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नागर खण्ड · अध्याय 266

शिवरात्रि-माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 265अध्याय-सूचीअध्याय 267

श्लोक 1 (skanda.6.266.1)

ऋषय ऊचुः । श्रुतानि मुख्यतीर्थानि तत्क्षेत्रप्रोद्भवानि च । येषु स्नातो नरः स्म्यक्सर्व तीर्थफलं लभेत्

ṛṣaya ūcuḥ śrutāni mukhyatīrthāni tatkṣetraprodbhavāni ca yeṣu snāto naraḥ smyaksarva tīrthaphalaṁ labhet

ऋषियों ने कहा — उस क्षेत्र में उत्पन्न प्रमुख तीर्थों के विषय में सुना, जिनमें स्नान करने से मनुष्य को सभी तीर्थों का फल पूर्णतः प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.6.266.2)

लिंगानि च महाभाग तत्र मुख्यानि यानि च । यैर्दृष्टैर्लभ्यते श्रेयः सर्वेषां तानि नो वद

liṁgāni ca mahābhāga tatra mukhyāni yāni ca yairdṛṣṭairlabhyate śreyaḥ sarveṣāṁ tāni no vada

हे महाभाग! वहाँ के प्रमुख लिंग भी बताइए, जिनके दर्शनमात्र से सबको कल्याण प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (skanda.6.266.3)

सूत उवाच । तत्र च मंकणाख्यं तु लिंगमस्ति सुशोभनम् । तथा सिद्धेश्वरं नाम गौतमेश्वरसंयुतम्

sūta uvāca tatra ca maṁkaṇākhyaṁ tu liṁgamasti suśobhanam tathā siddheśvaraṁ nāma gautameśvarasaṁyutam

सूत ने कहा — वहाँ मंकण नामक अत्यंत सुशोभित लिंग है, तथा गौतमेश्वर से युक्त सिद्धेश्वर नामक लिंग भी है,

श्लोक 4 (skanda.6.266.4)

कपालेश्वमन्यच्च चतुर्थं परिकीर्तितम् । एकैकं सर्वलिंगानां फलं यच्छत्यसंशयम् । यथोक्तविधिना सम्यग्यथोक्तं द्विजसत्तमाः

kapāleśvamanyacca caturthaṁ parikīrtitam ekaikaṁ sarvaliṁgānāṁ phalaṁ yacchatyasaṁśayam yathoktavidhinā samyagyathoktaṁ dvijasattamāḥ

तथा कपालेश्वर नामक चौथा भी कहा गया है; हे श्रेष्ठ द्विजो! इनमें से एक-एक भी, विधिपूर्वक और यथोक्त रूप से पूजित होने पर, समस्त लिंगों का फल निःसंदेह प्रदान करता है।

श्लोक 5 (skanda.6.266.5)

तत्र तावत्प्रवक्ष्यामि मंकणेश्वरजं फलम् । मकाराक्षरयुक्तस्य लिंगस्यात्र द्विजोत्तमाः

tatra tāvatpravakṣyāmi maṁkaṇeśvarajaṁ phalam makārākṣarayuktasya liṁgasyātra dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! वहाँ पहले मैं मंकणेश्वर से उत्पन्न फल का वर्णन करूँगा — 'म' अक्षर से युक्त इस लिंग का,

श्लोक 6 (skanda.6.266.6)

शिवरात्रिं समासाद्य यस्तस्य पुरुषो द्विजाः । कुर्याज्जागरणं रात्रौ निराहारः स्थितः शुचिः

śivarātriṁ samāsādya yastasya puruṣo dvijāḥ kuryājjāgaraṇaṁ rātrau nirāhāraḥ sthitaḥ śuciḥ

हे द्विजो! शिवरात्रि के आने पर जो पुरुष निराहार और शुचि रहकर रात्रि में इसका जागरण करता है,

श्लोक 7 (skanda.6.266.7)

सर्वलिंगोद्भवं चैव फलं दर्शनसंभवम् । जायते नात्र संदेह इत्युवाच हरः स्वयम्

sarvaliṁgodbhavaṁ caiva phalaṁ darśanasaṁbhavam jāyate nātra saṁdeha ityuvāca haraḥ svayam

उसे केवल दर्शन से ही समस्त लिंगों के फल की प्राप्ति होती है — इसमें कोई संदेह नहीं, ऐसा स्वयं हर ने कहा है।

श्लोक 8 (skanda.6.266.8)

ऋषय ऊचुः । शिवरात्रिर्महाभाग कस्मिन्काले तु सा भवेत् । विध्यानं चैव माहात्म्यं सर्वं नो विस्तराद्वद

ṛṣaya ūcuḥ śivarātrirmahābhāga kasminkāle tu sā bhavet vidhyānaṁ caiva māhātmyaṁ sarvaṁ no vistarādvada

ऋषियों ने कहा — हे महाभाग! शिवरात्रि किस काल में होती है? इसका विधान, ध्यान तथा माहात्म्य — यह सब हमें विस्तारपूर्वक बताइए।

श्लोक 9 (skanda.6.266.9)

सूत उवाच । माघस्य कृष्णपक्षे या तिथिश्चैव चतुर्दशी । तस्या रात्रिः समाख्याता शिवरात्रिसमुद्भवा

sūta uvāca māghasya kṛṣṇapakṣe yā tithiścaiva caturdaśī tasyā rātriḥ samākhyātā śivarātrisamudbhavā

सूत ने कहा — माघ मास के कृष्ण पक्ष में जो चतुर्दशी तिथि है, उसकी रात्रि ही शिवरात्रि के उद्भव की रात्रि कही गई है।

श्लोक 10 (skanda.6.266.10)

तस्यां सर्वेषु लिंगेषु सदा संक्रमते हरः । विशेषात्सर्वपुण्येषु ख्यातेयं मंकणेश्वरे

tasyāṁ sarveṣu liṁgeṣu sadā saṁkramate haraḥ viśeṣātsarvapuṇyeṣu khyāteyaṁ maṁkaṇeśvare

उस रात्रि में हर सदा समस्त लिंगों में संक्रमण करते हैं; और यह विशेष रूप से समस्त पुण्य-स्थलों में मंकणेश्वर में ही विख्यात है।

श्लोक 11 (skanda.6.266.11)

ऋषय ऊचुः । शिवरात्रिः कथं जाता केनैषा च विनिर्मिता । कस्माद्बहुफला जाता सर्वं नो विस्तराद्वद

