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नागर खण्ड · अध्याय 263

कर्मयोग-उपदेश तथा मत्स्येन्द्रनाथ की उत्पत्ति का वर्णन

अध्याय 262अध्याय-सूचीअध्याय 264

श्लोक 1 (skanda.6.263.1)

ईश्वर उवाच । यदि चेत्तामसं कर्म त्यक्त्वा कर्मसु जायते । तदा ज्ञानमयो योगी जीवतां मोक्षदायकः

īśvara uvāca yadi cettāmasaṁ karma tyaktvā karmasu jāyate tadā jñānamayo yogī jīvatāṁ mokṣadāyakaḥ

ईश्वर ने कहा — यदि तामसिक कर्म को त्यागकर मनुष्य कर्मों में प्रवृत्त होता है, तो वह ज्ञानमय योगी जीवित रहते हुए ही मोक्षदायक बन जाता है।

श्लोक 2 (skanda.6.263.2)

यदा निर्ममता देहे यदा चित्तं सुनिर्मलम् । यदा हरौ भक्तियोगस्तदा बन्धो न कर्मणा

yadā nirmamatā dehe yadā cittaṁ sunirmalam yadā harau bhaktiyogastadā bandho na karmaṇā

जब देह में ममता नहीं रहती, जब चित्त पूर्णतः निर्मल हो जाता है, जब हरि में भक्तियोग होता है, तब कर्म से बंधन नहीं होता।

श्लोक 3 (skanda.6.263.3)

कुर्वन्नेव हि कर्माणि मनः शांतं नृणां यदा । तदा योगमयी सिद्धिर्जायते नात्र संशयः

kurvanneva hi karmāṇi manaḥ śāṁtaṁ nṛṇāṁ yadā tadā yogamayī siddhirjāyate nātra saṁśayaḥ

कर्म करते हुए भी जब मनुष्यों का मन शांत रहता है, तब योगमयी सिद्धि उत्पन्न होती है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 4 (skanda.6.263.4)

गुरुत्वं स्थानमसकृदनुभूय महामतिः । जीवन्विष्णुत्वमासाद्य कर्म संगात्प्रमुच्यते

gurutvaṁ sthānamasakṛdanubhūya mahāmatiḥ jīvanviṣṇutvamāsādya karma saṁgātpramucyate

गुरुत्व-पद का बार-बार अनुभव करके, महामति पुरुष जीवित रहते हुए ही विष्णुत्व को प्राप्त कर, कर्म की आसक्ति से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 5 (skanda.6.263.5)

कर्माणि नित्यजातानि नित्यनैमित्तिकानि च । इच्छया नैव सेव्यानि दुःखतापविवृद्धये

karmāṇi nityajātāni nityanaimittikāni ca icchayā naiva sevyāni duḥkhatāpavivṛddhaye

नित्य और नैमित्तिक कर्म कभी भी इच्छापूर्वक नहीं किए जाने चाहिए, अन्यथा वे दुःख और संताप की वृद्धि करने वाले हो जाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.6.263.6)

कर्मणामीशितारं च विष्णुं विद्धि महेश्वरि । तस्मिन्संत्यज्य सर्वाणि संसारान्मुच्यतेऽखिलात्

karmaṇāmīśitāraṁ ca viṣṇuṁ viddhi maheśvari tasminsaṁtyajya sarvāṇi saṁsārānmucyate'khilāt

हे महेश्वरि! विष्णु को ही समस्त कर्मों का नियन्ता जानो; उन्हीं में सब कुछ अर्पित करके मनुष्य संपूर्ण संसार से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 7 (skanda.6.263.7)

एतदेव परं ज्ञानमेतदेव परं तपः । एतदेव परं श्रेयो यत्कृष्णे कर्मणोऽर्पणम्

etadeva paraṁ jñānametadeva paraṁ tapaḥ etadeva paraṁ śreyo yatkṛṣṇe karmaṇo'rpaṇam

यही परम ज्ञान है, यही परम तप है, यही परम श्रेय है — कि कर्म को कृष्ण को अर्पित कर दिया जाए।

श्लोक 8 (skanda.6.263.8)

अयं हि निर्मलो योगो निर्गुणः स उदाहृतः । तद्विष्णोः कर्म जनितं शुभत्व प्रतिपादनम्

ayaṁ hi nirmalo yogo nirguṇaḥ sa udāhṛtaḥ tadviṣṇoḥ karma janitaṁ śubhatva pratipādanam

यह वस्तुतः निर्मल योग है, इसे निर्गुण कहा गया है; विष्णु के प्रति उत्पन्न वह कर्म शुभत्व का ही प्रतिपादन करने वाला है।

