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नागर खण्ड · अध्याय 272

युगों के स्वरूप का वर्णन

अध्याय 271अध्याय-सूचीअध्याय 273

श्लोक 1 (skanda.6.272.1)

ऋषय ऊचुः यदेतद्भवता प्रोक्तमीशानस्य महीपतेः ईश्वरेण पुरा दत्तमायुर्यावत्स्ववासरम्

ṛṣaya ūcuḥ yadetadbhavatā proktamīśānasya mahīpateḥ īśvareṇa purā dattamāyuryāvatsvavāsaram

ऋषियों ने कहा — आपने जो बताया कि ईश्वर ने पूर्व में राजा ईशान को अपने ही एक दिन के बराबर आयु प्रदान की थी...

श्लोक 2 (skanda.6.272.2)

किंप्रमाणं भवेत्तस्य दिवसस्य ब्रवीहि नः सूत उवाच अहं वः कीर्तयिष्यामि प्रमाणं दिवसस्य तु

kiṁpramāṇaṁ bhavettasya divasasya bravīhi naḥ sūta uvāca ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi pramāṇaṁ divasasya tu

...उस दिन का प्रमाण क्या है, हमें बताइए। सूत जी ने कहा — मैं तुम्हें दिन का वह प्रमाण बताता हूँ।

श्लोक 3 (skanda.6.272.3)

माहेश्वरस्य विप्रेन्द्राः श्रूयतां गदतः स्फुटम् निमेषस्य चतुर्भागस्त्रुटिः स्यात्तद्द्वयं लवः

māheśvarasya viprendrāḥ śrūyatāṁ gadataḥ sphuṭam nimeṣasya caturbhāgastruṭiḥ syāttaddvayaṁ lavaḥ

हे विप्रेन्द्रो, माहेश्वर काल को स्पष्ट रूप से कहता हूँ, सुनिए — निमेष का चौथा भाग त्रुटि कहलाता है, दो त्रुटियाँ एक लव।

श्लोक 4 (skanda.6.272.4)

लवद्वयं यवः प्रोक्तः काष्ठा ते दश पंच च त्रिंशत्काष्ठाः कलामाहुः क्षणस्त्रिंशत्कलो मतः

lavadvayaṁ yavaḥ proktaḥ kāṣṭhā te daśa paṁca ca triṁśatkāṣṭhāḥ kalāmāhuḥ kṣaṇastriṁśatkalo mataḥ

दो लव एक यव कहलाते हैं, पंद्रह यव एक काष्ठा; तीस काष्ठा को कला कहते हैं, तीस कला को क्षण माना गया है।

श्लोक 5 (skanda.6.272.5)

क्षणैः षष्ट्या पलं प्रोक्तं षष्ट्या तेषां च नाडिका नाडिकाद्वितयेनैव मुहूर्तं परिकीर्तितम्

kṣaṇaiḥ ṣaṣṭyā palaṁ proktaṁ ṣaṣṭyā teṣāṁ ca nāḍikā nāḍikādvitayenaiva muhūrtaṁ parikīrtitam

साठ क्षण को पल कहा गया है, साठ पल की एक नाड़िका; दो नाड़िकाओं से मुहूर्त कहलाता है।

श्लोक 6 (skanda.6.272.6)

त्रिंशन्मुहूर्त्तमुद्दिष्टमहोरात्रं मनीषिभिः मासस्त्रिंशदहोरात्रैद्वौ द्वौ मासावृतुं विदुः

triṁśanmuhūrttamuddiṣṭamahorātraṁ manīṣibhiḥ māsastriṁśadahorātraidvau dvau māsāvṛtuṁ viduḥ

तीस मुहूर्तों को विद्वानों ने अहोरात्र (दिन-रात) कहा है; तीस अहोरात्रों का एक मास; दो-दो मास मिलकर एक ऋतु होती है।

श्लोक 7 (skanda.6.272.7)

ऋतुत्रयं चाप्ययनमयने द्वे तु वत्सरम् मानुषाणां हि सर्वेषां स एव परिकीर्तितः

ṛtutrayaṁ cāpyayanamayane dve tu vatsaram mānuṣāṇāṁ hi sarveṣāṁ sa eva parikīrtitaḥ

तीन ऋतुओं का एक अयन; और दो अयन मिलकर एक वत्सर (वर्ष) — यही सभी मनुष्यों का वर्ष कहा गया है।

श्लोक 8 (skanda.6.272.8)

