नागर खण्ड · अध्याय 269
वातकेश्वर क्षेत्र में कपालमोचनेश्वर की उत्पत्ति एवं महिमा
श्लोक 1 (skanda.6.269.1)
सूत उवाच कपालेशस्य माहात्म्यं श्रूयतामधुना द्विजाः चतुर्थस्य महाभागास्तत्र क्षेत्रे स्थितस्य च
sūta uvāca kapāleśasya māhātmyaṁ śrūyatāmadhunā dvijāḥ caturthasya mahābhāgāstatra kṣetre sthitasya ca
सूत जी ने कहा — हे द्विजो, अब उस क्षेत्र में स्थित चतुर्थ महाभाग कपालेश की महिमा सुनिए।
श्लोक 2 (skanda.6.269.2)
श्रुतमात्रेण येनात्र नरः पापात्प्रमुच्यते
śrutamātreṇa yenātra naraḥ pāpātpramucyate
जिसे केवल सुनने मात्र से ही मनुष्य यहाँ पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.6.269.3)
ऋषय ऊचुः त्रयाणां चैव लिंगानां पूर्वोक्तानां महामते श्रुतास्माभिः समुत्पत्तिःकपालेश्वरवर्जिता केनायं स्थापितो देवः कपालेश्वरसंज्ञितः
ṛṣaya ūcuḥ trayāṇāṁ caiva liṁgānāṁ pūrvoktānāṁ mahāmate śrutāsmābhiḥ samutpattiḥkapāleśvaravarjitā kenāyaṁ sthāpito devaḥ kapāleśvarasaṁjñitaḥ
ऋषियों ने कहा — हे महामते, पूर्व कथित तीनों लिंगों की उत्पत्ति तो हमने सुन ली, केवल कपालेश्वर की छोड़कर। यह कपालेश्वर नामक देव किसके द्वारा स्थापित किया गया?
श्लोक 4 (skanda.6.269.4)
तस्मिन्दृष्टे फलं किं स्यात्पूजिते च वदस्व नः
tasmindṛṣṭe phalaṁ kiṁ syātpūjite ca vadasva naḥ
उनके दर्शन और पूजन से क्या फल प्राप्त होता है, यह भी हमें बताइए।
श्लोक 5 (skanda.6.269.5)
सूत उवाच इंद्रेण स्थापितः पूर्वमेष देवो द्विजोत्तमाः कपालेश्वसंज्ञस्तु ब्रह्महत्या विमुक्तये
sūta uvāca iṁdreṇa sthāpitaḥ pūrvameṣa devo dvijottamāḥ kapāleśvasaṁjñastu brahmahatyā vimuktaye
सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो, इस देव को पूर्व में इन्द्र ने ब्रह्महत्या से मुक्ति पाने हेतु कपालेश्वर नाम से स्थापित किया था।
श्लोक 6 (skanda.6.269.6)
तत्प्रभावत्सुरश्रेष्ठ स्तया मुक्ते द्विजोत्तमाः पापं पूरुषदानेन इत्येषा वैदिकी श्रुतिः अन्योऽपि यो नरस्तं च पूजयित्वा प्रभक्तितः प्रयच्छेद्ब्राह्मणेन्द्राय शुद्धये पापपूरुषम् स मुच्येत्पातकाद्घोराद्ब्रह्महत्यासमुद्भवात्
tatprabhāvatsuraśreṣṭha stayā mukte dvijottamāḥ pāpaṁ pūruṣadānena ityeṣā vaidikī śrutiḥ anyo'pi yo narastaṁ ca pūjayitvā prabhaktitaḥ prayacchedbrāhmaṇendrāya śuddhaye pāpapūruṣam sa mucyetpātakādghorādbrahmahatyāsamudbhavāt
हे सुरश्रेष्ठ, उनके प्रभाव से पुरुष-दान द्वारा वे पाप से मुक्त हुए — यह वैदिक श्रुति है। जो कोई अन्य मनुष्य भी भक्तिपूर्वक उनकी पूजा कर, शुद्धि हेतु किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को पापपुरुष अर्पित करता है, वह घोर ब्रह्महत्याजनित पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 7 (skanda.6.269.7)
दक्षिणामूर्तिमासाद्य प्रोवाचेदं बृहस्पतिः हाटकेश्वरजे क्षेत्रे गत्वा तं वीक्ष्य शंकरम्
dakṣiṇāmūrtimāsādya provācedaṁ bṛhaspatiḥ hāṭakeśvaraje kṣetre gatvā taṁ vīkṣya śaṁkaram
दक्षिणामूर्ति के समक्ष पहुँचकर बृहस्पति ने हाटकेश्वर क्षेत्र में जाकर उन शंकर को देखकर यह कहा।
श्लोक 8 (skanda.6.269.8)
यो ददाति शरीरं च कृत्वा हेममयं ततः मुच्यते नात्र संदेहः पातकैः पूर्वसंयुतैः
yo dadāti śarīraṁ ca kṛtvā hemamayaṁ tataḥ mucyate nātra saṁdehaḥ pātakaiḥ pūrvasaṁyutaiḥ
जो सुवर्णमय शरीर बनवाकर अर्पित करता है, वह निःसंदेह पूर्वसंचित पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 9 (skanda.6.269.9)
ऋषय ऊचुः ब्रह्महत्या कथं जाता सुरेन्द्रस्य हि सूतज एतन्नः सर्वमाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः
ṛṣaya ūcuḥ brahmahatyā kathaṁ jātā surendrasya hi sūtaja etannaḥ sarvamācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ
ऋषियों ने कहा — हे सूतनन्दन, देवराज को ब्रह्महत्या कैसे लगी? यह सब हमें बताइए, हमें अत्यंत कौतूहल है।
श्लोक 10 (skanda.6.269.10)
कपालेश्वरसंज्ञस्तु कथं देवोऽत्र संस्थितः ब्रह्महत्या कथं नष्टा तत्प्रभावाद्दिवस्पतेः
kapāleśvarasaṁjñastu kathaṁ devo'tra saṁsthitaḥ brahmahatyā kathaṁ naṣṭā tatprabhāvāddivaspateḥ
कपालेश्वर नामक देव यहाँ कैसे स्थापित हुए? इन्द्र के प्रभाव से उनकी ब्रह्महत्या कैसे नष्ट हुई?
श्लोक 11 (skanda.6.269.11)
स पापपूरुषो देयो विधिना केन सूतज कैर्मंत्रैः स हि देयः कैश्चैव ह्युपस्करैः
sa pāpapūruṣo deyo vidhinā kena sūtaja kairmaṁtraiḥ sa hi deyaḥ kaiścaiva hyupaskaraiḥ
हे सूतनन्दन, वह पापपुरुष किस विधि से दान करना चाहिए? किन मंत्रों तथा किन उपकरणों से दिया जाना चाहिए?
श्लोक 12 (skanda.6.269.12)
दर्शनात्पूजनाच्चापि किं फलं जायते नृणाम् अदत्त्वा स्वशरीरं वा पूजया केवलं वद
darśanātpūjanāccāpi kiṁ phalaṁ jāyate nṛṇām adattvā svaśarīraṁ vā pūjayā kevalaṁ vada
केवल दर्शन और पूजन मात्र से — अपना शरीर दान किए बिना — मनुष्यों को क्या फल प्राप्त होता है, यह बताइए।
श्लोक 13 (skanda.6.269.13)
सूत उवाच अहं वः कीर्तयिष्यामि कथामेतां पुरातनीम् यां श्रुत्वापि महाभागा नरः पापात्प्रमुच्यते
sūta uvāca ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi kathāmetāṁ purātanīm yāṁ śrutvāpi mahābhāgā naraḥ pāpātpramucyate
सूत जी ने कहा — हे महाभागो, मैं तुम्हें यह प्राचीन कथा सुनाता हूँ, जिसे सुनकर ही मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 14 (skanda.6.269.14)
अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि विहितैरन्यजन्मजैः दृष्टमात्रेण येनात्र पातकात्तद्दिनोद्भवात् मुच्यते नात्र संदेहः सत्यमेतन्मयोदितम्
ajñānājjñānato vāpi vihitairanyajanmajaiḥ dṛṣṭamātreṇa yenātra pātakāttaddinodbhavāt mucyate nātra saṁdehaḥ satyametanmayoditam
अज्ञान से अथवा ज्ञानपूर्वक, इस जन्म या अन्य जन्म में किए गए पाप से भी, केवल उनके दर्शन मात्र से मनुष्य मुक्त हो जाता है — इसमें कोई संदेह नहीं, यह मैंने सत्य कहा है।
श्लोक 15 (skanda.6.269.15)
पुरा त्वष्टुः सुतो जज्ञे वृत्रो हि द्विजसत्तमाः पुलोमदुहितुः पार्श्वाद्विभावर्याः सुवीर्यवान्
purā tvaṣṭuḥ suto jajñe vṛtro hi dvijasattamāḥ pulomaduhituḥ pārśvādvibhāvaryāḥ suvīryavān
हे द्विजसत्तमो, पूर्वकाल में त्वष्टा के पुत्र वृत्र का जन्म हुआ — पुलोमा की पुत्री विभावरी के गर्भ से, वह महान पराक्रमी था।
श्लोक 16 (skanda.6.269.16)
स बाल एव धर्मात्मा आसीत्सर्वजनप्रियः दानवं भावमुत्सृज्य द्विजभक्तिपरायणः
sa bāla eva dharmātmā āsītsarvajanapriyaḥ dānavaṁ bhāvamutsṛjya dvijabhaktiparāyaṇaḥ
वह बाल्यकाल से ही धर्मात्मा और सर्वजनप्रिय था; दानव-स्वभाव को त्यागकर वह द्विज-भक्ति में तत्पर रहता था।
श्लोक 17 (skanda.6.269.17)
स गत्वा पुष्करारण्यं परमेण समाधिना तोषयामास देवेशं पद्मजं तपसि स्थितः
sa gatvā puṣkarāraṇyaṁ parameṇa samādhinā toṣayāmāsa deveśaṁ padmajaṁ tapasi sthitaḥ
वह पुष्करारण्य जाकर परम समाधि द्वारा तपस्या में स्थित हो, पद्मजन्मा देवेश ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया।
श्लोक 18 (skanda.6.269.18)
तस्य तुष्टः स्वयं ब्रह्मा दृष्टिगोचरमागतः प्रोवाच वरदोऽस्मीति किं ते कृत्यं करोम्यहम्
tasya tuṣṭaḥ svayaṁ brahmā dṛṣṭigocaramāgataḥ provāca varado'smīti kiṁ te kṛtyaṁ karomyaham
उससे प्रसन्न होकर स्वयं ब्रह्मा प्रत्यक्ष हुए और बोले — 'मैं वरदाता हूँ, तेरे लिए क्या करूँ?'