श्लोक 9 (skanda.6.263.9)

तावद्भ्रमंति संसारे पितरः पिंडतत्पराः । यावत्कुले भक्तियुतः स्तो नैव प्रजायते

tāvadbhramaṁti saṁsāre pitaraḥ piṁḍatatparāḥ yāvatkule bhaktiyutaḥ sto naiva prajāyate

पिण्डदान की अपेक्षा रखने वाले पितर तभी तक संसार में भटकते रहते हैं, जब तक कुल में भक्तियुक्त संतान उत्पन्न नहीं होती।

श्लोक 10 (skanda.6.263.10)

तावद्द्विजानि गर्जंति तावद्गर्जति पातकम् । तावत्तीर्थान्यनेकानि यावद्भक्तिं न विंदति

tāvaddvijāni garjaṁti tāvadgarjati pātakam tāvattīrthānyanekāni yāvadbhaktiṁ na viṁdati

जब तक मनुष्य को भक्ति प्राप्त नहीं होती, तब तक द्विजोचित कर्म भी शोर मचाते रहते हैं, तब तक पाप भी शोर मचाता रहता है, और तब तक अनेक तीर्थ भी [अनिवार्य बने रहते हैं]।

श्लोक 11 (skanda.6.263.11)

स एव ज्ञानवाँल्लोके योगिनां प्रथमो हि सः । महाक्रतूनामाहर्ता हरिभक्तियुतो हि सः

sa eva jñānavā~lloke yogināṁ prathamo hi saḥ mahākratūnāmāhartā haribhaktiyuto hi saḥ

वही संसार में ज्ञानवान है, वही योगियों में प्रथम है; वही, हरि की भक्ति से युक्त होकर, महायज्ञों का करने वाला है।

श्लोक 12 (skanda.6.263.12)

निमिषं निर्नयन्मेषं योगः समभिजायते । वाणीजये योगिनस्तु गोमेधश्च प्रकीर्तितः

nimiṣaṁ nirnayanmeṣaṁ yogaḥ samabhijāyate vāṇījaye yoginastu gomedhaśca prakīrtitaḥ

पलक की झपक को भी नियंत्रित करने से योग भलीभाँति उत्पन्न होता है; वाणी पर विजय पाने पर योगी के लिए वह गोमेध-यज्ञ के समान कहा गया है।

श्लोक 13 (skanda.6.263.13)

मनसो विजये नित्यमश्वमेधफलं लभेत् । कल्पनाविजयान्नित्यं यज्ञं सौत्रामणिं लभेत्

manaso vijaye nityamaśvamedhaphalaṁ labhet kalpanāvijayānnityaṁ yajñaṁ sautrāmaṇiṁ labhet

मन पर विजय पाने से नित्य अश्वमेध का फल प्राप्त होता है; कल्पना पर विजय पाने से नित्य सौत्रामणि यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 14 (skanda.6.263.14)

देहस्योत्सर्जनान्नित्यं नरयज्ञः प्रकीर्तितः । पंचेंद्रियपशून्हत्वाऽनग्नौ शीर्षे च कुण्डले

dehasyotsarjanānnityaṁ narayajñaḥ prakīrtitaḥ paṁceṁdriyapaśūnhatvā'nagnau śīrṣe ca kuṇḍale

देह के त्याग से नित्य नरयज्ञ कहा गया है; पाँचों इंद्रिय-रूपी पशुओं का, शिर-रूपी अग्नि में तथा कुण्डल-रूपी स्थान में, वध करके —

श्लोक 15 (skanda.6.263.15)

गुरूपदेशविधिना ब्रह्मभूतत्वमश्नुते । स योगी नियताहारोदण्डत्रितयधारकः

gurūpadeśavidhinā brahmabhūtatvamaśnute sa yogī niyatāhārodaṇḍatritayadhārakaḥ

— गुरु के उपदेश की विधि से मनुष्य ब्रह्मभूतत्व को प्राप्त करता है; वह योगी नियमित आहार वाला और त्रिदंड धारण करने वाला होता है।

श्लोक 16 (skanda.6.263.16)

त्रिदंडी स तु विज्ञेयो ज्ञाते देवे निरंजने । मनोदण्डः कर्मदण्डो वाग्दंडो यस्य योगिनः

tridaṁḍī sa tu vijñeyo jñāte deve niraṁjane manodaṇḍaḥ karmadaṇḍo vāgdaṁḍo yasya yoginaḥ

