नागर खण्ड · अध्याय 25
विष्णुपदीगङ्गामाहात्म्यवर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.25.1)
सूत उवाच। तत्राश्चर्यमभूत्पूर्वं यत्तद्ब्राह्मणसत्तमाः। तद्वोऽहं संप्रवक्ष्यामि गंगामाहात्म्यसंभवम्
sūta uvāca| tatrāścaryamabhūtpūrvaṁ yattadbrāhmaṇasattamāḥ| tadvo'haṁ saṁpravakṣyāmi gaṁgāmāhātmyasaṁbhavam
सूत जी ने कहा -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वहाँ पूर्वकाल में जो अद्भुत घटना हुई थी, गंगा-माहात्म्य से जुड़ी वह घटना अब मैं तुम्हें सुनाता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.6.25.2)
चमत्कारपुरे विप्रः पुरासीत्संशितव्रतः। चंडशर्मेति विख्यातो रूपौदार्यगुणान्वितः
camatkārapure vipraḥ purāsītsaṁśitavrataḥ| caṁḍaśarmeti vikhyāto rūpaudāryaguṇānvitaḥ
चमत्कारपुर में पहले एक दृढ़-व्रती ब्राह्मण रहता था, जो चंडशर्मा के नाम से विख्यात था और रूप तथा उदारता के गुणों से युक्त था।
श्लोक 3 (skanda.6.25.3)
स यदा यौवनोपेतस्तदा वेश्यानुरागकृत्। श्रोत्रियोऽप्यभवद्विप्रो यौवनोद्भारपीडितः
sa yadā yauvanopetastadā veśyānurāgakṛt| śrotriyo'pyabhavadvipro yauvanodbhārapīḍitaḥ
जब वह युवावस्था को प्राप्त हुआ, तब वेदज्ञ ब्राह्मण होते हुए भी वह युवावस्था के भार से पीड़ित होकर एक वेश्या के प्रति आसक्त हो गया।
श्लोक 4 (skanda.6.25.4)
स कदाचिन्निशीथेऽथ तृषार्तश्च समुत्थितः। प्रार्थयामास तां वेश्यां पानीयं पातुमुत्सहे
sa kadācinniśīthe'tha tṛṣārtaśca samutthitaḥ| prārthayāmāsa tāṁ veśyāṁ pānīyaṁ pātumutsahe
एक बार आधी रात को प्यास से व्याकुल होकर उठकर उसने उस वेश्या से कहा -- मुझे पानी पीने की इच्छा है, मुझे दो।
श्लोक 5 (skanda.6.25.5)
अथ सा सलिलभ्रांत्या करकं मद्यसंभवम्। समादाय ददौ पानं तस्मै निद्राकुलाय च
atha sā salilabhrāṁtyā karakaṁ madyasaṁbhavam| samādāya dadau pānaṁ tasmai nidrākulāya ca
तब उसने जल समझने की भूल से मदिरा से भरा घड़ा उठाकर, नींद में डूबे उस ब्राह्मण को पीने के लिए दे दिया।
श्लोक 6 (skanda.6.25.6)
मुखमध्यगते मद्ये सोऽपि तां कोपसंयुतः। वेश्यां प्रभर्त्सयामास धिग्धिक्शब्दैर्मुहुर्मुहुः
mukhamadhyagate madye so'pi tāṁ kopasaṁyutaḥ| veśyāṁ prabhartsayāmāsa dhigdhikśabdairmuhurmuhuḥ
जैसे ही मदिरा उसके मुख में गई, वह क्रोध से भरकर उस वेश्या को बार-बार 'धिक्कार है, धिक्कार है' कहकर फटकारने लगा।
श्लोक 7 (skanda.6.25.7)
किमिदंकिमिदं पापे त्वया कर्म विगर्हितम्। कृतं यन्मुखमध्ये मे प्रक्षिप्ता निंदिता सुरा
kimidaṁkimidaṁ pāpe tvayā karma vigarhitam| kṛtaṁ yanmukhamadhye me prakṣiptā niṁditā surā
'यह क्या, यह क्या, हे पापिन! तूने यह कैसा निंदनीय कर्म किया, कि मेरे मुख में यह घृणित मदिरा डाल दी!'
