नागर खण्ड · अध्याय 264
तारकासुर-वध तथा कार्तिकेय का ज्ञानोपदेश
श्लोक 1 (skanda.6.264.1)
ब्रह्मोवाच । कार्तिकेयश्च पार्वत्याः प्राणेभ्यश्चातिवल्लभः । संक्रीडति समीपस्थो नानाचेष्टाभिरुद्यतः
brahmovāca kārtikeyaśca pārvatyāḥ prāṇebhyaścātivallabhaḥ saṁkrīḍati samīpastho nānāceṣṭābhirudyataḥ
ब्रह्मा ने कहा — पार्वती के प्राणों से भी अधिक प्रिय कार्तिकेय, उनके समीप ही रहकर नाना प्रकार की चेष्टाओं में तत्पर होकर खेलने लगे।
श्लोक 2 (skanda.6.264.2)
रक्तकांतिर्महातेजाः षण्मुखोऽद्भुत विक्रमः । क्वचिद्गायति चात्यर्थं क्वचिन्नृत्यति स्वेच्छया
raktakāṁtirmahātejāḥ ṣaṇmukho'dbhuta vikramaḥ kvacidgāyati cātyarthaṁ kvacinnṛtyati svecchayā
रक्त-वर्ण कांतिवाले, महातेजस्वी, षण्मुख, अद्भुत पराक्रमी वे कहीं अत्यंत उल्लासपूर्वक गाते, कहीं अपनी इच्छानुसार नाचते,
श्लोक 3 (skanda.6.264.3)
मातरं पितरं दृष्ट्वा विनयावनतः क्वचित् । क्वचिच्च गंगापुलिने सिकतालेपनाकृतिः
mātaraṁ pitaraṁ dṛṣṭvā vinayāvanataḥ kvacit kvacicca gaṁgāpuline sikatālepanākṛtiḥ
कहीं माता-पिता को देखकर विनयपूर्वक झुक जाते, तथा कहीं गंगा के तट पर बालू से लिप्त शरीर बना लेते,
श्लोक 4 (skanda.6.264.4)
गणैः सह विचिन्वानो विविधान्वनभूरुहान् । एवं प्रक्रीडितस्तस्य दिवसाः पंच जज्ञिरे
gaṇaiḥ saha vicinvāno vividhānvanabhūruhān evaṁ prakrīḍitastasya divasāḥ paṁca jajñire
अपने गणों के साथ वन के नाना वृक्षों को बटोरते हुए — इस प्रकार खेलते हुए उनके पाँच दिन बीत गए।
श्लोक 5 (skanda.6.264.5)
ततो देवा महेन्द्राद्यास्तारकत्रासविद्रुताः । स्तुवन्तः शंकरं सर्वे तारकस्य जिघृक्षया
tato devā mahendrādyāstārakatrāsavidrutāḥ stuvantaḥ śaṁkaraṁ sarve tārakasya jighṛkṣayā
तब इंद्र आदि देवगण, तारक के भय से भागे हुए, तारक को पकड़ने की इच्छा से सभी शंकर की स्तुति करने लगे,
श्लोक 6 (skanda.6.264.6)
चक्रुः कुमारं सेनान्यं जाह्नव्यां स्वगणैः सुराः । सस्वनुर्देववाद्यानि पुष्पवर्षं पपात ह
cakruḥ kumāraṁ senānyaṁ jāhnavyāṁ svagaṇaiḥ surāḥ sasvanurdevavādyāni puṣpavarṣaṁ papāta ha
तथा देवगणों ने अपने-अपने गणों सहित जाह्नवी के तट पर कुमार को सेनापति बना दिया; दिव्य वाद्य बजने लगे, और पुष्पों की वर्षा हुई।
श्लोक 7 (skanda.6.264.7)
वह्निस्तु स्वां ददौ शक्तिं हिमवान्वाहनं ददौ । सर्वदेवसमुद्भूतगणकोटिसमावृतः
vahnistu svāṁ dadau śaktiṁ himavānvāhanaṁ dadau sarvadevasamudbhūtagaṇakoṭisamāvṛtaḥ
अग्नि ने अपनी शक्ति दी, हिमवान ने वाहन दिया; समस्त देवों से उत्पन्न करोड़ों गणों से घिरे हुए,
श्लोक 8 (skanda.6.264.8)
प्रणम्य मुनिसंघेभ्यः प्रययौ रिपुविग्रहे । ताम्रवत्यां नगर्यां च शंखं दध्मौ प्रतापवान्
praṇamya munisaṁghebhyaḥ prayayau ripuvigrahe tāmravatyāṁ nagaryāṁ ca śaṁkhaṁ dadhmau pratāpavān
