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नागर खण्ड · अध्याय 261

पार्वती को विष्णु-शिव-दर्शन, कार्तिकेय-मिलन तथा द्वादशाक्षर-ध्यानयोग का वर्णन

अध्याय 260अध्याय-सूचीअध्याय 262

श्लोक 1 (skanda.6.261.1)

नारद उवाच । कथं नित्या भगवती हरपत्नी यशस्विनी । योगसिद्धिं सुमहतीं प्राप मासचतुष्टये

nārada uvāca kathaṁ nityā bhagavatī harapatnī yaśasvinī yogasiddhiṁ sumahatīṁ prāpa māsacatuṣṭaye

नारद ने कहा — वह नित्या, यशस्विनी भगवती हरपत्नी चार महीनों में इतनी महान योगसिद्धि किस प्रकार प्राप्त हुई?

श्लोक 2 (skanda.6.261.2)

मन्त्रराजमिमं जप्त्वा द्वादशाक्षरसंभवम् । एतन्मे विस्तरेण त्वं कथयस्व यथातथम्

mantrarājamimaṁ japtvā dvādaśākṣarasaṁbhavam etanme vistareṇa tvaṁ kathayasva yathātatham

द्वादशाक्षरों से उत्पन्न इस मन्त्रराज का जप करके [उन्होंने जो प्राप्त किया], वह सब मुझे यथार्थतः विस्तारपूर्वक कहिए।

श्लोक 3 (skanda.6.261.3)

ब्रह्मोवाच । चातुर्मास्ये हरौ सुप्ते पार्वती नियतव्रता । मनसा कर्मणा वाचा हरिभक्तिपरायणा

brahmovāca cāturmāsye harau supte pārvatī niyatavratā manasā karmaṇā vācā haribhaktiparāyaṇā

ब्रह्मा ने कहा — चातुर्मास्य में हरि के शयन करने पर, नियमव्रता पार्वती मन, कर्म और वाणी से हरि-भक्ति में परायण होकर,

श्लोक 4 (skanda.6.261.4)

चारुशृंगे पितुर्नित्यं तिष्ठंती तपसि स्थिता । देवद्विजाग्निगोऽश्वत्थातिथिपूजापरायणा

cāruśṛṁge piturnityaṁ tiṣṭhaṁtī tapasi sthitā devadvijāgnigo'śvatthātithipūjāparāyaṇā

पिता के मनोहर शिखर पर सदा रहती हुई, तप में स्थित, देव, द्विज, अग्नि, गौ, अश्वत्थ तथा अतिथि की पूजा में तत्पर रहीं।

श्लोक 5 (skanda.6.261.5)

चातुर्मास्येऽथ संप्राप्ते विमले हरिवासरे । जजाप परमं मंत्रं यथादिष्टं पिनाकिना

cāturmāsye'tha saṁprāpte vimale harivāsare jajāpa paramaṁ maṁtraṁ yathādiṣṭaṁ pinākinā

चातुर्मास्य के आने पर, हरि के निर्मल दिन में, उन्होंने पिनाकी (शिव) के बताए अनुसार उस परम मंत्र का जप किया।

श्लोक 6 (skanda.6.261.6)

शंखचक्रधरो विष्णुश्चतुर्हस्तः किरीटधृक् । मेघश्यामोंऽबुजाक्षश्च सूर्यकोटिसमप्रभः

śaṁkhacakradharo viṣṇuścaturhastaḥ kirīṭadhṛk meghaśyāmoṁ'bujākṣaśca sūryakoṭisamaprabhaḥ

शंख-चक्रधारी, चतुर्भुज, किरीटधारी विष्णु, मेघ के समान श्याम, कमलनयन, तथा करोड़ों सूर्यों के समान प्रभावाले,

श्लोक 7 (skanda.6.261.7)

गरुडाधिष्ठितो हृष्टो वसन्व्याप्य जगत्त्रयम् । श्रीवत्सकौस्तुभयुतः पीतकौशेयवस्त्रकः

garuḍādhiṣṭhito hṛṣṭo vasanvyāpya jagattrayam śrīvatsakaustubhayutaḥ pītakauśeyavastrakaḥ

गरुड़ पर आरूढ़, प्रसन्न, तीनों लोकों को व्याप्त करके निवास करते हुए, श्रीवत्स तथा कौस्तुभ से युक्त, पीत रेशमी वस्त्र धारण किए हुए,

श्लोक 8 (skanda.6.261.8)

सर्वाभरणशोभाभिरभिदीप्तमहावपुः । बभाषे पार्वतीं विष्णुः प्रसन्नवदनः शुभाम् । देवि तुष्टो ऽस्मि भद्रं ते कथयस्व तवेप्सितम्

sarvābharaṇaśobhābhirabhidīptamahāvapuḥ babhāṣe pārvatīṁ viṣṇuḥ prasannavadanaḥ śubhām devi tuṣṭo 'smi bhadraṁ te kathayasva tavepsitam