श्लोक 8 (skanda.6.25.8)
ब्राह्मण्यमद्य मे नष्टं मद्यपानादसंशयम्। प्रायश्चित्तं करिष्यामि तस्मादात्मविशुद्धये
brāhmaṇyamadya me naṣṭaṁ madyapānādasaṁśayam| prāyaścittaṁ kariṣyāmi tasmādātmaviśuddhaye
'मदिरापान के कारण आज निःसंदेह मेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है; इसलिए मैं अपनी शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त करूँगा।'
श्लोक 9 (skanda.6.25.9)
एवमुक्त्वा विनिष्क्रम्य तद्गृहाद्दुःखसंयुतः। रुरोदाथ तदा गत्वा करुणं निर्जने वने
evamuktvā viniṣkramya tadgṛhādduḥkhasaṁyutaḥ| rurodātha tadā gatvā karuṇaṁ nirjane vane
ऐसा कहकर वह दुःख से भरा हुआ उस घर से निकल गया, और एक निर्जन वन में जाकर करुण विलाप करने लगा।
श्लोक 10 (skanda.6.25.10)
ततः प्रभातवेलायां स्नात्वा वस्त्रसमन्वितः। त्यक्त्वा गात्रस्य रोमाणि समस्तानि द्विजोत्तमाः
tataḥ prabhātavelāyāṁ snātvā vastrasamanvitaḥ| tyaktvā gātrasya romāṇi samastāni dvijottamāḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! फिर प्रातःकाल स्नान कर, वस्त्र धारण कर, और शरीर के सभी बालों को मुंडवाकर --
श्लोक 11 (skanda.6.25.11)
संप्राप्तो विप्रमुख्यानां सभा यत्र व्यवस्थिता। पठंति सर्वशास्त्राणि वेदांतानि च कृत्स्नशः
saṁprāpto vipramukhyānāṁ sabhā yatra vyavasthitā| paṭhaṁti sarvaśāstrāṇi vedāṁtāni ca kṛtsnaśaḥ
वह वहाँ पहुँचा जहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मणों की सभा बैठी हुई थी, जो समस्त शास्त्रों और सम्पूर्ण वेदांत का अध्ययन कर रहे थे।
श्लोक 12 (skanda.6.25.12)
अथासौ प्रणिपत्योच्चैः प्रोवाच द्विजसत्तमान्। जलभ्रांत्या सुरा पीता मया कुरुत निग्रहम्
athāsau praṇipatyoccaiḥ provāca dvijasattamān| jalabhrāṁtyā surā pītā mayā kuruta nigraham
तब उसने झुककर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से ऊँचे स्वर में कहा -- जल समझने की भूल से मैंने मदिरा पी ली है, मुझे दंड दीजिए।
श्लोक 13 (skanda.6.25.13)
अथ ते धर्मशास्त्राणि प्रविचार्य पुनःपुनः। तमूचुर्ब्राह्मणाः सर्वे प्रायश्चित्तकृते स्थितम्
atha te dharmaśāstrāṇi pravicārya punaḥpunaḥ| tamūcurbrāhmaṇāḥ sarve prāyaścittakṛte sthitam
तब उन सभी ब्राह्मणों ने धर्मशास्त्रों पर बार-बार विचार कर, प्रायश्चित्त के लिए तत्पर उस ब्राह्मण से कहा --
श्लोक 14 (skanda.6.25.14)
ब्राह्मणा ऊचुः। अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि सुरां चेद्ब्राह्मणः पिबेत्। अग्निवर्णं घृतं पीत्वा तावन्मात्रं विशुध्यति
brāhmaṇā ūcuḥ| ajñānājjñānato vāpi surāṁ cedbrāhmaṇaḥ pibet| agnivarṇaṁ ghṛtaṁ pītvā tāvanmātraṁ viśudhyati
ब्राह्मणों ने कहा -- यदि कोई ब्राह्मण अनजाने में या जानबूझकर मदिरा पी ले, तो अग्नि के समान तपाए हुए घी को उतनी ही मात्रा में पीकर शुद्ध हो जाता है।
श्लोक 15 (skanda.6.25.15)
स त्वं वांछसि चेच्छुद्धिमग्निवर्णं घृतं पिब। यावन्मात्रा सुरा पीता तावन्मात्रं विशुद्धये
