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नागर खण्ड · अध्याय 3

हरिश्चन्द्र का राज्य-लाभ

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

श्लोक 1 (skanda.6.3.1)

सूत उवाच। ततः प्रणम्य भूयः स वसिष्ठं मुनिपुंगवम्। ययौ तत्र सुतास्तस्य यत्र ते शतसंख्यकाः

sūta uvāca| tataḥ praṇamya bhūyaḥ sa vasiṣṭhaṁ munipuṁgavam| yayau tatra sutāstasya yatra te śatasaṁkhyakāḥ

सूत जी ने कहा — तब मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ को पुनः प्रणाम करके वह राजा वहाँ गया, जहाँ उनके सौ पुत्र थे।

श्लोक 2 (skanda.6.3.2)

तानपि प्राह नत्वा स तमेवार्थं नराधिपः। वसिष्ठवचनं कृत्स्नं तस्य तैरपि शंसितम्

tānapi prāha natvā sa tamevārthaṁ narādhipaḥ| vasiṣṭhavacanaṁ kṛtsnaṁ tasya tairapi śaṁsitam

राजा ने उन्हें भी प्रणाम कर उसी विषय में निवेदन किया, और उन्होंने भी वसिष्ठ जी का समस्त वचन उसे सुना दिया।

श्लोक 3 (skanda.6.3.3)

ततस्तान्स पुनः प्राह युष्माकं जनकोऽधुना। अशक्तो मा दिवं नेतुं सशरीरं विसर्जितः

tatastānsa punaḥ prāha yuṣmākaṁ janako'dhunā| aśakto mā divaṁ netuṁ saśarīraṁ visarjitaḥ

तब उसने उनसे पुनः कहा — तुम्हारे पिता ने अभी मुझे इसी शरीर सहित स्वर्ग ले जाने में असमर्थ बताकर विदा कर दिया है।

श्लोक 4 (skanda.6.3.4)

तस्माद्यदि न मां यूयं याजयिष्यथ सांप्रतम्। परित्यज्य करिष्यामि शीघ्रमन्यं पुरोहितम्

tasmādyadi na māṁ yūyaṁ yājayiṣyatha sāṁpratam| parityajya kariṣyāmi śīghramanyaṁ purohitam

अतः यदि अब तुम मुझसे यजन नहीं कराओगे, तो मैं तुम्हें त्यागकर शीघ्र ही किसी अन्य को पुरोहित बना लूँगा —

श्लोक 5 (skanda.6.3.5)

यो मां यज्ञप्रभावेन नयिष्यति सुरालयम्। अनेनैव शरीरेण सहितं गुरुपुत्रकाः

yo māṁ yajñaprabhāvena nayiṣyati surālayam| anenaiva śarīreṇa sahitaṁ guruputrakāḥ

— हे गुरुपुत्रो! जो यज्ञ के प्रभाव से इसी शरीर सहित मुझे देवलोक ले जाए।

श्लोक 6 (skanda.6.3.6)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सर्वे ते मुनिसत्तमाः। परं कोपं समाविष्टास्तमूचुः परुषाक्षरैः

tasya tadvacanaṁ śrutvā sarve te munisattamāḥ| paraṁ kopaṁ samāviṣṭāstamūcuḥ paruṣākṣaraiḥ

उसका यह वचन सुनकर वे सभी श्रेष्ठ मुनि अत्यंत क्रोध से भर गए और उससे कठोर वचन बोले।

श्लोक 7 (skanda.6.3.7)

यस्मात्त्वया गुरुस्त्यक्तो हितकृत्पापवानसि। तस्माद्भवाधुना पाप चंडालो लोकनिंदितः

yasmāttvayā gurustyakto hitakṛtpāpavānasi| tasmādbhavādhunā pāpa caṁḍālo lokaniṁditaḥ

हे पापी! चूँकि तूने हितकारी गुरु का त्याग किया है, अतः अब तू लोकनिंदित चंडाल हो जा!

