नागर खण्ड · अध्याय 271
हाटकेश्वर में सप्तलिंग की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.6.271.1)
सूत उवाच अथान्यदपि तत्रास्ति सुपुण्यं लिंगसप्तकम् येनार्चितेन दृष्टेन पूजितेन विशेषतः
sūta uvāca athānyadapi tatrāsti supuṇyaṁ liṁgasaptakam yenārcitena dṛṣṭena pūjitena viśeṣataḥ
सूत जी ने कहा — अब वहाँ एक और अत्यंत पुण्यमय सप्तलिंग हैं, जिनकी अर्चना, दर्शन और विशेष रूप से पूजा करने से...
श्लोक 2 (skanda.6.271.2)
दीर्घायुर्जायते मर्त्यः सर्वरोगविवर्जितः मार्कण्डेश्वर इत्युक्तस्तत्र देवो महेश्वरः
dīrghāyurjāyate martyaḥ sarvarogavivarjitaḥ mārkaṇḍeśvara ityuktastatra devo maheśvaraḥ
...मनुष्य दीर्घायु और समस्त रोगों से रहित हो जाता है। वहाँ मार्कण्डेश्वर नामक महेश्वर देव विराजमान हैं।
श्लोक 3 (skanda.6.271.3)
इन्द्रद्युम्नेश्वरोऽन्यस्तु सर्वपापहरो हरः पालेश्वरस्तथा चैव सर्वव्याधिविनाशनः
indradyumneśvaro'nyastu sarvapāpaharo haraḥ pāleśvarastathā caiva sarvavyādhivināśanaḥ
दूसरे हैं इन्द्रद्युम्नेश्वर, समस्त पापों के हारी हर; तथा तीसरे पालेश्वर, जो समस्त व्याधियों का नाश करने वाले हैं।
श्लोक 4 (skanda.6.271.4)
ततो घंटशिवः ख्यातो यो घंटेन प्रतिष्ठितः कलशेश्वरसंज्ञस्तु वानरेश्वरसंयुतः
tato ghaṁṭaśivaḥ khyāto yo ghaṁṭena pratiṣṭhitaḥ kalaśeśvarasaṁjñastu vānareśvarasaṁyutaḥ
फिर घंटशिव प्रसिद्ध हैं, जो घंट नामक के द्वारा स्थापित किए गए; तथा कलशेश्वर नामक, वानरेश्वर सहित।
श्लोक 5 (skanda.6.271.5)
ईशान शिव इत्युक्तस्तत्र क्षेत्रेश्वरेश्वरः पूजितो मानवैर्भक्त्या कामान्यच्छत्यमानुषान्
īśāna śiva ityuktastatra kṣetreśvareśvaraḥ pūjito mānavairbhaktyā kāmānyacchatyamānuṣān
वहाँ ईशान शिव कहलाने वाले क्षेत्रेश्वरेश्वर हैं, जो मनुष्यों द्वारा भक्तिपूर्वक पूजित होने पर अमानुष कामनाएँ भी पूर्ण करते हैं...
श्लोक 6 (skanda.6.271.6)
वांछितान्मनसा सर्वान्कलिकालेऽपि संस्थिते
vāṁchitānmanasā sarvānkalikāle'pi saṁsthite
...मन से इच्छित समस्त कामनाएँ, कलिकाल में भी।
श्लोक 7 (skanda.6.271.7)
ऋषय ऊचुः कोऽयं मार्कंडसंज्ञस्तु येन लिंगं प्रतिष्ठितम् इन्द्रद्युम्नो महीपालः कतमो वद सूतज
ṛṣaya ūcuḥ ko'yaṁ mārkaṁḍasaṁjñastu yena liṁgaṁ pratiṣṭhitam indradyumno mahīpālaḥ katamo vada sūtaja
ऋषियों ने कहा — यह मार्कण्ड नामक कौन है, जिसके द्वारा लिंग प्रतिष्ठित हुआ? इन्द्रद्युम्न महीपाल कौन थे? हे सूतनन्दन, बताइए।
श्लोक 8 (skanda.6.271.8)
तथा पालकनामा च येनायं स्थापितो हरः तथा यो घण्टसंज्ञस्तु कस्मिञ्जातः स चान्वये
tathā pālakanāmā ca yenāyaṁ sthāpito haraḥ tathā yo ghaṇṭasaṁjñastu kasmiñjātaḥ sa cānvaye
तथा पालक नामक कौन थे जिनके द्वारा यह हर स्थापित हुए? घण्ट नामक किस वंश में उत्पन्न हुए?
श्लोक 9 (skanda.6.271.9)
कलशाख्यस्तु यः ख्यातो वानरेण समन्वितः ईशानोप्यखिलं ब्रूहि परं नःकौतुकं स्थितम्
kalaśākhyastu yaḥ khyāto vānareṇa samanvitaḥ īśānopyakhilaṁ brūhi paraṁ naḥkautukaṁ sthitam
वानर सहित प्रसिद्ध कलश नामक कौन हैं, तथा ईशान भी — यह सब हमें बताइए, हमें अत्यंत कौतूहल है।
श्लोक 10 (skanda.6.271.10)
यतोऽत्र जायते श्रेयः पुनः पुंसां प्रकीर्तय यैरेतैः स्थापिता देवाः क्षेत्रेऽस्मिन्मानवोत्तमैः
yato'tra jāyate śreyaḥ punaḥ puṁsāṁ prakīrtaya yairetaiḥ sthāpitā devāḥ kṣetre'sminmānavottamaiḥ
जिससे यहाँ पुनः मनुष्यों का कल्याण होता है, वह बताइए, तथा यह भी कि इन उत्तम मानवों ने इन देवों को कैसे स्थापित किया।
श्लोक 11 (skanda.6.271.11)
तथा तेषां समाचारं प्रभावं चैव सूतज दानं वापि यथाकालं मंत्रांश्च विस्तराद्वद
tathā teṣāṁ samācāraṁ prabhāvaṁ caiva sūtaja dānaṁ vāpi yathākālaṁ maṁtrāṁśca vistarādvada
हे सूतनन्दन, उनके आचरण, प्रभाव, यथासमय किए जाने वाले दान तथा मंत्रों को भी विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 12 (skanda.6.271.12)
सूत उवाच अहं वः कीर्तयिष्यामि कथामेतां पुरातनीम् कथितां भर्तृयज्ञेन आनर्ताधिपतेः स्वयम्
sūta uvāca ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi kathāmetāṁ purātanīm kathitāṁ bhartṛyajñena ānartādhipateḥ svayam
सूत जी ने कहा — मैं तुम्हें यह प्राचीन कथा सुनाता हूँ, जो भर्तृयज्ञ ने स्वयं आनर्ताधिपति से कही थी।
श्लोक 13 (skanda.6.271.13)
श्रुतयापि यया मर्त्यो दीर्घायुर्जायतेनरः नापमृत्युमवाप्नोति कथंचित्तत्प्रभावतः
śrutayāpi yayā martyo dīrghāyurjāyatenaraḥ nāpamṛtyumavāpnoti kathaṁcittatprabhāvataḥ
जिसके केवल श्रवण मात्र से भी मनुष्य दीर्घायु होता है, तथा उसके प्रभाव से किसी प्रकार अपमृत्यु को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 14 (skanda.6.271.14)
यो मार्कंड इति ख्यातः प्रथमं परिकीर्तितः संभूतिस्तस्य संप्रोक्ता युष्माकं पापनाशिनी
yo mārkaṁḍa iti khyātaḥ prathamaṁ parikīrtitaḥ saṁbhūtistasya saṁproktā yuṣmākaṁ pāpanāśinī
जो पहले मार्कण्ड नाम से प्रसिद्ध हुए, उनकी पापनाशक उत्पत्ति अब तुम्हें बताई जाती है।
श्लोक 15 (skanda.6.271.15)
इंद्रद्युम्नं प्रवक्ष्यामि सांप्रतं मुनिसत्तमाः यद्वंशो यत्प्रभावश्च सर्वभूपालमानितः
iṁdradyumnaṁ pravakṣyāmi sāṁprataṁ munisattamāḥ yadvaṁśo yatprabhāvaśca sarvabhūpālamānitaḥ
हे मुनिसत्तमो, अब मैं इन्द्रद्युम्न का वर्णन करता हूँ — उनका वंश, उनका प्रभाव, जिनका समस्त राजाओं ने सम्मान किया।
श्लोक 16 (skanda.6.271.16)
इंद्रद्युम्नो महीपाल आसीत्पूर्वं द्विजोत्तमाः ब्राह्मण्यश्च शरण्यश्च साधुलोकप्रपालकः यज्वा दानपतिर्दक्षः सर्वभूतहिते रतः
iṁdradyumno mahīpāla āsītpūrvaṁ dvijottamāḥ brāhmaṇyaśca śaraṇyaśca sādhulokaprapālakaḥ yajvā dānapatirdakṣaḥ sarvabhūtahite rataḥ
हे द्विजोत्तमो, पूर्वकाल में इन्द्रद्युम्न नामक राजा थे — ब्राह्मणप्रिय, शरणदाता, साधुजनों के रक्षक, यज्ञकर्ता, दानपतियों में दक्ष, तथा सर्वभूतों के हित में रत।
श्लोक 17 (skanda.6.271.17)
न दुर्भिक्षं न च व्याधिर्न च चौरकृतं भयम् तस्मिञ्छासति धर्मज्ञे आसील्लोकस्य कस्यचित्
na durbhikṣaṁ na ca vyādhirna ca caurakṛtaṁ bhayam tasmiñchāsati dharmajñe āsīllokasya kasyacit
उस धर्मज्ञ राजा के शासनकाल में न तो दुर्भिक्ष था, न व्याधि, न ही चोरों से उत्पन्न कोई भय था।
श्लोक 18 (skanda.6.271.18)
यथैव वर्षतो धारा यथा वा दिवि तारकाः गंगायां सिकता यद्वत्संख्यया परिवर्जिताः
yathaiva varṣato dhārā yathā vā divi tārakāḥ gaṁgāyāṁ sikatā yadvatsaṁkhyayā parivarjitāḥ
जैसे वर्षा की धाराएँ, आकाश के तारे, अथवा गंगा की बालू गिनती से परे हैं...
श्लोक 19 (skanda.6.271.19)
तद्वत्तेन कृता यज्ञाः सर्वे संपूर्णदक्षिणाः अग्निष्टोमोऽतिरात्रश्च उक्थः षोडशिकास्तथा
tadvattena kṛtā yajñāḥ sarve saṁpūrṇadakṣiṇāḥ agniṣṭomo'tirātraśca ukthaḥ ṣoḍaśikāstathā
...वैसे ही उनके द्वारा किए गए संपूर्ण-दक्षिणा वाले यज्ञ गणना से परे थे — अग्निष्टोम, अतिरात्र, उक्थ तथा षोडशी।
श्लोक 20 (skanda.6.271.20)
सौत्रामण्याऽथ पशवश्चातुर्मास्या द्विजोत्तमाः वाजपेयाश्वमेधाश्च राजसूया विशेषतः
sautrāmaṇyā'tha paśavaścāturmāsyā dvijottamāḥ vājapeyāśvamedhāśca rājasūyā viśeṣataḥ
हे द्विजोत्तमो, सौत्रामणी, पशुयज्ञ, चातुर्मास्य, वाजपेय, अश्वमेध तथा विशेष रूप से राजसूय...
श्लोक 21 (skanda.6.271.21)
पौण्डरीकास्तथैवान्ये श्रद्धापूतेन चेतसा
pauṇḍarīkāstathaivānye śraddhāpūtena cetasā
...तथा पौण्डरीक आदि अन्य यज्ञ भी, श्रद्धा से पवित्र मन के साथ सम्पन्न किए।
श्लोक 22 (skanda.6.271.22)
तेन दानानि दत्तानि तीर्थेषु च विशेषतः मिष्टान्नानि द्विजेंद्राणां दक्षिणासहितानि च
tena dānāni dattāni tīrtheṣu ca viśeṣataḥ miṣṭānnāni dvijeṁdrāṇāṁ dakṣiṇāsahitāni ca
उनके द्वारा तीर्थों में विशेष रूप से दान दिए गए — द्विजेन्द्रों को मिष्टान्न, दक्षिणा सहित।
श्लोक 23 (skanda.6.271.23)
न तदस्ति धरापृष्ठे नगरं पत्तनं तथा तीर्थं वा यत्र नो तस्य विद्यते त्रिदशालयः
na tadasti dharāpṛṣṭhe nagaraṁ pattanaṁ tathā tīrthaṁ vā yatra no tasya vidyate tridaśālayaḥ
पृथ्वी पर कोई ऐसा नगर, पत्तन अथवा तीर्थ नहीं है जहाँ उनका बनवाया देवालय न हो।
श्लोक 24 (skanda.6.271.24)
तेन कन्यासहस्राणि अच्युतान्यर्बुदानि च ब्राहमणेभ्यः प्रदत्तानि ब्राह्मणानां धनार्थिनाम्
tena kanyāsahasrāṇi acyutānyarbudāni ca brāhamaṇebhyaḥ pradattāni brāhmaṇānāṁ dhanārthinām
उनके द्वारा धनार्थी ब्राह्मणों को हजारों-करोड़ों कन्याएँ अविचल भाव से (दहेज सहित) प्रदान की गईं।
श्लोक 25 (skanda.6.271.25)
दशमीदिवसे तस्य रात्रौ च गजपृष्ठिगः दुन्दुभिस्ताड्यमानस्तु बभ्राम सकलं पुरम्
daśamīdivase tasya rātrau ca gajapṛṣṭhigaḥ dundubhistāḍyamānastu babhrāma sakalaṁ puram
दशमी के दिन, रात्रि में, हाथी की पीठ पर बैठकर, दुन्दुभि बजाते हुए वे सम्पूर्ण नगर में घूमते थे।
श्लोक 26 (skanda.6.271.26)
प्रत्यूषे वैष्णवं भावि पापहारि च वासरम् उपवासः प्रकर्त्तव्यो मुक्त्वा वृद्धं च बालकम् अन्यथा निग्रहिष्यामि भोजनं यः करिष्यति
pratyūṣe vaiṣṇavaṁ bhāvi pāpahāri ca vāsaram upavāsaḥ prakarttavyo muktvā vṛddhaṁ ca bālakam anyathā nigrahiṣyāmi bhojanaṁ yaḥ kariṣyati
(उन्होंने घोषणा की —) 'प्रातःकाल पापनाशक वैष्णव दिवस आएगा; वृद्ध और बालक को छोड़कर सबको उपवास करना होगा; अन्यथा जो भोजन करेगा, उसे मैं दंडित करूँगा।'
श्लोक 27 (skanda.6.271.27)
इंद्रद्युम्नः स राजर्षिस्तदा विष्णोः प्रसादतः तेनैव स्वशरीरेण ब्रह्मलोकं तदा गतः
iṁdradyumnaḥ sa rājarṣistadā viṣṇoḥ prasādataḥ tenaiva svaśarīreṇa brahmalokaṁ tadā gataḥ
वे राजर्षि इन्द्रद्युम्न तब विष्णु की कृपा से उसी शरीर के साथ ब्रह्मलोक चले गए।
श्लोक 28 (skanda.6.271.28)
तत्र कल्पसहस्रांते स प्रोक्तो ब्रह्मणा स्वयम् इंद्रद्युम्न धरां गच्छ न स्थातव्यं त्वयाऽधुना
tatra kalpasahasrāṁte sa prokto brahmaṇā svayam iṁdradyumna dharāṁ gaccha na sthātavyaṁ tvayā'dhunā
वहाँ सहस्र कल्पों के अंत में स्वयं ब्रह्मा ने उनसे कहा — 'हे इन्द्रद्युम्न, पृथ्वी पर जाओ, अब तुम यहाँ नहीं ठहर सकते।'
श्लोक 29 (skanda.6.271.29)
इंद्रद्युम्न उवाच कस्माच्च्यावयसे ब्रह्मन्निजलोकाद्द्रुतं हि माम् अपापमपि देवेश तथा मे वद कारणम्
iṁdradyumna uvāca kasmāccyāvayase brahmannijalokāddrutaṁ hi mām apāpamapi deveśa tathā me vada kāraṇam
इन्द्रद्युम्न ने कहा — हे ब्रह्मन्, बिना किसी पाप के भी आप मुझे अपने लोक से इतनी शीघ्रता से क्यों निकाल रहे हैं? हे देवेश, इसका कारण बताइए।
श्लोक 30 (skanda.6.271.30)
श्रीब्रह्मोवाच तव कीर्तिसमुच्छेदः संजातोऽद्य धरातले यावत्कीर्तिर्धरापृष्ठे तावत्स्वर्गे वसेन्नरः
śrībrahmovāca tava kīrtisamucchedaḥ saṁjāto'dya dharātale yāvatkīrtirdharāpṛṣṭhe tāvatsvarge vasennaraḥ
श्री ब्रह्मा ने कहा — आज पृथ्वीतल पर तुम्हारी कीर्ति का उच्छेद हो गया है; मनुष्य स्वर्ग में तभी तक निवास करता है जब तक उसकी कीर्ति पृथ्वी पर बनी रहती है।
श्लोक 31 (skanda.6.271.31)
एतस्मात्कारणाल्लोकाः स्वनामांकानि चक्रिरे वापीकूपतडागानि देवतायतनानि च
etasmātkāraṇāllokāḥ svanāmāṁkāni cakrire vāpīkūpataḍāgāni devatāyatanāni ca
इसी कारण लोग बावड़ी, कुएँ, तालाब तथा देवालयों पर अपना नाम अंकित कराते हैं।
श्लोक 32 (skanda.6.271.32)
तस्माद्गच्छ धरापृष्ठं स्वां कीर्तिं नूतनां कुरु यदि वांछसि लोकेऽस्मिन्मामके वसतिं चिरम्
tasmādgaccha dharāpṛṣṭhaṁ svāṁ kīrtiṁ nūtanāṁ kuru yadi vāṁchasi loke'sminmāmake vasatiṁ ciram
इसलिए पृथ्वी पर जाओ और अपनी कीर्ति नए सिरे से स्थापित करो, यदि इस मेरे लोक में चिरकाल निवास करना चाहते हो।
श्लोक 33 (skanda.6.271.33)
अथात्मानं स राजेंद्रो यावत्पश्यति तत्क्षणात् तावत्प्राप्तं धरापृष्ठे कांपिल्य नगरं प्रति
athātmānaṁ sa rājeṁdro yāvatpaśyati tatkṣaṇāt tāvatprāptaṁ dharāpṛṣṭhe kāṁpilya nagaraṁ prati
जब तक वह राजेन्द्र स्वयं को देखता, तब तक वे पृथ्वीतल पर कांपिल्य नगर में पहुँच चुके थे।
श्लोक 34 (skanda.6.271.34)
अथ पप्रच्छ लोकान्स किमेतन्नगरं स्मृतम् कोऽयं देशः कोऽत्र राजा किं पुरं नगरं च किम्
atha papraccha lokānsa kimetannagaraṁ smṛtam ko'yaṁ deśaḥ ko'tra rājā kiṁ puraṁ nagaraṁ ca kim
तब उन्होंने लोगों से पूछा — 'यह कौन-सा नगर है? यह कौन-सा देश है? यहाँ राजा कौन है? यह पुर, यह नगर क्या है?'
श्लोक 35 (skanda.6.271.35)
ते तमूचुः परं चैतत्कांपिल्यमिति विश्रुतम् आनर्तनामा देशोऽयं राजात्र पृथिवीजयः
te tamūcuḥ paraṁ caitatkāṁpilyamiti viśrutam ānartanāmā deśo'yaṁ rājātra pṛthivījayaḥ
उन्होंने कहा — 'यह कांपिल्य नाम से विख्यात है; यह देश आनर्त नाम से जाना जाता है, यहाँ राजा पृथ्वीजय हैं।'
श्लोक 36 (skanda.6.271.36)
को भवान्किमिहायातः किंचित्कार्यं वदस्व नः
ko bhavānkimihāyātaḥ kiṁcitkāryaṁ vadasva naḥ
'आप कौन हैं? यहाँ क्यों आए हैं? यदि कोई कार्य हो तो हमें बताइए।'
श्लोक 37 (skanda.6.271.37)
इंद्रद्युम्न उवाच इंद्रद्युम्नो महीपालः पुरासीद्रोचके पुरे देशे वैजरुके पूर्वं स देशः क्व च तत्पुरम्
iṁdradyumna uvāca iṁdradyumno mahīpālaḥ purāsīdrocake pure deśe vaijaruke pūrvaṁ sa deśaḥ kva ca tatpuram
इन्द्रद्युम्न ने कहा — पूर्व में वैजरुक देश के रोचक नगर में इन्द्रद्युम्न नामक राजा थे; अब वह देश और वह नगर कहाँ हैं?
श्लोक 38 (skanda.6.271.38)
जना ऊचुः न वयं तत्पुरं विद्मो न देशं न च भूपतिम् इन्द्रद्युम्नाभिधानं च यं त्वं पृच्छसि भद्रक
janā ūcuḥ na vayaṁ tatpuraṁ vidmo na deśaṁ na ca bhūpatim indradyumnābhidhānaṁ ca yaṁ tvaṁ pṛcchasi bhadraka
लोगों ने कहा — हम न उस नगर को जानते हैं, न उस देश को, न उस राजा को; हे भद्रक, आप जिस इन्द्रद्युम्न के विषय में पूछ रहे हैं, उसे भी नहीं जानते।
श्लोक 39 (skanda.6.271.39)
इंद्रद्युम्न उवाच चिरायुरस्ति कोऽप्यत्र यस्तं वेत्ति महीपतिम् देशं वा तत्पुरं वापि तन्मे वदथ मा चिरम्
iṁdradyumna uvāca cirāyurasti ko'pyatra yastaṁ vetti mahīpatim deśaṁ vā tatpuraṁ vāpi tanme vadatha mā ciram
इन्द्रद्युम्न ने कहा — क्या यहाँ कोई दीर्घायु पुरुष है जो उस राजा, उस देश या उस नगर को जानता हो? बिना विलंब मुझे बताइए।
श्लोक 40 (skanda.6.271.40)
जना ऊचुः सप्तकल्पस्मरो नाम मार्कंडेयो महामुनिः श्रूयते नैमिषारण्ये तं गत्वा पृच्छ वेत्स्यसि
janā ūcuḥ saptakalpasmaro nāma mārkaṁḍeyo mahāmuniḥ śrūyate naimiṣāraṇye taṁ gatvā pṛccha vetsyasi
लोगों ने कहा — सप्तकल्प-स्मरण करने वाले मार्कण्डेय नामक महामुनि नैमिषारण्य में सुने जाते हैं; उनके पास जाकर पूछिए, आपको ज्ञात हो जाएगा।
श्लोक 41 (skanda.6.271.41)
अथासौ सत्वरं गत्वा व्योममार्गेण तं मुनिम् पप्रच्छ प्रणिपत्योच्चैर्नैमिषारण्यमाश्रितम्
athāsau satvaraṁ gatvā vyomamārgeṇa taṁ munim papraccha praṇipatyoccairnaimiṣāraṇyamāśritam
तब वे शीघ्र आकाशमार्ग से जाकर, नैमिषारण्य में स्थित उन मुनि से उच्च स्वर में प्रणाम कर पूछने लगे।
श्लोक 42 (skanda.6.271.42)
इंद्रद्युम्नेति वै भूपस्त्वया दृष्टः श्रुतोऽथ वा चिरायुस्त्वं श्रुतोऽस्माभिः पृच्छामस्तेन सन्मुने
iṁdradyumneti vai bhūpastvayā dṛṣṭaḥ śruto'tha vā cirāyustvaṁ śruto'smābhiḥ pṛcchāmastena sanmune
'इन्द्रद्युम्न नामक राजा क्या आपने देखा या सुना है? हमने सुना है कि आप दीर्घायु हैं, इसीलिए, हे सन्मुने, हम आपसे पूछते हैं।'
श्लोक 43 (skanda.6.271.43)
श्रीमार्कंडेय उवाच सप्तकल्पांतरे भूपो न दृष्टो न मया श्रुतः इंद्रद्युम्नाभिधानोऽत्र तत्र किं नु वदामि ते
śrīmārkaṁḍeya uvāca saptakalpāṁtare bhūpo na dṛṣṭo na mayā śrutaḥ iṁdradyumnābhidhāno'tra tatra kiṁ nu vadāmi te
श्री मार्कण्डेय ने कहा — सात कल्पों में मैंने न कोई ऐसा राजा देखा है, न सुना है; इन्द्रद्युम्न नामक कोई यहाँ, वहाँ — मैं तुम्हें क्या कहूँ?
श्लोक 44 (skanda.6.271.44)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा निराशः स महीपतिः वैराग्यं परमं गत्वा मरणे कृतनिश्चयः
tasya tadvacanaṁ śrutvā nirāśaḥ sa mahīpatiḥ vairāgyaṁ paramaṁ gatvā maraṇe kṛtaniścayaḥ
उनके ये वचन सुनकर वह राजा निराश हो गया, तथा परम वैराग्य को प्राप्त कर मरण का निश्चय कर लिया।
श्लोक 45 (skanda.6.271.45)
तेन चानीय दारूणि प्रज्वाल्य च हुताशनम् प्रवेष्टुकामः स प्रोक्त इन्द्रद्युम्नो महीपतिः
tena cānīya dārūṇi prajvālya ca hutāśanam praveṣṭukāmaḥ sa prokta indradyumno mahīpatiḥ
उसने लकड़ियाँ मँगाकर अग्नि प्रज्वलित की; जब वे राजा इन्द्रद्युम्न उसमें प्रवेश करना चाहते थे, तभी उनसे यह कहा गया।
श्लोक 46 (skanda.6.271.46)
त्वया चात्र न कर्तव्यमहं ते मित्रतां गतः नाशयिष्यामि ते मृत्युं यद्यपि स्यान्महत्तरम्
tvayā cātra na kartavyamahaṁ te mitratāṁ gataḥ nāśayiṣyāmi te mṛtyuṁ yadyapi syānmahattaram
'यह तुम्हें नहीं करना चाहिए, मैं तुम्हारा मित्र बन गया हूँ; तुम्हारी मृत्यु चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, मैं उसे टाल दूँगा।'
श्लोक 47 (skanda.6.271.47)
नीरोगोऽसि सुभव्योऽसि कस्मान्मृत्युं प्रवांछसि वद मे कारणं मृत्योः प्रतीकारं करोमि ते
nīrogo'si subhavyo'si kasmānmṛtyuṁ pravāṁchasi vada me kāraṇaṁ mṛtyoḥ pratīkāraṁ karomi te
'तुम नीरोग हो, सुंदर हो, फिर मृत्यु की कामना क्यों करते हो? मुझे कारण बताओ, मैं उसका उपाय करूँगा।'
श्लोक 48 (skanda.6.271.48)
इंद्रद्युम्न उवाच चिरायुर्मे भवान्प्रोक्तः कांपिल्यपुरवासिभिः तेनाहं तव पार्श्वेऽत्र समायातो महामुने
iṁdradyumna uvāca cirāyurme bhavānproktaḥ kāṁpilyapuravāsibhiḥ tenāhaṁ tava pārśve'tra samāyāto mahāmune
इन्द्रद्युम्न ने कहा — कांपिल्यपुरवासियों ने आपको दीर्घायु बताया, इसीलिए हे महामुने, मैं आपके पास यहाँ आया हूँ।
श्लोक 49 (skanda.6.271.49)
इंद्रद्युम्नोद्भवां वार्तां त्वं वदिष्यसि सन्मुने मत्कीर्तिर्न परिज्ञाता ततो मृत्युं व्रजाम्यहम्
iṁdradyumnodbhavāṁ vārtāṁ tvaṁ vadiṣyasi sanmune matkīrtirna parijñātā tato mṛtyuṁ vrajāmyaham
'मुझे लगा था कि आप इन्द्रद्युम्न से संबंधित वृत्तांत बताएँगे, हे सन्मुने; किन्तु मेरी कीर्ति ज्ञात नहीं हुई, इसलिए अब मैं मृत्यु को जाता हूँ।'
श्लोक 50 (skanda.6.271.50)
सूत उवाच तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा दयावान्स मुनीश्वरः वृथाश्रमं च तं ज्ञात्वा दाक्षिण्यादिदमब्रवीत्
sūta uvāca tasya taṁ niścayaṁ jñātvā dayāvānsa munīśvaraḥ vṛthāśramaṁ ca taṁ jñātvā dākṣiṇyādidamabravīt
सूत जी ने कहा — उसका यह निश्चय जानकर, दयावान मुनीश्वर ने उसका तपोश्रम व्यर्थ न जाए, यह जानकर दाक्षिण्यवश यह कहा।
श्लोक 51 (skanda.6.271.51)
यद्येवं मा विशाग्निं त्वमहं ज्ञास्यामि तं नृपम् नाडीजंघो बको नाम ममास्ति परमः सुहृत्
yadyevaṁ mā viśāgniṁ tvamahaṁ jñāsyāmi taṁ nṛpam nāḍījaṁgho bako nāma mamāsti paramaḥ suhṛt
'यदि ऐसा है तो अग्नि में मत प्रवेश करो, मैं उस राजा के बारे में पता लगाऊँगा; मेरा नाडीजंघ नामक बक एक परम सुहृद है।'
श्लोक 52 (skanda.6.271.52)
चिरंतनश्च सोऽस्माकं नूनं ज्ञास्यति तं नृपम् तस्मादागच्छ गच्छावस्तस्य पार्श्वे हिमाचले
ciraṁtanaśca so'smākaṁ nūnaṁ jñāsyati taṁ nṛpam tasmādāgaccha gacchāvastasya pārśve himācale
'वह मुझसे भी अधिक वयोवृद्ध है, वह निश्चय ही उस राजा को जानता होगा; अतः आओ, हम हिमालय पर उसके पास चलें।'
श्लोक 53 (skanda.6.271.53)
साधूनां दर्शनं जातु न वृथा जायते क्वचित्
sādhūnāṁ darśanaṁ jātu na vṛthā jāyate kvacit
'साधुओं का दर्शन कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।'
श्लोक 54 (skanda.6.271.54)
एवमुक्त्वा ततस्तौ तु प्रस्थितौ मुनिपार्थिवौ व्योममार्गेण संतुष्टौ बकं प्रति हिमाचले
evamuktvā tatastau tu prasthitau munipārthivau vyomamārgeṇa saṁtuṣṭau bakaṁ prati himācale
ऐसा कहकर वे मुनि और राजा दोनों संतुष्ट होकर आकाशमार्ग से हिमाचल पर बक के पास चल पड़े।
श्लोक 55 (skanda.6.271.55)
बकोऽपि तं समालोक्य मार्कण्डेयं समागतम् संमुखः प्रययौ तुष्टः स्वागतेनाभ्यपूजयत्
bako'pi taṁ samālokya mārkaṇḍeyaṁ samāgatam saṁmukhaḥ prayayau tuṣṭaḥ svāgatenābhyapūjayat
मार्कण्डेय को आया देख बक भी प्रसन्न होकर सम्मुख गया और स्वागत करते हुए उनका सत्कार किया।
श्लोक 56 (skanda.6.271.56)
धन्योऽहं कृतपुण्योऽहं यस्य मे त्वत्समागमः भो भो ब्रह्मविदां श्रेष्ठ आतिथ्यं ते करोमि किम्
dhanyo'haṁ kṛtapuṇyo'haṁ yasya me tvatsamāgamaḥ bho bho brahmavidāṁ śreṣṭha ātithyaṁ te karomi kim
'धन्य हूँ मैं, पुण्यशाली हूँ जिसे आपका यह समागम प्राप्त हुआ। हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, आपका क्या आतिथ्य करूँ?'