स देवानामहोरात्रं पुराणज्ञाः प्रचक्षते अयनं चोत्तरं शुक्लं यद्देवानां दिनं च तत् यद्दक्षिणं तु सा रात्रिः शुभकर्मविगर्हिता

sa devānāmahorātraṁ purāṇajñāḥ pracakṣate ayanaṁ cottaraṁ śuklaṁ yaddevānāṁ dinaṁ ca tat yaddakṣiṇaṁ tu sā rātriḥ śubhakarmavigarhitā

पुराणों के ज्ञाता उसी को देवताओं का अहोरात्र कहते हैं — उत्तरायण, जो शुक्ल है, देवताओं का दिन है; दक्षिणायन, जो शुभकर्मों के लिए वर्जित है, उनकी रात्रि है।

श्लोक 9 (skanda.6.272.9)

यथा सुप्तो न गृह्णाति किंचिद्भोगादिकं नरः तथा देवाश्च यज्ञांशान्न गृह्णन्ति कथं चन

yathā supto na gṛhṇāti kiṁcidbhogādikaṁ naraḥ tathā devāśca yajñāṁśānna gṛhṇanti kathaṁ cana

जैसे सोया हुआ मनुष्य किसी भोग आदि को ग्रहण नहीं करता, वैसे ही देवता भी (रात्रि में) यज्ञ के भाग को कदापि ग्रहण नहीं करते।

श्लोक 10 (skanda.6.272.10)

अनेनैव तु मानेन मानवेन द्विजोत्तमाः लक्षैः सप्तदशाख्यैस्तु वत्सराणां प्रकीर्तितम्

anenaiva tu mānena mānavena dvijottamāḥ lakṣaiḥ saptadaśākhyaistu vatsarāṇāṁ prakīrtitam

हे द्विजोत्तमो, इसी मानव-मान से सत्रह लाख वर्ष...

श्लोक 11 (skanda.6.272.11)

अष्टाविंशत्सहस्रैस्तु वत्सराणां कृतं युगम् तस्मिञ्छ्वेतोऽभवद्विष्णुर्भगवान्यो जगद्गुरुः

aṣṭāviṁśatsahasraistu vatsarāṇāṁ kṛtaṁ yugam tasmiñchveto'bhavadviṣṇurbhagavānyo jagadguruḥ

...तथा अट्ठाईस हज़ार वर्षों सहित कृतयुग कहा गया है। उसमें भगवान विष्णु, जो जगद्गुरु हैं, श्वेत वर्ण के थे।

श्लोक 12 (skanda.6.272.12)

लोकाः पापविनिर्मुक्ताः शांता दांता जितेन्द्रियाः दीर्घायुषस्तथा सर्वे सदैव तपसि स्थिताः

lokāḥ pāpavinirmuktāḥ śāṁtā dāṁtā jitendriyāḥ dīrghāyuṣastathā sarve sadaiva tapasi sthitāḥ

लोग पापरहित, शांत, संयमी, जितेन्द्रिय थे; तथा सभी दीर्घायु होकर सदा तपस्या में लीन रहते थे।

श्लोक 13 (skanda.6.272.13)

यो यथा जन्म चाप्नोति तथा स म्रियते नरः न पुत्रसंभवो मृत्युर्वीक्ष्यते जनकैः क्वचित्

yo yathā janma cāpnoti tathā sa mriyate naraḥ na putrasaṁbhavo mṛtyurvīkṣyate janakaiḥ kvacit

मनुष्य जिस प्रकार जन्म लेता, उसी प्रकार मृत्यु को प्राप्त होता; पिता कभी भी पुत्र की मृत्यु नहीं देखते थे।

श्लोक 14 (skanda.6.272.14)

कामः क्रोधस्तथा लोभो दंभो मत्सर एव च न जायते नृणां तत्र युगे तु द्विजसत्तमाः

kāmaḥ krodhastathā lobho daṁbho matsara eva ca na jāyate nṛṇāṁ tatra yuge tu dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो, उस युग में मनुष्यों में काम, क्रोध, लोभ, दंभ तथा मत्सर उत्पन्न नहीं होते थे।

श्लोक 15 (skanda.6.272.15)

ततस्त्रेतायुगं भावि द्वितीयं मुनिसत्तमाः पादेनैकेन पापं तु रौद्रं धर्मे तदाविशत्

tatastretāyugaṁ bhāvi dvitīyaṁ munisattamāḥ pādenaikena pāpaṁ tu raudraṁ dharme tadāviśat

