नागर खण्ड · अध्याय 265
भीष्मपंचक-व्रत तथा अशून्यशयन-व्रत का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.265.1)
ऋषय ऊचुः । प्रभूतानि त्वयोक्तानि व्रतानि नियमास्तथा । प्रसुप्ते पुंडरीकाक्षे येषां संख्या न विद्यते
ṛṣaya ūcuḥ prabhūtāni tvayoktāni vratāni niyamāstathā prasupte puṁḍarīkākṣe yeṣāṁ saṁkhyā na vidyate
ऋषियों ने कहा — जब पुण्डरीकाक्ष शयन करते हैं, उस समय के अनगिनत व्रत और नियम आपने हमें बताए, जिनकी गणना ही नहीं हो सकती।
श्लोक 2 (skanda.6.265.2)
अशक्त्या हि शरीरस्य नियमानां कथं चरेत् । व्रतं हि सुकुमारांगो दानैर्वापि वदस्व नः
aśaktyā hi śarīrasya niyamānāṁ kathaṁ caret vrataṁ hi sukumārāṁgo dānairvāpi vadasva naḥ
किंतु शरीर की अशक्ति के कारण मनुष्य इन नियमों का आचरण कैसे करे? सुकुमार शरीर वाले के लिए उपयुक्त व्रत, अथवा उसके स्थान पर दानों को हमें बताइए।
श्लोक 3 (skanda.6.265.3)
सूत उवाच । अशक्तो नियमं कर्तुं सुकुमारो भवेत्तु यः । तेन तत्र प्रकर्तव्यं विख्यातं भीष्मपंचकम्
sūta uvāca aśakto niyamaṁ kartuṁ sukumāro bhavettu yaḥ tena tatra prakartavyaṁ vikhyātaṁ bhīṣmapaṁcakam
सूत ने कहा — जो सुकुमार होने के कारण नियमों का पालन करने में असमर्थ हो, उसे प्रसिद्ध भीष्मपंचक-व्रत करना चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.6.265.4)
कार्त्तिकस्य सिते पक्ष एकादश्यां समाहितः । प्रातरुत्थाय विप्रेंद्र कर्तव्यं दंतधावनम्
kārttikasya site pakṣa ekādaśyāṁ samāhitaḥ prātarutthāya vipreṁdra kartavyaṁ daṁtadhāvanam
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को, हे विप्रेंद्र! एकाग्रचित्त होकर प्रातःकाल उठकर दंतधावन करना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.6.265.5)
ततस्तु नियमं कुर्याद्वासुदेवपरायणः । पूर्वोक्तानां च सर्वेषां नियमानां द्विजोत्तमाः
tatastu niyamaṁ kuryādvāsudevaparāyaṇaḥ pūrvoktānāṁ ca sarveṣāṁ niyamānāṁ dvijottamāḥ
फिर वासुदेव में परायण होकर नियम का पालन करे; हे द्विजोत्तमो! पूर्वोक्त समस्त नियमों में से —
श्लोक 6 (skanda.6.265.6)
उपवासः प्रकर्तव्यस्तस्मिन्नहनि भक्तितः । अशक्त्या वा शरीरस्य हेमं दद्यात्स्वशक्तितः
upavāsaḥ prakartavyastasminnahani bhaktitaḥ aśaktyā vā śarīrasya hemaṁ dadyātsvaśaktitaḥ
— उस दिन भक्तिपूर्वक उपवास करना चाहिए; अथवा शरीर की अशक्ति के कारण अपनी शक्ति के अनुसार स्वर्ण दान करे।
श्लोक 7 (skanda.6.265.7)
ब्राह्मणाय हविष्यान्नं दातव्यं वैष्णवैर्नरैः । एवं पञ्चदिनं यावत्कर्तव्यं व्रतमुत्तमम्
brāhmaṇāya haviṣyānnaṁ dātavyaṁ vaiṣṇavairnaraiḥ evaṁ pañcadinaṁ yāvatkartavyaṁ vratamuttamam