श्लोक 19 (skanda.6.269.19)
वृत्र उवाच यदि तुष्टोसि मे देव ब्राह्मणत्वं प्रयच्छ मे ब्राह्मणत्वं समासाद्य साधयामि परं पदम्
vṛtra uvāca yadi tuṣṭosi me deva brāhmaṇatvaṁ prayaccha me brāhmaṇatvaṁ samāsādya sādhayāmi paraṁ padam
वृत्र ने कहा — हे देव, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे ब्राह्मणत्व प्रदान कीजिए; ब्राह्मणत्व पाकर मैं परम पद सिद्ध करूँगा।
श्लोक 20 (skanda.6.269.20)
तेन किंचिदसाध्यं न ब्राह्मण्येन भवेन्मम ब्राह्मणेन समं चान्यन्न किंचित्प्रतिभाति मे
tena kiṁcidasādhyaṁ na brāhmaṇyena bhavenmama brāhmaṇena samaṁ cānyanna kiṁcitpratibhāti me
'उस ब्राह्मणत्व से मेरे लिए कुछ भी असाध्य नहीं होगा; ब्राह्मण के समान मुझे अन्य कुछ भी प्रतीत नहीं होता।'
श्लोक 21 (skanda.6.269.21)
परमं दैवतं किंचिन्न विप्राद्विद्यते परम् तस्मान्मे हृत्स्थितं नान्यदपि राज्यं त्रिविष्टपे
paramaṁ daivataṁ kiṁcinna viprādvidyate param tasmānme hṛtsthitaṁ nānyadapi rājyaṁ triviṣṭape
'विप्र से बढ़कर कोई परम देवता नहीं है; इसलिए मेरे हृदय में स्वर्ग का राज्य भी नहीं टिकता, केवल यही स्थित है।'
श्लोक 22 (skanda.6.269.22)
सूत उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तुष्टस्तस्य पितामहः ब्राह्मणत्वं स्वयं दत्त्वा ततः प्रोवाच सादरम्
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā tuṣṭastasya pitāmahaḥ brāhmaṇatvaṁ svayaṁ dattvā tataḥ provāca sādaram
सूत जी ने कहा — उसके ये वचन सुनकर प्रसन्न हुए पितामह ब्रह्मा ने स्वयं उसे ब्राह्मणत्व देकर आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 23 (skanda.6.269.23)
मया त्वं विहितो विप्र पुत्र प्रकुरु वांछितम् प्रसादयस्व सततं ब्राह्मणान्ब्रह्मवित्तमान्
mayā tvaṁ vihito vipra putra prakuru vāṁchitam prasādayasva satataṁ brāhmaṇānbrahmavittamān
'हे पुत्र विप्र, मैंने तुझे यह प्रदान किया है, अब अपनी इच्छा पूर्ण कर; सदैव ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणों को प्रसन्न रखना।'
श्लोक 24 (skanda.6.269.24)
ब्राह्मणैः सुप्रसन्नैश्च प्रीयंते सर्वदेवताः तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूजनीया द्विजोत्तमाः
brāhmaṇaiḥ suprasannaiśca prīyaṁte sarvadevatāḥ tasmātsarvaprayatnena pūjanīyā dvijottamāḥ
'सुप्रसन्न ब्राह्मणों से समस्त देवता प्रसन्न होते हैं; अतः सर्वप्रयत्न से द्विजोत्तमों की पूजा करनी चाहिए।'
श्लोक 25 (skanda.6.269.25)
सूत उवाच एवमुक्तस्तदा तेन वृत्रोऽभूद्ब्राह्मणस्ततः ब्राह्म्या लक्ष्म्या समोपेतो ब्रह्मचर्यपरायणः
sūta uvāca evamuktastadā tena vṛtro'bhūdbrāhmaṇastataḥ brāhmyā lakṣmyā samopeto brahmacaryaparāyaṇaḥ
सूत जी ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर वृत्र ब्राह्मण हो गया, ब्राह्मी शोभा से युक्त तथा ब्रह्मचर्य में तत्पर।
श्लोक 26 (skanda.6.269.26)
तस्मिंस्तपसि संस्थे तु हता इंद्रेण दानवाः वंशोच्छेदे समापन्ने दानवानां महात्मनाम्
tasmiṁstapasi saṁsthe tu hatā iṁdreṇa dānavāḥ vaṁśocchede samāpanne dānavānāṁ mahātmanām
जब वह तपस्या में लीन था, इन्द्र ने दानवों का वध कर दिया, और उन महात्मा दानवों का वंश ही समाप्त हो गया।
श्लोक 27 (skanda.6.269.27)
ततस्ते दानवाः सर्वे पराभूताः सुरैस्ततः स्वं स्थानं संपरित्यज्य दुःखशोकसमन्विताः
tataste dānavāḥ sarve parābhūtāḥ suraistataḥ svaṁ sthānaṁ saṁparityajya duḥkhaśokasamanvitāḥ
तब देवताओं से पराजित होकर वे सभी दानव अपने स्थान को त्यागकर, दुःख-शोक से युक्त होकर...
श्लोक 28 (skanda.6.269.28)
तन्मातरं पुरस्कृत्वा तत्सकाशमुपागताः स च तां मातरं दृष्ट्वा वृतां तैश्च समन्वितः
tanmātaraṁ puraskṛtvā tatsakāśamupāgatāḥ sa ca tāṁ mātaraṁ dṛṣṭvā vṛtāṁ taiśca samanvitaḥ
...अपनी माता को आगे कर उसके पास पहुँचे। वृत्र ने उन दानवों से घिरी हुई अपनी माता को देखकर...
श्लोक 29 (skanda.6.269.29)
दानवैश्च पराभूतैस्तथाभूतां च मातरम् किमागमनकृत्यं च दुःखितानां ममांतिके
dānavaiśca parābhūtaistathābhūtāṁ ca mātaram kimāgamanakṛtyaṁ ca duḥkhitānāṁ mamāṁtike
...देवताओं से पराजित उन दुःखी दानवों तथा माता से पूछा — 'दुःखित होकर मेरे पास आने का क्या प्रयोजन है?'
श्लोक 30 (skanda.6.269.30)
दानवा ऊचुः वयं देवैः पराभूता भवंतं शरणागताः क्व यामोऽन्यत्र चाऽस्माकं त्वां विना नास्ति संश्रयः
dānavā ūcuḥ vayaṁ devaiḥ parābhūtā bhavaṁtaṁ śaraṇāgatāḥ kva yāmo'nyatra cā'smākaṁ tvāṁ vinā nāsti saṁśrayaḥ
दानवों ने कहा — हम देवताओं से पराजित होकर तुम्हारी शरण में आए हैं; अन्यत्र कहाँ जाएँ? तुम्हारे बिना हमारा कोई आश्रय नहीं है।
श्लोक 31 (skanda.6.269.31)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा वृत्रः प्रोवाच सादरम् देवानहं हनिष्यामि गम्यतां तत्र मा चिरम्
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā vṛtraḥ provāca sādaram devānahaṁ haniṣyāmi gamyatāṁ tatra mā ciram
उनके वचन सुनकर वृत्र ने आदरपूर्वक कहा — 'मैं देवताओं का वध करूँगा, अविलम्ब वहाँ चलें।'
श्लोक 32 (skanda.6.269.32)
तवागमनकृत्यं च मातः कथय सांप्रतम्
tavāgamanakṛtyaṁ ca mātaḥ kathaya sāṁpratam
'और हे माता, अब अपने आने का प्रयोजन भी बताइए।'
श्लोक 33 (skanda.6.269.33)
मातोवाच तथा कुरु महाभाग शीघ्रं दारपरिग्रहम् वंशवृद्धौ प्रमाणं चेद्वाक्यं तव ममोद्भवम्
mātovāca tathā kuru mahābhāga śīghraṁ dāraparigraham vaṁśavṛddhau pramāṇaṁ cedvākyaṁ tava mamodbhavam
माता ने कहा — हे महाभाग, वंश-वृद्धि हेतु शीघ्र विवाह कर; यदि तेरी उत्पत्तिकर्त्री माता का यह वचन तेरे लिए प्रमाण हो...
श्लोक 34 (skanda.6.269.34)
एष एव परो धर्म एष एव परो नयः पुत्रस्य जननीवाक्यं यत्करोति समाहितः
eṣa eva paro dharma eṣa eva paro nayaḥ putrasya jananīvākyaṁ yatkaroti samāhitaḥ
'...तो यही परम धर्म है, यही परम नीति है — कि पुत्र एकाग्रचित्त होकर माता की आज्ञा का पालन करे।'
श्लोक 35 (skanda.6.269.35)
तथा स्त्रीणां पतिं मुक्त्वा नान्यास्ति भुवि देवता जनन्यां जीवमानायां तथैव च सुतस्य च
tathā strīṇāṁ patiṁ muktvā nānyāsti bhuvi devatā jananyāṁ jīvamānāyāṁ tathaiva ca sutasya ca
'जैसे स्त्री के लिए पति के अतिरिक्त पृथ्वी पर अन्य कोई देवता नहीं है, वैसे ही माता के जीवित रहते पुत्र के लिए भी वही परम है।'
श्लोक 36 (skanda.6.269.36)
अतिक्रम्य च या नारी पतिं धर्मपरा भवेत् तत्सर्वं विफलं तस्या जायते नात्र संशयः
atikramya ca yā nārī patiṁ dharmaparā bhavet tatsarvaṁ viphalaṁ tasyā jāyate nātra saṁśayaḥ
'जो स्त्री पति की अवहेलना कर स्वयं को धर्मपरायण मानती है, उसके सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं।'
श्लोक 37 (skanda.6.269.37)
पुत्रः स्वजननीवाक्यं योऽतिक्रम्य यथारुचि करोति धर्मकृत्यानि तानि सर्वाणि तस्य च
putraḥ svajananīvākyaṁ yo'tikramya yathāruci karoti dharmakṛtyāni tāni sarvāṇi tasya ca
'जो पुत्र अपनी माता के वचन की अवहेलना कर अपनी इच्छानुसार धर्म-कृत्य करता है, उसके वे सभी कृत्य...'