sa tvaṁ vāṁchasi cecchuddhimagnivarṇaṁ ghṛtaṁ piba| yāvanmātrā surā pītā tāvanmātraṁ viśuddhaye
यदि तुम शुद्धि चाहते हो, तो जितनी मदिरा पी है, अपनी शुद्धि के लिए उतना ही अग्नि-तप्त घी पी लो।
श्लोक 16 (skanda.6.25.16)
स तथेति प्रतिज्ञाय घृतमादाय तत्क्षणात्। चक्रे वह्निसमं यावत्पानार्थं द्विजसत्तमाः
sa tatheti pratijñāya ghṛtamādāya tatkṣaṇāt| cakre vahnisamaṁ yāvatpānārthaṁ dvijasattamāḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! 'ऐसा ही होगा' कहकर उसने तुरंत घी लेकर उसे पीने के लिए अग्नि के समान तपाना शुरू कर दिया।
श्लोक 17 (skanda.6.25.17)
तावत्तस्य पिता प्राप्तः श्रुत्वा वार्तां सभार्यकः। किमिदं किमिदं पुत्र ब्रुवाणो दुःखसंयुतः। अश्रुपूर्णेक्षणो दीनो वाष्पगद्गदया गिरा
tāvattasya pitā prāptaḥ śrutvā vārtāṁ sabhāryakaḥ| kimidaṁ kimidaṁ putra bruvāṇo duḥkhasaṁyutaḥ| aśrupūrṇekṣaṇo dīno vāṣpagadgadayā girā
इतने में यह समाचार सुनकर उसका पिता अपनी पत्नी सहित वहाँ आ पहुँचा, और दुःख से भरकर, आँसुओं से भरी दीन आँखों तथा गद्गद वाणी से बोला -- 'यह क्या है, यह क्या है, पुत्र?'
श्लोक 18 (skanda.6.25.18)
ततः स कथयामास सर्वरात्रिसमुद्भवम्। वृत्तांतं तच्च विप्राणां प्रायश्चित्तं यथोचितम्
tataḥ sa kathayāmāsa sarvarātrisamudbhavam| vṛttāṁtaṁ tacca viprāṇāṁ prāyaścittaṁ yathocitam
तब उसने रात्रि में घटी सारी घटना और ब्राह्मणों द्वारा बताया गया उचित प्रायश्चित्त, दोनों को कह सुनाया।
श्लोक 19 (skanda.6.25.19)
अथ स ब्राह्मणान्प्राह सर्वांस्तान्द्विजसत्तमाः। प्रायश्चित्तं सुतायास्मै ममान्यत्संप्रदीयताम्
atha sa brāhmaṇānprāha sarvāṁstāndvijasattamāḥ| prāyaścittaṁ sutāyāsmai mamānyatsaṁpradīyatām
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! तब उसने उन सब ब्राह्मणों से कहा -- मेरे इस पुत्र के लिए कोई और प्रायश्चित्त दिया जाए।
श्लोक 20 (skanda.6.25.20)
संचिन्त्य धर्मशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः। सर्वस्वमपि दास्यामि पुत्रहेतोरसंशयम्
saṁcintya dharmaśāstrāṇi vicārya ca punaḥ punaḥ| sarvasvamapi dāsyāmi putrahetorasaṁśayam
धर्मशास्त्रों पर बार-बार विचार करने के बाद, पुत्र के लिए मैं अपना सर्वस्व भी देने को तैयार हूँ, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 21 (skanda.6.25.21)
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे भूयोभूयश्च सादरम्। विचिंत्य धर्मशास्त्राणि तमूचुर्मुनिसत्तमाः
tataste brāhmaṇāḥ sarve bhūyobhūyaśca sādaram| viciṁtya dharmaśāstrāṇi tamūcurmunisattamāḥ
तब हे श्रेष्ठ मुनियो! उन सब ब्राह्मणों ने बार-बार आदरपूर्वक धर्मशास्त्रों पर विचार कर उससे कहा --
श्लोक 22 (skanda.6.25.22)
नान्यदस्ति सुरापाने प्रायश्चित्तं द्विजन्मनाम्। मौंजीहोमं विना विप्र यद्युक्तं तत्समाचर
nānyadasti surāpāne prāyaścittaṁ dvijanmanām| mauṁjīhomaṁ vinā vipra yadyuktaṁ tatsamācara
मौंजी-होम के अतिरिक्त द्विजों के मदिरापान का कोई और प्रायश्चित्त नहीं है; हे ब्राह्मण! जो भी उचित हो, वही करो।
