नागर खण्ड · अध्याय 268
गौतमेश्वर में पृथ्वीदान की महिमा
श्लोक 1 (skanda.6.268.1)
आनर्त उवाच कर्मणा केन मर्त्ये च नराणां जायते वद चक्रवर्तित्वमखिलं सर्वशत्रुविमर्दनम्
ānarta uvāca karmaṇā kena martye ca narāṇāṁ jāyate vada cakravartitvamakhilaṁ sarvaśatruvimardanam
आनर्त ने कहा — कहिए, मनुष्यों में किस कर्म से समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला सम्पूर्ण चक्रवर्तित्व उत्पन्न होता है?
श्लोक 2 (skanda.6.268.2)
भर्तृयज्ञ उवाच दुर्लभं भूमिपालत्वं सर्वपापैर्नराधिप तपोभिर्नियमैर्दानैस्तथान्यैश्च शुभैर्व्रतैः
bhartṛyajña uvāca durlabhaṁ bhūmipālatvaṁ sarvapāpairnarādhipa tapobhirniyamairdānaistathānyaiśca śubhairvrataiḥ
भर्तृयज्ञ ने कहा — हे नराधिप, तप, नियम, दान तथा अन्य शुभ व्रतों से भी सर्वपापरहित भूमिपालत्व दुर्लभ ही है।
श्लोक 3 (skanda.6.268.3)
यः पुनर्भूपतिर्भूत्वा पृथ्वीं दद्याद्धिरण्मयीम् गौतमेश्वरदेवस्य पुरतः श्रद्धयान्वितः चक्रवर्ती भवेन्नूनमेवमाह पितामहः
yaḥ punarbhūpatirbhūtvā pṛthvīṁ dadyāddhiraṇmayīm gautameśvaradevasya purataḥ śraddhayānvitaḥ cakravartī bhavennūnamevamāha pitāmahaḥ
किन्तु जो राजा होकर गौतमेश्वर देव के समक्ष श्रद्धापूर्वक सुवर्ण की पृथ्वी दान करता है, वह निश्चय ही चक्रवर्ती होता है — ऐसा स्वयं पितामह ब्रह्मा ने कहा है।
श्लोक 4 (skanda.6.268.4)
मांधाता धुन्धुमारश्च हरिश्चंद्रः पुरूरवाः भरतः कार्तवीर्यश्च षडेते चक्रवर्तिनः
māṁdhātā dhundhumāraśca hariścaṁdraḥ purūravāḥ bharataḥ kārtavīryaśca ṣaḍete cakravartinaḥ
मान्धाता, धुन्धुमार, हरिश्चन्द्र, पुरूरवा, भरत तथा कार्तवीर्य — ये छह चक्रवर्ती हुए।
श्लोक 5 (skanda.6.268.5)
पृथ्वीदानं पुरा कृत्वा गौतमेश्वरसंनिधौ दत्त्वा हिरण्मयीं पृथ्वीं सार्वभौमास्ततः स्थिताः
pṛthvīdānaṁ purā kṛtvā gautameśvarasaṁnidhau dattvā hiraṇmayīṁ pṛthvīṁ sārvabhaumāstataḥ sthitāḥ
पूर्वकाल में गौतमेश्वर के समीप पृथ्वीदान करके, सुवर्णमयी पृथ्वी अर्पित करके ही वे सार्वभौम पद पर प्रतिष्ठित हुए थे।
श्लोक 6 (skanda.6.268.6)
आनर्त उवाच भगवन्केन विधिना दातव्या सा वसुन्धरा अहं दास्यामि तां नूनं श्रद्धा मे महती स्थिता
ānarta uvāca bhagavankena vidhinā dātavyā sā vasundharā ahaṁ dāsyāmi tāṁ nūnaṁ śraddhā me mahatī sthitā
आनर्त ने कहा — हे भगवन्, वह वसुन्धरा किस विधि से दान करनी चाहिए? मैं निश्चय ही उसे दान करूँगा, मुझमें महती श्रद्धा है।
श्लोक 7 (skanda.6.268.7)
