नागर खण्ड · अध्याय 270
कपालेश्वर में पापपिंडदान की विधि
श्लोक 1 (skanda.6.270.1)
आनर्त उवाच मूर्खत्वाद्वा प्रमादाद्वा कामाद्बालस्यतोऽपि वा यो नरः कुरुते पापं प्रायश्चित्तं करोति न
ānarta uvāca mūrkhatvādvā pramādādvā kāmādbālasyato'pi vā yo naraḥ kurute pāpaṁ prāyaścittaṁ karoti na
आनर्त ने कहा — जो मनुष्य मूर्खता से, प्रमाद से, काम-वासना से अथवा बालपन के कारण पाप करता है और उसका प्रायश्चित्त नहीं करता...
श्लोक 2 (skanda.6.270.2)
तस्य पापक्षयकरं पुण्यं ब्रूहि द्विजोत्तम येन मुक्तिर्भवेत्सद्यो यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो
tasya pāpakṣayakaraṁ puṇyaṁ brūhi dvijottama yena muktirbhavetsadyo yadi tuṣṭo'si me prabho
...हे द्विजोत्तम, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो उसके पाप का नाश करने वाला वह पुण्य-कर्म बताइए, जिससे उसे तत्काल मुक्ति प्राप्त हो।
श्लोक 3 (skanda.6.270.3)
लोभमोहपरो योऽसौ पापपिंडं महामुने प्रददाति विधिं ब्रूहि येन यच्छाम्यहं द्रुतम्
lobhamohaparo yo'sau pāpapiṁḍaṁ mahāmune pradadāti vidhiṁ brūhi yena yacchāmyahaṁ drutam
हे महामुने, जो लोभ और मोह से युक्त होकर पापपिंड का दान करता है, उसकी विधि बताइए, जिससे मैं भी शीघ्र वह दान करूँ।
श्लोक 4 (skanda.6.270.4)
भर्तृयज्ञ उवाच दद्यात्स्वपिंडं सौवर्णं पंचविंशत्पलात्मकम्
bhartṛyajña uvāca dadyātsvapiṁḍaṁ sauvarṇaṁ paṁcaviṁśatpalātmakam
भर्तृयज्ञ ने कहा — पच्चीस पल परिमाण का अपना सुवर्णमय पिंड दान करना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.6.270.5)
विधायापरपक्षे तु स्नापयित्वा विधानतः मंडपाद्यं च प्राक्कृत्वा स्नात्वा धौतांबरः शुचिः
vidhāyāparapakṣe tu snāpayitvā vidhānataḥ maṁḍapādyaṁ ca prākkṛtvā snātvā dhautāṁbaraḥ śuciḥ
कृष्णपक्ष में विधिपूर्वक उसे स्नान कराकर, पहले मंडप आदि तैयार कर, स्वयं स्नान कर, धुले वस्त्र पहनकर, शुद्ध होकर...
श्लोक 6 (skanda.6.270.6)
तदा स्वरूपं पृथ्व्यादि पूजयेत्पापकृन्नरः तथा स मुच्यते पापात्तत्कृताद्धि न संशयः
tadā svarūpaṁ pṛthvyādi pūjayetpāpakṛnnaraḥ tathā sa mucyate pāpāttatkṛtāddhi na saṁśayaḥ
...तब पापकर्ता मनुष्य उस मूर्ति को पृथ्वी आदि स्वरूपों में पूजे; इस प्रकार वह अपने किए हुए पाप से निःसंदेह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 7 (skanda.6.270.7)
चतुर्विंशतितत्त्वानि पृथिव्यादीनि यानि च तेषां नामभिस्तत्पिंडं पूजयेतन्नराधिपः
caturviṁśatitattvāni pṛthivyādīni yāni ca teṣāṁ nāmabhistatpiṁḍaṁ pūjayetannarādhipaḥ
हे नराधिप, पृथ्वी आदि जो चौबीस तत्त्व हैं, उन्हीं के नामों से उस पिंड की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 8 (skanda.6.270.8)
ॐ पृथिव्यै नमः ॐ अद्भ्यो नमः ॐ तेजसे नमः ॐ वायवे नमः ॐ आकाशाय नमः ॐ घ्राणाय नमः ॐ जिह्वायै नमः ॐ चक्षुषे नमः ॐ त्वचे नमः ॐ श्रोत्राय नमः ॐ गन्धाय नमः ॐ रसाय नमः ॐ रूपाय नमः ॐ स्पर्शाय नमः ॐ शब्दाय नमः ॐ वाचे नमः ॐ पाणिभ्यां नमः ॐ पादाभ्यां नमः ॐ पायवे नमः ॐ उपस्थाय नमः ॐ मनसे नमः ॐ बुद्ध्यै नमः ॐ चित्ताय नमः ॐ अहंकाराय नमः ॐ क्षेत्रात्मने नमः ॐ परमात्मने नमः धूपं धूरसि मंत्रेण अग्निर्ज्योतीति दीपकम् युवा सुवासेति च ततो वासांसि परिधापयेत्