तथा समस्त आभूषणों की शोभा से देदीप्यमान महान शरीरवाले, प्रसन्नमुख विष्णु ने शुभ पार्वती से कहा — हे देवि! मैं संतुष्ट हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, अपनी अभिलषित वस्तु कहो।

श्लोक 9 (skanda.6.261.9)

पार्वत्युवाच । तज्ज्ञानममलं देहि येन नावर्त्तनं भवेत् । इत्युक्तः स महाविष्णुः प्रत्युवाच हरप्रियाम्

pārvatyuvāca tajjñānamamalaṁ dehi yena nāvarttanaṁ bhavet ityuktaḥ sa mahāviṣṇuḥ pratyuvāca harapriyām

पार्वती ने कहा — मुझे वह निर्मल ज्ञान दीजिए, जिससे पुनरागमन (जन्म-मरण) न हो। यह सुनकर वे महाविष्णु हर-प्रिया से बोले —

श्लोक 10 (skanda.6.261.10)

स एव देवदेवेशस्तव वक्ष्यत्यसंशयम् । स एव भगवान्साक्षी देहांतरबहिःस्थितः

sa eva devadeveśastava vakṣyatyasaṁśayam sa eva bhagavānsākṣī dehāṁtarabahiḥsthitaḥ

वे ही देवदेवेश तुम्हें निःसंदेह वह ज्ञान बताएँगे; वे ही भगवान साक्षी हैं, जो देह के भीतर और बाहर दोनों ओर स्थित हैं,

श्लोक 11 (skanda.6.261.11)

विश्वस्रष्टा च गोप्ता च पवित्राणां च पावनः । अनादिनिधनो धर्मो धर्मादीनां प्रभुर्हि सः

viśvasraṣṭā ca goptā ca pavitrāṇāṁ ca pāvanaḥ anādinidhano dharmo dharmādīnāṁ prabhurhi saḥ

विश्व के स्रष्टा और रक्षक, पवित्रों के भी पावनकर्ता, आदि-अंत रहित धर्म — वे ही धर्मादि पुरुषार्थों के भी प्रभु हैं।

श्लोक 12 (skanda.6.261.12)

अक्षरत्रयसेव्यं यत्सकलं ब्रह्म एव सः । मूर्त्तामूर्त्तस्वरूपेण योऽजो जन्मधरो हि सः

akṣaratrayasevyaṁ yatsakalaṁ brahma eva saḥ mūrttāmūrttasvarūpeṇa yo'jo janmadharo hi saḥ

जो तीन अक्षरों से सेव्य वह संपूर्ण ब्रह्म है, वे ही हैं; जो अजन्मा होते हुए भी मूर्त और अमूर्त स्वरूप से जन्म धारण करते हैं, वे ही हैं।

श्लोक 13 (skanda.6.261.13)

ममाधिकारो नैवास्ति वक्तुं तव न संशयः । इत्युक्त्वा भगवानीशो विरराम प्रहृष्टवान्

mamādhikāro naivāsti vaktuṁ tava na saṁśayaḥ ityuktvā bhagavānīśo virarāma prahṛṣṭavān

— यह तुम्हें बताने का मुझे कोई अधिकार नहीं है, इसमें संदेह नहीं। ऐसा कहकर भगवान ईश अत्यंत प्रसन्न होकर मौन हो गए।

श्लोक 14 (skanda.6.261.14)

एतस्मिन्नंतरे शंभुर्गिरिजाश्रममभ्यगात् । सर्वभूत गणैर्युक्तो विमाने सार्वकामिके

etasminnaṁtare śaṁbhurgirijāśramamabhyagāt sarvabhūta gaṇairyukto vimāne sārvakāmike

इसी बीच शंभु, समस्त भूतगणों के साथ, अपने सर्वकामिक विमान में गिरिजा के आश्रम पर पहुँचे।

श्लोक 15 (skanda.6.261.15)

तया वै भगवान्देवः पूजितः परमेश्वरः । सखीनामपि प्रत्यक्षमाश्चर्यं समजायत

tayā vai bhagavāndevaḥ pūjitaḥ parameśvaraḥ sakhīnāmapi pratyakṣamāścaryaṁ samajāyata

उस पार्वती ने भगवान परमेश्वर की पूजा की; और सखियों के भी प्रत्यक्ष एक आश्चर्य घटित हुआ।

श्लोक 16 (skanda.6.261.16)

स्तुत्वाऽथ तं महादेवं विष्णुर्देहे लयं ययौ । अथोवाच महेशानः पार्वतीं परमेश्वरः

stutvā'tha taṁ mahādevaṁ viṣṇurdehe layaṁ yayau athovāca maheśānaḥ pārvatīṁ parameśvaraḥ

तब उस महादेव की स्तुति करके विष्णु उनके शरीर में लीन हो गए; तत्पश्चात् महेशान परमेश्वर ने पार्वती से कहा —