श्लोक 57 (skanda.6.271.57)
श्रीमार्कंडेय उवाच मत्तोपि त्वं चिरायुश्च यतो मित्रं व्यवस्थितः इन्द्रद्युम्नो महीपालस्त्वया दृष्टः श्रुतोऽथवा
śrīmārkaṁḍeya uvāca mattopi tvaṁ cirāyuśca yato mitraṁ vyavasthitaḥ indradyumno mahīpālastvayā dṛṣṭaḥ śruto'thavā
श्री मार्कण्डेय ने कहा — चूँकि तुम मुझसे भी अधिक दीर्घायु मित्र हो, बताओ — क्या तुमने इन्द्रद्युम्न नामक राजा को देखा अथवा सुना है?
श्लोक 58 (skanda.6.271.58)
एतस्य मम मित्रस्य तेन दृष्टेन कारणम् अन्यथा जायते मृत्युस्ततोऽहं त्वां समागतः
etasya mama mitrasya tena dṛṣṭena kāraṇam anyathā jāyate mṛtyustato'haṁ tvāṁ samāgataḥ
'मेरे इस मित्र के लिए ही यह उनके देखे जाने का कारण है; अन्यथा इनकी मृत्यु हो जाएगी, इसीलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ।'
श्लोक 59 (skanda.6.271.59)
बक उवाच सप्तद्विगुणितान्कल्पान्स्मराम्यहमसंशयम् न स्मरामि कथामेव इंद्रद्युम्नसमुद्भवाम्
baka uvāca saptadviguṇitānkalpānsmarāmyahamasaṁśayam na smarāmi kathāmeva iṁdradyumnasamudbhavām
बक ने कहा — मुझे निश्चय ही चौदह कल्प स्मरण हैं, किन्तु इन्द्रद्युम्न से संबंधित कोई कथा मुझे स्मरण नहीं है।
श्लोक 60 (skanda.6.271.60)
आस्तां हि दर्शनं तावत्सत्यमेतन्मयोदिम्
āstāṁ hi darśanaṁ tāvatsatyametanmayodim
'देखने की तो बात दूर, यह मैंने सत्य ही कहा है।'
श्लोक 61 (skanda.6.271.61)
इंद्रद्युम्न उवाच तपसः किं प्रभावोऽयं दानस्य नियमस्य च यदायुरीदृशं जातं बकत्वेऽपि वदस्व नः
iṁdradyumna uvāca tapasaḥ kiṁ prabhāvo'yaṁ dānasya niyamasya ca yadāyurīdṛśaṁ jātaṁ bakatve'pi vadasva naḥ
इन्द्रद्युम्न ने कहा — क्या यह तप का प्रभाव है, अथवा दान और नियम का, कि बक होकर भी आपको ऐसी आयु प्राप्त हुई? हमें बताइए।
श्लोक 62 (skanda.6.271.62)
बक उवाच घृतकंबलमाहात्म्याद्देवदेवस्य शूलिनः ममायुरीदृशं जातं बकत्वं मुनिशापतः
baka uvāca ghṛtakaṁbalamāhātmyāddevadevasya śūlinaḥ mamāyurīdṛśaṁ jātaṁ bakatvaṁ muniśāpataḥ
बक ने कहा — शूलधारी देवदेव को अर्पित घृत-कंबल की महिमा से मुझे यह आयु प्राप्त हुई; तथा मुनि के शाप से मुझे बकत्व मिला।
श्लोक 63 (skanda.6.271.63)
अहमासं पुरा बालो ब्राह्मणस्य निवेशने चमत्कारपुरे रम्ये पाराशर्यस्य धीमतः
ahamāsaṁ purā bālo brāhmaṇasya niveśane camatkārapure ramye pārāśaryasya dhīmataḥ
'मैं पूर्वकाल में सुंदर चमत्कारपुर में बुद्धिमान पाराशर्य ब्राह्मण के घर में एक बालक था।'
श्लोक 64 (skanda.6.271.64)
नाम्ना च विश्वरूपाख्यो नाम्ना ऽन्येन बक स्मृतः अतीव चपलत्वेन संयुक्तः पितृवल्लभः
nāmnā ca viśvarūpākhyo nāmnā 'nyena baka smṛtaḥ atīva capalatvena saṁyuktaḥ pitṛvallabhaḥ
'मेरा नाम विश्वरूप था, तथा एक अन्य नाम से बक भी कहा जाता था; अत्यंत चंचल स्वभाव का, अपने पिता का प्रिय।'
श्लोक 65 (skanda.6.271.65)
कस्यचित्त्वथ कालस्य संक्रांतौ मकरस्य भोः संप्राप्यातीव चापल्याल्लिंगं जागेश्वरं मया घृतकुम्भे परिक्षिप्तं पूजितं जनकेन यत्
kasyacittvatha kālasya saṁkrāṁtau makarasya bhoḥ saṁprāpyātīva cāpalyālliṁgaṁ jāgeśvaraṁ mayā ghṛtakumbhe parikṣiptaṁ pūjitaṁ janakena yat
'एक बार मकर संक्रांति के अवसर पर, अत्यंत चंचलतावश मैंने घृत-कुम्भ में स्थापित, मेरे पिता द्वारा पूजित जागेश्वर लिंग को छू लिया।'
श्लोक 66 (skanda.6.271.66)
अथ रात्र्यां व्यतीतायां पृष्टोऽहं जनकेन च त्वया पुत्र परिक्षिप्तं नूनं जागेश्वरं क्वचित् तस्माद्वद प्रयच्छामि तेन ते भक्ष्यमुत्तमम्
atha rātryāṁ vyatītāyāṁ pṛṣṭo'haṁ janakena ca tvayā putra parikṣiptaṁ nūnaṁ jāgeśvaraṁ kvacit tasmādvada prayacchāmi tena te bhakṣyamuttamam
'रात्रि बीतने पर पिता ने मुझसे पूछा — पुत्र, क्या तुमने कहीं जागेश्वर को छुआ है? बताओ, मैं तुम्हें उत्तम भोजन दूँगा।'
श्लोक 67 (skanda.6.271.67)
ततो मयाज्यकुम्भाच्च तस्मादादाय सत्वरम् भक्ष्यलौल्यात्पितुर्हस्ते विन्यस्तं घृतसंप्लुतम्
tato mayājyakumbhācca tasmādādāya satvaram bhakṣyalaulyātpiturhaste vinyastaṁ ghṛtasaṁplutam
'तब मैंने भोजन के लोभ से शीघ्र उस घृत-कुम्भ से उसे निकालकर, घी में डूबा हुआ, पिता के हाथ में रख दिया।'
श्लोक 68 (skanda.6.271.68)
कस्यचित्त्वथ कालस्य पंचत्वं च समागतः जातिस्मरस्ततो जातस्तत्प्रभावान्नृपालये
kasyacittvatha kālasya paṁcatvaṁ ca samāgataḥ jātismarastato jātastatprabhāvānnṛpālaye
'कुछ समय बाद मेरी मृत्यु हो गई; तब उसी प्रभाव से मैं एक राजमहल में पूर्वजन्म-स्मृति सहित उत्पन्न हुआ।'
श्लोक 69 (skanda.6.271.69)
आनर्ताधिपतेर्हर्म्ये नाम्ना ख्यातस्त्वहं बकः चमत्कारपुरे देवो हरः संस्थापितो मया
ānartādhipaterharmye nāmnā khyātastvahaṁ bakaḥ camatkārapure devo haraḥ saṁsthāpito mayā
'आनर्ताधिपति के महल में मैं बक नाम से विख्यात हुआ; चमत्कारपुर में मैंने ही हर देव की स्थापना की थी।'
श्लोक 70 (skanda.6.271.70)
तत्प्रभावेण विप्रेंद्र प्राप्तः पैतामहं पदम्
tatprabhāveṇa vipreṁdra prāptaḥ paitāmahaṁ padam
'हे विप्रेन्द्र, उसी प्रभाव से मैंने अपना पैतृक राज्यपद प्राप्त किया।'
श्लोक 71 (skanda.6.271.71)
ततो यानि धरापृष्ठे सुलिंगानि स्थितानि च घृतेनच्छादयाम्येव मकरस्थे दिवाकरे मया यत्स्थापितं लिंगं चमत्कारपुरे शुभम्
tato yāni dharāpṛṣṭhe suliṁgāni sthitāni ca ghṛtenacchādayāmyeva makarasthe divākare mayā yatsthāpitaṁ liṁgaṁ camatkārapure śubham
'तत्पश्चात पृथ्वीतल पर स्थित सभी शुभ लिंगों को मैं मकरस्थ सूर्य के समय घृत से अभिषिक्त करता, विशेषतः चमत्कारपुर में स्थापित उस शुभ लिंग को।'
श्लोक 72 (skanda.6.271.72)
आराधितं दिवा नक्तं राज्ये संस्थाप्य पुत्रकम् नियोज्य सर्वतो भृत्यान्धनवस्त्रसमन्वितान्
ārādhitaṁ divā naktaṁ rājye saṁsthāpya putrakam niyojya sarvato bhṛtyāndhanavastrasamanvitān
'अपने पुत्र को राज्य पर स्थापित कर, तथा चारों ओर धन-वस्त्रों से युक्त सेवक नियुक्त कर, मैं दिन-रात उसकी आराधना करता।'
श्लोक 73 (skanda.6.271.73)
ततःकालेन महता तुष्टो मे भगवाञ्छिवः मत्समीपं समासाद्य वाक्यमेतदुवाच सः
tataḥkālena mahatā tuṣṭo me bhagavāñchivaḥ matsamīpaṁ samāsādya vākyametaduvāca saḥ
'तब दीर्घकाल बाद भगवान शिव मुझसे प्रसन्न होकर मेरे समीप आए और यह वचन कहा।'
श्लोक 74 (skanda.6.271.74)
परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते तव पार्थिवसत्तम घृतकंबलदानेन संख्यया रहितेन च
parituṣṭo'smi bhadraṁ te tava pārthivasattama ghṛtakaṁbaladānena saṁkhyayā rahitena ca
'हे पार्थिवसत्तम, तुम्हारा मंगल हो; मैं तुम्हारे असंख्य घृत-कंबल दानों से अत्यंत प्रसन्न हूँ।'
श्लोक 75 (skanda.6.271.75)
तस्माद्वरय भद्रं ते वरं यन्मनसि स्थितम् अदेयमपि दास्यामि यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
tasmādvaraya bhadraṁ te varaṁ yanmanasi sthitam adeyamapi dāsyāmi yadyapi syātsudurlabham
'अतः तुम्हारा मंगल हो, जो भी वर तुम्हारे मन में हो, माँगो; असंभव वर भी दूँगा, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।'
श्लोक 76 (skanda.6.271.76)
ततो मया हरः प्रोक्तो यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो कुरुष्व मां गणं देव नान्यत्किंचिद्वृणोम्यहम्
tato mayā haraḥ prokto yadi tuṣṭo'si me prabho kuruṣva māṁ gaṇaṁ deva nānyatkiṁcidvṛṇomyaham
'तब मैंने हर से कहा — यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे प्रभो, तो मुझे अपना गण बना लीजिए; मैं और कुछ नहीं माँगता।'
श्लोक 77 (skanda.6.271.77)
श्रीभगवानुवाच बकैहि त्वं महाभाग कैलासं पर्वतोत्तमम् मया सार्धमनेनैव शरीरेण गणो भव
śrībhagavānuvāca bakaihi tvaṁ mahābhāga kailāsaṁ parvatottamam mayā sārdhamanenaiva śarīreṇa gaṇo bhava
श्री भगवान ने कहा — हे बक महाभाग, आओ, कैलास पर्वत पर मेरे साथ इसी शरीर से गण बनो।
श्लोक 78 (skanda.6.271.78)
अन्योऽपि मर्त्यलोकेत्र यः करिष्यति मानवः मकरस्थे रवौ मह्यं संक्रांतौ रजनीमुखे स नूनं मद्गणो भावी सकृत्कृत्वाऽथ कंबलम्
anyo'pi martyaloketra yaḥ kariṣyati mānavaḥ makarasthe ravau mahyaṁ saṁkrāṁtau rajanīmukhe sa nūnaṁ madgaṇo bhāvī sakṛtkṛtvā'tha kaṁbalam
'मर्त्यलोक में भी जो अन्य मनुष्य मकरस्थ सूर्य के समय, रात्रि के प्रारंभ में, एक बार भी मुझे कंबल अर्पित करेगा, वह भी निश्चय ही मेरा गण बनेगा।'
श्लोक 79 (skanda.6.271.79)
त्वं पुनर्मामकं लिंगं समं कुर्वन्भविष्यसि धर्मसेनेति विख्यातो विकृत्या परिवर्जितः
tvaṁ punarmāmakaṁ liṁgaṁ samaṁ kurvanbhaviṣyasi dharmaseneti vikhyāto vikṛtyā parivarjitaḥ
'किन्तु तुम मेरे लिंग को पुनः सुसज्जित करते हुए, विकृति से रहित होकर धर्मसेन नाम से विख्यात होओगे।'
श्लोक 80 (skanda.6.271.80)
एवमुक्त्वा स भगवान्मामादाय ततः परम् कैलासं पर्वतं गत्वा गणकोटीशतामदात्
evamuktvā sa bhagavānmāmādāya tataḥ param kailāsaṁ parvataṁ gatvā gaṇakoṭīśatāmadāt
ऐसा कहकर उन भगवान ने मुझे साथ लेकर कैलास पर्वत जाकर करोड़ों गणों का अधिपति बना दिया।
श्लोक 81 (skanda.6.271.81)
कस्यचित्त्वथ कालस्य भ्रममाणो यदृच्छया गतोऽहं पर्वतश्रेष्ठं हिमवंतं महागिरिम्
kasyacittvatha kālasya bhramamāṇo yadṛcchayā gato'haṁ parvataśreṣṭhaṁ himavaṁtaṁ mahāgirim
'तत्पश्चात कुछ समय बाद स्वेच्छा से विचरण करते हुए मैं पर्वतश्रेष्ठ महागिरि हिमवान के पास गया।'
श्लोक 82 (skanda.6.271.82)
यत्रास्ते गालवो नाम सदैव तपसि स्थितः तस्य भार्या विशालाक्षी सर्वलक्षणलक्षिता
yatrāste gālavo nāma sadaiva tapasi sthitaḥ tasya bhāryā viśālākṣī sarvalakṣaṇalakṣitā
'वहाँ गालव नामक मुनि सदा तपस्या में लीन रहते थे; उनकी पत्नी विशालाक्षी समस्त शुभ लक्षणों से युक्त थीं।'
श्लोक 83 (skanda.6.271.83)
सप्तरक्ता त्रिगंभीरा गूढगुल्फा कृशोदरी तां दृष्ट्वा मन्मथाविष्टः संजातोऽहं मुनीश्वर
saptaraktā trigaṁbhīrā gūḍhagulphā kṛśodarī tāṁ dṛṣṭvā manmathāviṣṭaḥ saṁjāto'haṁ munīśvara
'सुंदर अंगों, गंभीर स्वभाव तथा कृशोदरी उस स्त्री को देखकर, हे मुनीश्वर, मैं कामदेव के वश में हो गया।'
श्लोक 84 (skanda.6.271.84)
चिंतितं च मया चित्ते कथमेतां हराम्यहम् तस्माच्छिष्यत्वमासाद्य भक्तिमस्य करोम्यहम्
ciṁtitaṁ ca mayā citte kathametāṁ harāmyaham tasmācchiṣyatvamāsādya bhaktimasya karomyaham
'मैंने मन में सोचा — इसे कैसे हर लूँ? अतः शिष्यत्व स्वीकार कर मैं उनकी भक्ति करूँगा।'
श्लोक 85 (skanda.6.271.85)
शुश्रूषानिरतो भूत्वा येन प्राप्नोमि भामिनीम्
śuśrūṣānirato bhūtvā yena prāpnomi bhāminīm
'सेवा में तत्पर रहकर, जिससे मैं उस सुंदरी को प्राप्त कर सकूँ।'
श्लोक 86 (skanda.6.271.86)
ततो बटुकरूपेण संप्राप्तो गालवो मया संसारस्य विरक्तोऽहं करिष्यामि मह्त्तपः
tato baṭukarūpeṇa saṁprāpto gālavo mayā saṁsārasya virakto'haṁ kariṣyāmi mahttapaḥ
'तब ब्रह्मचारी बटु के रूप में मैं गालव के पास पहुँचा — मैं संसार से विरक्त हूँ, महान तप करूँगा।'
श्लोक 87 (skanda.6.271.87)
दीक्षां यच्छ विभो मह्यं येन शिष्यो भवामि ते
dīkṣāṁ yaccha vibho mahyaṁ yena śiṣyo bhavāmi te
'हे विभो, मुझे दीक्षा दीजिए, जिससे मैं आपका शिष्य बनूँ।'
श्लोक 88 (skanda.6.271.88)
आहरिष्याम्यहं दर्भांस्तथा सुमनसः सदा समिधश्च सदैवाहं फलानि जलमेव च
āhariṣyāmyahaṁ darbhāṁstathā sumanasaḥ sadā samidhaśca sadaivāhaṁ phalāni jalameva ca
'मैं सदा कुशा और पुष्प लाऊँगा, तथा समिधा, फल और जल भी सदा लाऊँगा।'
श्लोक 89 (skanda.6.271.89)
स मां विनयसंपन्नं ज्ञात्वा ब्राह्मणरूपिणम् ददौ दीक्षां ततो मह्यं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा
sa māṁ vinayasaṁpannaṁ jñātvā brāhmaṇarūpiṇam dadau dīkṣāṁ tato mahyaṁ śāstradṛṣṭena karmaṇā
उन्होंने मुझे विनम्र और ब्राह्मणरूपधारी जानकर शास्त्रोक्त विधि से दीक्षा दे दी।
श्लोक 90 (skanda.6.271.90)
अथ दीक्षां समासाद्य तोषयामि दिनेदिने तं चैव तस्य पत्नीं तां यथोक्तपरिचर्यया अशुद्धेनापि चित्तेन छिद्रान्वेषणतत्परः
atha dīkṣāṁ samāsādya toṣayāmi dinedine taṁ caiva tasya patnīṁ tāṁ yathoktaparicaryayā aśuddhenāpi cittena chidrānveṣaṇatatparaḥ
'तब दीक्षा लेकर मैं प्रतिदिन उन्हें और उनकी पत्नी को यथोक्त सेवा से प्रसन्न रखता, किन्तु अशुद्ध चित्त से छिद्र ढूँढ़ने में तत्पर रहता।'
श्लोक 91 (skanda.6.271.91)
अन्यस्मिन्दिवसे प्राप्ते सा स्त्रीधर्मसमन्विता उटजं दूरतस्त्यक्त्वा रात्रौ सुप्ता मनस्विनी
anyasmindivase prāpte sā strīdharmasamanvitā uṭajaṁ dūratastyaktvā rātrau suptā manasvinī
'एक दिन, ऋतुधर्म से युक्त होने पर, वह मनस्विनी झोपड़ी से दूर जाकर रात्रि में सो गई।'
श्लोक 92 (skanda.6.271.92)
सोऽहं रूपं महत्कृत्वा तामादाय तपस्विनीम् सुखसुप्तां सुविश्रब्धां प्रस्थितो दक्षिणामुखः
so'haṁ rūpaṁ mahatkṛtvā tāmādāya tapasvinīm sukhasuptāṁ suviśrabdhāṁ prasthito dakṣiṇāmukhaḥ
'मैंने विशाल रूप धारण कर उस सुखपूर्वक निद्रित, निश्चिंत तपस्विनी को उठाकर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया।'
श्लोक 93 (skanda.6.271.93)
अथासौ संपरित्यक्ता संस्पर्शान्मम निद्रया चौररूपं परिज्ञाय मां शिष्यं प्ररुरोद ह
athāsau saṁparityaktā saṁsparśānmama nidrayā caurarūpaṁ parijñāya māṁ śiṣyaṁ praruroda ha
'तब मेरे स्पर्श से जागकर उसने चोर-रूप में अपने शिष्य को पहचान लिया और रो पड़ी।'
श्लोक 94 (skanda.6.271.94)
साब्रवीच्च स्वभर्तारं गालवं मुनिसत्तमम् एष शिष्यो दुराचारो हरते मामितः प्रभो
sābravīcca svabhartāraṁ gālavaṁ munisattamam eṣa śiṣyo durācāro harate māmitaḥ prabho
'उसने अपने पति गालव मुनि से कहा — हे प्रभो, यह दुराचारी शिष्य मुझे यहाँ से हर रहा है!'
श्लोक 95 (skanda.6.271.95)
तस्माद्रक्ष महाभाग यावद्दूरं न गच्छति
tasmādrakṣa mahābhāga yāvaddūraṁ na gacchati
'अतः हे महाभाग, इससे पहले कि वह दूर चला जाए, मेरी रक्षा कीजिए।'
श्लोक 96 (skanda.6.271.96)
तच्छ्रुत्वा गालवः प्राह तिष्ठतिष्ठेति चासकृत् पापाचार सुदुष्टात्मन्गतिस्ते स्तंभिता मया
tacchrutvā gālavaḥ prāha tiṣṭhatiṣṭheti cāsakṛt pāpācāra suduṣṭātmangatiste staṁbhitā mayā
यह सुनकर गालव बार-बार बोल उठे — 'रुको, रुको! हे पापाचारी, दुष्टात्मा, मैंने तुम्हारी गति स्तंभित कर दी है।'
श्लोक 97 (skanda.6.271.97)
तस्य वाक्यात्ततो मह्यं गतिस्तंभो व्यजायत यद्वल्लिखित एवाहं प्रतिष्ठामि सुनिश्चलः
tasya vākyāttato mahyaṁ gatistaṁbho vyajāyata yadvallikhita evāhaṁ pratiṣṭhāmi suniścalaḥ
'उनके वचन से मेरी गति रुक गई; मैं चित्र में अंकित के समान पूर्णतः स्थिर होकर वहीं खड़ा रह गया।'
श्लोक 98 (skanda.6.271.98)
ततस्तेन च शप्तोऽहं गालवेन महात्मना वंचितोऽहं त्वया यस्माद्बको भव सुदुर्मते
tatastena ca śapto'haṁ gālavena mahātmanā vaṁcito'haṁ tvayā yasmādbako bhava sudurmate
'तब उन महात्मा गालव ने मुझे शाप दिया — तूने मुझे धोखा दिया है, इसलिए हे दुर्मते, तू बक हो जा!'
श्लोक 99 (skanda.6.271.99)
ततः पश्यामि चात्मानं सहसा बकरूपिणम् बकत्वेऽपि न मे नष्टा या स्मृतिः पूर्वसंभवा
tataḥ paśyāmi cātmānaṁ sahasā bakarūpiṇam bakatve'pi na me naṣṭā yā smṛtiḥ pūrvasaṁbhavā
'तब मैंने सहसा स्वयं को बक-रूप में देखा; किन्तु बक बनकर भी मेरी पूर्वजन्म की स्मृति नष्ट नहीं हुई।'
श्लोक 100 (skanda.6.271.100)
ततः साऽपि च तत्पत्नी सचैलं स्नानमाश्रिता मत्स्पर्शादुःखितांगी च शापाय समुपस्थिता
tataḥ sā'pi ca tatpatnī sacailaṁ snānamāśritā matsparśāduḥkhitāṁgī ca śāpāya samupasthitā
'तब उनकी वही पत्नी, जो वस्त्र सहित स्नान करने गई थी, मेरे स्पर्श से दुखी होकर मुझे शाप देने को उद्यत हुई।'
श्लोक 101 (skanda.6.271.101)
यस्मात्पाप त्वया स्पृष्टा प्रसुप्ताहं रजस्वला बकधर्मं समाश्रित्य भर्त्ता मे वंचितस्त्वया अन्यरूपं समास्थाय तस्मात्सत्यं बको भव
yasmātpāpa tvayā spṛṣṭā prasuptāhaṁ rajasvalā bakadharmaṁ samāśritya bharttā me vaṁcitastvayā anyarūpaṁ samāsthāya tasmātsatyaṁ bako bhava
'हे पापी, तूने सोई हुई, रजस्वला मुझ स्त्री को स्पर्श किया, बकधर्म का बहाना कर मेरे पति को धोखा दिया, अन्यरूप धारण कर — इसलिए वास्तव में ही तू बक हो जा।'
श्लोक 102 (skanda.6.271.102)
एवं शप्तस्ततो द्वाभ्यां ताभ्यां वै दुःखसंयुतः चरणाभ्यां प्रलग्नस्तु गालवस्य महात्मनः
evaṁ śaptastato dvābhyāṁ tābhyāṁ vai duḥkhasaṁyutaḥ caraṇābhyāṁ pralagnastu gālavasya mahātmanaḥ
इस प्रकार उन दोनों से शापित होकर, अत्यंत दुःखी होकर, मैं महात्मा गालव के चरणों से लिपट गया।
श्लोक 103 (skanda.6.271.103)
गणोऽहं देवदेवस्य त्रिनेत्रस्य महात्मनः पालकेति च विख्यातो गणकोटिप्रभुः स्थितः
gaṇo'haṁ devadevasya trinetrasya mahātmanaḥ pālaketi ca vikhyāto gaṇakoṭiprabhuḥ sthitaḥ
मैंने कहा — मैं महात्मा त्रिनेत्र देवदेव का गण हूँ, पालक नाम से विख्यात, करोड़ों गणों का अधिपति।
श्लोक 104 (skanda.6.271.104)
सोऽहमत्र समायातः प्रभोः कार्येण केनचित् तव भार्यां समालोक्य कामदेववशं गतः
so'hamatra samāyātaḥ prabhoḥ kāryeṇa kenacit tava bhāryāṁ samālokya kāmadevavaśaṁ gataḥ
'मैं यहाँ अपने प्रभु के किसी कार्य से आया था; आपकी पत्नी को देखकर कामदेव के वश में हो गया।'
श्लोक 105 (skanda.6.271.105)
क्षमापराधं त्वं मह्यमेवं ज्ञात्वा मुनीश्वर दुर्विनीतः श्रियं प्राप्य विद्यामैश्वर्यमेव च
kṣamāparādhaṁ tvaṁ mahyamevaṁ jñātvā munīśvara durvinītaḥ śriyaṁ prāpya vidyāmaiśvaryameva ca
'हे मुनीश्वर, यह जानकर मेरा अपराध क्षमा कीजिए — जो दुर्विनीत हो, ऐश्वर्य, विद्या और सम्पत्ति पाकर...'
श्लोक 106 (skanda.6.271.106)
न तिष्ठति चिरं स्थाने यथाहं मदगर्वितः शिष्यरूपं समास्थाय ततः प्राप्तस्तवांतिकम्
na tiṣṭhati ciraṁ sthāne yathāhaṁ madagarvitaḥ śiṣyarūpaṁ samāsthāya tataḥ prāptastavāṁtikam
'...मद से गर्वित होकर अपने स्थान पर चिरकाल नहीं टिकता, वैसा ही मैं हूँ। शिष्य-रूप धारण कर मैं आपके पास आया।'
श्लोक 107 (skanda.6.271.107)
अस्या हरणहेतोश्च महासत्या मुनीश्वर तस्मात्कुरु प्रसादं मे दीनस्य प्रणतस्य च
asyā haraṇahetośca mahāsatyā munīśvara tasmātkuru prasādaṁ me dīnasya praṇatasya ca
'हे मुनीश्वर, इस महासती को हरने के उद्देश्य से ही ऐसा किया; अतः दीन और नतमस्तक मुझ पर कृपा कीजिए।'
श्लोक 108 (skanda.6.271.108)
अनुग्रहप्रदानेन क्षमा यस्मात्तपस्विनाम् कोकिलानां स्वरो रूपं नारीरूपं पतिव्रता विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्
anugrahapradānena kṣamā yasmāttapasvinām kokilānāṁ svaro rūpaṁ nārīrūpaṁ pativratā vidyā rūpaṁ kurūpāṇāṁ kṣamā rūpaṁ tapasvinām
'क्षमा तपस्वियों का अनुग्रह-प्रदत्त आभूषण है — कोकिल का स्वर ही उसका रूप है, पातिव्रत्य ही नारी का रूप है, विद्या ही कुरूप का रूप है, तथा क्षमा ही तपस्वियों का रूप है।'
श्लोक 109 (skanda.6.271.109)
सूत उवाच तस्य तत्कृपणं श्रुत्वा सोपि माहेश्वरो मुनिः ज्ञात्वा तं बांधवस्थाने दयां कृत्वाऽब्रवीद्वचः
sūta uvāca tasya tatkṛpaṇaṁ śrutvā sopi māheśvaro muniḥ jñātvā taṁ bāṁdhavasthāne dayāṁ kṛtvā'bravīdvacaḥ
सूत जी ने कहा — उसकी यह दीनतापूर्ण प्रार्थना सुनकर वे शिवभक्त मुनि भी उसे बांधव-सदृश जानकर, दया करके यह वचन बोले।
श्लोक 110 (skanda.6.271.110)
सत्यवाक्तिष्ठते विप्रश्चमत्कारपुरे शुभे
satyavāktiṣṭhate vipraścamatkārapure śubhe
'चमत्कारपुर नामक शुभ नगर में एक सत्यवादी विप्र निवास करता है।'
श्लोक 111 (skanda.6.271.111)
भर्त्तृयज्ञ इति ख्यातस्तदा तस्योपदेशतः बकत्वं यास्यते नूनं मम वाक्यादसंशयम्
bharttṛyajña iti khyātastadā tasyopadeśataḥ bakatvaṁ yāsyate nūnaṁ mama vākyādasaṁśayam
'भर्तृयज्ञ नाम से विख्यात होगा वह; उसी के उपदेश से, मेरे वचन से निःसंदेह, तू बकत्व से मुक्त हो जाएगा।'
श्लोक 112 (skanda.6.271.112)
ततः पश्यामि चात्मानं बकत्वेन समाश्रितम्
tataḥ paśyāmi cātmānaṁ bakatvena samāśritam
तब मैंने स्वयं को बक-रूप में स्थित देखा।
श्लोक 113 (skanda.6.271.113)
एवं मे दीर्घमायुष्यं संजातं शिवभक्तितः घृतकम्बलमाहात्म्याद्बकत्वं मुनिशापतः
evaṁ me dīrghamāyuṣyaṁ saṁjātaṁ śivabhaktitaḥ ghṛtakambalamāhātmyādbakatvaṁ muniśāpataḥ
'इस प्रकार शिवभक्ति और घृतकंबल की महिमा से मुझे दीर्घायु प्राप्त हुई, तथा मुनि के शाप से बकत्व प्राप्त हुआ।'
श्लोक 114 (skanda.6.271.114)
इंद्रद्युम्न उवाच एतदर्थं समानीतस्त्वत्सकाशं विहंगम इंद्रद्युम्नस्य वार्तार्थं मरणे कृतनिश्चयः
iṁdradyumna uvāca etadarthaṁ samānītastvatsakāśaṁ vihaṁgama iṁdradyumnasya vārtārthaṁ maraṇe kṛtaniścayaḥ
इन्द्रद्युम्न ने कहा — हे पक्षिराज, इसी प्रयोजन से मैं आपके पास लाया गया — इन्द्रद्युम्न का समाचार जानने हेतु, मैं जो मरण का निश्चय कर चुका हूँ।
श्लोक 115 (skanda.6.271.115)
सा त्वया नैव विज्ञाता ममाभाग्यैर्विहंगम सेवयिष्याम्यहं तस्मात्प्रदीप्तं हव्यवाहनम्
sā tvayā naiva vijñātā mamābhāgyairvihaṁgama sevayiṣyāmyahaṁ tasmātpradīptaṁ havyavāhanam
'हे विहंगम, वह समाचार आपको ज्ञात नहीं है, यह मेरा दुर्भाग्य है; अतः अब मैं प्रज्वलित अग्नि की शरण लूँगा।'
श्लोक 116 (skanda.6.271.116)
प्रतिज्ञातं मया पूर्वमेतन्निश्चित्य चेतसि इंद्रद्युम्ने ह्यविज्ञाते संसेव्यः पावको मया
pratijñātaṁ mayā pūrvametanniścitya cetasi iṁdradyumne hyavijñāte saṁsevyaḥ pāvako mayā
'मैंने पहले ही मन में निश्चय करके यह प्रतिज्ञा की थी कि यदि इन्द्रद्युम्न अज्ञात रहा तो मुझे अग्नि की शरण लेनी होगी।'
श्लोक 117 (skanda.6.271.117)
तस्माद्देहि ममादेशं मार्कंडेयसमन्वितः प्रविशामि यथा वह्निं भ्रष्टकीर्तिरहं बक
tasmāddehi mamādeśaṁ mārkaṁḍeyasamanvitaḥ praviśāmi yathā vahniṁ bhraṣṭakīrtirahaṁ baka
'अतः मार्कण्डेय सहित मुझे आज्ञा दीजिए, हे बक, मैं अग्नि में प्रवेश करता हूँ, मैं जिसकी कीर्ति नष्ट हो चुकी है।'
श्लोक 118 (skanda.6.271.118)
मार्कंडेय उवाच वेत्सि चान्यं नरं कञ्चिद्वयसा चात्मनोऽधिकम् पृच्छामि येन तं गत्वा कृते ह्यस्य महात्मनः
mārkaṁḍeya uvāca vetsi cānyaṁ naraṁ kañcidvayasā cātmano'dhikam pṛcchāmi yena taṁ gatvā kṛte hyasya mahātmanaḥ
मार्कण्डेय ने कहा — क्या तुम अपनी अपेक्षा वयोवृद्ध किसी अन्य पुरुष को जानते हो? इस महात्मा के लिए मैं उसके पास जाकर पूछूँगा।
श्लोक 119 (skanda.6.271.119)
श्रद्धया परया युक्तः संप्राप्तोऽयं मया सह तत्कथं त्यजति प्राणान्सहाये मयि संस्थिते
śraddhayā parayā yuktaḥ saṁprāpto'yaṁ mayā saha tatkathaṁ tyajati prāṇānsahāye mayi saṁsthite
'यह परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरे साथ आया है; मेरे सहायक रहते यह अपने प्राण कैसे त्याग दे?'