हे मुनिसत्तमो, तत्पश्चात दूसरा त्रेतायुग आता है; तब धर्म में एक पाद रौद्र पाप प्रविष्ट हो जाता है।

श्लोक 16 (skanda.6.272.16)

ततो रक्तत्वमभ्येति भगवान्मधुसूदनः पापांशेऽपि च संप्राप्ते सस्पर्द्धो जायते जनः

tato raktatvamabhyeti bhagavānmadhusūdanaḥ pāpāṁśe'pi ca saṁprāpte sasparddho jāyate janaḥ

तब भगवान मधुसूदन रक्त वर्ण के हो जाते हैं; पाप का अंश आने पर लोग परस्पर स्पर्धाशील हो जाते हैं।

श्लोक 17 (skanda.6.272.17)

स्वर्गमार्गकृते सर्वे चक्रुर्यज्ञांस्ततः परम् अग्निष्टोमादिकांस्तत्र बहुहोमादिकांस्तथा

svargamārgakṛte sarve cakruryajñāṁstataḥ param agniṣṭomādikāṁstatra bahuhomādikāṁstathā

तब सभी स्वर्गमार्ग हेतु यज्ञ करने लगे — अग्निष्टोम आदि तथा अनेक होम आदि।

श्लोक 18 (skanda.6.272.18)

देवलोकांस्ततो यांति मूलाद्यावच्चतुर्दश ब्रह्मलोकस्य पर्यंतं स्वकीयैर्य ज्ञकर्मभिः

devalokāṁstato yāṁti mūlādyāvaccaturdaśa brahmalokasya paryaṁtaṁ svakīyairya jñakarmabhiḥ

अपने-अपने यज्ञकर्मों से वे मूल से लेकर चौदह देवलोकों तक, ब्रह्मलोक की सीमा तक पहुँचते हैं।

श्लोक 19 (skanda.6.272.19)

किंचित्स्वल्पायुषस्तत्र जायन्ते स्पर्धयाऽन्विताः परं तत्रापि नो यांति मृत्युं पुत्राः कथंचन

kiṁcitsvalpāyuṣastatra jāyante spardhayā'nvitāḥ paraṁ tatrāpi no yāṁti mṛtyuṁ putrāḥ kathaṁcana

वहाँ उनकी आयु कुछ कम हो जाती है और वे स्पर्धाशील हो जाते हैं, फिर भी वहाँ पुत्र कभी पिता से पहले मृत्यु को प्राप्त नहीं होते।

श्लोक 20 (skanda.6.272.20)

जनके विद्यमाने च स्व ल्पदोषाः प्रकीर्तिताः कामक्रोधादयो ये च भवंति न भवंति च

janake vidyamāne ca sva lpadoṣāḥ prakīrtitāḥ kāmakrodhādayo ye ca bhavaṁti na bhavaṁti ca

पिता के जीवित रहते ही थोड़े-बहुत दोष कहे गए हैं; काम-क्रोध आदि कभी उत्पन्न होते, कभी नहीं होते।

श्लोक 21 (skanda.6.272.21)

एकया वेलया तत्र वापितं सस्यमुत्तमम् सप्तवारान्प्रगृह्णंति वैश्याः कृषिपरायणाः

ekayā velayā tatra vāpitaṁ sasyamuttamam saptavārānpragṛhṇaṁti vaiśyāḥ kṛṣiparāyaṇāḥ

वहाँ एक ही बार बोया गया उत्तम अन्न कृषिपरायण वैश्य सात बार काटते थे।

श्लोक 22 (skanda.6.272.22)

सर्वा घटस्रवा गावो महिष्यश्च चतुर्गुणाः प्रयच्छंति तथा क्षीरमुष्ट्र्यस्तासां चतुर्गुणम्

sarvā ghaṭasravā gāvo mahiṣyaśca caturguṇāḥ prayacchaṁti tathā kṣīramuṣṭryastāsāṁ caturguṇam

सभी गायें घट भर दूध देतीं, भैंसें उससे चौगुना, तथा ऊँटनियाँ भैंसों से भी चौगुना दूध देतीं।

श्लोक 23 (skanda.6.272.23)