श्लोक 38 (skanda.6.269.38)
भवंति च तथा नूनं वृथा भस्महुतं यथा अरण्ये रुदितानीव ऊषरे वापितानि च
bhavaṁti ca tathā nūnaṁ vṛthā bhasmahutaṁ yathā araṇye ruditānīva ūṣare vāpitāni ca
'...वैसे ही निष्फल होते हैं जैसे राख में डाली गई आहुति, जंगल में किया गया विलाप, अथवा ऊसर भूमि में बोए गए बीज।'
श्लोक 39 (skanda.6.269.39)
यथैव बधिरस्याग्रे गीतं नृत्यमचक्षुषः तद्वन्मातृमतादन्यकृतं पुत्रस्य धर्मजम्
yathaiva badhirasyāgre gītaṁ nṛtyamacakṣuṣaḥ tadvanmātṛmatādanyakṛtaṁ putrasya dharmajam
'जैसे बहरे के आगे गीत और अंधे के आगे नृत्य व्यर्थ है, वैसे ही माता की इच्छा के विरुद्ध किया गया पुत्र का धर्म-कर्म व्यर्थ है।'
श्लोक 40 (skanda.6.269.40)
सर्वं कर्म न संदेहस्तेनाहं त्वामुपागता बंधूनां वचनात्पुत्र दुःखार्ता च विशेषतः
sarvaṁ karma na saṁdehastenāhaṁ tvāmupāgatā baṁdhūnāṁ vacanātputra duḥkhārtā ca viśeṣataḥ
'इसमें कोई संदेह नहीं — इसीलिए हे पुत्र, बंधुजनों के कहने से तथा विशेषतः दुःख से पीड़ित होकर मैं तेरे पास आई हूँ।'
श्लोक 41 (skanda.6.269.41)
किं वा ते बहुनोक्तेन भूयो भूयश्च पुत्रक आनृण्यं जायते यद्वत्पितॄणां तत्तथा शृणु
kiṁ vā te bahunoktena bhūyo bhūyaśca putraka ānṛṇyaṁ jāyate yadvatpitṝṇāṁ tattathā śṛṇu
'हे पुत्र, बार-बार अधिक कहने से क्या लाभ? सुन, पितरों के प्रति ऋणमुक्ति किस प्रकार होती है।'
श्लोक 42 (skanda.6.269.42)
तव वत्स प्रमाणं चेत्कुरुष्व च वचो मम तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा वृत्रः संचिंत्य चेतसि
tava vatsa pramāṇaṁ cetkuruṣva ca vaco mama tasyāstadvacanaṁ śrutvā vṛtraḥ saṁciṁtya cetasi
'हे वत्स, यदि मेरा वचन तेरे लिए प्रमाण है तो मेरी बात मान।' उसके ये वचन सुनकर वृत्र ने मन में विचार कर...
श्लोक 43 (skanda.6.269.43)
श्रुतिस्मृत्युक्तमार्गेण न मातुर्विद्यते परम् स तथेति प्रतिज्ञाय आनिनाय परिग्रहम्
śrutismṛtyuktamārgeṇa na māturvidyate param sa tatheti pratijñāya ānināya parigraham
...(सोचा) श्रुति-स्मृति में कहे मार्ग से माता से बढ़कर कुछ नहीं है। ऐसा मानकर उसने विवाह करना स्वीकार कर लिया।
श्लोक 44 (skanda.6.269.44)
त्वष्टा तस्मै ददौ प्रीतस्ततो रत्नान्यनेकशः संख्याहीनानि तस्यैव कुप्याकुप्यमनंतकम्
tvaṣṭā tasmai dadau prītastato ratnānyanekaśaḥ saṁkhyāhīnāni tasyaiva kupyākupyamanaṁtakam
प्रसन्न होकर त्वष्टा ने उसे अनेक रत्न, तथा असंख्य श्रेष्ठ एवं साधारण धातुएँ प्रदान कीं।
श्लोक 45 (skanda.6.269.45)
हस्त्यश्वयानकोशाढ्यं सोऽभिषिक्तः पदे निजे दानवानां महावीर्यो ब्राह्मण्येन समन्वितः
hastyaśvayānakośāḍhyaṁ so'bhiṣiktaḥ pade nije dānavānāṁ mahāvīryo brāhmaṇyena samanvitaḥ
हाथी, घोड़े, वाहन और कोष से समृद्ध, वह महापराक्रमी, ब्राह्मणत्व से युक्त दानव अपने पद पर अभिषिक्त हुआ।
श्लोक 46 (skanda.6.269.46)
अभिषिक्तं तदा वृत्रं स्वराज्ये तेऽसुरादयः श्रुत्वाभिषेकं संहृष्टास्तस्य वृत्रस्य बांधवाः
abhiṣiktaṁ tadā vṛtraṁ svarājye te'surādayaḥ śrutvābhiṣekaṁ saṁhṛṣṭāstasya vṛtrasya bāṁdhavāḥ
वृत्र के अपने राज्य में अभिषिक्त होने का समाचार सुनकर उसके बांधव असुर आदि अत्यंत हर्षित हुए।
श्लोक 47 (skanda.6.269.47)
दानवाश्च समाजग्मुर्ये तत्रासन्पुरोगताः पातालाद्गिरिदुर्गाच्च स्थलदुर्गेभ्य एव च कृतवैराः समं देवैः कोपेन महता वृताः
dānavāśca samājagmurye tatrāsanpurogatāḥ pātālādgiridurgācca sthaladurgebhya eva ca kṛtavairāḥ samaṁ devaiḥ kopena mahatā vṛtāḥ
जो दानव आगे थे, वे पाताल से, पर्वत-दुर्गों से तथा स्थल-दुर्गों से एकत्र हुए — देवताओं से वैर रखने वाले, अत्यंत क्रोध से युक्त।
श्लोक 48 (skanda.6.269.48)
ततः प्रोत्साहितः सर्वैर्दानवैः स महाबलः प्रस्थितः शत्रुनाशाय महेन्द्रभवनं प्रति
tataḥ protsāhitaḥ sarvairdānavaiḥ sa mahābalaḥ prasthitaḥ śatrunāśāya mahendrabhavanaṁ prati
तब समस्त दानवों द्वारा उत्साहित होकर वह महाबली शत्रुनाश हेतु महेन्द्र के भवन की ओर चल पड़ा।
श्लोक 49 (skanda.6.269.49)
शक्रोऽपि वृत्रमाकर्ण्य समायांतं युयुत्सया सन्मुखः प्रययौ हृष्टः सर्वदेवसमन्वितः
śakro'pi vṛtramākarṇya samāyāṁtaṁ yuyutsayā sanmukhaḥ prayayau hṛṣṭaḥ sarvadevasamanvitaḥ
युद्धेच्छा से आ रहे वृत्र का समाचार सुनकर इन्द्र भी हर्षित होकर समस्त देवताओं सहित सम्मुख गए।
श्लोक 50 (skanda.6.269.50)
ततः समभवद्युद्धं देवानां दानवैः सह मेरुपृष्ठे सुविस्तीर्णे नित्यमेव दिवानिशम्
tataḥ samabhavadyuddhaṁ devānāṁ dānavaiḥ saha merupṛṣṭhe suvistīrṇe nityameva divāniśam
तब मेरु पर्वत के विस्तृत शिखर पर देवताओं और दानवों में दिन-रात निरंतर युद्ध होने लगा।
श्लोक 51 (skanda.6.269.51)
नित्यं पराजयो जज्ञे देवानां दानवैः सह तत्रोवाच गुरुः शक्र मा युद्धं कुरु देवप
nityaṁ parājayo jajñe devānāṁ dānavaiḥ saha tatrovāca guruḥ śakra mā yuddhaṁ kuru devapa
देवताओं की दानवों से निरंतर पराजय होने लगी। तब गुरु बृहस्पति ने कहा — 'हे इन्द्र, यह युद्ध मत करो।'
श्लोक 52 (skanda.6.269.52)
वृत्रोऽयं दारुणो युद्धे बलद्वयसमन्वितः चत्वारश्चाग्रतो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः
vṛtro'yaṁ dāruṇo yuddhe baladvayasamanvitaḥ catvāraścāgrato vedāḥ pṛṣṭhataḥ saśaraṁ dhanuḥ
'यह वृत्र युद्ध में भयंकर है, दो प्रकार के बल से युक्त है — आगे चारों वेद हैं और पीछे बाणयुक्त धनुष है।'
श्लोक 53 (skanda.6.269.53)
तेन जेयतमो दैत्यस्तवैव च महाहवे तस्मात्संधानमेतेन त्वं कुरुष्व शचीपते
tena jeyatamo daityastavaiva ca mahāhave tasmātsaṁdhānametena tvaṁ kuruṣva śacīpate
'इसलिए यह दैत्य तुम्हारे लिए भी इस महायुद्ध में जीतना अत्यंत कठिन है; अतः हे शचीपते, इसके साथ संधि कर लो।'
श्लोक 54 (skanda.6.269.54)
ततो विश्वासमाया तं जहि वज्रेण दानवम् षडुपायै रिपुर्वध्य इति शास्त्रनिदर्शनम्
tato viśvāsamāyā taṁ jahi vajreṇa dānavam ṣaḍupāyai ripurvadhya iti śāstranidarśanam
'फिर विश्वास दिलाकर वज्र से उस दानव का वध कर देना; शास्त्रों में यही दिखाया गया है कि शत्रु को छह उपायों से मारना चाहिए।'
श्लोक 55 (skanda.6.269.55)
भुंजानश्च शयानश्च दत्त्वा कन्यामपि स्वकाम् विप्रदानेन संयोज्य कृत्वापि शपथं गुरुम् मायाप्रपंचमासाद्य तस्मादेवं समाचर
bhuṁjānaśca śayānaśca dattvā kanyāmapi svakām vipradānena saṁyojya kṛtvāpi śapathaṁ gurum māyāprapaṁcamāsādya tasmādevaṁ samācara
'भोजन करते या सोते समय, अथवा अपनी कन्या देकर, ब्राह्मण-दान द्वारा जोड़कर, शपथ लेकर भी — इस माया-प्रपंच का सहारा लेकर वैसा ही आचरण करो।'
श्लोक 56 (skanda.6.269.56)
इन्द्र उवाच यद्येवं च स्वयं गत्वा त्वं विश्वासे नियोजय तव वाक्येन विश्वासं नूनं यास्यति दानवः
indra uvāca yadyevaṁ ca svayaṁ gatvā tvaṁ viśvāse niyojaya tava vākyena viśvāsaṁ nūnaṁ yāsyati dānavaḥ
इन्द्र ने कहा — यदि ऐसा है तो आप स्वयं जाकर उसे विश्वास दिलाइए; आपके वचन से वह दानव निश्चय ही विश्वास कर लेगा।
श्लोक 57 (skanda.6.269.57)
सूत उवाच शक्रस्य मतमाज्ञाय प्रतस्थे च बृहस्पतिः यत्र वृत्रः स्थितो दैत्यो युद्धार्थं कृतनिश्चयः
sūta uvāca śakrasya matamājñāya pratasthe ca bṛhaspatiḥ yatra vṛtraḥ sthito daityo yuddhārthaṁ kṛtaniścayaḥ
सूत जी ने कहा — इन्द्र का अभिप्राय जानकर बृहस्पति वहाँ चल पड़े, जहाँ युद्ध हेतु दृढ़-निश्चय दैत्य वृत्र स्थित था।
श्लोक 58 (skanda.6.269.58)
वृत्रोऽपि तं समालोक्य स्वयं प्राप्तं बृहस्पतिम् सदैव द्विजभक्तः स हृष्टात्मा समपद्यत विशेषात्प्रणिपत्योच्चैर्वाक्यमेतदभाषत
vṛtro'pi taṁ samālokya svayaṁ prāptaṁ bṛhaspatim sadaiva dvijabhaktaḥ sa hṛṣṭātmā samapadyata viśeṣātpraṇipatyoccairvākyametadabhāṣata
बृहस्पति को स्वयं आया देख वृत्र भी, सदा द्विज-भक्त होने के कारण, हर्षित हो गया; विशेष रूप से प्रणाम कर उच्च स्वर में यह वचन बोला।
श्लोक 59 (skanda.6.269.59)
वृत्र उवाच स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ किं करोमि प्रशाधि माम् प्रिया मे ब्राह्मणा यस्मात्तस्मात्कीर्तय सांप्रतम्