वैष्णव मनुष्यों को ब्राह्मण को हविष्यान्न देना चाहिए; इस प्रकार पाँच दिनों तक यह उत्तम व्रत करना चाहिए।
श्लोक 8 (skanda.6.265.8)
पूजनीयो हृषीकेशो जलशायिस्वरूपधृक् । गंधैर्धूपैश्च नैवेद्यै रात्रिजागरणैरपि
pūjanīyo hṛṣīkeśo jalaśāyisvarūpadhṛk gaṁdhairdhūpaiśca naivedyai rātrijāgaraṇairapi
जलशायी स्वरूप धारण करने वाले हृषीकेश की गंध, धूप, नैवेद्य तथा रात्रि-जागरण से भी पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 9 (skanda.6.265.9)
षष्ठेऽहनि ततो जाते पूजयेद्ब्राह्मणोत्तमान् । तांश्च वस्त्रैर्हिरण्येन मिष्टान्नेन प्रभक्तितः
ṣaṣṭhe'hani tato jāte pūjayedbrāhmaṇottamān tāṁśca vastrairhiraṇyena miṣṭānnena prabhaktitaḥ
तत्पश्चात् छठे दिन आने पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा करे, तथा उन्हें वस्त्र, स्वर्ण और मिष्टान्न से अत्यंत भक्तिपूर्वक सम्मानित करे।
श्लोक 10 (skanda.6.265.10)
ततः कृतांजलिर्भूत्वा याचयेद्ब्राह्मणोत्तमान् । सर्वे मे नियमाः प्राप्ता युष्माकं च प्रसादतः
tataḥ kṛtāṁjalirbhūtvā yācayedbrāhmaṇottamān sarve me niyamāḥ prāptā yuṣmākaṁ ca prasādataḥ
फिर हाथ जोड़कर श्रेष्ठ ब्राह्मणों से प्रार्थना करे — आपके ही प्रसाद से मेरे समस्त नियम पूर्ण हुए हैं।
श्लोक 11 (skanda.6.265.11)
ततस्तैरपि वक्तव्यं चतुर्मासीसमुद्भवम् । व्रतानां नियमानां च व्रतं भूयात्तवाखिलम्
tatastairapi vaktavyaṁ caturmāsīsamudbhavam vratānāṁ niyamānāṁ ca vrataṁ bhūyāttavākhilam
तत्पश्चात् उन्हें भी कहना चाहिए — चातुर्मास्य से उत्पन्न समस्त व्रतों और नियमों का फल तुम्हें प्राप्त हो।
श्लोक 12 (skanda.6.265.12)
ततो विसर्ज्य तान्विप्रान्भोजनं स्वयमाचरेत् । सर्वाहारेण राजेंद्र पंचगव्यप्रपूर्वकम्
tato visarjya tānviprānbhojanaṁ svayamācaret sarvāhāreṇa rājeṁdra paṁcagavyaprapūrvakam
तत्पश्चात् उन विप्रों को विदा करके स्वयं भोजन करे; हे राजेंद्र! सर्वाहार से, पंचगव्य को पहले लेकर।
श्लोक 13 (skanda.6.265.13)
यः करोति व्रतं तस्य फलं स्याद्बहुपुण्यदम् । यः पुनर्व्रतमेतद्धि कुरुते दिनपंचकम् । उपवासपरस्तस्य फलं शतगुणं भवेत्
yaḥ karoti vrataṁ tasya phalaṁ syādbahupuṇyadam yaḥ punarvratametaddhi kurute dinapaṁcakam upavāsaparastasya phalaṁ śataguṇaṁ bhavet
जो यह व्रत करता है, उसे बहुत पुण्यदायक फल प्राप्त होता है; और जो इस व्रत को पाँचों दिन उपवासपरायण होकर करता है, उसका फल सौ गुना हो जाता है।
श्लोक 14 (skanda.6.265.14)
एकादश्यां हरेः पूजां जातिपुष्पैः समाचरेत् । द्वादश्यां बिल्वपत्रेण शतपत्र्या ततः परम् । त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां सुरभ्या भक्तिपूर्वकम्