श्लोक 120 (skanda.6.271.120)
अपरं च क्षमं वाक्यं यत्त्वां वच्मि विहंगम अयं दुःखेन संयुक्तः साधयिष्यति पावकम् अहमेनमनुद्धृत्य कस्माद्गच्छामि चाश्रमम्
aparaṁ ca kṣamaṁ vākyaṁ yattvāṁ vacmi vihaṁgama ayaṁ duḥkhena saṁyuktaḥ sādhayiṣyati pāvakam ahamenamanuddhṛtya kasmādgacchāmi cāśramam
'हे विहंगम, तुमसे मैं एक और उचित बात कहता हूँ — यह दुःख से व्याकुल पुरुष अग्नि को सिद्ध कर लेगा; इसका उद्धार किए बिना मैं अपने आश्रम कैसे लौटूँ?'
श्लोक 121 (skanda.6.271.121)
सूत उवाच तयोस्तं निश्चयं ज्ञात्वा बकः परमदुर्मना सुचिरं चिंतयामास कथं स्यादेतयोः सुखम्
sūta uvāca tayostaṁ niścayaṁ jñātvā bakaḥ paramadurmanā suciraṁ ciṁtayāmāsa kathaṁ syādetayoḥ sukham
सूत जी ने कहा — उन दोनों का यह निश्चय जानकर बक अत्यंत दुःखी मन से चिरकाल तक सोचता रहा कि इन दोनों का कल्याण कैसे हो।
श्लोक 122 (skanda.6.271.122)
ततो राजा मुनिश्चैव दारूण्याहृत्य पावकम् प्रवेष्टुकामौ तौ दृष्ट्वा बको वचनमब्रवीत्
tato rājā muniścaiva dārūṇyāhṛtya pāvakam praveṣṭukāmau tau dṛṣṭvā bako vacanamabravīt
तब राजा और मुनि दोनों लकड़ियाँ लाकर अग्नि प्रज्वलित कर उसमें प्रवेश करना चाहते थे, यह देखकर बक ने कहा।
श्लोक 123 (skanda.6.271.123)
मम वाक्यं कुरु प्राज्ञ यदि जीवितुमिच्छसि ज्ञातः सोऽद्य मया व्यक्तमिन्द्रद्युम्नं नराधिपम्
mama vākyaṁ kuru prājña yadi jīvitumicchasi jñātaḥ so'dya mayā vyaktamindradyumnaṁ narādhipam
'हे प्राज्ञ, यदि जीवित रहना चाहते हो तो मेरी बात मानो; आज मैंने स्पष्ट रूप से इस राजा इन्द्रद्युम्न को जान लिया है।'
श्लोक 124 (skanda.6.271.124)
यो ज्ञास्यति मम ज्येष्ठः सर्वशास्त्रविचक्षणः तत्त्वमेनं समादाय मरणे कृतनिश्चयम्
yo jñāsyati mama jyeṣṭhaḥ sarvaśāstravicakṣaṇaḥ tattvamenaṁ samādāya maraṇe kṛtaniścayam
'जो मुझसे भी ज्येष्ठ, समस्त शास्त्रों में निपुण है, वह इसे सत्य रूप से जान लेगा — इसे साथ लेकर, जो मरण का निश्चय कर चुका है...'
श्लोक 125 (skanda.6.271.125)
निश्वसन्तं यथा नागं बाष्पव्याकुललोचनम् समागच्छ मया सार्धं कैलासं पर्वतं प्रति
niśvasantaṁ yathā nāgaṁ bāṣpavyākulalocanam samāgaccha mayā sārdhaṁ kailāsaṁ parvataṁ prati
'...सर्प के समान श्वास लेते, अश्रुओं से व्याकुल नेत्रों वाले इसे लेकर, मेरे साथ कैलास पर्वत की ओर चलो।'
श्लोक 126 (skanda.6.271.126)
यत्रास्ति दयितो मह्यमुलूकश्चिरजीवभाक् स नूनं ज्ञास्यते तं हि मा वृथा मरणं कृथाः
yatrāsti dayito mahyamulūkaścirajīvabhāk sa nūnaṁ jñāsyate taṁ hi mā vṛthā maraṇaṁ kṛthāḥ
'वहाँ मेरा प्रिय दीर्घजीवी उलूक निवास करता है; वह निश्चय ही इसे जान लेगा — व्यर्थ मृत्यु मत करो।'
श्लोक 127 (skanda.6.271.127)
ततोऽसौ तेन संयुक्तो बकेन सुमहात्मना मार्कंडेयेन संप्राप्तः कैलासं पर्वतोत्तमम्
tato'sau tena saṁyukto bakena sumahātmanā mārkaṁḍeyena saṁprāptaḥ kailāsaṁ parvatottamam
तत्पश्चात महात्मा बक सहित वह मार्कण्डेय के साथ पर्वतश्रेष्ठ कैलास पर्वत पर पहुँचा।
श्लोक 128 (skanda.6.271.128)
सोऽपि दृष्ट्वा बकं प्राप्तं मित्रं परमसंमतम् समागच्छदसौ हृष्टः स्वागतेनाभ्यनन्दयत्
so'pi dṛṣṭvā bakaṁ prāptaṁ mitraṁ paramasaṁmatam samāgacchadasau hṛṣṭaḥ svāgatenābhyanandayat
अपने परम प्रिय मित्र बक को आया देख वह भी हर्षित होकर सम्मुख गया और स्वागत करते हुए अभिनंदन किया।
श्लोक 129 (skanda.6.271.129)
अथ तं चैव विश्रान्तं समालिङ्ग्य मुहुर्मुहुः प्राकारवर्णनामासौ वाक्यमेतदुवाच ह
atha taṁ caiva viśrāntaṁ samāliṅgya muhurmuhuḥ prākāravarṇanāmāsau vākyametaduvāca ha
फिर विश्राम कर चुके उसे बार-बार आलिंगन कर, कुशल-क्षेम पूछते हुए यह वचन कहा।
श्लोक 130 (skanda.6.271.130)
स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ भूप सुस्वागतं च ते सख्येऽद्य यच्च ते कार्यं वदागमनकारणम्
svāgataṁ te dvijaśreṣṭha bhūpa susvāgataṁ ca te sakhye'dya yacca te kāryaṁ vadāgamanakāraṇam
'हे द्विजश्रेष्ठ, तुम्हारा स्वागत है; हे राजन्, तुम्हारा भी सुस्वागत है। हे मित्र, अपने आगमन का कारण बताओ।'
श्लोक 131 (skanda.6.271.131)
कावेतौ पुरुषौ प्राप्तौ त्वया सार्धं ममांतिकम् दिव्यरूपौ महाभागौ तेजसा परिवारितौ
kāvetau puruṣau prāptau tvayā sārdhaṁ mamāṁtikam divyarūpau mahābhāgau tejasā parivāritau
'ये कौन दो पुरुष तुम्हारे साथ मेरे पास आए हैं, दिव्यरूपधारी, महाभाग, तेज से घिरे हुए?'
श्लोक 132 (skanda.6.271.132)
बक उवाच एष मार्कंडसंज्ञोऽत्र प्रसिद्धो भुवनत्रये महेश्वरप्रसादेन संसिद्धिं परमां गतः द्वितीयोऽसौ सुहृच्चास्य कश्चिन्नो वेद्मि तत्त्वतः मार्कंडेन समायातः सुहृदा व ममांतिकम्
baka uvāca eṣa mārkaṁḍasaṁjño'tra prasiddho bhuvanatraye maheśvaraprasādena saṁsiddhiṁ paramāṁ gataḥ dvitīyo'sau suhṛccāsya kaścinno vedmi tattvataḥ mārkaṁḍena samāyātaḥ suhṛdā va mamāṁtikam
बक ने कहा — यह त्रिभुवन में प्रसिद्ध मार्कण्ड नामक हैं, जो महेश्वर की कृपा से परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं। दूसरा इनका सुहृद है, जिसे मैं वास्तव में नहीं जानता — यह मार्कण्ड के साथ मेरे पास आया है।
श्लोक 133 (skanda.6.271.133)
यदि जानासि तं भूपमिन्द्रद्युम्नं महामते तत्त्वं कीर्तय येनासौ मरणाद्विनिवर्तते
yadi jānāsi taṁ bhūpamindradyumnaṁ mahāmate tattvaṁ kīrtaya yenāsau maraṇādvinivartate
'हे महामते, यदि आप इन्द्रद्युम्न नामक राजा को जानते हैं तो सत्य बताइए, जिससे यह मृत्यु से लौट सके।'
श्लोक 134 (skanda.6.271.134)
चिरायुस्त्वं मया ज्ञातो ह्यतः प्राप्तोऽस्मि तेंऽतिकम्
cirāyustvaṁ mayā jñāto hyataḥ prāpto'smi teṁ'tikam
'मैंने आपको दीर्घायु जानकर ही आपके समीप आना उचित समझा।'
श्लोक 135 (skanda.6.271.135)
उलूक उवाच अष्टाविंशत्प्रमाणेन कल्पा जातस्य मे स्थिताः न दृष्टो न श्रुतः कश्चिदिंद्रद्युम्नो महीपतिः
ulūka uvāca aṣṭāviṁśatpramāṇena kalpā jātasya me sthitāḥ na dṛṣṭo na śrutaḥ kaścidiṁdradyumno mahīpatiḥ
उलूक ने कहा — मुझे जन्मे अट्ठाईस कल्प बीत चुके हैं, किन्तु मैंने न कभी इन्द्रद्युम्न नामक राजा को देखा है, न सुना है।
श्लोक 136 (skanda.6.271.136)
इंद्रद्युम्न उवाच तव कस्मादुलूकत्वं शीघ्रं तन्मे प्रकीर्तय एतन्मे कौतुकं भावि यत्ते ह्यायुरनन्तकम् उलूकत्वं च संजातं रौद्रं लोकविगर्हितम्
iṁdradyumna uvāca tava kasmādulūkatvaṁ śīghraṁ tanme prakīrtaya etanme kautukaṁ bhāvi yatte hyāyuranantakam ulūkatvaṁ ca saṁjātaṁ raudraṁ lokavigarhitam
इन्द्रद्युम्न ने कहा — तुम्हें उलूकत्व कैसे प्राप्त हुआ, शीघ्र बताओ; मुझे कौतूहल है कि तुम्हारी आयु अनंत है, फिर भी उलूकत्व जैसी लोकनिंदित योनि क्यों प्राप्त हुई।
श्लोक 137 (skanda.6.271.137)
उलूक उवाच शृणु तेऽहं प्रवक्ष्यामि दीर्घायुर्मे यथा स्थितम् महेश्वरप्रसादेन बिल्वपत्रार्चनान्मया उलूकत्वं मया प्राप्तं भृगोः शापान्महात्मनः
ulūka uvāca śṛṇu te'haṁ pravakṣyāmi dīrghāyurme yathā sthitam maheśvaraprasādena bilvapatrārcanānmayā ulūkatvaṁ mayā prāptaṁ bhṛgoḥ śāpānmahātmanaḥ
उलूक ने कहा — सुनो, मैं बताता हूँ कि मेरी दीर्घायु कैसे स्थिर हुई; महेश्वर की कृपा से, बिल्वपत्र-पूजा के प्रभाव से; तथा महात्मा भृगु के शाप से मुझे उलूकत्व प्राप्त हुआ।
श्लोक 138 (skanda.6.271.138)
अहमासं पुरा विप्रः सर्वविद्यासु पारगः चमत्कारपुरे श्रेष्ठे नाम्ना ख्यातस्तु घंटकः ब्रह्मचारी दमोपेतो हरपूजार्चने रतः
ahamāsaṁ purā vipraḥ sarvavidyāsu pāragaḥ camatkārapure śreṣṭhe nāmnā khyātastu ghaṁṭakaḥ brahmacārī damopeto harapūjārcane rataḥ
'मैं पूर्वकाल में समस्त विद्याओं में पारंगत ब्राह्मण था, श्रेष्ठ चमत्कारपुर में घंटक नाम से विख्यात, ब्रह्मचारी, संयमी, हर की पूजा में रत।'
श्लोक 139 (skanda.6.271.139)
अखंडितैर्बिल्वपत्रैरग्रजातैस्त्रिपत्रकैः त्रिकालं पूजितः शंभुर्लक्षमात्रैः सदा मया
akhaṁḍitairbilvapatrairagrajātaistripatrakaiḥ trikālaṁ pūjitaḥ śaṁbhurlakṣamātraiḥ sadā mayā
'अखंडित, नवोत्पन्न, तीन पत्तों वाले बिल्वपत्रों से मैं सदा त्रिकाल शंभु की पूजा करता था, प्रत्येक बार लाख की संख्या में।'
श्लोक 140 (skanda.6.271.140)
ततो वर्षसह्स्रांते तुष्टो मे भगवान्हरः प्रोवाच दर्शनं गत्वा मेघगंभीरया गिरा
tato varṣasahsrāṁte tuṣṭo me bhagavānharaḥ provāca darśanaṁ gatvā meghagaṁbhīrayā girā
'तब सहस्र वर्षों के अंत में भगवान हर मुझसे प्रसन्न होकर, दर्शन देकर, मेघ-गंभीर वाणी में बोले।'
श्लोक 141 (skanda.6.271.141)
अहं तुष्टोऽस्मि ते वत्स वरं वरय सुव्रत अखंडितैर्बिल्वपत्रैस्त्रिकाले यत्त्वयार्चितः
ahaṁ tuṣṭo'smi te vatsa varaṁ varaya suvrata akhaṁḍitairbilvapatraistrikāle yattvayārcitaḥ
'हे वत्स, हे सुव्रत, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; वर माँगो, जिन्होंने मुझे त्रिकाल अखंडित बिल्वपत्रों से पूजा है।'
श्लोक 142 (skanda.6.271.142)
बिल्वस्य प्रसवाग्रेण त्रिपत्रेण प्रजायते एकेनापि यथातुष्टिस्तथान्येषां न कोटिभिः
bilvasya prasavāgreṇa tripatreṇa prajāyate ekenāpi yathātuṣṭistathānyeṣāṁ na koṭibhiḥ
'बिल्व की अग्रज तीन पत्तियों में से एक से भी जितनी मुझे तुष्टि होती है, उतनी अन्य करोड़ों पुष्पों से भी नहीं होती।'
श्लोक 143 (skanda.6.271.143)
पुष्पाणामपि भद्रं ते सुगंधानामपि ध्रुवम् सखे मया प्रणम्योच्चैः स प्रोक्तः शशिशेखरः
puṣpāṇāmapi bhadraṁ te sugaṁdhānāmapi dhruvam sakhe mayā praṇamyoccaiḥ sa proktaḥ śaśiśekharaḥ
'तुम्हारा मंगल हो, यह सुगंधित पुष्पों से भी बढ़कर निश्चित है।' हे मित्र, तब मैंने उच्च स्वर में प्रणाम करते हुए उन शशिशेखर से यह कहा।
श्लोक 144 (skanda.6.271.144)
यदि तुष्टोसि मे देव यदि देयो वरो मम तन्मां कुरु जगन्नाथ जरामरणवर्जितम्
yadi tuṣṭosi me deva yadi deyo varo mama tanmāṁ kuru jagannātha jarāmaraṇavarjitam
'यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे देव, और यदि मुझे वर देना चाहते हैं, तो हे जगन्नाथ, मुझे जरा-मरण से रहित कर दीजिए।'
श्लोक 145 (skanda.6.271.145)
स तथेति प्रतिज्ञाय महादेवो महेश्वरः कैलासं प्रति देवेशः क्षणाच्चादर्शनं गतः
sa tatheti pratijñāya mahādevo maheśvaraḥ kailāsaṁ prati deveśaḥ kṣaṇāccādarśanaṁ gataḥ
'तथास्तु' कहकर महादेव महेश्वर देवेश तत्क्षण कैलास की ओर अंतर्धान हो गए।
श्लोक 146 (skanda.6.271.146)
ततोहं परितुष्टोथ वरं प्राप्य महेश्वरात् कृतकृत्यमिवात्मानं चिंतयामि प्रहर्षितः
tatohaṁ parituṣṭotha varaṁ prāpya maheśvarāt kṛtakṛtyamivātmānaṁ ciṁtayāmi praharṣitaḥ
'तब महेश्वर से वर पाकर मैं अत्यंत संतुष्ट होकर, हर्षित होकर स्वयं को कृतकृत्य मानने लगा।'
श्लोक 147 (skanda.6.271.147)
एतस्मिन्नेव काले तु भार्गवो मुनिसत्तमः कुशलः सर्वशास्त्रेषु वेदवेदांग पारगः
etasminneva kāle tu bhārgavo munisattamaḥ kuśalaḥ sarvaśāstreṣu vedavedāṁga pāragaḥ
'उसी समय भार्गव नामक एक मुनिसत्तम थे, समस्त शास्त्रों में कुशल, वेद-वेदांगों में पारंगत।'
श्लोक 148 (skanda.6.271.148)
तस्य भार्याऽभवत्साध्वी नाम्ना ख्याता सुदर्शना प्राणेभ्योऽपि प्रिया तस्य गालवस्य मुनेः सुता
tasya bhāryā'bhavatsādhvī nāmnā khyātā sudarśanā prāṇebhyo'pi priyā tasya gālavasya muneḥ sutā
'उनकी पत्नी साध्वी सुदर्शना नाम से विख्यात थी, अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय, गालव मुनि की पुत्री।'
श्लोक 149 (skanda.6.271.149)
तस्य कन्या समभवद्रूपेणाप्रतिमा भुवि सा मया सहसा दृष्टा क्रीडमाना यथेच्छया
tasya kanyā samabhavadrūpeṇāpratimā bhuvi sā mayā sahasā dṛṣṭā krīḍamānā yathecchayā
'उनकी एक कन्या हुई, पृथ्वी पर अनुपम रूपवती; मैंने उसे सहसा वहाँ स्वेच्छा से क्रीड़ा करते देखा।'
श्लोक 150 (skanda.6.271.150)
मध्यक्षामा सुकेशी च बिंबोष्ठी दीर्घलोचना तामहं वीक्षयित्वा तु कामदेववशं गतः
madhyakṣāmā sukeśī ca biṁboṣṭhī dīrghalocanā tāmahaṁ vīkṣayitvā tu kāmadevavaśaṁ gataḥ
'कृशकटि, सुंदर केशों वाली, बिंबोष्ठी, दीर्घनयना — उसे देखकर मैं कामदेव के वश में हो गया।'
श्लोक 151 (skanda.6.271.151)
ततः पृष्टा मया कस्य कन्येयं चारुलोचना विभक्तसर्वावयवा देवकन्येव राजते
tataḥ pṛṣṭā mayā kasya kanyeyaṁ cārulocanā vibhaktasarvāvayavā devakanyeva rājate
'तब मैंने पूछा — यह चारुलोचना, सर्वांगसुंदरी, देवकन्या-सी शोभायमान कन्या किसकी है?'
श्लोक 152 (skanda.6.271.152)
सखीभिः कीर्तिता मह्यं भार्गवस्य मुनेः सुता एषा चाद्यापि कन्यात्वे वर्तते चारुहासिनी
sakhībhiḥ kīrtitā mahyaṁ bhārgavasya muneḥ sutā eṣā cādyāpi kanyātve vartate cāruhāsinī
'सखियों ने मुझे बताया कि यह भार्गव मुनि की पुत्री है, तथा आज भी अविवाहित, मृदुहासिनी है।'
श्लोक 153 (skanda.6.271.153)
ततोऽहं भार्गवं गत्वा विनयेन समन्वितः ययाचे कन्यकां ता च कृतांजलिपुटः स्थितः
tato'haṁ bhārgavaṁ gatvā vinayena samanvitaḥ yayāce kanyakāṁ tā ca kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ
'तब मैं विनयपूर्वक भार्गव के पास गया और हाथ जोड़े खड़े होकर उस कन्या की याचना की।'
श्लोक 154 (skanda.6.271.154)
सवर्णं मां परिज्ञाय सोऽपि भार्गवनंदनः दत्तवांस्तां महाभाग विरूपस्यापि कन्यकाम्
savarṇaṁ māṁ parijñāya so'pi bhārgavanaṁdanaḥ dattavāṁstāṁ mahābhāga virūpasyāpi kanyakām
'मुझे समान वर्ण का जानकर उन भार्गवनंदन ने भी, हे महाभाग, विरूप होते हुए भी, वह कन्या मुझे दे दी।'
श्लोक 155 (skanda.6.271.155)
अथ सा कन्यका ज्ञात्वा पित्रा दत्तास्मि धर्मतः विरूपाय ततो गत्वा मातरं वाक्यमब्रवीत्
atha sā kanyakā jñātvā pitrā dattāsmi dharmataḥ virūpāya tato gatvā mātaraṁ vākyamabravīt
'तब यह जानकर कि उसका पिता उसे धर्मानुसार विरूप को दे चुका है, वह कन्या माता के पास जाकर यह बोली।'
श्लोक 156 (skanda.6.271.156)
सुलज्जा साऽतिदुःखार्ता पश्यांब जनकेन च विरूपाय प्रदत्तास्मि नाहं जीवितुमुत्सहे
sulajjā sā'tiduḥkhārtā paśyāṁba janakena ca virūpāya pradattāsmi nāhaṁ jīvitumutsahe
'अत्यंत लज्जित, दुःखार्त होकर — हे माता, देखो, पिता ने मुझे विरूप को दे दिया है; मैं जीवित नहीं रह सकती।'
श्लोक 157 (skanda.6.271.157)
विषं वा भक्षयिष्यामि प्रवेक्ष्यामि हुताशनम् तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा निषिद्धः स द्विजस्तया
viṣaṁ vā bhakṣayiṣyāmi pravekṣyāmi hutāśanam tasyāstadvacanaṁ śrutvā niṣiddhaḥ sa dvijastayā
'मैं विष खाऊँगी अथवा अग्नि में प्रवेश करूँगी।' उसके ये वचन सुनकर उस ब्राह्मण को (पत्नी द्वारा) रोका गया।
श्लोक 158 (skanda.6.271.158)
कस्मान्नाथ प्रदत्तासौ विरूपाय त्वया विभो कन्यकेयं सुरूपाढ्या सर्वलक्षणसंयुता
kasmānnātha pradattāsau virūpāya tvayā vibho kanyakeyaṁ surūpāḍhyā sarvalakṣaṇasaṁyutā
'हे नाथ, हे विभो, यह सुंदर, सर्वलक्षणसंयुक्त कन्या आपने विरूप को क्यों दे दी?'
श्लोक 159 (skanda.6.271.159)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं भार्गवो मुनिसत्तमः ततस्तां गर्हयित्वासौ धिङ्नारी पुरुषायते
etacchrutvā tu vacanaṁ bhārgavo munisattamaḥ tatastāṁ garhayitvāsau dhiṅnārī puruṣāyate
यह वचन सुनकर मुनिसत्तम भार्गव ने उसे डाँटते हुए कहा — 'धिक्कार है! स्त्री यहाँ पुरुष जैसी बात कर रही है।'
श्लोक 160 (skanda.6.271.160)
अनेन प्रार्थिता कन्या मया चास्मै प्रदीयते तत्किं निषेधयसि मां दीयमानां सुतामिमाम्
anena prārthitā kanyā mayā cāsmai pradīyate tatkiṁ niṣedhayasi māṁ dīyamānāṁ sutāmimām
'यह कन्या इसके द्वारा माँगी गई थी, और मैंने ही इसे दी है; फिर तू दी जा रही इस पुत्री को देने से मुझे क्यों रोकती है?'