श्लोक 17 (skanda.6.261.17)

विमानवरमारुह्य तुष्टोऽहं तव सुव्रते । गत्वैकांतप्रदेशं ते कथये परमं महः

vimānavaramāruhya tuṣṭo'haṁ tava suvrate gatvaikāṁtapradeśaṁ te kathaye paramaṁ mahaḥ

हे सुव्रते! इस उत्तम विमान पर चढ़कर मैं तुमसे संतुष्ट हूँ; एकांत प्रदेश में जाकर मैं तुम्हें परम तेज बताऊँगा।

श्लोक 18 (skanda.6.261.18)

एवमुक्त्वा भगवतीं करे गृह्य मुदान्वितः । विमानवरमारोप्य लीलया प्रययौ तदा

evamuktvā bhagavatīṁ kare gṛhya mudānvitaḥ vimānavaramāropya līlayā prayayau tadā

ऐसा कहकर, प्रसन्नतापूर्वक भगवती का हाथ पकड़कर, उत्तम विमान पर बिठाकर, वे तब लीलापूर्वक चल पड़े।

श्लोक 19 (skanda.6.261.19)

नानाधातुमयानद्रीन्नानारत्नविचित्रितान् । नदीनिर्झरकुंजांश्च नदान्कोकिलकूजितान्

nānādhātumayānadrīnnānāratnavicitritān nadīnirjharakuṁjāṁśca nadānkokilakūjitān

[उन्हें दिखलाते हुए] नाना धातुओं से बने, नाना रत्नों से विचित्रित पर्वत, नदियाँ, झरने, कुंज तथा कोकिल के कूजन से गुँजायमान नद —

श्लोक 20 (skanda.6.261.20)

अखातान्देवखातांश्च गंगाद्याः सरितस्तथा । सौगंधिकांश्च कल्हारान्सहस्रदलपिंजरान्

akhātāndevakhātāṁśca gaṁgādyāḥ saritastathā saugaṁdhikāṁśca kalhārānsahasradalapiṁjarān

प्राकृतिक और देव-निर्मित सरोवर, गंगा आदि नदियाँ, तथा सुगंधित कमल, कल्हार, सहस्रदल स्वर्णिम पद्म —

श्लोक 21 (skanda.6.261.21)

दर्शन्यकर्णिकारांश्च कोविदारान्महाद्रुमान् । तालांस्तमालान्हिंतालान्प्रियंगून्पनसानपि

darśanyakarṇikārāṁśca kovidārānmahādrumān tālāṁstamālānhiṁtālānpriyaṁgūnpanasānapi

दर्शनीय कर्णिकार वृक्ष, कोविदार तथा अन्य महावृक्ष, ताल, तमाल, हिंताल, प्रियंगु तथा कटहल के वृक्ष भी —

श्लोक 22 (skanda.6.261.22)

तिलकान्बकुलांश्चैव बहूनपि च पुष्पितान् । क्षेत्राणि कलनाभानि पिञ्जराणि विदर्शयन्

tilakānbakulāṁścaiva bahūnapi ca puṣpitān kṣetrāṇi kalanābhāni piñjarāṇi vidarśayan

तिलक तथा बकुल के वृक्ष, और अनेक अन्य पुष्पित वृक्ष, तथा नवांकुरों से सुशोभित स्वर्णाभ क्षेत्रों को दिखलाते हुए,

श्लोक 23 (skanda.6.261.23)

ययौ देवनदीतीरे गतं शरवणं महत् । फुल्लकाशं स्वर्णमयं शरस्तंबगणान्वितम्

yayau devanadītīre gataṁ śaravaṇaṁ mahat phullakāśaṁ svarṇamayaṁ śarastaṁbagaṇānvitam

वे देवनदी के तट पर स्थित उस महान शरवण की ओर गए, जो पुष्पित काश से युक्त, स्वर्णमय तथा सरकंडों के झुरमुटों से भरा हुआ था।

श्लोक 24 (skanda.6.261.24)

हेम भूमिविभागस्थं वह्निकांतिमृगद्विजम् । तत्र तीरगतानां च मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्

hema bhūmivibhāgasthaṁ vahnikāṁtimṛgadvijam tatra tīragatānāṁ ca munīnāmūrdhvaretasām

वह स्वर्णिम भूमि पर स्थित था, जिसके मृग और पक्षी अग्नि की कांति के समान थे; और वहाँ तट पर रहने वाले ऊर्ध्वरेता मुनियों के —

श्लोक 25 (skanda.6.261.25)

आश्रमान्स विमानाग्रे तिष्ठन्पत्न्यै प्रदर्शयत् । षट्कृत्तिकाश्च ददृशे पार्वती वनसन्निधौ

āśramānsa vimānāgre tiṣṭhanpatnyai pradarśayat ṣaṭkṛttikāśca dadṛśe pārvatī vanasannidhau