ekādaśyāṁ hareḥ pūjāṁ jātipuṣpaiḥ samācaret dvādaśyāṁ bilvapatreṇa śatapatryā tataḥ param trayodaśyāṁ caturdaśyāṁ surabhyā bhaktipūrvakam
एकादशी को चमेली के पुष्पों से हरि की पूजा करे; द्वादशी को बिल्वपत्र से, तत्पश्चात् शतपत्री (कमल) से; त्रयोदशी और चतुर्दशी को सुगंधित पुष्पों से भक्तिपूर्वक पूजा करे।
श्लोक 15 (skanda.6.265.15)
भृंगराजेन पुण्येन पौर्णमास्यां प्रपूजयेत् । प्रतिपद्दिवसे सर्वैः पूजनीयो जनार्दनः । गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्
bhṛṁgarājena puṇyena paurṇamāsyāṁ prapūjayet pratipaddivase sarvaiḥ pūjanīyo janārdanaḥ gomūtraṁ gomayaṁ kṣīraṁ dadhi sarpiḥ kuśodakam
पूर्णिमा को पुण्यदायक भृंगराज के पुष्प से पूजा करे; प्रतिपदा के दिन सबको जनार्दन की पूजा गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुश-जल से करनी चाहिए।
श्लोक 16 (skanda.6.265.16)
प्रतिपद्दिवसे सर्वान्प्राशयेत्कायशुद्धये । अगरं गुग्गुलं चैव कर्पूरं तगरं त्वचा
pratipaddivase sarvānprāśayetkāyaśuddhaye agaraṁ guggulaṁ caiva karpūraṁ tagaraṁ tvacā
प्रतिपदा के दिन देह की शुद्धि के लिए इन सबका सेवन कराए; तथा अगर, गुग्गुल, कर्पूर, तगर और त्वचा (दालचीनी) —
श्लोक 17 (skanda.6.265.17)
एकैकं निर्वपेद्धूपं प्रतिपद्दिवसेऽखिलम् । जलशायी जगद्योनिः शेषपर्यंकमाश्रितः
ekaikaṁ nirvapeddhūpaṁ pratipaddivase'khilam jalaśāyī jagadyoniḥ śeṣaparyaṁkamāśritaḥ
— इनमें से एक-एक को प्रतिपदा के संपूर्ण दिन धूप के रूप में जलाए। जल में शयन करने वाले, जगत की योनि-स्वरूप, शेष-शय्या पर आश्रित —
श्लोक 18 (skanda.6.265.18)
अर्घं गृह्णातु मे देवो भीष्मपंचकसिद्धये । मंत्रेणानेन दातव्यो ह्यर्घो देवस्य भक्तितः
arghaṁ gṛhṇātu me devo bhīṣmapaṁcakasiddhaye maṁtreṇānena dātavyo hyargho devasya bhaktitaḥ
— 'वे देव भीष्मपंचक की सिद्धि के लिए मेरा अर्घ्य ग्रहण करें' — इसी मंत्र से भक्तिपूर्वक देव को अर्घ्य देना चाहिए।
श्लोक 19 (skanda.6.265.19)
शंखतोयं समादाय सपुष्पफलचंदनैः । नैवेद्यं परमान्नं च स्वशक्त्या निर्वपेद्द्विजाः
śaṁkhatoyaṁ samādāya sapuṣpaphalacaṁdanaiḥ naivedyaṁ paramānnaṁ ca svaśaktyā nirvapeddvijāḥ
शंख का जल, पुष्प, फल और चंदन लेकर, तथा नैवेद्य के रूप में परमान्न, द्विजगण अपनी शक्ति के अनुसार अर्पित करें।
श्लोक 20 (skanda.6.265.20)
एतद्वः सर्वमाख्यातं व्रतं वै भीष्मपंचकम् । संप्राप्यते फलं चैव व्रतानां नियमैः सह
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ vrataṁ vai bhīṣmapaṁcakam saṁprāpyate phalaṁ caiva vratānāṁ niyamaiḥ saha