ṛṣaya ūcuḥ śivarātriḥ kathaṁ jātā kenaiṣā ca vinirmitā kasmādbahuphalā jātā sarvaṁ no vistarādvada

ऋषियों ने कहा — शिवरात्रि किस प्रकार उत्पन्न हुई, तथा किसके द्वारा इसका निर्माण हुआ? यह इतनी बहुफलदायी कैसे हुई — यह सब हमें विस्तारपूर्वक बताइए।

श्लोक 12 (skanda.6.266.12)

सूत उवाच । अत्र वः कीर्तयिष्यामि पूर्ववृत्तं कथानकम् । भर्तृयज्ञस्य संवादमश्वसेनस्य भूपतेः

sūta uvāca atra vaḥ kīrtayiṣyāmi pūrvavṛttaṁ kathānakam bhartṛyajñasya saṁvādamaśvasenasya bhūpateḥ

सूत ने कहा — यहाँ मैं तुम्हें एक प्राचीन कथा सुनाऊँगा — भर्तृयज्ञ और राजा अश्वसेन के संवाद की।

श्लोक 13 (skanda.6.266.13)

आनर्ताधिपतिः पूर्वमश्वसेन इति स्मृतः । आसीद्धर्मपरो नित्यं वेदवेदागंपारगः

ānartādhipatiḥ pūrvamaśvasena iti smṛtaḥ āsīddharmaparo nityaṁ vedavedāgaṁpāragaḥ

पूर्वकाल में आनर्त देश के अधिपति अश्वसेन नामक राजा थे, जो सदा धर्मपरायण तथा वेद-वेदांगों के पारंगत थे।

श्लोक 14 (skanda.6.266.14)

भर्तृयज्ञः पुरा तेन इदं पृष्टः कुतूहलात् । कलिकालं समुद्वीक्ष्य वर्धमानं दिनेदिने

bhartṛyajñaḥ purā tena idaṁ pṛṣṭaḥ kutūhalāt kalikālaṁ samudvīkṣya vardhamānaṁ dinedine

कलिकाल को दिन-प्रतिदिन बढ़ता देखकर, उस राजा ने पूर्वकाल में कुतूहलवश भर्तृयज्ञ से यह प्रश्न पूछा —

श्लोक 15 (skanda.6.266.15)

अश्वसेन उवाच । कलिकालकृते किंचिद्व्रतं मे वद सन्मुने । स्वल्पायासं महत्पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्

aśvasena uvāca kalikālakṛte kiṁcidvrataṁ me vada sanmune svalpāyāsaṁ mahatpuṇyaṁ sarvapāpapraṇāśanam

अश्वसेन ने कहा — हे सन्मुने! मुझे कलिकाल के लिए उपयुक्त कोई व्रत बताइए, जो अल्प परिश्रम वाला, महापुण्यदायी और समस्त पापों का नाशक हो।

श्लोक 16 (skanda.6.266.16)

स्वल्पायुषः सदा मर्त्या ब्रह्मन्कृतयुगे पुरा । त्रेतायां द्वापरे चैव किमु प्राप्ते कलौ युगे

svalpāyuṣaḥ sadā martyā brahmankṛtayuge purā tretāyāṁ dvāpare caiva kimu prāpte kalau yuge

हे ब्रह्मन्! पूर्वकाल में कृतयुग में भी मनुष्य सदा अल्पायु ही थे, तथा त्रेता और द्वापर में भी — फिर कलियुग के आ जाने पर तो क्या कहना!

श्लोक 17 (skanda.6.266.17)

तस्माद्वर्षव्रतं त्यक्त्वा किंचिदेकाह्निकं वद

tasmādvarṣavrataṁ tyaktvā kiṁcidekāhnikaṁ vada

अतः वर्षभर चलने वाले व्रत को छोड़कर, कोई एक दिन में पूर्ण होने वाला व्रत बताइए।

श्लोक 18 (skanda.6.266.18)

श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम् । न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं वास्य न वा कृतम्

śvaḥ kāryamadya kurvīta pūrvāhṇe cāparāhṇikam na hi pratīkṣate mṛtyuḥ kṛtaṁ vāsya na vā kṛtam

कल का कार्य आज ही कर लेना चाहिए, और अपराह्न का कार्य पूर्वाह्न में ही; क्योंकि मृत्यु यह प्रतीक्षा नहीं करती कि यह कार्य पूर्ण हुआ या नहीं।

श्लोक 19 (skanda.6.266.19)

तस्य तद्वचं श्रुत्वा भर्तृयज्ञ उदारधीः । अब्रवीत्सुचिरं ध्यात्वा ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा

tasya tadvacaṁ śrutvā bhartṛyajña udāradhīḥ abravītsuciraṁ dhyātvā jñātvā divyena cakṣuṣā

उसके इस वचन को सुनकर, उदारबुद्धि भर्तृयज्ञ ने बहुत देर तक ध्यान करके, दिव्य चक्षु से जानकर कहा —

श्लोक 20 (skanda.6.266.20)

अस्ति राजन्व्रतं पुण्यं शिवरात्रीतिसंज्ञितम् । एकाह्निकं महाराज सर्वपातकनाशनम्

asti rājanvrataṁ puṇyaṁ śivarātrītisaṁjñitam ekāhnikaṁ mahārāja sarvapātakanāśanam

हे राजन्! एक पुण्य व्रत है, जिसे शिवरात्रि कहते हैं; हे महाराज! यह एक ही दिन का व्रत है, तथा समस्त पापों का नाशक है।

श्लोक 21 (skanda.6.266.21)

तत्र यद्दीयते दानं हुतं जप्तं तथैव च । सर्वमक्षयतां याति रात्रि जागरणे कृते

tatra yaddīyate dānaṁ hutaṁ japtaṁ tathaiva ca sarvamakṣayatāṁ yāti rātri jāgaraṇe kṛte

उसमें जो भी दान दिया जाता है, जो हवन और जप किया जाता है, वह सब — रात्रि-जागरण करने पर — अक्षय हो जाता है।

श्लोक 22 (skanda.6.266.22)

अपुत्रो लभते पुत्रानधनो धनमाप्नुयात् । स्वल्पायुर्दीर्घमायुष्यं शत्रूणां चैव संक्षयम्

aputro labhate putrānadhano dhanamāpnuyāt svalpāyurdīrghamāyuṣyaṁ śatrūṇāṁ caiva saṁkṣayam

पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होते हैं, निर्धन को धन मिलता है; अल्पायु को दीर्घायु, तथा शत्रुओं का भी नाश प्राप्त होता है।

श्लोक 23 (skanda.6.266.23)

यंयं काममभिध्यायन्व्रतमेतत्समाचरेत् । तंतं समाप्नुयान्मर्त्यो निष्कामो मोक्षमाप्नुयात्

yaṁyaṁ kāmamabhidhyāyanvratametatsamācaret taṁtaṁ samāpnuyānmartyo niṣkāmo mokṣamāpnuyāt

मनुष्य जिस-जिस कामना का चिंतन करते हुए यह व्रत करता है, वह-वह कामना उसे प्राप्त हो जाती है; और निष्काम व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है।

श्लोक 24 (skanda.6.266.24)

कार्पण्येनाथ वित्तेन यदि कुर्यात्प्रजागरम् । तथा वर्षकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः

kārpaṇyenātha vittena yadi kuryātprajāgaram tathā varṣakṛtātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ

और यदि तुच्छ धन के साथ भी यह जागरण करता है, तो भी वह वर्षभर में किए गए पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 25 (skanda.6.266.25)

यानि कान्यत्र लिंगानि स्थावराणि चराणि च । तेषु संक्रमते देवस्तस्यां रात्रौ यतो हरः

yāni kānyatra liṁgāni sthāvarāṇi carāṇi ca teṣu saṁkramate devastasyāṁ rātrau yato haraḥ

जो भी लिंग स्थावर या चर हैं, उस रात्रि में देव हर उन सबमें संक्रमण करते हैं,

श्लोक 26 (skanda.6.266.26)

शिवरात्रिस्ततः प्रोक्ता तेन सा हरवल्लभा । प्रार्थितः स सुरैः सर्वैर्लोकानुग्रहकाम्यया

śivarātristataḥ proktā tena sā haravallabhā prārthitaḥ sa suraiḥ sarvairlokānugrahakāmyayā

इसीलिए इसे शिवरात्रि कहा गया है, और यह हर को अत्यंत प्रिय है। लोकों पर अनुग्रह की कामना से समस्त देवताओं ने उनसे प्रार्थना की —

श्लोक 27 (skanda.6.266.27)

भगवन्कलिकालेऽस्मिन्सर्वपापसमन्विते । वर्षपापविशुद्ध्यर्थं दिनमेकं क्षितौ व्रज । येन त्वत्पूजया पूता मर्त्याः शुद्धिमवाप्नुयुः

bhagavankalikāle'sminsarvapāpasamanvite varṣapāpaviśuddhyarthaṁ dinamekaṁ kṣitau vraja yena tvatpūjayā pūtā martyāḥ śuddhimavāpnuyuḥ

— हे भगवन्! समस्त पापों से युक्त इस कलिकाल में, वर्षभर के पाप की शुद्धि के लिए, एक दिन के लिए पृथ्वी पर पधारें, जिससे आपकी पूजा से पवित्र होकर मनुष्य शुद्धि को प्राप्त कर सकें।

श्लोक 28 (skanda.6.266.28)

ततो दत्तं हुतं तेषामस्माकमुपतिष्ठति । यदुच्छिष्टं नरैर्दत्तं तद्वृथा जायतेऽखिलम्

tato dattaṁ hutaṁ teṣāmasmākamupatiṣṭhati yaducchiṣṭaṁ narairdattaṁ tadvṛthā jāyate'khilam

तभी उनके द्वारा दिया गया दान और हवन हम तक पहुँचता है; अन्यथा मनुष्यों द्वारा जो जूठा दान दिया जाता है, वह सब व्यर्थ हो जाता है।

श्लोक 29 (skanda.6.266.29)

कलिकाले न चास्माकं किंचिदेवोपतिष्ठति । अशुद्धैर्मानवैर्दत्तं प्रभूतमपि शंकर

kalikāle na cāsmākaṁ kiṁcidevopatiṣṭhati aśuddhairmānavairdattaṁ prabhūtamapi śaṁkara

हे शंकर! कलिकाल में अशुद्ध मनुष्यों द्वारा दिया गया, चाहे कितना भी प्रचुर हो, हम तक कुछ भी नहीं पहुँचता।

श्लोक 30 (skanda.6.266.30)

श्रीभगवानुवाच । माघमासस्य कृष्णायां चतुर्दश्यां सुरेश्वर । अहं यास्यामि भूपृष्ठे रात्रौ नैव दिवा कलौ

śrībhagavānuvāca māghamāsasya kṛṣṇāyāṁ caturdaśyāṁ sureśvara ahaṁ yāsyāmi bhūpṛṣṭhe rātrau naiva divā kalau

श्रीभगवान ने कहा — हे सुरेश्वर! माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी को, कलिकाल में, मैं रात्रि में ही पृथ्वीतल पर आऊँगा, दिन में नहीं।

श्लोक 31 (skanda.6.266.31)

लिंगेषु च समस्तेषु चलेषु स्थावरेषु च । संक्रमिष्याम्यसंदिग्धं वर्षपापविशुद्धये

liṁgeṣu ca samasteṣu caleṣu sthāvareṣu ca saṁkramiṣyāmyasaṁdigdhaṁ varṣapāpaviśuddhaye

समस्त लिंगों में, चाहे चर हों या स्थावर, मैं निःसंदेह संक्रमण करूँगा — वर्षभर के पाप की शुद्धि के लिए।

श्लोक 32 (skanda.6.266.32)

तस्यां रात्रौ हि मे पूजां यः करिष्यति मानवः । मंत्रैरेतैः सुरश्रेष्ठ विपाप्मा स भविष्यति

tasyāṁ rātrau hi me pūjāṁ yaḥ kariṣyati mānavaḥ maṁtrairetaiḥ suraśreṣṭha vipāpmā sa bhaviṣyati

हे देवश्रेष्ठ! उस रात्रि में जो भी मनुष्य इन मंत्रों के साथ मेरी पूजा करेगा, वह पापरहित हो जाएगा।

श्लोक 33 (skanda.6.266.33)

ॐ सद्योजाताय नमः । ॐ वामदेवाय नमः । ॐ घोराय नमः । ॐ तत्पुरुषाय नमः । ॐ ईशानाय नमः

oṁ sadyojātāya namaḥ oṁ vāmadevāya namaḥ oṁ ghorāya namaḥ oṁ tatpuruṣāya namaḥ oṁ īśānāya namaḥ