— उनके आश्रमों को विमान के अग्रभाग में खड़े होकर उन्होंने अपनी पत्नी को दिखलाया; और पार्वती ने वन के निकट छहों कृत्तिकाओं को देखा,

श्लोक 26 (skanda.6.261.26)

स्नाताः स्वलंकृताश्चन्द्रपत्न्यस्ता विरजांबराः । ऊचुस्ता योजितकरा केऽयं पुत्राय गम्यते

snātāḥ svalaṁkṛtāścandrapatnyastā virajāṁbarāḥ ūcustā yojitakarā ke'yaṁ putrāya gamyate

स्नान की हुई, सुसज्जित, निर्मल वस्त्र धारण किए चंद्र की उन पत्नियों ने हाथ जोड़कर कहा — यह कौन पुत्र के लिए यहाँ आया है?

श्लोक 27 (skanda.6.261.27)

तत्कथ्यतां महाभागे स च ते दर्शनं गतः

tatkathyatāṁ mahābhāge sa ca te darśanaṁ gataḥ

हे महाभागे! वह बताइए — क्या वह आपकी दृष्टि में आ गया है?

श्लोक 28 (skanda.6.261.28)

पार्वत्युवाच । मम भाग्यवशात्पुत्रः कथमुत्संगमाहरेत् । न ह्यभाग्यवशात्पुंसां क्वापि सौख्यं निरन्तरम्

pārvatyuvāca mama bhāgyavaśātputraḥ kathamutsaṁgamāharet na hyabhāgyavaśātpuṁsāṁ kvāpi saukhyaṁ nirantaram

पार्वती ने कहा — मेरे भाग्यवश पुत्र मेरी गोद में कैसे आ सकता है? दुर्भाग्यशाली मनुष्यों को कहीं भी निरंतर सुख नहीं मिलता।

श्लोक 29 (skanda.6.261.29)

सुतनाम्नाप्यहं दृष्ट्वा भवतीनां च दर्शनात् । किमर्थमिह संप्राप्ताः कथ्यतामविलंबितम्

sutanāmnāpyahaṁ dṛṣṭvā bhavatīnāṁ ca darśanāt kimarthamiha saṁprāptāḥ kathyatāmavilaṁbitam

पुत्र के नाम मात्र से भी मैं विचलित हो जाती हूँ, तथा तुम्हें देखकर भी; तुम यहाँ किस प्रयोजन से आई हो, बिना विलंब के बताओ।

श्लोक 30 (skanda.6.261.30)

कृत्तिका ऊचुः । वयं तव सुतं न्यस्तं प्रदातुमिह सुन्दरि । चातुर्मास्ये रवौ स्नातुमागता देवनिम्नगाम्

kṛttikā ūcuḥ vayaṁ tava sutaṁ nyastaṁ pradātumiha sundari cāturmāsye ravau snātumāgatā devanimnagām

कृत्तिकाओं ने कहा — हे सुंदरी! हम तुम्हारे उस सुत को लौटाने आई हैं, जो हमें सौंपा गया था; चातुर्मास्य में हम रविवार को देवनदी में स्नान करने आई थीं।

श्लोक 31 (skanda.6.261.31)

पार्वत्युवाच । न हास्यावसरः सख्यः सत्यमेव हि कथ्यताम् । एकांतावसरे हास्यं जायते चेतरेतरम्

pārvatyuvāca na hāsyāvasaraḥ sakhyaḥ satyameva hi kathyatām ekāṁtāvasare hāsyaṁ jāyate cetaretaram

पार्वती ने कहा — हे सखियो! यह हँसी का अवसर नहीं है, सत्य ही कहो; हँसी तो एकांत के अवसर पर पारस्परिक रूप से होती है।

श्लोक 32 (skanda.6.261.32)

कृत्तिका ऊचुः । सत्यं वदामहे देवि तव त्रैलोक्यशोभिते । अस्य स्तंबसमूहस्य मध्यस्थं बालकं वृणु

kṛttikā ūcuḥ satyaṁ vadāmahe devi tava trailokyaśobhite asya staṁbasamūhasya madhyasthaṁ bālakaṁ vṛṇu

कृत्तिकाओं ने कहा — हे त्रैलोक्य को सुशोभित करने वाली देवि! हम सत्य ही कह रही हैं; इस सरकंडों के झुरमुट के मध्य स्थित बालक को चुन लो।

श्लोक 33 (skanda.6.261.33)

कृत्तिकानां वचः श्रुत्वा शंकिता पार्वती तदा । ददर्श बालं दीप्ताभं षण्मुखं दीप्तवर्चसम्

kṛttikānāṁ vacaḥ śrutvā śaṁkitā pārvatī tadā dadarśa bālaṁ dīptābhaṁ ṣaṇmukhaṁ dīptavarcasam