यह भीष्मपंचक व्रत तुम्हें संपूर्ण रूप से बता दिया गया; इससे समस्त व्रतों और नियमों का फल भी साथ में प्राप्त होता है।
श्लोक 21 (skanda.6.265.21)
ऋषय ऊचुः । यदेतद्भवता प्रोक्तमशून्यशायिनीव्रतम् । इन्द्रेण यत्कृतं पूर्वं तुष्ट्यर्थं चक्रपाणिनः । प्रसुप्तस्य महाभाग फलं चैव प्रकीर्तितम्
ṛṣaya ūcuḥ yadetadbhavatā proktamaśūnyaśāyinīvratam indreṇa yatkṛtaṁ pūrvaṁ tuṣṭyarthaṁ cakrapāṇinaḥ prasuptasya mahābhāga phalaṁ caiva prakīrtitam
ऋषियों ने कहा — आपने जिस अशून्यशयन-व्रत का उल्लेख किया, जो पूर्वकाल में इंद्र द्वारा शयन करते हुए चक्रपाणि की प्रसन्नता के लिए किया गया था — हे महाभाग! उसका फल भी बता दिया गया है।
श्लोक 22 (skanda.6.265.22)
कस्मिन्काले प्रकर्तव्यं केनैव विधिना तथा । तस्मात्सूत महाभाग विधानं विस्तराद्वद
kasminkāle prakartavyaṁ kenaiva vidhinā tathā tasmātsūta mahābhāga vidhānaṁ vistarādvada
किस समय इसे करना चाहिए, और किस विधि से — हे महाभाग सूत! अतः इसका विधान विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 23 (skanda.6.265.23)
सूत उवाच । श्रावण्यां समतीतायां द्वितीयादिवसे स्थिते । प्रातरुत्थाय विप्रेन्द्रा नक्षत्रे विष्णुदैवते । पापिष्ठैः पतितैर्म्लेच्छैः संभाषं नैव कारयेत्
sūta uvāca śrāvaṇyāṁ samatītāyāṁ dvitīyādivase sthite prātarutthāya viprendrā nakṣatre viṣṇudaivate pāpiṣṭhaiḥ patitairmlecchaiḥ saṁbhāṣaṁ naiva kārayet
सूत ने कहा — श्रावण मास के बीत जाने पर, द्वितीया के दिन आने पर, हे विप्रेंद्रो! विष्णु-देवता वाले नक्षत्र में प्रातःकाल उठकर, महापापियों, पतितों और म्लेच्छों से बातचीत न करे।
श्लोक 24 (skanda.6.265.24)
ततो मध्याह्नसमये स्नात्वा धौतांबरः शुचिः । जलशायिनमासाद्य मंत्रेणानेन पूजयेत्
tato madhyāhnasamaye snātvā dhautāṁbaraḥ śuciḥ jalaśāyinamāsādya maṁtreṇānena pūjayet
तत्पश्चात् मध्याह्न के समय स्नान करके, धुले वस्त्र धारण किए, पवित्र होकर, जलशायी के पास जाकर इस मंत्र से उनकी पूजा करे —
श्लोक 25 (skanda.6.265.25)
श्रीवत्सधारिञ्छ्रीकांत श्रीधामञ्छ्रीपतेऽव्यय । गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामदम्
śrīvatsadhāriñchrīkāṁta śrīdhāmañchrīpate'vyaya gārhasthyaṁ mā praṇāśaṁ me yātu dharmārthakāmadam
हे श्रीवत्सधारी, श्रीकांत, श्रीधाम, अव्यय श्रीपते! धर्म, अर्थ और काम को देने वाला मेरा गार्हस्थ्य जीवन नष्ट न हो;
श्लोक 26 (skanda.6.265.26)
पितरो मा प्रणश्यंतु मा प्रणश्यंतु चाग्नयः । देवता मा प्रणश्यंतु मत्तो दांपत्यभेदतः