ॐ सद्योजात को नमस्कार। ॐ वामदेव को नमस्कार। ॐ घोर को नमस्कार। ॐ तत्पुरुष को नमस्कार। ॐ ईशान को नमस्कार।

श्लोक 34 (skanda.6.266.34)

एवं वक्त्राणि संपूज्य गन्धपुष्पानुलेपनैः । वस्त्रैर्दीपैश्च नैवेद्यैस्ततोऽर्घं संप्रदापयेत् । मंत्रेणानेन संपूज्य मां ध्यात्वा मनसि स्थितम्

evaṁ vaktrāṇi saṁpūjya gandhapuṣpānulepanaiḥ vastrairdīpaiśca naivedyaistato'rghaṁ saṁpradāpayet maṁtreṇānena saṁpūjya māṁ dhyātvā manasi sthitam

इस प्रकार इन [पाँच] मुखों की गंध, पुष्प और अनुलेपन से पूजा करके, वस्त्र, दीप तथा नैवेद्य से भी, तत्पश्चात् अर्घ्य अर्पित करे; इसी मंत्र से पूजा करके, मन में स्थित मुझे ध्यान करते हुए —

श्लोक 35 (skanda.6.266.35)

गौरीवल्लभ देवेश सर्वाद्य शशिशेखर । वर्षपापविशुद्ध्यर्थमर्घो मे प्रतिगृह्यताम्

gaurīvallabha deveśa sarvādya śaśiśekhara varṣapāpaviśuddhyarthamargho me pratigṛhyatām

— [यह मंत्र बोले] — हे गौरीवल्लभ, देवेश, सबके आदि, शशिशेखर! वर्षभर के पाप की शुद्धि के लिए मेरा यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए।

श्लोक 36 (skanda.6.266.36)

ततः संपूजयेद्विप्रं भोजनाच्छादनादिभिः । दत्त्वाथ दक्षिणां तस्मै वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्

tataḥ saṁpūjayedvipraṁ bhojanācchādanādibhiḥ dattvātha dakṣiṇāṁ tasmai vittaśāṭhyaṁ vivarjayet

तत्पश्चात् भोजन, वस्त्र आदि से विप्र की पूजा करे; उसे दक्षिणा देकर धन के विषय में कंजूसी न करे।

श्लोक 37 (skanda.6.266.37)

धर्माख्यानकथाभिश्च सलास्यैस्तांडवैस्तथा

dharmākhyānakathābhiśca salāsyaistāṁḍavaistathā

धर्म-कथाओं तथा लास्य और ताण्डव नृत्यों के साथ रात्रि व्यतीत करनी चाहिए।

श्लोक 38 (skanda.6.266.38)

एवं करिष्यते योऽत्र व्रतमेतत्सुरेश्वर । वर्षपापविशुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं भविष्यति

evaṁ kariṣyate yo'tra vratametatsureśvara varṣapāpaviśuddhyarthaṁ prāyaścittaṁ bhaviṣyati

हे सुरेश्वर! जो इस प्रकार यहाँ यह व्रत करेगा, उसके लिए यही वर्षभर के पाप की शुद्धि हेतु प्रायश्चित्त हो जाएगा।

श्लोक 39 (skanda.6.266.39)

तच्छ्रुत्वा त्रिदशाः सर्वे प्रणम्य शशिशेखरम् । संप्रहृष्टा नरश्रेष्ठ स्वानि स्थानानि भेजिरे

tacchrutvā tridaśāḥ sarve praṇamya śaśiśekharam saṁprahṛṣṭā naraśreṣṭha svāni sthānāni bhejire

यह सुनकर समस्त देवगण शशिशेखर को प्रणाम करके, हे नरश्रेष्ठ! अत्यंत हर्षित होकर अपने-अपने स्थानों को चले गए।

श्लोक 40 (skanda.6.266.40)

प्रेषयामासुरुर्व्यां च नारदं मुनिसत्तमम् । प्रबोधनाय लोकानां शिवरात्रिकृते सदा

preṣayāmāsururvyāṁ ca nāradaṁ munisattamam prabodhanāya lokānāṁ śivarātrikṛte sadā

उन्होंने पृथ्वी पर मुनिश्रेष्ठ नारद को भेजा, ताकि वे लोगों को सदा के लिए शिवरात्रि के प्रति जागृत कर सकें।

श्लोक 41 (skanda.6.266.41)

सोऽपि गत्वा धरापृष्ठं श्रावयामास सर्वतः । शिवरात्रेस्तु माहात्म्यं यदुक्तं शूलपाणिना

so'pi gatvā dharāpṛṣṭhaṁ śrāvayāmāsa sarvataḥ śivarātrestu māhātmyaṁ yaduktaṁ śūlapāṇinā

वे भी पृथ्वीतल पर जाकर, त्रिशूलधारी शिव द्वारा कहे गए शिवरात्रि के माहात्म्य को सर्वत्र सुनाने लगे।

श्लोक 42 (skanda.6.266.42)

ततः प्रभृति संजाता शिवरात्रिर्धरातले । सर्वकामप्रदा पुण्या सर्वपातकनाशिनी

tataḥ prabhṛti saṁjātā śivarātrirdharātale sarvakāmapradā puṇyā sarvapātakanāśinī

तभी से पृथ्वीतल पर शिवरात्रि प्रचलित हो गई, जो समस्त कामनाओं को देने वाली, पुण्यदायी तथा समस्त पापों का नाश करने वाली है।

श्लोक 43 (skanda.6.266.43)

अत्र वः कीर्तयिष्यामि पुरावृत्तं कथानकम् । यद्वृत्तं नैमिषारण्ये लुब्धकस्यात्र कस्यचित्

atra vaḥ kīrtayiṣyāmi purāvṛttaṁ kathānakam yadvṛttaṁ naimiṣāraṇye lubdhakasyātra kasyacit

अब मैं तुम्हें एक और प्राचीन कथा सुनाऊँगा, जो नैमिषारण्य में एक शिकारी के साथ घटित हुई थी।

श्लोक 44 (skanda.6.266.44)

तत्रासील्लुब्धकः कश्चिज्जातिमात्रान्न कर्मतः । व्यसेनानाभिभूतात्मा परवित्तापहारकः

tatrāsīllubdhakaḥ kaścijjātimātrānna karmataḥ vyasenānābhibhūtātmā paravittāpahārakaḥ