मुनि-समूहों को प्रणाम करके वे शत्रु से युद्ध के लिए चल पड़े; ताम्रवती नगरी में उस प्रतापी ने शंख फूँका।
श्लोक 9 (skanda.6.264.9)
ततस्तारकसैन्यस्य दैत्यदानवकोटयः । समाजग्मुस्तस्य पुराच्छंखनादभयातुराः
tatastārakasainyasya daityadānavakoṭayaḥ samājagmustasya purācchaṁkhanādabhayāturāḥ
तब तारक की सेना के करोड़ों दैत्य-दानव, उस शंखनाद से भयातुर होकर, उसके नगर से निकल आए।
श्लोक 10 (skanda.6.264.10)
स्ववाहनसमारूढाः संयता बलदर्पिताः । देवाः सर्वेऽपि युयुधुः स्कन्दतेजोपबृंहिताः
svavāhanasamārūḍhāḥ saṁyatā baladarpitāḥ devāḥ sarve'pi yuyudhuḥ skandatejopabṛṁhitāḥ
अपने-अपने वाहनों पर आरूढ़, संयत, बल से गर्वित समस्त देवगण, स्कन्द के तेज से बढ़ाए जाकर युद्ध करने लगे।
श्लोक 11 (skanda.6.264.11)
तदा दानवसैन्यानि निजघान च सर्वशः । विष्णुचक्रेण ते छिन्नाः पेतुरुर्व्यां सहस्रशः
tadā dānavasainyāni nijaghāna ca sarvaśaḥ viṣṇucakreṇa te chinnāḥ petururvyāṁ sahasraśaḥ
तब उन्होंने दानवों की सेनाओं को सब ओर से मार गिराया; विष्णु के चक्र से कटकर वे सहस्रों की संख्या में धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 12 (skanda.6.264.12)
ततो भग्नाश्च शतशो दानवा निहतास्तदा । नद्यः शोणितसंभूता जाता बहुविधामुने
tato bhagnāśca śataśo dānavā nihatāstadā nadyaḥ śoṇitasaṁbhūtā jātā bahuvidhāmune
तत्पश्चात् सैकड़ों की संख्या में भग्न होकर दानव मारे गए; हे मुने! रक्त से बनी नदियाँ अनेक प्रकार से बह चलीं।
श्लोक 13 (skanda.6.264.13)
तद्भग्नं दानवबलं दृष्ट्वा स युयुधे रणे । बभंज सद्यो देवेशो बाणजालैरनेकधा
tadbhagnaṁ dānavabalaṁ dṛṣṭvā sa yuyudhe raṇe babhaṁja sadyo deveśo bāṇajālairanekadhā
उस भग्न दानव-सेना को देखकर वह [तारक] स्वयं युद्ध में जूझने लगा; परंतु देवेश ने तुरंत ही उसे अपने बाणजाल से अनेक प्रकार से तोड़ डाला।
श्लोक 14 (skanda.6.264.14)
शक्तिनायुध्य गंगिन्याश्चिक्षेप कृष्णप्रेरिताः । सरथं च सयंतारं चक्रे तं भस्मसात्क्षणात्
śaktināyudhya gaṁginyāścikṣepa kṛṣṇapreritāḥ sarathaṁ ca sayaṁtāraṁ cakre taṁ bhasmasātkṣaṇāt
शक्ति-अस्त्र से युद्ध करते हुए, कृष्ण द्वारा प्रेरित गंगापुत्र ने उसे फेंका, और उसे रथ तथा सारथि सहित क्षणभर में भस्म कर दिया।
श्लोक 15 (skanda.6.264.15)
शेषाः पातालमगमन्हतं दृष्ट्वाऽथ तारकम् । ततो देवगणाः सर्वे शसंसुस्तस्य विक्रमम्
śeṣāḥ pātālamagamanhataṁ dṛṣṭvā'tha tārakam tato devagaṇāḥ sarve śasaṁsustasya vikramam
तारक को इस प्रकार मारा गया देखकर शेष असुर पाताल को भाग गए; तत्पश्चात् समस्त देवगण उसके पराक्रम की प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 16 (skanda.6.264.16)
देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिस्तथाऽभवत् । ते लब्धविजयाः सर्वे महेश्वरपुरोगमाः
