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नागर खण्ड · अध्याय 31

नागह्रद माहात्म्य वर्णन

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

श्लोक 1 (skanda.6.31.1)

तथान्यदपि तत्रास्ति नागतीर्थमनुत्तमम् । यत्र स्नातस्य सर्पाणां न भयं जायते क्वचित्

tathānyadapi tatrāsti nāgatīrthamanuttamam | yatra snātasya sarpāṇāṁ na bhayaṁ jāyate kvacit

सूत जी ने कहा -- वहाँ एक और अत्यंत उत्तम नागतीर्थ है, जहाँ स्नान करने वाले को कभी भी सर्पों से भय नहीं होता।

श्लोक 2 (skanda.6.31.2)

तत्र श्रावणपञ्चम्यां यो नरः स्नानमाचरेत् । कृष्णायां न भयं तस्य कुलेऽपि स्यादहेः क्वचित्

tatra śrāvaṇapañcamyāṁ yo naraḥ snānamācaret | kṛṣṇāyāṁ na bhayaṁ tasya kule'pi syādaheḥ kvacit

जो मनुष्य वहाँ श्रावण मास की कृष्णपक्ष पंचमी को स्नान करता है, उसके कुल में भी कभी सर्प का भय नहीं होता।

श्लोक 3 (skanda.6.31.3)

तत्र पूर्वं तपस्तप्तं मातुः शापप्रपीडितैः । शेष प्रभृतिनागैस्तु मुक्तिहेतोर्हुताशनात्

tatra pūrvaṁ tapastaptaṁ mātuḥ śāpaprapīḍitaiḥ | śeṣa prabhṛtināgaistu muktihetorhutāśanāt

पहले वहाँ माता के शाप से पीड़ित शेष आदि नागों ने अग्नि से मुक्ति पाने के लिए घोर तप किया था।

श्लोक 4 (skanda.6.31.4)

कम्बलाश्वतरौ नागौ तथा ख्यातौ धरातले । तत्र तप्त्वा तपस्तीव्रं संसिद्धिं परमां गतौ

kambalāśvatarau nāgau tathā khyātau dharātale | tatra taptvā tapastīvraṁ saṁsiddhiṁ paramāṁ gatau

पृथ्वी पर विख्यात कम्बल और अश्वतर नामक दोनों नाग भी वहाँ तीव्र तप करके परम सिद्धि को प्राप्त हुए।

श्लोक 5 (skanda.6.31.5)

अनंतो वासुकिश्चैव तक्षकश्च महावलः । कर्कोटश्चैव नागेन्द्रो मणिकण्ठस्तथापरः

anaṁto vāsukiścaiva takṣakaśca mahāvalaḥ | karkoṭaścaiva nāgendro maṇikaṇṭhastathāparaḥ

अनन्त, वासुकि, महाबली तक्षक, नागराज कर्कोट तथा दूसरा मणिकण्ठ --

श्लोक 6 (skanda.6.31.6)

ऐरावतस्तथा शंखः पुण्डरीको महाविषः । शेषपूर्वाः स्मृता नागा एतेऽत्र नव नायकाः

airāvatastathā śaṁkhaḥ puṇḍarīko mahāviṣaḥ | śeṣapūrvāḥ smṛtā nāgā ete'tra nava nāyakāḥ

ऐरावत, शंख और महाविषधारी पुण्डरीक -- शेष से आरम्भ होने वाले ये नौ नाग यहाँ प्रधान नायक कहे गए हैं।

श्लोक 7 (skanda.6.31.7)

एतेषां पुत्रपौत्राश्च तेषामपि विभूतिभिः । असंख्याभिरिदं व्याप्तं समस्तं धरणीतलम्

eteṣāṁ putrapautrāśca teṣāmapi vibhūtibhiḥ | asaṁkhyābhiridaṁ vyāptaṁ samastaṁ dharaṇītalam

इनके पुत्र-पौत्र और उनकी भी असंख्य संतानों से यह सम्पूर्ण पृथ्वीतल व्याप्त है।

श्लोक 8 (skanda.6.31.8)

अथ ते कुटिला दुष्टा भक्षयंति सदा जनान् । बहुत्वादपि संस्पर्शादपराधं विनापि च

atha te kuṭilā duṣṭā bhakṣayaṁti sadā janān | bahutvādapi saṁsparśādaparādhaṁ vināpi ca

वे कुटिल और दुष्ट सर्प अपनी अधिकता के कारण, स्पर्शमात्र से भी, बिना किसी अपराध के सदा लोगों को खा जाते थे।

