नागर खण्ड · अध्याय 267
सिद्धेश्वर में तुलापुरुषदान की महिमा
श्लोक 1 (skanda.6.267.1)
सूत उवाच तस्मादेषा महाराज शिवरात्रिर्विपश्चिता कर्तव्या पुरुषेणात्र लोकद्वयमभीप्सुना
sūta uvāca tasmādeṣā mahārāja śivarātrirvipaścitā kartavyā puruṣeṇātra lokadvayamabhīpsunā
सूत जी ने कहा — इसलिए हे महाराज, यह शिवरात्रि बुद्धिमान पुरुष द्वारा अवश्य करनी चाहिए, जो इस लोक और परलोक दोनों की कामना रखता है।
श्लोक 2 (skanda.6.267.2)
आनर्त उवाच मंकणेश्वरमाहात्म्यं मया विस्तरतः श्रुतम् शिवरात्रिसमोपेतं यत्त्वया परिकीर्तितम्
ānarta uvāca maṁkaṇeśvaramāhātmyaṁ mayā vistarataḥ śrutam śivarātrisamopetaṁ yattvayā parikīrtitam
आनर्त ने कहा — हे महामुने, शिवरात्रि-व्रत सहित मंकणेश्वर की जो महिमा आपने वर्णन की, वह मैंने विस्तार से सुन ली है।
श्लोक 3 (skanda.6.267.3)
सांप्रतं वद मे कृत्स्नं सिद्धेश्वरसमुद्भवम् विस्तरेण महाभाग परं कौतूहलं हि मे
sāṁprataṁ vada me kṛtsnaṁ siddheśvarasamudbhavam vistareṇa mahābhāga paraṁ kautūhalaṁ hi me
अब हे महाभाग, सिद्धेश्वर की सम्पूर्ण उत्पत्ति-कथा मुझे विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि इसके विषय में मुझे अत्यंत कौतूहल है।
श्लोक 4 (skanda.6.267.4)
भर्तृयज्ञ उवाच सिद्धेश्वर इति ख्यातो महादेवो महीपते तस्योत्पत्तिस्त्वया पूर्वं श्रुतात्र वदतो मम
bhartṛyajña uvāca siddheśvara iti khyāto mahādevo mahīpate tasyotpattistvayā pūrvaṁ śrutātra vadato mama
भर्तृयज्ञ ने कहा — हे महीपते, सिद्धेश्वर नामक विख्यात महादेव की उत्पत्ति तो आप पहले ही यहाँ मुझसे सुन चुके हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.267.5)
सांप्रतं तत्फलं वच्मि तस्मिन्दृष्टे तु दानजम् यत्फलं जायते नॄणां चक्रवर्तित्व संभवम्
sāṁprataṁ tatphalaṁ vacmi tasmindṛṣṭe tu dānajam yatphalaṁ jāyate nṝṇāṁ cakravartitva saṁbhavam
अब मैं वह फल कहता हूँ जो उनके दर्शन के पश्चात दान से उत्पन्न होता है — वह फल जिससे मनुष्यों को चक्रवर्तित्व की प्राप्ति होती है।
श्लोक 6 (skanda.6.267.6)
तुलापुरुषदानं च तत्र राजन्प्रशश्यते य इच्छेच्चक्रवर्तित्वं समस्ते धरणीतले
tulāpuruṣadānaṁ ca tatra rājanpraśaśyate ya iccheccakravartitvaṁ samaste dharaṇītale
हे राजन्, वहाँ तुलापुरुषदान की विशेष प्रशंसा की गई है, उसके लिए जो सम्पूर्ण पृथ्वी पर चक्रवर्तित्व की इच्छा रखता है।
श्लोक 7 (skanda.6.267.7)
आनर्त उवाच तुलापुरुषदानस्य यो विधिः परिकीर्तितः तं मे सर्वं समाचक्ष्व विस्तरेण महामुने