वही सच्चा त्रिदंडी जानना चाहिए, जिसने निरंजन देव को जान लिया है — वह योगी, जिसके मन का दंड, कर्म का दंड तथा वाणी का दंड [नियंत्रित हों]।

श्लोक 17 (skanda.6.263.17)

स योगी ब्रह्मरूपेण जीवन्नेव समाप्यते । अज्ञानी बाध्यते नित्यं कर्मभिर्बंधनात्मकैः

sa yogī brahmarūpeṇa jīvanneva samāpyate ajñānī bādhyate nityaṁ karmabhirbaṁdhanātmakaiḥ

वह योगी ब्रह्मरूप से जीवित रहते हुए ही पूर्णता को प्राप्त हो जाता है; किंतु अज्ञानी सदा बंधनकारी कर्मों से बाधित होता रहता है।

श्लोक 18 (skanda.6.263.18)

कुर्वन्नेव हि कर्माणि ज्ञानी मुक्तिं प्रयाति हि । यदा हि गुरुभिः स्थानं ब्रह्मणः प्रतिपाद्यते

kurvanneva hi karmāṇi jñānī muktiṁ prayāti hi yadā hi gurubhiḥ sthānaṁ brahmaṇaḥ pratipādyate

कर्म करते हुए भी ज्ञानी मुक्ति को प्राप्त हो जाता है; क्योंकि जब गुरुओं द्वारा ब्रह्म का स्थान बता दिया जाता है,

श्लोक 19 (skanda.6.263.19)

तदैष मुक्तिमाप्नोति देहस्तिष्ठति केवलम् । यावद्ब्रह्मफलावाप्त्यै प्रयाति पुरुषोत्तमः

tadaiṣa muktimāpnoti dehastiṣṭhati kevalam yāvadbrahmaphalāvāptyai prayāti puruṣottamaḥ

तब यह मुक्ति को प्राप्त हो जाता है; केवल देह ही तब तक स्थित रहती है, जब तक कि ब्रह्मफल की प्राप्ति के लिए पुरुषोत्तम प्रस्थान नहीं करता।

श्लोक 20 (skanda.6.263.20)

तावत्कर्ममयी वृत्तिर्ब्रह्म वृक्षांतराभवेत् । अवांतराणि पर्वाणि ज्ञेयानि मुनिभिः सदा

tāvatkarmamayī vṛttirbrahma vṛkṣāṁtarābhavet avāṁtarāṇi parvāṇi jñeyāni munibhiḥ sadā

तब तक कर्ममयी वृत्ति ब्रह्मरूपी वृक्ष के भीतर बनी रहती है; इसके अंतर्वर्ती चरणों को मुनियों को सदा जानना चाहिए।

श्लोक 21 (skanda.6.263.21)

मोक्षमार्गो द्विजैश्चैव श्रुतिस्मृतिसमुच्चयात् । मोक्षोऽयं नगराकारश्चतुर्द्वार समाकुलः

mokṣamārgo dvijaiścaiva śrutismṛtisamuccayāt mokṣo'yaṁ nagarākāraścaturdvāra samākulaḥ

द्विजों द्वारा श्रुति-स्मृति के समुच्चय से मोक्ष का मार्ग [जाना जाता है]; यह मोक्ष नगर के आकार वाला है, चार द्वारों से युक्त है।

श्लोक 22 (skanda.6.263.22)

द्वारपालास्तत्र नित्यं चत्वारस्तु शमादयः । त एव प्रथमं सेव्या मनुजैर्माक्षदायकाः

dvārapālāstatra nityaṁ catvārastu śamādayaḥ ta eva prathamaṁ sevyā manujairmākṣadāyakāḥ

वहाँ सदा चार द्वारपाल हैं — शम आदि; मोक्ष देने वाले वे ही सबसे पहले मनुष्यों द्वारा सेवनीय हैं।

श्लोक 23 (skanda.6.263.23)

शमश्च सद्विचारश्च संतोषः साधुसंगमः । एते वै हस्तगा यस्य तस्य सिद्धिर्न दूरतः

śamaśca sadvicāraśca saṁtoṣaḥ sādhusaṁgamaḥ ete vai hastagā yasya tasya siddhirna dūrataḥ

शम, सद्विचार, संतोष और साधुसंगति — जिसके हाथ में ये सब हों, उसकी सिद्धि दूर नहीं है।

श्लोक 24 (skanda.6.263.24)

योगसिद्धिर्विष्णुभक्त्या सद्धर्माचरणेन च । प्राप्यते मनुजैर्देवि ह्येतज्ज्ञानमलं विदुः

yogasiddhirviṣṇubhaktyā saddharmācaraṇena ca prāpyate manujairdevi hyetajjñānamalaṁ viduḥ