vṛtra uvāca svāgataṁ te dvijaśreṣṭha kiṁ karomi praśādhi mām priyā me brāhmaṇā yasmāttasmātkīrtaya sāṁpratam
वृत्र ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ, आपका स्वागत है, मैं क्या करूँ, मुझे आज्ञा दीजिए; चूँकि मुझे ब्राह्मण प्रिय हैं, अपना प्रयोजन अभी कहिए।
श्लोक 60 (skanda.6.269.60)
बृहस्पतिरुवाच संदिग्धो विजयो युद्धे यस्माद्दैवेन सत्तम तस्मात्कुरु महेंद्रेण व्यवस्थां वचनान्मम
bṛhaspatiruvāca saṁdigdho vijayo yuddhe yasmāddaivena sattama tasmātkuru maheṁdreṇa vyavasthāṁ vacanānmama
बृहस्पति ने कहा — हे सत्तम, चूँकि युद्ध में विजय दैवाधीन तथा संदिग्ध है, अतः मेरे कहने से महेन्द्र से समझौता कर लो।
श्लोक 61 (skanda.6.269.61)
त्वं भुंक्ष्व भूतलं कृत्स्नं शक्रश्चापि त्रिविष्टपम् व्यवस्थयाऽनया नित्यं वर्तितव्यं परस्परम्
tvaṁ bhuṁkṣva bhūtalaṁ kṛtsnaṁ śakraścāpi triviṣṭapam vyavasthayā'nayā nityaṁ vartitavyaṁ parasparam
'तुम सम्पूर्ण भूतल का भोग करो और इन्द्र स्वर्ग का; इस व्यवस्था के अनुसार तुम दोनों सदा परस्पर वर्तन करना।'
श्लोक 62 (skanda.6.269.62)
वृत्र उवाच अहं तव वचो ब्रह्मन्करिष्यामि सदैव हि संगमं कुरु शक्रेण सांप्रतं मम सद्द्विज
vṛtra uvāca ahaṁ tava vaco brahmankariṣyāmi sadaiva hi saṁgamaṁ kuru śakreṇa sāṁprataṁ mama saddvija
वृत्र ने कहा — हे ब्रह्मन्, मैं सदा आपके वचन का पालन करूँगा; अब मेरा इन्द्र से मिलन करवा दीजिए, हे सद्द्विज।
श्लोक 63 (skanda.6.269.63)
सूत उवाच अथ शक्रं समानीय बृहस्पतिरुदारधीः वृत्रेण सह संधानं चक्रे चैव परस्परम्
sūta uvāca atha śakraṁ samānīya bṛhaspatirudāradhīḥ vṛtreṇa saha saṁdhānaṁ cakre caiva parasparam
सूत जी ने कहा — तब उदारबुद्धि बृहस्पति ने इन्द्र को लाकर वृत्र के साथ परस्पर संधि करा दी।
श्लोक 64 (skanda.6.269.64)
एकारिमित्रतां गत्वा तावुभौ दैत्यदेवपौ प्रहृष्टौ गतवन्तौ तौ ततश्चैव निजं गृहम्
ekārimitratāṁ gatvā tāvubhau daityadevapau prahṛṣṭau gatavantau tau tataścaiva nijaṁ gṛham
इस प्रकार शत्रुता त्यागकर मित्रता को प्राप्त कर वे दोनों दैत्यराज और देवराज हर्षित होकर अपने-अपने घर चले गए।
श्लोक 65 (skanda.6.269.65)
अथ शक्रच्छलान्वेषी सदा वृत्रस्य वर्तते न च्छिद्रं लभते क्वापि वीक्षमाणोपि यत्नतः
atha śakracchalānveṣī sadā vṛtrasya vartate na cchidraṁ labhate kvāpi vīkṣamāṇopi yatnataḥ
फिर भी इन्द्र सदा वृत्र में छिद्र (दोष) ढूँढ़ता रहा, किंतु प्रयत्नपूर्वक देखने पर भी कहीं कोई कमी नहीं पा सका।
श्लोक 66 (skanda.6.269.66)
कथंचिदपि सोऽभ्येति तत्सकाशं पुरंदरः किंचिच्छिद्रं समासाद्य तत्प्रतापेन दह्यते
kathaṁcidapi so'bhyeti tatsakāśaṁ puraṁdaraḥ kiṁcicchidraṁ samāsādya tatpratāpena dahyate
जब भी इन्द्र किसी प्रकार उसके समीप जाकर कोई थोड़ा-सा छिद्र ढूँढ़ने का प्रयास करता, वह उसके तेज से जल उठता।
श्लोक 67 (skanda.6.269.67)
इंद्र उवाच न शक्नोमि च तं दैत्यं वीक्षितुं च कथंचन तेजसा सर्वतो व्याप्तं तत्कथं सूदयाम्यहम्
iṁdra uvāca na śaknomi ca taṁ daityaṁ vīkṣituṁ ca kathaṁcana tejasā sarvato vyāptaṁ tatkathaṁ sūdayāmyaham
इन्द्र ने कहा — मैं उस दैत्य को किसी भी प्रकार देख भी नहीं पाता, वह सर्वत्र तेज से व्याप्त है; उसका वध मैं कैसे करूँ?
श्लोक 68 (skanda.6.269.68)
तस्मात्कंचिदुपायं मे तद्वधार्थं प्रकीर्तय यथा शक्नोमि तत्सोढुं तेजस्तस्य दुरात्मनः
tasmātkaṁcidupāyaṁ me tadvadhārthaṁ prakīrtaya yathā śaknomi tatsoḍhuṁ tejastasya durātmanaḥ
'अतः उसके वध हेतु कोई उपाय मुझे बताइए, जिससे मैं उस दुरात्मा के तेज को सहन कर सकूँ।'
श्लोक 69 (skanda.6.269.69)
सूत उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा चिरं ध्यात्वा बृहस्पतिः ततः प्रोवाच तं शक्रं विनयावनतं स्थितम्
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā ciraṁ dhyātvā bṛhaspatiḥ tataḥ provāca taṁ śakraṁ vinayāvanataṁ sthitam
सूत जी ने कहा — उसके वचन सुनकर बृहस्पति ने चिरकाल तक विचार कर, विनयपूर्वक खड़े इन्द्र से कहा।
श्लोक 70 (skanda.6.269.70)
बृहस्पतिरुवाच तस्य ब्राह्म्यं स्थितं तेजः सम्यग्गात्रे पुरंदर वीक्षितुं नैव शक्नोषि तेन त्वं त्रिदशाधिप
bṛhaspatiruvāca tasya brāhmyaṁ sthitaṁ tejaḥ samyaggātre puraṁdara vīkṣituṁ naiva śaknoṣi tena tvaṁ tridaśādhipa
बृहस्पति ने कहा — हे त्रिदशाधिप इन्द्र, उसके शरीर में ब्राह्मी तेज पूर्णतः स्थित है, इसीलिए तुम उसे देख नहीं पाते।
श्लोक 71 (skanda.6.269.71)
तथा ते कीर्तयिष्यामि तस्योपायं वधोद्भवम् वधयिष्यसि येनात्र तं त्वं दानवसत्तमम्
tathā te kīrtayiṣyāmi tasyopāyaṁ vadhodbhavam vadhayiṣyasi yenātra taṁ tvaṁ dānavasattamam
'फिर भी मैं तुम्हें उसके वध का उपाय बताता हूँ, जिससे तुम उस श्रेष्ठ दानव का वध कर सकोगे।'
श्लोक 72 (skanda.6.269.72)
प्राचीसरस्वतीतीरे पुष्करारण्यमाश्रितः दधीचिर्नाम विप्रर्षिः शतयोजनमुच्छ्रितः
prācīsarasvatītīre puṣkarāraṇyamāśritaḥ dadhīcirnāma viprarṣiḥ śatayojanamucchritaḥ
'प्राची सरस्वती के तट पर, पुष्करारण्य में, दधीचि नामक विप्रर्षि निवास करते हैं, जिनका शरीर सौ योजन ऊँचा है।'
श्लोक 73 (skanda.6.269.73)
तत्र नित्यं तपः कुर्वन्स्तौति नित्यं पितामहम् स निर्विण्णो मुनिश्रेष्ठः प्राणानां धारणे हरे
tatra nityaṁ tapaḥ kurvanstauti nityaṁ pitāmaham sa nirviṇṇo muniśreṣṭhaḥ prāṇānāṁ dhāraṇe hare
'वहाँ सदा तपस्या करते हुए वे निरंतर पितामह की स्तुति करते हैं। हे हरे, वे मुनिश्रेष्ठ अपने प्राणों को धारण करने से उदासीन हो चुके हैं।'
श्लोक 74 (skanda.6.269.74)
चिरंतनो मुनिः स स्याज्जरयातिसमावृतः तं प्रार्थय द्रुतं गत्वा तस्यास्थीनि गुरूणि च
ciraṁtano muniḥ sa syājjarayātisamāvṛtaḥ taṁ prārthaya drutaṁ gatvā tasyāsthīni gurūṇi ca
'वे अत्यंत वृद्ध मुनि हैं, जरा से पूर्णतः आवृत हैं; शीघ्र जाकर उनसे उनकी विशाल अस्थियाँ माँगो।'
श्लोक 75 (skanda.6.269.75)
स ते दास्यस्त्यसंदिग्धं त्यक्त्वा प्राणानतिप्रियान् तस्यास्थिभिः प्रहरणं वज्राख्यं ते भविष्यति
sa te dāsyastyasaṁdigdhaṁ tyaktvā prāṇānatipriyān tasyāsthibhiḥ praharaṇaṁ vajrākhyaṁ te bhaviṣyati
'वे निःसंदेह अपने अत्यंत प्रिय प्राणों को त्यागकर तुम्हें वे अस्थियाँ देंगे; उन अस्थियों से 'वज्र' नामक तुम्हारा अस्त्र बनेगा।'
श्लोक 76 (skanda.6.269.76)
अमोघं ते ततो नूनं त्वं वृत्रं सूदयिष्यसि तस्य वज्रस्य तत्तेजो ब्रह्मतेजोऽभिबृंहितम् तेन वृत्रोद्भवं तेजः प्रशमं संप्रयास्यति
amoghaṁ te tato nūnaṁ tvaṁ vṛtraṁ sūdayiṣyasi tasya vajrasya tattejo brahmatejo'bhibṛṁhitam tena vṛtrodbhavaṁ tejaḥ praśamaṁ saṁprayāsyati
'उस अमोघ अस्त्र से तुम निश्चय ही वृत्र का वध कर दोगे; उस वज्र का तेज ब्रह्मतेज से समृद्ध होगा, जिससे वृत्र में उत्पन्न तेज शांत हो जाएगा।'
श्लोक 77 (skanda.6.269.77)
सूत उवाच तच्छ्रुत्वा सत्वरं शक्रः सर्वैर्दैवगणैः सह जगाम पुष्करारण्ये यत्र प्राची सरस्वती
sūta uvāca tacchrutvā satvaraṁ śakraḥ sarvairdaivagaṇaiḥ saha jagāma puṣkarāraṇye yatra prācī sarasvatī
सूत जी ने कहा — यह सुनकर इन्द्र तुरंत समस्त देवगणों सहित पुष्करारण्य में, जहाँ प्राची सरस्वती बहती है, वहाँ गए।
श्लोक 78 (skanda.6.269.78)
त्रयस्त्रिंशत्समोपेता तीर्थानां कोटिभिर्युता दधीचेराश्रमं तत्र सोऽविशच्चित्रसंयुतम्
trayastriṁśatsamopetā tīrthānāṁ koṭibhiryutā dadhīcerāśramaṁ tatra so'viśaccitrasaṁyutam
तैंतीस देवताओं तथा करोड़ों तीर्थों से युक्त होकर वे वहाँ दधीचि के विचित्र आश्रम में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 79 (skanda.6.269.79)
क्रीडंते नकुलैः सर्पा यत्र तुष्टिं गता मिथः मृगाः पंचाननैः सार्धं वृषदंशास्तथाऽऽखुभिः
krīḍaṁte nakulaiḥ sarpā yatra tuṣṭiṁ gatā mithaḥ mṛgāḥ paṁcānanaiḥ sārdhaṁ vṛṣadaṁśāstathā''khubhiḥ
जहाँ साँप नेवलों के साथ खेलते हुए परस्पर संतुष्ट रहते थे, तथा हिरण सिंहों के साथ और बिल्लियाँ चूहों के साथ...