ānarta uvāca tulāpuruṣadānasya yo vidhiḥ parikīrtitaḥ taṁ me sarvaṁ samācakṣva vistareṇa mahāmune
आनर्त ने कहा — हे महामुने, जो विधि तुलापुरुषदान की कही गई है, वह सब मुझे विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 8 (skanda.6.267.8)
भर्तृयज्ञ उवाच चंद्रसूर्योपरागे वा अयने विषुवे तथा तीर्थे वा पुरुषश्रेष्ठ तुलापुरुषसंभवम्
bhartṛyajña uvāca caṁdrasūryoparāge vā ayane viṣuve tathā tīrthe vā puruṣaśreṣṭha tulāpuruṣasaṁbhavam
भर्तृयज्ञ ने कहा — हे पुरुषश्रेष्ठ, चन्द्र या सूर्यग्रहण में, अयन अथवा विषुव के समय, अथवा किसी तीर्थ में तुलापुरुष सम्पन्न किया जाता है।
श्लोक 9 (skanda.6.267.9)
प्रशंसंति विधिं सम्यक्प्राप्ते वा चेंदुसंक्षये ब्राह्मणानां सुदांतानामनुष्ठानवतां सताम्
praśaṁsaṁti vidhiṁ samyakprāpte vā ceṁdusaṁkṣaye brāhmaṇānāṁ sudāṁtānāmanuṣṭhānavatāṁ satām
चंद्रमा के क्षय-काल में प्राप्त होने पर भी इस विधि की भली-भाँति प्रशंसा की जाती है — उन ब्राह्मणों के लिए जो सुसंयमी, अनुष्ठानशील और सज्जन हैं।
श्लोक 10 (skanda.6.267.10)
वेदाध्ययनयुक्तानां निर्दोषाणां च पार्थिव विभज्य स भवेद्देयो नैकस्य च कथंचन
vedādhyayanayuktānāṁ nirdoṣāṇāṁ ca pārthiva vibhajya sa bhaveddeyo naikasya ca kathaṁcana
हे पार्थिव, वह दान वेदाध्ययनरत तथा निर्दोष ब्राह्मणों में विभाजित करके देना चाहिए, किसी एक को अकेले कदापि नहीं।
श्लोक 11 (skanda.6.267.11)
शुचौ देशे समे पुण्ये पूर्वोत्तरप्लवे शुभे मंडपं कारयेद्विद्वान् रम्यं ष़ोशहस्तकम् तन्मध्ये कारयेद्वेदिं चतुर्हस्त प्रमाणतः यजमानस्य हस्तेन हस्तैकेन समुच्छ्रिताम्
śucau deśe same puṇye pūrvottaraplave śubhe maṁḍapaṁ kārayedvidvān ramyaṁ ṣa़ośahastakam tanmadhye kārayedvediṁ caturhasta pramāṇataḥ yajamānasya hastena hastaikena samucchritām
पवित्र, समतल, पुण्यमय तथा पूर्वोत्तर की ओर ढाल लिए हुए शुभ स्थान में विद्वान पुरुष सोलह हाथ का सुंदर मंडप बनवाए; उसके मध्य में चार हाथ प्रमाण की वेदी बनवाए, जो यजमान के अपने हाथ के माप से एक हाथ ऊँची हो।
श्लोक 12 (skanda.6.267.12)
चतुर्हस्तानि कुण्डानि चतुर्दिक्षु प्रकल्पयेत एकहस्तप्रमाणानि आयामव्यासविस्तरात् ऐशान्यामपरां वेदिं हस्तमात्रां न्यसेच्छुभाम् रत्निमात्रोत्थितां चैव ग्रहांस्तत्र प्रकल्पयेत्
caturhastāni kuṇḍāni caturdikṣu prakalpayeta ekahastapramāṇāni āyāmavyāsavistarāt aiśānyāmaparāṁ vediṁ hastamātrāṁ nyasecchubhām ratnimātrotthitāṁ caiva grahāṁstatra prakalpayet