हे देवि! योगसिद्धि विष्णु-भक्ति तथा सद्धर्म के आचरण से मनुष्यों द्वारा प्राप्त होती है — यही निर्मल ज्ञान ज्ञानीजन जानते हैं।

श्लोक 25 (skanda.6.263.25)

ज्ञानार्थं च भ्रमन्मर्त्यो विद्यास्थानेषु सर्वशः । सद्यो ज्ञानं सद्गुरुतो दीपार्चिरिव निर्मला

jñānārthaṁ ca bhramanmartyo vidyāsthāneṣu sarvaśaḥ sadyo jñānaṁ sadguruto dīpārciriva nirmalā

ज्ञान के लिए मर्त्य मनुष्य सर्वत्र विद्या के स्थानों में भटकता है; किंतु सद्गुरु से ज्ञान तत्काल ही, दीपशिखा के समान निर्मल, प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 26 (skanda.6.263.26)

मुहूर्तमात्रमपि यो लयं चिंतयति ध्रुवम् । तस्य पापसहस्राणि विलयं यांति तत्क्षणात्

muhūrtamātramapi yo layaṁ ciṁtayati dhruvam tasya pāpasahasrāṇi vilayaṁ yāṁti tatkṣaṇāt

जो एक मुहूर्तमात्र भी दृढ़तापूर्वक लय का चिंतन करता है, उसके सहस्रों पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 27 (skanda.6.263.27)

रागद्वेषौ परित्यज्य क्रोधलोभविवर्जितः । सर्वत्र समदर्शी च विष्णुभक्तस्य दर्शनम्

rāgadveṣau parityajya krodhalobhavivarjitaḥ sarvatra samadarśī ca viṣṇubhaktasya darśanam

राग-द्वेष को त्यागकर, क्रोध और लोभ से रहित होकर, सर्वत्र समदर्शी होना ही विष्णुभक्त का सच्चा दर्शन है।

श्लोक 28 (skanda.6.263.28)

सर्वेषामपि जीवानां दया यस्य हृदि स्थिरा । शौचाचारसमायुक्तो योगी दुःखं न विंदति

sarveṣāmapi jīvānāṁ dayā yasya hṛdi sthirā śaucācārasamāyukto yogī duḥkhaṁ na viṁdati

जिसके हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति दया दृढ़ता से स्थित है, तथा जो शौच और सदाचार से युक्त है, वह योगी दुःख का अनुभव नहीं करता।

श्लोक 29 (skanda.6.263.29)

मायाधिपटलैर्हीनो मिथ्या वस्तुविरागवान् । कुसंसर्गविहीनश्च योगसिद्धेश्च लक्षणम्

māyādhipaṭalairhīno mithyā vastuvirāgavān kusaṁsargavihīnaśca yogasiddheśca lakṣaṇam

माया के आवरणों से रहित, मिथ्या वस्तुओं के प्रति विरागी, तथा कुसंगति से रहित होना — यही योगसिद्धि का लक्षण है।

श्लोक 30 (skanda.6.263.30)

ममतावह्निसंयोगो नराणां तापदायकः । उत्पन्नः शमनं तस्य योगिनां शांतिचारणम्

mamatāvahnisaṁyogo narāṇāṁ tāpadāyakaḥ utpannaḥ śamanaṁ tasya yogināṁ śāṁticāraṇam

ममतारूपी अग्नि का संयोग मनुष्यों को संताप देने वाला है; उत्पन्न हो जाने पर उसका शमन योगियों की शांति-साधना से ही होता है।

श्लोक 31 (skanda.6.263.31)

इन्द्रियाणामथोद्धृत्य मनसैव निषेधयेत् । यथा लोहेन लोहं च घर्षितं तीक्ष्णतां व्रजेत्

indriyāṇāmathoddhṛtya manasaiva niṣedhayet yathā lohena lohaṁ ca gharṣitaṁ tīkṣṇatāṁ vrajet

इंद्रियों को खींचकर मन के द्वारा ही उनका निषेध करना चाहिए, जिस प्रकार लोहे से घिसा हुआ लोहा तीक्ष्णता को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 32 (skanda.6.263.32)

बुद्धिर्हि द्विविधा देहे देया ग्राह्या विशुद्धिदा । संसारविषया त्याज्या परब्रह्मणि सा शुभा

buddhirhi dvividhā dehe deyā grāhyā viśuddhidā saṁsāraviṣayā tyājyā parabrahmaṇi sā śubhā

