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नागर खण्ड · अध्याय 28

हाटकेश्वरक्षेत्रे सर्वतीर्थसमाश्रयवर्णन

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29

श्लोक 1 (skanda.6.28.1)

सूत उवाच। तस्यां देवसभायां च संस्थिता ये द्विजोत्तमाः। प्रभासादीनि तीर्थानि मूर्तानि सकलानि च

sūta uvāca| tasyāṁ devasabhāyāṁ ca saṁsthitā ye dvijottamāḥ| prabhāsādīni tīrthāni mūrtāni sakalāni ca

सूत जी ने कहा -- उस देवसभा में उपस्थित जो श्रेष्ठ ब्राह्मणरूप थे, वे प्रभास आदि सभी तीर्थ मूर्तिमान रूप में थे।

श्लोक 2 (skanda.6.28.2)

तानि श्रुत्वा वचस्तस्य देवाचार्यस्य तादृशम्। भयं कृत्वा महच्चित्ते प्रोचुश्च त्रिदिवेश्वरम्

tāni śrutvā vacastasya devācāryasya tādṛśam| bhayaṁ kṛtvā mahaccitte procuśca tridiveśvaram

देवगुरु के उस वचन (कलियुग के भय का वर्णन) को सुनकर, अपने हृदय में बड़ा भय धारण कर उन्होंने देवेंद्र से कहा --

श्लोक 3 (skanda.6.28.3)

यद्येवं देवदेवेश भविष्यत्यशुभं युगम्। वयं नाशं समेष्यामो न स्थास्यामो जगत्त्रये

yadyevaṁ devadeveśa bhaviṣyatyaśubhaṁ yugam| vayaṁ nāśaṁ sameṣyāmo na sthāsyāmo jagattraye

'हे देवदेवेश! यदि इस प्रकार अशुभ युग आने वाला है, तो हम विनाश को प्राप्त होंगे और तीनों लोकों में कहीं नहीं ठहर पाएँगे।'

श्लोक 4 (skanda.6.28.4)

पुरंदराद्य चास्माकं स्थानं किंचित्प्रदर्शय। तस्मात्कीर्तय नः स्थानं किंचित्क्वापि पुरंदर

puraṁdarādya cāsmākaṁ sthānaṁ kiṁcitpradarśaya| tasmātkīrtaya naḥ sthānaṁ kiṁcitkvāpi puraṁdara

'हे पुरंदर! आज हमें कोई स्थान दिखाइए; इसलिए हे पुरंदर! कहीं भी कोई स्थान हमें बताइए --'

श्लोक 5 (skanda.6.28.5)

यदाश्रित्य नयिष्यामो रौद्रं कलियुगं विभो। अस्पृष्टानि नरैर्म्लेच्छैः प्रभावसहितानि च। पाताले स्वर्गलोके वा मर्त्ये वा सुरसत्तम

yadāśritya nayiṣyāmo raudraṁ kaliyugaṁ vibho| aspṛṣṭāni narairmlecchaiḥ prabhāvasahitāni ca| pātāle svargaloke vā martye vā surasattama

'जिसका आश्रय लेकर हम इस भयंकर कलियुग को पार कर सकें -- हे देवश्रेष्ठ! ऐसा स्थान, चाहे पाताल में हो, स्वर्ग में हो, अथवा मृत्युलोक में, जो मनुष्यों और म्लेच्छों से अछूता हो और अपने प्रभाव सहित हो।'

श्लोक 6 (skanda.6.28.6)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा कृपाविष्टः शतक्रतुः। प्रोवाच ब्राह्मणश्रेष्ठं भूय एव बृहस्पतिम्

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā kṛpāviṣṭaḥ śatakratuḥ| provāca brāhmaṇaśreṣṭhaṁ bhūya eva bṛhaspatim

उनका यह वचन सुनकर करुणा से भरे शतक्रतु ने फिर से श्रेष्ठ ब्राह्मण बृहस्पति से कहा --

श्लोक 7 (skanda.6.28.7)

अस्पृष्टं कलिना स्थानं किंचिद्वद बृहस्पते। समाश्रयाय तीर्थानां यदि वेत्सि जगत्त्रये

aspṛṣṭaṁ kalinā sthānaṁ kiṁcidvada bṛhaspate| samāśrayāya tīrthānāṁ yadi vetsi jagattraye

'हे बृहस्पते! यदि आप तीनों लोकों में कलि से अछूता कोई स्थान जानते हों, तो तीर्थों के आश्रय के लिए वह हमें बताइए।'

श्लोक 8 (skanda.6.28.8)

शक्रस्य तद्वचः श्रुत्वा चिरं ध्यात्वा वृहस्पतिः। तत्र प्रोवाच तीर्थानि भयाद्भीतानि हर्षयन्

śakrasya tadvacaḥ śrutvā ciraṁ dhyātvā vṛhaspatiḥ| tatra provāca tīrthāni bhayādbhītāni harṣayan

शक्र का यह वचन सुनकर बृहस्पति देर तक चिंतन कर, भय से भीत उन तीर्थों को प्रसन्न करते हुए बोले --

श्लोक 9 (skanda.6.28.9)