श्लोक 9 (skanda.6.31.9)

ततः प्रजा इमाः सर्वा ब्रह्माणं शरणं गताः । पीडिताः स्म सुरश्रेष्ठ सर्पेभ्यो रक्ष सत्वरम्

tataḥ prajā imāḥ sarvā brahmāṇaṁ śaraṇaṁ gatāḥ | pīḍitāḥ sma suraśreṣṭha sarpebhyo rakṣa satvaram

तब ये सारी प्रजाएँ ब्रह्मा जी की शरण में गईं और बोलीं -- हे देवश्रेष्ठ! हम सर्पों से पीड़ित हैं, शीघ्र हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 10 (skanda.6.31.10)

यावन्न शून्यतां याति सकलं वसुधातलम् । व्याप्तं सर्वैस्ततः सर्पैर्विषाढ्यैरतिभीषणैः

yāvanna śūnyatāṁ yāti sakalaṁ vasudhātalam | vyāptaṁ sarvaistataḥ sarpairviṣāḍhyairatibhīṣaṇaiḥ

इससे पहले कि विषधारी और अत्यंत भयंकर उन सब सर्पों से व्याप्त होकर यह सम्पूर्ण पृथ्वीतल जनशून्य हो जाए, हमारी रक्षा कीजिए।

श्लोक 11 (skanda.6.31.11)

अथ तानब्रवीद्ब्रह्मा शेषाद्यान्नवनायकान् । स्वसंततेः प्ररक्षध्वं भक्ष्यमाणा इमाः प्रजाः

atha tānabravīdbrahmā śeṣādyānnavanāyakān | svasaṁtateḥ prarakṣadhvaṁ bhakṣyamāṇā imāḥ prajāḥ

तब ब्रह्मा जी ने शेष आदि उन नौ नायकों से कहा -- अपनी ही संतान द्वारा खाई जा रही इन प्रजाओं की तुम रक्षा करो।

श्लोक 12 (skanda.6.31.12)

ते तथेति प्रतिज्ञाय जग्मुः सर्वे भुजंगमाः

te tatheti pratijñāya jagmuḥ sarve bhujaṁgamāḥ

"ऐसा ही होगा" कहकर वे सभी सर्प वहाँ से चले गए।

श्लोक 13 (skanda.6.31.13)

अथ तेषां बहुत्वाच्च नैव रक्षा प्रजायते । वारिता अपि ते यस्मात्प्रकुर्वंति प्रजाक्षयम्

atha teṣāṁ bahutvācca naiva rakṣā prajāyate | vāritā api te yasmātprakurvaṁti prajākṣayam

किन्तु सर्पों की अधिकता के कारण वह रक्षा सम्भव न हो सकी, क्योंकि मना करने पर भी वे प्रजा का नाश करते ही रहे।

श्लोक 14 (skanda.6.31.14)

ततः कोपपरीतात्मा तानाहूय कुलाधिपान् । तानुवाच स्वयं ब्रह्मा सर्वदेवसमागमे

tataḥ kopaparītātmā tānāhūya kulādhipān | tānuvāca svayaṁ brahmā sarvadevasamāgame

तब क्रोध से भर उठे ब्रह्मा जी ने उन कुलाधिपतियों को बुलाकर, सम्पूर्ण देवताओं की सभा में स्वयं उनसे यह कहा --

श्लोक 15 (skanda.6.31.15)

भक्षयंति यतः सर्पा अपराधं विना प्रजाः । वारिता अपि ते तस्मात्तान्निगृह्णामि सांप्रतम्

bhakṣayaṁti yataḥ sarpā aparādhaṁ vinā prajāḥ | vāritā api te tasmāttānnigṛhṇāmi sāṁpratam

चूँकि सर्प बिना अपराध के ही प्रजाओं को खा रहे हैं और मना करने पर भी नहीं मान रहे, इसलिए मैं अभी उन्हें दंड दूँगा।

श्लोक 16 (skanda.6.31.16)

भविष्यति महीपालो भूतले जनमेजयः । चित्रभानुर्मखे तस्य सर्पान्संभक्षयिष्यति

bhaviṣyati mahīpālo bhūtale janamejayaḥ | citrabhānurmakhe tasya sarpānsaṁbhakṣayiṣyati

भूतल पर जनमेजय नामक एक राजा होगा, जिसके यज्ञ में अग्नि सब सर्पों को भस्म कर देगी।