देह में बुद्धि दो प्रकार की होती है — एक त्याज्य, दूसरी शुद्धि देने वाली ग्राह्य; संसार-विषयक बुद्धि त्याज्य है, परब्रह्म-विषयक बुद्धि शुभ है।

श्लोक 33 (skanda.6.263.33)

अहंकारो यथा देवि पापपुण्यप्रदायकः । ज्ञाते तत्त्वे शुभफले कृतः संधाय नान्यथा

ahaṁkāro yathā devi pāpapuṇyapradāyakaḥ jñāte tattve śubhaphale kṛtaḥ saṁdhāya nānyathā

हे देवि! जिस प्रकार अहंकार पाप और पुण्य दोनों को देने वाला है, तत्त्व के ज्ञात हो जाने पर वह शुभ फल की ओर ही निर्देशित करके निष्प्रभावी किया जाता है, अन्यथा नहीं।

श्लोक 34 (skanda.6.263.34)

श्यामलं च उपस्थं च रूपातीतान्नराः शिवम् । हृदिस्थं सिरशिस्थं च द्वयं बद्धविमुक्तये

śyāmalaṁ ca upasthaṁ ca rūpātītānnarāḥ śivam hṛdisthaṁ siraśisthaṁ ca dvayaṁ baddhavimuktaye

मनुष्य श्याम-वर्ण, सन्निकट रूप में, तथा रूप से अतीत शिव के रूप में भी [उस तत्त्व को] ध्याते हैं — हृदय में स्थित और शिर में स्थित, ये दोनों बंधन और मुक्ति के लिए हैं।

श्लोक 35 (skanda.6.263.35)

एतदक्षरमव्यकममृतं सकलं तव । रूपरूपविष्णुरूपरूपमूर्तिनिवेदितम्

etadakṣaramavyakamamṛtaṁ sakalaṁ tava rūparūpaviṣṇurūparūpamūrtiniveditam

यह अक्षर, अव्यक्त, अमृत — यह सब तुम्हारा ही है, विष्णु के रूप और अरूप, तथा साकार मूर्ति के रूप में निवेदित।

श्लोक 36 (skanda.6.263.36)

एवं ज्ञात्वा विमुच्येत योगी संसारबन्धनात् । गुरूपदेशाद्गृहस्थो लभते नान्यथा क्वचित्

evaṁ jñātvā vimucyeta yogī saṁsārabandhanāt gurūpadeśādgṛhastho labhate nānyathā kvacit

इस प्रकार जानकर योगी संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है; गृहस्थ भी गुरु के उपदेश से ही इसे प्राप्त करता है, अन्यथा कभी नहीं।

श्लोक 37 (skanda.6.263.37)

यदा गुरुः प्रसन्नात्मा तस्य विश्वं प्रसीदति । गुरुश्च तोषितो येन संतुष्टाः पितृदेवताः

yadā guruḥ prasannātmā tasya viśvaṁ prasīdati guruśca toṣito yena saṁtuṣṭāḥ pitṛdevatāḥ

जब गुरु का मन प्रसन्न होता है, तब उस शिष्य के लिए संपूर्ण विश्व प्रसन्न हो जाता है; और जिसके द्वारा गुरु संतुष्ट किया जाता है, उसके पितर और देवगण भी संतुष्ट होते हैं।

श्लोक 38 (skanda.6.263.38)

गुरूपदेशः प्रतिमा सद्विचारः समे मनः । क्रिया च ज्ञानसहिता मोक्षसिद्धेर्हि लक्षणम्

gurūpadeśaḥ pratimā sadvicāraḥ same manaḥ kriyā ca jñānasahitā mokṣasiddherhi lakṣaṇam

गुरु का उपदेश ही प्रतिमा है, सद्विचार तथा समभाव वाला मन, और ज्ञानसहित क्रिया — यही मोक्षसिद्धि का लक्षण है।

श्लोक 39 (skanda.6.263.39)

क्रियापतिर्विष्णुरेव स्वयमेव हि निष्क्रियः । स च प्राणविरूपाय द्वादशाक्षरवीजकः

kriyāpatirviṣṇureva svayameva hi niṣkriyaḥ sa ca prāṇavirūpāya dvādaśākṣaravījakaḥ

क्रिया के स्वामी विष्णु ही हैं, और वे स्वयं निष्क्रिय भी हैं; वे ही प्राणरूप के लिए द्वादशाक्षर के बीज-स्वरूप हैं।

श्लोक 40 (skanda.6.263.40)