श्लोक 23 (skanda.6.25.23)
ततः स स्वसुतं प्राह नैव त्वं कर्तुमर्हसि। यच्छ दानानि विप्रेभ्यस्तीर्थयात्रां समाचर
tataḥ sa svasutaṁ prāha naiva tvaṁ kartumarhasi| yaccha dānāni viprebhyastīrthayātrāṁ samācara
तब उस पिता ने अपने पुत्र से कहा -- तुम्हें यह नहीं करना चाहिए; ब्राह्मणों को दान दो और तीर्थयात्रा करो।
श्लोक 24 (skanda.6.25.24)
ततः शुद्धिं समाप्नोषि क्रमान्नियमसंयुतः। व्रतैश्च विविधैश्चीर्णैः सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम्
tataḥ śuddhiṁ samāpnoṣi kramānniyamasaṁyutaḥ| vrataiśca vividhaiścīrṇaiḥ satyametadbravīmyaham
नियमों का पालन करते हुए और नाना व्रतों का आचरण करते हुए तुम क्रमशः शुद्धि प्राप्त करोगे -- मैं यह सत्य कहता हूँ।
श्लोक 25 (skanda.6.25.25)
न ब्राह्मणसमादिष्टं प्रायश्चित्त विशुद्धये
na brāhmaṇasamādiṣṭaṁ prāyaścitta viśuddhaye
ब्राह्मणों द्वारा बताया गया वह प्रायश्चित्त (मौंजी-होम) शुद्धि के लिए (उचित) नहीं है।
श्लोक 26 (skanda.6.25.26)
पुत्र उवाच। एतन्मम महाभागा यद्ब्रुवंति व्रतादिकम्। तस्मात्कार्यो मया तात मौंजीहोमो न संशयः
putra uvāca| etanmama mahābhāgā yadbruvaṁti vratādikam| tasmātkāryo mayā tāta mauṁjīhomo na saṁśayaḥ
पुत्र ने कहा -- हे तात! उन महाभागों ने जो व्रत आदि बताया है, वही मेरे लिए उचित है; इसलिए मुझे मौंजी-होम अवश्य करना चाहिए, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 27 (skanda.6.25.27)
यन्मया तु कृतं बाल्ये तत्सर्वं क्षंतुमर्हसि
yanmayā tu kṛtaṁ bālye tatsarvaṁ kṣaṁtumarhasi
बचपन में मैंने जो कुछ किया है, उस सबके लिए आप मुझे क्षमा करें।
श्लोक 28 (skanda.6.25.28)
सूत उवाच। तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा स पिता सुतवत्सलः। सर्वस्वं प्रददौ रुष्टो मरणे कृतनिश्चयः
sūta uvāca| tasya taṁ niścayaṁ jñātvā sa pitā sutavatsalaḥ| sarvasvaṁ pradadau ruṣṭo maraṇe kṛtaniścayaḥ
सूत जी ने कहा -- पुत्र का वह निश्चय जानकर पुत्र-वत्सल पिता ने क्रुद्ध होकर अपना सर्वस्व दान कर दिया, और मृत्यु का निश्चय कर लिया।
श्लोक 29 (skanda.6.25.29)
साऽपि तस्य सती भार्या कृत्वा मृत्युविनिश्चयम्। तमुवाच सुतं दृष्ट्वा सर्वं दत्त्वा गृहादिकम्
sā'pi tasya satī bhāryā kṛtvā mṛtyuviniścayam| tamuvāca sutaṁ dṛṣṭvā sarvaṁ dattvā gṛhādikam
उसकी सती पत्नी ने भी मृत्यु का निश्चय कर, घर आदि सब कुछ दान करने के बाद, पुत्र को देखकर उससे कहा --
श्लोक 30 (skanda.6.25.30)
आवाभ्यां संप्रविष्टाभ्यां वह्नौ पुत्र ततस्तदा। मौंजीहोमस्त्वया कार्यो मां तातं यदि मन्यसे
āvābhyāṁ saṁpraviṣṭābhyāṁ vahnau putra tatastadā| mauṁjīhomastvayā kāryo māṁ tātaṁ yadi manyase
'हे पुत्र! जब हम दोनों अग्नि में प्रवेश कर लें, तब यदि तू हमें अपने माता-पिता मानता है, तो मौंजी-होम अवश्य करना।'
श्लोक 31 (skanda.6.25.31)
ततस्तौ दम्पती हृष्टौ यावद्वह्निसमीपगौ। संजातौ मरणार्थाय स च ताभ्यां समुद्भवः