अजाविकास्तथा पादं नार्यः सर्वास्तथैव च वेदाध्ययनसंपन्नाः प्रतिग्रहविवर्जिताः शापानुग्रहकृत्येषु समर्थाः संभवंति च २३ क्षत्रियाः क्षात्रधर्मेण पालयंति वसुंधराम् न तत्र दृश्यते चौरो न च जारः कथंचन स्वधर्मनिरताः सर्वे वर्णाश्चैव व्यवस्थिताः

ajāvikāstathā pādaṁ nāryaḥ sarvāstathaiva ca vedādhyayanasaṁpannāḥ pratigrahavivarjitāḥ śāpānugrahakṛtyeṣu samarthāḥ saṁbhavaṁti ca 23 kṣatriyāḥ kṣātradharmeṇa pālayaṁti vasuṁdharām na tatra dṛśyate cauro na ca jāraḥ kathaṁcana svadharmaniratāḥ sarve varṇāścaiva vyavasthitāḥ

बकरी-भेड़ें उससे चौथाई देतीं; तथा समस्त स्त्रियाँ वेदाध्ययन-सम्पन्न, प्रतिग्रह-रहित, शाप-अनुग्रह करने में समर्थ होती थीं। क्षत्रिय क्षात्रधर्म से पृथ्वी की रक्षा करते; वहाँ न कोई चोर दिखाई देता, न कोई व्यभिचारी; सभी वर्ण अपने-अपने धर्म में स्थित रहते थे।

श्लोक 24 (skanda.6.272.24)

तच्च द्वादशभिर्लक्षैर्वत्सराणां प्रकीर्तितम् षण्णवत्या सहस्रैस्तु द्वितीयं युगमुत्तमम्

tacca dvādaśabhirlakṣairvatsarāṇāṁ prakīrtitam ṣaṇṇavatyā sahasraistu dvitīyaṁ yugamuttamam

वह उत्तम दूसरा युग बारह लाख छियानवे हज़ार वर्षों का कहा गया है।

श्लोक 25 (skanda.6.272.25)

ततश्च द्वापरं भावि तृतीयं द्विजसत्तमाः द्वौ पादौ तत्र पापस्य द्वौ च धर्मस्य संस्थितौ भगवान्वासुदेवश्च कपिलस्तत्र जायते

tataśca dvāparaṁ bhāvi tṛtīyaṁ dvijasattamāḥ dvau pādau tatra pāpasya dvau ca dharmasya saṁsthitau bhagavānvāsudevaśca kapilastatra jāyate

हे द्विजसत्तमो, तत्पश्चात तीसरा युग द्वापर आता है; वहाँ पाप के दो पाद तथा धर्म के भी दो पाद स्थित रहते हैं। वहाँ भगवान वासुदेव कपिल (श्याम वर्ण) रूप में जन्म लेते हैं।

श्लोक 26 (skanda.6.272.26)

तच्चाष्टलक्षमानेन वत्सराणां प्रकीर्तितम् चतुःषष्टिभिरन्यैस्तु सहस्राणां द्विजोत्तमाः

taccāṣṭalakṣamānena vatsarāṇāṁ prakīrtitam catuḥṣaṣṭibhiranyaistu sahasrāṇāṁ dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो, वह आठ लाख वर्षों तथा अन्य चौंसठ हज़ार वर्षों का कहा गया है।

श्लोक 27 (skanda.6.272.27)

कामः क्रोधस्तथा लोभो दंभो मत्सर एव च षडेते तत्र जायंते ईर्ष्या चैव तु सप्तमी

kāmaḥ krodhastathā lobho daṁbho matsara eva ca ṣaḍete tatra jāyaṁte īrṣyā caiva tu saptamī

काम, क्रोध, लोभ, दंभ तथा मत्सर — ये छह वहाँ उत्पन्न होते हैं, तथा ईर्ष्या सातवीं।

श्लोक 28 (skanda.6.272.28)

अथ संसेवितास्तैस्तु मानवाश्च परस्परम् विरुद्धांश्च प्रकुर्वंति नाप्नुवंति यथा दिवम्

atha saṁsevitāstaistu mānavāśca parasparam viruddhāṁśca prakurvaṁti nāpnuvaṁti yathā divam

तब इनसे युक्त मनुष्य परस्पर विरुद्ध कार्य करने लगते हैं, जिससे वे स्वर्ग को प्राप्त नहीं होते।

श्लोक 29 (skanda.6.272.29)

केचित्तत्रापि जायंते शांता दांता जितेंद्रियाः न सर्वेऽपि द्विजश्रेष्ठा यतोऽर्द्धं पातकस्य तु

kecittatrāpi jāyaṁte śāṁtā dāṁtā jiteṁdriyāḥ na sarve'pi dvijaśreṣṭhā yato'rddhaṁ pātakasya tu