वहाँ एक शिकारी था, जो केवल जाति से ही शिकारी था, कर्म से नहीं; वह दुर्व्यसनों से पराभूत आत्मावाला, दूसरों के धन का हरण करने वाला था।

श्लोक 45 (skanda.6.266.45)

न कदाचिद्व्रतं तेन न दत्तं न जपः कृतः । केवलं च हृतं वित्तं लोकानां छलसंश्रयात्

na kadācidvrataṁ tena na dattaṁ na japaḥ kṛtaḥ kevalaṁ ca hṛtaṁ vittaṁ lokānāṁ chalasaṁśrayāt

उसने कभी न कोई व्रत किया, न कोई दान दिया, न जप किया; केवल छल का सहारा लेकर लोगों का धन हरण करता रहा।

श्लोक 46 (skanda.6.266.46)

कस्यचित्त्वथ कालस्य शिवरात्रिः समागता । माघमासेऽसितेपक्षे सर्वपातकनाशिनी

kasyacittvatha kālasya śivarātriḥ samāgatā māghamāse'sitepakṣe sarvapātakanāśinī

किसी समय माघ मास के कृष्ण पक्ष में समस्त पापों का नाश करने वाली शिवरात्रि आई।

श्लोक 47 (skanda.6.266.47)

तत्रास्त्यायतनं पुण्यं देवदेवस्य शूलिनः । तत्र जागरणं रात्रौ प्रारब्धं बहुभिर्ज्जनैः

tatrāstyāyatanaṁ puṇyaṁ devadevasya śūlinaḥ tatra jāgaraṇaṁ rātrau prārabdhaṁ bahubhirjjanaiḥ

वहाँ त्रिशूलधारी देवदेव का एक पुण्य मंदिर था; वहाँ अनेक लोगों ने रात्रि में जागरण आरंभ किया,

श्लोक 48 (skanda.6.266.48)

नारीभिर्नरशार्दूल भूषिताभिः सुभूषणैः । अथासौ चिंतयामास चोरो दृष्ट्वाथ जागरम्

nārībhirnaraśārdūla bhūṣitābhiḥ subhūṣaṇaiḥ athāsau ciṁtayāmāsa coro dṛṣṭvātha jāgaram

हे नरशार्दूल! सुंदर आभूषणों से सजी हुई स्त्रियों के साथ। तब उस जागरण को देखकर वह चोर सोचने लगा —

श्लोक 49 (skanda.6.266.49)

गच्छामि यदि कांचित्स्त्रीं भूषणैः परिभूषिताम् । निष्क्रांतां बाह्यतश्चास्य प्रासादस्याप्नुयामहम्

gacchāmi yadi kāṁcitstrīṁ bhūṣaṇaiḥ paribhūṣitām niṣkrāṁtāṁ bāhyataścāsya prāsādasyāpnuyāmaham

यदि मैं जाऊँ, तो शायद आभूषणों से सुसज्जित किसी स्त्री को, जो इस मंदिर से बाहर निकलेगी, पकड़ सकूँगा,

श्लोक 50 (skanda.6.266.50)

ततो हत्वा समादाय भूषणानि व्रजाम्यहम्

tato hatvā samādāya bhūṣaṇāni vrajāmyaham

और फिर उसे मारकर, आभूषण लेकर मैं चला जाऊँगा।

श्लोक 51 (skanda.6.266.51)

एवं निश्चित्य मनसा गतस्तस्य समीपतः । कर्णिकारं समारुह्य स्थितो गुप्तस्ततो हि सः

evaṁ niścitya manasā gatastasya samīpataḥ karṇikāraṁ samāruhya sthito guptastato hi saḥ

इस प्रकार मन में निश्चय करके वह उसके निकट गया, और कर्णिकार वृक्ष पर चढ़कर वहाँ छिपकर बैठ गया।

श्लोक 52 (skanda.6.266.52)

वीक्षमाणो दिशः सर्वा नारीनिष्क्रामणोद्भवाः । चौरकर्मप्रवृत्तस्य शीतार्तस्य विशेषतः

vīkṣamāṇo diśaḥ sarvā nārīniṣkrāmaṇodbhavāḥ caurakarmapravṛttasya śītārtasya viśeṣataḥ

वह सब दिशाओं में देख रहा था कि कोई स्त्री बाहर निकले — विशेषतः वह जो चौर्य-कर्म में प्रवृत्त और शीत से पीड़ित था।

श्लोक 53 (skanda.6.266.53)

अल्पापि निद्रा नायाता न च नारी विनिर्गता । तस्याधस्तात्ततो लिंगमभवत्तु धरोद्भवम् । गत्वा च पत्राण्यादाय प्रचिक्षेपास्य चोपरि

alpāpi nidrā nāyātā na ca nārī vinirgatā tasyādhastāttato liṁgamabhavattu dharodbhavam gatvā ca patrāṇyādāya pracikṣepāsya copari

न तो उसे तनिक भी नींद आई और न ही कोई स्त्री बाहर निकली। उसके नीचे भूमि से उत्पन्न एक लिंग था; उसने पत्तियाँ तोड़कर उसके ऊपर फेंकनी शुरू कर दीं।

श्लोक 54 (skanda.6.266.54)

एतस्मिन्नेव काले तु प्रोद्गतस्तीक्ष्णदीधितिः । असतीनां च चौराणां कामिनामसुखावहः

etasminneva kāle tu prodgatastīkṣṇadīdhitiḥ asatīnāṁ ca caurāṇāṁ kāmināmasukhāvahaḥ

इसी समय तीक्ष्ण किरणों वाला सूर्य उदित हो गया, जो असती स्त्रियों, चोरों और कामी पुरुषों को दुःख देने वाला होता है।

श्लोक 55 (skanda.6.266.55)

ततो नराश्च नार्यश्च जग्मुः स्वंस्वं निकेतनम् । उपचारपराः शांताः प्रणिपत्य महेश्वरम्

tato narāśca nāryaśca jagmuḥ svaṁsvaṁ niketanam upacāraparāḥ śāṁtāḥ praṇipatya maheśvaram

तत्पश्चात् उपचारपरायण, शांतचित्त पुरुष और स्त्रियाँ, महेश्वर को प्रणाम करके अपने-अपने घर चले गए।