भर्तृयज्ञ उवाच कार्या पलशतेनोर्वी वृत्ताकारा नृपोत्तम तदर्धेनाथवा शक्त्या पंचविंशत्पलात्मिका
bhartṛyajña uvāca kāryā palaśatenorvī vṛttākārā nṛpottama tadardhenāthavā śaktyā paṁcaviṁśatpalātmikā
भर्तृयज्ञ ने कहा — हे नृपोत्तम, वह पृथ्वी सौ पल की वृत्ताकार बनानी चाहिए, अथवा उसकी आधी, अथवा अपनी शक्ति के अनुसार पच्चीस पल की।
श्लोक 8 (skanda.6.268.8)
धरादाने महाराज वित्तशाठ्यं विवर्जयेत् नैव पंचपलादर्वाक्प्रदातव्या कथञ्चन लवणेक्षुसुरासर्पिर्दधिदुग्धजलोद्भवाः समुद्राः सप्त चैतांस्तु कक्षायां तत्र दर्शयेत्
dharādāne mahārāja vittaśāṭhyaṁ vivarjayet naiva paṁcapalādarvākpradātavyā kathañcana lavaṇekṣusurāsarpirdadhidugdhajalodbhavāḥ samudrāḥ sapta caitāṁstu kakṣāyāṁ tatra darśayet
हे महाराज, पृथ्वीदान में धन के विषय में कृपणता का त्याग करना चाहिए; पाँच पल से कम में यह कभी नहीं देनी चाहिए। नमक, इक्षुरस, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और जल से बने सातों समुद्रों को उसकी परिधि पर दिखाना चाहिए।
श्लोक 9 (skanda.6.268.9)
जंबूप्लक्षकुशक्रौंचशाकशाल्मलिपुष्कराः समुद्रान्सरितः सप्त द्वैगुण्येन प्रकल्पयेत्
jaṁbūplakṣakuśakrauṁcaśākaśālmalipuṣkarāḥ samudrānsaritaḥ sapta dvaiguṇyena prakalpayet
जम्बू, प्लक्ष, कुश, क्रौंच, शाक, शाल्मलि और पुष्कर — इन सातों द्वीपों तथा सातों समुद्रों को इस प्रकार युगल रूप में रचना चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.6.268.10)
महेन्द्रो मलयः सह्यो हिमवान्गंधमादनः विंध्यः शृंगी च सप्तैव कल्पयेत्कुलपर्वतान्
mahendro malayaḥ sahyo himavāngaṁdhamādanaḥ viṁdhyaḥ śṛṁgī ca saptaiva kalpayetkulaparvatān
महेन्द्र, मलय, सह्य, हिमवान्, गंधमादन, विंध्य और शृंगी — इन सातों कुलपर्वतों की रचना करनी चाहिए।
श्लोक 11 (skanda.6.268.11)
मध्ये प्रकल्पयेन्मेरुं दिक्षु विष्कम्भपर्वतान् जंबून्यग्रोधनीपांश्च प्लक्षश्चैव तथा द्रुमान्
madhye prakalpayenmeruṁ dikṣu viṣkambhaparvatān jaṁbūnyagrodhanīpāṁśca plakṣaścaiva tathā drumān
मध्य में मेरु पर्वत की रचना करे तथा दिशाओं में विष्कम्भ पर्वतों की; साथ ही जम्बू वृक्ष, न्यग्रोध, नीप, प्लक्ष आदि वृक्षों की भी।
श्लोक 12 (skanda.6.268.12)
गंगाद्याः सरितस्तत्र प्राधान्येन प्रकल्पयेत् एवं निर्माप्य वसुधां सर्वां हेममयीं नृप
gaṁgādyāḥ saritastatra prādhānyena prakalpayet evaṁ nirmāpya vasudhāṁ sarvāṁ hemamayīṁ nṛpa
वहाँ गंगा आदि नदियों की प्रमुखता से रचना करे। हे नृप, इस प्रकार सम्पूर्ण सुवर्णमयी पृथ्वी बनवाकर...