श्लोक 17 (skanda.6.31.17)

मातुः शापाद्विशेषेण मंत्राकृष्टा द्विजोत्तमैः । स्वयमेव पतिष्यंति सुसमिद्धे हुताशने

mātuḥ śāpādviśeṣeṇa maṁtrākṛṣṭā dvijottamaiḥ | svayameva patiṣyaṁti susamiddhe hutāśane

अपनी माता के शाप के कारण विशेष रूप से, श्रेष्ठ ब्राह्मणों के मंत्रों से खिंचकर, वे स्वयं ही प्रज्वलित अग्नि में गिर पड़ेंगे।

श्लोक 18 (skanda.6.31.18)

तच्छ्रुत्वा वेपमानास्ते सर्पाणां नवनायकाः । प्रोचुः प्रांजलयः सद्यः प्रणिपत्य पितामहम्

tacchrutvā vepamānāste sarpāṇāṁ navanāyakāḥ | procuḥ prāṁjalayaḥ sadyaḥ praṇipatya pitāmaham

यह सुनकर काँपते हुए वे नौ नाग-नायक हाथ जोड़कर, पितामह को प्रणाम करके तुरंत बोले --

श्लोक 19 (skanda.6.31.19)

भगवन्कुटिला ज्ञातिरस्माकं भवता कृता । तत्कस्मात्कुरुषे कोपं जातिधर्मानुवर्तिनाम्

bhagavankuṭilā jñātirasmākaṁ bhavatā kṛtā | tatkasmātkuruṣe kopaṁ jātidharmānuvartinām

हे भगवन्! हमारी यह कुटिल जाति आपने ही रची है; फिर अपने ही जाति-धर्म का पालन करने वालों पर आप क्रोध क्यों करते हैं?

श्लोक 20 (skanda.6.31.20)

ब्रह्मा उवाच । यदि नाम मया सृष्टा यूयं दिष्ट्या विषोल्बणाः । अपराधं विना कस्माद्भक्षयध्व इमाः प्रजाः

brahmā uvāca | yadi nāma mayā sṛṣṭā yūyaṁ diṣṭyā viṣolbaṇāḥ | aparādhaṁ vinā kasmādbhakṣayadhva imāḥ prajāḥ

ब्रह्मा जी ने कहा -- यदि मैंने ही सौभाग्य से तुम्हें विषैला बनाकर रचा है, तो भी तुम बिना अपराध के इन प्रजाओं को क्यों खा जाते हो?

श्लोक 21 (skanda.6.31.21)

नागाः उवाच । मर्यादां कुरु देवेश अस्माकं मानवैः सह । अथवा संप्रयच्छस्व स्थानं मानुषवर्जितम्

nāgāḥ uvāca | maryādāṁ kuru deveśa asmākaṁ mānavaiḥ saha | athavā saṁprayacchasva sthānaṁ mānuṣavarjitam

नागों ने कहा -- हे देवेश! मनुष्यों के साथ हमारे लिए कोई मर्यादा नियत कर दीजिए, अथवा हमें मनुष्यविहीन कोई स्थान दे दीजिए।

श्लोक 22 (skanda.6.31.22)

पारिक्षितमखे तस्मिन्सर्पाणां चित्रभानुना । समंताद्दह्यमानानां रक्षोपायं प्रचिंतय

pārikṣitamakhe tasminsarpāṇāṁ citrabhānunā | samaṁtāddahyamānānāṁ rakṣopāyaṁ praciṁtaya

परीक्षित-पुत्र के उस यज्ञ में अग्नि द्वारा चारों ओर से जलाए जा रहे सर्पों की रक्षा का भी कोई उपाय सोचिए।

श्लोक 23 (skanda.6.31.23)

यथा न संततिच्छेदो जायते प्रपितामह । अस्माकं सर्वलोकेषु तथा त्वं कर्तुमर्हसि

yathā na saṁtaticchedo jāyate prapitāmaha | asmākaṁ sarvalokeṣu tathā tvaṁ kartumarhasi

हे प्रपितामह! ऐसा कीजिए कि सभी लोकों में हमारी संतति का उच्छेद न हो।

श्लोक 24 (skanda.6.31.24)

ब्रह्मा उवाच । जरत्कारुरिति ख्यातो भविष्यति क्वचिद्द्विजः । स संतानकृते भार्यां भूमावन्वेषयिष्यति

brahmā uvāca | jaratkāruriti khyāto bhaviṣyati kvaciddvijaḥ | sa saṁtānakṛte bhāryāṁ bhūmāvanveṣayiṣyati