devadundubhayo neduḥ puṣpavṛṣṭistathā'bhavat te labdhavijayāḥ sarve maheśvarapurogamāḥ
देवताओं की दुंदुभियाँ बज उठीं, और पुष्पवर्षा भी हुई; विजय प्राप्त करने वाले, महेश्वर को आगे किए हुए वे सब —
श्लोक 17 (skanda.6.264.17)
सिषिचुः सर्वदेवानां सेनापत्ये षडाननम् । ततः स्कंदं समालिंग्य पार्वती हर्षगद्गदा
siṣicuḥ sarvadevānāṁ senāpatye ṣaḍānanam tataḥ skaṁdaṁ samāliṁgya pārvatī harṣagadgadā
— षडानन को समस्त देवताओं के सेनापति-पद पर अभिषिक्त किया। तत्पश्चात् हर्ष से गद्गद होकर पार्वती ने स्कन्द का आलिंगन किया,
श्लोक 18 (skanda.6.264.18)
मांगल्यानि तदा चक्रे स्वसखीभिः समावृता । एवं च तारकं हत्वा सप्तमेऽहनि बालकः
māṁgalyāni tadā cakre svasakhībhiḥ samāvṛtā evaṁ ca tārakaṁ hatvā saptame'hani bālakaḥ
तथा अपनी सखियों से घिरी हुई मांगलिक कार्य करने लगीं। इस प्रकार तारक का वध करके सातवें दिन ही उस बालक ने,
श्लोक 19 (skanda.6.264.19)
मंदराचलमासाद्य पितरौ संप्रहर्षयन् । उवाच सकलं स्कन्दः परमानंदनिर्भरः
maṁdarācalamāsādya pitarau saṁpraharṣayan uvāca sakalaṁ skandaḥ paramānaṁdanirbharaḥ
मंदराचल पर्वत पर पहुँचकर, अपने माता-पिता को हर्षित करते हुए, परमानंद से परिपूर्ण स्कन्द ने संपूर्ण वृत्तांत कह सुनाया।
श्लोक 20 (skanda.6.264.20)
काले दारक्रियां तस्य चिन्तयामास शंकरः । स उवाच प्रसन्नात्मा गांगेयममितद्युतिम्
kāle dārakriyāṁ tasya cintayāmāsa śaṁkaraḥ sa uvāca prasannātmā gāṁgeyamamitadyutim
समय आने पर शंकर ने उसके विवाह के विषय में सोचा; प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने अमित द्युतिवाले गांगेय से कहा —
श्लोक 21 (skanda.6.264.21)
प्राप्तः कालस्तव विभो पाणिग्रहणसंमतः । कुरु दारान्समासाद्य धर्मस्ते पुंससंमतः
prāptaḥ kālastava vibho pāṇigrahaṇasaṁmataḥ kuru dārānsamāsādya dharmaste puṁsasaṁmataḥ
हे विभो! तुम्हारे पाणिग्रहण का उचित समय आ गया है; पत्नी को प्राप्त करके उसे स्वीकार करो, यही पुरुष के लिए अनुमोदित धर्म है।
श्लोक 22 (skanda.6.264.22)
क्रीडस्व विविधैर्भोगैर्विमानैः सह कामिकैः । तच्छ्रुत्वा भगवान्स्कन्दः पितरं वाक्यमब्रवीत्
krīḍasva vividhairbhogairvimānaiḥ saha kāmikaiḥ tacchrutvā bhagavānskandaḥ pitaraṁ vākyamabravīt
नाना भोगों तथा कामनापूर्ण विमानों के साथ विहार करो। यह सुनकर भगवान स्कन्द ने अपने पिता से यह वचन कहा —
श्लोक 23 (skanda.6.264.23)
अहमेव हि सर्वत्र दृश्यः सर्वगणेषु च । दृश्यादृश्यपदार्थेषु किं गृह्णामि त्यजामि किम्
ahameva hi sarvatra dṛśyaḥ sarvagaṇeṣu ca dṛśyādṛśyapadārtheṣu kiṁ gṛhṇāmi tyajāmi kim
मैं ही तो सर्वत्र दृश्य हूँ, समस्त प्राणिसमूहों में भी विद्यमान हूँ; दृश्य-अदृश्य पदार्थों में मैं क्या ग्रहण करूँ और क्या त्यागूँ?