श्लोक 8 (skanda.6.3.8)

अथ तद्वचनांते स तत्क्षणात्पृथिवीपतिः। बभूवांत्यजरूपाढ्यो विकृताकारदेहभृत्

atha tadvacanāṁte sa tatkṣaṇātpṛthivīpatiḥ| babhūvāṁtyajarūpāḍhyo vikṛtākāradehabhṛt

उस वचन के समाप्त होते ही वह राजा उसी क्षण अन्त्यज रूप को प्राप्त होकर विकृत आकार वाला शरीर धारण करने लगा।

श्लोक 9 (skanda.6.3.9)

यवमध्यः कृशग्रीवः पिंगाक्षो भुग्ननासिकः। कृष्णांगः शंकुवर्णश्च दुर्गंधेन समावृतः

yavamadhyaḥ kṛśagrīvaḥ piṁgākṣo bhugnanāsikaḥ| kṛṣṇāṁgaḥ śaṁkuvarṇaśca durgaṁdhena samāvṛtaḥ

वह जौ के समान मध्य भाग वाला, दुबली गर्दन वाला, पिंगल नेत्रों वाला, टेढ़ी नाक वाला, काले अंगों वाला, स्तम्भ के समान वर्ण वाला और दुर्गंध से घिरा हुआ हो गया।

श्लोक 10 (skanda.6.3.10)

अथात्मानं समालोक्य विकृतं स नराधिपः। चण्डालधर्मिणं सद्यो लज्जयाऽधोमुखः स्थितः

athātmānaṁ samālokya vikṛtaṁ sa narādhipaḥ| caṇḍāladharmiṇaṁ sadyo lajjayā'dhomukhaḥ sthitaḥ

अपने आपको इस प्रकार विकृत और तत्क्षण चंडाल-स्वभाव वाला देखकर राजा लज्जा से नीचा मुख किए खड़ा रहा।

श्लोक 11 (skanda.6.3.11)

याहियाहीति विप्रैस्तैर्भर्त्स्यमानो मुहुर्मुहुः। सर्वतः सारमेयैश्च क्लिश्यमानो निरर्गलैः। काककोकिलसंकाशो जीर्णवस्त्रावगुंठितः

yāhiyāhīti vipraistairbhartsyamāno muhurmuhuḥ| sarvataḥ sārameyaiśca kliśyamāno nirargalaiḥ| kākakokilasaṁkāśo jīrṇavastrāvaguṁṭhitaḥ

उन ब्राह्मणों द्वारा बार-बार "जा, जा" कहकर धिक्कारा जाता, चारों ओर से उन्मुक्त कुत्तों द्वारा सताया जाता, कौवे के समान वर्ण वाला और जीर्ण वस्त्र से लिपटा हुआ —

श्लोक 12 (skanda.6.3.12)

ततः स चिन्तयामास दुःखेन महता वृतः। किं करोमि क्व गच्छामि कथं शांतिर्भविष्यति

tataḥ sa cintayāmāsa duḥkhena mahatā vṛtaḥ| kiṁ karomi kva gacchāmi kathaṁ śāṁtirbhaviṣyati

— वह अत्यंत दुःख से घिरकर सोचने लगा — मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कैसे मुझे शांति मिलेगी?

श्लोक 13 (skanda.6.3.13)

किं मयैतत्सुमूर्खेण वांछितं दुर्लभं पदम्। तत्प्रभावेन विभ्रष्टः कुलधर्मोऽपि मे स्वकः

kiṁ mayaitatsumūrkheṇa vāṁchitaṁ durlabhaṁ padam| tatprabhāvena vibhraṣṭaḥ kuladharmo'pi me svakaḥ

मैं कैसा मूर्ख था कि मैंने इस दुर्लभ पद की कामना की! उसी के प्रभाव से मेरा अपना कुलधर्म भी नष्ट हो गया।

श्लोक 14 (skanda.6.3.14)

किं जलं प्रविशाम्यद्य किं वा दीप्तं हुताशनम्। भक्षयामि विषं किं वा कथं स्यान्मृत्युरद्य मे

kiṁ jalaṁ praviśāmyadya kiṁ vā dīptaṁ hutāśanam| bhakṣayāmi viṣaṁ kiṁ vā kathaṁ syānmṛtyuradya me

क्या मैं आज जल में प्रवेश करूँ, या प्रज्वलित अग्नि में? या विष खा लूँ? आज मुझे किस प्रकार मृत्यु प्राप्त हो?