श्लोक 13 (skanda.6.268.13)
मंडपं कारयेत्पश्चाद्यथापूर्वं प्रकल्पितम्
maṁḍapaṁ kārayetpaścādyathāpūrvaṁ prakalpitam
...तत्पश्चात पूर्व की भाँति ही मंडप बनवाना चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.6.268.14)
कुण्डानि तोरणान्येव ब्राह्मणग्रहपूजने पूर्ववत्सकलं कृत्वा मध्ये वेदिं प्रकल्पयेत्
kuṇḍāni toraṇānyeva brāhmaṇagrahapūjane pūrvavatsakalaṁ kṛtvā madhye vediṁ prakalpayet
हवन-कुण्ड और तोरण, तथा ब्राह्मणों एवं ग्रहों के पूजन की समस्त विधि पूर्ववत् करके, मध्य में वेदी बनवाए।
श्लोक 15 (skanda.6.268.15)
तत्र संस्थापयेत्पृथ्वीं पंचगव्येन पार्थिव यथोक्तमंत्रैस्तल्लिंगैस्ततः शुद्धोदकेन तु
tatra saṁsthāpayetpṛthvīṁ paṁcagavyena pārthiva yathoktamaṁtraistalliṁgaistataḥ śuddhodakena tu
हे पार्थिव, वहाँ पंचगव्य से, फिर यथोक्त मंत्रों तथा उस-उस लिंग (चिह्न) के अनुसार, तत्पश्चात शुद्ध जल से पृथ्वी को स्थापित करे।
श्लोक 16 (skanda.6.268.16)
इमं मे गंगे यमुने पंचनद्यस्त्रिपुष्करम् श्रीसूक्तं पावमानं च हैमीं च तदनंतरम्
imaṁ me gaṁge yamune paṁcanadyastripuṣkaram śrīsūktaṁ pāvamānaṁ ca haimīṁ ca tadanaṁtaram
'हे गंगे, यमुने, पंचनद्यः, त्रिपुष्करम्' — इसका उच्चारण, तथा श्रीसूक्त, पावमान सूक्त और तदनन्तर हैमी ऋचाएँ...
श्लोक 17 (skanda.6.268.17)
स्नानकर्मणि योग्यांश स्वादिष्ठायनमुत्तमम्
snānakarmaṇi yogyāṁśa svādiṣṭhāyanamuttamam
...स्नान-कर्म के योग्य ये मंत्र, तथा उत्तम, अत्यंत मधुर स्वादिष्ठायन सूक्त भी।
श्लोक 18 (skanda.6.268.18)
एवं संस्नाप्य विधिवद्वासांसि परिधापयेत् युवा सुवासा मंत्रेण सूक्ष्माणि विविधानि च
evaṁ saṁsnāpya vidhivadvāsāṁsi paridhāpayet yuvā suvāsā maṁtreṇa sūkṣmāṇi vividhāni ca
इस प्रकार विधिवत् स्नान कराकर, युवा और सुवासा (देवी) के मंत्र से विविध सूक्ष्म वस्त्र पहनाए।
श्लोक 19 (skanda.6.268.19)
ये भूतानामधीत्येवं ततः प्रोच्य प्रपूजयेत् धूरसीति च मंत्रेण धूपं दद्यात्समाहितः
ye bhūtānāmadhītyevaṁ tataḥ procya prapūjayet dhūrasīti ca maṁtreṇa dhūpaṁ dadyātsamāhitaḥ
भूतों से संबंधित इन मंत्रों का पाठ करके, फिर उनका उच्चारण करते हुए पूजा करे, तथा 'धूरसि' मंत्र से एकाग्रचित्त होकर धूप अर्पित करे।
श्लोक 20 (skanda.6.268.20)
अग्निर्ज्योतीति मंत्रेण कुर्यादारार्तिकं ततः अहमस्मीति मंत्रेण सप्तधान्यं प्रकल्पयेत्
agnirjyotīti maṁtreṇa kuryādārārtikaṁ tataḥ ahamasmīti maṁtreṇa saptadhānyaṁ prakalpayet
'अग्निर्ज्योतिः' मंत्र से आरती करे, तथा 'अहमस्मि' मंत्र से सात प्रकार के धान्य अर्पित करे।
श्लोक 21 (skanda.6.268.21)
एवं कृत्वाऽखिलं तस्या यजमानः सितांबरः पुरः स्थितोंजलिं बद्ध्वा मंत्रानेतानुदाहरेत्