कृत्तिकाओं के वचन सुनकर, तब शंकित पार्वती ने देखा — एक तेजस्वी, षण्मुख, प्रज्वलित कांतिवाला बालक,

श्लोक 34 (skanda.6.261.34)

तडित्कोटिप्रतीकाशं रूपदिव्यश्रिया युतम् । वह्निपुत्रं च गांगेयं कार्तिकेयं महाबलम्

taḍitkoṭipratīkāśaṁ rūpadivyaśriyā yutam vahniputraṁ ca gāṁgeyaṁ kārtikeyaṁ mahābalam

करोड़ों बिजलियों के समान कांतिवाला, दिव्य रूप-श्री से युक्त — अग्नि का पुत्र, गंगापुत्र, महाबली कार्तिकेय।

श्लोक 35 (skanda.6.261.35)

सा वत्सेति गृहीत्वा तं कुमारं पाणिना मुदा । विमानमध्यमादाय कृत्वोत्संगे ह्युवाच ह

sā vatseti gṛhītvā taṁ kumāraṁ pāṇinā mudā vimānamadhyamādāya kṛtvotsaṁge hyuvāca ha

'हे वत्स!' कहकर उन्होंने उस कुमार को प्रसन्नतापूर्वक हाथों से पकड़ा, विमान के मध्य में लाकर गोद में बिठाया, और कहा —

श्लोक 36 (skanda.6.261.36)

चिरंजीव चिरं नन्द चिरं नंदय बाधवान् । इत्युक्त्वा गाढमालिंग्य मूर्ध्नि चाघ्राय तं सुतम्

ciraṁjīva ciraṁ nanda ciraṁ naṁdaya bādhavān ityuktvā gāḍhamāliṁgya mūrdhni cāghrāya taṁ sutam

'चिरंजीवी हो, चिरकाल तक आनंदित रहो, चिरकाल तक अपने बंधुओं को आनंदित करो' — ऐसा कहकर उन्होंने उस पुत्र को कसकर आलिंगन किया और सिर सूँघा,

श्लोक 37 (skanda.6.261.37)

संहृष्टा परमोदारं भास्वरं हृष्टमानसम् । कार्तिकेयो महाप्रेम्णा प्रणिपत्य महेश्वरम्

saṁhṛṣṭā paramodāraṁ bhāsvaraṁ hṛṣṭamānasam kārtikeyo mahāpremṇā praṇipatya maheśvaram

अत्यंत हर्षित होकर, उस परम उदार, तेजस्वी, प्रसन्नचित्त पुत्र के साथ; कार्तिकेय ने भी महाप्रेम से महेश्वर को प्रणाम किया,

श्लोक 38 (skanda.6.261.38)

ततः प्रांजलिरव्यग्रः प्रहृष्टेनांतरात्मना । तद्विमानं ययौ शीघ्रं तीर्त्वा नदनदीपतीन्

tataḥ prāṁjaliravyagraḥ prahṛṣṭenāṁtarātmanā tadvimānaṁ yayau śīghraṁ tīrtvā nadanadīpatīn

तत्पश्चात् हाथ जोड़े हुए, अव्यग्र होकर, प्रसन्न अंतरात्मा से, वह विमान नद-नदियों के स्वामियों (समुद्रों) को पार करते हुए शीघ्र आगे बढ़ा,

श्लोक 39 (skanda.6.261.39)

जंबुद्वीपमतिक्रम्य लक्षयोजनमायतम् । ततः समुद्रं द्विगुणं लवणोदं तथैव च

jaṁbudvīpamatikramya lakṣayojanamāyatam tataḥ samudraṁ dviguṇaṁ lavaṇodaṁ tathaiva ca

एक लाख योजन विस्तृत जंबुद्वीप को पार करके, तत्पश्चात् उससे दुगुने विस्तार वाले लवण-समुद्र को भी,

श्लोक 40 (skanda.6.261.40)

उत्तरांश्च कुरून्नीत्वा विमानेनार्कतेजसा । समुद्रद्विगुणं द्वीपं कुशनाभेति कीर्तितम्

uttarāṁśca kurūnnītvā vimānenārkatejasā samudradviguṇaṁ dvīpaṁ kuśanābheti kīrtitam

तथा सूर्य के समान तेजस्वी विमान से उत्तर कुरुओं को पार करके, समुद्र से दुगुने आकार वाले, कुशनाभ नामक द्वीप को [पार करते हुए],

श्लोक 41 (skanda.6.261.41)

दिव्यलोकसमाक्रांतं दिव्यपर्वतसंकुलम् । इक्षूदाद्विगुणं द्वीपं तद्द्वीपाद्द्विगुणः पुनः

divyalokasamākrāṁtaṁ divyaparvatasaṁkulam ikṣūdādviguṇaṁ dvīpaṁ taddvīpāddviguṇaḥ punaḥ