हे द्विजश्रेष्ठो, वहाँ भी कुछ लोग शांत, संयमी, जितेन्द्रिय उत्पन्न होते हैं, किन्तु सभी नहीं, क्योंकि वहाँ पाप का आधा भाग व्याप्त होता है।

श्लोक 30 (skanda.6.272.30)

ततः कलियुगं प्रोक्तं चतुर्थं च सुदारुणम् एकपादो वृषो यत्र पापं पादैस्त्रिभिः स्थितम्

tataḥ kaliyugaṁ proktaṁ caturthaṁ ca sudāruṇam ekapādo vṛṣo yatra pāpaṁ pādaistribhiḥ sthitam

तत्पश्चात चौथा युग कलियुग कहा गया है, अत्यंत भयंकर; वहाँ धर्मरूपी वृषभ एक पाद पर खड़ा रहता है, तीन पादों पर पाप स्थित रहता है।

श्लोक 31 (skanda.6.272.31)

कृष्णत्वं याति देवोऽपि तत्र चैव चतुर्भुजः एक पादोऽपि धर्मस्य यावत्तावत्प्रवर्तते

kṛṣṇatvaṁ yāti devo'pi tatra caiva caturbhujaḥ eka pādo'pi dharmasya yāvattāvatpravartate

वहाँ चतुर्भुज देव भी कृष्ण वर्ण को प्राप्त होते हैं; जब तक धर्म का एक पाद भी शेष रहता है, तब तक वह कार्यरत रहता है।

श्लोक 32 (skanda.6.272.32)

पश्चान्नाशं समभ्येति यावत्तावच्छनैःशनैः प्रमाणं तस्य निर्दिष्टं लक्षाश्चत्वार एव हि

paścānnāśaṁ samabhyeti yāvattāvacchanaiḥśanaiḥ pramāṇaṁ tasya nirdiṣṭaṁ lakṣāścatvāra eva hi

तत्पश्चात धीरे-धीरे वह नाश को प्राप्त होता जाता है; इसका प्रमाण चार लाख वर्ष कहा गया है...

श्लोक 33 (skanda.6.272.33)

द्वात्रिंशच्च सहस्राणि युगस्यैवांतिमस्य च कलिना तत्र संपृष्टा मर्त्याः सर्वे परस्परम्

dvātriṁśacca sahasrāṇi yugasyaivāṁtimasya ca kalinā tatra saṁpṛṣṭā martyāḥ sarve parasparam

...तथा बत्तीस हज़ार वर्ष, इस अंतिम युग का। उसमें कलि से प्रभावित होकर सभी मनुष्य परस्पर उलझ जाते हैं।

श्लोक 34 (skanda.6.272.34)

विबुधैस्ते प्रवर्तंते रागद्वेषपरायणाः यस्ययस्य गृहे वित्तं तथा नार्यो मनोरमाः

vibudhaiste pravartaṁte rāgadveṣaparāyaṇāḥ yasyayasya gṛhe vittaṁ tathā nāryo manoramāḥ

वे विद्वानों के अनुसार व्यवहार करते हुए राग-द्वेष में लीन हो जाते हैं; जिस-जिस के घर में धन तथा मनोहर स्त्रियाँ होतीं...

श्लोक 35 (skanda.6.272.35)

तेनतेन समं मैत्रीं कलौ कुर्वंति मानवाः विधवानां यतीनां च सर्वेषां च तपस्विनाम्

tenatena samaṁ maitrīṁ kalau kurvaṁti mānavāḥ vidhavānāṁ yatīnāṁ ca sarveṣāṁ ca tapasvinām

...उसी-उसी से कलियुग में मनुष्य मित्रता करते हैं। विधवाओं, यतियों तथा समस्त तपस्वियों के प्रति...