श्लोक 24 (skanda.6.264.24)
याः स्त्रियः सकला विश्वे पार्वत्या ताः समा हि मे । नराः सर्वेऽपि देवेश भवद्वत्तान्विलोकये
yāḥ striyaḥ sakalā viśve pārvatyā tāḥ samā hi me narāḥ sarve'pi deveśa bhavadvattānvilokaye
विश्व की जितनी भी स्त्रियाँ हैं, वे सब मेरे लिए पार्वती के समान हैं; हे देवेश! समस्त पुरुषों को भी मैं आपके समान ही देखता हूँ।
श्लोक 25 (skanda.6.264.25)
त्वं गुरुर्मां च रक्षस्व पुनर्नरकमज्जनात् । येन ज्ञातमिदं ज्ञानं त्वत्प्रसादादखंडितम्
tvaṁ gururmāṁ ca rakṣasva punarnarakamajjanāt yena jñātamidaṁ jñānaṁ tvatprasādādakhaṁḍitam
आप गुरु हैं, आप मेरी रक्षा करें कि मैं पुनः नरक में न डूबूँ — मैंने आपकी कृपा से ही यह अखंडित ज्ञान प्राप्त किया है।
श्लोक 26 (skanda.6.264.26)
पुनरेव महाघोरसंसाराब्धौ निमज्जये । दीपहस्तो यथा वस्तु दृष्ट्वा तत्करणं त्यजेत्
punareva mahāghorasaṁsārābdhau nimajjaye dīpahasto yathā vastu dṛṣṭvā tatkaraṇaṁ tyajet
मुझे पुनः उस महाघोर संसार-सागर में मत डुबाइए। जिस प्रकार दीपक हाथ में लिए मनुष्य वस्तु को देखकर उस दीपक के प्रयोजन को त्याग देता है,
श्लोक 27 (skanda.6.264.27)
तथा ज्ञानमधिप्राप्य योगी त्यजति संसृतिम् । ज्ञात्वा सर्वगतं ब्रह्म सर्वज्ञ परमेश्वर
tathā jñānamadhiprāpya yogī tyajati saṁsṛtim jñātvā sarvagataṁ brahma sarvajña parameśvara
उसी प्रकार ज्ञान को भलीभाँति प्राप्त करके योगी संसार को त्याग देता है — सर्वगत ब्रह्म को जानकर, हे सर्वज्ञ परमेश्वर!