pitaro mā praṇaśyaṁtu mā praṇaśyaṁtu cāgnayaḥ devatā mā praṇaśyaṁtu matto dāṁpatyabhedataḥ
मेरे पितर नष्ट न हों, मेरी अग्नियाँ नष्ट न हों, मेरे दांपत्य में किसी भेद के कारण देवता भी नष्ट न हों;
श्लोक 27 (skanda.6.265.27)
लक्ष्म्या वियुज्यसे कृष्ण न कदाचिद्यथा भवान् । तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे प्रणश्यतु
lakṣmyā viyujyase kṛṣṇa na kadācidyathā bhavān tathā kalatrasambandho deva mā me praṇaśyatu
हे कृष्ण! जिस प्रकार आप कभी भी लक्ष्मी से वियुक्त नहीं होते, उसी प्रकार हे देव! मेरा पत्नी के साथ का संबंध कभी नष्ट न हो।
श्लोक 28 (skanda.6.265.28)
लक्ष्म्या ह्यशून्यं शयनं यथा ते देव सर्वदा । शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा जन्मनि जन्मनि
lakṣmyā hyaśūnyaṁ śayanaṁ yathā te deva sarvadā śayyā mamāpyaśūnyāstu tathā janmani janmani
हे देव! जिस प्रकार आपकी शय्या सदा लक्ष्मी से रहित नहीं रहती, उसी प्रकार मेरी शय्या भी जन्म-जन्म में अशून्य रहे।
श्लोक 29 (skanda.6.265.29)
एवमर्थं निवेद्याथ ततो विप्रं प्रपूजयेत् । यथाशक्त्या द्विजश्रेष्ठा वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्
evamarthaṁ nivedyātha tato vipraṁ prapūjayet yathāśaktyā dvijaśreṣṭhā vittaśāṭhyaṁ vivarjayet
इस प्रकार अपनी प्रार्थना निवेदित करके तत्पश्चात् विप्र की पूजा करे; हे द्विजश्रेष्ठो! यथाशक्ति धन देने में कंजूसी न करे।
श्लोक 30 (skanda.6.265.30)
एवं भाद्रपदे मासि आश्विने कार्तिके तथा । पूजयेच्च जगन्नाथं जलशायिनमच्युतम्
evaṁ bhādrapade māsi āśvine kārtike tathā pūjayecca jagannāthaṁ jalaśāyinamacyutam
इस प्रकार भाद्रपद मास में, तथा आश्विन और कार्तिक में भी, जगन्नाथ जलशायी अच्युत की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 31 (skanda.6.265.31)
अक्षारभोजनं कार्यं विशेषात्तैलवर्जितम् । समाप्तौ च ततो दद्याद्ब्राह्मणेंद्राय भक्तितः
akṣārabhojanaṁ kāryaṁ viśeṣāttailavarjitam samāptau ca tato dadyādbrāhmaṇeṁdrāya bhaktitaḥ
नमकरहित भोजन करना चाहिए, विशेषतः तेल से रहित; और समाप्ति पर भक्तिपूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मण को —
श्लोक 32 (skanda.6.265.32)
फलव्रीहिसमोपेतां शय्यां वस्त्रसमन्विताम् । सुवर्णं दक्षिणायां च तथैव च फलं लभेत्
phalavrīhisamopetāṁ śayyāṁ vastrasamanvitām suvarṇaṁ dakṣiṇāyāṁ ca tathaiva ca phalaṁ labhet
— फल और चावल सहित, वस्त्र से युक्त एक शय्या दान करे, तथा दक्षिणा में स्वर्ण भी दे; ऐसा करने से ही फल की प्राप्ति होती है।
श्लोक 33 (skanda.6.265.33)