श्लोक 161 (skanda.6.271.161)
इत्युक्त्वा स प्रसुष्वाप पत्न्याथ कन्यया समम्
ityuktvā sa prasuṣvāpa patnyātha kanyayā samam
ऐसा कहकर वे पत्नी और कन्या सहित सो गए।
श्लोक 162 (skanda.6.271.162)
ततोऽर्द्धरात्रे चागत्य मया सुप्ता च भार्गवी हृत्वा स्वभवने नीता निशि सुप्ते जने तदा
tato'rddharātre cāgatya mayā suptā ca bhārgavī hṛtvā svabhavane nītā niśi supte jane tadā
'तब आधी रात को आकर, सोए हुए लोगों के बीच, मैंने सोई हुई उस भार्गवी को हरकर अपने घर ले जाया।'
श्लोक 163 (skanda.6.271.163)
नियुक्ता कामधर्मेण ह्यनिच्छंती बलान्मया विप्रः प्रातर्जजागार पिता तस्यास्ततः परम्
niyuktā kāmadharmeṇa hyanicchaṁtī balānmayā vipraḥ prātarjajāgāra pitā tasyāstataḥ param
'उसकी इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक मैंने उसे काम-धर्म में नियुक्त किया। प्रातःकाल उसके पिता जागे।'
श्लोक 164 (skanda.6.271.164)
क्वासौ सा दुहिता केन हृता नष्टा मदीयिका अथासौ वीक्षितुं बाह्ये बभ्राम स्ववनांतिकम्
kvāsau sā duhitā kena hṛtā naṣṭā madīyikā athāsau vīkṣituṁ bāhye babhrāma svavanāṁtikam
'मेरी वह पुत्री कहाँ है, किसने उसे हर लिया, वह कहाँ खो गई?' — यह कहते हुए वे बाहर अपने आश्रम के पास घूमने लगे।
श्लोक 165 (skanda.6.271.165)
पदसंहतिमार्गेण मुनिभिर्बहुभिर्वृतः तेन दृष्टाऽथ सा कन्या कृतकौतुकमंगला
padasaṁhatimārgeṇa munibhirbahubhirvṛtaḥ tena dṛṣṭā'tha sā kanyā kṛtakautukamaṁgalā
'पैरों के निशानों का अनुसरण करते, अनेक मुनियों से घिरे हुए, उन्होंने उस कन्या को विवाह-मंगल की सज्जा में देखा।'
श्लोक 166 (skanda.6.271.166)
रुदंती सस्वनं तत्र लज्जमाना ह्यधोमुखी ततः कोपपरीतात्मा मां प्रोवाच स भार्गवः
rudaṁtī sasvanaṁ tatra lajjamānā hyadhomukhī tataḥ kopaparītātmā māṁ provāca sa bhārgavaḥ
'वह वहाँ ऊँची आवाज़ में रोती हुई, लज्जित, नतमुख बैठी थी। तब क्रोध से व्याप्त होकर भार्गव ने मुझसे यह कहा।'
श्लोक 167 (skanda.6.271.167)
निशाचरस्य धर्मेण यस्मादूढा सुता मम निशाचरो भवानस्तु कर्मणानेन सांप्रतम्
niśācarasya dharmeṇa yasmādūḍhā sutā mama niśācaro bhavānastu karmaṇānena sāṁpratam
'जिस निशाचर के धर्म से मेरी पुत्री विवाहित हुई है, उसी कर्म से अब तू स्वयं निशाचर बन जा।'
श्लोक 168 (skanda.6.271.168)
घंटक उवाच निर्दोषं मां द्विजश्रेष्ठ कस्मात्त्वं शपसि द्रुतम् त्वयैषा मे स्वयं दत्ता तेन रात्रौ हृता मया
ghaṁṭaka uvāca nirdoṣaṁ māṁ dvijaśreṣṭha kasmāttvaṁ śapasi drutam tvayaiṣā me svayaṁ dattā tena rātrau hṛtā mayā
घंटक ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ, आप मुझ निर्दोष को क्यों शीघ्र शाप देते हैं? यह तो आपने ही मुझे स्वयं दी थी, इसीलिए मैं रात्रि में उसे ले गया।
श्लोक 169 (skanda.6.271.169)
यो दत्वा कन्यकां पूर्वं पश्चाद्यच्छेन्न दुर्मतिः स याति नरकं घोरं यावदाभूतसंप्लवम्
yo datvā kanyakāṁ pūrvaṁ paścādyacchenna durmatiḥ sa yāti narakaṁ ghoraṁ yāvadābhūtasaṁplavam
'जो पूर्व में कन्या देकर पीछे उसे नहीं देता, वह दुर्मति यावदाभूतसंप्लव (प्रलय) तक घोर नरक भोगता है।'
श्लोक 170 (skanda.6.271.170)
अथासौ चिंतयामास सत्यमेतेन जल्पितम् पश्चात्तापसमोपेतो वाक्यमेतदुवाच ह
athāsau ciṁtayāmāsa satyametena jalpitam paścāttāpasamopeto vākyametaduvāca ha
तब उन्होंने विचार किया — इसने सत्य ही कहा है। तत्पश्चात पश्चातापयुक्त होकर यह वचन कहा।
श्लोक 171 (skanda.6.271.171)
सत्यमेतत्त्वया प्रोक्तं न मे वचनमन्यथा उलूकरूपसंयुक्तो भविष्यसि न संशयः
satyametattvayā proktaṁ na me vacanamanyathā ulūkarūpasaṁyukto bhaviṣyasi na saṁśayaḥ
'तूने जो कहा वह सत्य है, फिर भी मेरा वचन अन्यथा नहीं होगा — तू निःसंदेह उलूक-रूप को प्राप्त होगा।'
श्लोक 172 (skanda.6.271.172)
उत्पत्स्यते यदा चात्र भर्तृयज्ञो महामुनिः तस्योपदेशमासाद्य भूयः प्राप्स्यसि स्वां तनुम्
utpatsyate yadā cātra bhartṛyajño mahāmuniḥ tasyopadeśamāsādya bhūyaḥ prāpsyasi svāṁ tanum
'जब यहाँ भर्तृयज्ञ नामक महामुनि उत्पन्न होंगे, उनका उपदेश पाकर तू पुनः अपना (मूल) शरीर प्राप्त करेगा।'
श्लोक 173 (skanda.6.271.173)
ततः कौशिकरूपं तु पश्याम्यात्मानमेव च तथापि न स्मृतिर्नष्टा मम या पूर्वसंभवा
tataḥ kauśikarūpaṁ tu paśyāmyātmānameva ca tathāpi na smṛtirnaṣṭā mama yā pūrvasaṁbhavā
'तब मैंने स्वयं को उलूक-रूप में देखा; फिर भी मेरी पूर्वजन्म-स्मृति नष्ट नहीं हुई।'
श्लोक 174 (skanda.6.271.174)
अथ या तत्सुता चोढा मया तस्मिन्गिरौ तदा सापि मां संनिरीक्ष्याथ तद्रूपं दुःखसंयुता प्रविष्टा हव्यवाहं सा विधवात्वमनिच्छती
atha yā tatsutā coḍhā mayā tasmingirau tadā sāpi māṁ saṁnirīkṣyātha tadrūpaṁ duḥkhasaṁyutā praviṣṭā havyavāhaṁ sā vidhavātvamanicchatī
'तत्पश्चात जिस पुत्री से मैंने उस पर्वत पर विवाह किया था, वह भी मुझे उस रूप में देखकर, अत्यंत दुःखी होकर, विधवा न होना चाहते हुए अग्नि में प्रविष्ट हो गई।'
श्लोक 175 (skanda.6.271.175)
एवं मे कौशिकत्वं हि संजातं तु महाद्युते भार्गवस्य तु शापेन कन्यार्थे यत्तवोदितम्
evaṁ me kauśikatvaṁ hi saṁjātaṁ tu mahādyute bhārgavasya tu śāpena kanyārthe yattavoditam
'इस प्रकार, हे महाद्युते, भार्गव के शाप से, उसकी पुत्री के कारण, मुझे उलूकत्व प्राप्त हुआ, जैसा तुम्हें बताया गया।'
श्लोक 176 (skanda.6.271.176)
अखंडबिल्वपत्रेण पूजितो यन्महेश्वरः चिरायुस्तेनसंजातं सत्यमेतन्मयोदितम्
akhaṁḍabilvapatreṇa pūjito yanmaheśvaraḥ cirāyustenasaṁjātaṁ satyametanmayoditam
'तथा अखंडित बिल्वपत्र से महेश्वर की पूजा करने से मुझे दीर्घायु प्राप्त हुई — यह मैंने तुम्हें सत्य कहा है।'
श्लोक 177 (skanda.6.271.177)
सत्यं कथय यत्कृत्यं गृहायातस्य किं तव प्रकरोमि महाभाग यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
satyaṁ kathaya yatkṛtyaṁ gṛhāyātasya kiṁ tava prakaromi mahābhāga yadyapi syātsudurlabham
'अब सत्य कहो, तुम्हारे घर आने का क्या प्रयोजन है? हे महाभाग, मैं वह कार्य करूँगा, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।'
श्लोक 178 (skanda.6.271.178)
इन्द्रद्युम्न उवाच इन्द्रद्युम्नस्य ज्ञानाय प्राप्तोऽहं यत्तवांतिकम् नाडीजंघेन चानीतो मरणे कृतनिश्चयः
indradyumna uvāca indradyumnasya jñānāya prāpto'haṁ yattavāṁtikam nāḍījaṁghena cānīto maraṇe kṛtaniścayaḥ
इन्द्रद्युम्न ने कहा — इन्द्रद्युम्न के बारे में जानने के लिए ही मैं तुम्हारे पास आया हूँ, नाडीजंघ द्वारा लाया गया, मरण का निश्चय कर चुका हूँ।
श्लोक 179 (skanda.6.271.179)
यदि नो ज्ञास्यति भवांस्तं कीर्त्या च कुलेन च प्रविशामि ततो नूनं प्रदीप्तं हव्यवाहनम्
yadi no jñāsyati bhavāṁstaṁ kīrtyā ca kulena ca praviśāmi tato nūnaṁ pradīptaṁ havyavāhanam
'यदि आप कीर्ति और कुल से भी उसे नहीं जानते, तो निश्चय ही मैं प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करूँगा।'
श्लोक 180 (skanda.6.271.180)
नो चेत्कीर्तय मे कञ्चिदन्यं तु चिरजीविनम् पृच्छामि तेन तं गत्वा येन वेत्ति न वा च सः
no cetkīrtaya me kañcidanyaṁ tu cirajīvinam pṛcchāmi tena taṁ gatvā yena vetti na vā ca saḥ
'अन्यथा मुझे किसी अन्य दीर्घजीवी का नाम बताइए; मैं उसके पास जाकर पूछूँगा, चाहे वह जानता हो या न जानता हो।'
श्लोक 181 (skanda.6.271.181)
बक उवाच युक्तमुक्तमनेनाद्य तत्कुरुष्व वदास्य भोः यदि जानासि कंचित्वमात्मनश्चिरजीविनम्
baka uvāca yuktamuktamanenādya tatkuruṣva vadāsya bhoḥ yadi jānāsi kaṁcitvamātmanaścirajīvinam
बक ने कहा — इसने आज उचित ही कहा है, वैसा ही करो। हे महोदय, बताओ, यदि तुम अपने से भी अधिक दीर्घजीवी किसी को जानते हो।
श्लोक 182 (skanda.6.271.182)
नो चेदहमपि क्षिप्रं प्रविशामि हुताशनम् मार्कंडेनापि सहितः सांप्रतं तव पश्यतः
no cedahamapi kṣipraṁ praviśāmi hutāśanam mārkaṁḍenāpi sahitaḥ sāṁprataṁ tava paśyataḥ
'अन्यथा मैं भी शीघ्र ही मार्कण्डेय सहित, अभी तुम्हारे सामने ही अग्नि में प्रवेश करूँगा।'
श्लोक 183 (skanda.6.271.183)
एवम् ज्ञात्वा महाभाग चिन्तयस्व चिरंतनम् कंचिद्भूमितलेऽन्यत्र यतस्त्वं चिरजीवधृक्
evam jñātvā mahābhāga cintayasva ciraṁtanam kaṁcidbhūmitale'nyatra yatastvaṁ cirajīvadhṛk
'यह जानकर, हे महाभाग, किसी अन्य दीर्घजीवी के विषय में सोचो, कहीं और, इस पृथ्वीतल पर, क्योंकि तुम भी दीर्घजीवी हो।'
श्लोक 184 (skanda.6.271.184)
आशया परया प्राप्तस्तवाहं किल मंदिरे पुमानेष विशेषेण मार्कंडेयः प्रियो मम
āśayā parayā prāptastavāhaṁ kila maṁdire pumāneṣa viśeṣeṇa mārkaṁḍeyaḥ priyo mama
'हे मित्र, मैं परम आशा से तुम्हारे मंदिर में आया हूँ; यह पुरुष मार्कण्डेय मुझे विशेष प्रिय है।'
श्लोक 185 (skanda.6.271.185)
संत्यत्र पर्वतश्रेष्ठाः शतशोऽथ सहस्रशः येषु सन्ति महाभागास्तापसाश्चिरजीविनः नान्यथा जीवितं चास्य कथंचित्संभविष्यति
saṁtyatra parvataśreṣṭhāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ yeṣu santi mahābhāgāstāpasāścirajīvinaḥ nānyathā jīvitaṁ cāsya kathaṁcitsaṁbhaviṣyati
'यहाँ सैकड़ों-हजारों उत्तम पर्वत हैं, जिन पर दीर्घजीवी महाभाग तपस्वी निवास करते हैं। अन्यथा इसका जीवन किसी प्रकार बच नहीं सकेगा।'
श्लोक 186 (skanda.6.271.186)
इंद्रद्युम्नस्य राजर्षेर्हितं परमकं भवेत् तथावयोर्द्वयोश्चापि तस्माच्चिंतय सत्वरम्
iṁdradyumnasya rājarṣerhitaṁ paramakaṁ bhavet tathāvayordvayoścāpi tasmācciṁtaya satvaram
'राजर्षि इन्द्रद्युम्न का सबसे बड़ा हित इसी में होगा, तथा हम दोनों का भी; अतः शीघ्र विचार करो।'
श्लोक 187 (skanda.6.271.187)
तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा मरणार्थं महीपतेः स उलूकः कृपां गत्वा ततो वचनमब्रवीत्
tasya taṁ niścayaṁ jñātvā maraṇārthaṁ mahīpateḥ sa ulūkaḥ kṛpāṁ gatvā tato vacanamabravīt
उस राजा का मृत्यु का निश्चय जानकर वह उलूक दया से युक्त होकर यह वचन बोला।
श्लोक 188 (skanda.6.271.188)
यद्येवं तु महाभाग मर्तुकामोऽसि सांप्रतम् तदागच्छ मया सार्धं गन्धमादनपर्वतम्
yadyevaṁ tu mahābhāga martukāmo'si sāṁpratam tadāgaccha mayā sārdhaṁ gandhamādanaparvatam
'हे महाभाग, यदि ऐसा है और तुम अभी मरना चाहते हो, तो मेरे साथ गंधमादन पर्वत पर चलो।'
श्लोक 189 (skanda.6.271.189)
तत्र संतिष्ठते गृध्रः स च मे परमः सुहृत् चिरंतनस्तथा सम्यक्स ते ज्ञास्यति तं नृपम् कथयिष्यत्यसंदिग्धं मम वाक्यादसंशयम्
tatra saṁtiṣṭhate gṛdhraḥ sa ca me paramaḥ suhṛt ciraṁtanastathā samyaksa te jñāsyati taṁ nṛpam kathayiṣyatyasaṁdigdhaṁ mama vākyādasaṁśayam
'वहाँ मेरा परम सुहृद, अत्यंत दीर्घजीवी एक गृध्र (गिद्ध) निवास करता है; वह उस राजा को अवश्य जानेगा, तथा मेरे वचन से निःसंदेह निःसंदिग्ध रूप से बता देगा।'
श्लोक 190 (skanda.6.271.190)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मार्कंडेयादिभिस्त्रिभिः प्रोक्तः सर्वैर्महाभाग मा त्वं प्रविश पावकम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā mārkaṁḍeyādibhistribhiḥ proktaḥ sarvairmahābhāga mā tvaṁ praviśa pāvakam
उसके वचन सुनकर मार्कण्डेय आदि तीनों ने सर्वसम्मति से कहा — 'हे महाभाग, तुम अग्नि में प्रवेश मत करो।'
श्लोक 191 (skanda.6.271.191)
वयं यास्यामहे सर्वे त्वया सार्धं च तत्र हि कदाचित्सोऽपि जानाति इंद्रद्युम्नं महीपतिम्
vayaṁ yāsyāmahe sarve tvayā sārdhaṁ ca tatra hi kadācitso'pi jānāti iṁdradyumnaṁ mahīpatim
'हम सब तुम्हारे साथ वहाँ चलेंगे; शायद वह भी इन्द्रद्युम्न राजा को जानता हो।'
श्लोक 192 (skanda.6.271.192)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा आशया परया युतः स राजा सह तैः सर्वैः प्रययौ गंधमादनम्
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā āśayā parayā yutaḥ sa rājā saha taiḥ sarvaiḥ prayayau gaṁdhamādanam
उनके वचन सुनकर, परम आशा से युक्त होकर वह राजा उन सबके साथ गंधमादन पर्वत को गया।
श्लोक 193 (skanda.6.271.193)
गृध्रराजोऽपि तान्दृष्ट्वा सर्वानेव कृतांजलिः उलूकं पुरतो दृष्ट्वा प्रहृष्टः सन्मुखो ययौ
gṛdhrarājo'pi tāndṛṣṭvā sarvāneva kṛtāṁjaliḥ ulūkaṁ purato dṛṣṭvā prahṛṣṭaḥ sanmukho yayau
गृध्रराज ने भी उन सबको हाथ जोड़े हुए देखकर, तथा सामने उलूक को देखकर, अत्यंत हर्षित होकर सम्मुख गमन किया।
श्लोक 194 (skanda.6.271.194)
ततोऽब्रवीत्प्रहृष्टात्मा स्वागतं ते द्विजोत्तम चिरकालात्प्रदृष्टोऽसि क एतेऽन्येऽत्र ये स्थिताः
tato'bravītprahṛṣṭātmā svāgataṁ te dvijottama cirakālātpradṛṣṭo'si ka ete'nye'tra ye sthitāḥ
फिर हर्षित मन से बोला — 'हे द्विजोत्तम, स्वागत है; बहुत समय बाद तुम्हारे दर्शन हुए हैं। ये अन्य कौन हैं जो यहाँ हैं?'
श्लोक 195 (skanda.6.271.195)
उलूक उवाच एष मे परमं मित्रं नाडीजंघो बकः स्मृतः एतस्यापि तु मार्कण्डः संस्थितः परमः सुहृत्
ulūka uvāca eṣa me paramaṁ mitraṁ nāḍījaṁgho bakaḥ smṛtaḥ etasyāpi tu mārkaṇḍaḥ saṁsthitaḥ paramaḥ suhṛt
उलूक ने कहा — यह मेरा परम मित्र नाडीजंघ है, बक नाम से विख्यात; इसका भी एक परम सुहृद यहाँ स्थित है, यह मार्कण्ड।
श्लोक 196 (skanda.6.271.196)
असौ त्रैलोक्यविख्यातः सप्तकल्पस्मरो भुवि एतस्यापि सुहृत्कश्चिन्नैनं जानामि सत्वरम्
asau trailokyavikhyātaḥ saptakalpasmaro bhuvi etasyāpi suhṛtkaścinnainaṁ jānāmi satvaram
'यह त्रिलोकविख्यात है, पृथ्वी पर सात कल्पों का स्मरण रखता है। इसका भी एक मित्र है, जिसे मैं अभी नहीं जानता।'
श्लोक 197 (skanda.6.271.197)
म्रियमाणो मया ह्येष समानी तस्तवांतिकम् अयं जीवति विज्ञात इंद्रद्युम्ने नरेश्वरे नो चेत्प्रविशति क्षिप्रं प्रदीप्तं हव्यवाहनम्
mriyamāṇo mayā hyeṣa samānī tastavāṁtikam ayaṁ jīvati vijñāta iṁdradyumne nareśvare no cetpraviśati kṣipraṁ pradīptaṁ havyavāhanam
'मृत्युपथ पर यह मेरे द्वारा तुम्हारे पास लाया गया है; यह तभी जीवित रहेगा जब इन्द्रद्युम्न नरेश्वर ज्ञात हों — अन्यथा यह शीघ्र प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करेगा।'
श्लोक 198 (skanda.6.271.198)
स त्वं जानासि चेद्ब्रूहि इन्द्रद्युम्नं महीपतिम् चिरंतनो मयापि त्वं तेन प्रष्टुं समागतः
sa tvaṁ jānāsi cedbrūhi indradyumnaṁ mahīpatim ciraṁtano mayāpi tvaṁ tena praṣṭuṁ samāgataḥ
'यदि तुम जानते हो तो इन्द्रद्युम्न राजा के बारे में बताओ; तुम मुझसे भी अधिक वयोवृद्ध हो, इसीलिए इन सबके साथ मैं तुम्हारे पास पूछने आया हूँ।'
श्लोक 199 (skanda.6.271.199)
गृध्र उवाच इन्द्रद्युम्नेति विख्यातं राजानं न स्मराम्यहम् न दृष्टो न श्रुतश्चापि इन्द्रद्युम्नो महीपतिः
gṛdhra uvāca indradyumneti vikhyātaṁ rājānaṁ na smarāmyaham na dṛṣṭo na śrutaścāpi indradyumno mahīpatiḥ
गृध्र ने कहा — मुझे इन्द्रद्युम्न नाम से विख्यात कोई राजा स्मरण नहीं है; मैंने न इन्द्रद्युम्न राजा को देखा है, न सुना है।
श्लोक 200 (skanda.6.271.200)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सोऽपि राजा सुदुर्मनाः मनसा चिन्तयामास मरणे कृतनिश्चयः
tasya tadvacanaṁ śrutvā so'pi rājā sudurmanāḥ manasā cintayāmāsa maraṇe kṛtaniścayaḥ
उसके वचन सुनकर वह राजा भी अत्यंत दुःखी होकर मन ही मन मृत्यु का निश्चय करने लगा।
श्लोक 201 (skanda.6.271.201)
ततस्तु कौतुकाविष्टस्तं पप्रच्छ द्विजोत्तमम् कर्मणा केन संप्राप्तमायुष्यं चेदृशं वद
tatastu kautukāviṣṭastaṁ papraccha dvijottamam karmaṇā kena saṁprāptamāyuṣyaṁ cedṛśaṁ vada
तब कौतूहल से भरकर उसने उस श्रेष्ठ पक्षी से पूछा — किस कर्म से ऐसी आयु प्राप्त हुई, बताओ।
श्लोक 202 (skanda.6.271.202)
ततः संभावयिष्यामि श्रुत्वा तेऽहं विभावसुम्
tataḥ saṁbhāvayiṣyāmi śrutvā te'haṁ vibhāvasum
'सुनने के पश्चात मैं तुम्हारा यथोचित सम्मान करूँगा।'
श्लोक 203 (skanda.6.271.203)
गृध्र उवाच अहमासं चमत्कारपुरे मर्कटकः किल उपत्यकायां तत्रैव रक्तशृंगस्य भूभृतः
gṛdhra uvāca ahamāsaṁ camatkārapure markaṭakaḥ kila upatyakāyāṁ tatraiva raktaśṛṁgasya bhūbhṛtaḥ
गृध्र ने कहा — मैं पूर्वकाल में चमत्कारपुर में, रक्तशृंग नामक पर्वत की तराई में, एक वानर था।
श्लोक 204 (skanda.6.271.204)
तत्रैवास्ति महच्छंभोर्मंदिरं मंदरोपमम् चित्रेश्वराभिधानं च सर्वपातकनाशनम्
tatraivāsti mahacchaṁbhormaṁdiraṁ maṁdaropamam citreśvarābhidhānaṁ ca sarvapātakanāśanam
'वहीं मंदराचल के समान भव्य, चित्रेश्वर नामक शंभु का एक बड़ा मंदिर है, जो समस्त पापों का नाशक है।'
श्लोक 205 (skanda.6.271.205)
वसंते तत्र संप्राप्ते पौरजानपदैस्तथा आगत्य चैव सुमहानुत्सवो विहितोऽभवत्
vasaṁte tatra saṁprāpte paurajānapadaistathā āgatya caiva sumahānutsavo vihito'bhavat
'जब वहाँ वसंत ऋतु आती, नगरवासी और ग्रामीण एकत्र होकर एक महान उत्सव मनाते थे।'
श्लोक 206 (skanda.6.271.206)
लिंगस्य सविधै रम्ये सर्वर्तुफलितद्रुमे कानने कामिनीलोककांते जनमनोहरे लिंगमारोपितं चारु तरोरांदोलके मुदा
liṁgasya savidhai ramye sarvartuphalitadrume kānane kāminīlokakāṁte janamanohare liṁgamāropitaṁ cāru tarorāṁdolake mudā
'लिंग के समीप, सर्वऋतु-फलित वृक्षों वाले सुरम्य वन में, स्त्रियों को प्रिय, मनमोहक स्थान में, वृक्ष के झूले पर आनंदपूर्वक सुंदर लिंग रखा गया।'
श्लोक 207 (skanda.6.271.207)
कृत्वा दमनकेनार्चां स्थाप्यांदोले सुयंत्रिते ययुस्ते स्वगृहं पश्चादर्चयित्वा त्रिलोचनम्
kṛtvā damanakenārcāṁ sthāpyāṁdole suyaṁtrite yayuste svagṛhaṁ paścādarcayitvā trilocanam
'दमनक पुष्प से अर्चा कर, सुव्यवस्थित झूले पर उसे स्थापित कर, त्रिलोचन की पूजा करके वे लोग अपने-अपने घर लौट गए।'
श्लोक 208 (skanda.6.271.208)
ततोऽहं रजनीवक्त्रे तां दोलां सुमनोहराम् कौतुकाविष्टहृदयो दोलयामि मुहुर्मुहुः
tato'haṁ rajanīvaktre tāṁ dolāṁ sumanoharām kautukāviṣṭahṛdayo dolayāmi muhurmuhuḥ
'तब रात्रि के समय मैं कौतूहलपूर्ण मन से उस मनोहर झूले को बार-बार झुलाने लगा।'
श्लोक 209 (skanda.6.271.209)
एवं संदोलयानस्य मम प्राप्ता नरास्तदा कैश्चित्तैस्त्रासितो हत्वा लगुडैः सर्वतोदिशम्
evaṁ saṁdolayānasya mama prāptā narāstadā kaiścittaistrāsito hatvā laguḍaiḥ sarvatodiśam
'इस प्रकार झुलाते हुए मुझे कुछ लोगों ने पकड़ लिया, भयभीत करके चारों ओर से लाठियों से मारा।'
श्लोक 210 (skanda.6.271.210)
ततः पंचत्वमापन्नस्तत्रैवायतने द्रुतम् ततो जातिस्मरो भूत्वा संजातो नृपमंदिरे
tataḥ paṁcatvamāpannastatraivāyatane drutam tato jātismaro bhūtvā saṁjāto nṛpamaṁdire
'तब मैं उसी मंदिर में तुरंत मृत्यु को प्राप्त हुआ; तत्पश्चात जातिस्मर होकर एक राजमहल में उत्पन्न हुआ।'
श्लोक 211 (skanda.6.271.211)
कोटीश्वरस्यविख्यातो नाम्ना चैव कुशध्वजः पितृपैतामहं राज्यं मया प्राप्तं ततः क्रमात्
koṭīśvarasyavikhyāto nāmnā caiva kuśadhvajaḥ pitṛpaitāmahaṁ rājyaṁ mayā prāptaṁ tataḥ kramāt
'कोटीश्वर के वंश में विख्यात, कुशध्वज नाम से, मैंने क्रमशः अपने पिता-पितामह का राज्य प्राप्त किया।'
श्लोक 212 (skanda.6.271.212)
कोटीशे समनुप्राप्ते परलोकं स्वकर्मणा जागेश्वरं महाभागं दोलयामि यथेच्छया
koṭīśe samanuprāpte paralokaṁ svakarmaṇā jāgeśvaraṁ mahābhāgaṁ dolayāmi yathecchayā
'जब कोटीश स्वकर्म से परलोक चले गए, तब मैं स्वेच्छा से महाभाग जागेश्वर को झुलाता रहा।'
श्लोक 213 (skanda.6.271.213)
शिवसिद्धांतजैर्मंत्रैर्गुरुणा संनिवेदितैः ततः कालेन महता तुष्टो देवो हरो मम भवतो वरदश्चास्मि वाक्यमेतदुवाच ह
śivasiddhāṁtajairmaṁtrairguruṇā saṁniveditaiḥ tataḥ kālena mahatā tuṣṭo devo haro mama bhavato varadaścāsmi vākyametaduvāca ha
'गुरु द्वारा बताए शिवसिद्धांत के मंत्रों से पूजा करते हुए, दीर्घकाल बाद हर देव मुझसे प्रसन्न होकर बोले — मैं तुम्हारा वरदाता हूँ।'
श्लोक 214 (skanda.6.271.214)
कुशध्वज प्रतुष्टोऽस्मि श्रद्धया परया तव वरं वृणीष्व भद्रं ते यः सदा मनसि स्थितः
kuśadhvaja pratuṣṭo'smi śraddhayā parayā tava varaṁ vṛṇīṣva bhadraṁ te yaḥ sadā manasi sthitaḥ
'हे कुशध्वज, तुम्हारी परम श्रद्धा से मैं प्रसन्न हूँ; तुम्हारा मंगल हो, जो सदा तुम्हारे मन में हो, वह वर माँगो।'
श्लोक 215 (skanda.6.271.215)
ततो मया प्रणम्योच्चैः स प्रोक्तो भगवान्हरः
tato mayā praṇamyoccaiḥ sa prokto bhagavānharaḥ
'तब मैंने उच्च स्वर में प्रणाम कर भगवान हर से यह कहा।'
श्लोक 216 (skanda.6.271.216)
यदि तुष्टोसि मे देव तन्मां कुरु निजं गणम् त्रैलोक्यराज्यमपि मे नान्यत्संप्रति रोचते
yadi tuṣṭosi me deva tanmāṁ kuru nijaṁ gaṇam trailokyarājyamapi me nānyatsaṁprati rocate
'यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे देव, तो मुझे अपना गण बना लीजिए; अब मुझे त्रिलोक का राज्य भी नहीं भाता।'
श्लोक 217 (skanda.6.271.217)
एवमुक्तो मया देवो विमाने मां निधाय सः शिवलोकं महापुण्यं सहसा मां समानयत्
evamukto mayā devo vimāne māṁ nidhāya saḥ śivalokaṁ mahāpuṇyaṁ sahasā māṁ samānayat
'मेरे ऐसा कहने पर उन देव ने मुझे विमान में बिठाकर तत्काल महापुण्यमय शिवलोक में पहुँचा दिया।'
श्लोक 218 (skanda.6.271.218)
ततः प्रसादतश्चाहं भवान्याश्च हरस्य च क्रीडामि स्वेच्छया तत्र गणमध्ये व्यवस्थितः
tataḥ prasādataścāhaṁ bhavānyāśca harasya ca krīḍāmi svecchayā tatra gaṇamadhye vyavasthitaḥ
'तब भवानी और हर की कृपा से मैं वहाँ गणों के मध्य स्वेच्छापूर्वक क्रीड़ा करता हूँ।'
श्लोक 219 (skanda.6.271.219)
कस्यचित्त्वथ कालस्य विमानवरमाश्रितः स्वेच्छयाभ्रममाणस्तु प्राप्तोऽत्रैव महागिरौ
kasyacittvatha kālasya vimānavaramāśritaḥ svecchayābhramamāṇastu prāpto'traiva mahāgirau
'फिर कुछ समय बाद, श्रेष्ठ विमान पर स्वेच्छा से विचरण करते हुए मैं इसी महागिरि पर आ पहुँचा।'
श्लोक 220 (skanda.6.271.220)
वसंतसमये प्राप्ते प्रवृत्ते दक्षिणानिले अग्निवेश्यसुता दृष्टा विवस्त्रा जलम ध्यगा
vasaṁtasamaye prāpte pravṛtte dakṣiṇānile agniveśyasutā dṛṣṭā vivastrā jalama dhyagā
'वसंत ऋतु में, दक्षिणी वायु चलते समय, मैंने अग्निवेश्य की पुत्री को जल के बीच निर्वस्त्र देखा।'
श्लोक 221 (skanda.6.271.221)
आलिभिर्बहुभिर्युक्ता क्रीडमाना यथेच्छया मुष्टिग्राह्या तु मध्ये सा बिंबोष्ठी वारिजेक्षणा
ālibhirbahubhiryuktā krīḍamānā yathecchayā muṣṭigrāhyā tu madhye sā biṁboṣṭhī vārijekṣaṇā
'अनेक सखियों सहित स्वेच्छापूर्वक क्रीड़ा करती, कटि में मुट्ठी में पकड़ी जा सके इतनी कृश, बिंबोष्ठी, कमलनयना वह...'
श्लोक 222 (skanda.6.271.222)
बिल्वस्तनी शशांकास्या सर्वलक्षणलक्षिता ततोऽहं मन्मथाविष्टः समभूवं हि तत्क्षणात्
bilvastanī śaśāṁkāsyā sarvalakṣaṇalakṣitā tato'haṁ manmathāviṣṭaḥ samabhūvaṁ hi tatkṣaṇāt
'...बिल्वफल-सदृश स्तनों वाली, चंद्रमुखी, समस्त शुभ लक्षणों से युक्त — उसे देखते ही मैं तत्क्षण कामदेव के वश में हो गया।'
श्लोक 223 (skanda.6.271.223)
अवतीर्य विमानाग्र्याद्गृहीताथ करे मया प्रकुर्वाणाथ करुणं पक्षिणीकुररी यथा
avatīrya vimānāgryādgṛhītātha kare mayā prakurvāṇātha karuṇaṁ pakṣiṇīkurarī yathā
'अपने श्रेष्ठ विमान से उतरकर मैंने उसे हाथ से पकड़ लिया, तब वह कुररी पक्षिणी के समान करुण विलाप करने लगी।'
श्लोक 224 (skanda.6.271.224)
ततः कन्या मुनींद्राणां याः स्थितास्तत्र वारिणि रुदंत्यः संप्रयातास्ता अग्निवेश्यस्य संनिधौ
tataḥ kanyā munīṁdrāṇāṁ yāḥ sthitāstatra vāriṇi rudaṁtyaḥ saṁprayātāstā agniveśyasya saṁnidhau
'तब वहाँ जल में स्थित मुनिश्रेष्ठों की जो अन्य कन्याएँ थीं, वे रोती हुई अग्निवेश्य के पास गईं।'
श्लोक 225 (skanda.6.271.225)
नीयते त्वत्सुता ब्रह्मन्विमानवरमाश्रिता वैमानिकेन केनापि क्रन्दमाना निरर्गलम्
nīyate tvatsutā brahmanvimānavaramāśritā vaimānikena kenāpi krandamānā nirargalam
'हे ब्रह्मन्, आपकी पुत्री को कोई आकाशचारी विमान पर बिठाकर हर ले जा रहा है, वह बेरोक-टोक रो रही है।'
श्लोक 226 (skanda.6.271.226)
तच्छ्रुत्वा कुपितः सोऽथ व्योममार्गावलोकनः स्वाश्रमात्संप्रयातः स भर्त्समानो मुहुर्मुहुः
tacchrutvā kupitaḥ so'tha vyomamārgāvalokanaḥ svāśramātsaṁprayātaḥ sa bhartsamāno muhurmuhuḥ
यह सुनकर वे क्रोधित होकर, आकाशमार्ग की ओर देखते हुए अपने आश्रम से निकल पड़े, बार-बार मुझे धिक्कारते हुए।
श्लोक 227 (skanda.6.271.227)
तिष्ठतिष्ठेति च प्रोच्य स्तंभयामास सर्वतः तपसोग्रेण विप्रस्य विमानं मम संस्थितम्
tiṣṭhatiṣṭheti ca procya staṁbhayāmāsa sarvataḥ tapasogreṇa viprasya vimānaṁ mama saṁsthitam
'रुको, रुको' कहते हुए, अपने उग्र तप के प्रभाव से उस विप्र ने मेरे विमान को चारों ओर से पूर्णतः स्तंभित कर दिया।'
श्लोक 228 (skanda.6.271.228)
अब्रवीच्च ततो मां स कोपेन महताऽन्वितः यस्मात्पाप त्वया कन्या क्रीडती विहृताधुना
abravīcca tato māṁ sa kopena mahatā'nvitaḥ yasmātpāpa tvayā kanyā krīḍatī vihṛtādhunā
फिर अत्यंत क्रोध से भरकर उसने मुझसे कहा — 'हे पापी, चूँकि तूने क्रीड़ारत मेरी कन्या को अभी हर लिया...'