जो दिव्यलोकों से आक्रांत तथा दिव्य पर्वतों से भरा था; उससे दुगुना विस्तृत इक्षुरस-सागर था, और उससे भी दुगुना [अगला द्वीप था],

श्लोक 42 (skanda.6.261.42)

तमतिक्रम्य तत्सिन्धोर्दविगुणं क्रौंचसंज्ञितम् । ततोऽपि द्विगुणः सिन्धुः सुरोदो यक्षसेवितः

tamatikramya tatsindhordaviguṇaṁ krauṁcasaṁjñitam tato'pi dviguṇaḥ sindhuḥ surodo yakṣasevitaḥ

उसे पार करके, उस सागर से दुगुने आकार वाला क्रौंच नामक द्वीप था; उससे भी दुगुना यक्षसेवित सुरोद सागर था,

श्लोक 43 (skanda.6.261.43)

ततोऽपि द्विगुणं द्वीपं शाकद्वीपेतिसंज्ञितम् । अर्णवद्विगुणं तस्मादाज्यरूपं सुनिर्मितं

tato'pi dviguṇaṁ dvīpaṁ śākadvīpetisaṁjñitam arṇavadviguṇaṁ tasmādājyarūpaṁ sunirmitaṁ

उससे भी दुगुना शाकद्वीप नामक द्वीप था; उससे दुगुना घृत के रूप में सुनिर्मित सागर था,

श्लोक 44 (skanda.6.261.44)

परमस्वादसंपूर्णं यत्र सिद्धाः समंततः । तस्माच्च द्विगुणं द्वीपं शाल्मलीवृक्षसंज्ञितम्

paramasvādasaṁpūrṇaṁ yatra siddhāḥ samaṁtataḥ tasmācca dviguṇaṁ dvīpaṁ śālmalīvṛkṣasaṁjñitam

जो परम स्वाद से परिपूर्ण था, और जहाँ चारों ओर सिद्धगण निवास करते थे; उससे भी दुगुना, शाल्मली वृक्ष के नाम पर द्वीप था,

श्लोक 45 (skanda.6.261.45)

समुद्रो द्विगुणस्तत्र दधिमंडोदसंभवः । साध्या वसंति नियतं महत्तपसि संस्थिताः

samudro dviguṇastatra dadhimaṁḍodasaṁbhavaḥ sādhyā vasaṁti niyataṁ mahattapasi saṁsthitāḥ

वहाँ दधि-मंड (मट्ठे) के रूप में उत्पन्न दुगुना सागर था; वहाँ साध्यगण निरंतर महातप में स्थित होकर निवास करते हैं।

श्लोक 46 (skanda.6.261.46)

ततोऽपि द्विगुणं द्वीपं प्लक्षनामेति विश्रुतम् । क्षीरोदो द्विगुणस्तत्र यत्रयत्रमहर्षयः

tato'pi dviguṇaṁ dvīpaṁ plakṣanāmeti viśrutam kṣīrodo dviguṇastatra yatrayatramaharṣayaḥ

उससे भी दुगुना, प्लक्ष नाम से विख्यात द्वीप था; वहाँ दुगुना क्षीरसागर था, जहाँ-जहाँ महर्षिगण [निवास करते थे]।

श्लोक 47 (skanda.6.261.47)

षडिमानि सुदिव्यानि भौमः स्वर्ग उदाहृतः । तत्र स्वर्णमयी भूमिस्तथा रजतसंयुता

ṣaḍimāni sudivyāni bhaumaḥ svarga udāhṛtaḥ tatra svarṇamayī bhūmistathā rajatasaṁyutā

ये छहों अत्यंत दिव्य कहे गए हैं — यह भूलोक का स्वर्ग है; वहाँ स्वर्णमयी भूमि है, और रजत से भी संयुक्त है।

श्लोक 48 (skanda.6.261.48)

दृष्टवा मधूपलस्वादैः सर्वकामप्रदायका । यत्र स्त्रीपुरुषाणां च कल्पवृक्षा गृहे स्थिताः

dṛṣṭavā madhūpalasvādaiḥ sarvakāmapradāyakā yatra strīpuruṣāṇāṁ ca kalpavṛkṣā gṛhe sthitāḥ

मधु के समान स्वाद वाली, समस्त कामनाएँ प्रदान करने वाली उन भूमियों को देखा, जहाँ स्त्री-पुरुषों के घरों में कल्पवृक्ष स्थित हैं,

श्लोक 49 (skanda.6.261.49)

वासांसि भूषणानां च समूहान्हर्षयंति च । एतानि दक्षचिह्नानि द्वीपानि मुनिसत्तम

vāsāṁsi bhūṣaṇānāṁ ca samūhānharṣayaṁti ca etāni dakṣacihnāni dvīpāni munisattama

जो वस्त्र और आभूषणों के समूहों से उन्हें हर्षित करते हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! ये द्वीप दक्ष की व्यवस्था के चिह्न हैं।