द्वादशाक्षरकं चक्रं सर्वपापनिबर्हणम् । दुष्टानां दमनं चैव परब्रह्मप्रदायकम्

dvādaśākṣarakaṁ cakraṁ sarvapāpanibarhaṇam duṣṭānāṁ damanaṁ caiva parabrahmapradāyakam

द्वादशाक्षर का चक्र समस्त पापों का नाशक है, दुष्टों का दमन करने वाला भी है, तथा परब्रह्म को देने वाला है।

श्लोक 41 (skanda.6.263.41)

एतदेव परं ब्रह्म द्वादशाक्षररूपधृक् । मया प्रकाशितं देवि स्कन्दे हि विमलं तव

etadeva paraṁ brahma dvādaśākṣararūpadhṛk mayā prakāśitaṁ devi skande hi vimalaṁ tava

यही परम ब्रह्म द्वादशाक्षर का रूप धारण करता है; हे देवि! यह मेरे द्वारा तुम्हें और स्कन्द को निर्मल रूप से प्रकाशित किया गया है।

श्लोक 42 (skanda.6.263.42)

एतत्सारं योगिनां ध्यानरूपं भक्तिग्राह्यं श्रद्धया चिन्तयेच्च । चातुर्मास्ये जन्मकोट्यां च जातं पापं दग्ध्वा मुक्तिदः कैटभारिः

etatsāraṁ yogināṁ dhyānarūpaṁ bhaktigrāhyaṁ śraddhayā cintayecca cāturmāsye janmakoṭyāṁ ca jātaṁ pāpaṁ dagdhvā muktidaḥ kaiṭabhāriḥ

यही योगियों का सार है, ध्यान का रूप है, भक्ति से ग्रहण करने योग्य है — इसका श्रद्धापूर्वक चिंतन करना चाहिए। चातुर्मास्य में करोड़ों जन्मों का उपार्जित पाप जलाकर कैटभारि (विष्णु) मुक्ति देने वाले हो जाते हैं।

श्लोक 43 (skanda.6.263.43)

ब्रह्मोवाच । एतस्मिन्नगरे तत्र क्षीरसागरमध्यतः । उज्जहार विमानाग्रे तेजोभाराभिपीडितः

brahmovāca etasminnagare tatra kṣīrasāgaramadhyataḥ ujjahāra vimānāgre tejobhārābhipīḍitaḥ

ब्रह्मा ने कहा — उसी नगर में, वहाँ क्षीरसागर के मध्य से, अपने ही तेज के भार से पीड़ित कुछ [असाधारण] विमान के आगे उभर आया,

श्लोक 44 (skanda.6.263.44)

उरो बाहुकृतिं कुर्वन्सान्निध्यं समुपागतः । महामत्स्योऽज्ञातपूर्वः सन्निधानेऽनहंकृतिः

uro bāhukṛtiṁ kurvansānnidhyaṁ samupāgataḥ mahāmatsyo'jñātapūrvaḥ sannidhāne'nahaṁkṛtiḥ

वक्ष और भुजाओं का आकार बनाता हुआ, उनके निकट आया — पहले कभी न जाना गया एक महामत्स्य, अपनी उपस्थिति में अहंकाररहित।

श्लोक 45 (skanda.6.263.45)

हुंकारगर्भे मत्स्यं च दृष्ट्वा तं स महेश्वरः । तेजसा स्तंभयामास वाक्यमेतदुवाच ह

huṁkāragarbhe matsyaṁ ca dṛṣṭvā taṁ sa maheśvaraḥ tejasā staṁbhayāmāsa vākyametaduvāca ha

अपने हुंकार के भीतर उस मत्स्य को देखकर महेश्वर ने उसे अपने तेज से स्तंभित कर दिया, और यह वचन कहा —

श्लोक 46 (skanda.6.263.46)

कस्त्वं मत्स्योदरस्थश्च देवो यक्षोऽथ मानुषः । कथं जीवसि देहांतर्गतो मम वद प्रभो

kastvaṁ matsyodarasthaśca devo yakṣo'tha mānuṣaḥ kathaṁ jīvasi dehāṁtargato mama vada prabho

मत्स्य के उदर में स्थित तुम कौन हो — देव, यक्ष अथवा मनुष्य? किसी देह के भीतर रहते हुए तुम कैसे जीवित हो? हे भद्र! मुझे बताओ।

श्लोक 47 (skanda.6.263.47)

मत्स्य उवाच । अहं मत्स्योदरे क्षिप्तः समुद्रे क्षीरसंभवे । मात्रा तु पितृवाक्येन नायं मम कुलान्वितः

matsya uvāca ahaṁ matsyodare kṣiptaḥ samudre kṣīrasaṁbhave mātrā tu pitṛvākyena nāyaṁ mama kulānvitaḥ