श्लोक 15 (skanda.6.3.15)

अनेन वपुषा दारान्वीक्षयिष्यामि तान्कथम्। तादृशेन शरीरेण याभिः संक्रीडितं मया

anena vapuṣā dārānvīkṣayiṣyāmi tānkatham| tādṛśena śarīreṇa yābhiḥ saṁkrīḍitaṁ mayā

इस शरीर से मैं उन पत्नियों को कैसे मुख दिखाऊँगा, जिनके साथ मैंने पहले वैसे ही (सुंदर) शरीर से क्रीड़ा की थी?

श्लोक 16 (skanda.6.3.16)

कथं पुत्रांस्तथा पौत्रान्सुहृत्संबंधिबांधवान्। वीक्षयिष्यामि तान्भूयस्तथान्यं सेवकं जनम्

kathaṁ putrāṁstathā pautrānsuhṛtsaṁbaṁdhibāṁdhavān| vīkṣayiṣyāmi tānbhūyastathānyaṁ sevakaṁ janam

मैं अपने पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, संबंधियों और बांधवों को, तथा अन्य सेवकजनों को पुनः कैसे मुख दिखाऊँगा?

श्लोक 17 (skanda.6.3.17)

ये मया निर्जिताः सर्वे रिपवः संगरे पुरा। तेऽद्य मामीदृशं श्रुत्वा हर्षं यास्यंति निर्भयाः

ye mayā nirjitāḥ sarve ripavaḥ saṁgare purā| te'dya māmīdṛśaṁ śrutvā harṣaṁ yāsyaṁti nirbhayāḥ

जिन शत्रुओं को मैंने पूर्वकाल में युद्ध में जीता था, वे आज मेरी यह दशा सुनकर निर्भय होकर हर्षित होंगे।

श्लोक 18 (skanda.6.3.18)

ये मया तर्पिता दानैर्ब्राह्मणा वेदपारगाः। तेऽद्य मामीदृशं श्रुत्वा संभविष्यंति दुःखिताः

ye mayā tarpitā dānairbrāhmaṇā vedapāragāḥ| te'dya māmīdṛśaṁ śrutvā saṁbhaviṣyaṁti duḥkhitāḥ

वेदपारंगत जिन ब्राह्मणों को मैंने दान से तृप्त किया था, वे आज मेरी यह दशा सुनकर दुःखी होंगे।

श्लोक 19 (skanda.6.3.19)

तथा ये सुहृदोऽभीष्टा नित्यं मम हिते रताः। कामवस्थां प्रयास्यन्ति दृष्ट्वा मां स्थितमीदृशम्

tathā ye suhṛdo'bhīṣṭā nityaṁ mama hite ratāḥ| kāmavasthāṁ prayāsyanti dṛṣṭvā māṁ sthitamīdṛśam

तथा जो प्रिय मित्र सदा मेरे हित में लगे रहते थे, वे मुझे इस दशा में देखकर विषाद को प्राप्त होंगे।

श्लोक 20 (skanda.6.3.20)

भद्रजात्या गजा ये मे मदान्धाः षष्टिहायनाः। मया विना मिथो युद्धे कस्तानद्य नियोक्ष्यति

bhadrajātyā gajā ye me madāndhāḥ ṣaṣṭihāyanāḥ| mayā vinā mitho yuddhe kastānadya niyokṣyati

मेरे साठ वर्ष के, मदांध, उत्तम जाति के जो हाथी हैं, उन्हें मेरे बिना आज परस्पर युद्ध में कौन लगाएगा?

श्लोक 21 (skanda.6.3.21)

अश्वास्तित्तिरकल्माषाः सुदांताः सादिभिर्दृढैः। कस्तांश्चित्रपदन्यासैर्नियाम्यति मया विना

aśvāstittirakalmāṣāḥ sudāṁtāḥ sādibhirdṛḍhaiḥ| kastāṁścitrapadanyāsairniyāmyati mayā vinā

तीतर के समान चितकबरे, सुशिक्षित, दृढ़ सवारों वाले मेरे अश्वों को, विविध पद-चालों में मेरे बिना कौन संचालित करेगा?