ब्रह्मा जी ने कहा -- कहीं जरत्कारु नाम का एक ब्राह्मण होगा, वह संतानोत्पत्ति के लिए पृथ्वी पर पत्नी की खोज करेगा।

श्लोक 25 (skanda.6.31.25)

भाविनी च भवद्वंशे जरत्कन्या सुशोभना । सा देया चादरात्तस्मै पुत्रार्थं वरवर्णिनी

bhāvinī ca bhavadvaṁśe jaratkanyā suśobhanā | sā deyā cādarāttasmai putrārthaṁ varavarṇinī

तुम्हारे ही वंश में जरत्कारु नाम की एक सुंदर कन्या होगी; उस श्रेष्ठवर्णा कन्या को पुत्रप्राप्ति के हेतु आदरपूर्वक उसे दे देना।

श्लोक 26 (skanda.6.31.26)

ताभ्यां यो भविता पुत्रः स शेषान्रक्षयिष्यति । सर्पाञ्छुद्धसमाचारान्मर्यादासु व्यवस्थितान्

tābhyāṁ yo bhavitā putraḥ sa śeṣānrakṣayiṣyati | sarpāñchuddhasamācārānmaryādāsu vyavasthitān

उन दोनों से जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह शुद्ध आचरण वाले तथा मर्यादा में स्थित सर्पों -- शेष आदि की रक्षा करेगा।

श्लोक 27 (skanda.6.31.27)

सुतलं नितलं चैव तथैव वितलं च यत् । तस्याधस्ताच्चतुर्थे च वसतिर्वो धरातले

sutalaṁ nitalaṁ caiva tathaiva vitalaṁ ca yat | tasyādhastāccaturthe ca vasatirvo dharātale

सुतल, नितल तथा वितल -- इनके नीचे चौथे लोक में पृथ्वीतल पर तुम्हारा निवास होगा।

श्लोक 28 (skanda.6.31.28)

मया दत्तेऽतिरम्ये च सर्वभोगसमन्विते । तस्माद्व्रजत तत्रैव परित्यज्य महीतलम्

mayā datte'tiramye ca sarvabhogasamanvite | tasmādvrajata tatraiva parityajya mahītalam

मेरे द्वारा दिए गए इस अत्यंत रमणीय और समस्त भोगों से युक्त स्थान में तुम इस पृथ्वीतल को छोड़कर चले जाओ।

श्लोक 29 (skanda.6.31.29)

तत्र भुंजथ सद्भोगान् गत्वाशु मम शासनात् । पुत्रपौत्रसमोपेतांस्त्रिदशैरपि दुर्लभान्

tatra bhuṁjatha sadbhogān gatvāśu mama śāsanāt | putrapautrasamopetāṁstridaśairapi durlabhān

मेरी आज्ञा से शीघ्र वहाँ जाकर, पुत्र-पौत्रों के साथ, देवताओं को भी दुर्लभ ऐसे उत्तम भोगों को भोगो।

श्लोक 30 (skanda.6.31.30)

नागाः उवाच । भोगानपि प्रभुंजाना न वयं तत्र पद्मज । शक्नुमो वस्तुमुर्व्यां नस्तस्मात्स्थानं प्रदर्शय

nāgāḥ uvāca | bhogānapi prabhuṁjānā na vayaṁ tatra padmaja | śaknumo vastumurvyāṁ nastasmātsthānaṁ pradarśaya

नागों ने कहा -- हे पद्मज! वहाँ भोगों को भोगते हुए भी हम पृथ्वी को त्यागकर नहीं रह सकते; अतः हमें कोई और ही स्थान दिखाइए।

श्लोक 31 (skanda.6.31.31)

मर्यादया वर्तयामो यत्रस्था मानवैः समम्

maryādayā vartayāmo yatrasthā mānavaiḥ samam

जहाँ स्थित होकर हम मनुष्यों के साथ मर्यादापूर्वक व्यवहार कर सकें, वैसा स्थान दीजिए।

श्लोक 32 (skanda.6.31.32)

ब्रह्मा उवाच । एषा तिथिर्मया दत्ता युष्माकं धरणीतले । पंचमी शेषकालस्तु नेयस्तत्रं रसातले

brahmā uvāca | eṣā tithirmayā dattā yuṣmākaṁ dharaṇītale | paṁcamī śeṣakālastu neyastatraṁ rasātale