मत्स्य ने कहा — मैं अपनी माता द्वारा, पिता के वचन से, दुग्ध-सागर में एक मत्स्य के उदर में डाल दिया गया, यह कहते हुए कि यह मेरे कुल का नहीं है।

श्लोक 48 (skanda.6.263.48)

कुलक्षयभयात्तेन जातं स्वकुलनाशनम् । गंडांतयोगजनितो बालो न गृहकर्मकृत्

kulakṣayabhayāttena jātaṁ svakulanāśanam gaṁḍāṁtayogajanito bālo na gṛhakarmakṛt

कुल के नाश के भय से, उसने सोचा कि यह उत्पन्न शिशु स्वयं अपने कुल का नाशक है, गण्डांत-योग में जन्मा यह बालक गृहस्थ-कर्म करने योग्य नहीं है।

श्लोक 49 (skanda.6.263.49)

इति मात्रा दुःखितया निरस्तः शृणु वंशजः । झषेणापि गृहीतोऽस्मि कालो मेऽत्र महानभूत्

iti mātrā duḥkhitayā nirastaḥ śṛṇu vaṁśajaḥ jhaṣeṇāpi gṛhīto'smi kālo me'tra mahānabhūt

इस प्रकार, हे वंशज, सुनो — दुःखी माता द्वारा त्यागा गया मैं एक मत्स्य द्वारा ग्रस लिया गया, और यहाँ मुझे बहुत समय बीत गया।

श्लोक 50 (skanda.6.263.50)

तव वाक्यामृतैरेभिर्ज्ञानयोगो महानभूत् । तेन त्वं सकलो ज्ञातो मया मूर्तोऽथ मूर्त्तगः

tava vākyāmṛtairebhirjñānayogo mahānabhūt tena tvaṁ sakalo jñāto mayā mūrto'tha mūrttagaḥ

तुम्हारे इन वाणी-अमृतों से मुझे महान ज्ञानयोग प्राप्त हुआ; उसी से मैंने तुम्हें, साकार और उससे भी परे, संपूर्ण रूप से जान लिया है।

श्लोक 51 (skanda.6.263.51)

अनुज्ञां मम देवेश देहि निष्क्रमणाय च । यथाऽहं पितृपो ब्रह्मन्भवान्याश्चापि लक्ष्यते

anujñāṁ mama deveśa dehi niṣkramaṇāya ca yathā'haṁ pitṛpo brahmanbhavānyāścāpi lakṣyate

हे देवेश! मुझे बाहर निकलने की अनुमति दीजिए, ताकि मैं, अपने पितरों का उद्धारकर्ता होकर, हे ब्रह्मन्! भवानी के द्वारा भी देखा जा सकूँ।

श्लोक 52 (skanda.6.263.52)

हर उवाच । विप्रोऽसि सुतरूपोऽसि पूज्योस्यासि बभाषतः । बहिर्निष्क्रम वेगेन स्तंभितोऽसि महाझषः

hara uvāca vipro'si sutarūpo'si pūjyosyāsi babhāṣataḥ bahirniṣkrama vegena staṁbhito'si mahājhaṣaḥ

हर ने उस बोलते हुए [जीव] से कहा — तुम विप्र हो, पुत्र-रूप हो, पूज्य हो; हे महामीन! शीघ्रतापूर्वक बाहर निकलो, तुम्हें [अभी तक] केवल स्तंभित किया गया था।

श्लोक 53 (skanda.6.263.53)

ततोऽसौ शिरसा जात उत्क्लेशान्मत्स्ययोजितः । ततो हि विकृतं वक्त्रं क्षणाद्बहिरुपागतः

tato'sau śirasā jāta utkleśānmatsyayojitaḥ tato hi vikṛtaṁ vaktraṁ kṣaṇādbahirupāgataḥ

तब वह, मत्स्य से जुड़ा हुआ, कष्टपूर्वक शिर के बल जन्मा; तत्पश्चात् विकृत मुखवाला होकर क्षणभर में बाहर आ गया।

श्लोक 54 (skanda.6.263.54)

रूपवान्प्रतिमायुक्तो मत्स्यगंधेन संयुतः । सोमकांतिसमस्तत्र ह्यभवद्दिव्यगंधभाक्

rūpavānpratimāyukto matsyagaṁdhena saṁyutaḥ somakāṁtisamastatra hyabhavaddivyagaṁdhabhāk