श्लोक 36 (skanda.6.272.36)

लोकद्वयविनाशः स्याद्यतश्चेतो न शुध्यति प्रावृट्कालेऽपि संप्राप्ते दुर्भिक्षेण प्रपीडिताः

lokadvayavināśaḥ syādyataśceto na śudhyati prāvṛṭkāle'pi saṁprāpte durbhikṣeṇa prapīḍitāḥ

...उपेक्षा से दोनों लोकों का नाश होता है, क्योंकि चित्त शुद्ध नहीं रहता। वर्षा ऋतु आने पर भी लोग दुर्भिक्ष से पीड़ित रहते हैं।

श्लोक 37 (skanda.6.272.37)

भ्रमंति च कलौ लोका गगनासक्तदृष्टयः जानाति चापि तनयः पिता चेन्निधनं व्रजेत्

bhramaṁti ca kalau lokā gaganāsaktadṛṣṭayaḥ jānāti cāpi tanayaḥ pitā cennidhanaṁ vrajet

कलियुग में लोग आकाश की ओर आसक्त दृष्टि से (वर्षा हेतु) भटकते रहते हैं। पुत्र भी जान लेता है कि यदि पिता की मृत्यु हो जाए...

श्लोक 38 (skanda.6.272.38)

ततोहं गृहपो भूयां बांधवो ह्यपि बांधवम् स्नुषापि वेत्ति चित्तेन यदि श्वश्रूः क्षयं व्रजेत्

tatohaṁ gṛhapo bhūyāṁ bāṁdhavo hyapi bāṁdhavam snuṣāpi vetti cittena yadi śvaśrūḥ kṣayaṁ vrajet

...तो 'मैं घर का स्वामी बन जाऊँगा' — बांधव भी बांधव के प्रति ऐसा ही सोचता है। इसी प्रकार पुत्रवधू भी मन में सोचती है कि यदि सास का नाश हो जाए...

श्लोक 39 (skanda.6.272.39)

मम स्याद्गृह ऐश्वर्यं तत्सर्वं नान्यथा व्रजेत् काव्यैरुपहता वेदाः पुत्रा जामातृकैस्तथा

mama syādgṛha aiśvaryaṁ tatsarvaṁ nānyathā vrajet kāvyairupahatā vedāḥ putrā jāmātṛkaistathā

...तो घर का ऐश्वर्य मेरा ही होगा — यह सब अन्यथा नहीं होता। वेद काव्यों से अपमानित होते हैं, पुत्र जामाताओं से...

श्लोक 40 (skanda.6.272.40)

शालकैर्बांधवाश्चैव ह्यसतीभिः कुलस्त्रियः शूद्रास्तपस्विनश्चैव शूद्रा धर्मस्य सूचकाः

śālakairbāṁdhavāścaiva hyasatībhiḥ kulastriyaḥ śūdrāstapasvinaścaiva śūdrā dharmasya sūcakāḥ

...बांधव सालों से, तथा कुलस्त्रियाँ असतियों से अपमानित होती हैं; शूद्र तपस्वी बन जाते हैं, शूद्र ही धर्म के उपदेशक बन जाते हैं।

श्लोक 41 (skanda.6.272.41)

ब्राह्मणानां ततः शूद्रा उपदेशं वदंति च अल्पोदकास्तथा मेघा अल्पसस्या च मेदिनी

brāhmaṇānāṁ tataḥ śūdrā upadeśaṁ vadaṁti ca alpodakāstathā meghā alpasasyā ca medinī

तब शूद्र ब्राह्मणों को उपदेश देने लगते हैं; मेघ अल्प जल देने वाले तथा पृथ्वी अल्प अन्न देने वाली हो जाती है।

श्लोक 42 (skanda.6.272.42)

अल्पक्षीरास्तथा गावः क्षीरे सर्पिस्तथाऽल्पकम् सर्वभक्षास्तथा विप्रा नृपा निष्करुणास्ततः कृष्या लज्जंति वैश्याश्च शूद्रा ब्राह्मणप्रेषकाः

alpakṣīrāstathā gāvaḥ kṣīre sarpistathā'lpakam sarvabhakṣāstathā viprā nṛpā niṣkaruṇāstataḥ kṛṣyā lajjaṁti vaiśyāśca śūdrā brāhmaṇapreṣakāḥ

गायें अल्प दूध देतीं, दूध में घी भी अल्प होता; ब्राह्मण सर्वभक्षी हो जाते, राजा निर्दयी हो जाते, वैश्य कृषि करने में लज्जा करते, और शूद्र ब्राह्मणों को आदेश देने वाले हो जाते हैं।

श्लोक 43 (skanda.6.272.43)

हेतुवादरता ये च भंडंविद्यापराश्च ये तेते स्युर्भूमिपालस्य सदाऽभीष्टाः कलौ युगे

hetuvādaratā ye ca bhaṁḍaṁvidyāparāśca ye tete syurbhūmipālasya sadā'bhīṣṭāḥ kalau yuge