श्लोक 229 (skanda.6.271.229)
अकामा मांसपेशीव यथा गृध्रेण दुर्मते तस्माद्गृध्रो भवत्वाशु मम वाक्यादसंशयम्
akāmā māṁsapeśīva yathā gṛdhreṇa durmate tasmādgṛdhro bhavatvāśu mama vākyādasaṁśayam
'...अनिच्छुक होते हुए भी, जैसे गिद्ध मांस का टुकड़ा उठा ले जाता है — इसलिए हे दुर्मते, मेरे वचन से निःसंदेह अभी तू गृध्र (गिद्ध) हो जा।'
श्लोक 230 (skanda.6.271.230)
एवमुक्तस्ततस्तेन लज्जयाऽहं परिप्लुतः निवेद्य कन्यकां तस्मै प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः
evamuktastatastena lajjayā'haṁ pariplutaḥ nivedya kanyakāṁ tasmai praṇipatya muhurmuhuḥ
उनके ऐसा कहने पर मैं लज्जा से अभिभूत होकर बार-बार प्रणाम करते हुए वह कन्या उन्हें लौटा दी।
श्लोक 231 (skanda.6.271.231)
ततः प्रोक्तो मया विप्रस्त्वग्निवेश्यो महातपाः न मया ते सुता ज्ञाता न कोपयितुमर्हसि
tataḥ prokto mayā viprastvagniveśyo mahātapāḥ na mayā te sutā jñātā na kopayitumarhasi
फिर मैंने उन महातपस्वी अग्निवेश्य विप्र से कहा — 'मुझे नहीं पता था कि यह आपकी पुत्री है, आपको क्रोध नहीं करना चाहिए।'
श्लोक 232 (skanda.6.271.232)
गृध्रत्वं मे यथा न स्यात्तथाकुरु मुनीश्वर
gṛdhratvaṁ me yathā na syāttathākuru munīśvara
'हे मुनीश्वर, कुछ ऐसा कीजिए कि मुझे गृध्रत्व प्राप्त न हो।'
श्लोक 233 (skanda.6.271.233)
ततोऽहं तेन च प्रोक्तो न मिथ्यावचनं मम कथंचिज्जायते तस्माद्गृध्रत्वं प्रभविष्यति
tato'haṁ tena ca prokto na mithyāvacanaṁ mama kathaṁcijjāyate tasmādgṛdhratvaṁ prabhaviṣyati
तब उन्होंने मुझसे कहा — 'मेरा वचन मिथ्या नहीं हो सकता, किसी न किसी प्रकार तुझे गृध्रत्व प्राप्त होकर ही रहेगा।'
श्लोक 234 (skanda.6.271.234)
आनर्तस्योपदेशेन यदा यास्यसि भोऽधम भर्तृयज्ञं महाभागमुपदेशकृते तदा
ānartasyopadeśena yadā yāsyasi bho'dhama bhartṛyajñaṁ mahābhāgamupadeśakṛte tadā
'किन्तु हे अधम, जब तू आनर्त के उपदेश से महाभाग भर्तृयज्ञ के पास उपदेश हेतु जाएगा...'
श्लोक 235 (skanda.6.271.235)
तस्माच्च निष्कृतिं प्राप्य गृध्रत्वं ते प्रयास्यति स मयाऽन्वेषमाणेन न दृष्टो नैव च श्रुतः निर्विण्णो गृध्रभावेन शापांतो न च मेऽभवत्
tasmācca niṣkṛtiṁ prāpya gṛdhratvaṁ te prayāsyati sa mayā'nveṣamāṇena na dṛṣṭo naiva ca śrutaḥ nirviṇṇo gṛdhrabhāvena śāpāṁto na ca me'bhavat
'...तब उससे मुक्ति पाकर तेरा गृध्रत्व समाप्त हो जाएगा।' मैंने खोजने पर भी उन्हें न देखा, न सुना; गृध्र-भाव से विरक्त होते हुए भी मेरा शाप अभी तक समाप्त नहीं हुआ।
श्लोक 236 (skanda.6.271.236)
गृध्र उवाच एतत्ते सर्वमाख्यातं गृधत्वस्य च कारणम् आयुष्यं च यथा जातं मम संख्याविवर्जितम्
gṛdhra uvāca etatte sarvamākhyātaṁ gṛdhatvasya ca kāraṇam āyuṣyaṁ ca yathā jātaṁ mama saṁkhyāvivarjitam
गृध्र ने कहा — इस प्रकार मैंने तुम्हें गृध्रत्व का सम्पूर्ण कारण बताया, तथा यह भी कि मेरी असंख्य आयु कैसे प्राप्त हुई।
श्लोक 237 (skanda.6.271.237)
इन्द्रद्युम्न उवाच अनुज्ञां देहि मे शीघ्रं प्रविशामि हुताशनम् येन वैराग्यमापन्नो न हि जीवितुमुत्सहे
indradyumna uvāca anujñāṁ dehi me śīghraṁ praviśāmi hutāśanam yena vairāgyamāpanno na hi jīvitumutsahe
इन्द्रद्युम्न ने कहा — मुझे शीघ्र आज्ञा दीजिए, मैं अग्नि में प्रवेश करता हूँ; वैराग्य को प्राप्त होकर मुझमें जीने का साहस नहीं है।
श्लोक 238 (skanda.6.271.238)
एवमुक्तः स तेनाथ चिंतयामास चेतसि ममांतिकं समायात एवं मित्रसमन्वितः तत्करोमि यथाशक्त्या स्वोपकारं सुदुर्लभम्
evamuktaḥ sa tenātha ciṁtayāmāsa cetasi mamāṁtikaṁ samāyāta evaṁ mitrasamanvitaḥ tatkaromi yathāśaktyā svopakāraṁ sudurlabham
ऐसा कहे जाने पर उसने मन में सोचा — यह इतने मित्रों सहित मेरे पास आया है; अतः यथाशक्ति मैं इसका कोई दुर्लभ उपकार करूँ।
श्लोक 239 (skanda.6.271.239)
ततः प्रोवाच तं प्रीत्या दाक्षिण्यं परमं गतः मा साधय चाग्निं भोः शृणु तावद्वचो मम
tataḥ provāca taṁ prītyā dākṣiṇyaṁ paramaṁ gataḥ mā sādhaya cāgniṁ bhoḥ śṛṇu tāvadvaco mama
तब स्नेह और परम दाक्षिण्यवश उसने कहा — 'अग्नि साधना मत करो, पहले मेरे वचन सुनो।'
श्लोक 240 (skanda.6.271.240)
अहं ते कीर्तयिष्यामि मत्तो योऽपि चिरंतनः
ahaṁ te kīrtayiṣyāmi matto yo'pi ciraṁtanaḥ
'मैं तुम्हें अपने से भी अधिक वयोवृद्ध किसी का पता बताता हूँ।'
श्लोक 241 (skanda.6.271.241)
यो ज्ञास्यति न संदेह इंद्रद्युम्नं महीपतिम्
yo jñāsyati na saṁdeha iṁdradyumnaṁ mahīpatim
'जो निःसंदेह इन्द्रद्युम्न राजा को जान लेगा।'
श्लोक 242 (skanda.6.271.242)
तदागच्छ मया सार्धं तत्समीपं महात्मनः सहायैः सहितः सर्वैर्मया सार्धं तथैव च
tadāgaccha mayā sārdhaṁ tatsamīpaṁ mahātmanaḥ sahāyaiḥ sahitaḥ sarvairmayā sārdhaṁ tathaiva ca
'अतः अपने सभी सहायकों सहित मेरे साथ उन महात्मा के समीप चलो।'
श्लोक 243 (skanda.6.271.243)
इंद्रद्युम्न उवाच कस्तवाप्यधिकोऽप्यस्ति जीवितव्येन सद्द्विज एतन्मे कौतुकं भूरि तस्माद्वद महामते
iṁdradyumna uvāca kastavāpyadhiko'pyasti jīvitavyena saddvija etanme kautukaṁ bhūri tasmādvada mahāmate
इन्द्रद्युम्न ने कहा — हे सद्द्विज, क्या तुमसे भी अधिक वयोवृद्ध कोई है? मुझे इसका अत्यंत कौतूहल है, हे महामते, बताओ।
श्लोक 244 (skanda.6.271.244)
गृध्र उवाच अस्ति मंथरकोनाम कमठश्चिरजीवितः मानसे सरसि ख्यात इन्द्रद्युम्नं स वेत्स्यति
gṛdhra uvāca asti maṁtharakonāma kamaṭhaścirajīvitaḥ mānase sarasi khyāta indradyumnaṁ sa vetsyati
गृध्र ने कहा — मानस सरोवर में मंथरक नामक एक दीर्घजीवी कच्छप विख्यात है; वह इन्द्रद्युम्न को अवश्य जानेगा।
श्लोक 245 (skanda.6.271.245)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मार्कंडाद्याश्च ते त्रयः तमूचुः पार्थिवश्रेष्ठं मरणे कृतनिश्चयम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā mārkaṁḍādyāśca te trayaḥ tamūcuḥ pārthivaśreṣṭhaṁ maraṇe kṛtaniścayam
उसके वचन सुनकर मार्कण्डेय आदि उन तीनों ने मरण का निश्चय कर चुके उस पार्थिवश्रेष्ठ से कहा।
श्लोक 246 (skanda.6.271.246)
युक्तमुक्तं महाभाग गृधराजेन धीमता तत्र यास्यामहे सर्वे यत्रासौ कमठः स्थितः
yuktamuktaṁ mahābhāga gṛdharājena dhīmatā tatra yāsyāmahe sarve yatrāsau kamaṭhaḥ sthitaḥ
'हे महाभाग, बुद्धिमान गृध्रराज ने जो कहा वह उचित ही है; चलो, हम सब वहीं चलें जहाँ वह कच्छप निवास करता है।'
श्लोक 247 (skanda.6.271.247)
अनिर्वेदः श्रियो मूलं यतः शंसंति पंडिताः नीतिशास्त्रविदः सर्वे तस्मादागच्छ गम्यताम्
anirvedaḥ śriyo mūlaṁ yataḥ śaṁsaṁti paṁḍitāḥ nītiśāstravidaḥ sarve tasmādāgaccha gamyatām
'नीतिशास्त्र के जानकार सभी पंडित कहते हैं कि निराशा न करना ही सम्पत्ति का मूल है; अतः चलो, आगे बढ़ें।'
श्लोक 248 (skanda.6.271.248)
सूत उवाच तेषां तद्वचनं श्रुत्वाकृच्छ्रान्निर्वर्त्य पार्थिवः मरणाद्ब्राह्मणश्रेष्ठा वैराग्यं परमं गतः
sūta uvāca teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvākṛcchrānnirvartya pārthivaḥ maraṇādbrāhmaṇaśreṣṭhā vairāgyaṁ paramaṁ gataḥ
सूत जी ने कहा — हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, उनके वचन सुनकर वह राजा, यद्यपि परम वैराग्य को प्राप्त था, कठिनाई से मृत्यु से विरत हुआ।
श्लोक 249 (skanda.6.271.249)
अथ ते प्रस्थिताः सर्वे गंधमादनपर्वतात् पंचापि च समादिश्य मानसं सर उत्तमम् अथ प्राप्ताः क्रमेणैव गच्छमाना विहायसा
atha te prasthitāḥ sarve gaṁdhamādanaparvatāt paṁcāpi ca samādiśya mānasaṁ sara uttamam atha prāptāḥ krameṇaiva gacchamānā vihāyasā
तब वे पाँचों गंधमादन पर्वत से प्रस्थान कर, उत्तम मानस सरोवर की ओर दिशा-निर्देश कर, क्रमशः आकाशमार्ग से जाते हुए वहाँ पहुँचे।
श्लोक 250 (skanda.6.271.250)
मानसं तत्सरो रम्यं कूर्मस्तोयाद्विनिर्गतः निदाघे सेवमानस्तु संतिष्ठति यदृच्छया
mānasaṁ tatsaro ramyaṁ kūrmastoyādvinirgataḥ nidāghe sevamānastu saṁtiṣṭhati yadṛcchayā
उस सुरम्य मानस सरोवर में जल से बाहर निकला एक कच्छप, ग्रीष्म का सेवन करते हुए, स्वेच्छा से वहाँ बैठा था।
श्लोक 251 (skanda.6.271.251)
स च तांश्चतुरो दृष्ट्वा सुचिरं च निरीक्ष्य तान् परिज्ञाय ततः सर्वान्प्रनष्टः सलिलं प्रति
sa ca tāṁścaturo dṛṣṭvā suciraṁ ca nirīkṣya tān parijñāya tataḥ sarvānpranaṣṭaḥ salilaṁ prati
उन चारों को देखकर, चिरकाल तक उन्हें निहारकर, तथा उन्हें पहचानकर, वह सबको छोड़कर जल की ओर भाग गया।
श्लोक 252 (skanda.6.271.252)
अथ तं कौशिकः प्राह गच्छमानं पराङ्मुखम् भोभो मित्राय मां दृष्ट्वा संजातोऽसि पराङ्मुखः
atha taṁ kauśikaḥ prāha gacchamānaṁ parāṅmukham bhobho mitrāya māṁ dṛṣṭvā saṁjāto'si parāṅmukhaḥ
तब पीठ फेरकर जाते उससे उलूक ने कहा — 'अरे मित्र, मुझे देखकर तुम पीठ फेरकर क्यों जा रहे हो?'
श्लोक 253 (skanda.6.271.253)
सुनीचोऽपि गृहं प्राप्तो भवेत्पूज्य तमः सताम्
sunīco'pi gṛhaṁ prāpto bhavetpūjya tamaḥ satām
'नीच व्यक्ति भी जब घर आ जाए तो सज्जनों द्वारा सम्मानित होना चाहिए।'
श्लोक 254 (skanda.6.271.254)
अथासौ तोयमध्यस्थः शिरोमात्रं बहिर्गतः प्रत्युवाचाथ तं गृध्रं विनयाद्द्विजसत्तमाः
athāsau toyamadhyasthaḥ śiromātraṁ bahirgataḥ pratyuvācātha taṁ gṛdhraṁ vinayāddvijasattamāḥ
हे द्विजसत्तमो, तब जल के मध्य खड़े होकर, केवल सिर बाहर निकालकर, उसने विनयपूर्वक उस गृध्र को उत्तर दिया।
श्लोक 255 (skanda.6.271.255)
नाहं पराङ्मुखो जात स्त्वां दृष्ट्वाऽनंतरावुभौ पंचमोऽयं समभ्येति यो युष्माकं महापुमान्
nāhaṁ parāṅmukho jāta stvāṁ dṛṣṭvā'naṁtarāvubhau paṁcamo'yaṁ samabhyeti yo yuṣmākaṁ mahāpumān
'मैं तुम्हें और इस दूसरे को देखकर पीठ नहीं फेर रहा — बल्कि तुम सबमें से यह पाँचवाँ महापुरुष आ रहा है, उसी से।'
श्लोक 256 (skanda.6.271.256)
भयात्तस्य प्रणष्टोऽहमिंद्रद्युम्नस्य भूपतेः अनेन तु प्रदग्धा मे पुरा पृष्ठिर्मखाग्निना सततं यजमानेन रोचके सत्पुरोत्तमे
bhayāttasya praṇaṣṭo'hamiṁdradyumnasya bhūpateḥ anena tu pradagdhā me purā pṛṣṭhirmakhāgninā satataṁ yajamānena rocake satpurottame
'इन्द्रद्युम्न राजा के भय से ही मैं भागा हूँ — क्योंकि पूर्वकाल में रोचक नामक श्रेष्ठ नगर में निरंतर यज्ञ करते हुए इन्हीं के यज्ञाग्नि से मेरी पीठ जल गई थी।'
श्लोक 257 (skanda.6.271.257)
एतदीयं पुनः स्मृत्वा भयं मे सुमहत्स्थितम् इंद्रद्युम्नस्य राजर्षेः कीर्ति संश्रयणं महत्
etadīyaṁ punaḥ smṛtvā bhayaṁ me sumahatsthitam iṁdradyumnasya rājarṣeḥ kīrti saṁśrayaṇaṁ mahat
'उसे पुनः स्मरण कर मुझे बड़ा भय हुआ; राजर्षि इन्द्रद्युम्न की कीर्ति का आश्रय महान है।'
श्लोक 258 (skanda.6.271.258)
इत्येवमुक्ते वचने कमठेन तदा दिवः देवदूतः समागच्छच्छासनात्परमेष्ठिनः
ityevamukte vacane kamaṭhena tadā divaḥ devadūtaḥ samāgacchacchāsanātparameṣṭhinaḥ
कच्छप के यह वचन कहते ही परमेष्ठी ब्रह्मा की आज्ञा से आकाश से एक देवदूत आ पहुँचा।
श्लोक 259 (skanda.6.271.259)
देवदूत उवाच आगच्छागच्छ राजर्षे सांप्रतं ब्रह्मणोंऽतिकम् उक्तोऽहं ब्रह्मणा राजन्कीर्तिश्चास्य पृथग्विधा
devadūta uvāca āgacchāgaccha rājarṣe sāṁprataṁ brahmaṇoṁ'tikam ukto'haṁ brahmaṇā rājankīrtiścāsya pṛthagvidhā
देवदूत ने कहा — हे राजर्षि, आइए, अभी ब्रह्मा के समीप चलिए; हे राजन्, मुझे ब्रह्मा ने भेजा है — अब आपकी कीर्ति नाना प्रकार से फैल चुकी है।
श्लोक 260 (skanda.6.271.260)
यदा प्रकाशतां याति स्वल्पापि जगती तले तदाऽऽनेयो द्रुतं राजा मम लोके सुदुर्लभे
yadā prakāśatāṁ yāti svalpāpi jagatī tale tadā''neyo drutaṁ rājā mama loke sudurlabhe
'(ब्रह्मा ने कहा —) जैसे ही पृथ्वीतल पर उसकी थोड़ी भी कीर्ति फैले, राजा को शीघ्र मेरे अत्यंत दुर्लभ लोक में ले आना।'
श्लोक 261 (skanda.6.271.261)
तस्मादागच्छ गच्छामो विमानारोहणं कुरु नयामि येन तत्पार्श्वं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः
tasmādāgaccha gacchāmo vimānārohaṇaṁ kuru nayāmi yena tatpārśvaṁ brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ
'अतः आइए, चलें, विमान पर आरूढ़ हों; मैं आपको अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा के समीप ले चलूँगा।'
श्लोक 262 (skanda.6.271.262)
इंद्रद्युम्न उवाच यद्येते सुहृदो मह्यं बककौशिककच्छपाः मार्कंडेयेन सहिता आगच्छंति मया सह
iṁdradyumna uvāca yadyete suhṛdo mahyaṁ bakakauśikakacchapāḥ mārkaṁḍeyena sahitā āgacchaṁti mayā saha
इन्द्रद्युम्न ने कहा — यदि मेरे ये सुहृद बक, कौशिक (उलूक) तथा कच्छप, मार्कण्डेय सहित मेरे साथ चलें...
श्लोक 263 (skanda.6.271.263)
आगच्छामि त्वया सार्धं तदहं ब्रह्मणोंऽतिकम् अन्यथा नागमिष्यामि सत्यमेतन्मयोदितम्
āgacchāmi tvayā sārdhaṁ tadahaṁ brahmaṇoṁ'tikam anyathā nāgamiṣyāmi satyametanmayoditam
'...तो मैं तुम्हारे साथ ब्रह्मा के समीप चलूँगा; अन्यथा नहीं चलूँगा — यह मैंने सत्य कहा है।'
श्लोक 264 (skanda.6.271.264)
देवदूत उवाच एते हरगणाः सर्वे शापभ्रष्टा क्षितिं गताः शापांते हरपार्श्वे तु यो यास्यंत्यसंशयम्
devadūta uvāca ete haragaṇāḥ sarve śāpabhraṣṭā kṣitiṁ gatāḥ śāpāṁte harapārśve tu yo yāsyaṁtyasaṁśayam
देवदूत ने कहा — ये सब हर के गण हैं, शाप से भ्रष्ट होकर पृथ्वी पर आए; शाप समाप्त होने पर वे निःसंदेह हर के समीप ही जाएँगे।
श्लोक 265 (skanda.6.271.265)
तस्मादागच्छ गच्छामो मुक्त्वात्रैतान्द्रुतं नृप न चैषां रोचते स्वर्गो मुक्त्वा देवं महेश्वरम्
tasmādāgaccha gacchāmo muktvātraitāndrutaṁ nṛpa na caiṣāṁ rocate svargo muktvā devaṁ maheśvaram
'अतः हे नृप, इन्हें छोड़कर शीघ्र चलें; इन्हें महेश्वर देव के अतिरिक्त कोई भी स्वर्ग नहीं भाता।'
श्लोक 266 (skanda.6.271.266)
इंद्रद्युम्न उवाच यद्येवं गच्छ ते भद्रं नाहं गंता त्रिविष्टपम् तथातथा यतिष्यामि भविष्यामि यथा गणः
iṁdradyumna uvāca yadyevaṁ gaccha te bhadraṁ nāhaṁ gaṁtā triviṣṭapam tathātathā yatiṣyāmi bhaviṣyāmi yathā gaṇaḥ
इन्द्रद्युम्न ने कहा — यदि ऐसा है तो तुम्हारा मंगल हो, तुम जाओ; मैं स्वर्ग नहीं जाऊँगा। मैं वैसा ही प्रयत्न करूँगा जिससे मैं भी गण बन सकूँ।
श्लोक 267 (skanda.6.271.267)
तत्रस्थस्य ध्रुवं भावि नित्यं च पतनाद्भयम् एवमुक्तः स तेनाथ समादाय विमानकम्
tatrasthasya dhruvaṁ bhāvi nityaṁ ca patanādbhayam evamuktaḥ sa tenātha samādāya vimānakam
'वहाँ रहने वाले के लिए सदा नीचे गिरने का भय अवश्य बना रहता है।' ऐसा कहे जाने पर उसने अपना विमान लेकर...
श्लोक 268 (skanda.6.271.268)
ब्रह्मलोकं गतो दूतो वैलक्ष्यं परमं गतः इंद्रद्युम्नोपि प्रपच्छ तं कूर्मं विनयान्वितः
brahmalokaṁ gato dūto vailakṣyaṁ paramaṁ gataḥ iṁdradyumnopi prapaccha taṁ kūrmaṁ vinayānvitaḥ
...ब्रह्मलोक को प्रस्थान किया, अत्यंत विस्मित होकर। इन्द्रद्युम्न ने भी विनयपूर्वक उस कच्छप से पूछा।
श्लोक 269 (skanda.6.271.269)
आख्याहि कूर्म स्वं कर्म यदीदृक्त्वं चिरंतनः कर्मणा केन तत्प्राप्तं कूर्मत्वं शंस मे द्रुतम्
ākhyāhi kūrma svaṁ karma yadīdṛktvaṁ ciraṁtanaḥ karmaṇā kena tatprāptaṁ kūrmatvaṁ śaṁsa me drutam
'हे कच्छप, बताओ अपना कर्म, जो तुम इतने वयोवृद्ध हो; किस कर्म से तुम्हें यह कच्छपत्व प्राप्त हुआ, मुझे शीघ्र बताओ।'
श्लोक 270 (skanda.6.271.270)
कूर्म उवाच अहमासं पुरा विप्रो बालभावे व्यवस्थितः चमत्कारपुरे रम्ये शांडिल्यो नाम विश्रुतः
kūrma uvāca ahamāsaṁ purā vipro bālabhāve vyavasthitaḥ camatkārapure ramye śāṁḍilyo nāma viśrutaḥ
कच्छप ने कहा — मैं पूर्वकाल में बाल्यावस्था में सुंदर चमत्कारपुर में शांडिल्य नाम से विख्यात एक ब्राह्मण था।
श्लोक 271 (skanda.6.271.271)
बालक्रीडासु सर्वासु क्रीडमानो यदृच्छया पक्वेष्टिकमयं शंभोः क्रीडता निर्मितं गृहम् तत्र जागेश्वरं लिंगं हृत्वाऽथ विनिवेशितम्
bālakrīḍāsu sarvāsu krīḍamāno yadṛcchayā pakveṣṭikamayaṁ śaṁbhoḥ krīḍatā nirmitaṁ gṛham tatra jāgeśvaraṁ liṁgaṁ hṛtvā'tha viniveśitam
'सभी बाल-क्रीड़ाओं में स्वेच्छा से खेलते हुए मैंने खेल-खेल में शंभु के लिए पकी ईंटों का एक घर बनाया; वहाँ जागेश्वर लिंग को हरकर स्थापित कर दिया।'
श्लोक 272 (skanda.6.271.272)
ततोऽहं भक्तिसंयुक्तः पूजयामि दिनेदिने क्रीडमानो विना मंत्रैः शिशुभिः परिवारितः
tato'haṁ bhaktisaṁyuktaḥ pūjayāmi dinedine krīḍamāno vinā maṁtraiḥ śiśubhiḥ parivāritaḥ
'तब भक्तिपूर्वक मैं प्रतिदिन उसकी पूजा करता, बिना मंत्रों के, खेलते हुए, अन्य बालकों से घिरा हुआ।'
श्लोक 273 (skanda.6.271.273)
कस्यचित्त्वथ कालस्य मरणे समुपस्थिते जातिस्मरो ह्यहं विप्रो जातो वै वैदिशे पुरे
kasyacittvatha kālasya maraṇe samupasthite jātismaro hyahaṁ vipro jāto vai vaidiśe pure
'कुछ समय बाद जब मृत्यु आई, तब मैं जातिस्मर ब्राह्मण होकर वैदिश नगर में उत्पन्न हुआ।'
श्लोक 274 (skanda.6.271.274)
ततो मेऽभ्यधिका जाता भक्तिर्देवं हरं प्रति कृत्त्वा भिक्षाटनं नित्यं याचयित्वा धनं बहु
tato me'bhyadhikā jātā bhaktirdevaṁ haraṁ prati kṛttvā bhikṣāṭanaṁ nityaṁ yācayitvā dhanaṁ bahu
'तब हर देव के प्रति मेरी भक्ति और भी बढ़ गई; नित्य भिक्षाटन करते हुए मैंने बहुत धन एकत्र किया।'
श्लोक 275 (skanda.6.271.275)
कृत्वा प्रासादमात्रं तु लिंगं संस्थापितं मया पूजयामि ततो भक्त्या देवं पशुपतिं हरम्
kṛtvā prāsādamātraṁ tu liṁgaṁ saṁsthāpitaṁ mayā pūjayāmi tato bhaktyā devaṁ paśupatiṁ haram
'मंदिर बनवाकर उसमें लिंग स्थापित किया, तत्पश्चात भक्तिपूर्वक पशुपति हर देव की पूजा करने लगा।'
श्लोक 276 (skanda.6.271.276)
ब्रह्मविद्यासमोपेतो भिक्षान्नकृतभोजनः ब्रह्मचर्यसमोपेतस्त्रिकालं च जपञ्छिवम्
brahmavidyāsamopeto bhikṣānnakṛtabhojanaḥ brahmacaryasamopetastrikālaṁ ca japañchivam
'ब्रह्मविद्या से युक्त, भिक्षान्न से जीवन-निर्वाह करता, ब्रह्मचर्य पालन करता, त्रिकाल शिव का जप करता...'
श्लोक 277 (skanda.6.271.277)
ततस्तेन प्रभावेन संजा तोऽहं भवांतरे सार्वभौमो महीपालो जातिस्मरणसंयुतः
tatastena prabhāvena saṁjā to'haṁ bhavāṁtare sārvabhaumo mahīpālo jātismaraṇasaṁyutaḥ
'...उसी प्रभाव से मैं दूसरे जन्म में सार्वभौम राजा हुआ, पूर्वजन्म-स्मृति सहित।'
श्लोक 278 (skanda.6.271.278)
ततः संख्याविहीनाश्च प्रासादाः कारिता मया त्रिनेत्रस्य महाराज कैलास शिखरोपमाः
tataḥ saṁkhyāvihīnāśca prāsādāḥ kāritā mayā trinetrasya mahārāja kailāsa śikharopamāḥ
'हे महाराज, तब मैंने त्रिनेत्र देव के लिए कैलास-शिखर के समान असंख्य मंदिर बनवाए।'
श्लोक 279 (skanda.6.271.279)
तथा निरूपिता पूजा बहुपुष्पसमुद्भवा नान्यत्किंचित्करोम्यत्र धर्म दानादिकं नृप
tathā nirūpitā pūjā bahupuṣpasamudbhavā nānyatkiṁcitkaromyatra dharma dānādikaṁ nṛpa
'तथा बहुपुष्पों से पूजा की व्यवस्था कराई; हे नृप, इसके अतिरिक्त मैंने अन्य कोई धर्म-कार्य, दान आदि नहीं किया।'
श्लोक 280 (skanda.6.271.280)
ततः कालेन महता तुष्टो मे शशिशेखरः ततः प्रोवाच राजर्षे प्रहसञ्छ्लक्ष्णया गिरा
tataḥ kālena mahatā tuṣṭo me śaśiśekharaḥ tataḥ provāca rājarṣe prahasañchlakṣṇayā girā
'तब दीर्घकाल पश्चात शशिशेखर मुझसे प्रसन्न हुए और मुस्कुराते हुए, हे राजर्षि, मधुर वाणी में बोले।'
श्लोक 281 (skanda.6.271.281)
जयदत्त प्रतुष्टोऽस्मि तव पार्थिवसत्तम भक्त्याऽनया द्रुतं ब्रूहि किं ते यच्छामि वांछितम्
jayadatta pratuṣṭo'smi tava pārthivasattama bhaktyā'nayā drutaṁ brūhi kiṁ te yacchāmi vāṁchitam
'हे जयदत्त, हे पार्थिवसत्तम, मैं तुम्हारी इस भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ; शीघ्र बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है जो मैं पूर्ण करूँ?'