oṁ pṛthivyai namaḥ oṁ adbhyo namaḥ oṁ tejase namaḥ oṁ vāyave namaḥ oṁ ākāśāya namaḥ oṁ ghrāṇāya namaḥ oṁ jihvāyai namaḥ oṁ cakṣuṣe namaḥ oṁ tvace namaḥ oṁ śrotrāya namaḥ oṁ gandhāya namaḥ oṁ rasāya namaḥ oṁ rūpāya namaḥ oṁ sparśāya namaḥ oṁ śabdāya namaḥ oṁ vāce namaḥ oṁ pāṇibhyāṁ namaḥ oṁ pādābhyāṁ namaḥ oṁ pāyave namaḥ oṁ upasthāya namaḥ oṁ manase namaḥ oṁ buddhyai namaḥ oṁ cittāya namaḥ oṁ ahaṁkārāya namaḥ oṁ kṣetrātmane namaḥ oṁ paramātmane namaḥ dhūpaṁ dhūrasi maṁtreṇa agnirjyotīti dīpakam yuvā suvāseti ca tato vāsāṁsi paridhāpayet
ॐ पृथ्वी को नमस्कार। ॐ जल को नमस्कार। ॐ तेज को नमस्कार। ॐ वायु को नमस्कार। ॐ आकाश को नमस्कार। ॐ घ्राण को नमस्कार। ॐ जिह्वा को नमस्कार। ॐ नेत्र को नमस्कार। ॐ त्वचा को नमस्कार। ॐ श्रोत्र को नमस्कार। ॐ गंध को नमस्कार। ॐ रस को नमस्कार। ॐ रूप को नमस्कार। ॐ स्पर्श को नमस्कार। ॐ शब्द को नमस्कार। ॐ वाणी को नमस्कार। ॐ दोनों हाथों को नमस्कार। ॐ दोनों पैरों को नमस्कार। ॐ मलेन्द्रिय को नमस्कार। ॐ जननेन्द्रिय को नमस्कार। ॐ मन को नमस्कार। ॐ बुद्धि को नमस्कार। ॐ चित्त को नमस्कार। ॐ अहंकार को नमस्कार। ॐ क्षेत्रात्मा को नमस्कार। ॐ परमात्मा को नमस्कार। 'धूरसि' मंत्र से धूप अर्पित करे, 'अग्निर्ज्योतिः' मंत्र से दीपक, तथा 'युवा सुवासा' मंत्र से तत्पश्चात वस्त्र धारण कराए।
श्लोक 9 (skanda.6.270.9)
ततो ब्राह्मणमानीय वेदवेदांगपारगम् प्रक्षाल्य चरणौ तस्य वासांसि परिधापयेत्
tato brāhmaṇamānīya vedavedāṁgapāragam prakṣālya caraṇau tasya vāsāṁsi paridhāpayet
तत्पश्चात वेद-वेदांगपारंगत ब्राह्मण को बुलाकर, उसके चरण धोकर, उसे वस्त्र पहनाए।
श्लोक 10 (skanda.6.270.10)
केयूरैः कंकणैश्चैव अंगुलीयकभूषणैः
keyūraiḥ kaṁkaṇaiścaiva aṁgulīyakabhūṣaṇaiḥ
केयूर, कंकण तथा अंगूठियों जैसे आभूषणों से।
श्लोक 11 (skanda.6.270.11)
भूषयित्वा तनुं तस्य ततो मूर्तिं समानयेत् मंत्रेणानेन राजेंद्र ब्राह्मणाय निवेदयेत्
bhūṣayitvā tanuṁ tasya tato mūrtiṁ samānayet maṁtreṇānena rājeṁdra brāhmaṇāya nivedayet
इस प्रकार उसके शरीर को अलंकृत कर, तत्पश्चात वह मूर्ति लाकर, हे राजेन्द्र, इस मंत्र के साथ ब्राह्मण को निवेदित करे।
श्लोक 12 (skanda.6.270.12)
एष आत्मा मया दत्तस्तव हेममयो द्विज यत्किंचिद्विहितं पापं पूर्वं भूयात्तवाखिलम्
eṣa ātmā mayā dattastava hemamayo dvija yatkiṁcidvihitaṁ pāpaṁ pūrvaṁ bhūyāttavākhilam
'हे द्विज, यह सुवर्णमय आत्मा मैंने तुझे दान किया है; पूर्व में मुझसे जो भी पाप हुआ हो, वह सब अब इसी में समाहित हो जाए।'
श्लोक 13 (skanda.6.270.13)
इति दानमंत्रः ततस्तु ब्राह्मणो राजन्मंत्रमेतं समुच्चरेत्
iti dānamaṁtraḥ tatastu brāhmaṇo rājanmaṁtrametaṁ samuccaret
यह दान-मंत्र है। तत्पश्चात, हे राजन्, ब्राह्मण इस मंत्र का उच्चारण करे।
श्लोक 14 (skanda.6.270.14)
यत्किंचिद्विहितं पापं त्वया पूर्वंमया हि तत् गृहीतं मूर्तिरूपं तत्ततस्त्वं पापवर्जितः इति प्रतिग्रहमंत्रः
yatkiṁcidvihitaṁ pāpaṁ tvayā pūrvaṁmayā hi tat gṛhītaṁ mūrtirūpaṁ tattatastvaṁ pāpavarjitaḥ iti pratigrahamaṁtraḥ
'तुमसे पूर्व में जो भी पाप हुआ हो, वह इस मूर्ति के रूप में अब मेरे द्वारा ग्रहण कर लिया गया; अतः अब तुम पापरहित हो।' यह प्रतिग्रह-मंत्र है।
श्लोक 15 (skanda.6.270.15)
एवं दत्त्वा विधानेन ततो विप्रं विसर्जयेत् एवं कृते ततो राजंस्तस्मै दत्त्वाथ दक्षिणाम्
evaṁ dattvā vidhānena tato vipraṁ visarjayet evaṁ kṛte tato rājaṁstasmai dattvātha dakṣiṇām
इस प्रकार विधिपूर्वक दान कर तत्पश्चात ब्राह्मण को विदा करे; हे राजन्, ऐसा करने के पश्चात उसे दक्षिणा देकर...