जो लोग केवल तर्कवाद में लीन रहते हैं तथा जो ठग-विद्याओं में निपुण होते हैं, वे ही कलियुग में सदा राजा के प्रिय बन जाते हैं।

श्लोक 44 (skanda.6.272.44)

श्वःश्वःपापीयदिवसाः पृथिवी गतयौवना अतिक्रांत शुभाः कालाः पर्युपस्थितदारुणाः

śvaḥśvaḥpāpīyadivasāḥ pṛthivī gatayauvanā atikrāṁta śubhāḥ kālāḥ paryupasthitadāruṇāḥ

प्रत्येक आने वाला दिन पहले से अधिक पापी होता जाता है; पृथ्वी अपना यौवन खो देती है; शुभ काल बीत चुके होते हैं, और भयंकर काल निकट आ पहुँचते हैं।

श्लोक 45 (skanda.6.272.45)

यथायथा युगं भावि वृद्धिं यांति स्त्रियो नराः तथातथा प्रयांति स्म लघुतां जंतुभिः सह

yathāyathā yugaṁ bhāvi vṛddhiṁ yāṁti striyo narāḥ tathātathā prayāṁti sma laghutāṁ jaṁtubhiḥ saha

जैसे-जैसे युग आगे बढ़ता है, स्त्री-पुरुष संख्या में बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे सभी प्राणी काया में क्षीण होते जाते हैं।

श्लोक 46 (skanda.6.272.46)

द्वादशमे चैव कन्या स्याद्भर्तृसंयुता

dvādaśame caiva kanyā syādbhartṛsaṁyutā

बारहवें वर्ष में ही कन्या पति सहित हो जाती है।

श्लोक 47 (skanda.6.272.47)

ततः षोडशमे वर्षे नराः पलितयौवनाः शौचाचारपरित्यक्ता निजकार्यपरास्तथा

tataḥ ṣoḍaśame varṣe narāḥ palitayauvanāḥ śaucācāraparityaktā nijakāryaparāstathā

फिर सोलहवें वर्ष में ही पुरुष यौवन में भी पलित (श्वेतकेश) हो जाते हैं, शौच-आचार त्यागकर केवल अपने ही कार्यों में लगे रहते हैं।

श्लोक 48 (skanda.6.272.48)

भविष्यंति युगस्यांते नराः अंगुष्ठमात्रकाः गृहं च तेऽथ कुर्वंति बिलैराखुसमुद्भवैः

bhaviṣyaṁti yugasyāṁte narāḥ aṁguṣṭhamātrakāḥ gṛhaṁ ca te'tha kurvaṁti bilairākhusamudbhavaiḥ

युग के अंत में मनुष्य अंगूठे के बराबर मात्र रह जाएँगे, और चूहों द्वारा बनाए बिलों में अपना घर बनाएँगे।

श्लोक 49 (skanda.6.272.49)

तथा प्रावरणं तेषां कृमिवस्त्रं भविष्यति एकवर्णा भविष्यंति वर्णाः सर्वे ततः परः म्लेछीभूता दुराचारा धर्मकृत्यविदूषकाः

tathā prāvaraṇaṁ teṣāṁ kṛmivastraṁ bhaviṣyati ekavarṇā bhaviṣyaṁti varṇāḥ sarve tataḥ paraḥ mlechībhūtā durācārā dharmakṛtyavidūṣakāḥ

उनका वस्त्र कीड़ों (रेशम) का बना होगा; सभी वर्ण तब एक ही वर्ण के हो जाएँगे, म्लेच्छ बनकर दुराचारी हो जाएँगे तथा धर्म-कृत्यों को दूषित करने वाले होंगे।

श्लोक 50 (skanda.6.272.50)

एवं जाते ततो लोके ब्राह्मणो हरिपिंगलः कल्किगोत्रसमुत्पन्नस्तान्सर्वा न्सूदयेत्ततः

evaṁ jāte tato loke brāhmaṇo haripiṁgalaḥ kalkigotrasamutpannastānsarvā nsūdayettataḥ

इस प्रकार जगत् के हो जाने पर, कल्कि-गोत्र में उत्पन्न, स्वर्णिम-पिंगल वर्ण का एक ब्राह्मण तब उन सबका संहार करेगा।

श्लोक 51 (skanda.6.272.51)

पश्चात्कृतयुगं भावि भूयोऽपि द्विजसत्तमाः

paścātkṛtayugaṁ bhāvi bhūyo'pi dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो, उसके पश्चात पुनः कृतयुग आएगा।