चारों दिशाओं में चार-चार हाथ के हवन-कुण्ड बनवाए, जिनकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक हाथ हो; ईशान दिशा में एक हाथ की एक अन्य शुभ वेदी स्थापित करे, जो एक रत्नि ऊँची हो — वहीं ग्रहों की स्थापना करे।
श्लोक 13 (skanda.6.267.13)
युग्मांश्च ऋत्विजः कार्याश्चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् बह्वृचोऽध्वर्यश्चैव च्छंदोगाथर्वणावपि
yugmāṁśca ṛtvijaḥ kāryāścaturdikṣu yathākramam bahvṛco'dhvaryaścaiva cchaṁdogātharvaṇāvapi
चारों दिशाओं में क्रम से जोड़े में ऋत्विज नियुक्त करने चाहिए — ऋग्वेदी, अध्वर्यु, तथा छन्दोग एवं अथर्ववेदी।
श्लोक 14 (skanda.6.267.14)
तूष्णीं तु देवताहोमस्तैः कार्यः सुसमाहितैः तल्लिंगैर्नृपतेमंत्रैः स्वशक्त्या जप एव च
tūṣṇīṁ tu devatāhomastaiḥ kāryaḥ susamāhitaiḥ talliṁgairnṛpatemaṁtraiḥ svaśaktyā japa eva ca
हे नृप, उन सुसमाहित ऋत्विजों द्वारा उन-उन देवताओं के अनुरूप मंत्रों से मौन होकर हवन करना चाहिए, तथा अपनी शक्ति के अनुसार जप भी करना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.6.267.15)
एकहस्तप्रविष्टं तु चतुर्हस्तोच्छ्रितं तथा स्तंभद्वयं तु कर्तव्यं वेदियाम्योत्तरे स्थितम्
ekahastapraviṣṭaṁ tu caturhastocchritaṁ tathā staṁbhadvayaṁ tu kartavyaṁ vediyāmyottare sthitam
वेदी के दक्षिण-उत्तर में दो स्तम्भ बनाने चाहिए, जो एक हाथ भूमि में धँसे हों और चार हाथ ऊँचे उठे हों।
श्लोक 16 (skanda.6.267.16)
तन्मध्ये सुशुभं काष्ठं स्तंभजात्यं दृढं न्यसेत् चन्दनः खदिरो वाथ बिल्वोवाऽश्वत्थ एव वा
tanmadhye suśubhaṁ kāṣṭhaṁ staṁbhajātyaṁ dṛḍhaṁ nyaset candanaḥ khadiro vātha bilvovā'śvattha eva vā
उसके मध्य में सुंदर और दृढ़ स्तंभ-काष्ठ रखा जाए — चंदन, खदिर, बिल्व अथवा अश्वत्थ की लकड़ी का।
श्लोक 17 (skanda.6.267.17)
तिंदुको देवदारुर्वा श्रीपर्णी वा वटोऽथवा अष्टौ वृक्षाः शुभाः शस्ताः स्तंभार्थं नृपसत्तम्
tiṁduko devadārurvā śrīparṇī vā vaṭo'thavā aṣṭau vṛkṣāḥ śubhāḥ śastāḥ staṁbhārthaṁ nṛpasattam
तिंदुक, देवदारु, श्रीपर्णी अथवा वट — हे नृपसत्तम, स्तंभ के लिए ये आठ वृक्ष शुभ और प्रशस्त बताए गए हैं।
श्लोक 18 (skanda.6.267.18)
शिक्यद्वय समोपेतां तन्मध्ये विन्यसेत्तुलाम् स्नातः शुक्लांबरधरः शुक्लमाल्यानुलेपनः
śikyadvaya samopetāṁ tanmadhye vinyasettulām snātaḥ śuklāṁbaradharaḥ śuklamālyānulepanaḥ
उस स्तंभ के मध्य दो झूलों (शिक्यों) सहित तुला को स्थापित करे; स्नान कर, श्वेत वस्त्र धारण कर, श्वेत माला और अनुलेपन से युक्त होकर...