रूपवान, सुंदर आकृति से युक्त, मत्स्य की गंध से संयुक्त होते हुए भी, वहाँ वह चंद्रमा के समान कांतिवाला तथा दिव्य सुगंध से युक्त हो गया।

श्लोक 55 (skanda.6.263.55)

उमापि प्रणतं चामुं सुतं स्वोत्संगभाजनम् । चकार तस्य नामापि हरः परमहर्षितः

umāpi praṇataṁ cāmuṁ sutaṁ svotsaṁgabhājanam cakāra tasya nāmāpi haraḥ paramaharṣitaḥ

उमा ने भी उस प्रणत सुत को अपनी गोद का पात्र बनाया; और परम हर्षित हुए हर ने उसका नामकरण किया —

श्लोक 56 (skanda.6.263.56)

यस्मान्मत्स्योदराज्जातो योगिनां प्रवरो ह्ययम् । तस्मात्तु मत्स्य नाथेति लोके ख्यातो भविष्यति

yasmānmatsyodarājjāto yogināṁ pravaro hyayam tasmāttu matsya nātheti loke khyāto bhaviṣyati

चूँकि यह योगियों में श्रेष्ठ मत्स्य के उदर से उत्पन्न हुआ है, इसलिए यह संसार में 'मत्स्येन्द्रनाथ' के नाम से विख्यात होगा।

श्लोक 57 (skanda.6.263.57)

अच्छेद्यः स्यान्नरतनुर्ज्ञानयोगस्य पारगः । निर्मत्सरोऽपि निर्द्वंद्वो निराशो ब्रह्मसेवकः

acchedyaḥ syānnaratanurjñānayogasya pāragaḥ nirmatsaro'pi nirdvaṁdvo nirāśo brahmasevakaḥ

यह मानव-तनु अच्छेद्य होगा, ज्ञानयोग के पार जाने वाला होगा; ईर्ष्यारहित, द्वंद्वरहित, आशारहित, ब्रह्म का सेवक होगा,

श्लोक 58 (skanda.6.263.58)

जीवन्मुक्तश्च भविता भुवनानि चतुर्दश । इत्युक्तश्च महेशानं प्रणमंश्च पुनःपुनः । महेश्वरेण सहितो मंदराचलमाययौ

jīvanmuktaśca bhavitā bhuvanāni caturdaśa ityuktaśca maheśānaṁ praṇamaṁśca punaḥpunaḥ maheśvareṇa sahito maṁdarācalamāyayau

तथा चौदहों भुवनों में जीवन्मुक्त कहलाएगा — ऐसा कहे जाने पर, महेशान को बार-बार प्रणाम करते हुए, वह महेश्वर के साथ मंदराचल पर्वत पर गया।

श्लोक 59 (skanda.6.263.59)

ब्रह्मोवाच । कृत्वा प्रदक्षिणं देवीं स्कन्दमालिंग्य सोऽगमत्

brahmovāca kṛtvā pradakṣiṇaṁ devīṁ skandamāliṁgya so'gamat

ब्रह्मा ने कहा — देवी की परिक्रमा करके तथा स्कन्द का आलिंगन करके वह वहाँ से चला गया।

श्लोक 60 (skanda.6.263.60)

ततः सा पार्वती हृष्टा प्राप्य ज्ञानमनुत्तमम् । एवं सा परमां सिद्धिं प्रणवस्यप्रभा जनम्

tataḥ sā pārvatī hṛṣṭā prāpya jñānamanuttamam evaṁ sā paramāṁ siddhiṁ praṇavasyaprabhā janam

तत्पश्चात् वह पार्वती अनुत्तम ज्ञान को प्राप्त कर हर्षित हुईं; इस प्रकार वे प्रणव की प्रभा से युक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हुईं।

श्लोक 61 (skanda.6.263.61)

सा प्राप्य जगतां माता द्वादशाक्षरजांबुना । इमां मत्स्येन्द्रनाथस्य चोत्पत्तिं यः शृणोति च

sā prāpya jagatāṁ mātā dvādaśākṣarajāṁbunā imāṁ matsyendranāthasya cotpattiṁ yaḥ śṛṇoti ca

वह जगत की माता द्वादशाक्षर से उत्पन्न फल को प्राप्त हुईं। और जो कोई भी मत्स्येन्द्रनाथ की इस उत्पत्ति-कथा को सुनता है,

श्लोक 62 (skanda.6.263.62)

चातुर्मास्ये विशेषेण सोऽश्वमेधफलं लभेत्

cāturmāsye viśeṣeṇa so'śvamedhaphalaṁ labhet

— विशेष रूप से चातुर्मास्य में — वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

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