tatastau dampatī hṛṣṭau yāvadvahnisamīpagau| saṁjātau maraṇārthāya sa ca tābhyāṁ samudbhavaḥ
फिर वह दंपती, मृत्यु के लिए तत्पर, प्रसन्न होकर अग्नि के निकट पहुँच गए, और इसी बीच वह घटना घट गई --
श्लोक 32 (skanda.6.25.32)
तावत्प्राप्तो मुनिर्नाम शांडिल्यो वेदपारगः। तीर्थयात्राप्रसंगेन तत्र देशे द्विजोत्तमाः
tāvatprāpto munirnāma śāṁḍilyo vedapāragaḥ| tīrthayātrāprasaṁgena tatra deśe dvijottamāḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! तभी वेद-पारंगत शांडिल्य नामक मुनि तीर्थयात्रा के प्रसंग में उस देश में आ पहुँचे।
श्लोक 33 (skanda.6.25.33)
स वृत्तांतं समाकर्ण्य कोपसंरक्तलोचनः। अब्रवीद्ब्राह्मणान्सर्वान्भर्त्समानो मुहुर्मुहुः
sa vṛttāṁtaṁ samākarṇya kopasaṁraktalocanaḥ| abravīdbrāhmaṇānsarvānbhartsamāno muhurmuhuḥ
वह सारा वृत्तांत सुनकर, क्रोध से लाल हुई आँखों से, बार-बार उन सब ब्राह्मणों को फटकारते हुए बोले --
श्लोक 34 (skanda.6.25.34)
अहो मूढतमा यूयं यदेतद्ब्राह्मणत्रयम्। वृथा मृत्युमवाप्नोति निग्रहे सुगमे सति
aho mūḍhatamā yūyaṁ yadetadbrāhmaṇatrayam| vṛthā mṛtyumavāpnoti nigrahe sugame sati
'अरे, तुम कितने मूर्ख हो, कि यह ब्राह्मण-त्रय (माता, पिता और पुत्र) व्यर्थ ही मृत्यु को प्राप्त हो रहा है, जबकि एक सरल उपाय मौजूद है!'
श्लोक 35 (skanda.6.25.35)
अत्र कात्यायनेनोक्तं यद्वचः सुमहात्मना। तच्छृण्वन्तु द्विजाः सर्वे प्रायश्चित्ती तथाप्ययम्
atra kātyāyanenoktaṁ yadvacaḥ sumahātmanā| tacchṛṇvantu dvijāḥ sarve prāyaścittī tathāpyayam
'महात्मा कात्यायन ने जो वचन इस विषय में कहा है, उसे सब ब्राह्मण सुनें -- इसके लिए भी प्रायश्चित्त है।'
श्लोक 36 (skanda.6.25.36)
चांद्रायणानि कृच्छ्राणि तथा सांतपनानि च। प्रायश्चित्तानि दीयंते यत्र गंगा न विद्यते
cāṁdrāyaṇāni kṛcchrāṇi tathā sāṁtapanāni ca| prāyaścittāni dīyaṁte yatra gaṁgā na vidyate
'चांद्रायण, कृच्छ्र-व्रत और सांतपन आदि प्रायश्चित्त वहाँ दिए जाते हैं, जहाँ गंगा उपस्थित न हो।'
श्लोक 37 (skanda.6.25.37)
अत्र विष्णुपदी गंगा तत्क्षेत्रे तु द्विजोत्तमाः। तस्यां स्नानं करोत्वेष ततः शुद्धिमवाप्स्यति
atra viṣṇupadī gaṁgā tatkṣetre tu dvijottamāḥ| tasyāṁ snānaṁ karotveṣa tataḥ śuddhimavāpsyati
'हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! किंतु इसी क्षेत्र में विष्णुपदी गंगा विद्यमान है -- यह उसमें स्नान करे, तभी शुद्धि प्राप्त करेगा।'
श्लोक 38 (skanda.6.25.38)
मौंजीहोमः प्रमाणं स्यान्मुनिवाक्येन चेद्भवेत्। तदेतदपि वाक्यं हि कात्यायनमुनेः स्फुटम्
mauṁjīhomaḥ pramāṇaṁ syānmunivākyena cedbhavet| tadetadapi vākyaṁ hi kātyāyanamuneḥ sphuṭam
यदि मुनि के वचन से मौंजी-होम प्रमाणित हो सकता है, तो कात्यायन मुनि का यह स्पष्ट वचन भी उतना ही प्रमाणित है।
श्लोक 39 (skanda.6.25.39)
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे हर्षेण महतान्विताः। साधुसाध्विति तं प्रोच्य प्रोचुः सत्यमिदं मुने
tataste brāhmaṇāḥ sarve harṣeṇa mahatānvitāḥ| sādhusādhviti taṁ procya procuḥ satyamidaṁ mune