श्लोक 28 (skanda.6.264.28)
निवर्त्तंते क्रियाः सर्वा यस्य तं योगिनं विदुः । विषये लुब्धचित्तानां वनेऽपि जायते रतिः
nivarttaṁte kriyāḥ sarvā yasya taṁ yoginaṁ viduḥ viṣaye lubdhacittānāṁ vane'pi jāyate ratiḥ
जिसकी समस्त क्रियाएँ निवृत्त हो चुकी हों, उसे ही सच्चा योगी जानना चाहिए। विषयों में लुब्ध चित्तवालों को तो वन में भी आसक्ति उत्पन्न हो जाती है,
श्लोक 29 (skanda.6.264.29)
सर्वत्र समदृष्टीनां गेहे मुक्तिर्हि शाश्वती । ज्ञानमेव महेशान मनुष्याणां सुदुर्लभम्
sarvatra samadṛṣṭīnāṁ gehe muktirhi śāśvatī jñānameva maheśāna manuṣyāṇāṁ sudurlabham
किंतु सर्वत्र समदृष्टि रखने वालों को घर में रहते हुए भी शाश्वत मुक्ति प्राप्त हो जाती है। हे महेशान! मनुष्यों के लिए ज्ञान ही अत्यंत दुर्लभ है।
श्लोक 30 (skanda.6.264.30)
लब्धं ज्ञानं कथमपि पंडितो नैव पातयेत् । नाहमस्मि न माता मे न पिता न च बांधवः
labdhaṁ jñānaṁ kathamapi paṁḍito naiva pātayet nāhamasmi na mātā me na pitā na ca bāṁdhavaḥ
प्राप्त हुए ज्ञान को पंडित किसी भी प्रकार गिरने न दे। मैं यह [शरीर] नहीं हूँ, मेरी न कोई माता है, न पिता, न बंधु —
श्लोक 31 (skanda.6.264.31)
ज्ञानं प्राप्य पृथक्भावमापन्नो भुवनेष्वहम् । प्राप्यं भागमिदं दैवात्प्रभावात्तव नार्हसि
jñānaṁ prāpya pṛthakbhāvamāpanno bhuvaneṣvaham prāpyaṁ bhāgamidaṁ daivātprabhāvāttava nārhasi
— ज्ञान प्राप्त करके मैं संसार में पृथक्-भाव को प्राप्त हो चुका हूँ; यह प्राप्तव्य भाग मुझे दैव से, आपके ही प्रभाव से मिला है — अतः आप उचित नहीं हैं
श्लोक 32 (skanda.6.264.32)
वक्तुमेवंविधं वाक्यं मुमुक्षोर्मे न संशयः । यदाग्रहपरा देवी पुनःपुनरभाषत
vaktumevaṁvidhaṁ vākyaṁ mumukṣorme na saṁśayaḥ yadāgrahaparā devī punaḥpunarabhāṣata
— मुक्ति चाहने वाले मुझसे ऐसा वचन कहना, इसमें संदेह नहीं। किंतु जब आग्रहशील देवी बार-बार यह बात कहती रहीं,
श्लोक 33 (skanda.6.264.33)
तदा तौ पितरौ नत्वा गतोऽसौ क्रौञ्चपर्वतम् । तत्राश्रमे महापुण्ये चचार परमं तपः
tadā tau pitarau natvā gato'sau krauñcaparvatam tatrāśrame mahāpuṇye cacāra paramaṁ tapaḥ
तब अपने दोनों माता-पिता को प्रणाम करके वे क्रौञ्च पर्वत को चले गए; वहाँ के महापुण्य आश्रम में उन्होंने परम तप किया।
श्लोक 34 (skanda.6.264.34)
जजाप परमं ब्रह्म द्वादशाक्षरबीजकम् । पूर्वं ध्यानेन सर्वाणि वशीकृत्येन्द्रियाणि च
jajāpa paramaṁ brahma dvādaśākṣarabījakam pūrvaṁ dhyānena sarvāṇi vaśīkṛtyendriyāṇi ca
उन्होंने द्वादशाक्षर-बीजयुक्त परम ब्रह्म का जप किया; पहले ध्यान के द्वारा समस्त इंद्रियों को वश में करके,
श्लोक 35 (skanda.6.264.35)