ब्रह्मा जी ने कहा -- यह पंचमी तिथि मैंने पृथ्वीतल पर तुम्हारे लिए नियत की है; शेष समय तुम्हें रसातल में बिताना होगा।

श्लोक 33 (skanda.6.31.33)

तत्रागतैर्न हंतव्या मानवा दोषवर्जिताः । मंत्रसंरक्षितांगाश्च तथौषधिकृतादराः

tatrāgatairna haṁtavyā mānavā doṣavarjitāḥ | maṁtrasaṁrakṣitāṁgāśca tathauṣadhikṛtādarāḥ

उस दिन आकर तुम्हें निर्दोष मनुष्यों को नहीं मारना चाहिए, विशेष रूप से जिनके अंग मंत्रों से सुरक्षित हों और जिन्होंने औषधियों का आदर किया हो।

श्लोक 34 (skanda.6.31.34)

चमत्कारपुरे क्षेत्रे मया दत्ता स्थितिः सदा । पृथिव्यां कुलमुख्यानां नागानां नागसत्तमाः

camatkārapure kṣetre mayā dattā sthitiḥ sadā | pṛthivyāṁ kulamukhyānāṁ nāgānāṁ nāgasattamāḥ

हे श्रेष्ठ नागों! चमत्कारपुर क्षेत्र में मैंने पृथ्वी पर कुल-प्रमुख नागों के लिए सदा के लिए यह निवास-स्थान दिया है।

श्लोक 35 (skanda.6.31.35)

सूत उवाच । एवमुक्ताश्च ते नागा ब्रह्मणा सत्वरं ययुः । पातालं कुलमुख्याश्च तस्मिन्क्षेत्रे व्यवस्थिताः

sūta uvāca | evamuktāśca te nāgā brahmaṇā satvaraṁ yayuḥ | pātālaṁ kulamukhyāśca tasminkṣetre vyavasthitāḥ

सूत जी ने कहा -- ब्रह्मा जी द्वारा ऐसा कहे जाने पर वे नाग शीघ्र पाताल को चले गए, और कुल-प्रमुख नाग उसी क्षेत्र में स्थापित हो गए।

श्लोक 36 (skanda.6.31.36)

तत्र श्रावणपंचम्यां यस्तान्पूजयते नरः । स प्राप्नोति नरोऽभीष्टं तेषामेव प्रसादतः

tatra śrāvaṇapaṁcamyāṁ yastānpūjayate naraḥ | sa prāpnoti naro'bhīṣṭaṁ teṣāmeva prasādataḥ

जो मनुष्य वहाँ श्रावण मास की पंचमी को उन नागों की पूजा करता है, वह उन्हीं के प्रसाद से मनोवांछित फल पाता है।

श्लोक 37 (skanda.6.31.37)

तस्य वंशेऽपि सर्पाणां न भयं स्यान्न किल्बिषम् । न रोगो नोपसर्गश्च न च भूतभयं क्वचित्

tasya vaṁśe'pi sarpāṇāṁ na bhayaṁ syānna kilbiṣam | na rogo nopasargaśca na ca bhūtabhayaṁ kvacit

उसके कुल में भी न तो सर्पों का भय होता है, न पाप, न रोग, न कोई उपद्रव, और न कभी भूत-प्रेत का भय।

श्लोक 38 (skanda.6.31.38)

अपुत्रस्तत्र यः श्राद्धं करोति सुतवांछया । पुत्रं विशिष्टमासाद्य पितॄणामनृणो हि सः

aputrastatra yaḥ śrāddhaṁ karoti sutavāṁchayā | putraṁ viśiṣṭamāsādya pitṝṇāmanṛṇo hi saḥ

जो पुत्रहीन मनुष्य वहाँ पुत्र की कामना से श्राद्ध करता है, वह एक विशिष्ट पुत्र पाकर पितरों से उऋण हो जाता है।

श्लोक 39 (skanda.6.31.39)

तथा वंध्या च या नारी पंचम्यां भास्करोदये । श्रावणे कुरुते स्नानं कृष्णपक्षे विशेषतः । सा सद्यो लभते पुत्रं स्ववंशोद्धरणक्षमम्

tathā vaṁdhyā ca yā nārī paṁcamyāṁ bhāskarodaye | śrāvaṇe kurute snānaṁ kṛṣṇapakṣe viśeṣataḥ | sā sadyo labhate putraṁ svavaṁśoddharaṇakṣamam