हाटकेश्वरमित्युक्तमस्ति क्षेत्रमनुत्तमम्। लिंगस्य पतनाज्जातं देवदेवस्य शूलिनः

hāṭakeśvaramityuktamasti kṣetramanuttamam| liṁgasya patanājjātaṁ devadevasya śūlinaḥ

'हाटकेश्वर नाम का एक अनुपम क्षेत्र है, जो त्रिशूलधारी देवाधिदेव के लिंग के गिरने से उत्पन्न हुआ है।'

श्लोक 10 (skanda.6.28.10)

यत्र पूर्वं तपस्तप्तं विश्वामित्रेण धीमता। त्रिशंकोर्भूमिपालस्य कृते तीर्थे महात्मना

yatra pūrvaṁ tapastaptaṁ viśvāmitreṇa dhīmatā| triśaṁkorbhūmipālasya kṛte tīrthe mahātmanā

'जहाँ पूर्वकाल में उस महात्मा और बुद्धिमान विश्वामित्र ने राजा त्रिशंकु के लिए उस तीर्थ में तप किया था।'

श्लोक 11 (skanda.6.28.11)

यत्र स्थित्वा सभूपालस्त्रिशंकुः पापवर्जितः। चण्डालत्वं परित्यज्य सदेहस्त्रिदिवं गतः

yatra sthitvā sabhūpālastriśaṁkuḥ pāpavarjitaḥ| caṇḍālatvaṁ parityajya sadehastridivaṁ gataḥ

'जहाँ रहकर राजा त्रिशंकु पापों से मुक्त होकर, चांडाल-अवस्था त्यागकर, अपने शरीर सहित स्वर्ग को चला गया था।'

श्लोक 12 (skanda.6.28.12)

यत्र शक्रसमादेशात्पूरितं पांसुभिः पुरा। संवर्तकेन रौद्रेण वायुना तीर्थमुत्तमम्

yatra śakrasamādeśātpūritaṁ pāṁsubhiḥ purā| saṁvartakena raudreṇa vāyunā tīrthamuttamam

'जहाँ पूर्वकाल में इंद्र की आज्ञा से भयंकर संवर्तक वायु द्वारा वह उत्तम तीर्थ धूल से भर दिया गया था।'

श्लोक 13 (skanda.6.28.13)

यत्र रक्षत्यधस्ताच्च स स्वयं हाटकेश्वरः। उपरिष्टात्प्रदेशं च कलौ देवोऽचलेश्वरः

yatra rakṣatyadhastācca sa svayaṁ hāṭakeśvaraḥ| upariṣṭātpradeśaṁ ca kalau devo'caleśvaraḥ

'जहाँ कलियुग में स्वयं हाटकेश्वर नीचे के भाग की रक्षा करते हैं, और अचलेश्वर देवता ऊपर के प्रदेश की रक्षा करते हैं।'

श्लोक 14 (skanda.6.28.14)

हाटकेश्वरमाहात्म्यादस्पृष्टं कलिना हि तत्। पंचक्रोशप्रमाणेन अचलेश्वरजेन च

hāṭakeśvaramāhātmyādaspṛṣṭaṁ kalinā hi tat| paṁcakrośapramāṇena acaleśvarajena ca

'हाटकेश्वर के माहात्म्य से और अचलेश्वर के प्रभाव से पाँच क्रोश के परिमाण में वह क्षेत्र कलि से अछूता रहता है।'

श्लोक 15 (skanda.6.28.15)

तस्मास्वांशेन गच्छंतु तत्र तीर्थान्यशेषतः। तेषां कलिभयं शक्र नैव तत्रास्त्यसंशयम्

tasmāsvāṁśena gacchaṁtu tatra tīrthānyaśeṣataḥ| teṣāṁ kalibhayaṁ śakra naiva tatrāstyasaṁśayam

'इसलिए समस्त तीर्थ अपने-अपने अंश से वहाँ जाएँ; हे शक्र! वहाँ उन्हें निःसंदेह कलियुग का कोई भय नहीं होगा।'

श्लोक 16 (skanda.6.28.16)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सर्वतीर्थानि तत्क्षणात्। हाटकेश्वरसंज्ञं तत्क्षेत्रं जग्मुर्द्विजोत्तमाः

tacchrutvā vacanaṁ tasya sarvatīrthāni tatkṣaṇāt| hāṭakeśvarasaṁjñaṁ tatkṣetraṁ jagmurdvijottamāḥ

उनका यह वचन सुनकर वे सभी तीर्थ, ब्राह्मण-रूपधारी होकर, उसी क्षण हाटकेश्वर नामक उस क्षेत्र में चले गए।

श्लोक 17 (skanda.6.28.17)

यज्ञोपवीतमात्राणि कृत्वा स्थानानि चात्मनः। क्षेत्रमासादयामासुस्तत्सर्वं हि द्विजोत्तमाः

yajñopavītamātrāṇi kṛtvā sthānāni cātmanaḥ| kṣetramāsādayāmāsustatsarvaṁ hi dvijottamāḥ

वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने-अपने स्थान को यज्ञोपवीत के सूत्र मात्र जितना संकुचित कर उस समस्त क्षेत्र में समा गए।