श्लोक 80 (skanda.6.269.80)
उलूक सहिताः काका मिथो द्वेषविवर्जिताः प्रभावात्तस्य तपसो दधीचेः सुमहात्मनः
ulūka sahitāḥ kākā mitho dveṣavivarjitāḥ prabhāvāttasya tapaso dadhīceḥ sumahātmanaḥ
...उल्लू कौओं के साथ, परस्पर द्वेष त्यागकर रहते थे — उन महात्मा दधीचि की तपस्या के प्रभाव से।
श्लोक 81 (skanda.6.269.81)
दधीचिरपि चालोक्य देवाञ्छक्रपुरोगमान् समायातान्प्रहृष्टात्मा सत्वरं संमुखोभ्यगात्
dadhīcirapi cālokya devāñchakrapurogamān samāyātānprahṛṣṭātmā satvaraṁ saṁmukhobhyagāt
इन्द्र आदि देवताओं को आया देख दधीचि भी प्रसन्नचित्त होकर तुरंत उनके सम्मुख गए।
श्लोक 82 (skanda.6.269.82)
ततश्चार्घ्यं समादाय प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः शक्रमभ्यागतं प्राह किं ते कृत्यं करोम्यहम्
tataścārghyaṁ samādāya praṇipatya muhurmuhuḥ śakramabhyāgataṁ prāha kiṁ te kṛtyaṁ karomyaham
फिर अर्घ्य लेकर बार-बार प्रणाम करते हुए, आए हुए इन्द्र से पूछा — 'आपका क्या कार्य करूँ?'
श्लोक 83 (skanda.6.269.83)
गृहायातस्य देवेश तच्छीघ्रं मे निवेदय
gṛhāyātasya deveśa tacchīghraṁ me nivedaya
'हे देवेश, मेरे घर पधारने का प्रयोजन शीघ्र मुझे बताइए।'
श्लोक 84 (skanda.6.269.84)
इंद्र उवाच आतिथ्यं कुरु विप्रेंद्र गृहायातस्य सन्मुने त्वदस्थीनि निजान्याशु मम देह्यविकल्पितम्
iṁdra uvāca ātithyaṁ kuru vipreṁdra gṛhāyātasya sanmune tvadasthīni nijānyāśu mama dehyavikalpitam
इन्द्र ने कहा — हे विप्रेन्द्र, हे सन्मुने, घर आए अतिथि का सत्कार करो — बिना किसी संकोच के शीघ्र अपनी अस्थियाँ मुझे दो।
श्लोक 85 (skanda.6.269.85)
अतदर्थमहं प्राप्तस्त्वत्सकाशं मुनीश्वर अस्थिभिस्ते परं कार्यं देवानां सिद्धिमेष्यति
atadarthamahaṁ prāptastvatsakāśaṁ munīśvara asthibhiste paraṁ kāryaṁ devānāṁ siddhimeṣyati
'हे मुनीश्वर, इसी प्रयोजन से मैं आपके पास आया हूँ; आपकी अस्थियों से महान कार्य सिद्ध होगा, देवताओं की सिद्धि होगी।'
श्लोक 86 (skanda.6.269.86)
सूत उवाच इंद्रस्य तद्वचः श्रुत्वा दधीचिस्तोषसंयुतः ततः प्राह सहस्राक्षं सर्वैर्देवैः समन्वितम्
sūta uvāca iṁdrasya tadvacaḥ śrutvā dadhīcistoṣasaṁyutaḥ tataḥ prāha sahasrākṣaṁ sarvairdevaiḥ samanvitam
सूत जी ने कहा — इन्द्र के वचन सुनकर संतोषयुक्त दधीचि ने समस्त देवताओं सहित सहस्राक्ष इन्द्र से कहा।
श्लोक 87 (skanda.6.269.87)
अहो नास्ति मया तुल्यः सांप्रतं भुवि कश्चन पुण्यवान्यस्य देवेशः स्वयमर्थी गृहागतः
aho nāsti mayā tulyaḥ sāṁprataṁ bhuvi kaścana puṇyavānyasya deveśaḥ svayamarthī gṛhāgataḥ
'आश्चर्य है! अब पृथ्वी पर मेरे समान पुण्यवान कोई नहीं है, जिसके यहाँ स्वयं देवेश याचक बनकर आए हैं।'
श्लोक 88 (skanda.6.269.88)
धन्यानि च ममास्थीनि यानि देवेश ते हितम् करिष्यंति सदा कार्यं रक्षार्थं त्रिदिवौकसाम्
dhanyāni ca mamāsthīni yāni deveśa te hitam kariṣyaṁti sadā kāryaṁ rakṣārthaṁ tridivaukasām
'हे देवेश, धन्य हैं मेरी अस्थियाँ, जो तुम्हारा हित करेंगी, त्रिलोकवासियों की रक्षा हेतु सदा कार्य करेंगी।'
श्लोक 89 (skanda.6.269.89)
एषोऽहं संप्रदास्यामि प्रियान्प्राणान्कृते तव गृहाण स्वेच्छयाऽस्थीनि स्वकार्यार्थं पुरंदर
eṣo'haṁ saṁpradāsyāmi priyānprāṇānkṛte tava gṛhāṇa svecchayā'sthīni svakāryārthaṁ puraṁdara
'यह मैं तुम्हारे लिए अपने अत्यंत प्रिय प्राणों का त्याग करता हूँ; हे इन्द्र, अपने कार्य हेतु स्वेच्छा से अस्थियाँ ले लो।'
श्लोक 90 (skanda.6.269.90)
एवमुक्त्वा महर्षिः स ध्यानमाश्रित्य सत्वरम् ब्रह्मरंध्रेण निःसार्य प्राणमात्मानमत्यजत्
evamuktvā maharṣiḥ sa dhyānamāśritya satvaram brahmaraṁdhreṇa niḥsārya prāṇamātmānamatyajat
ऐसा कहकर उस महर्षि ने तुरंत ध्यान का आश्रय लेकर, ब्रह्मरंध्र से प्राण निकालकर अपने शरीर का त्याग कर दिया।
श्लोक 91 (skanda.6.269.91)
तदात्मना परित्यक्तं तस्य गात्रं च तत्क्षणात् पतितं मेदनीपृष्ठे व्यसु तद्द्विजसत्तमाः
tadātmanā parityaktaṁ tasya gātraṁ ca tatkṣaṇāt patitaṁ medanīpṛṣṭhe vyasu taddvijasattamāḥ
हे द्विजसत्तमो, आत्मा द्वारा त्यागा गया उसका शरीर उसी क्षण पृथ्वी पर प्राणहीन होकर गिर पड़ा।
श्लोक 92 (skanda.6.269.92)
तस्मिन्नेव काले तु तस्यास्थीनि शतक्रतुः प्रगृह्य विश्वकर्माणं ततः प्रोवाच सादरम्
tasminneva kāle tu tasyāsthīni śatakratuḥ pragṛhya viśvakarmāṇaṁ tataḥ provāca sādaram
उसी समय इन्द्र ने उसकी अस्थियाँ लेकर विश्वकर्मा से आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 93 (skanda.6.269.93)
एतैरस्थिभिः शीघ्रं मे कुरु त्वं वज्रमायुधम् येन व्यापादयाम्याशु वृत्रं दानवसत्तमम्
etairasthibhiḥ śīghraṁ me kuru tvaṁ vajramāyudham yena vyāpādayāmyāśu vṛtraṁ dānavasattamam
'इन अस्थियों से शीघ्र मेरे लिए वज्र नामक आयुध बनाओ, जिससे मैं श्रेष्ठ दानव वृत्र का शीघ्र वध कर सकूँ।'
श्लोक 94 (skanda.6.269.94)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विश्वकर्मा त्वरान्वितः यथायुधं तथा चक्रे वज्राख्यं दारुणाकृति
tasya tadvacanaṁ śrutvā viśvakarmā tvarānvitaḥ yathāyudhaṁ tathā cakre vajrākhyaṁ dāruṇākṛti
उसके वचन सुनकर विश्वकर्मा ने शीघ्रता से वैसा ही भयंकर आकार का वज्र नामक अस्त्र बना दिया।
श्लोक 95 (skanda.6.269.95)
षडस्रि शतपर्वाख्यं मध्ये क्षामं विभीषणम् प्रददौ च ततस्तस्मै सहस्राक्षाय धीमते
ṣaḍasri śataparvākhyaṁ madhye kṣāmaṁ vibhīṣaṇam pradadau ca tatastasmai sahasrākṣāya dhīmate
छह धार वाला, सौ पर्वों वाला, मध्य में क्षीण तथा अत्यंत भयंकर, वह उसे बुद्धिमान सहस्राक्ष को दे दिया।
श्लोक 96 (skanda.6.269.96)
अथ तं स समादाय द्वादशार्कसमप्रभम् समाधिस्थं चरैर्ज्ञात्वा वृत्रं संध्यार्चने रतम्
atha taṁ sa samādāya dvādaśārkasamaprabham samādhisthaṁ carairjñātvā vṛtraṁ saṁdhyārcane ratam
तब उसे लेकर, बारह सूर्यों के समान तेजस्वी वृत्र को गुप्तचरों द्वारा संध्या-पूजा में समाधिस्थ जानकर...