श्लोक 50 (skanda.6.261.50)

महेश्वरो विमानेन व्यतिक्रामद्विहायसा । प्लक्षद्वीपस्य च प्रांते द्विगुणः क्षीरसागरः

maheśvaro vimānena vyatikrāmadvihāyasā plakṣadvīpasya ca prāṁte dviguṇaḥ kṣīrasāgaraḥ

महेश्वर विमान द्वारा आकाश-मार्ग से आगे बढ़ते गए; प्लक्षद्वीप के छोर पर दुगुना क्षीरसागर था,

श्लोक 51 (skanda.6.261.51)

तन्मध्ये सुमह्द्वीपं श्वेतं नाम सुनिश्चितम् । रम्यकः पर्वतस्तत्र शतशृंगोमितद्रुमः

tanmadhye sumahdvīpaṁ śvetaṁ nāma suniścitam ramyakaḥ parvatastatra śataśṛṁgomitadrumaḥ

उसके मध्य में श्वेत नामक एक अत्यंत विशाल द्वीप निश्चित रूप से था; वहाँ रम्यक नामक पर्वत था, जिसके सौ शिखर और असंख्य वृक्ष थे।

श्लोक 52 (skanda.6.261.52)

तस्य शृंगे महद्दिव्ये विमानं स्थापितं तदा । तदाऽमृतफलैर्वृक्षैः सेविते हेमवालुके

tasya śṛṁge mahaddivye vimānaṁ sthāpitaṁ tadā tadā'mṛtaphalairvṛkṣaiḥ sevite hemavāluke

उसके महान दिव्य शिखर पर तब विमान स्थापित किया गया, जो अमृतफल वाले वृक्षों से सेवित तथा स्वर्णिम बालू वाला था,

श्लोक 53 (skanda.6.261.53)

क्षीरच्छेदेन विहृते शिलातलसुसंवृते । विविक्ते सर्वसुभगे मणिरत्नसमन्विते

kṣīracchedena vihṛte śilātalasusaṁvṛte vivikte sarvasubhage maṇiratnasamanvite

जो दूध की धारा से सुशोभित, चट्टानों के तल से भलीभाँति आवृत, एकांत, सर्वथा सुंदर तथा मणि-रत्नों से युक्त था।

श्लोक 54 (skanda.6.261.54)

उमायै कथयामास देवदेवः पिनाकधृक् । कार्तिकेयोऽपि शुश्राव गुह्याद्गुह्यतरं महत्

umāyai kathayāmāsa devadevaḥ pinākadhṛk kārtikeyo'pi śuśrāva guhyādguhyataraṁ mahat

वहाँ पिनाकधारी देवदेव ने उमा से कहा; और कार्तिकेय ने भी उस गुह्य से भी अधिक गुह्य, महान तत्त्व को सुना —

श्लोक 55 (skanda.6.261.55)

ध्यानयोगं मंत्ररूपं द्वादशाक्षरसंज्ञितम् । प्रणवेन युतं साग्रं सरहस्यं श्रुतेः परम्

dhyānayogaṁ maṁtrarūpaṁ dvādaśākṣarasaṁjñitam praṇavena yutaṁ sāgraṁ sarahasyaṁ śruteḥ param

— द्वादशाक्षर नाम से प्रसिद्ध, मंत्ररूप ध्यानयोग को, प्रणव से युक्त, अपने सार तथा रहस्य सहित, श्रुति से भी परे।

श्लोक 56 (skanda.6.261.56)

ईश्वर उवाच । अक्षरत्रयसंयुक्तो मन्त्रोऽयं सकृदक्षरः । माघमासहितश्चायममाक्षोहेनश्चायममायो विश्वपावनः

īśvara uvāca akṣaratrayasaṁyukto mantro'yaṁ sakṛdakṣaraḥ māghamāsahitaścāyamamākṣohenaścāyamamāyo viśvapāvanaḥ

ईश्वर ने कहा — यह मन्त्र तीन अक्षरों से संयुक्त, अविनाशी अक्षरों वाला है; माघ मास के माहात्म्य से युक्त, अक्षोभ्य तथा अव्यय यह विश्व का पावन करने वाला है (मूल पाठ इस स्थान पर अशुद्ध/खंडित प्राप्त हुआ है)।

श्लोक 57 (skanda.6.261.57)

विष्णुगम्यो विष्णु मध्यो मन्त्रत्रयसमन्वितः । तुरीयकलयाऽशेषब्रह्मांडगणसेवितः

viṣṇugamyo viṣṇu madhyo mantratrayasamanvitaḥ turīyakalayā'śeṣabrahmāṁḍagaṇasevitaḥ

विष्णु के द्वारा प्राप्य, विष्णु ही जिसके मध्य में हैं, तीनों मंत्रों से युक्त, तथा अपनी तुरीय कला से संपूर्ण ब्रह्मांड-समूहों द्वारा सेवित,