इसी प्रकार जो बाँझ स्त्री श्रावण मास में, विशेषतः कृष्णपक्ष की पंचमी को सूर्योदय के समय वहाँ स्नान करती है, वह तुरंत ऐसा पुत्र पाती है जो अपने वंश का उद्धार करने में समर्थ हो।

श्लोक 40 (skanda.6.31.40)

सर्वरोगविनिर्मुक्तं सुरूपं विनयान्वितम् । भ्रष्टराज्यो नरो यो वा तत्र स्नानं समाचरेत्

sarvarogavinirmuktaṁ surūpaṁ vinayānvitam | bhraṣṭarājyo naro yo vā tatra snānaṁ samācaret

-- वह पुत्र सब रोगों से मुक्त, सुंदर और विनययुक्त होता है। तथा जो राज्यभ्रष्ट पुरुष वहाँ स्नान करता है --

श्लोक 41 (skanda.6.31.41)

ततः पूजयते नागाञ्छ्रावणे पंचमीदिने । स हत्वाऽरिगणान्सर्वान्भूयोराज्यमवाप्नुयात्

tataḥ pūjayate nāgāñchrāvaṇe paṁcamīdine | sa hatvā'rigaṇānsarvānbhūyorājyamavāpnuyāt

-- और श्रावण की पंचमी को नागों की पूजा करता है, वह अपने सभी शत्रुओं का नाश करके पुनः राज्य पा लेता है।

श्लोक 42 (skanda.6.31.42)

येषां मृत्युर्मनुष्याणां जायते सर्पभक्षणात् । न तेषां जायते मुक्तिः प्रेतभावात्कथंचन

yeṣāṁ mṛtyurmanuṣyāṇāṁ jāyate sarpabhakṣaṇāt | na teṣāṁ jāyate muktiḥ pretabhāvātkathaṁcana

जिन मनुष्यों की मृत्यु सर्प के डसने से होती है, उनकी प्रेत-योनि से किसी भी प्रकार मुक्ति नहीं होती,

श्लोक 43 (skanda.6.31.43)

यावन्न क्रियते श्राद्धं तस्मिंस्तीर्थे द्विजोत्तमाः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मृतस्याहिप्रदंक्षणात् । श्राद्धं कार्यं प्रयत्नेन तस्मिंस्तीर्थेऽहिसंभवे

yāvanna kriyate śrāddhaṁ tasmiṁstīrthe dvijottamāḥ | tasmātsarvaprayatnena mṛtasyāhipradaṁkṣaṇāt | śrāddhaṁ kāryaṁ prayatnena tasmiṁstīrthe'hisaṁbhave

-- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जब तक उस तीर्थ में उनका श्राद्ध नहीं किया जाता। इसलिए सर्पदंश से मरे हुए व्यक्ति का, पूरे प्रयत्न से, इसी नाग-तीर्थ में यत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए।

श्लोक 44 (skanda.6.31.44)

अत्र वः कीर्तयिष्यामि पुरावृत्तां कथां शुभाम् । इन्द्रसेनस्य राजर्षेः सर्वपातकनाशिनीम्

atra vaḥ kīrtayiṣyāmi purāvṛttāṁ kathāṁ śubhām | indrasenasya rājarṣeḥ sarvapātakanāśinīm

अब मैं तुम्हें राजर्षि इन्द्रसेन की एक प्राचीन, शुभ और सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली कथा सुनाता हूँ।

श्लोक 45 (skanda.6.31.45)

इन्द्रसेनो महीपालः पुरासीद्रिपुदर्पहा । अश्वमेधसहस्रेण इष्टं तेन महात्मना

indraseno mahīpālaḥ purāsīdripudarpahā | aśvamedhasahasreṇa iṣṭaṁ tena mahātmanā

पूर्वकाल में इन्द्रसेन नामक एक राजा थे, जो शत्रुओं के दर्प का नाश करने वाले थे; उस महात्मा ने सहस्र अश्वमेध यज्ञ किए थे।

श्लोक 46 (skanda.6.31.46)

ततः स दैवयोगेन प्रसुप्तः शयने शुभे । दष्टः सर्पेण मुक्तश्च इन्द्रसेनो महीपतिः । वियुक्तश्चैव सहसा जीवितव्येन तत्क्षणात्

tataḥ sa daivayogena prasuptaḥ śayane śubhe | daṣṭaḥ sarpeṇa muktaśca indraseno mahīpatiḥ | viyuktaścaiva sahasā jīvitavyena tatkṣaṇāt