तब वे सभी ब्राह्मण अत्यंत हर्ष से भरकर, 'साधु, साधु' कहकर उनसे बोले -- हे मुनि! यह सत्य है।
श्लोक 40 (skanda.6.25.40)
ततः प्रबोध्य तं विप्रं निन्युस्तत्र द्विजोत्तमाः। यत्र विष्णुपदी गंगा स्वयमेव व्यवस्थिता
tataḥ prabodhya taṁ vipraṁ ninyustatra dvijottamāḥ| yatra viṣṇupadī gaṁgā svayameva vyavasthitā
तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने उस ब्राह्मण को समझाकर वहाँ ले जाया जहाँ विष्णुपदी गंगा स्वयं विराजमान थी।
श्लोक 41 (skanda.6.25.41)
तत्र स ब्राह्मणो यावद्गंगातोयसमुद्भवम्। गंडूषं कुरुते वक्त्रे तावच्छुद्धो बभूव सः। उदरादखिलं तोयं निष्क्रांतं द्विजसत्तमाः
tatra sa brāhmaṇo yāvadgaṁgātoyasamudbhavam| gaṁḍūṣaṁ kurute vaktre tāvacchuddho babhūva saḥ| udarādakhilaṁ toyaṁ niṣkrāṁtaṁ dvijasattamāḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ज्योंही उस ब्राह्मण ने अपने मुख में गंगाजल का कुल्ला किया, त्योंही वह शुद्ध हो गया, और उसके उदर से समस्त (मदिरा का) जल बाहर निकल गया।
श्लोक 42 (skanda.6.25.42)
ततोऽवगाहते यावत्तस्यास्तोयं सुशोभनम्। तावदाकाशसंभूता गम्भीरोवाच भारती
tato'vagāhate yāvattasyāstoyaṁ suśobhanam| tāvadākāśasaṁbhūtā gambhīrovāca bhāratī
फिर ज्योंही वह उसके सुंदर जल में डूबा, त्योंही आकाश से एक गंभीर वाणी सुनाई दी --
श्लोक 43 (skanda.6.25.43)
शुद्धोऽयं ब्राह्मणः साक्षाद्विष्णुपद्याः समागमात्। स्नानादाचमनादेव तस्माद्यातु गृहं निजम्
śuddho'yaṁ brāhmaṇaḥ sākṣādviṣṇupadyāḥ samāgamāt| snānādācamanādeva tasmādyātu gṛhaṁ nijam
'यह ब्राह्मण विष्णुपदी के संपर्क से, केवल स्नान और आचमन मात्र से ही साक्षात् शुद्ध हो गया है; इसलिए यह अपने घर जाए।'
श्लोक 44 (skanda.6.25.44)
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे चंडशर्मादयश्च ये। दिष्ट्यादिष्ट्येति जल्पन्तः स्वानि हर्म्याणि भेजिरे
tataste brāhmaṇāḥ sarve caṁḍaśarmādayaśca ye| diṣṭyādiṣṭyeti jalpantaḥ svāni harmyāṇi bhejire
तब चंडशर्मा आदि वे सभी ब्राह्मण 'सौभाग्य है, सौभाग्य है' कहते हुए अपने-अपने घरों को लौट गए।
श्लोक 45 (skanda.6.25.45)
सूत उवाच। एवं प्रभावा सा विप्रा गंगा विष्णुपदी स्थिता। तस्य क्षेत्रस्य सीमांते पश्चिमे पापनाशिनी
sūta uvāca| evaṁ prabhāvā sā viprā gaṁgā viṣṇupadī sthitā| tasya kṣetrasya sīmāṁte paścime pāpanāśinī
सूत जी ने कहा -- हे ब्राह्मणो! ऐसी प्रभावशाली वह विष्णुपदी गंगा है, जो उस क्षेत्र की पश्चिमी सीमा पर स्थित है और पाप का नाश करने वाली है।
श्लोक 46 (skanda.6.25.46)
एतद्वः सर्वमाख्यातं विष्णुपद्याः समुद्भवम्। माहात्म्यं ब्राह्मणश्रेष्ठाः सर्वपातकनाशनम्
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ viṣṇupadyāḥ samudbhavam| māhātmyaṁ brāhmaṇaśreṣṭhāḥ sarvapātakanāśanam
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! यह सब मैंने तुम्हें विष्णुपदी की उत्पत्ति और उसका सर्वपाप-नाशक माहात्म्य सुनाया।