ममतां संवियुज्याथ ज्ञानयोगमवाप्तवान् । सिद्धयस्तस्य निर्विघ्ना अणिमाद्या यदाऽऽगताः
mamatāṁ saṁviyujyātha jñānayogamavāptavān siddhayastasya nirvighnā aṇimādyā yadā''gatāḥ
तत्पश्चात् ममता से रहित होकर उन्होंने ज्ञानयोग को प्राप्त किया। जब उन्हें अणिमा आदि सिद्धियाँ निर्विघ्न रूप से प्राप्त हुईं,
श्लोक 36 (skanda.6.264.36)
तदा तासां गणा क्रुद्धो वाक्यमेतदुवाच ह । ममापि दु्ष्टभावेन यदि यूयमुपागताः
tadā tāsāṁ gaṇā kruddho vākyametaduvāca ha mamāpi duṣṭabhāvena yadi yūyamupāgatāḥ
तब उन सिद्धि-गणों पर क्रुद्ध होकर उन्होंने यह वचन कहा — यदि तुम भी मेरे पास दुष्ट-भाव से आई हो,
श्लोक 37 (skanda.6.264.37)
तदास्मत्समशांतानां नाभिभूतिं करिष्यथ । एवं ज्ञात्वा महेशोऽपि यतो ज्ञानमहोदयम्
tadāsmatsamaśāṁtānāṁ nābhibhūtiṁ kariṣyatha evaṁ jñātvā maheśo'pi yato jñānamahodayam
तो तुम मुझ जैसे शांत पुरुषों में कोई विकार उत्पन्न नहीं कर सकोगी। इस प्रकार जानकर महेश ने भी, जिनसे ज्ञान का महोदय हुआ था,
श्लोक 38 (skanda.6.264.38)
मत्तोऽपि ज्ञानयोगेनस्कन्दोऽप्यधिकभावभृत् । विस्मयाविष्टहृदयः पार्वतीमनुशिष्टवान्
matto'pi jñānayogenaskando'pyadhikabhāvabhṛt vismayāviṣṭahṛdayaḥ pārvatīmanuśiṣṭavān
[यह देखकर] कि स्कन्द भी ज्ञानयोग में मुझसे भी अधिक भाव को धारण करने वाला है, विस्मय से भरे हृदय से पार्वती को समझाया,
श्लोक 39 (skanda.6.264.39)
पुत्रशोकपरां चोमां शुभैर्वाक्यामृतैर्हरः । चातुर्मासस्य माहात्म्यं सर्वपापप्रणाशनम्
putraśokaparāṁ comāṁ śubhairvākyāmṛtairharaḥ cāturmāsasya māhātmyaṁ sarvapāpapraṇāśanam
पुत्र-शोक में डूबी उमा को हर ने शुभ वाणी-अमृतों से, समस्त पापों का नाश करने वाला चातुर्मास्य का माहात्म्य सुनाया।
श्लोक 40 (skanda.6.264.40)
महेश्वरो वा मधुकैटभारिर्हृद्याश्रितो ध्यानमयोऽद्वितीयः । अभेदबुद्ध्या परमार्तिहंता रिपुः स एवातिप्रियो भवेत्ततः
maheśvaro vā madhukaiṭabhārirhṛdyāśrito dhyānamayo'dvitīyaḥ abhedabuddhyā paramārtihaṁtā ripuḥ sa evātipriyo bhavettataḥ
चाहे महेश्वर हों या मधु-कैटभ के शत्रु विष्णु, हृदय में आश्रित, ध्यानमय, अद्वितीय — अभेद-बुद्धि से देखने पर वही परम पीड़ा को हरने वाला है; उसके पश्चात् शत्रु भी अत्यंत प्रिय हो जाता है।
श्लोक 41 (skanda.6.264.41)
सूत उवाच । एतद्वः कथितं विप्राश्चातुर्मास्यसमुद्भवम् । माहात्म्यं विस्तरेणैव किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ
sūta uvāca etadvaḥ kathitaṁ viprāścāturmāsyasamudbhavam māhātmyaṁ vistareṇaiva kimanyacchrotumicchatha
सूत ने कहा — हे विप्रो! चातुर्मास्य से उत्पन्न यह माहात्म्य मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक कह सुनाया; अब और क्या सुनना चाहते हो?