श्लोक 97 (skanda.6.269.97)
ततश्च पृष्ठभागं स समाश्रित्य त्रिलोकराट् चिक्षेप वज्रमुद्दिश्य तद्वधार्थं समुत्सुकः
tataśca pṛṣṭhabhāgaṁ sa samāśritya trilokarāṭ cikṣepa vajramuddiśya tadvadhārthaṁ samutsukaḥ
...त्रिलोकपति इन्द्र ने पीछे से पहुँचकर, उसके वध हेतु उत्सुक होकर वज्र का प्रहार किया।
श्लोक 98 (skanda.6.269.98)
स हतस्तेन वज्रेण दानवो भस्मसाद्गतः शक्रोपि हतमज्ञात्वा भयात्तस्याथ दुद्रुवे
sa hatastena vajreṇa dānavo bhasmasādgataḥ śakropi hatamajñātvā bhayāttasyātha dudruve
उस वज्र के प्रहार से वह दानव भस्म हो गया। इन्द्र भी उसके मारे जाने की बात न जानकर भय से भाग गया।
श्लोक 99 (skanda.6.269.99)
मनुष्यरहिते देशे विषमे गुल्मसंवृते लिल्ये शक्रस्तदा सर्वं मेने वृत्रमयं जगत्
manuṣyarahite deśe viṣame gulmasaṁvṛte lilye śakrastadā sarvaṁ mene vṛtramayaṁ jagat
इन्द्र मनुष्यरहित, विषम, झाड़ियों से घिरे स्थान में जा छिपा — उसे लगा मानो सारा जगत् ही वृत्रमय हो गया हो।
श्लोक 100 (skanda.6.269.100)
एतस्मिन्नंतरे देवाः पश्यंतः सर्वतो दिशम् सिद्धचारणगन्धर्वा आजग्मुश्च शतक्रतुम्
etasminnaṁtare devāḥ paśyaṁtaḥ sarvato diśam siddhacāraṇagandharvā ājagmuśca śatakratum
इसी बीच सभी देवता, सिद्ध, चारण और गंधर्व चारों दिशाओं में देखते हुए इन्द्र को ढूँढ़ने निकले।
श्लोक 101 (skanda.6.269.101)
ततः कृच्छ्राच्च तैर्दृष्टः शक्रोऽसौ गहने वने निलीनो भयसंत्रस्तो गुल्ममध्ये व्यवस्थितः
tataḥ kṛcchrācca tairdṛṣṭaḥ śakro'sau gahane vane nilīno bhayasaṁtrasto gulmamadhye vyavasthitaḥ
तब बड़ी कठिनाई से उन्होंने इन्द्र को घने वन में, भय से त्रस्त होकर झाड़ी के मध्य छिपा हुआ देखा।
श्लोक 102 (skanda.6.269.102)
देवा ऊचुः किं त्वं भीतः सहस्राक्ष वृत्रोऽयं घातितस्त्वया परिवारेण सर्वेण वीक्षितोऽस्माभिरेव च
devā ūcuḥ kiṁ tvaṁ bhītaḥ sahasrākṣa vṛtro'yaṁ ghātitastvayā parivāreṇa sarveṇa vīkṣito'smābhireva ca
देवताओं ने कहा — हे सहस्राक्ष, तुम क्यों भयभीत हो? यह वृत्र तुमने मार डाला है, तुम्हारे सारे परिवार ने तथा हमने भी यह देखा है।
श्लोक 103 (skanda.6.269.103)
अस्मादागच्छ गच्छामो गृहं प्रति पुरंदर कुरु त्रैलोक्यराज्यं त्वं सांप्रतं हतकण्टकम्
asmādāgaccha gacchāmo gṛhaṁ prati puraṁdara kuru trailokyarājyaṁ tvaṁ sāṁprataṁ hatakaṇṭakam
'यहाँ से चलो, हम घर लौटें, हे इन्द्र; अब कंटकरहित त्रैलोक्य-राज्य का शासन करो।'
श्लोक 104 (skanda.6.269.104)
तच्छ्रुत्वाऽथ विनिष्क्रांतो गुल्ममध्याच्छतक्रतुः हृष्टरोमा हतं श्रुत्वा वृत्रं दानवसत्तमम्
tacchrutvā'tha viniṣkrāṁto gulmamadhyācchatakratuḥ hṛṣṭaromā hataṁ śrutvā vṛtraṁ dānavasattamam
यह सुनकर, श्रेष्ठ दानव वृत्र के मारे जाने का समाचार सुन रोमांचित होकर इन्द्र झाड़ी के मध्य से बाहर निकला।
श्लोक 105 (skanda.6.269.105)
अथ पश्यंति यावत्तं देवाः सर्वे शतक्रतुम् तावत्तेजोविहीनं तद्गात्रं दुर्गंधितायुतम्
atha paśyaṁti yāvattaṁ devāḥ sarve śatakratum tāvattejovihīnaṁ tadgātraṁ durgaṁdhitāyutam
किंतु ज्यों ही सभी देवताओं ने इन्द्र को देखा, त्यों ही उसका शरीर तेजरहित और दुर्गंध से युक्त दिखाई दिया।
श्लोक 106 (skanda.6.269.106)
दृष्ट्वा लोकगुरुर्ब्रह्मा देवान्सर्वानुवाच ह शक्रोऽयं सांप्रतं व्याप्तः पापया ब्रह्महत्यया
dṛṣṭvā lokagururbrahmā devānsarvānuvāca ha śakro'yaṁ sāṁprataṁ vyāptaḥ pāpayā brahmahatyayā
यह देखकर लोकगुरु ब्रह्मा ने सभी देवताओं से कहा — 'यह इन्द्र अब पापमयी ब्रह्महत्या से व्याप्त है।'
श्लोक 107 (skanda.6.269.107)
यदनेन हतो वृत्रो ब्रह्मभूतश्छलेन सः तस्मात्त्याज्यः सुदूरेण नो चेत्पापमवाप्स्यथ
yadanena hato vṛtro brahmabhūtaśchalena saḥ tasmāttyājyaḥ sudūreṇa no cetpāpamavāpsyatha
'क्योंकि इसने छल से ब्राह्मण बने वृत्र का वध किया है, अतः इसे दूर से ही त्याग दो, अन्यथा तुम भी पाप के भागी बनोगे।'
श्लोक 108 (skanda.6.269.108)
ब्रह्मघ्नेन समं स्पर्शः संभाषोऽथ विनिर्मितः पापाय जायते पुंसां तस्मात्तं दूरतस्त्यजेत्
brahmaghnena samaṁ sparśaḥ saṁbhāṣo'tha vinirmitaḥ pāpāya jāyate puṁsāṁ tasmāttaṁ dūratastyajet
'ब्रह्महत्यारे का स्पर्श अथवा संभाषण मनुष्यों के लिए पापकारी होता है, इसलिए उसे दूर से ही त्यागना चाहिए।'
श्लोक 109 (skanda.6.269.109)
आस्तां संस्पर्शनं तस्य संभाषो वा विशेषतः दर्शनं वापि तस्याहुः सर्वपापप्रदं नृणाम्
āstāṁ saṁsparśanaṁ tasya saṁbhāṣo vā viśeṣataḥ darśanaṁ vāpi tasyāhuḥ sarvapāpapradaṁ nṛṇām
'उसका स्पर्श और संभाषण तो दूर, कहते हैं उसका दर्शन भी मनुष्यों को सभी पापों से युक्त कर देता है।'
श्लोक 110 (skanda.6.269.110)
सूत उवाच तच्छ्रुत्वा ब्रह्मणो वाक्यं शक्रो दृष्ट्वाऽऽत्मनस्तनुम् तेजसा संपरित्यक्तां दुर्गन्धेन समावृताम्
sūta uvāca tacchrutvā brahmaṇo vākyaṁ śakro dṛṣṭvā''tmanastanum tejasā saṁparityaktāṁ durgandhena samāvṛtām
सूत जी ने कहा — ब्रह्मा के ये वचन सुनकर, इन्द्र ने अपने ही शरीर को तेजरहित तथा दुर्गंध से व्याप्त देखकर...
श्लोक 111 (skanda.6.269.111)
ततः प्रोवाच लोकेशं दीनः प्रणतकन्धरः तवाहं किंकरो देव त्वयेंद्रत्वे नियोजितः
tataḥ provāca lokeśaṁ dīnaḥ praṇatakandharaḥ tavāhaṁ kiṁkaro deva tvayeṁdratve niyojitaḥ
...लोकेश ब्रह्मा से दीन होकर, गर्दन झुकाकर कहा — 'हे देव, मैं आपका सेवक हूँ, आपने ही मुझे इन्द्रपद पर नियुक्त किया है।'
श्लोक 112 (skanda.6.269.112)
तस्मात्कुरु प्रसादं मे ब्रह्महत्याविनाशनम् प्रायश्चित्तं विभो ब्रूहि येन शुद्धिः प्रजायते
tasmātkuru prasādaṁ me brahmahatyāvināśanam prāyaścittaṁ vibho brūhi yena śuddhiḥ prajāyate
'अतः मुझ पर कृपा कर मेरी ब्रह्महत्या का नाश कीजिए; हे विभो, वह प्रायश्चित्त बताइए जिससे शुद्धि प्राप्त हो।'
श्लोक 113 (skanda.6.269.113)
ब्रह्मोवाच अष्टषष्टिषु तीर्थेषु त्वं स्नात्वा बलसूदन आत्मानं हेमजं देहि पापपूरुषसंज्ञितम्
brahmovāca aṣṭaṣaṣṭiṣu tīrtheṣu tvaṁ snātvā balasūdana ātmānaṁ hemajaṁ dehi pāpapūruṣasaṁjñitam
ब्रह्मा ने कहा — हे बलसूदन, अड़सठ तीर्थों में स्नान कर अपना सुवर्णमय पापपुरुष नामक शरीर दान कर।
श्लोक 114 (skanda.6.269.114)
मंत्रवत्तं यथोक्तं च ब्राह्मणाय महात्मने स्नात्वा पुण्यजले तीर्थे ब्रह्मघ्नोऽहमिति ब्रुवन्
maṁtravattaṁ yathoktaṁ ca brāhmaṇāya mahātmane snātvā puṇyajale tīrthe brahmaghno'hamiti bruvan
उसे यथोक्त मंत्रों सहित किसी महात्मा ब्राह्मण को अर्पित कर, पुण्य जल वाले तीर्थ में स्नान कर 'मैं ब्रह्मघाती हूँ' ऐसा कहते हुए...