श्लोक 19 (skanda.6.267.19)
पूरयित्वा समंताच्च लोकपालान्यथाक्रमम् स्तंभान्संपूजयत्पश्चाद्गन्धमाल्यानुलेपनैः
pūrayitvā samaṁtācca lokapālānyathākramam staṁbhānsaṁpūjayatpaścādgandhamālyānulepanaiḥ
...चारों ओर क्रमशः लोकपालों की पूर्ण पूजा करने के पश्चात, गंध-माला-अनुलेपन से स्तंभों की पूजा करे।
श्लोक 20 (skanda.6.267.20)
तुलां च पार्थिवश्रेष्ठ पुण्याहं च प्रकीर्तयेत् यजमानो निजैः सर्वैरायुधैः कायसंस्थितैः
tulāṁ ca pārthivaśreṣṭha puṇyāhaṁ ca prakīrtayet yajamāno nijaiḥ sarvairāyudhaiḥ kāyasaṁsthitaiḥ
हे पार्थिवश्रेष्ठ, यजमान अपने शरीर पर धारण किए हुए समस्त शस्त्रों सहित तुला के समक्ष खड़े होकर पुण्याहवाचन कराए।
श्लोक 21 (skanda.6.267.21)
पश्चिमां दिशमास्थाय प्राङ्मुखः श्रद्धयाऽन्वितः कृतांजलिपुटो भूत्वा इमं मंत्रमुदीरयेत्
paścimāṁ diśamāsthāya prāṅmukhaḥ śraddhayā'nvitaḥ kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā imaṁ maṁtramudīrayet
पश्चिम दिशा में खड़े होकर, पूर्वाभिमुख, श्रद्धायुक्त तथा हाथ जोड़े हुए, वह यह मंत्र बोले।
श्लोक 22 (skanda.6.267.22)
ब्रह्मणो दुहिता नित्यं सत्यं परममाश्रिता काश्यपी गोत्रतश्चैव नामतो विश्रुता तुला
brahmaṇo duhitā nityaṁ satyaṁ paramamāśritā kāśyapī gotrataścaiva nāmato viśrutā tulā
'तुला ब्रह्मा की नित्य पुत्री है, जो सदा परम सत्य का आश्रय लिए हुए है, गोत्र से काश्यपी तथा नाम से तुला विख्यात है।'
श्लोक 23 (skanda.6.267.23)
त्वं तुले सत्यनामासि स्वभीष्टं चात्मनः शुभम् करिष्यामि प्रसादं मे सांनिध्यं कुरु सांप्रतम्
tvaṁ tule satyanāmāsi svabhīṣṭaṁ cātmanaḥ śubham kariṣyāmi prasādaṁ me sāṁnidhyaṁ kuru sāṁpratam
'हे तुले! तुम सत्यनामा हो; मैं अपने लिए अभीष्ट शुभ कार्य सम्पन्न करूँगा। मुझ पर प्रसन्न होओ, अभी मेरे समीप उपस्थित रहो।'
श्लोक 24 (skanda.6.267.24)
ततस्तस्यां समारुह्य स्वशक्त्या यत्समाहृतम् दानार्थं पूर्वमायोज्यं शिक्येन्यस्मिन्नरोत्तम
tatastasyāṁ samāruhya svaśaktyā yatsamāhṛtam dānārthaṁ pūrvamāyojyaṁ śikyenyasminnarottama
हे नरोत्तम, तत्पश्चात उस पर आरूढ़ होकर, अपनी शक्ति के अनुसार दान हेतु पूर्व-संचित द्रव्य को दूसरे शिक्य में रखे।
श्लोक 25 (skanda.6.267.25)
सुवर्णं रजतं वाऽथ वस्त्रं चान्यदभीप्सितम् यावत्साम्यं भवेद्राजन्नात्मनोऽभ्यधिकं च वा
suvarṇaṁ rajataṁ vā'tha vastraṁ cānyadabhīpsitam yāvatsāmyaṁ bhavedrājannātmano'bhyadhikaṁ ca vā
सुवर्ण, रजत, वस्त्र अथवा अन्य अभीष्ट वस्तु — हे राजन्, तब तक रखे जब तक अपने शरीर के बराबर अथवा उससे अधिक तौल न हो जाए।