श्लोक 52 (skanda.6.272.52)

एवं युगसहस्रेण संप्राप्तेन ततः परम् ब्रह्मणो दिवसं भावि रात्रिश्चैव ततः परम्

evaṁ yugasahasreṇa saṁprāptena tataḥ param brahmaṇo divasaṁ bhāvi rātriścaiva tataḥ param

इस प्रकार सहस्र युग बीतने पर ब्रह्मा का एक दिन होता है, तथा उसके पश्चात रात्रि होती है।

श्लोक 53 (skanda.6.272.53)

ततश्चानेन मानेन षष्ट्या युक्तैस्त्रिभिः शतैः ब्रह्मणो वत्सरं भावि केशवस्य च तद्दिनम्

tataścānena mānena ṣaṣṭyā yuktaistribhiḥ śataiḥ brahmaṇo vatsaraṁ bhāvi keśavasya ca taddinam

फिर इसी मान से तीन सौ साठ दिन-रात्रि मिलकर ब्रह्मा का एक वर्ष होता है; और वह सम्पूर्ण अवधि केशव का एक ही दिन है।

श्लोक 54 (skanda.6.272.54)

आत्मीये जीविते ब्रह्म यावद्वर्षशतं स्थितः केशवोऽपि स्वमानेन वर्षाणां जीविते शतम्

ātmīye jīvite brahma yāvadvarṣaśataṁ sthitaḥ keśavo'pi svamānena varṣāṇāṁ jīvite śatam

ब्रह्मा अपने जीवन-मान से सौ वर्ष तक स्थित रहते हैं; केशव भी अपने ही मान से सौ वर्ष तक जीवित रहते हैं।

श्लोक 55 (skanda.6.272.55)

वर्षेण वासुदेवस्य दिनं माहेश्वरं भवेत् निजमानेन सोप्यत्र याव द्वर्षशतं स्थितः

varṣeṇa vāsudevasya dinaṁ māheśvaraṁ bhavet nijamānena sopyatra yāva dvarṣaśataṁ sthitaḥ

वासुदेव के एक वर्ष से माहेश्वर का एक दिन होता है; वे भी अपने ही मान से यहाँ सौ वर्ष तक स्थित रहते हैं।

श्लोक 56 (skanda.6.272.56)

ततः शक्तिस्वरूपः स्यात्सोऽक्षयी कीर्त्यते यतः सदाशिवस्य निःश्वासः शैवं वर्षशतं भवेत् उच्छ्वासस्तु पुनस्तस्य शक्तिरूपेण संस्थितः

tataḥ śaktisvarūpaḥ syātso'kṣayī kīrtyate yataḥ sadāśivasya niḥśvāsaḥ śaivaṁ varṣaśataṁ bhavet ucchvāsastu punastasya śaktirūpeṇa saṁsthitaḥ

तत्पश्चात वे शक्ति-स्वरूप हो जाते हैं, क्योंकि वे अक्षय कहलाते हैं; सदाशिव का एक निःश्वास शिव-मान से सौ वर्ष का होता है, तथा उनका उच्छ्वास पुनः शक्ति-रूप में स्थित रहता है।

श्लोक 57 (skanda.6.272.57)

सूत उवाच एतद्वः सर्वमाख्यातं शिवशक्तिसमुद्भवम् यावदायुः प्रमाणं च मानुषाढ्यं च यद्भवेत्

sūta uvāca etadvaḥ sarvamākhyātaṁ śivaśaktisamudbhavam yāvadāyuḥ pramāṇaṁ ca mānuṣāḍhyaṁ ca yadbhavet

सूत जी ने कहा — इस प्रकार तुम्हें शिव-शक्ति से उत्पन्न यह सब बताया गया, तथा मानव-मान से लेकर जो भी दीर्घ आयु का प्रमाण है।

श्लोक 58 (skanda.6.272.58)

भवद्भिः शांकरं पृष्टो द्विजा अस्मि दिनं पुरा मया पुनस्तु सर्वेषां मर्त्यादीनां तु कीर्तितम्

bhavadbhiḥ śāṁkaraṁ pṛṣṭo dvijā asmi dinaṁ purā mayā punastu sarveṣāṁ martyādīnāṁ tu kīrtitam

हे द्विजो, तुमने पहले मुझसे शांकर-दिन के विषय में पूछा था; मैंने अब तुम्हें समस्त प्राणियों की आयु का प्रमाण भी बता दिया।

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