श्लोक 56 (skanda.6.266.56)

सोऽपि चौरो निराशश्च क्षुत्क्षामः शीतविह्वलः । अवतीर्य द्रुमात्तस्मादुपायं कंचिदाश्रितः

so'pi cauro nirāśaśca kṣutkṣāmaḥ śītavihvalaḥ avatīrya drumāttasmādupāyaṁ kaṁcidāśritaḥ

वह चोर भी निराश होकर, भूख से क्षीण, शीत से विह्वल होकर उस वृक्ष से उतरा, और किसी अन्य उपाय का सहारा लिया।

श्लोक 57 (skanda.6.266.57)

ततः कालेन महता पंचत्वं समपद्यत । जातो जातिस्मरः सोऽथ दशार्णाधिपतेर्गृहे

tataḥ kālena mahatā paṁcatvaṁ samapadyata jāto jātismaraḥ so'tha daśārṇādhipatergṛhe

तत्पश्चात् दीर्घकाल बीतने पर उसकी मृत्यु हो गई; और वह दशार्ण के अधिपति के घर में जातिस्मर होकर जन्मा।

श्लोक 58 (skanda.6.266.58)

उपवासप्रभावेन बलादपि प्रजागरात् । शिवरात्रेस्तथा तस्य लिङ्गस्यापि प्रपूजया

upavāsaprabhāvena balādapi prajāgarāt śivarātrestathā tasya liṅgasyāpi prapūjayā

उस उपवास के प्रभाव से, बलपूर्वक हुए जागरण से, और उसी शिवरात्रि को उस लिंग की [अनजाने में हुई] पूजा से —

श्लोक 59 (skanda.6.266.59)

ततो राज्यं समासाद्य पितृपैतामहं महत् । कारयामास लिंगस्य प्रासादं तस्य शोभनम्

tato rājyaṁ samāsādya pitṛpaitāmahaṁ mahat kārayāmāsa liṁgasya prāsādaṁ tasya śobhanam

— तत्पश्चात् उसने पितृ-पितामह का महान राज्य प्राप्त कर, उस लिंग का एक सुंदर मंदिर बनवाया।

श्लोक 60 (skanda.6.266.60)

वर्षेवर्षे समाश्रित्य शिवरात्रौ प्रजागरात् । उपवासपरोभूत्वा गीतवादित्रनिःस्वनैः

varṣevarṣe samāśritya śivarātrau prajāgarāt upavāsaparobhūtvā gītavāditraniḥsvanaiḥ

वर्ष-वर्ष शिवरात्रि का आश्रय लेकर, जागरण करते हुए, उपवासपरायण होकर, गीत-वाद्य के निनाद के साथ,

श्लोक 61 (skanda.6.266.61)

धर्माख्यानकथाभिश्च गीतध्वनिभिरेव च । पूर्वोक्तमंत्रैः संपूज्य अर्घं दत्त्वा विधानतः । संतर्प्य ब्राह्मणान्कामैर्जगाम निलयं निजम्

dharmākhyānakathābhiśca gītadhvanibhireva ca pūrvoktamaṁtraiḥ saṁpūjya arghaṁ dattvā vidhānataḥ saṁtarpya brāhmaṇānkāmairjagāma nilayaṁ nijam

धर्मकथाओं और गीत-ध्वनियों के साथ, पूर्वोक्त मंत्रों से पूजा करके, विधिपूर्वक अर्घ्य देकर, ब्राह्मणों को उनकी इच्छानुसार संतुष्ट करके, वह अपने निवास को लौट जाता था।

श्लोक 62 (skanda.6.266.62)

कस्यचित्त्वथ कालस्य शिवरात्रौ समागताः । प्रासादे तत्र मुनयः प्राप्ता शाण्डिल्यपूर्वकाः

kasyacittvatha kālasya śivarātrau samāgatāḥ prāsāde tatra munayaḥ prāptā śāṇḍilyapūrvakāḥ

किसी समय, शिवरात्रि के अवसर पर, उस मंदिर में शाण्डिल्य आदि मुनि आए,

श्लोक 63 (skanda.6.266.63)

शांडिल्योऽथ भरद्वाजो यवक्रीतोऽथ गालवः । पुलस्त्यः पुलहो गार्ग्यस्तथान्ये बहवो नृप

śāṁḍilyo'tha bharadvājo yavakrīto'tha gālavaḥ pulastyaḥ pulaho gārgyastathānye bahavo nṛpa

शाण्डिल्य, भरद्वाज, यवक्रीत, गालव, पुलस्त्य, पुलह, गार्ग्य — हे राजन्! तथा अन्य भी अनेक मुनि।

श्लोक 64 (skanda.6.266.64)

सोऽपि राजा बृहत्सेनो दशार्णाधिपतेः सुतः । संप्राप्तो जागरं कर्तुं तस्य लिंगस्य चाग्रतः

so'pi rājā bṛhatseno daśārṇādhipateḥ sutaḥ saṁprāpto jāgaraṁ kartuṁ tasya liṁgasya cāgrataḥ

वह राजा बृहत्सेन, दशार्णपति का पुत्र, भी उस लिंग के सम्मुख जागरण करने के लिए वहाँ आ पहुँचा।

श्लोक 65 (skanda.6.266.65)

पूजयित्वा ततो देवं प्रणिपत्य मुनीश्वरान् । उपविष्टस्तस्य चाग्रे ह्यनुज्ञातो द्विजोत्तमैः

pūjayitvā tato devaṁ praṇipatya munīśvarān upaviṣṭastasya cāgre hyanujñāto dvijottamaiḥ

देव की पूजा करके तथा मुनीश्वरों को प्रणाम करके, द्विजोत्तमों की अनुमति से वह उनके सम्मुख बैठ गया।

श्लोक 66 (skanda.6.266.66)

ततस्तस्याग्रतश्चक्रुः कथास्ते बहुधा नृप । राजर्षीणामतीतानां ब्रह्मर्षीणां विशेषतः

tatastasyāgrataścakruḥ kathāste bahudhā nṛpa rājarṣīṇāmatītānāṁ brahmarṣīṇāṁ viśeṣataḥ

तत्पश्चात् हे राजन्! उन्होंने उसके सम्मुख अनेक प्रकार की कथाएँ कहीं — विशेषकर भूतकाल के राजर्षियों तथा ब्रह्मर्षियों की।