श्लोक 18 (skanda.6.28.18)

एतस्मात्कारणाज्जातं क्षेत्रं पुण्यतमं हि तत्। हाटकेश्वरदेवस्य महापातकनाशनम्

etasmātkāraṇājjātaṁ kṣetraṁ puṇyatamaṁ hi tat| hāṭakeśvaradevasya mahāpātakanāśanam

इसी कारण वह हाटकेश्वर देवता का क्षेत्र अत्यंत पुण्यमय और महापापों का नाश करने वाला बन गया।

श्लोक 19 (skanda.6.28.19)

ऋषय ऊचुः। अत्याश्चर्यमिदं सूत यत्त्वयैतदुदाहृतम्। संगमं सर्वतीर्थानां क्षेत्रे तत्र प्रकीर्तितम्

ṛṣaya ūcuḥ| atyāścaryamidaṁ sūta yattvayaitadudāhṛtam| saṁgamaṁ sarvatīrthānāṁ kṣetre tatra prakīrtitam

ऋषियों ने कहा -- हे सूत! यह अत्यंत आश्चर्यजनक है जो आपने बताया, कि उस क्षेत्र में समस्त तीर्थों का संगम कहा गया है।

श्लोक 20 (skanda.6.28.20)

तावन्मात्रप्रभावाणि तत्स्थानि प्रभवंति किम्। तानि तीर्थानि नो ब्रूहि विस्तरेण महामते

tāvanmātraprabhāvāṇi tatsthāni prabhavaṁti kim| tāni tīrthāni no brūhi vistareṇa mahāmate

वहाँ स्थित वे तीर्थ किस-किस प्रभाव के हैं? हे महामति! उन्हें हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 21 (skanda.6.28.21)

नामतः स्थानतश्चैव तथा चैव प्रभावतः। सर्वाण्यपि महाभाग परं कौतूहलं हि नः

nāmataḥ sthānataścaiva tathā caiva prabhāvataḥ| sarvāṇyapi mahābhāga paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

हे महाभाग! उनके नाम, उनका स्थान और उनका प्रभाव -- यह सब हमें बताइए, हमें बड़ी उत्सुकता है।

श्लोक 22 (skanda.6.28.22)

सूत उवाच। तिस्रः कोट्योऽर्धकोटिश्च तीर्थानां द्विजसत्तमाः। हाटकेश्वरजं क्षेत्रं व्याप्य सर्वं व्यवस्थिताः

sūta uvāca| tisraḥ koṭyo'rdhakoṭiśca tīrthānāṁ dvijasattamāḥ| hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ vyāpya sarvaṁ vyavasthitāḥ

सूत जी ने कहा -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हाटकेश्वर क्षेत्र में सर्वत्र व्याप्त होकर स्थित हैं।

श्लोक 23 (skanda.6.28.23)

न तेषां कीर्तनं शक्यं कर्तुं वर्षशतैरपि। तथा स्वायंभुवस्यादौ कल्पस्य प्रथमस्य च

na teṣāṁ kīrtanaṁ śakyaṁ kartuṁ varṣaśatairapi| tathā svāyaṁbhuvasyādau kalpasya prathamasya ca

उन सबका वर्णन सौ वर्षों में भी नहीं किया जा सकता; स्वायंभुव नामक प्रथम कल्प के आरंभ में --

श्लोक 24 (skanda.6.28.24)

कृतः समाश्रयस्तत्र क्षेत्रे तीर्थैः शुभावहे। बहुत्वादथ कालस्य बहूनि द्विजसत्तमाः

kṛtaḥ samāśrayastatra kṣetre tīrthaiḥ śubhāvahe| bahutvādatha kālasya bahūni dvijasattamāḥ

उस शुभप्रद क्षेत्र में तीर्थों ने आश्रय ग्रहण किया था; किंतु हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! समय की अधिकता के कारण बहुत से --

श्लोक 25 (skanda.6.28.25)

उच्छेदं संप्रयातानि तीर्थान्यायतनानि च। यान्यहं वेद कार्त्स्न्येन प्रभावसहितानि च। तानि वः कीर्तयिष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिताः

ucchedaṁ saṁprayātāni tīrthānyāyatanāni ca| yānyahaṁ veda kārtsnyena prabhāvasahitāni ca| tāni vaḥ kīrtayiṣyāmi śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ

तीर्थ और देवालय नष्ट हो गए हैं; जिन्हें मैं पूरी तरह से, उनके प्रभाव सहित, जानता हूँ, उन्हें तुम्हें बताता हूँ -- ध्यानपूर्वक सुनो।

श्लोक 26 (skanda.6.28.26)

येषां संश्रवणादेव नरः पापात्प्रमुच्यते। ध्यानात्स्नानात्तथा दानात्स्पर्शनाद्विजसत्तमाः

yeṣāṁ saṁśravaṇādeva naraḥ pāpātpramucyate| dhyānātsnānāttathā dānātsparśanādvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इनके केवल सुनने मात्र से ही मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है, और इसी प्रकार ध्यान, स्नान, दान तथा स्पर्श से भी।

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