श्लोक 22 (skanda.6.3.22)

तथा मे भृत्यवर्गास्ते कुलीना युद्धदुर्मदाः। मां विना कस्य यास्यंति समीपेऽद्य सुदुःखिताः

tathā me bhṛtyavargāste kulīnā yuddhadurmadāḥ| māṁ vinā kasya yāsyaṁti samīpe'dya suduḥkhitāḥ

मेरे कुलीन, युद्ध में उन्मत्त वे सेवकगण, मेरे बिना आज अत्यंत दुःखी होकर किसके समीप जाएँगे?

श्लोक 23 (skanda.6.3.23)

संख्याहीनस्तथा कोशस्तादृङ्मे बहुरत्नभाक्। कस्य यास्यति संभोगं मया हीनस्तु रक्षितः

saṁkhyāhīnastathā kośastādṛṅme bahuratnabhāk| kasya yāsyati saṁbhogaṁ mayā hīnastu rakṣitaḥ

गणना से परे, अनेक रत्नों से भरा जो मेरा कोश मेरे द्वारा ही रक्षित था, वह मेरे बिना अब किसके भोग में जाएगा?

श्लोक 24 (skanda.6.3.24)

तथा मे संख्यया हीनं धान्यं गोजाविकं महत्। भविष्यति कथं हीनं मयाभीष्टैस्तु रक्षितम्

tathā me saṁkhyayā hīnaṁ dhānyaṁ gojāvikaṁ mahat| bhaviṣyati kathaṁ hīnaṁ mayābhīṣṭaistu rakṣitam

गणनातीत मेरा विशाल धान्य, गौ, बकरी और भेड़ें, जिन्हें मैंने प्रेमपूर्वक रक्षित किया था, मेरे बिना उनका क्या होगा?

श्लोक 25 (skanda.6.3.25)

एवं बहुविधं राजा स विलप्य च दुःखितः। जगाम नगराभ्याशं पद्भ्यामेव शनैःशनैः

evaṁ bahuvidhaṁ rājā sa vilapya ca duḥkhitaḥ| jagāma nagarābhyāśaṁ padbhyāmeva śanaiḥśanaiḥ

इस प्रकार बहुत विधि से विलाप करता हुआ, दुःखी राजा पैदल ही धीरे-धीरे नगर के समीप चला गया।

श्लोक 26 (skanda.6.3.26)

ततो रात्रौ समासाद्य स्वं पुरं जनवर्जितम्। द्वारे स्थित्वा समाहूय पुत्रं मंत्रिभिरन्वितम्

tato rātrau samāsādya svaṁ puraṁ janavarjitam| dvāre sthitvā samāhūya putraṁ maṁtribhiranvitam

फिर रात्रि में अपने नगर को जनरहित पाकर, द्वार पर खड़े होकर उसने अपने पुत्र को मंत्रियों सहित बुलाया।

श्लोक 27 (skanda.6.3.27)

कथयामास वृत्तांतं सर्वं शापसमुद्भवम्। दूरे स्थितः स पुत्राणां वसिष्ठस्य महात्मनः

kathayāmāsa vṛttāṁtaṁ sarvaṁ śāpasamudbhavam| dūre sthitaḥ sa putrāṇāṁ vasiṣṭhasya mahātmanaḥ

दूर खड़े होकर उसने महात्मा वसिष्ठ के पुत्रों के शाप से उत्पन्न समस्त वृत्तांत कह सुनाया।

श्लोक 28 (skanda.6.3.28)

वज्रपातोपमं वाक्यं तेऽपि तस्य निशम्य तत्। बाष्पपर्याकुलैरास्यै रुरुदुः शोकसंयुताः

vajrapātopamaṁ vākyaṁ te'pi tasya niśamya tat| bāṣpaparyākulairāsyai ruruduḥ śokasaṁyutāḥ

वज्रपात के समान उसका वह वचन सुनकर वे भी शोकयुक्त होकर, अश्रुओं से व्याकुल मुख से रोने लगे।

श्लोक 29 (skanda.6.3.29)

हा नाथ हा महाराज हा नित्यं धर्मवत्सल। त्वया हीना भविष्यामः कथमद्य सुदुःखिताः

hā nātha hā mahārāja hā nityaṁ dharmavatsala| tvayā hīnā bhaviṣyāmaḥ kathamadya suduḥkhitāḥ

हा नाथ! हा महाराज! हा सदा धर्मवत्सल! आपसे रहित होकर हम आज अत्यंत दुःखी होकर कैसे रहेंगे?