श्लोक 67 (skanda.6.266.67)

अथ कस्मिन्कथांते स तैः पृष्टो ब्रह्मवादिभिः । कौतुकाविष्टचित्तैश्च विस्मयोत्फुल्ललोचनैः

atha kasminkathāṁte sa taiḥ pṛṣṭo brahmavādibhiḥ kautukāviṣṭacittaiśca vismayotphullalocanaiḥ

तब किसी कथा के अंत में, कुतूहल से भरे चित्तवाले और विस्मय से खिले नेत्रों वाले उन ब्रह्मवादियों ने उससे पूछा —

श्लोक 68 (skanda.6.266.68)

राजन्पृच्छामहे सर्वे वयं कौतूहलान्विताः । यदि ब्रवीषि नः सत्यं देवतायतने स्थितः

rājanpṛcchāmahe sarve vayaṁ kautūhalānvitāḥ yadi bravīṣi naḥ satyaṁ devatāyatane sthitaḥ

हे राजन्! हम सब कौतूहलवश पूछते हैं — यदि आप इस देवमंदिर में खड़े होकर हमें सत्य बताएँ,

श्लोक 69 (skanda.6.266.69)

राजोवाच । यदि ज्ञास्यामि विप्रेंद्राः कथयिष्याम्यसंशयम् । देवस्याग्रे च संपृष्टः सत्येनात्मानमालभे

rājovāca yadi jñāsyāmi vipreṁdrāḥ kathayiṣyāmyasaṁśayam devasyāgre ca saṁpṛṣṭaḥ satyenātmānamālabhe

राजा ने कहा — हे विप्रेंद्रो! यदि मैं जानता हूँ, तो निःसंदेह बता दूँगा; और देव के सम्मुख पूछे जाने पर मैं स्वयं को सत्य से बाँधता हूँ।

श्लोक 70 (skanda.6.266.70)

ऋषय ऊचुः । पुष्कलानि परित्यज्य कस्माद्दानान्यनेकशः । जागरं कर्तुकामोऽत्र स्वदेशादुपतिष्ठसि

ṛṣaya ūcuḥ puṣkalāni parityajya kasmāddānānyanekaśaḥ jāgaraṁ kartukāmo'tra svadeśādupatiṣṭhasi

ऋषियों ने कहा — प्रचुर तथा अनेक दानों को छोड़कर, जागरण करने की इच्छा से आप अपने देश से यहाँ क्यों आते हैं?

श्लोक 71 (skanda.6.266.71)

वर्षेवर्षे सदा प्राप्ते नूनं त्वं वेत्सि कारणम् । रहस्यं यदि ते न स्यात्तद्ब्रवीहि नराधिप

varṣevarṣe sadā prāpte nūnaṁ tvaṁ vetsi kāraṇam rahasyaṁ yadi te na syāttadbravīhi narādhipa

वर्ष-वर्ष सदा यहाँ आने का कारण निश्चय ही आप जानते हैं; हे नराधिप! यदि यह आपका रहस्य नहीं है, तो बताइए।

श्लोक 72 (skanda.6.266.72)

सूत उवाच । सवैलक्ष्यं स्मितं कृत्वा ततः प्राह स दुर्मनाः । रहस्यं परमं ह्येतदवाच्यं हि द्विजोत्तमाः

sūta uvāca savailakṣyaṁ smitaṁ kṛtvā tataḥ prāha sa durmanāḥ rahasyaṁ paramaṁ hyetadavācyaṁ hi dvijottamāḥ

सूत ने कहा — कुछ लज्जित हँसी हँसकर, विचलित मन से उसने कहा — हे द्विजोत्तमो! यह वस्तुतः परम रहस्य है, अवाच्य है —

श्लोक 73 (skanda.6.266.73)

तथापि च वदिष्यामि पृष्टो देवाग्रतो यतः

tathāpi ca vadiṣyāmi pṛṣṭo devāgrato yataḥ

तथापि, चूँकि मुझसे देव के सम्मुख पूछा गया है, मैं इसे बता दूँगा।

श्लोक 74 (skanda.6.266.74)

ततः स कथयामास पूर्वदेहसमुद्भवम् । मलिम्लुचस्ततो नूनं शिवरात्रिसमुद्भवम्

tataḥ sa kathayāmāsa pūrvadehasamudbhavam malimlucastato nūnaṁ śivarātrisamudbhavam

तत्पश्चात् उसने अपने पूर्वजन्म में घटित बातें कहीं — कि वह पूर्वजन्म में एक चोर था, और शिवरात्रि से उत्पन्न [पुण्य के प्रभाव से ही उसे यह नया जन्म मिला था] —

श्लोक 75 (skanda.6.266.75)

चौर्यभावेन देवस्य पूजनं जागरस्तथा । उपवासं विना तेन शिवरात्रौ पुरा कृतम्

cauryabhāvena devasya pūjanaṁ jāgarastathā upavāsaṁ vinā tena śivarātrau purā kṛtam

— चोरी के भाव से ही उसने देव की पूजा और जागरण किया था, यद्यपि उपवास के बिना, पूर्वजन्म में शिवरात्रि के दिन,

श्लोक 76 (skanda.6.266.76)

जातिस्मरणसंयुक्तं जन्मजातं यथातथम् । ततस्ते मुनयः सर्वे साधुवादान्पृथग्विधान्

jātismaraṇasaṁyuktaṁ janmajātaṁ yathātatham tataste munayaḥ sarve sādhuvādānpṛthagvidhān

— और इसी के फलस्वरूप वह अपने इस जन्म में जातिस्मरण से युक्त हुआ, जैसा कि यथार्थतः घटित हुआ। तत्पश्चात् वे सभी मुनि अनेक प्रकार की साधुवाद —

श्लोक 77 (skanda.6.266.77)

नृपोत्तमस्य राजर्षेर्दत्त्वाशीर्भिः समन्वितान् । रात्रौ जागरणं कृत्वा प्रजग्मुस्ते निजाश्रमान्

nṛpottamasya rājarṣerdattvāśīrbhiḥ samanvitān rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā prajagmuste nijāśramān

— और आशीर्वाद उस श्रेष्ठ राजर्षि नृप को देकर, रात्रि में जागरण करके अपने-अपने आश्रमों को चले गए।

श्लोक 78 (skanda.6.266.78)