श्लोक 16 (skanda.6.270.16)
यथा तुष्टिं समभ्येति ततः पापं नयत्यसौ तस्मिन्कृते महाराज प्रत्ययस्तत्क्षणाद्भवेत्
yathā tuṣṭiṁ samabhyeti tataḥ pāpaṁ nayatyasau tasminkṛte mahārāja pratyayastatkṣaṇādbhavet
...जिससे वह संतुष्ट हो जाए — तभी वह ब्राह्मण उस पाप को अपने साथ ले जाता है। हे महाराज, ऐसा करने पर उसी क्षण उसकी प्रतीति (प्रमाण) मिल जाती है।
श्लोक 17 (skanda.6.270.17)
शरीरं लघुतामेति तेजोवृद्धिश्च जायते स्वप्ने च वीक्षते रात्रौ संतुष्टमनसः स्थितान्
śarīraṁ laghutāmeti tejovṛddhiśca jāyate svapne ca vīkṣate rātrau saṁtuṣṭamanasaḥ sthitān
शरीर हल्का हो जाता है और तेज की वृद्धि होती है; तथा रात्रि में स्वप्न में संतुष्टचित्त पुरुषों को देखता है...
श्लोक 18 (skanda.6.270.18)
नरान्स्त्रियः सितैर्वस्त्रैः श्वेतमाल्यानुलेपनैः श्वेतान्गोवृषभानश्वांस्तीर्थानि विविधानि च
narānstriyaḥ sitairvastraiḥ śvetamālyānulepanaiḥ śvetāngovṛṣabhānaśvāṁstīrthāni vividhāni ca
...पुरुषों और स्त्रियों को श्वेत वस्त्रों, श्वेत माला-अनुलेपन से युक्त, श्वेत गौओं, बैलों, घोड़ों तथा विविध तीर्थों को।
श्लोक 19 (skanda.6.270.19)
एतत्ते सर्वमाख्यातं पापपिंडस्य दापनम् श्रवणादपि राजेंद्र यस्य पापैः प्रमुच्यते
etatte sarvamākhyātaṁ pāpapiṁḍasya dāpanam śravaṇādapi rājeṁdra yasya pāpaiḥ pramucyate
हे राजेन्द्र, इस प्रकार तुम्हें पापपिंड-दान की सम्पूर्ण विधि बताई गई, जिसके केवल श्रवण मात्र से भी मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 20 (skanda.6.270.20)
अन्यत्रापि महादानं पापपिण्डो हरेन्नृप
anyatrāpi mahādānaṁ pāpapiṇḍo harennṛpa
हे नृप, अन्यत्र भी यह महादान पापपिंड को हर लेता है।
श्लोक 21 (skanda.6.270.21)
एकजन्मकृतं पापं निजकायेन निर्मितम् कपालेश्वरदेवस्य सहस्रगुणितं हरेत्
ekajanmakṛtaṁ pāpaṁ nijakāyena nirmitam kapāleśvaradevasya sahasraguṇitaṁ haret
एक जन्म में अपने शरीर से किया गया पाप कपालेश्वर देव के समक्ष यह दान करने से सहस्रगुणित होकर नष्ट होता है।
श्लोक 22 (skanda.6.270.22)
पूर्ववच्चैव कर्तव्यो वेदिमंडपयोर्विधिः परं होमः प्रकर्तव्यो गायत्र्या केवलं नृप
pūrvavaccaiva kartavyo vedimaṁḍapayorvidhiḥ paraṁ homaḥ prakartavyo gāyatryā kevalaṁ nṛpa
वेदी और मंडप की विधि पूर्ववत् ही करनी चाहिए; हे नृप, केवल हवन गायत्री मंत्र से ही करना चाहिए।