श्लोक 26 (skanda.6.267.26)
ततोऽभीष्टां समासाद्य देवतां शिक्यमाश्रितः उदकं जलमध्ये च तदर्थं प्रक्षिपेद्द्रुतम्
tato'bhīṣṭāṁ samāsādya devatāṁ śikyamāśritaḥ udakaṁ jalamadhye ca tadarthaṁ prakṣipeddrutam
तदनन्तर अभीष्ट देवता का आवाहन कर, शिक्य पर स्थित होकर, उस प्रयोजन हेतु शीघ्र ही जल में जल अर्पित करे।
श्लोक 27 (skanda.6.267.27)
सतिलं सहिरण्यं च साक्षतं विधिपूर्वकम् अवतीर्य ततः सर्वं ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्
satilaṁ sahiraṇyaṁ ca sākṣataṁ vidhipūrvakam avatīrya tataḥ sarvaṁ brāhmaṇebhyo nivedayet
तिल, हिरण्य और अक्षत सहित विधिपूर्वक, तदनन्तर नीचे उतरकर वह सब कुछ ब्राह्मणों को समर्पित कर दे।
श्लोक 28 (skanda.6.267.28)
यत्फलं प्राप्यते पश्चात्तदिहैकमनाः शृणु
yatphalaṁ prāpyate paścāttadihaikamanāḥ śṛṇu
इसके पश्चात जो फल प्राप्त होता है, उसे अब एकाग्रचित्त होकर सुनो।
श्लोक 29 (skanda.6.267.29)
अजानता जानता वा यत्पापं तु भवेत्कृतम् तत्सर्वं नाशयेन्मर्त्यो दानस्यास्य प्रभावतः
ajānatā jānatā vā yatpāpaṁ tu bhavetkṛtam tatsarvaṁ nāśayenmartyo dānasyāsya prabhāvataḥ
जाने या अनजाने जो भी पाप किया गया हो, इस दान के प्रभाव से मनुष्य उस सबका नाश कर देता है।
श्लोक 30 (skanda.6.267.30)
यावन्मात्रं कृतं पापमतीतं नृपसत्तम तावन्मात्रं क्षयं याति तुलापुरुषदानतः
yāvanmātraṁ kṛtaṁ pāpamatītaṁ nṛpasattama tāvanmātraṁ kṣayaṁ yāti tulāpuruṣadānataḥ
हे नृपसत्तम, अतीत में जितना भी पाप किया गया हो, तुलापुरुषदान से उतना ही नष्ट हो जाता है।
श्लोक 31 (skanda.6.267.31)
ईश्वराणां समादिष्टं कायक्लेशभयात्मनाम् पुरश्चरणमेतद्धि दानं तौल्यसमुद्भवम्
īśvarāṇāṁ samādiṣṭaṁ kāyakleśabhayātmanām puraścaraṇametaddhi dānaṁ taulyasamudbhavam
शरीर-क्लेश से भयभीत रहने वालों के लिए ईश्वरों ने इसे विशेष रूप से आदिष्ट किया है — तौल से उत्पन्न यह दान वस्तुतः एक पुरश्चरण ही है।
श्लोक 32 (skanda.6.267.32)
एतद्दत्तं दिलीपेन कार्तवीर्येण भूपते पृथुना पुरुकुत्सेन तथान्यैरपि पार्थिवैः
etaddattaṁ dilīpena kārtavīryeṇa bhūpate pṛthunā purukutsena tathānyairapi pārthivaiḥ
हे भूपते, यह दान दिलीप, कार्तवीर्य, पृथु, पुरुकुत्स तथा अन्य अनेक राजाओं द्वारा भी दिया गया।
श्लोक 33 (skanda.6.267.33)
एतत्पुण्यं प्रशस्यं च सर्वकामप्रदं नृणाम् तुलापुरुषदानं च सर्वोपद्रवनाशनम्
etatpuṇyaṁ praśasyaṁ ca sarvakāmapradaṁ nṛṇām tulāpuruṣadānaṁ ca sarvopadravanāśanam