सोऽपि राजासमभ्यर्च्य तं देवं तान्द्विजोत्तमान् । जगाम स्वपुरं पश्चात्कृत्वा रात्रौ प्रजागरम्

so'pi rājāsamabhyarcya taṁ devaṁ tāndvijottamān jagāma svapuraṁ paścātkṛtvā rātrau prajāgaram

वह राजा भी उस देव और उन द्विजोत्तमों की भलीभाँति पूजा करके, रात्रि में जागरण करने के पश्चात्, अपने नगर को चला गया।

श्लोक 79 (skanda.6.266.79)

भर्तृयज्ञ उवाच । शिवरात्रिः समुत्पन्ना एवं भूमितले नृप । एवंविधं च माहात्म्यं तस्यास्ते परिकीर्तितम्

bhartṛyajña uvāca śivarātriḥ samutpannā evaṁ bhūmitale nṛpa evaṁvidhaṁ ca māhātmyaṁ tasyāste parikīrtitam

भर्तृयज्ञ ने कहा — हे राजन्! इस प्रकार पृथ्वीतल पर शिवरात्रि उत्पन्न हुई, और इस प्रकार उसका यह माहात्म्य तुम्हें बताया गया।

श्लोक 80 (skanda.6.266.80)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कार्या स नृपसत्तम । कलिकाले विशेषेण य इच्छेद्भूतिमात्मनः

tasmātsarvaprayatnena kāryā sa nṛpasattama kalikāle viśeṣeṇa ya icchedbhūtimātmanaḥ

अतः, हे नृपसत्तम! जो भी अपने लिए ऐश्वर्य चाहता हो, उसे विशेष रूप से कलिकाल में सर्वप्रयत्नपूर्वक यह व्रत करना चाहिए।

श्लोक 81 (skanda.6.266.81)

एषा कृता दिलीपेन नलेन नहुषेण च । मान्धात्रा धुंधुमारेण सगरेण युयुत्सुना

eṣā kṛtā dilīpena nalena nahuṣeṇa ca māndhātrā dhuṁdhumāreṇa sagareṇa yuyutsunā

यह व्रत दिलीप, नल तथा नहुष ने किया था, मान्धाता, धुंधुमार, सगर तथा युयुत्सु ने भी किया था,

श्लोक 82 (skanda.6.266.82)

तथान्यैश्च विशेषेण सम्यक्छ्रद्धासमन्वितैः । प्राप्ताश्च हृद्गताः कामा ये दिव्या ये च मानुषाः

tathānyaiśca viśeṣeṇa samyakchraddhāsamanvitaiḥ prāptāśca hṛdgatāḥ kāmā ye divyā ye ca mānuṣāḥ

तथा उचित श्रद्धा से युक्त अन्य अनेक लोगों ने भी किया, और उनके हृदय में स्थित समस्त कामनाएँ, चाहे दिव्य हों या मानवीय, पूर्ण हुईं।

श्लोक 83 (skanda.6.266.83)

तथा चैव तु सावित्र्या श्रिया देव्या तु सीतया । अरुंधत्या सरस्वत्या मेनया रंभया तथा

tathā caiva tu sāvitryā śriyā devyā tu sītayā aruṁdhatyā sarasvatyā menayā raṁbhayā tathā

इसी प्रकार सावित्री, देवी श्री, सीता, अरुंधती, सरस्वती, मेना तथा रंभा ने भी,

श्लोक 84 (skanda.6.266.84)

इंद्राण्याथ दृषद्वत्या स्वधया स्वाहया तथा । रत्या प्रीत्या प्रभावत्या गायत्र्या च नृपोत्तम । सर्वाः प्राप्ताः प्रियान्कामानतिसौभाग्यसंयुतान्

iṁdrāṇyātha dṛṣadvatyā svadhayā svāhayā tathā ratyā prītyā prabhāvatyā gāyatryā ca nṛpottama sarvāḥ prāptāḥ priyānkāmānatisaubhāgyasaṁyutān

इंद्राणी, दृषद्वती, स्वधा, स्वाहा, रति, प्रीति, प्रभावती तथा गायत्री ने भी — हे नृपोत्तम! इन सभी ने अत्यंत सौभाग्य से युक्त अपनी प्रिय कामनाओं को प्राप्त किया।

श्लोक 85 (skanda.6.266.85)

यश्चैतां पठते व्युष्टिं भावेन शिवसंनिधौ । दिनजात्पातकात्सोऽपि मुच्यते नात्र संशयः

yaścaitāṁ paṭhate vyuṣṭiṁ bhāvena śivasaṁnidhau dinajātpātakātso'pi mucyate nātra saṁśayaḥ

जो कोई भी शिव की उपस्थिति में सच्चे भाव से इस कथा को पढ़ता है, वह भी उस दिन उत्पन्न पाप से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 86 (skanda.6.266.86)

नास्ति गंगासमं तीर्थं नास्ति देवो हरोपमः । शिवरात्रेः परं नास्ति तपः सत्यं मयोदितम्

nāsti gaṁgāsamaṁ tīrthaṁ nāsti devo haropamaḥ śivarātreḥ paraṁ nāsti tapaḥ satyaṁ mayoditam

गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है, हर के समान कोई देव नहीं है; शिवरात्रि से बढ़कर कोई तप नहीं है — यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 87 (skanda.6.266.87)

सर्वरत्नमयो मेरुः सर्वाश्चर्यमयं तपः । सर्वधर्ममयी राजञ्छिवरात्रिः प्रकीर्तिताः

sarvaratnamayo meruḥ sarvāścaryamayaṁ tapaḥ sarvadharmamayī rājañchivarātriḥ prakīrtitāḥ

जिस प्रकार मेरु पर्वत समस्त रत्नों से बना है, तथा तप समस्त आश्चर्यों से युक्त है, उसी प्रकार, हे राजन्! शिवरात्रि को समस्त धर्मों से युक्त कहा गया है।

श्लोक 88 (skanda.6.266.88)

गरुडः पक्षिणां यद्वन्नदीनां सागरो यथा । प्रधानः सर्वधर्माणां शिवरात्रिस्तथोत्तमा

garuḍaḥ pakṣiṇāṁ yadvannadīnāṁ sāgaro yathā pradhānaḥ sarvadharmāṇāṁ śivarātristathottamā

जिस प्रकार पक्षियों में गरुड़ प्रधान है, और नदियों में सागर, उसी प्रकार समस्त धर्मों में शिवरात्रि सर्वोत्तम है।

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