श्लोक 115 (skanda.6.269.115)
स्नातमात्रस्य ते हस्ताद्यत्र तत्पतति क्षितौ तेजः संजायतेगात्रे दुर्गंधश्च प्रणश्यति
snātamātrasya te hastādyatra tatpatati kṣitau tejaḥ saṁjāyategātre durgaṁdhaśca praṇaśyati
'...जहाँ स्नान करते ही तेरे हाथ से वह पृथ्वी पर गिर पड़े, वहीं तेरे शरीर में तेज उत्पन्न होगा और दुर्गंध नष्ट हो जाएगी।'
श्लोक 116 (skanda.6.269.116)
तस्मिंस्तीर्थे त्वया तच्च स्थाप्यं शक्र कपालकम् महेश्वरस्य नाम्ना च पूजनीयं ततः परम्
tasmiṁstīrthe tvayā tacca sthāpyaṁ śakra kapālakam maheśvarasya nāmnā ca pūjanīyaṁ tataḥ param
'हे इन्द्र, उसी तीर्थ में तुझे वह कपाल स्थापित करना चाहिए और उसके पश्चात उसे महेश्वर के नाम से पूजनीय बनाना चाहिए।'
श्लोक 117 (skanda.6.269.117)
पंचभिर्वक्त्रमंत्रैश्च ततो देयाऽऽत्मतस्तनूः हेमोद्भवा द्विजेन्द्राय ततः शुद्धिमवाप्स्यसि
paṁcabhirvaktramaṁtraiśca tato deyā''tmatastanūḥ hemodbhavā dvijendrāya tataḥ śuddhimavāpsyasi
'तत्पश्चात पाँचों मुख-मंत्रों से अपने सुवर्णमय शरीर को किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को अर्पित करना चाहिए, तभी तुझे शुद्धि प्राप्त होगी।'
श्लोक 118 (skanda.6.269.118)
शक्रस्तु तद्वचः श्रुत्वा ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः कपालं वृत्रजं गृह्य तीर्थयात्रां ततो गतः
śakrastu tadvacaḥ śrutvā brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ kapālaṁ vṛtrajaṁ gṛhya tīrthayātrāṁ tato gataḥ
अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा के इन वचनों को सुनकर इन्द्र वृत्र से उत्पन्न कपाल लेकर तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।
श्लोक 119 (skanda.6.269.119)
अष्टषष्टिषु तीर्थेषु गच्छन्स च सुरेश्वरः हाटकेश्वरजे क्षेत्रे समायातः क्रमेण च
aṣṭaṣaṣṭiṣu tīrtheṣu gacchansa ca sureśvaraḥ hāṭakeśvaraje kṣetre samāyātaḥ krameṇa ca
अड़सठ तीर्थों में जाते हुए वे सुरेश्वर क्रमशः हाटकेश्वर क्षेत्र में आ पहुँचे।
श्लोक 120 (skanda.6.269.120)
विश्वामित्रह्रदे स्नात्वा यावत्तस्माद्विनिर्गतः कपालं पतितं तस्मात्स्वयमेव हतात्मनः
viśvāmitrahrade snātvā yāvattasmādvinirgataḥ kapālaṁ patitaṁ tasmātsvayameva hatātmanaḥ
विश्वामित्र-ह्रद में स्नान कर, ज्यों ही वे उससे बाहर निकले, त्यों ही उस मृत वृत्र का कपाल स्वयं ही हाथ से गिर पड़ा।
श्लोक 121 (skanda.6.269.121)
ततस्तं पूजयामास मन्त्रैर्वक्त्रसमुद्भवैः सर्वपापहरैः पुण्यैर्यथोक्तैर्ब्रह्मणा पुरा
tatastaṁ pūjayāmāsa mantrairvaktrasamudbhavaiḥ sarvapāpaharaiḥ puṇyairyathoktairbrahmaṇā purā
तत्पश्चात उन्होंने पहले ब्रह्मा द्वारा बताए, सर्वपापहारी, पवित्र मुख-मंत्रों से उसकी पूजा की।
श्लोक 122 (skanda.6.269.122)
एतस्मिन्नेव काले तु दुर्गन्धो नाशमाप्तवान् तच्छरीराद्द्विजश्रेष्ठा महत्तेजो व्यजायत
etasminneva kāle tu durgandho nāśamāptavān taccharīrāddvijaśreṣṭhā mahattejo vyajāyata
हे द्विजश्रेष्ठो, उसी क्षण दुर्गंध का नाश हो गया और उसके शरीर से महान तेज प्रकट हुआ।
श्लोक 123 (skanda.6.269.123)
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा सह देवैः समागतः ब्रह्महत्याविमुक्तं तं ज्ञात्वा सर्वसुराधिपम्
etasminnantare brahmā saha devaiḥ samāgataḥ brahmahatyāvimuktaṁ taṁ jñātvā sarvasurādhipam
इसी बीच समस्त सुराधिपति (इन्द्र) को ब्रह्महत्या से मुक्त जानकर ब्रह्मा देवताओं सहित वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 124 (skanda.6.269.124)
श्रीब्रह्मोवाच ब्रह्महत्याकृतो दोषो गतस्ते सुरसत्तम शेषपापविशुद्ध्यर्थं स्वर्णदानं प्रयच्छ भोः
śrībrahmovāca brahmahatyākṛto doṣo gataste surasattama śeṣapāpaviśuddhyarthaṁ svarṇadānaṁ prayaccha bhoḥ
श्री ब्रह्मा ने कहा — हे सुरसत्तम, ब्रह्महत्या से उत्पन्न दोष तेरा दूर हो गया है; शेष पाप की शुद्धि हेतु सुवर्णदान भी कर।
श्लोक 125 (skanda.6.269.125)
कपालमेतद्देशेऽत्र यत्त्वया परिपूजितम् वृत्रस्य पंचभिर्मंत्रैर्हरवक्त्रसमुद्भवैः
kapālametaddeśe'tra yattvayā paripūjitam vṛtrasya paṁcabhirmaṁtrairharavaktrasamudbhavaiḥ
'इस देश में यह जो कपाल तूने हरवक्त्र से उत्पन्न पाँच मंत्रों द्वारा भलीभाँति पूजा है...'
श्लोक 126 (skanda.6.269.126)
प्रदास्यसि ततो भक्त्या हेमजामात्मनस्तनुम् विधिना मंत्रयुक्तेन तव पापं प्रयास्यति यद्यत्पूर्वकृतं कृत्स्नं प्रदाय ब्राह्मणाय भोः
pradāsyasi tato bhaktyā hemajāmātmanastanum vidhinā maṁtrayuktena tava pāpaṁ prayāsyati yadyatpūrvakṛtaṁ kṛtsnaṁ pradāya brāhmaṇāya bhoḥ
'...उसके पश्चात भक्तिपूर्वक अपने सुवर्णमय शरीर का मंत्रयुक्त विधि से दान कर, तेरा पूर्वकृत सम्पूर्ण पाप, ब्राह्मण को अर्पित करते ही, नष्ट हो जाएगा।'
श्लोक 127 (skanda.6.269.127)
एवमुक्तस्ततः शक्रो ब्रह्मणा सुरसंनिधौ तथेत्युक्त्वा तु तत्कालं पापपिंडं निजं ददौ
evamuktastataḥ śakro brahmaṇā surasaṁnidhau tathetyuktvā tu tatkālaṁ pāpapiṁḍaṁ nijaṁ dadau
देवताओं की उपस्थिति में ब्रह्मा द्वारा ऐसा कहे जाने पर इन्द्र ने 'तथास्तु' कहकर उसी समय अपना पापपिंड अर्पित कर दिया।
श्लोक 128 (skanda.6.269.128)
कृत्वा हेममयं विप्रा ब्राह्मणाय महात्मने गर्तातीर्थसमुत्थाय वाताख्यायाहिताग्नये
kṛtvā hemamayaṁ viprā brāhmaṇāya mahātmane gartātīrthasamutthāya vātākhyāyāhitāgnaye
हे विप्रो, उसे सुवर्णमय बनाकर उन्होंने गर्ततीर्थ में उत्पन्न, अग्निहोत्री, वात नामक महात्मा ब्राह्मण को अर्पित किया।
श्लोक 129 (skanda.6.269.129)
एतस्मिन्नंतरे विप्रो गर्हितः सोऽथ नागरैः धिग्धिक्पाप वृथा वेदा ये त्वया पारिताः पुरा
etasminnaṁtare vipro garhitaḥ so'tha nāgaraiḥ dhigdhikpāpa vṛthā vedā ye tvayā pāritāḥ purā
इसी बीच नगरवासियों ने उस विप्र की निंदा की — 'धिक्कार है तुझे, पापी! व्यर्थ थे वे वेद जिन्हें तूने पूर्व में पारंगत किया।'
श्लोक 130 (skanda.6.269.130)
नास्माभिः सह संपर्कं कदाचित्त्वं करिष्यसि गृहीतं यत्त्वया दानं पापपिंडसमुद्भवम्
nāsmābhiḥ saha saṁparkaṁ kadācittvaṁ kariṣyasi gṛhītaṁ yattvayā dānaṁ pāpapiṁḍasamudbhavam
'हम कभी भी तुझसे सम्पर्क नहीं रखेंगे, क्योंकि तूने पापपिंड से उत्पन्न यह दान स्वीकार कर लिया है।'
श्लोक 131 (skanda.6.269.131)
ततः प्रोवाच विप्रः स उपमन्युकुलोद्भवः विवर्णवदनो भूत्वा नाम्ना ख्यातः स वातकः
tataḥ provāca vipraḥ sa upamanyukulodbhavaḥ vivarṇavadano bhūtvā nāmnā khyātaḥ sa vātakaḥ
तब उपमन्यु-कुल में उत्पन्न वह विप्र, जो वातक नाम से विख्यात था, म्लान मुख होकर बोला।
श्लोक 132 (skanda.6.269.132)
त्वया शक्र प्रदत्तो मे पापपिंडः स्वको यतः मया प्रतिग्रहस्तेन दाक्षिण्येन कृतस्तव
tvayā śakra pradatto me pāpapiṁḍaḥ svako yataḥ mayā pratigrahastena dākṣiṇyena kṛtastava
'हे इन्द्र, चूँकि तुमने मुझे अपना पापपिंड दिया, इसलिए मैंने केवल दाक्षिण्यवश ही यह दान स्वीकार किया था।'
श्लोक 133 (skanda.6.269.133)
न लोभेन सुरश्रेष्ठ पश्यतस्ते विगर्हितः अहं च ब्राह्मणैः सर्वैरेतैर्नगरवासिभिः
na lobhena suraśreṣṭha paśyataste vigarhitaḥ ahaṁ ca brāhmaṇaiḥ sarvairetairnagaravāsibhiḥ
'हे सुरश्रेष्ठ, लोभ से नहीं — तुम्हारे ही सामने इन नगरवासी समस्त ब्राह्मणों ने मेरी निंदा की है।'
श्लोक 134 (skanda.6.269.134)
तस्मान्नाहं ग्रहीष्यामि एतं तव प्रतिग्रहम्
tasmānnāhaṁ grahīṣyāmi etaṁ tava pratigraham
'अतः अब मैं तुम्हारा यह दान स्वीकार नहीं करूँगा।'
श्लोक 135 (skanda.6.269.135)
भूयोऽपि तव दास्यामि न त्वं गृह्णासि चेत्पुनः ब्रह्मशापं प्रदास्यामि दारुणं च क्षयात्मकम्
bhūyo'pi tava dāsyāmi na tvaṁ gṛhṇāsi cetpunaḥ brahmaśāpaṁ pradāsyāmi dāruṇaṁ ca kṣayātmakam
(इन्द्र ने कहा) — 'मैं तुम्हें पुनः यह दूँगा; और यदि इस बार भी तुम इसे स्वीकार नहीं करोगे, तो मैं तुम्हें भयंकर, विनाशकारी ब्रह्मशाप दे दूँगा।'
श्लोक 136 (skanda.6.269.136)
इंद्र उवाच वेदागंपारगो विप्रो यदि कुर्यात्प्रतिग्रहम् न स पापेन लिप्येत पद्मपत्रमिवांभसा
iṁdra uvāca vedāgaṁpārago vipro yadi kuryātpratigraham na sa pāpena lipyeta padmapatramivāṁbhasā
इन्द्र ने कहा — यदि वेद-वेदांगपारंगत विप्र दान स्वीकार करे, तो वह पाप से वैसे ही अलिप्त रहता है जैसे कमल-पत्र जल से।
श्लोक 137 (skanda.6.269.137)
तस्मात्ते पातकं नास्ति शृणुष्वात्र वचो मम एतैस्त्वं गर्हिते यस्माद्ब्राह्मणैर्नगरोद्भवैः
tasmātte pātakaṁ nāsti śṛṇuṣvātra vaco mama etaistvaṁ garhite yasmādbrāhmaṇairnagarodbhavaiḥ
'इसलिए तुझे कोई पाप नहीं लगेगा; मेरा यह वचन सुनो — चूँकि इन नगरवासी ब्राह्मणों ने तेरी निंदा की है...'