यह पुण्यमय और प्रशंसनीय है, जो मनुष्यों की सभी कामनाएँ पूर्ण करता है; तुलापुरुषदान समस्त उपद्रवों का नाशक है।
श्लोक 34 (skanda.6.267.34)
आधयो व्याधयो न स्युर्न वैधव्यं गदोद्भवम् संजायते नृपश्रेष्ठ न वियोगः स्वबन्धुभिः तुलापुरुषदानस्य फलमेतदुदाहृतम्
ādhayo vyādhayo na syurna vaidhavyaṁ gadodbhavam saṁjāyate nṛpaśreṣṭha na viyogaḥ svabandhubhiḥ tulāpuruṣadānasya phalametadudāhṛtam
हे नृपश्रेष्ठ, न मानसिक पीड़ाएँ होती हैं, न रोग, न रोगजनित वैधव्य उत्पन्न होता है, न अपने बंधुजनों से वियोग होता है — यही तुलापुरुषदान का फल कहा गया है।
श्लोक 35 (skanda.6.267.35)
तुलापुरुषदानस्य प्रदत्तस्य नृपोत्तम न शक्यते कथयितुं फलं यत्स्यात्कलौ युगे
tulāpuruṣadānasya pradattasya nṛpottama na śakyate kathayituṁ phalaṁ yatsyātkalau yuge
हे नृपोत्तम, कलियुग में दिए गए तुलापुरुषदान का फल इतना अधिक है कि उसे पूर्णतः कहा नहीं जा सकता।
श्लोक 36 (skanda.6.267.36)
दक्षिणामूर्तिमासाद्य सिद्धेश्वरविभोः पुरः यः प्रयच्छति भूपाल सहस्रगुणितं फलम्
dakṣiṇāmūrtimāsādya siddheśvaravibhoḥ puraḥ yaḥ prayacchati bhūpāla sahasraguṇitaṁ phalam
हे भूपाल, जो दक्षिणामूर्ति स्वरूप सिद्धेश्वर विभु के समक्ष जाकर यह दान करता है, उसे सहस्रगुणित फल प्राप्त होता है।
श्लोक 37 (skanda.6.267.37)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्राप्य सिद्धेश्वरं विभुम् तुलापुरुषदानं च कर्तव्यं सुविवेकिना
tasmātsarvaprayatnena prāpya siddheśvaraṁ vibhum tulāpuruṣadānaṁ ca kartavyaṁ suvivekinā
अतः विवेकशील पुरुष को सिद्धेश्वर विभु के समीप पहुँचकर सर्वप्रयत्नपूर्वक तुलापुरुषदान करना चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.6.267.38)
एकत्र सर्वतीर्थानि सर्वाण्यायतनानि च हाटकेश्वरजे क्षेत्रे कथितानि स्वयंभुवा
ekatra sarvatīrthāni sarvāṇyāyatanāni ca hāṭakeśvaraje kṣetre kathitāni svayaṁbhuvā
सभी तीर्थ तथा सभी आयतन एकत्र स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा हाटकेश्वर क्षेत्र में ही कहे गए हैं।
श्लोक 39 (skanda.6.267.39)
सिद्धेश्वरः सुरश्रेष्ठ एकत्र समुदाहृतः तस्मिन्दृष्टे तथा स्पृष्टे पूजिते नृपसत्तम सर्वेषां लभते मर्त्यः फलं यत्परिकीर्तितम्
siddheśvaraḥ suraśreṣṭha ekatra samudāhṛtaḥ tasmindṛṣṭe tathā spṛṣṭe pūjite nṛpasattama sarveṣāṁ labhate martyaḥ phalaṁ yatparikīrtitam
हे नृपसत्तम, सिद्धेश्वर सुरश्रेष्ठ में ये सब एक साथ समाहित कहे गए हैं; उनके दर्शन, स्पर्श और पूजन से मनुष्य उन सबका सम्मिलित फल प्राप्त कर लेता है।