evaṁ kṛtvā'khilaṁ tasyā yajamānaḥ sitāṁbaraḥ puraḥ sthitoṁjaliṁ baddhvā maṁtrānetānudāharet
इस प्रकार सम्पूर्ण विधि करके, श्वेतवस्त्रधारी यजमान उसके समक्ष खड़े होकर हाथ जोड़कर ये मंत्र बोले।
श्लोक 22 (skanda.6.268.22)
त्वया संधार्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् तव दानं करिष्यामि सांनिध्यं कुरु मेदिनि
tvayā saṁdhāryate viśvaṁ jagadetaccarācaram tava dānaṁ kariṣyāmi sāṁnidhyaṁ kuru medini
'तुझसे ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् धारण किया जाता है। हे मेदिनि, अब मैं तेरा दान करूँगा — मेरे समीप उपस्थित हो।'
श्लोक 23 (skanda.6.268.23)
शरीरेष्वपि भूतानां त्वं देवि प्रथमं स्थिता ततश्चान्यानि भूतानि जलादीनि वसुन्धरे
śarīreṣvapi bhūtānāṁ tvaṁ devi prathamaṁ sthitā tataścānyāni bhūtāni jalādīni vasundhare
'हे देवि, तू ही समस्त प्राणियों के शरीर में सर्वप्रथम स्थित है; उसके पश्चात ही जल आदि अन्य भूत आते हैं, हे वसुन्धरे।'
श्लोक 24 (skanda.6.268.24)
ये त्वां यच्छंति ते भूयस्त्वां लभंते न संशयः इह लोके परे चैव पार्थिवं रूपमाश्रिता
ye tvāṁ yacchaṁti te bhūyastvāṁ labhaṁte na saṁśayaḥ iha loke pare caiva pārthivaṁ rūpamāśritā
'जो तुझे दान करते हैं, वे निःसंदेह तुझे पुनः प्राप्त कर लेते हैं — इस लोक में और परलोक में भी, हे पार्थिव रूप धारण करने वाली!'
श्लोक 25 (skanda.6.268.25)
एवं स्तुत्वा समादाय तोयं हेमाकृतिं नृप वासुदेवं हृदि स्थाप्य मंत्रेणानेन कल्पयेत्
evaṁ stutvā samādāya toyaṁ hemākṛtiṁ nṛpa vāsudevaṁ hṛdi sthāpya maṁtreṇānena kalpayet
हे नृप, इस प्रकार स्तुति करके, सुवर्णमयी आकृति सहित जल लेकर, हृदय में वासुदेव की स्थापना कर इस मंत्र से कल्पना करे।
श्लोक 26 (skanda.6.268.26)
पातालादुद्धृता येन पृथ्वी सा लोककारिणा अस्या दानेन च सदा प्रीयतां मे जनार्दनः
pātālāduddhṛtā yena pṛthvī sā lokakāriṇā asyā dānena ca sadā prīyatāṁ me janārdanaḥ
'जिन लोककर्ता (विष्णु) ने पाताल से इस पृथ्वी को उद्धृत किया था, इसके दान से वे जनार्दन मुझ पर सदा प्रसन्न हों।'
श्लोक 27 (skanda.6.268.27)
एवमुच्चार्य तत्तोयं तोयमध्ये परिक्षिपेत् न भूमौ नैव हस्ते च ब्राह्मणस्य नृपोत्तम
evamuccārya tattoyaṁ toyamadhye parikṣipet na bhūmau naiva haste ca brāhmaṇasya nṛpottama
इस प्रकार उच्चारण करके उस जल को जल के मध्य में डाले — हे नृपोत्तम, न भूमि पर और न ब्राह्मण के हाथ में।
श्लोक 28 (skanda.6.268.28)
ततो विसर्जयेद्देवीं मन्त्रेणानेन भागशः आगता च यथान्यायं पूजिता च यथाविधि
tato visarjayeddevīṁ mantreṇānena bhāgaśaḥ āgatā ca yathānyāyaṁ pūjitā ca yathāvidhi
तदनन्तर इस मंत्र से भाग-भाग करके देवी को विसर्जित करे — 'तुम विधिपूर्वक आईं और यथाविधि पूजित हुईं...'