श्लोक 138 (skanda.6.269.138)
एतेषां सर्वकृत्येषु प्रधानस्त्वं भविष्यसि एतेषां पुत्रपौत्रा ये भविष्यंति तथा तव
eteṣāṁ sarvakṛtyeṣu pradhānastvaṁ bhaviṣyasi eteṣāṁ putrapautrā ye bhaviṣyaṁti tathā tava
'...अतः तू इनके समस्त कार्यों में प्रधान होगा; और जो भी इनके तथा तेरे पुत्र-पौत्र होंगे...'
श्लोक 139 (skanda.6.269.139)
ते सर्वे चाज्ञया तेषां वर्तयिष्यंत्यसंशयम् युष्मद्वाक्यविहीनं यत्कृत्यं स्वल्पमपि द्विज
te sarve cājñayā teṣāṁ vartayiṣyaṁtyasaṁśayam yuṣmadvākyavihīnaṁ yatkṛtyaṁ svalpamapi dvija
'...वे सब निःसंदेह इनकी आज्ञा से ही कार्य करेंगे। हे द्विज, तुम्हारे परिवार की सम्मति के बिना किया गया कोई भी, चाहे छोटा भी, कार्य...'
श्लोक 140 (skanda.6.269.140)
तेषां संपत्स्यते वन्ध्यं यथा भस्महुतं तथा कपालमोचनं नाम ख्यातमेतद्भविष्यति
teṣāṁ saṁpatsyate vandhyaṁ yathā bhasmahutaṁ tathā kapālamocanaṁ nāma khyātametadbhaviṣyati
'...उनके लिए वैसे ही वंध्य (निष्फल) हो जाएगा जैसे राख में डाली गई आहुति। और यह तीर्थ 'कपालमोचन' नाम से विख्यात होगा।'
श्लोक 141 (skanda.6.269.141)
ये तु संस्मृत्य मनुजाः कपालं मम सद्द्विज तत्र श्राद्धं करिष्यंति ते नरा मुक्तिसंयुताः श्राद्धपक्षे विशेषेण प्रयास्यंति परांगतिम्
ye tu saṁsmṛtya manujāḥ kapālaṁ mama saddvija tatra śrāddhaṁ kariṣyaṁti te narā muktisaṁyutāḥ śrāddhapakṣe viśeṣeṇa prayāsyaṁti parāṁgatim
'हे सद्द्विज, जो मनुष्य मेरे इस कपाल का स्मरण कर वहाँ श्राद्ध करेंगे, वे मुक्ति को प्राप्त होंगे; श्राद्धपक्ष में विशेष रूप से वे परम गति को प्राप्त करेंगे।'
श्लोक 142 (skanda.6.269.142)
स्थानबाह्यद्विजातीनां कुले दारपरिग्रहम् कृत्वा त्वद्गोत्रसंभूता ब्राह्मणा मत्प्रसादतः
sthānabāhyadvijātīnāṁ kule dāraparigraham kṛtvā tvadgotrasaṁbhūtā brāhmaṇā matprasādataḥ
'तेरे गोत्र में उत्पन्न ब्राह्मण, इस स्थान से बाहर के द्विजातियों के कुल में विवाह कर, मेरे प्रसाद से...'
श्लोक 143 (skanda.6.269.143)
व्यवहार्या भविष्यंति नगरे सर्वकर्मसु एवमुक्त्वा सहस्राक्षस्ततश्चादर्शनं गतः
vyavahāryā bhaviṣyaṁti nagare sarvakarmasu evamuktvā sahasrākṣastataścādarśanaṁ gataḥ
'...नगर के समस्त कार्यों में व्यवहार्य होंगे।' ऐसा कहकर सहस्राक्ष इन्द्र वहाँ से अंतर्धान हो गए।
श्लोक 144 (skanda.6.269.144)
वातोपि तेन वित्तेन प्रतिग्रहकृतेन च चकार तत्र प्रासादं देवदेवस्य शूलिनः
vātopi tena vittena pratigrahakṛtena ca cakāra tatra prāsādaṁ devadevasya śūlinaḥ
उस दान से प्राप्त धन से वात ने भी वहाँ शूलधारी देवाधिदेव का भव्य मंदिर बनवाया।
श्लोक 145 (skanda.6.269.145)
ततः प्रोवाच शक्रस्तान्ब्राह्मणान्नगरोद्भवान् कपालमोचने स्नात्वा यो देवं ह्यर्चयिष्यति
tataḥ provāca śakrastānbrāhmaṇānnagarodbhavān kapālamocane snātvā yo devaṁ hyarcayiṣyati
तत्पश्चात इन्द्र ने उन नगरवासी ब्राह्मणों से कहा — 'जो भी कपालमोचन में स्नान कर इस देव की पूजा करेगा...'
श्लोक 146 (skanda.6.269.146)
ब्रह्महत्योद्भवं पापं तस्य नश्यत्यसंशयम् महापातकयुक्तो वा विपाप्मा संभविष्यति
brahmahatyodbhavaṁ pāpaṁ tasya naśyatyasaṁśayam mahāpātakayukto vā vipāpmā saṁbhaviṣyati
'...उसकी ब्रह्महत्याजनित पाप निःसंदेह नष्ट हो जाएगी; महापातकी भी निष्पाप हो जाएगा।'
श्लोक 147 (skanda.6.269.147)
स तथेति प्रतिज्ञाय ब्राह्मणान्नगरोद्भवान् तत्रैव स्वाश्रमं कृत्वा पूजयामास शंकरम्
sa tatheti pratijñāya brāhmaṇānnagarodbhavān tatraiva svāśramaṁ kṛtvā pūjayāmāsa śaṁkaram
नगरवासी ब्राह्मणों को यह प्रतिज्ञा देकर वात ने वहीं अपना आश्रम बनाकर शंकर की पूजा की।
श्लोक 148 (skanda.6.269.148)
ततःप्रभृति यत्किंचित्तेषां कृत्यं प्रजायते तद्वाक्येन प्रकुर्वंति तत्र ये नागरः स्थिताः
tataḥprabhṛti yatkiṁcitteṣāṁ kṛtyaṁ prajāyate tadvākyena prakurvaṁti tatra ye nāgaraḥ sthitāḥ
तब से जो भी उन (ब्राह्मणों) का कोई कार्य होता है, वहाँ रहने वाले नगरवासी उनके ही निर्देश से उसे सम्पन्न करते हैं।
श्लोक 149 (skanda.6.269.149)
एतस्मात्कारणाज्जातो मध्यगो द्वितीयस्त्विह
etasmātkāraṇājjāto madhyago dvitīyastviha
इसी कारण से यहाँ दूसरा, मध्यवर्ती लिंग उत्पन्न हुआ।
श्लोक 150 (skanda.6.269.150)
एतद्वः सर्वमाख्यातमाख्यानं पापनाशनम् कपालेश्वरदेवस्य शृण्वतां पठतां नृणाम्
etadvaḥ sarvamākhyātamākhyānaṁ pāpanāśanam kapāleśvaradevasya śṛṇvatāṁ paṭhatāṁ nṛṇām
यह पापनाशक आख्यान — कपालेश्वर देव का — तुम्हें सम्पूर्ण रूप से सुनाया गया; जो मनुष्य इसे सुनते या पढ़ते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 151 (skanda.6.269.151)
यथा देवेश्वरस्यात्र पापं नष्टं महात्मनः ब्रह्महत्या यथा नष्टा तस्मिंस्तीर्थे द्विजोत्तमाः
yathā deveśvarasyātra pāpaṁ naṣṭaṁ mahātmanaḥ brahmahatyā yathā naṣṭā tasmiṁstīrthe dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, जिस प्रकार यहाँ महात्मा देवेश्वर का पाप नष्ट हुआ, जिस प्रकार उस तीर्थ में उनकी ब्रह्महत्या नष्ट हुई, उसी प्रकार श्रोता का पाप भी नष्ट हो जाता है।