श्लोक 282 (skanda.6.271.282)
प्रणिपत्य ततोऽष्टांगं स्तुत्वा चैव पृथिग्विधम् मया प्रोक्तो हरो राजन्कुरु मामजरामरम् स तथेति प्रतिज्ञाय गतोंऽतर्धानमेव हि
praṇipatya tato'ṣṭāṁgaṁ stutvā caiva pṛthigvidham mayā prokto haro rājankuru māmajarāmaram sa tatheti pratijñāya gatoṁ'tardhānameva hi
'तब अष्टांग प्रणाम कर, नाना प्रकार से स्तुति कर, हे राजन्, मैंने हर से कहा — मुझे जरा-मरण से रहित कर दीजिए। तथास्तु कहकर वे अंतर्धान हो गए।'
श्लोक 283 (skanda.6.271.283)
अप्रमेयगतिर्देवश्चतुर्दशजगत्पतिः ततोऽहं तुष्टिसंयुक्तो जरामरणवर्जितः विचरामि महीपृष्ठे स्वेच्छया शत्रु वर्जितः
aprameyagatirdevaścaturdaśajagatpatiḥ tato'haṁ tuṣṭisaṁyukto jarāmaraṇavarjitaḥ vicarāmi mahīpṛṣṭhe svecchayā śatru varjitaḥ
'वे देव, जिनकी गति अप्रमेय है, चौदह लोकों के स्वामी हैं — तत्पश्चात मैं संतुष्ट होकर, जरा-मरण से रहित, शत्रुरहित होकर स्वेच्छा से पृथ्वीतल पर विचरण करने लगा।'
श्लोक 284 (skanda.6.271.284)
ततः कालेन महता गतेन नृपसत्तम बहुकामाग्निसंतप्तः शिवभक्तिविवर्जितः
tataḥ kālena mahatā gatena nṛpasattama bahukāmāgnisaṁtaptaḥ śivabhaktivivarjitaḥ
'हे नृपसत्तम, फिर दीर्घकाल बीतने पर मैं अत्यधिक काम-अग्नि से संतप्त होकर शिवभक्ति से विमुख हो गया।'
श्लोक 285 (skanda.6.271.285)
यांयां पश्यामि रूपाढ्यां परनारीं मनोरमाम् तांतां निरीक्ष्य सुचिरं धर्षयामि ततः परम्
yāṁyāṁ paśyāmi rūpāḍhyāṁ paranārīṁ manoramām tāṁtāṁ nirīkṣya suciraṁ dharṣayāmi tataḥ param
'जिस-जिस सुंदर, मनोहर परनारी को मैं देखता, उसे चिरकाल तक निहारकर बाद में उसका बलात्कार करता।'
श्लोक 286 (skanda.6.271.286)
धर्मराजभयत्यक्तः पार्थिवत्वं समाश्रितः
dharmarājabhayatyaktaḥ pārthivatvaṁ samāśritaḥ
'धर्मराज के भय से भी विरक्त, मैं और भी राजशक्ति का आश्रय लेने लगा।'
श्लोक 287 (skanda.6.271.287)
एतस्मिन्नंतरे राजन्मम पापेन कर्मणा हाहाकारस्ततो जातः समग्रे धरणीतले
etasminnaṁtare rājanmama pāpena karmaṇā hāhākārastato jātaḥ samagre dharaṇītale
'हे राजन्, इसी बीच मेरे पापपूर्ण आचरण से सम्पूर्ण पृथ्वीतल पर हाहाकार मच गया।'
श्लोक 288 (skanda.6.271.288)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो धर्मराजः शिवांतिकम् अब्रवीत्प्रणिपत्योच्चैर्दुःखित स्तदनंतरम्
etasminnaṁtare prāpto dharmarājaḥ śivāṁtikam abravītpraṇipatyoccairduḥkhita stadanaṁtaram
'इसी बीच धर्मराज शिव के समीप पहुँचे और उच्च स्वर में प्रणाम कर दुःखित होकर यह कहा।'
श्लोक 289 (skanda.6.271.289)
त्वया देव महीपालो जयदत्तो महीतले यो निर्मितः प्रतुष्टेन जरामरणवर्जितः
tvayā deva mahīpālo jayadatto mahītale yo nirmitaḥ pratuṣṭena jarāmaraṇavarjitaḥ
'हे देव, आपने जिस राजा जयदत्त को प्रसन्न होकर पृथ्वी पर जरा-मरण से रहित बनाया था...'
श्लोक 290 (skanda.6.271.290)
स सतीनां सतीत्वं च बलान्नाशयते कुधीः सर्वो भूपभयाल्लोकः सर्वधर्मबहिष्कृतः
sa satīnāṁ satītvaṁ ca balānnāśayate kudhīḥ sarvo bhūpabhayāllokaḥ sarvadharmabahiṣkṛtaḥ
'...वह दुर्बुद्धि सतियों के सतीत्व को बलपूर्वक नष्ट कर रहा है; राजा के भय से सम्पूर्ण जगत् सभी धर्मों से बहिष्कृत हो गया है।'
श्लोक 291 (skanda.6.271.291)
संजातो विबुधश्रेष्ठ न स्वभावात्कथंचन तस्यैकमपि मे नास्ति भयं सत्यं ब्रवीमि ते
saṁjāto vibudhaśreṣṭha na svabhāvātkathaṁcana tasyaikamapi me nāsti bhayaṁ satyaṁ bravīmi te
'हे विबुधश्रेष्ठ, यह उसके स्वभाव से कदापि उत्पन्न नहीं हुआ है। मुझे उससे तनिक भी भय नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ।'
श्लोक 292 (skanda.6.271.292)
तस्माद्वारय तं शीघ्रं यावद्धर्मो न नश्यति मर्त्यलोकादशेषेण सतीनां धर्षणेन च
tasmādvāraya taṁ śīghraṁ yāvaddharmo na naśyati martyalokādaśeṣeṇa satīnāṁ dharṣaṇena ca
'अतः जब तक धर्म का पूर्णतः नाश और सतियों का बलात्कार मर्त्यलोक से समाप्त न हो, उसे शीघ्र रोकिए।'
श्लोक 293 (skanda.6.271.293)
एवमुक्तस्ततो देवः कोपेन महतान्वितः शशाप मां समानीय वेपमानं कृताञ्जलिम्
evamuktastato devaḥ kopena mahatānvitaḥ śaśāpa māṁ samānīya vepamānaṁ kṛtāñjalim
ऐसा कहे जाने पर वे देव अत्यंत क्रोधित होकर, काँपते हुए हाथ जोड़े मुझे बुलाकर, मुझे शाप दे बैठे।
श्लोक 294 (skanda.6.271.294)
यस्माद्दुष्टसमाचार कृतं कर्म विगर्हितम् तस्मान्मच्छाप निर्दग्धः कमठो वै भविष्यसि
yasmādduṣṭasamācāra kṛtaṁ karma vigarhitam tasmānmacchāpa nirdagdhaḥ kamaṭho vai bhaviṣyasi
'हे दुराचारी, चूँकि तूने यह निंदनीय कर्म किया है, इसलिए मेरे शाप से जलकर तू कच्छप बन जाएगा।'
श्लोक 295 (skanda.6.271.295)
ततो मया सुदीनेन प्रार्थितः परमेश्वरः शापांतं मे कुरुष्वेश कुरुष्व च दयां मम
tato mayā sudīnena prārthitaḥ parameśvaraḥ śāpāṁtaṁ me kuruṣveśa kuruṣva ca dayāṁ mama
'तब मैंने अत्यंत दीन होकर परमेश्वर से प्रार्थना की — हे ईश, मेरे शाप का अंत कीजिए, मुझ पर दया कीजिए।'
श्लोक 296 (skanda.6.271.296)
ततस्तेन पुनः प्रोक्तं कल्पांते षष्टिसंज्ञिते स्वशरीरं पुनः प्राप्य मद्गणस्त्वं भविष्यसि
tatastena punaḥ proktaṁ kalpāṁte ṣaṣṭisaṁjñite svaśarīraṁ punaḥ prāpya madgaṇastvaṁ bhaviṣyasi
'तब उन्होंने पुनः कहा — साठवें कल्प के अंत में अपना पूर्व शरीर पुनः प्राप्त कर तू मेरा गण बनेगा।'
श्लोक 297 (skanda.6.271.297)
एतस्मिन्नंतरे कूर्मः संजातोऽहं महीपते समुद्रसलिलं प्राप्य संस्थितो दुःखितोऽनिशम्
etasminnaṁtare kūrmaḥ saṁjāto'haṁ mahīpate samudrasalilaṁ prāpya saṁsthito duḥkhito'niśam
'इसी बीच मैं कच्छप बन गया, हे महीपते, और समुद्र के जल में पहुँचकर सतत दुःखी होकर रहने लगा।'
श्लोक 298 (skanda.6.271.298)
कस्यचित्त्वथकालस्य राजंस्त्वं भूतले स्थितः यजनार्थं समानीतः समुद्रसलिलस्त्वया
kasyacittvathakālasya rājaṁstvaṁ bhūtale sthitaḥ yajanārthaṁ samānītaḥ samudrasalilastvayā
'हे राजन्, फिर कुछ समय बाद पृथ्वीतल पर स्थित तुमने यज्ञ हेतु मुझ समुद्र-कच्छप को मँगवाया।'
श्लोक 299 (skanda.6.271.299)
स्थापितो भूमिपृष्ठे तु मंत्रै संस्तंभितस्तथा ममोपरि ततो यज्ञाः कृताः शतसहस्रशः
sthāpito bhūmipṛṣṭhe tu maṁtrai saṁstaṁbhitastathā mamopari tato yajñāḥ kṛtāḥ śatasahasraśaḥ
'भूमितल पर स्थापित कर मुझे मंत्रों से स्तंभित कर दिया गया; तब मेरे ऊपर लाखों-सैकड़ों यज्ञ किए गए।'
श्लोक 300 (skanda.6.271.300)
क्रियमाणैश्च यैर्दग्धा मम पृष्ठिः समंततः दह्यतोऽपि महाराज तेन यज्ञाग्निना तदा प्रसादनान्महेशस्य न मे प्राणात्ययो ऽभवत्
kriyamāṇaiśca yairdagdhā mama pṛṣṭhiḥ samaṁtataḥ dahyato'pi mahārāja tena yajñāgninā tadā prasādanānmaheśasya na me prāṇātyayo 'bhavat
'उन किए जाते यज्ञों से मेरी पीठ चारों ओर से जल गई; हे महाराज, उस यज्ञाग्नि से जलते हुए भी, महेश की कृपा से मेरे प्राणों का नाश नहीं हुआ।'
श्लोक 301 (skanda.6.271.301)
केवलं जायते दाहो यथा पापं पुरा कृतम् अनुभूतं च तत्सर्वं हरकोपादसंशयम्
kevalaṁ jāyate dāho yathā pāpaṁ purā kṛtam anubhūtaṁ ca tatsarvaṁ harakopādasaṁśayam
'केवल दाह ही हुआ, जितना मैंने पूर्व में पाप किया था उसी के अनुरूप; और वह सब मैंने हर के कोप से निःसंदेह भोगा।'
श्लोक 302 (skanda.6.271.302)
अथ प्राप्ते दिवं चैव त्वयि पार्थिवसत्तम एकार्णवे तु संजाते जलपूर्णे धरातले संप्राप्तः प्लवमानस्तु ततोऽहं मानसं सरः
atha prāpte divaṁ caiva tvayi pārthivasattama ekārṇave tu saṁjāte jalapūrṇe dharātale saṁprāptaḥ plavamānastu tato'haṁ mānasaṁ saraḥ
'हे पार्थिवसत्तम, फिर जब आप स्वर्ग गए और सम्पूर्ण पृथ्वी जल से भरकर एक महासागर बन गई, तब तैरते हुए मैं इसी मानस सरोवर में पहुँचा।'
श्लोक 303 (skanda.6.271.303)
षड्पंचाशत्प्रमाणेन कल्पा मम च संस्थिताः चतुर्भिरपरैर्मोक्षः कूर्मत्वात्संभविष्यति
ṣaḍpaṁcāśatpramāṇena kalpā mama ca saṁsthitāḥ caturbhiraparairmokṣaḥ kūrmatvātsaṁbhaviṣyati
'मुझे यहाँ छप्पन कल्प हो चुके हैं; चार कल्प और बीतने पर इस कच्छपत्व से मुक्ति होगी।'
श्लोक 304 (skanda.6.271.304)
एतत्ते सर्वमाख्यातं दीर्घायुष्ट्वस्य कारणम् हरप्रसादकरणाद्बहुपुष्पार्चनाद्विभोः
etatte sarvamākhyātaṁ dīrghāyuṣṭvasya kāraṇam haraprasādakaraṇādbahupuṣpārcanādvibhoḥ
'इस प्रकार मैंने तुम्हें अपनी दीर्घायु का सम्पूर्ण कारण बताया — हर की कृपा तथा असंख्य पुष्पों से की गई पूजा।'
श्लोक 305 (skanda.6.271.305)
कूर्मत्वं च यथा जातं कामदेवस्य कोपतः स त्वं वद महाभाग गृहायातस्य किं तव करोमि सांप्रतं कृत्यं शत्रोरपि हृदि स्थितम्
kūrmatvaṁ ca yathā jātaṁ kāmadevasya kopataḥ sa tvaṁ vada mahābhāga gṛhāyātasya kiṁ tava karomi sāṁprataṁ kṛtyaṁ śatrorapi hṛdi sthitam
'तथा कामदेव के कोप से कच्छपत्व कैसे प्राप्त हुआ, यह भी बताया। अब हे महाभाग, तुम बताओ — मेरे घर आने का क्या प्रयोजन है? मैं वह कार्य अभी करूँगा, चाहे वह शत्रु के हृदय में ही क्यों न बसा हो।'
श्लोक 306 (skanda.6.271.306)
त्वया मे सुचिरं कालं दग्धा पृष्ठिर्मखाग्निना अद्यापि च प्रपश्यामि तां ज्वलंतीमिव स्थिताम्
tvayā me suciraṁ kālaṁ dagdhā pṛṣṭhirmakhāgninā adyāpi ca prapaśyāmi tāṁ jvalaṁtīmiva sthitām
'तुमने चिरकाल तक यज्ञाग्नि से मेरी पीठ जलाई थी; आज भी मुझे वह मानो जलती हुई-सी दिखाई देती है।'
श्लोक 307 (skanda.6.271.307)
एतस्मात्कारणान्नष्टस्त्वां दृष्ट्वाहं महीपते कस्मात्त्वं न गतः स्वर्गं विमानेऽपि समागते एतस्मात्कारणाद्धर्मं प्रकुर्वंति नराधिपाः
etasmātkāraṇānnaṣṭastvāṁ dṛṣṭvāhaṁ mahīpate kasmāttvaṁ na gataḥ svargaṁ vimāne'pi samāgate etasmātkāraṇāddharmaṁ prakurvaṁti narādhipāḥ
'इसी कारण, हे महीपते, तुम्हें देखकर मैं भाग गया था। किन्तु विमान आने पर भी तुम स्वर्ग क्यों नहीं गए? इसी कारण राजा लोग धर्म का आचरण करते हैं।'
श्लोक 308 (skanda.6.271.308)
इन्द्रद्युम्न उवाच स्वर्गस्थाने च लोकानां नित्यं च पतना द्भयम् तन्न यास्याम्यहं तत्र यतिष्यामि विमुक्तये
indradyumna uvāca svargasthāne ca lokānāṁ nityaṁ ca patanā dbhayam tanna yāsyāmyahaṁ tatra yatiṣyāmi vimuktaye
इन्द्रद्युम्न ने कहा — स्वर्ग-स्थान में रहने वालों को सदा नीचे गिरने का भय बना रहता है; अतः मैं वहाँ नहीं जाऊँगा, मैं मुक्ति के लिए प्रयत्न करूँगा।
श्लोक 309 (skanda.6.271.309)
स त्वं करोषि चेत्कृत्यं गृहायातस्य मे मखे चिरंतनं कथय मे यद्यस्ति तव सौहृदम्
sa tvaṁ karoṣi cetkṛtyaṁ gṛhāyātasya me makhe ciraṁtanaṁ kathaya me yadyasti tava sauhṛdam
'यदि तुम आए हुए मेरा यह कार्य करते हो, तो अपने से भी वयोवृद्ध किसी का पता बताओ, यदि तुम्हें मुझसे कोई स्नेह हो।'
श्लोक 310 (skanda.6.271.310)
कूर्म उवाच लोमशो नाम विप्रर्षिः स मत्तोऽस्ति चिरंतनः श्रूयते स मया दृष्टो नदीतीरं समाश्रितः
kūrma uvāca lomaśo nāma viprarṣiḥ sa matto'sti ciraṁtanaḥ śrūyate sa mayā dṛṣṭo nadītīraṁ samāśritaḥ
कच्छप ने कहा — लोमश नामक एक विप्रर्षि है, जो मुझसे भी वयोवृद्ध है; सुना है, और मैंने देखा भी है, वह किसी नदी-तट पर निवास करता है।
श्लोक 311 (skanda.6.271.311)
इन्द्रद्युम्न उवाच तदागच्छत गच्छामो यतः सर्वे द्रुतं स्वयम् पृच्छामो बहुकालस्य जीवितस्य च कारणम्
indradyumna uvāca tadāgacchata gacchāmo yataḥ sarve drutaṁ svayam pṛcchāmo bahukālasya jīvitasya ca kāraṇam
इन्द्रद्युम्न ने कहा — तो चलो, हम सब स्वयं शीघ्र वहाँ चलें और उससे उसकी दीर्घायु का कारण पूछें।
श्लोक 312 (skanda.6.271.312)
अथ ते सहिताः पञ्च व्योममार्गेण संस्थिताः अथ ते ददृशुस्तत्र लोमशं च निराश्रयम्
atha te sahitāḥ pañca vyomamārgeṇa saṁsthitāḥ atha te dadṛśustatra lomaśaṁ ca nirāśrayam
तब वे पाँचों साथ मिलकर आकाशमार्ग से चले, और वहाँ उन्होंने आश्रयरहित लोमश को देखा।
श्लोक 313 (skanda.6.271.313)
स्वाध्यायनिरतं दांतं जपहोमपरायणम् सव्य हस्ते तृणौघेन छायार्थं विधृतेन च
svādhyāyanirataṁ dāṁtaṁ japahomaparāyaṇam savya haste tṛṇaughena chāyārthaṁ vidhṛtena ca
वे स्वाध्याय में लीन, संयमी, जप-होम में तत्पर, अपने बाएँ हाथ में छाया हेतु घास का गट्ठर धारण किए हुए थे...
श्लोक 314 (skanda.6.271.314)
दधतं चाक्षमालां च दक्षिणेन करेण हि ते तं दृष्ट्वा महात्मानं कृत्वा तस्य प्रदक्षिणाम् उपविष्टास्ततः सर्वे स्वागतेनाभिनन्दिताः
dadhataṁ cākṣamālāṁ ca dakṣiṇena kareṇa hi te taṁ dṛṣṭvā mahātmānaṁ kṛtvā tasya pradakṣiṇām upaviṣṭāstataḥ sarve svāgatenābhinanditāḥ
...तथा दाहिने हाथ में जपमाला। उन्हें देखकर, प्रदक्षिणा कर, सब वहीं बैठ गए, स्वागत-सत्कार से सम्मानित होकर।
श्लोक 315 (skanda.6.271.315)
पृष्टास्तेन ततश्चैव के यूयं किमिहागताः विश्रब्धं कथ्यतां मह्यं येन सर्वं करोम्यहम्
pṛṣṭāstena tataścaiva ke yūyaṁ kimihāgatāḥ viśrabdhaṁ kathyatāṁ mahyaṁ yena sarvaṁ karomyaham
तब उन्होंने पूछा — 'तुम कौन हो, यहाँ क्यों आए हो? निःसंकोच मुझसे कहो, जिससे मैं सब कुछ कर सकूँ।'
श्लोक 316 (skanda.6.271.316)
कूर्म उवाच मार्कंडो नाम विप्रर्षिः सप्तकल्पस्मरो ह्ययम् इन्द्रद्युम्नेन चानीतो भूभुजानेन सन्मुने
kūrma uvāca mārkaṁḍo nāma viprarṣiḥ saptakalpasmaro hyayam indradyumnena cānīto bhūbhujānena sanmune
कच्छप ने कहा — यह सप्तकल्प-स्मरण करने वाला मार्कण्ड नामक विप्रर्षि है, हे सन्मुने, इसे राजा इन्द्रद्युम्न लाए हैं।
श्लोक 317 (skanda.6.271.317)
बकस्यास्य समीपे तु नाडीजंघस्य धीमतः चिरायुरिति विज्ञाय आत्मनश्चायुरुत्तमम् इन्द्रद्युम्नस्य वार्तार्थं द्विगुणायुषमात्मनः
bakasyāsya samīpe tu nāḍījaṁghasya dhīmataḥ cirāyuriti vijñāya ātmanaścāyuruttamam indradyumnasya vārtārthaṁ dviguṇāyuṣamātmanaḥ
'बुद्धिमान नाडीजंघ, जो बक नाम से जाना जाता है और अपने से दुगुनी आयु का है, उसके पास इन्द्रद्युम्न के समाचार हेतु ये गए...'
श्लोक 318 (skanda.6.271.318)
अथ तेन न विज्ञातो यदा स पृथिवीपतिः तदा द्वावपि चायातावुलूकस्यास्य संनिधौ
atha tena na vijñāto yadā sa pṛthivīpatiḥ tadā dvāvapi cāyātāvulūkasyāsya saṁnidhau
'...और जब उस पृथ्वीपति को वह नहीं जान सका, तब दोनों इस उलूक के पास आए।'
श्लोक 319 (skanda.6.271.319)
द्विगुणास्तत्प्रमाणेन कल्पाश्चास्य महात्मनः वर्तंते नैव विज्ञातो नृपो ह्येतेन सद्द्विज
dviguṇāstatpramāṇena kalpāścāsya mahātmanaḥ vartaṁte naiva vijñāto nṛpo hyetena saddvija
'इस महात्मा के तो दुगुने कल्प हो चुके हैं, फिर भी हे सद्द्विज, इसके द्वारा भी वह राजा नहीं जाना गया।'
श्लोक 320 (skanda.6.271.320)
ततस्त्रयोऽपि चानीता गृध्रराजस्य चान्तिकम्
tatastrayo'pi cānītā gṛdhrarājasya cāntikam
'तब वे तीनों भी गृध्रराज के पास आए।'
श्लोक 321 (skanda.6.271.321)
षट्पञ्चाशत्प्रमाणेन कल्पाश्चास्य महात्मनः वर्तन्ते नैव विज्ञातो नृपो ह्येतेन सद्द्विज
ṣaṭpañcāśatpramāṇena kalpāścāsya mahātmanaḥ vartante naiva vijñāto nṛpo hyetena saddvija
'इस महात्मा के छप्पन कल्प हो चुके हैं, फिर भी हे सद्द्विज, इसके द्वारा भी वह राजा नहीं जाना गया।'
श्लोक 322 (skanda.6.271.322)
चत्वारोऽपि समानीता एतेनैव ममान्तिकम् चिरायुषं च मां ज्ञात्वा मित्रभावेन ते द्विज
catvāro'pi samānītā etenaiva mamāntikam cirāyuṣaṁ ca māṁ jñātvā mitrabhāvena te dvija
'तब वे चारों ही मुझे दीर्घायु जानकर, मित्रभाव से, हे द्विज, मेरे पास लाए गए।'
श्लोक 323 (skanda.6.271.323)
मयाप्यसौ परिज्ञातो दूरादेव समागतः इन्द्रद्युम्नो ध्रुवं ह्येष दग्धा पृष्ठिः पुरा मम
mayāpyasau parijñāto dūrādeva samāgataḥ indradyumno dhruvaṁ hyeṣa dagdhā pṛṣṭhiḥ purā mama
'मैंने भी उसे दूर से आते ही पहचान लिया — यह निश्चय ही वही इन्द्रद्युम्न है, जिसने पहले मेरी पीठ जलाई थी।'
श्लोक 324 (skanda.6.271.324)
येन यज्ञाग्निना मंत्रै स्तंभयित्वा क्षितेरधः ततोऽहं तद्भयान्नष्टो गृध्राद्यैश्च निवारितः
yena yajñāgninā maṁtrai staṁbhayitvā kṣiteradhaḥ tato'haṁ tadbhayānnaṣṭo gṛdhrādyaiśca nivāritaḥ
'जिसके यज्ञाग्नि तथा मंत्रों से मुझे भूमि के नीचे स्तंभित किया गया था — उसी भय से मैं भागा, किन्तु गृध्र आदि द्वारा रोक लिया गया।'
श्लोक 325 (skanda.6.271.325)
उपालंभैस्तु बहुभिः प्रणया ज्जलमाविशत् मयोक्तोऽथ स भूयोऽपि नाहं तव पराङ्मुखः
upālaṁbhaistu bahubhiḥ praṇayā jjalamāviśat mayokto'tha sa bhūyo'pi nāhaṁ tava parāṅmukhaḥ
अनेक उलाहनों और स्नेह से, जब मैं जल में प्रवेश कर रहा था, तब मैंने कहा — 'मैं तुमसे पुनः पीठ नहीं फेर रहा हूँ।'
श्लोक 326 (skanda.6.271.326)
इन्द्रद्युम्नेन मे पृष्ठिर्येन दग्धा मखाग्निना एतस्मिन्नन्तरे स्वर्गाद्देवदूतो महामनाः विमानवरमारूढः प्राप्तश्चास्य महात्मनः
indradyumnena me pṛṣṭhiryena dagdhā makhāgninā etasminnantare svargāddevadūto mahāmanāḥ vimānavaramārūḍhaḥ prāptaścāsya mahātmanaḥ
'यह वही इन्द्रद्युम्न है जिसने यज्ञाग्नि से मेरी पीठ जलाई थी।' इसी बीच स्वर्ग से एक महामना देवदूत, श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर, इस महात्मा के पास आया।
श्लोक 327 (skanda.6.271.327)
कीर्तिलोपाच्युतः स्वर्गादयमासीन्महीपतिः ततो विमानमायातमुक्तमात्रे मया दिवः
kīrtilopācyutaḥ svargādayamāsīnmahīpatiḥ tato vimānamāyātamuktamātre mayā divaḥ
'यह राजा कीर्ति के लोप से स्वर्ग से च्युत हो गया था; तब मेरे इतना बताते ही स्वर्ग से विमान आ गया।'
श्लोक 328 (skanda.6.271.328)
अथासौ न गतः स्वर्गं विनाऽस्माभिर्द्विजोत्तम मार्कंडेयं परित्यज्य तिर्यग्योनिगतैस्त्रिभिः
athāsau na gataḥ svargaṁ vinā'smābhirdvijottama mārkaṁḍeyaṁ parityajya tiryagyonigataistribhiḥ
'फिर भी, हे द्विजोत्तम, यह हम सबके बिना, मार्कण्डेय तथा तिर्यग्योनिगत हम तीनों को छोड़कर, स्वर्ग नहीं गया।'
श्लोक 329 (skanda.6.271.329)
पृच्छतोऽस्य मया प्रोक्तमायुष्यं चात्मनः पुनः षण्णवतिप्रमाणेन कल्पा मे जीवतो गताः
pṛcchato'sya mayā proktamāyuṣyaṁ cātmanaḥ punaḥ ṣaṇṇavatipramāṇena kalpā me jīvato gatāḥ
'इसने मुझसे पूछा तो मैंने अपनी आयु बताई — मुझे जीवित हुए छियानवे कल्प बीत चुके हैं।'
श्लोक 330 (skanda.6.271.330)
पृष्टोऽहं पूर्वमेवात्र संस्थितस्तव पार्श्वतः चिरंतनतमो ब्रूहि मया त्वं तु निवेदितः
pṛṣṭo'haṁ pūrvamevātra saṁsthitastava pārśvataḥ ciraṁtanatamo brūhi mayā tvaṁ tu niveditaḥ
'मुझसे पहले भी यहीं तुम्हारे पास खड़े होकर पूछा गया था — जो सबसे वयोवृद्ध हो, उसे बताओ — इस प्रकार मैंने तुम्हें बताया।'
श्लोक 331 (skanda.6.271.331)
एतस्मात्कारणात्प्राप्ता वयं सर्वे तवांतिकम् तस्माद्यत्पृच्छते भूप एष त्वां तत्प्रकीर्तय
etasmātkāraṇātprāptā vayaṁ sarve tavāṁtikam tasmādyatpṛcchate bhūpa eṣa tvāṁ tatprakīrtaya
'इसी कारण हम सब तुम्हारे पास आए हैं; अतः यह राजा जो भी पूछे, उसे बताओ।'
श्लोक 332 (skanda.6.271.332)
भर्तृयज्ञ उवाच लोमशोऽप्यथ तं प्राह विश्रब्धं पृच्छ पार्थिव अवश्यं कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि
bhartṛyajña uvāca lomaśo'pyatha taṁ prāha viśrabdhaṁ pṛccha pārthiva avaśyaṁ kathayiṣyāmi yanmāṁ tvaṁ paripṛcchasi
भर्तृयज्ञ ने कहा — तब लोमश ने भी उससे कहा — 'हे राजन्, निःसंकोच पूछो; तुम जो भी मुझसे पूछोगे, मैं अवश्य बताऊँगा।'
श्लोक 333 (skanda.6.271.333)
इंद्रद्युम्न उवाच कस्मात्त्वं ग्रीष्मकालेऽपि मध्यं प्राप्ते दिवाकरे निवासार्थं गृहं रम्यं किमर्थं न करिष्यसि
iṁdradyumna uvāca kasmāttvaṁ grīṣmakāle'pi madhyaṁ prāpte divākare nivāsārthaṁ gṛhaṁ ramyaṁ kimarthaṁ na kariṣyasi
इन्द्रद्युम्न ने कहा — ग्रीष्मकाल में भी, जब सूर्य मध्याह्न में होता है, आप निवास हेतु सुंदर घर क्यों नहीं बनाते?
श्लोक 334 (skanda.6.271.334)
लोमश उवाच कस्यार्थे क्रियते गेहमनित्यं जीवितं यतः यदि स्याच्छाश्वतो देहस्तदर्थं क्रियते च तत्
lomaśa uvāca kasyārthe kriyate gehamanityaṁ jīvitaṁ yataḥ yadi syācchāśvato dehastadarthaṁ kriyate ca tat
लोमश ने कहा — घर किसके लिए बनाया जाए, जबकि जीवन ही अनित्य है? यदि शरीर शाश्वत होता, तो उसी के लिए वह बनाया जाता।
श्लोक 335 (skanda.6.271.335)
इन्द्रद्युम्न उवाच सर्वेषामेव लोकानां चिरायुः श्रूयते भवान् तेनाहमपि संप्राप्तो भवद्दर्शनकाम्यया
indradyumna uvāca sarveṣāmeva lokānāṁ cirāyuḥ śrūyate bhavān tenāhamapi saṁprāpto bhavaddarśanakāmyayā
इन्द्रद्युम्न ने कहा — आप समस्त प्राणियों में सर्वाधिक दीर्घायु सुने जाते हैं; इसीलिए मैं भी आपके दर्शन की इच्छा से यहाँ आया हूँ।
श्लोक 336 (skanda.6.271.336)
लोमश उवाच कल्पे कल्पे तु संप्राप्ते रोमकं मम नश्यति अभावे सर्वरोम्णां च ततो नाशो भविष्यति
lomaśa uvāca kalpe kalpe tu saṁprāpte romakaṁ mama naśyati abhāve sarvaromṇāṁ ca tato nāśo bhaviṣyati
लोमश ने कहा — प्रत्येक कल्प बीतने पर मेरा एक रोम गिर जाता है; जब सभी रोम समाप्त हो जाएँगे, तब मेरा भी अंत होगा।
श्लोक 337 (skanda.6.271.337)
पश्य त्वं मच्छरीरेऽस्मिन्प्रकाशं रोमवर्जितम् न करोमि गृहं तेन कारणेन महामते
paśya tvaṁ maccharīre'sminprakāśaṁ romavarjitam na karomi gṛhaṁ tena kāraṇena mahāmate
'देखो, मेरे इस शरीर पर रोमरहित खाली स्थान दिखाई देते हैं; इसी कारण, हे महामते, मैं घर नहीं बनाता।'
श्लोक 338 (skanda.6.271.338)
इन्द्रद्युम्न उवाच किं त्वया विहितं कर्म येनेदृग्जीवितं स्थितम् किं दानस्यप्रभावोऽयं तपसो नियमस्य वा
indradyumna uvāca kiṁ tvayā vihitaṁ karma yenedṛgjīvitaṁ sthitam kiṁ dānasyaprabhāvo'yaṁ tapaso niyamasya vā
इन्द्रद्युम्न ने कहा — आपने ऐसा कौन-सा कर्म किया, जिससे ऐसी दीर्घायु स्थिर हुई? क्या यह दान का प्रभाव है, तप का, या नियम का?