एवं यः कुरुते सम्यग्व्रतमेतत्समाहितः । तस्य तुष्टिपथं याति जलशायी जगद्गुरुः
evaṁ yaḥ kurute samyagvratametatsamāhitaḥ tasya tuṣṭipathaṁ yāti jalaśāyī jagadguruḥ
इस प्रकार जो एकाग्रचित्त होकर इस व्रत को भलीभाँति करता है, उसके प्रति जगद्गुरु जलशायी प्रसन्नता के मार्ग पर चलते हैं।
श्लोक 34 (skanda.6.265.34)
यथा शक्रस्य संतुष्टः पूर्वमेव द्विजोत्तमाः । अशून्यं शयनं तस्य भवेज्जन्मनि जन्मनि
yathā śakrasya saṁtuṣṭaḥ pūrvameva dvijottamāḥ aśūnyaṁ śayanaṁ tasya bhavejjanmani janmani
हे द्विजोत्तमो! जिस प्रकार पूर्वकाल में इंद्र से प्रसन्न होकर उन्होंने वरदान दिया, जिससे उसकी शय्या जन्म-जन्म में अशून्य रहे,
श्लोक 35 (skanda.6.265.35)
अष्टमासकृतं पापमज्ञानाज्ज्ञानतोऽपि वा । अशून्यशयनात्सर्वं व्रतान्नाशं नयेत्पुमान्
aṣṭamāsakṛtaṁ pāpamajñānājjñānato'pi vā aśūnyaśayanātsarvaṁ vratānnāśaṁ nayetpumān
— उसी प्रकार आठ महीनों में किए गए पाप को, चाहे वह अज्ञानवश हो या ज्ञानपूर्वक, मनुष्य इस अशून्यशयन-व्रत से पूर्णतः नष्ट कर देता है।
श्लोक 36 (skanda.6.265.36)
पुत्रहीना च या नारी काकवन्ध्या च या भवेत् । विधवा या करोत्येतद्व्रतमेवं समाहिता । तस्यास्तुष्टो जगन्नाथः कायशुद्धिं प्रयच्छति
putrahīnā ca yā nārī kākavandhyā ca yā bhavet vidhavā yā karotyetadvratamevaṁ samāhitā tasyāstuṣṭo jagannāthaḥ kāyaśuddhiṁ prayacchati
जो नारी पुत्रहीन हो, जो काकवन्ध्या (केवल एक संतान वाली) हो, अथवा जो विधवा हो — यदि वह एकाग्रचित्त होकर इस व्रत को करती है, तो प्रसन्न होकर जगन्नाथ उसे देहशुद्धि प्रदान करते हैं।
श्लोक 37 (skanda.6.265.37)
न तस्या जायते बुद्धिः कदाचित्पापसंभवा । न कामोपहता बुद्धिः कथंचिदपि जायते
na tasyā jāyate buddhiḥ kadācitpāpasaṁbhavā na kāmopahatā buddhiḥ kathaṁcidapi jāyate
उसकी बुद्धि कभी पापोत्पन्न नहीं होती, और उसकी बुद्धि कामना से अभिभूत भी किसी प्रकार नहीं होती।
श्लोक 38 (skanda.6.265.38)
कुमारिकापि या सम्यग्व्रतमेतत्समाचरेत् । सा पतिं लभते विप्राः कुलीनं रूपसंयुतम्
kumārikāpi yā samyagvratametatsamācaret sā patiṁ labhate viprāḥ kulīnaṁ rūpasaṁyutam
हे विप्रो! जो कुमारी भी इस व्रत का भलीभाँति आचरण करती है, वह कुलीन और रूपवान पति को प्राप्त करती है।
श्लोक 39 (skanda.6.265.39)
निष्कामः कुरुते यस्तु व्रतमेतत्समाहितः । चातुर्मास्युद्भवानां च नियमानां फलं लभेत्
niṣkāmaḥ kurute yastu vratametatsamāhitaḥ cāturmāsyudbhavānāṁ ca niyamānāṁ phalaṁ labhet
और जो निष्काम भाव से एकाग्रचित्त होकर इस व्रत को करता है, वह चातुर्मास्य से उत्पन्न समस्त नियमों का फल प्राप्त करता है।