नागर खण्ड · अध्याय 260
शालग्राम-कथानक का उपसंहार तथा श्रवणफल-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.260.1)
गालव उवाच । इति ते कथितं सर्वं शालग्रामकथानकम् । महेश्वरस्य चोत्पत्तिर्यथा लिंगत्वमाप सः
gālava uvāca iti te kathitaṁ sarvaṁ śālagrāmakathānakam maheśvarasya cotpattiryathā liṁgatvamāpa saḥ
गालव ने कहा — इस प्रकार तुम्हें शालग्राम का संपूर्ण कथानक कह दिया गया, और यह भी कि महेश्वर किस प्रकार लिंगत्व को प्राप्त हुए।
श्लोक 2 (skanda.6.260.2)
तस्माद्वरं लिंगरूपं शालग्रामगतं हरिम् । येऽर्चयंति नरा भक्त्या न तेषां दुःखयातनाः
tasmādvaraṁ liṁgarūpaṁ śālagrāmagataṁ harim ye'rcayaṁti narā bhaktyā na teṣāṁ duḥkhayātanāḥ
अतः जो मनुष्य शालग्राम में स्थित उस श्रेष्ठ लिंगरूप हरि की भक्तिपूर्वक अर्चना करते हैं, उन्हें दुःख की यातना नहीं होती।
श्लोक 3 (skanda.6.260.3)
चातुर्मास्ये समायाते विशेषात्पूजयेच्च तौ । अर्चितौ यावभेदेन स्वर्गमोक्षप्रदायकौ
cāturmāsye samāyāte viśeṣātpūjayecca tau arcitau yāvabhedena svargamokṣapradāyakau
चातुर्मास्य के आने पर विशेष रूप से उन दोनों की पूजा करनी चाहिए; भेदभाव के बिना पूजित हुए वे दोनों स्वर्ग और मोक्ष देने वाले होते हैं।
श्लोक 4 (skanda.6.260.4)
देवौ हरिहरौ भक्त्या विप्रवह्निगवां गतौ । येऽर्चयंति महाशूद्र तेषां मोक्षप्रदोहरिः
devau hariharau bhaktyā vipravahnigavāṁ gatau ye'rcayaṁti mahāśūdra teṣāṁ mokṣapradohariḥ
हे महाशूद्र! जो लोग विप्र, अग्नि तथा गौओं में निवास करने वाले हरि-हर दोनों देवों की भक्तिपूर्वक अर्चना करते हैं, उनके लिए हरि मोक्ष देने वाले हो जाते हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.260.5)
वेदोक्तं कारयेत्कर्म पूर्तेष्टं वेदतत्परः । पंचायतनपूजा च सत्यवादो ह्यलोलता
vedoktaṁ kārayetkarma pūrteṣṭaṁ vedatatparaḥ paṁcāyatanapūjā ca satyavādo hyalolatā
वेद में तत्पर रहकर वेदोक्त कर्म, पूर्त और इष्ट कर्म करने चाहिए; पंचायतन-पूजा, सत्यवचन तथा लोभरहितता भी।
श्लोक 6 (skanda.6.260.6)
विवेकादिगुणैर्युक्तः स शूद्रो याति सद्गतिम् । ब्रह्मचर्यं तपो नान्यद्द्वादशाक्षरचिंतनात्
vivekādiguṇairyuktaḥ sa śūdro yāti sadgatim brahmacaryaṁ tapo nānyaddvādaśākṣaraciṁtanāt
विवेक आदि गुणों से युक्त वह शूद्र सद्गति को प्राप्त होता है; ब्रह्मचर्य तथा द्वादशाक्षर के चिंतन के अतिरिक्त अन्य कोई तप नहीं है।
श्लोक 7 (skanda.6.260.7)
मन्त्रैर्विना षोडश सोपचारैः कार्या सुपूजा नरकादिहंतुः । यथा तथा वै गिरिजापतेश्च कार्या महा शूद्र महाघहंत्री
mantrairvinā ṣoḍaśa sopacāraiḥ kāryā supūjā narakādihaṁtuḥ yathā tathā vai girijāpateśca kāryā mahā śūdra mahāghahaṁtrī
हे महाशूद्र! मंत्रों के बिना, षोडशोपचार से नरक आदि का नाश करने वाली उत्तम पूजा करनी चाहिए; उसी प्रकार महापाप का नाश करने वाली गिरिजापति की भी पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 8 (skanda.6.260.8)
ब्रह्मोवाच । एवं कथयतोरेषा रजनी क्षयमाययौ । सच्छूद्रो गालवश्चैव शिष्यैश्च परिवारितः
brahmovāca evaṁ kathayatoreṣā rajanī kṣayamāyayau sacchūdro gālavaścaiva śiṣyaiśca parivāritaḥ
ब्रह्मा ने कहा — इस प्रकार दोनों के वार्तालाप करते-करते वह रात्रि समाप्त हो गई; उस सच्छूद्र और शिष्यों से घिरे गालव ने —
श्लोक 9 (skanda.6.260.9)
स तेन पूजितो विप्रो ययौ शीघ्रं निजाश्रमम्
sa tena pūjito vipro yayau śīghraṁ nijāśramam
— उस [शूद्र] के द्वारा सम्मानित हुए वे विप्र शीघ्र ही अपने आश्रम को चले गए।
श्लोक 10 (skanda.6.260.10)
य इमं श्रुणुयान्मर्त्यो वाचयेत्पाठयेच्च वा । श्लोकं वा सर्वमपि च तस्य पुण्यक्षयो न हि
ya imaṁ śruṇuyānmartyo vācayetpāṭhayecca vā ślokaṁ vā sarvamapi ca tasya puṇyakṣayo na hi
जो भी मर्त्य इसे सुनेगा, अथवा दूसरों को सुनाएगा या पढ़ाएगा, चाहे एक श्लोक या इसका संपूर्ण भाग — उसके पुण्य का क्षय कभी नहीं होगा।