श्लोक 339 (skanda.6.271.339)
लोमश उवाच अहमासं पुरा शूद्रो दरिद्रेण परिप्लुतः भ्रमामि मेदिनीपृष्ठ उदरस्य कृते सदा
lomaśa uvāca ahamāsaṁ purā śūdro daridreṇa pariplutaḥ bhramāmi medinīpṛṣṭha udarasya kṛte sadā
लोमश ने कहा — मैं पूर्वकाल में एक शूद्र था, दरिद्रता से आक्रांत, सदा अपने उदर के लिए पृथ्वीतल पर भटकता रहता था।
श्लोक 340 (skanda.6.271.340)
कर्मयोगेन महता संप्राप्तो हाटकेश्वरम् क्षुत्क्षामस्तु पिपासार्तो यत्रैतल्लिंगमुत्तमम् अवधूतं ततो लिंगं मया दृष्ट्वा स्वयंभु तत्
karmayogena mahatā saṁprāpto hāṭakeśvaram kṣutkṣāmastu pipāsārto yatraitalliṁgamuttamam avadhūtaṁ tato liṁgaṁ mayā dṛṣṭvā svayaṁbhu tat
'महान कर्मयोग से मैं हाटकेश्वर पहुँचा, भूख से क्षीण और प्यास से पीड़ित; वहाँ मैंने यह उत्तम स्वयंभू लिंग उपेक्षित पड़ा देखा।'
श्लोक 341 (skanda.6.271.341)
स्नापितं तोयमादाय शीतमेतत्सुनिर्मलम् ततस्तु कमलैरेतैर्मया पूजा विनिर्मिता
snāpitaṁ toyamādāya śītametatsunirmalam tatastu kamalairetairmayā pūjā vinirmitā
'यह शीतल, अत्यंत निर्मल जल लेकर मैंने उसे स्नान कराया; फिर इन्हीं कमलों से मैंने पूजा सम्पन्न की।'
श्लोक 342 (skanda.6.271.342)
अथ पूजां विनिर्वर्त्य यावन्मार्गसमाश्रितः क्षु त्क्षामकण्ठस्य ततः प्राणा नष्टास्तदा मम
atha pūjāṁ vinirvartya yāvanmārgasamāśritaḥ kṣu tkṣāmakaṇṭhasya tataḥ prāṇā naṣṭāstadā mama
'पूजा समाप्त कर जैसे ही मैं मार्ग पर चला, भूख से सूखे कंठ के कारण मेरे प्राण उसी क्षण चले गए।'
श्लोक 343 (skanda.6.271.343)
अथाहं ब्राह्मणगृहे जातो जातिस्मरस्ततः सर्वं स्मरामि भूपाल देवदेवस्यपूजनात्
athāhaṁ brāhmaṇagṛhe jāto jātismarastataḥ sarvaṁ smarāmi bhūpāla devadevasyapūjanāt
'तब मैं एक ब्राह्मण के घर में जातिस्मर होकर जन्मा; हे राजन्, देवदेव की उसी पूजा के कारण मुझे सब कुछ स्मरण है।'
श्लोक 344 (skanda.6.271.344)
ततो मूकत्वमापन्नो नैव जल्पामि किंचन ईशान इति मे नाम पिता चक्रे प्रहर्षितः
tato mūkatvamāpanno naiva jalpāmi kiṁcana īśāna iti me nāma pitā cakre praharṣitaḥ
'तब मैं मूक हो गया, कुछ भी नहीं बोलता था; मेरे पिता ने प्रसन्न होकर मेरा नाम ईशान रखा।'
श्लोक 345 (skanda.6.271.345)
ईशानेन यतो दत्तः पूर्वमाराधितेन च वैराग्यं परमं प्राप्तो इष्ट्वा संसारसंस्थितिम्
īśānena yato dattaḥ pūrvamārādhitena ca vairāgyaṁ paramaṁ prāpto iṣṭvā saṁsārasaṁsthitim
'चूँकि यह नाम मेरे द्वारा पूर्व में आराधित ईशान के नाम पर दिया गया था, अतः संसार की दशा देखकर मुझे परम वैराग्य प्राप्त हुआ।'
श्लोक 346 (skanda.6.271.346)
पिता मे बहुवात्सल्याद्भेषजानि प्रयोजयेत् वाचार्थं मंत्रवादांश्च तथा चैवोपयाचितम् ब्राह्मणान्पृच्छते नित्यं दिवारात्रिमतंद्रितः
pitā me bahuvātsalyādbheṣajāni prayojayet vācārthaṁ maṁtravādāṁśca tathā caivopayācitam brāhmaṇānpṛcchate nityaṁ divārātrimataṁdritaḥ
'मेरे पिता स्नेहवश औषधियाँ और मंत्र-प्रयोग करते, मन्नतें माँगते, तथा दिन-रात अथकभाव से ब्राह्मणों से मेरी वाणी के विषय में पूछते रहते।'
श्लोक 347 (skanda.6.271.347)
ततो मे जायते हास्यं निजचित्ते नराधिप दृष्ट्वा संसारसंसक्तिं पितुर्मातुश्च भूरिशः
tato me jāyate hāsyaṁ nijacitte narādhipa dṛṣṭvā saṁsārasaṁsaktiṁ piturmātuśca bhūriśaḥ
'हे नराधिप, तब मुझे अपने मन में हँसी आती, माता-पिता की संसार में अत्यधिक आसक्ति देखकर।'
श्लोक 348 (skanda.6.271.348)
ततश्च यौवनं प्राप्तः क्रमेण नृपसत्तम यदा तदा निशि त्यक्त्वा तावुभौ चात्र संगतः
tataśca yauvanaṁ prāptaḥ krameṇa nṛpasattama yadā tadā niśi tyaktvā tāvubhau cātra saṁgataḥ
'हे नृपसत्तम, फिर क्रमशः युवावस्था प्राप्त होने पर, एक रात्रि दोनों को त्यागकर मैं यहाँ आ गया।'
श्लोक 349 (skanda.6.271.349)
ततो हृष्टमना नित्यं पूजयामि समाहितः ईशानं परया भक्त्या संस्नाप्य सलिलेन च
tato hṛṣṭamanā nityaṁ pūjayāmi samāhitaḥ īśānaṁ parayā bhaktyā saṁsnāpya salilena ca
'तब से प्रसन्नचित्त होकर मैं सदा एकाग्रचित्त से परम भक्ति के साथ ईशान की पूजा करता हूँ, जल से स्नान कराकर...'
श्लोक 350 (skanda.6.271.350)
ब्राह्मणीतीर्थजातेन त्रिकालं नृपसत्तम शिलोंछवृत्तिमासाद्य प्राणयात्रां समाचरन् नीवारैर्बदरैः शाकैश्चिर्भटैः फलपत्रकैः
brāhmaṇītīrthajātena trikālaṁ nṛpasattama śiloṁchavṛttimāsādya prāṇayātrāṁ samācaran nīvārairbadaraiḥ śākaiścirbhaṭaiḥ phalapatrakaiḥ
'...ब्राह्मणी-तीर्थ के जल से, हे नृपसत्तम, त्रिकाल; तथा शिलोंछ-वृत्ति से जीवन-निर्वाह करते हुए, नीवार, बेर, साग, ककड़ी तथा फल-पत्तों से...'
श्लोक 351 (skanda.6.271.351)
ततो मे भगवान्रुद्रः सर्वदेवेश्वरो हरः अब्रवीद्दर्शनं गत्वा मेघगम्भीरया गिरा
tato me bhagavānrudraḥ sarvadeveśvaro haraḥ abravīddarśanaṁ gatvā meghagambhīrayā girā
'...तब भगवान रुद्र, सर्वदेवेश्वर हर ने दर्शन देकर मेघ-गंभीर वाणी में मुझसे कहा।'
श्लोक 352 (skanda.6.271.352)
परितुष्टोऽस्मि ते वत्स वरं वरय सुवते अदेयमपि दास्यामि यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
parituṣṭo'smi te vatsa varaṁ varaya suvate adeyamapi dāsyāmi yadyapi syātsudurlabham
'हे वत्स, हे सुव्रत, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; वर माँगो — असंभव वर भी दूँगा, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।'
श्लोक 353 (skanda.6.271.353)
ततस्तं प्रणिपत्योच्चैः स्तुत्वा वाक्यैः पृथग्विधैः मया प्रोक्तं कुरु विभो जरामरण वर्जितम्
tatastaṁ praṇipatyoccaiḥ stutvā vākyaiḥ pṛthagvidhaiḥ mayā proktaṁ kuru vibho jarāmaraṇa varjitam
'तब उच्च स्वर में प्रणाम कर, नाना प्रकार से स्तुति कर, मैंने कहा — हे विभो, मुझे जरा-मरण से रहित कर दीजिए।'
श्लोक 354 (skanda.6.271.354)
श्रीभगवानुवाच अमरत्वं यतो नास्ति मर्त्यलोकेऽत्र कर्हिचित् मर्यादां कुरु तस्मात्त्वं जीवितस्य स्वकस्य वै
śrībhagavānuvāca amaratvaṁ yato nāsti martyaloke'tra karhicit maryādāṁ kuru tasmāttvaṁ jīvitasya svakasya vai
श्री भगवान ने कहा — इस मर्त्यलोक में अमरत्व कभी नहीं होता, इसलिए तुम अपने ही जीवन की सीमा निर्धारित करो।
श्लोक 355 (skanda.6.271.355)
ततो मे भगवानुक्तः कल्पांते समुपस्थिते रोम्ण एकस्य मे नाशो जायतां त्रिदशेश्वर
tato me bhagavānuktaḥ kalpāṁte samupasthite romṇa ekasya me nāśo jāyatāṁ tridaśeśvara
'तब मैंने भगवान से कहा — हे त्रिदशेश्वर, प्रत्येक कल्प के अंत में मेरा एक रोम नष्ट हो जाए।'
श्लोक 356 (skanda.6.271.356)
यदा च सर्वरोम्णां मे विनाशः संप्रजायते तदा मम गणत्वं च जायतां तावकं विभो
yadā ca sarvaromṇāṁ me vināśaḥ saṁprajāyate tadā mama gaṇatvaṁ ca jāyatāṁ tāvakaṁ vibho
'और जब मेरे सभी रोम नष्ट हो जाएँ, तब हे विभो, मुझे आपका ही गणत्व प्राप्त हो।'
श्लोक 357 (skanda.6.271.357)
एवं भविष्यतीत्युक्तं परं लिंग सदा मम स्नाप्यं जलेन चैतेन ब्राह्मणीसंभवेन च
evaṁ bhaviṣyatītyuktaṁ paraṁ liṁga sadā mama snāpyaṁ jalena caitena brāhmaṇīsaṁbhavena ca
'ऐसा ही होगा — यह कहकर उन्होंने कहा — यह मेरा सर्वोत्तम लिंग सदा इसी ब्राह्मणी-जल से स्नान कराया जाए।'
श्लोक 358 (skanda.6.271.358)
ब्रह्माद्यैः पूजनीय च त्रिकालं द्विजसत्तम ममकैवासरं यावत्तव चायुर्भविष्यति
brahmādyaiḥ pūjanīya ca trikālaṁ dvijasattama mamakaivāsaraṁ yāvattava cāyurbhaviṣyati
'हे द्विजसत्तम, इसकी त्रिकाल पूजा स्वयं ब्रह्मा आदि देवों द्वारा भी की जाएगी; और जब तक मेरी सत्ता रहेगी, तब तक तुम्हारी भी आयु रहेगी।'
श्लोक 359 (skanda.6.271.359)
अन्योऽपि यो नरो भक्त्या पूजयिष्यति मामिह स्नापयिष्यति सद्भक्त्या विपाप्मा स भविष्यति
anyo'pi yo naro bhaktyā pūjayiṣyati māmiha snāpayiṣyati sadbhaktyā vipāpmā sa bhaviṣyati
'जो भी अन्य मनुष्य यहाँ भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा और सद्भक्ति से मुझे स्नान कराएगा, वह पापरहित हो जाएगा।'
श्लोक 360 (skanda.6.271.360)
नापमृत्युर्भवेत्तस्य कदाचिद्द्विजसत्तम सकृत्संपूजिते ऽप्येवं ब्रह्माद्यैर्मत्कलेवरे
nāpamṛtyurbhavettasya kadāciddvijasattama sakṛtsaṁpūjite 'pyevaṁ brahmādyairmatkalevare
'हे द्विजसत्तम, उसे कभी भी अपमृत्यु नहीं होगी — मेरे इस शरीर की एक बार भी, ब्रह्मा आदि के समान, भलीभाँति पूजा कर लेने मात्र से।'
श्लोक 361 (skanda.6.271.361)
सकृत्पिबति यस्तोयं ब्रह्मतीर्थसमुद्भवम् सर्वपापविशुद्धात्मा तत्क्षणाज्जायते हि सः
sakṛtpibati yastoyaṁ brahmatīrthasamudbhavam sarvapāpaviśuddhātmā tatkṣaṇājjāyate hi saḥ
'जो ब्रह्मतीर्थ से उत्पन्न जल एक बार भी पी लेता है, वह उसी क्षण सर्वपापों से शुद्धात्मा हो जाता है।'
श्लोक 362 (skanda.6.271.362)
एवमुक्त्वाथ देवेशस्ततश्चादर्शनं गतः
evamuktvātha deveśastataścādarśanaṁ gataḥ
ऐसा कहकर वे देवेश तत्पश्चात अंतर्धान हो गए।
श्लोक 363 (skanda.6.271.363)
अहं तु संस्थितश्चात्र ततः प्रभृति पार्थिव पूजयानश्च सद्भक्त्या लिंगमेतत्सदैव हि
ahaṁ tu saṁsthitaścātra tataḥ prabhṛti pārthiva pūjayānaśca sadbhaktyā liṁgametatsadaiva hi
'हे पार्थिव, तब से मैं यहीं रहकर सदा सद्भक्ति से इसी लिंग की पूजा करता आ रहा हूँ।'
श्लोक 364 (skanda.6.271.364)
एतस्मात्कारणाज्जातं ममायुरतिविस्तृतम् शंकरस्य प्रसादेन नान्यदस्तीह कारणम्
etasmātkāraṇājjātaṁ mamāyurativistṛtam śaṁkarasya prasādena nānyadastīha kāraṇam
'इसी कारण मेरी अत्यंत विस्तृत आयु हुई, शंकर की कृपा से — इसका अन्य कोई कारण नहीं है।'
श्लोक 365 (skanda.6.271.365)
इन्द्रद्युम्न उवाच अहमप्यर्चयिष्यामि लिंगमेत त्त्वया सह नान्यत्र वा गमिष्यामि ममैवं हृदि निश्चयः
indradyumna uvāca ahamapyarcayiṣyāmi liṁgameta ttvayā saha nānyatra vā gamiṣyāmi mamaivaṁ hṛdi niścayaḥ
इन्द्रद्युम्न ने कहा — मैं भी आपके साथ इस लिंग की पूजा करूँगा; अन्यत्र कहीं नहीं जाऊँगा, यह मेरा हृदय का निश्चय है।
श्लोक 366 (skanda.6.271.366)
लोमश उवाच एवं कुरु महाभाग त्वमवाप्स्यसि वांछितम् हरभक्तस्य लोकस्य वांछितं नास्ति दुलर्भम्
lomaśa uvāca evaṁ kuru mahābhāga tvamavāpsyasi vāṁchitam harabhaktasya lokasya vāṁchitaṁ nāsti dularbham
लोमश ने कहा — हे महाभाग, ऐसा ही करो, तुम्हें अभीष्ट प्राप्त होगा; हरभक्त जनों के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
श्लोक 367 (skanda.6.271.367)
नाडीजंघो गृहं यातु मार्कंडगृधकौशिकाः कच्छपेन समायुक्तस्त्वं हि तिष्ठ ममा श्रमे
nāḍījaṁgho gṛhaṁ yātu mārkaṁḍagṛdhakauśikāḥ kacchapena samāyuktastvaṁ hi tiṣṭha mamā śrame
'नाडीजंघ घर जाए, तथा मार्कण्ड, गृध्र और उलूक भी; किन्तु तुम कच्छप सहित मेरे आश्रम में ही रहो।'
श्लोक 368 (skanda.6.271.368)
ततः प्रोचुश्च ते सर्वे न वयं तु नरेश्वर त्वां विना संप्रयास्यामो भूय एव निजालयम् लिंगमाराधयिष्यामो यदेतद्भवता र्चितम्
tataḥ procuśca te sarve na vayaṁ tu nareśvara tvāṁ vinā saṁprayāsyāmo bhūya eva nijālayam liṁgamārādhayiṣyāmo yadetadbhavatā rcitam
तब उन सबने कहा — 'हे नरेश्वर, हम आपके बिना अपने घर नहीं लौटेंगे; हम भी इस लिंग की आराधना करेंगे, जिसकी आपने पूजा की है।'
श्लोक 369 (skanda.6.271.369)
एवमुक्त्वा तु ते सर्वे लोमशस्य वराश्रमे तस्थुः संपूजयामासुस्त्रिकालं लिंगमेव तत्
evamuktvā tu te sarve lomaśasya varāśrame tasthuḥ saṁpūjayāmāsustrikālaṁ liṁgameva tat
ऐसा कहकर वे सब लोमश के उत्तम आश्रम में रहकर त्रिकाल उसी लिंग की पूजा करने लगे।
श्लोक 370 (skanda.6.271.370)
संस्नाप्य ब्राह्मणीतोयैः पद्मा द्यैः पूजयंति च
saṁsnāpya brāhmaṇītoyaiḥ padmā dyaiḥ pūjayaṁti ca
वे ब्राह्मणी-तीर्थ के जल से स्नान कराकर कमल आदि से उसकी पूजा करते।
श्लोक 371 (skanda.6.271.371)
कस्यचित्त्वथ कालस्य नारदो मुनिसत्तमः तीर्थयात्राप्रसंगेन संप्राप्तस्तत्र यत्र ते
kasyacittvatha kālasya nārado munisattamaḥ tīrthayātrāprasaṁgena saṁprāptastatra yatra te
कुछ समय पश्चात मुनिसत्तम नारद, तीर्थयात्रा के प्रसंग में, वहाँ पहुँचे जहाँ वे सब थे।
श्लोक 372 (skanda.6.271.372)
अथ नारदं दृष्ट्वा कृत्वा चैवार्हणक्रियाम् विश्रांतं च ततो ज्ञात्वा पप्रच्छुर्विनयान्विताः
atha nāradaṁ dṛṣṭvā kṛtvā caivārhaṇakriyām viśrāṁtaṁ ca tato jñātvā papracchurvinayānvitāḥ
तब नारद को देखकर, उनकी अर्चना कर, तथा उन्हें विश्राम कर चुका जानकर, उन्होंने विनयपूर्वक पूछा।
श्लोक 373 (skanda.6.271.373)
शापभ्रष्टा वयं सर्वे यतः संवर्तदर्शनात् बकाद्याश्चैव चत्वारः कूर्मांताश्च महामुने
śāpabhraṣṭā vayaṁ sarve yataḥ saṁvartadarśanāt bakādyāścaiva catvāraḥ kūrmāṁtāśca mahāmune
'हे महामुने, हम सब — बक आदि चार, कच्छप तक — शाप से भ्रष्ट हुए हैं, क्योंकि हमें संवर्त के दर्शन चाहिए।'
श्लोक 374 (skanda.6.271.374)
न स विज्ञायते क्वापि कस्मिन्स्थाने व्यवस्थितः किंरूपः किंप्रमाणश्च किमाचारः क्व संस्थितः
na sa vijñāyate kvāpi kasminsthāne vyavasthitaḥ kiṁrūpaḥ kiṁpramāṇaśca kimācāraḥ kva saṁsthitaḥ
'वे कहीं भी ज्ञात नहीं होते — किस स्थान में रहते हैं, कैसा उनका रूप है, कितना उनका प्रमाण है, क्या उनका आचार है, कहाँ वे स्थित हैं।'
श्लोक 375 (skanda.6.271.375)
स त्वं यदि विजानासि यत्र तं संस्थितं मुनिम् तद्वदस्व महाभाग न किंचित्तेऽस्त्यगोचरम्
sa tvaṁ yadi vijānāsi yatra taṁ saṁsthitaṁ munim tadvadasva mahābhāga na kiṁcitte'styagocaram
'हे महाभाग, यदि आप जानते हैं कि वे मुनि कहाँ स्थित हैं, तो बताइए; आपके लिए कुछ भी अज्ञात नहीं है।'
श्लोक 376 (skanda.6.271.376)
श्रीनारद उवाच अहं जानामि तं सम्यक्संवर्तं मुनिसत्तमम् गुप्ताचारेण तिष्ठंतं नान्यो वेत्ति कथंचनम्
śrīnārada uvāca ahaṁ jānāmi taṁ samyaksaṁvartaṁ munisattamam guptācāreṇa tiṣṭhaṁtaṁ nānyo vetti kathaṁcanam
श्री नारद ने कहा — मैं उस मुनिसत्तम संवर्त को भलीभाँति जानता हूँ, जो गुप्त आचरण से रहते हैं; उन्हें कोई अन्य किसी प्रकार नहीं जानता।
श्लोक 377 (skanda.6.271.377)
वाराणास्यां स्थितो नित्यं सोऽवधूतो महामुनिः विवस्त्रो मलदिग्धांगः सदारण्यं समाश्रितः
vārāṇāsyāṁ sthito nityaṁ so'vadhūto mahāmuniḥ vivastro maladigdhāṁgaḥ sadāraṇyaṁ samāśritaḥ
'वे महामुनि अवधूत सदा वाराणसी में रहते हैं, निर्वस्त्र, शरीर पर धूल लपेटे, सदा वन का ही आश्रय लिए हुए।'
श्लोक 378 (skanda.6.271.378)
भिक्षार्थं कुतपे काले समागच्छति तां पुरीम् पाणिपात्रकृताहारो गृहैः कैश्चित्सदैव हि
bhikṣārthaṁ kutape kāle samāgacchati tāṁ purīm pāṇipātrakṛtāhāro gṛhaiḥ kaiścitsadaiva hi
'भिक्षा हेतु नियत समय पर वे उस नगरी में आते हैं, हाथों में ही भोजन ग्रहण करते हैं, सदा कुछ निश्चित घरों से।'
श्लोक 379 (skanda.6.271.379)
भूयोपि याति सायाह्ने किंचिदेव वनांतरम् तस्यां पुर्यां तथारूपाः शतशोऽथ सहस्रशः
bhūyopi yāti sāyāhne kiṁcideva vanāṁtaram tasyāṁ puryāṁ tathārūpāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
'सायंकाल फिर वे वन के किसी भाग में लौट जाते हैं। उस नगरी में उनके समान वेष वाले सैकड़ों-हजारों तपस्वी...'
श्लोक 380 (skanda.6.271.380)
तिष्ठंति तापसश्रेष्ठास्तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् भवद्भिः स यथा ज्ञेयो मम वाक्यादसंशयम्
tiṣṭhaṁti tāpasaśreṣṭhāstasya vakṣyāmi lakṣaṇam bhavadbhiḥ sa yathā jñeyo mama vākyādasaṁśayam
'...निवास करते हैं। मैं उनका पहचान-चिह्न बताता हूँ, जिससे आप सब मेरे वचन से निःसंदेह उन्हें पहचान सकें।'
श्लोक 381 (skanda.6.271.381)
वाराणस्याः प्रतोल्यां च स्थापनीयं सुयत्नतः ः कुणपं चैव गुप्तं च यथा नो वेत्ति कश्चन
vārāṇasyāḥ pratolyāṁ ca sthāpanīyaṁ suyatnataḥ ḥ kuṇapaṁ caiva guptaṁ ca yathā no vetti kaścana
'वाराणसी की मुख्य गली में एक शव सावधानीपूर्वक, गुप्त रूप से इस प्रकार रखा जाए कि किसी को पता न चले।'
श्लोक 382 (skanda.6.271.382)
यास्यंति तापसाः सर्वे तमतिक्रम्य भूरिशः संवर्तो दिव्यदृष्टिस्तु शल्यं नातिक्रमिष्यति
yāsyaṁti tāpasāḥ sarve tamatikramya bhūriśaḥ saṁvarto divyadṛṣṭistu śalyaṁ nātikramiṣyati
'समस्त तपस्वी उसे लाँघकर आगे चले जाएँगे; किन्तु दिव्यदृष्टि सम्पन्न संवर्त उस शव को नहीं लाँघेंगे।'
श्लोक 383 (skanda.6.271.383)
निवर्तनं तु यश्चक्रे भूभागात्कुणपाश्रयात् स संवर्तः परिज्ञेयः प्रष्टव्यश्च ततः परम्
nivartanaṁ tu yaścakre bhūbhāgātkuṇapāśrayāt sa saṁvartaḥ parijñeyaḥ praṣṭavyaśca tataḥ param
'जो शव वाले स्थान से लौट जाए, उसी को संवर्त समझना चाहिए, और उसी से आगे प्रश्न करना चाहिए।'
श्लोक 384 (skanda.6.271.384)
यदि पृच्छति केनाहं भवतां संनिवेदितः नारदेन ततो वाच्यं स त्वां जानाति वै सदा
yadi pṛcchati kenāhaṁ bhavatāṁ saṁniveditaḥ nāradena tato vācyaṁ sa tvāṁ jānāti vai sadā
'यदि वे पूछें कि मुझे किसने आपको बताया, तो कहना — नारद ने; वे सदा तुम्हें जानते हैं।'
श्लोक 385 (skanda.6.271.385)
यदि पृच्छति भूयः स नारदः क्व स तिष्ठति
yadi pṛcchati bhūyaḥ sa nāradaḥ kva sa tiṣṭhati
'यदि वे फिर पूछें — वह नारद कहाँ रहते हैं?...'
श्लोक 386 (skanda.6.271.386)
ततो वाच्यो निवेद्य त्वां प्रतिष्टो हव्यवाहनम्
tato vācyo nivedya tvāṁ pratiṣṭo havyavāhanam
'...तो कहना — तुम्हें बताकर वे अग्नि में प्रविष्ट हो गए।'
श्लोक 387 (skanda.6.271.387)
तच्छ्रुत्वा नारदवचः सर्वे वै लोमशादयः वाराणसीं पुरीं प्राप्तास्तस्य दर्शनलालसाः
tacchrutvā nāradavacaḥ sarve vai lomaśādayaḥ vārāṇasīṁ purīṁ prāptāstasya darśanalālasāḥ
नारद के ये वचन सुनकर लोमश आदि सब उनके दर्शन की उत्कट इच्छा से वाराणसी नगरी पहुँचे।
श्लोक 388 (skanda.6.271.388)
प्रतोल्यां कुणपं स्थाप्य गुप्तं लोकैरलक्षितम् स्वयं चैव स्थिता दूरं प्रेक्षमाणाः प्रयत्नतः
pratolyāṁ kuṇapaṁ sthāpya guptaṁ lokairalakṣitam svayaṁ caiva sthitā dūraṁ prekṣamāṇāḥ prayatnataḥ
मुख्य गली में एक शव को इस प्रकार गुप्त रखकर कि लोगों को पता न चले, वे स्वयं दूर खड़े होकर सावधानीपूर्वक देखते रहे।
श्लोक 389 (skanda.6.271.389)
ततस्तु कुतपे काले संवर्तस्तु समागतः यादृग्रूपः पुरा प्रोक्तो नारदेन महात्मना
tatastu kutape kāle saṁvartastu samāgataḥ yādṛgrūpaḥ purā prokto nāradena mahātmanā
तब नियत समय पर संवर्त वहाँ आए, ठीक वैसे ही रूप में जैसा महात्मा नारद ने पहले बताया था।
श्लोक 390 (skanda.6.271.390)
स दृष्ट्वा कुणपं तत्र दिव्यदृष्ट्या महामुनिः निवृत्तः क्षुत्पिपासार्तो नैव शल्यमलंघयत्
sa dṛṣṭvā kuṇapaṁ tatra divyadṛṣṭyā mahāmuniḥ nivṛttaḥ kṣutpipāsārto naiva śalyamalaṁghayat
उस महामुनि ने अपनी दिव्यदृष्टि से वहाँ शव देखकर, भूख-प्यास से पीड़ित होते हुए भी, लौट गए और उस अशुद्ध वस्तु को नहीं लाँघा।
श्लोक 391 (skanda.6.271.391)
अथ ते तं समुद्दिश्य पृष्ठतोऽनुययुस्तदा तिष्ठतिष्ठेति जल्पंतः प्रसादः क्रियतामिति
atha te taṁ samuddiśya pṛṣṭhato'nuyayustadā tiṣṭhatiṣṭheti jalpaṁtaḥ prasādaḥ kriyatāmiti
तब उन्हें पहचानकर वे लोग उनके पीछे-पीछे चलने लगे, 'रुको, रुको, हम पर कृपा कीजिए' कहते हुए।
श्लोक 392 (skanda.6.271.392)
सोऽपि निर्भर्त्सयन्नेतान्निवर्तध्वमिति ब्रुवन् मा गच्छत मत्समीपमिति प्रोच्य पलायितम्
so'pi nirbhartsayannetānnivartadhvamiti bruvan mā gacchata matsamīpamiti procya palāyitam
उन्होंने भी इन्हें डाँटते हुए कहा — 'लौट जाओ, मेरे पास मत आओ' — और यह कहकर वे भाग गए।
श्लोक 393 (skanda.6.271.393)
अथ दूरतरं गत्वा स प्रोवाच क्षुधान्वितः
atha dūrataraṁ gatvā sa provāca kṣudhānvitaḥ
तब दूर जाकर, भूख से व्याकुल होकर उन्होंने कहा।
श्लोक 394 (skanda.6.271.394)
केनादिष्टोऽस्मि युष्माकं स शीघ्रं मे निवेद्यताम् शापाग्नौ येन तं पापं भस्मसात्प्रकरोम्यहम्
kenādiṣṭo'smi yuṣmākaṁ sa śīghraṁ me nivedyatām śāpāgnau yena taṁ pāpaṁ bhasmasātprakaromyaham
'मुझे तुम्हें किसने बताया? शीघ्र बताओ, जिससे मैं उस पापी को अपने शाप की अग्नि में भस्म कर दूँ।'
श्लोक 395 (skanda.6.271.395)
त ऊचुः नारदेन समाख्यातो भवानत्र स्थितो हि नः कथयित्वा ततो वह्नौ संप्रविष्टः स तत्क्षणात्
ta ūcuḥ nāradena samākhyāto bhavānatra sthito hi naḥ kathayitvā tato vahnau saṁpraviṣṭaḥ sa tatkṣaṇāt
उन्होंने कहा — 'नारद ने ही हमें बताया था कि आप यहाँ रहते हैं।' यह कहते ही वे (नारद) उसी क्षण अग्नि में प्रविष्ट हो गए थे।
श्लोक 396 (skanda.6.271.396)
संवर्त उवाच अहं तदेव कर्ता च तस्य दुष्टस्य सांप्रतम् निर्दिष्टो येन युष्माकं गुप्ताचारं समाश्रितः
saṁvarta uvāca ahaṁ tadeva kartā ca tasya duṣṭasya sāṁpratam nirdiṣṭo yena yuṣmākaṁ guptācāraṁ samāśritaḥ
संवर्त ने कहा — मैं अभी उस दुष्ट के साथ वही करूँगा, जिसने गुप्त आचरण से रहते हुए भी मुझे तुम्हें बता दिया।
श्लोक 397 (skanda.6.271.397)
त ऊचुः भगवन्नारदेनोक्तस्त्वमस्माकं महामुने चिरादन्वेष्यमाणानां नान्यस्त्वां वेत्ति कश्चन
ta ūcuḥ bhagavannāradenoktastvamasmākaṁ mahāmune cirādanveṣyamāṇānāṁ nānyastvāṁ vetti kaścana
उन्होंने कहा — हे भगवन्, हे महामुने, नारद ने ही आपको हमें बताया; हम चिरकाल से खोजते हुए भी, आपको कोई और नहीं जानता था।
श्लोक 398 (skanda.6.271.398)
तावन्निवेद्य चास्माकं प्रविष्टो हव्यवाहनम् तत्क्षणादेव विप्रेंद्र न विद्मस्तत्र कारणम्
tāvannivedya cāsmākaṁ praviṣṭo havyavāhanam tatkṣaṇādeva vipreṁdra na vidmastatra kāraṇam
'हमें यह बताकर वे उसी क्षण अग्नि में प्रविष्ट हो गए; हे विप्रेन्द्र, हम इसका कारण नहीं जानते।'
श्लोक 399 (skanda.6.271.399)
संवर्त उवाच अहमप्यतिसंक्रुद्धः शापात्कर्तुं समुद्यतः
saṁvarta uvāca ahamapyatisaṁkruddhaḥ śāpātkartuṁ samudyataḥ
संवर्त ने कहा — मैं भी अत्यंत क्रुद्ध होकर शाप देने को उद्यत हुआ था।
श्लोक 400 (skanda.6.271.400)
एतदेवहि तस्माच्च स्वयमेव कृतं च यत्
etadevahi tasmācca svayameva kṛtaṁ ca yat
'किन्तु यह तो उसने स्वयं ही कर लिया।'
श्लोक 401 (skanda.6.271.401)
तस्माद्वदथ मे शीघ्रं कस्माद्यूयं समागताः
tasmādvadatha me śīghraṁ kasmādyūyaṁ samāgatāḥ
'अतः शीघ्र बताओ, तुम सब क्यों आए हो?'