श्लोक 29 (skanda.6.268.29)
अस्माकं त्वं हितार्थाय यत्रेष्टं तत्र गम्यताम् उस्रा वेदेति मंत्रेण समुच्चार्य ततः परम् ब्राह्मणेभ्यः प्रदातव्या संविभज्य नराधिप
asmākaṁ tvaṁ hitārthāya yatreṣṭaṁ tatra gamyatām usrā vedeti maṁtreṇa samuccārya tataḥ param brāhmaṇebhyaḥ pradātavyā saṁvibhajya narādhipa
'...अब हमारे कल्याण हेतु जहाँ तुम्हें अभीष्ट हो वहाँ जाओ।' ऐसा कहकर 'उस्रा वेद' इस मंत्र का उच्चारण करके, हे नराधिप, तत्पश्चात उसे विभाजित कर ब्राह्मणों को देना चाहिए।
श्लोक 30 (skanda.6.268.30)
एवं ते सर्वमाख्यातं पृथिवीदानमुत्तमम् शृणुयात्पार्थिवो भावी दाता जन्मनिजन्मनि
evaṁ te sarvamākhyātaṁ pṛthivīdānamuttamam śṛṇuyātpārthivo bhāvī dātā janmanijanmani
इस प्रकार तुम्हें यह सम्पूर्ण उत्तम पृथ्वीदान बताया गया। भविष्य में दान देने वाले राजा को यह जन्म-जन्मांतर में सुनना चाहिए।
श्लोक 31 (skanda.6.268.31)
यो राजा पृथिवीं दद्याद्विधिनानेन पार्थिव राज्यभ्रंशो न वंशेऽपि तस्य संजायते क्वचित्
yo rājā pṛthivīṁ dadyādvidhinānena pārthiva rājyabhraṁśo na vaṁśe'pi tasya saṁjāyate kvacit
हे पार्थिव, जो राजा इस विधि से पृथ्वी का दान करता है, उसके राज्य का भ्रंश उसके वंश में भी कभी नहीं होता।
श्लोक 32 (skanda.6.268.32)
राज्यभ्रंशसमोपेता ये दृश्यंते महीभुजः न तैर्वसुन्धरा दत्ता ब्राह्मणानां धृतात्मनाम्
rājyabhraṁśasamopetā ye dṛśyaṁte mahībhujaḥ na tairvasundharā dattā brāhmaṇānāṁ dhṛtātmanām
जो राजा राज्यभ्रंश को प्राप्त हुए दिखाई देते हैं, उन्होंने ही दृढ़चित्त ब्राह्मणों को यह वसुन्धरा दान नहीं की थी।
श्लोक 33 (skanda.6.268.33)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पृथ्वीदानं समाचरेत् न हरेत्परदत्तां च कथंचिदपि मेदिनीम्
tasmātsarvaprayatnena pṛthvīdānaṁ samācaret na haretparadattāṁ ca kathaṁcidapi medinīm
अतः सर्वप्रयत्न से पृथ्वीदान करना चाहिए, तथा दूसरे द्वारा दी गई भूमि को कभी भी नहीं छीनना चाहिए।
श्लोक 34 (skanda.6.268.34)
एतत्पुण्यं प्रशस्यं च पृथिवीदानमुत्तमम् शृण्वतामपि राजेंद्र तद्देहाद्यघनाशनम्
etatpuṇyaṁ praśasyaṁ ca pṛthivīdānamuttamam śṛṇvatāmapi rājeṁdra taddehādyaghanāśanam