एक बार दैवयोग से वह राजा इन्द्रसेन अपनी सुंदर शय्या पर सोया हुआ था, तभी एक सर्प ने उसे डस लिया, और वह उसी क्षण अचानक अपने प्राणों से वियुक्त हो गया।

श्लोक 47 (skanda.6.31.47)

ततस्तस्य सुतोऽभीष्टस्तस्योद्देशेन कृत्स्नशः । चकार प्रेतकार्याणि स्मृत्युक्तानि च भक्तितः

tatastasya suto'bhīṣṭastasyoddeśena kṛtsnaśaḥ | cakāra pretakāryāṇi smṛtyuktāni ca bhaktitaḥ

तब उसके प्रिय पुत्र ने उसके उद्देश्य से भक्तिपूर्वक स्मृतियों में कहे गए सभी प्रेत-संस्कार सम्पूर्णतः किए।

श्लोक 48 (skanda.6.31.48)

गंगायामस्थिपातं च कृत्वा श्राद्धानि षोडश । गयां गत्वा ततश्चक्रे श्राद्धं श्रद्धासमन्वितः

gaṁgāyāmasthipātaṁ ca kṛtvā śrāddhāni ṣoḍaśa | gayāṁ gatvā tataścakre śrāddhaṁ śraddhāsamanvitaḥ

गंगा में अस्थि-विसर्जन करके तथा सोलह श्राद्ध करके, फिर गया जाकर उसने श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया।

श्लोक 49 (skanda.6.31.49)

अथ स्वप्नांतरे प्राप्तः पिता तस्य स भूपतिः । प्रोवाच दुःखितः पुत्रं बाष्पव्याकुललोचनम्

atha svapnāṁtare prāptaḥ pitā tasya sa bhūpatiḥ | provāca duḥkhitaḥ putraṁ bāṣpavyākulalocanam

तब स्वप्न में उसके पिता, वह राजा, उसके सामने आए और आँसुओं से भरी व्याकुल आँखों से दुःखी होकर पुत्र से कहने लगे --

श्लोक 50 (skanda.6.31.50)

सर्पमृत्योः सकाशान्मे प्रेतत्वं पुत्र संस्थितम् । तेन मे भवता दत्तं न किञ्चिदुपतिष्ठते

sarpamṛtyoḥ sakāśānme pretatvaṁ putra saṁsthitam | tena me bhavatā dattaṁ na kiñcidupatiṣṭhate

हे पुत्र! सर्प के दंश से मृत्यु होने के कारण मुझे प्रेत-योनि प्राप्त हुई है; तुमने जो कुछ भी दिया, उसमें से मुझे कुछ भी नहीं मिलता।

श्लोक 51 (skanda.6.31.51)

चमत्कारपुरं क्षेत्रं तस्मात्त्वं गच्छ सत्वरम् । तत्र तीर्थे कुरु श्राद्धं सर्पाणां मत्कृते सुत

camatkārapuraṁ kṣetraṁ tasmāttvaṁ gaccha satvaram | tatra tīrthe kuru śrāddhaṁ sarpāṇāṁ matkṛte suta

इसलिए तुम शीघ्र चमत्कारपुर क्षेत्र जाओ; हे पुत्र! वहाँ उस तीर्थ में मेरे लिए नागों का श्राद्ध करो,

श्लोक 52 (skanda.6.31.52)

येन संजायते मोक्षः प्रेतत्वा द्दारुणान्मम । स ततः प्रातरुत्थाय तत्स्मृत्वा नृपतेर्वचः

yena saṁjāyate mokṣaḥ pretatvā ddāruṇānmama | sa tataḥ prātarutthāya tatsmṛtvā nṛpatervacaḥ

जिससे मुझे इस भयंकर प्रेतत्व से मुक्ति मिल सके। तब वह प्रातःकाल उठकर, अपने पिता राजा के वचन को स्मरण कर,

श्लोक 53 (skanda.6.31.53)

प्रेतरूपस्य दुःखार्तस्तत्तीर्थं सत्वरं गतः । चकार च ततः श्राद्धं श्रावणे पंच मीदिने

pretarūpasya duḥkhārtastattīrthaṁ satvaraṁ gataḥ | cakāra ca tataḥ śrāddhaṁ śrāvaṇe paṁca mīdine

उस दुःखी प्रेत-रूप पिता के लिए शीघ्र उस तीर्थ को गया, और वहाँ श्रावण मास की पंचमी को श्राद्ध किया।

श्लोक 54 (skanda.6.31.54)