श्लोक 58 (skanda.6.261.58)

निष्कामैर्मुनिभिः सेव्यो महाविद्यादिसेवितः । नाभितः शिरसि व्याप्त अखण्डसुखदायकः

niṣkāmairmunibhiḥ sevyo mahāvidyādisevitaḥ nābhitaḥ śirasi vyāpta akhaṇḍasukhadāyakaḥ

निष्काम मुनियों द्वारा सेव्य, महाविद्याओं आदि से सेवित, नाभि से मस्तक तक व्याप्त, अखंड सुख देने वाला,

श्लोक 59 (skanda.6.261.59)

ओंकारेति प्रियोक्तिस्ते महादुःखविनाशनः । तं पूर्वं प्रणवं ध्यात्वा ज्ञानरूपं सुखाश्रयम्

oṁkāreti priyoktiste mahāduḥkhavināśanaḥ taṁ pūrvaṁ praṇavaṁ dhyātvā jñānarūpaṁ sukhāśrayam

'ओंकार' नाम से प्रिय रूप से कहा जाने वाला, महादुःख का नाशक — पहले उस ज्ञानरूप, सुख के आश्रयस्वरूप प्रणव का ध्यान करके,

श्लोक 60 (skanda.6.261.60)

ज्ञात्वा सर्वगतं ब्रह्म देहशोधनतत्परः । पद्मासनपरो भूत्वा संपूज्य ज्ञानलोचनः

jñātvā sarvagataṁ brahma dehaśodhanatatparaḥ padmāsanaparo bhūtvā saṁpūjya jñānalocanaḥ

उसे सर्वव्यापी ब्रह्म जानकर, देह-शुद्धि में तत्पर होकर, पद्मासन में स्थित होकर, ज्ञान-चक्षु से भलीभाँति पूजा करके,

श्लोक 61 (skanda.6.261.61)

नेत्रे मुकुलिते कृत्वा शुरो करौ कृत्वा तु संहतौ । चेतसि ध्यानरूपेण चिंतयेच्छिवमंगलम्

netre mukulite kṛtvā śuro karau kṛtvā tu saṁhatau cetasi dhyānarūpeṇa ciṁtayecchivamaṁgalam

नेत्रों को अर्धनिमीलित करके तथा दोनों हाथों को जोड़कर, मन में ध्यानरूप से मंगलमय शिव का चिंतन करना चाहिए,

श्लोक 62 (skanda.6.261.62)

तडित्कोटिप्रतीकाशं सूर्यकोटिसमच्छविम् । चन्द्रलक्षसमच्छन्नं पुरुषं द्योतिताखिलम्

taḍitkoṭipratīkāśaṁ sūryakoṭisamacchavim candralakṣasamacchannaṁ puruṣaṁ dyotitākhilam

करोड़ों बिजलियों के समान कांतिवाले, करोड़ों सूर्यों के समान प्रभावाले, तथा लाखों चंद्रमाओं से मानो आच्छादित उस पुरुष का, जो संपूर्ण जगत को आलोकित करते हैं,

श्लोक 63 (skanda.6.261.63)

मूर्त्तामूर्त्तवैराजं तं सदसद्रूप मव्यम् । चिंतयित्वा विराड्रूपं न भूयःस्तनपो भवेत् । चातुर्मास्ये सकृदपि ध्यानात्कल्मषसंक्षयः

mūrttāmūrttavairājaṁ taṁ sadasadrūpa mavyam ciṁtayitvā virāḍrūpaṁ na bhūyaḥstanapo bhavet cāturmāsye sakṛdapi dhyānātkalmaṣasaṁkṣayaḥ

मूर्त और अमूर्त, विराट स्वरूप वाले, सत्-असत् दोनों रूपों वाले, अविनाशी उस स्वरूप का चिंतन करके — विराट रूप का चिंतन करने वाला पुनः स्तनपान करने वाला (शिशु रूप में जन्म लेने वाला) नहीं होता; चातुर्मास्य में एक बार भी ध्यान करने से पापों का क्षय हो जाता है।

श्लोक 64 (skanda.6.261.64)

एवं च मद्रूपमिदं मुरारेरमोघवीर्यं गुण तोप्यपारम् । विलोकयेद्योऽघविनाशनाय क्षणं प्रभुर्जन्मशतोद्भवाय

evaṁ ca madrūpamidaṁ murāreramoghavīryaṁ guṇa topyapāram vilokayedyo'ghavināśanāya kṣaṇaṁ prabhurjanmaśatodbhavāya

इस प्रकार यह मेरा ही रूप, जो मुरारि (विष्णु) का भी रूप है, अमोघ वीर्यवाला तथा गुणों में भी अपार है — जो कोई भी पाप के नाश के लिए क्षणभर भी इसका अवलोकन करता है, वह प्रभु सैकड़ों जन्मों से मुक्त हो जाता है।

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