यह उत्तम पृथ्वीदान पुण्यमय और प्रशंसनीय है; हे राजेन्द्र, केवल सुनने मात्र से भी यह देह आदि के पापों का नाश कर देता है।
श्लोक 35 (skanda.6.268.35)
आस्तां तावत्प्रदानं च पृथिव्याः पृथिवीपतेः दातुः संप्रेरणं यस्या अज्ञानौघविनाशनम्
āstāṁ tāvatpradānaṁ ca pṛthivyāḥ pṛthivīpateḥ dātuḥ saṁpreraṇaṁ yasyā ajñānaughavināśanam
पृथ्वी के स्वामी द्वारा उसका वास्तविक दान तो दूर, दाता को इसके लिए मात्र प्रेरित करना भी अज्ञान के समूह का नाश करने वाला है।
श्लोक 36 (skanda.6.268.36)
रूपवान्सुभगश्चैव तथा च प्रियदर्शनः आधिव्याधिविनिर्मुक्तः पुत्रपौत्रसमन्वितः
rūpavānsubhagaścaiva tathā ca priyadarśanaḥ ādhivyādhivinirmuktaḥ putrapautrasamanvitaḥ
दाता रूपवान्, सौभाग्यशाली तथा प्रियदर्शन होता है, मानसिक एवं शारीरिक पीड़ाओं से मुक्त तथा पुत्र-पौत्रों से युक्त होता है।
श्लोक 37 (skanda.6.268.37)
मेधावी जायते मर्त्यो दानस्यास्य प्रभावतः इत्थंभूता महाराज कृत्वा राज्यमकण्टकम्
medhāvī jāyate martyo dānasyāsya prabhāvataḥ itthaṁbhūtā mahārāja kṛtvā rājyamakaṇṭakam
इस दान के प्रभाव से मनुष्य बुद्धिमान होता है। हे महाराज, इस प्रकार अपने राज्य को निष्कंटक बनाकर...
श्लोक 38 (skanda.6.268.38)
प्रीता विष्णोः पदं यांति शाश्वतं यन्निरामयम् अन्यत्रापि धरादानात्प्रकुर्याच्चक्रवर्तिताम्
prītā viṣṇoḥ padaṁ yāṁti śāśvataṁ yannirāmayam anyatrāpi dharādānātprakuryāccakravartitām
...प्रसन्नचित्त होकर वे विष्णु के उस शाश्वत, निरामय पद को प्राप्त होते हैं। भूमिदान से अन्यत्र भी मनुष्य चक्रवर्तित्व प्राप्त कर सकता है।
श्लोक 39 (skanda.6.268.39)
एकजन्मांतरं यावत्सम्यग्दत्तं नृपोत्तमः गौतमेश्वरदेवस्य यत्पुरा पुरतः कृतम्
ekajanmāṁtaraṁ yāvatsamyagdattaṁ nṛpottamaḥ gautameśvaradevasya yatpurā purataḥ kṛtam
हे नृपोत्तम, गौतमेश्वर देव के समक्ष पूर्वकाल में जो भलीभाँति दान किया गया था, वह एक जन्म तक तो फल देता ही है...
श्लोक 40 (skanda.6.268.40)
सप्तजन्मांतरं यावत्प्रकरोति न संशयः तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्र देया मही नृप
saptajanmāṁtaraṁ yāvatprakaroti na saṁśayaḥ tasmātsarvaprayatnena tatra deyā mahī nṛpa
...किन्तु सात जन्मों तक निःसंदेह फल देता रहता है। अतः हे नृप, वहाँ सर्वप्रयत्नपूर्वक पृथ्वी का दान करना चाहिए।