श्लोक 402 (skanda.6.271.402)
चिरं स्थास्यामि नात्राहं भ्रमिष्यामि पुरीं प्रति प्राणयात्राकृते भिक्षां करिष्यामि स्वयं यतः
ciraṁ sthāsyāmi nātrāhaṁ bhramiṣyāmi purīṁ prati prāṇayātrākṛte bhikṣāṁ kariṣyāmi svayaṁ yataḥ
'मैं यहाँ चिरकाल नहीं ठहरूँगा, नगर की ओर घूमने जाऊँगा; प्राण-यात्रा हेतु मैं स्वयं ही भिक्षा माँगता हूँ।'
श्लोक 403 (skanda.6.271.403)
विशल्यः क्रियतां मार्गः कुणपं ह्रियतां च यत् नोचेच्छापं प्रदास्यामि यद्येवं न करिष्यथ
viśalyaḥ kriyatāṁ mārgaḥ kuṇapaṁ hriyatāṁ ca yat nocecchāpaṁ pradāsyāmi yadyevaṁ na kariṣyatha
'मार्ग को इस बाधा से मुक्त करो — वह शव हटाओ; अन्यथा यदि ऐसा नहीं करोगे तो मैं शाप दे दूँगा।'
श्लोक 404 (skanda.6.271.404)
तथाहं नैव वक्तव्यः कस्यचिच्चात्र संस्थितः अन्वेषयति मां नित्यं मरुत्तः पृथिवीपतिः
tathāhaṁ naiva vaktavyaḥ kasyaciccātra saṁsthitaḥ anveṣayati māṁ nityaṁ maruttaḥ pṛthivīpatiḥ
'तथा मेरे यहाँ रहने की बात किसी से भी नहीं कहनी है; राजा मरुत्त सदा मुझे खोजते रहते हैं।'
श्लोक 405 (skanda.6.271.405)
यज्ञार्थं नैव तं भूपं याजयिष्ये कथंचन धिषणेन परित्यक्तो गुरुणा स महीपतिः
yajñārthaṁ naiva taṁ bhūpaṁ yājayiṣye kathaṁcana dhiṣaṇena parityakto guruṇā sa mahīpatiḥ
'मैं किसी भी प्रकार उस राजा का यज्ञ नहीं कराऊँगा; वह राजा अपने गुरु द्वारा त्यागा जा चुका है।'
श्लोक 406 (skanda.6.271.406)
गुरुपुत्रं च मां ज्ञात्वा ततोऽन्वेषयते हि माम्
guruputraṁ ca māṁ jñātvā tato'nveṣayate hi mām
'गुरु-पुत्र जानकर ही वह मुझे खोजता रहता है।'
श्लोक 407 (skanda.6.271.407)
त ऊचुः शापभ्रष्टा वयं सर्वे चत्वारोऽपि बकादयः पक्षित्वं चैव संप्राप्ता ब्रह्मशापेन सन्मुने
ta ūcuḥ śāpabhraṣṭā vayaṁ sarve catvāro'pi bakādayaḥ pakṣitvaṁ caiva saṁprāptā brahmaśāpena sanmune
उन्होंने कहा — हे सन्मुने, हम सब — बक आदि चारों ही — ब्रह्मशाप से पक्षियोनि को प्राप्त हुए, शाप से भ्रष्ट हैं।
श्लोक 408 (skanda.6.271.408)
महेश्वरगणाश्चैव वयं त्रैलोक्यवंदिताः तिर्यग्योनिं समानीता वैराग्यं परमं गताः
maheśvaragaṇāścaiva vayaṁ trailokyavaṁditāḥ tiryagyoniṁ samānītā vairāgyaṁ paramaṁ gatāḥ
'हम त्रिलोकवंदित महेश्वर के गण हैं, तिर्यग्योनि में लाए गए हैं, अब परम वैराग्य को प्राप्त हैं।'
श्लोक 409 (skanda.6.271.409)
शापांतस्तु समादिष्टस्तैर्विप्रैः स्त्रीसमु द्भवः तवोपदेशतस्तेन बकाद्याः शरणं गताः
śāpāṁtastu samādiṣṭastairvipraiḥ strīsamu dbhavaḥ tavopadeśatastena bakādyāḥ śaraṇaṁ gatāḥ
'उन ब्राह्मणों ने बताया था कि हमारे शाप का अंत आपके ही उपदेश से, एक स्त्री की संतान के माध्यम से होगा; इसी कारण बक आदि आपकी शरण में आए हैं।'
श्लोक 410 (skanda.6.271.410)
तस्मात्त्राहि महाभाग पक्षित्वात्सांप्रतं विभो
tasmāttrāhi mahābhāga pakṣitvātsāṁprataṁ vibho
'अतः हे महाभाग विभो, अभी हमें इस पक्षियोनि से बचाइए।'
श्लोक 411 (skanda.6.271.411)
निर्विण्णाश्चिरकालं च पक्षित्वस्य निषेवणात् एतच्च कारणं नान्यत्तव संगसमुद्भवम्
nirviṇṇāścirakālaṁ ca pakṣitvasya niṣevaṇāt etacca kāraṇaṁ nānyattava saṁgasamudbhavam
'चिरकाल से पक्षि-जीवन भोगते हुए हम विरक्त हो चुके हैं; यही एकमात्र कारण है, अन्य कोई नहीं, जिससे हम आपकी शरण में आए हैं।'
श्लोक 412 (skanda.6.271.412)
संवर्त उवाच यद्येवं गम्यतां शीघ्रं चमत्कारपुरं प्रति भर्तृ यज्ञः स्थितोऽप्यत्र सर्वसंदेहहारकः
saṁvarta uvāca yadyevaṁ gamyatāṁ śīghraṁ camatkārapuraṁ prati bhartṛ yajñaḥ sthito'pyatra sarvasaṁdehahārakaḥ
संवर्त ने कहा — यदि ऐसा है तो शीघ्र चमत्कारपुर की ओर जाओ; वहाँ समस्त संदेहों को हरने वाले भर्तृयज्ञ निवास करते हैं।
श्लोक 413 (skanda.6.271.413)
स वै दास्यति सर्वेषामुपदेशं सुशोभनम् तेन प्राप्स्यथ संदेहं पूर्वीयं च यथास्थितम्
sa vai dāsyati sarveṣāmupadeśaṁ suśobhanam tena prāpsyatha saṁdehaṁ pūrvīyaṁ ca yathāsthitam
'वे तुम सबको उत्तम उपदेश देंगे; उससे तुम्हारा पूर्व संदेह पूर्णतः वैसा ही दूर हो जाएगा।'
श्लोक 414 (skanda.6.271.414)
स पूर्वं याज्ञवल्क्योऽभूत्सर्वशास्त्रार्थपारगः ततो भवांतरेऽन्यस्मिन्कात्यायन इति स्मृतः
sa pūrvaṁ yājñavalkyo'bhūtsarvaśāstrārthapāragaḥ tato bhavāṁtare'nyasminkātyāyana iti smṛtaḥ
'वे पूर्व में समस्त शास्त्रों के अर्थ में पारंगत याज्ञवल्क्य थे; फिर दूसरे जन्म में कात्यायन नाम से स्मृत हुए।'
श्लोक 415 (skanda.6.271.415)
ततो देहांतरं प्राप्य ख्यातो वररुचिर्द्विजः ततो देहांतरेऽन्यस्मिन्वेश्यापुत्रो बभूव ह
tato dehāṁtaraṁ prāpya khyāto vararucirdvijaḥ tato dehāṁtare'nyasminveśyāputro babhūva ha
'फिर देहांतर पाकर वररुचि द्विज नाम से विख्यात हुए; फिर किसी अन्य देहांतर में वेश्या-पुत्र हुए।'
श्लोक 416 (skanda.6.271.416)
आराधिता ब्रह्मसुता देवी वाग्रूपिणी सदा न च तुष्टा स्वयं देवी कारणं वीक्ष्य किंचन
ārādhitā brahmasutā devī vāgrūpiṇī sadā na ca tuṣṭā svayaṁ devī kāraṇaṁ vīkṣya kiṁcana
'ब्रह्मा की पुत्री वाग्रूपिणी देवी सरस्वती सदा उनकी आराधना पाकर भी स्वयं किसी कारणवश प्रसन्न न हुई थीं।'
श्लोक 417 (skanda.6.271.417)
ब्राह्मणेन प्रजातस्तु देहांतं प्राप्य किंचन तस्य वक्त्रं समापन्ना स्वयमेव सरस्वती
brāhmaṇena prajātastu dehāṁtaṁ prāpya kiṁcana tasya vaktraṁ samāpannā svayameva sarasvatī
'किन्तु ब्राह्मण-कुल में जन्म पाकर, अन्य देहांतर में, स्वयं सरस्वती उनके मुख पर आ विराजीं।'
श्लोक 418 (skanda.6.271.418)
पूर्वमाराधिता नित्यं न सा त्यजति कर्हिचित् तस्याश्चर्यमभूच्चान्यद्यज्ञे वेश्यासुतस्य हि
pūrvamārādhitā nityaṁ na sā tyajati karhicit tasyāścaryamabhūccānyadyajñe veśyāsutasya hi
'पूर्वजन्म में सतत आराधित होने के कारण वे उन्हें कभी नहीं छोड़तीं। उस वेश्या-पुत्र के यज्ञ में एक और आश्चर्य हुआ।'
श्लोक 419 (skanda.6.271.419)
ब्रह्मसूत्रं समभ्येति स्कंधे निर्याति गच्छति
brahmasūtraṁ samabhyeti skaṁdhe niryāti gacchati
'ब्रह्मसूत्र स्वयं उनके कंधे पर आता है, निकलता है, चला जाता है।'
श्लोक 420 (skanda.6.271.420)
पूर्वेषामेव लोकानां यज्ञकर्मसु संस्थितान् स संदेहान्हरत्येव यथा नान्योऽत्र कश्चन
pūrveṣāmeva lokānāṁ yajñakarmasu saṁsthitān sa saṁdehānharatyeva yathā nānyo'tra kaścana
'यज्ञ-कर्मों में लगे पूर्वजनों के संदेहों को वे उसी प्रकार दूर करते हैं जैसे यहाँ अन्य कोई नहीं कर सकता।'
श्लोक 421 (skanda.6.271.421)
सूत उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः गतास्ते कुणपं यत्र संवर्तेन प्रणोदिताः
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā praṇipatya muhurmuhuḥ gatāste kuṇapaṁ yatra saṁvartena praṇoditāḥ
सूत जी ने कहा — उसके वचन सुनकर, बार-बार प्रणाम कर, संवर्त द्वारा भेजे गए वे उस स्थान पर गए जहाँ शव रखा था।
श्लोक 422 (skanda.6.271.422)
तच्चाकृष्य ततः सर्वे चमत्कारपुरं गताः वास्तुस्थानपदे तीर्थे तं दृष्ट्वा तत्र संस्थितम्
taccākṛṣya tataḥ sarve camatkārapuraṁ gatāḥ vāstusthānapade tīrthe taṁ dṛṣṭvā tatra saṁsthitam
उसे हटाकर वे सब चमत्कारपुर गए, और वहाँ वास्तुस्थानपद तीर्थ में उन्हें (भर्तृयज्ञ को) स्थित देखा।
श्लोक 423 (skanda.6.271.423)
प्रणिपत्य ततः प्रोचुः सर्वे विनयसंस्थिताः ब्रह्मशापेन निर्दग्धा वयं चत्वार एव हि
praṇipatya tataḥ procuḥ sarve vinayasaṁsthitāḥ brahmaśāpena nirdagdhā vayaṁ catvāra eva hi
प्रणाम कर, विनयपूर्वक खड़े होकर, उन सबने कहा — 'हम चारों ही ब्रह्मशाप से दग्ध हैं।'
श्लोक 424 (skanda.6.271.424)
पक्षित्वं समनुप्राप्तास्त्रयः कूर्मत्वमन्यकः य एते च त्रयोऽस्माकं स्थिताः पार्श्वे महत्तराः
pakṣitvaṁ samanuprāptāstrayaḥ kūrmatvamanyakaḥ ya ete ca trayo'smākaṁ sthitāḥ pārśve mahattarāḥ
'तीन को पक्षित्व प्राप्त हुआ, एक को कच्छपत्व; और ये तीन जो हमारे साथ खड़े हैं, हमारे बड़े हैं।'
श्लोक 425 (skanda.6.271.425)
मार्कंडः कथितो ह्येष इंद्रद्युम्नस्तथा परः तृतीयो लोमशो नाम विख्यातः सुमहातपाः
mārkaṁḍaḥ kathito hyeṣa iṁdradyumnastathā paraḥ tṛtīyo lomaśo nāma vikhyātaḥ sumahātapāḥ
'यह मार्कण्ड कहलाते हैं, दूसरे इन्द्रद्युम्न; तीसरे लोमश नाम से विख्यात, महातपस्वी।'
श्लोक 426 (skanda.6.271.426)
जीवितव्यस्य निर्विण्णास्त्रय एव च सांप्रतम् उपदेशप्रदानेन प्रसादं कर्तुमर्हसि
jīvitavyasya nirviṇṇāstraya eva ca sāṁpratam upadeśapradānena prasādaṁ kartumarhasi
'हम तीनों अब जीवन से विरक्त हो चुके हैं; अपना उपदेश देकर हम पर कृपा कीजिए।'
श्लोक 427 (skanda.6.271.427)
सूत उवाच तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भर्तृयज्ञो महामुनिः अब्रवीत्सुचिरं ध्यात्वा ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा
sūta uvāca teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā bhartṛyajño mahāmuniḥ abravītsuciraṁ dhyātvā jñātvā divyena cakṣuṣā
सूत जी ने कहा — उनके वचन सुनकर महामुनि भर्तृयज्ञ ने चिरकाल तक ध्यान कर, दिव्य नेत्र से जानकर यह कहा।
श्लोक 428 (skanda.6.271.428)
यूयं सप्तैव लिंगानि स्थापयध्वं समागताः हाटकेश्वरजे क्षेत्रे नाम्ना चैवांतिके निभोः
yūyaṁ saptaiva liṁgāni sthāpayadhvaṁ samāgatāḥ hāṭakeśvaraje kṣetre nāmnā caivāṁtike nibhoḥ
'तुम सब यहाँ एकत्र होकर हाटकेश्वर क्षेत्र में भगवान के नाम और स्वरूप में सात लिंग स्थापित करो।'
श्लोक 429 (skanda.6.271.429)
ततो दानानि सप्तैव तेषामग्रे प्रयच्छत कुलपर्वतसंज्ञानि सर्वपापहराणि च
tato dānāni saptaiva teṣāmagre prayacchata kulaparvatasaṁjñāni sarvapāpaharāṇi ca
'तत्पश्चात उनके समक्ष कुलपर्वत नामक सात दान करो, जो समस्त पापों को हरने वाले हैं।'
श्लोक 430 (skanda.6.271.430)
ततः प्राप्स्यथ चाभीष्टं वपुर्दिव्यं मनोरमम् गणत्वं देवदेवस्य त्रिने त्रस्य महात्मनः
tataḥ prāpsyatha cābhīṣṭaṁ vapurdivyaṁ manoramam gaṇatvaṁ devadevasya trine trasya mahātmanaḥ
'तब तुम्हें अभीष्ट दिव्य, मनोहर शरीर तथा महात्मा त्रिनेत्र देवदेव का गणत्व प्राप्त होगा।'
श्लोक 431 (skanda.6.271.431)
त ऊचुः प्रकीर्तय विभो दानं तेषां यच्छामहे यथा प्रमाणं च विधानं च विस्तरेण महामुने
ta ūcuḥ prakīrtaya vibho dānaṁ teṣāṁ yacchāmahe yathā pramāṇaṁ ca vidhānaṁ ca vistareṇa mahāmune
उन्होंने कहा — हे विभो, हे महामुने, वह दान किस प्रकार दें, उसका प्रमाण और विधि विस्तार से बताइए।
श्लोक 432 (skanda.6.271.432)
भर्तृयज्ञ उवाच देयो हेममयो मेरुः कैलासो रजतोद्भवः कार्प्पासेन हिमाद्रिस्तु गुडजो गंधमादनः
bhartṛyajña uvāca deyo hemamayo meruḥ kailāso rajatodbhavaḥ kārppāsena himādristu guḍajo gaṁdhamādanaḥ
भर्तृयज्ञ ने कहा — मेरु सुवर्ण का, कैलास रजत का, हिमाद्रि कपास का, गंधमादन गुड़ का बनाकर देना चाहिए।
श्लोक 433 (skanda.6.271.433)
सुवेलस्तु तिलैर्देयो विंध्यः शर्करया तथा लवणेन तथा शृंगी यथोक्तविधिना ततः
suvelastu tilairdeyo viṁdhyaḥ śarkarayā tathā lavaṇena tathā śṛṁgī yathoktavidhinā tataḥ
'सुवेल तिल का, विंध्य शक्कर का, तथा शृंगी नमक का — यथोक्त विधि से देना चाहिए।'
श्लोक 434 (skanda.6.271.434)
सूत उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा संस्थाप्य विधिपूर्वकम् सप्तलिंगानि तैः पश्चात्प्रदत्ताः कुलपर्वताः
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā saṁsthāpya vidhipūrvakam saptaliṁgāni taiḥ paścātpradattāḥ kulaparvatāḥ
सूत जी ने कहा — उनके वचन सुनकर, विधिपूर्वक सातों लिंगों की स्थापना कर, उन्होंने तत्पश्चात कुलपर्वत दान किए।
श्लोक 435 (skanda.6.271.435)
इंद्रद्युम्नेश्वरस्याग्रे इंद्रद्युम्नः प्रतापवान् मेरुं हेममयं कृत्वा भर्तृयज्ञमते स्थितः
iṁdradyumneśvarasyāgre iṁdradyumnaḥ pratāpavān meruṁ hemamayaṁ kṛtvā bhartṛyajñamate sthitaḥ
इन्द्रद्युम्नेश्वर के समक्ष प्रतापी इन्द्रद्युम्न ने भर्तृयज्ञ के मत के अनुसार सुवर्णमय मेरु बनाकर अर्पित किया।
श्लोक 436 (skanda.6.271.436)
मार्कंडेश्वरदेवस्य मार्कंडेन च धीमता कैलासो राजतो दत्तो भक्तिपूर्वं द्विजोत्तमाः
mārkaṁḍeśvaradevasya mārkaṁḍena ca dhīmatā kailāso rājato datto bhaktipūrvaṁ dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, मार्कण्डेश्वर देव के समक्ष बुद्धिमान मार्कण्ड ने भक्तिपूर्वक रजतमय कैलास अर्पित किया।
श्लोक 437 (skanda.6.271.437)
कार्पासो हिमवान्दत्तः पालकेन द्विजातये गंधमादनसंज्ञस्तु प्रदत्तो गुडजः पुरः
kārpāso himavāndattaḥ pālakena dvijātaye gaṁdhamādanasaṁjñastu pradatto guḍajaḥ puraḥ
पालक (बक) ने कपास से बना हिमवान द्विज को अर्पित किया; तथा गंधमादन नामक गुड़ का पर्वत भी उसी के समक्ष दान किया गया।
श्लोक 438 (skanda.6.271.438)
घंटकेश्वरदेवस्य घंटकेन द्विजोत्तमाः कच्छपेन तु संदत्तः सुवेलः पर्वतोत्तमः
ghaṁṭakeśvaradevasya ghaṁṭakena dvijottamāḥ kacchapena tu saṁdattaḥ suvelaḥ parvatottamaḥ
हे द्विजोत्तमो, घंटकेश्वर देव के समक्ष घंटक ने; तथा कच्छप ने सुवेल नामक श्रेष्ठ पर्वत अर्पित किया।
श्लोक 439 (skanda.6.271.439)
कच्छपेश्वरदेवस्य पुरस्तिलमयस्तथा शार्करस्तु तदा शैलः प्रदत्तो भक्तिपूर्वकम्
kacchapeśvaradevasya purastilamayastathā śārkarastu tadā śailaḥ pradatto bhaktipūrvakam
कच्छपेश्वर देव के समक्ष तिलमय सुवेल दिया गया; तथा तब शक्करमय पर्वत भी भक्तिपूर्वक दिया गया।
श्लोक 440 (skanda.6.271.440)
शैल ईशानसंज्ञेन निजदेवस्य चाऽग्रतः वानरेश्वर देवस्य पुरतो द्विजसत्तमाः
śaila īśānasaṁjñena nijadevasya cā'grataḥ vānareśvara devasya purato dvijasattamāḥ
हे द्विजसत्तमो, वह पर्वत ईशान नामधारी (उलूक) द्वारा अपने ही देव वानरेश्वर के समक्ष अर्पित किया गया।
श्लोक 441 (skanda.6.271.441)
गृध्रेणाथ प्रदत्तस्तु लवणाख्यो महागिरिः शृंगी नाम महाभागः श्रद्धापूतेन चेतसा
gṛdhreṇātha pradattastu lavaṇākhyo mahāgiriḥ śṛṁgī nāma mahābhāgaḥ śraddhāpūtena cetasā
फिर गृध्र द्वारा श्रद्धापूत मन से महाभाग शृंगी नामक नमक का महापर्वत अर्पित किया गया।
श्लोक 442 (skanda.6.271.442)
तत्राश्चर्यमभूद्विप्रा दत्तमात्रैर्नगोत्तमैः पक्षित्वं निर्गतं तेषां कूर्मत्वमितरस्य च
tatrāścaryamabhūdviprā dattamātrairnagottamaiḥ pakṣitvaṁ nirgataṁ teṣāṁ kūrmatvamitarasya ca
हे विप्रो, वहाँ आश्चर्य हुआ — उन श्रेष्ठ पर्वतों के दान करते ही उन सबका पक्षित्व और उस अन्य का कच्छपत्व नष्ट हो गया।
श्लोक 443 (skanda.6.271.443)
एतस्मिन्नेव काले तु सर्वे ते तत्प्रभावतः दिव्यमाल्यांबरधरा दिव्यगंधानुलेपनाः संजाता ब्राह्मणश्रेष्ठा ये च तत्संमुखे स्थिताः
etasminneva kāle tu sarve te tatprabhāvataḥ divyamālyāṁbaradharā divyagaṁdhānulepanāḥ saṁjātā brāhmaṇaśreṣṭhā ye ca tatsaṁmukhe sthitāḥ
उसी क्षण उस प्रभाव से, उनके समक्ष खड़े वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण दिव्य माला-वस्त्र धारण किए, दिव्य गंध-अनुलेपन से युक्त हो गए।
श्लोक 444 (skanda.6.271.444)
विमानानि च सर्वेषां समायातानि तत्क्षणात्
vimānāni ca sarveṣāṁ samāyātāni tatkṣaṇāt
और उसी क्षण सबके लिए विमान भी आ पहुँचे।
श्लोक 445 (skanda.6.271.445)
भर्तृयज्ञमनुप्राप्य प्रणिपत्य च तान्द्विजान् कैलासं पर्वतं प्राप्ता विमानवरमाश्रिताः
bhartṛyajñamanuprāpya praṇipatya ca tāndvijān kailāsaṁ parvataṁ prāptā vimānavaramāśritāḥ
भर्तृयज्ञ के पास जाकर, उन ब्राह्मणों को प्रणाम कर, वे श्रेष्ठ विमानों पर आरूढ़ होकर कैलास पर्वत पर पहुँचे।
श्लोक 446 (skanda.6.271.446)
एतद्वः सर्वमाख्यातं यथा तल्लिंगसप्तकम् हाटकेश्वरजे क्षेत्रे संजातं पापनाशनम्
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yathā talliṁgasaptakam hāṭakeśvaraje kṣetre saṁjātaṁ pāpanāśanam
इस प्रकार तुम्हें यह सब बताया गया कि किस प्रकार वह पापनाशक सप्तलिंग हाटकेश्वर क्षेत्र में उत्पन्न हुआ।
श्लोक 447 (skanda.6.271.447)
अन्योऽपि यः पुनस्तेषां लिंगानां भक्तिसंयुतः कुलपर्वतदानं च कुर्यात्सोऽपि शिवं व्रजेत्
anyo'pi yaḥ punasteṣāṁ liṁgānāṁ bhaktisaṁyutaḥ kulaparvatadānaṁ ca kuryātso'pi śivaṁ vrajet
जो कोई अन्य मनुष्य भी उन लिंगों के प्रति भक्तियुक्त होकर कुलपर्वत-दान करता है, वह भी शिव को प्राप्त होता है।
श्लोक 448 (skanda.6.271.448)
तानि लिंगानि यो मर्त्यः प्रातरुत्थाय वीक्षते अज्ञानविहितात्पापात्सोऽपि मुक्तिमवाप्नुयात्
tāni liṁgāni yo martyaḥ prātarutthāya vīkṣate ajñānavihitātpāpātso'pi muktimavāpnuyāt
जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर उन लिंगों का दर्शन करता है, वह भी अज्ञानवश किए गए पाप से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 449 (skanda.6.271.449)
यश्चैतान्पर्वतान्सप्त क्रमेणात्र प्रयच्छति द्विजातिभ्यः स्वलिंगानां पुरतस्त्रिदिवं व्रजेत्
yaścaitānparvatānsapta krameṇātra prayacchati dvijātibhyaḥ svaliṁgānāṁ puratastridivaṁ vrajet
जो इन सातों पर्वतों को क्रमशः अपने-अपने लिंग के समक्ष ब्राह्मणों को अर्पित करता है, वह स्वर्ग को प्राप्त होता है।
श्लोक 450 (skanda.6.271.450)
स्थित्वा कल्पांतरं तत्र संसेव्य च वराप्सराः दिव्यान्भोगांश्च संसेव्य यदा भूमौ प्रजायते चक्रवर्तित्वमासाद्य सार्वभौमः प्रजायते
sthitvā kalpāṁtaraṁ tatra saṁsevya ca varāpsarāḥ divyānbhogāṁśca saṁsevya yadā bhūmau prajāyate cakravartitvamāsādya sārvabhaumaḥ prajāyate
वहाँ एक कल्प तक रहकर, श्रेष्ठ अप्सराओं तथा दिव्य भोगों का सेवन कर, जब वह पृथ्वी पर पुनः जन्म लेता है, तब चक्रवर्तित्व प्राप्त कर सार्वभौम सम्राट बनता है।
श्लोक 451 (skanda.6.271.451)
एकेन तु प्रदत्तेन जायते पापसंक्षयः द्वाभ्यां पुत्राश्च पौत्राश्च वांछितानि फलानि च
ekena tu pradattena jāyate pāpasaṁkṣayaḥ dvābhyāṁ putrāśca pautrāśca vāṁchitāni phalāni ca
एक पर्वत के दान से पाप का क्षय होता है, दो से पुत्र-पौत्र तथा अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं।
श्लोक 452 (skanda.6.271.452)
त्रिभिः संजायते राजा चतुर्भिर्मंडलेश्वरः भारतस्य च खण्डस्य स्वामी भवति पंचभिः
tribhiḥ saṁjāyate rājā caturbhirmaṁḍaleśvaraḥ bhāratasya ca khaṇḍasya svāmī bhavati paṁcabhiḥ
तीन से राजा बनता है, चार से मंडलेश्वर, तथा पाँच से भारतखंड का स्वामी बनता है।
श्लोक 453 (skanda.6.271.453)
जंबुद्वीपाधिपः षङ्भिश्चक्रवर्ती च सप्तभिः विधिवत्पर्वतैर्दत्तैरेत दाह पितामहः
jaṁbudvīpādhipaḥ ṣaṅbhiścakravartī ca saptabhiḥ vidhivatparvatairdattaireta dāha pitāmahaḥ
छह से जम्बूद्वीप का अधिपति, तथा सात पर्वत विधिपूर्वक देने से चक्रवर्ती बनता है — ऐसा स्वयं पितामह ने कहा है।
श्लोक 454 (skanda.6.271.454)
नरः स्याद्ब्राह्मणश्रेष्ठाः सदाजन्मनिजन्मनि न दुःखितो दरिद्रो वा व्याधितो वा प्रजायते
naraḥ syādbrāhmaṇaśreṣṭhāḥ sadājanmanijanmani na duḥkhito daridro vā vyādhito vā prajāyate
हे द्विजश्रेष्ठो, ऐसा मनुष्य जन्म-जन्मांतर में सदा दुःख, दरिद्रता अथवा रोग से रहित उत्पन्न होता है।
श्लोक 455 (skanda.6.271.455)
सौभाग्यसुखसंयुक्तः सुदेहो रत्नवान्भवेत् सर्वराज्यविनिर्मुक्तः प्रतापी विजितेन्द्रियः
saubhāgyasukhasaṁyuktaḥ sudeho ratnavānbhavet sarvarājyavinirmuktaḥ pratāpī vijitendriyaḥ
वह सौभाग्य-सुख से युक्त, सुंदर शरीर वाला, रत्नवान होता है; सर्वराज्य-बंधन से मुक्त, प्रतापी तथा जितेन्द्रिय होता है।
श्लोक 456 (skanda.6.271.456)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भूमिपालैर्विशेषतः एतं च पर्वता देया उद्दिश्य निजदेवताः
tasmātsarvaprayatnena bhūmipālairviśeṣataḥ etaṁ ca parvatā deyā uddiśya nijadevatāḥ
अतः राजाओं को विशेष रूप से सर्वप्रयत्नपूर्वक ये पर्वत अपने-अपने इष्टदेव को उद्दिष्ट कर अर्पित करने चाहिए।