श्लोक 30 (skanda.6.3.30)

किमेतद्युज्यते तेषां वासिष्ठानां दुरात्मनाम्। शापं ददुः स्वयाज्यस्य विशेषाद्विनतस्य च

kimetadyujyate teṣāṁ vāsiṣṭhānāṁ durātmanām| śāpaṁ daduḥ svayājyasya viśeṣādvinatasya ca

वसिष्ठ के उन दुरात्मा पुत्रों को यह कैसे शोभा देता है, जिन्होंने अपने ही यजमान को, वह भी विशेष रूप से विनम्र होकर झुके हुए को, शाप दिया?

श्लोक 31 (skanda.6.3.31)

ते वयं राजशार्दूल परित्यज्य गृहादिकम्। अन्त्यजत्वं गमिष्यामस्त्वया सार्धमसंशयम्

te vayaṁ rājaśārdūla parityajya gṛhādikam| antyajatvaṁ gamiṣyāmastvayā sārdhamasaṁśayam

हे राजशार्दूल! हम भी घर आदि सब कुछ त्यागकर निःसंदेह आपके साथ ही अन्त्यजत्व को प्राप्त होंगे।

श्लोक 32 (skanda.6.3.32)

त्रिशंकुरुवाच। भक्तिश्चेदस्ति युष्माकं ममोपरि निरर्गल। तन्मे पुत्रस्य मंत्रित्वं सर्वे कुरुत सांप्रतम्

triśaṁkuruvāca| bhaktiścedasti yuṣmākaṁ mamopari nirargala| tanme putrasya maṁtritvaṁ sarve kuruta sāṁpratam

त्रिशंकु ने कहा — यदि मुझ पर तुम्हारी सीमारहित भक्ति है, तो अब तुम सब मेरे पुत्र के मंत्री बन जाओ।

श्लोक 33 (skanda.6.3.33)

हरिश्चंद्रः सुपुत्रोयं मम ज्येष्ठः सुवल्लभः। नियोजयध्वमव्यग्राः पदव्यां मम सत्वरम्

hariścaṁdraḥ suputroyaṁ mama jyeṣṭhaḥ suvallabhaḥ| niyojayadhvamavyagrāḥ padavyāṁ mama satvaram

यह हरिश्चन्द्र मेरा सुपुत्र, ज्येष्ठ और अत्यंत प्रिय है — व्याकुल हुए बिना इसे शीघ्र मेरे पद पर नियुक्त कर दो।

श्लोक 34 (skanda.6.3.34)

अहं पुनः करिष्यामि यन्मे मनसि संस्थितम्। मृत्युं वा संप्रयास्यामि सदेहो वा सुरालयम्

ahaṁ punaḥ kariṣyāmi yanme manasi saṁsthitam| mṛtyuṁ vā saṁprayāsyāmi sadeho vā surālayam

मैं तो वही करूँगा जो मेरे मन में निश्चित है — या तो मृत्यु को प्राप्त होऊँगा, या इसी शरीर सहित देवलोक को जाऊँगा।

श्लोक 35 (skanda.6.3.35)

एवमुक्त्वा परित्यज्य सर्वांस्तान्स महीपतिः। जगामारण्यमाश्रित्य पद्भ्यामेव शनैः शनैः

evamuktvā parityajya sarvāṁstānsa mahīpatiḥ| jagāmāraṇyamāśritya padbhyāmeva śanaiḥ śanaiḥ

ऐसा कहकर वह राजा उन सबको छोड़कर, वन का आश्रय लेकर, पैदल ही धीरे-धीरे चला गया।

श्लोक 36 (skanda.6.3.36)

तेपि सन्मंत्रिणस्तूर्णं पुत्रं तस्य सुसम्मतम्। राज्ये नियोजयासमासुर्नादवादित्रनिःस्वनैः

tepi sanmaṁtriṇastūrṇaṁ putraṁ tasya susammatam| rājye niyojayāsamāsurnādavāditraniḥsvanaiḥ

उन सज्जन मंत्रियों ने भी शीघ्र ही उसके सुसम्मत पुत्र को वाद्यों और नादों की गूँज के साथ राज्य पर नियुक्त कर दिया।

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