स्नात्वा श्रद्धासमोपेतः संनिवेश्य पुरोधसम् । ततः स दर्शनं प्राप्तो भूयोऽपि च यथा पुरा

snātvā śraddhāsamopetaḥ saṁniveśya purodhasam | tataḥ sa darśanaṁ prāpto bhūyo'pi ca yathā purā

स्नान करके, श्रद्धा से युक्त होकर, पुरोहित को बिठाकर, उसे फिर से पहले की भाँति अपने पिता का दर्शन प्राप्त हुआ।

श्लोक 55 (skanda.6.31.55)

प्रेतरूपेण दुःखार्तो वाक्यमेतदुवाच ह । न मयाऽऽसादितं किञ्चिद्यत्त्वया मत्कृते कृतम्

pretarūpeṇa duḥkhārto vākyametaduvāca ha | na mayā''sāditaṁ kiñcidyattvayā matkṛte kṛtam

प्रेत-रूप में दुःखी वह पिता यह वचन बोले -- तुमने मेरे लिए जो कुछ भी किया, उसमें से मुझे कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ।

श्लोक 56 (skanda.6.31.56)

फलं श्राद्धस्य चात्र त्वं कारणं शृणु पुत्रक । श्राद्धार्हा ब्राह्मणाश्चात्र चमत्कारपुरोद्भवाः

phalaṁ śrāddhasya cātra tvaṁ kāraṇaṁ śṛṇu putraka | śrāddhārhā brāhmaṇāścātra camatkārapurodbhavāḥ

हे पुत्र! इसका कारण सुनो -- यहाँ श्राद्ध का फल तभी मिलता है जब चमत्कारपुर में उत्पन्न श्राद्ध योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए।

श्लोक 57 (skanda.6.31.57)

क्षेत्रेऽपि गर्हिताः श्राद्धे येऽन्यत्र व्यंगकादयः । अत्र यत्क्रियते किञ्चिद्दानं वा व्रतमेव च

kṣetre'pi garhitāḥ śrāddhe ye'nyatra vyaṁgakādayaḥ | atra yatkriyate kiñciddānaṁ vā vratameva ca

इस क्षेत्र में भी जो अन्यत्र के व्यंग आदि दोषयुक्त ब्राह्मण हैं, वे श्राद्ध में निंदित हैं। यहाँ जो भी दान या व्रत किया जाता है,

श्लोक 58 (skanda.6.31.58)

तथान्यदपि विप्रार्हं कर्म यज्ञसमुद्भवम् । तत्तेषां वचनात्सर्वं पूर्णं स्यादपि खंडितम् । परोक्षे वापि संपूर्णं वृथा संजायते स्फुटम्

tathānyadapi viprārhaṁ karma yajñasamudbhavam | tatteṣāṁ vacanātsarvaṁ pūrṇaṁ syādapi khaṁḍitam | parokṣe vāpi saṁpūrṇaṁ vṛthā saṁjāyate sphuṭam

और इसी तरह ब्राह्मणों के योग्य यज्ञ आदि जो भी अन्य कर्म हैं, वे सब -- यद्यपि अपूर्ण भी हों -- यहाँ के ब्राह्मणों के वचन से पूर्ण माने जाते हैं। किन्तु उनके बिना, दूर रहकर किया गया कर्म पूर्ण होने पर भी स्पष्टतः निष्फल हो जाता है।

श्लोक 59 (skanda.6.31.59)

तस्मादस्मात्पुराद्विप्रान्समानीय ततः परम् । मम नाम्ना कुरु श्राद्धं येन मुक्तिः प्रजायते

tasmādasmātpurādviprānsamānīya tataḥ param | mama nāmnā kuru śrāddhaṁ yena muktiḥ prajāyate

इसलिए इसी नगर से ब्राह्मणों को बुलाकर, फिर मेरे नाम से श्राद्ध करो, जिससे मुझे मुक्ति प्राप्त हो सके।

श्लोक 60 (skanda.6.31.60)

अथासौ प्रातरुत्थाय स्मरमाणः पितुर्वचः । दुःखेन महताविष्टः प्रविवेश पुरोत्तमे

athāsau prātarutthāya smaramāṇaḥ piturvacaḥ | duḥkhena mahatāviṣṭaḥ praviveśa purottame

तब वह प्रातःकाल उठकर, पिता के वचन का स्मरण करते हुए, अत्यंत दुःख से व्याकुल होकर उस श्रेष्ठ नगर में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 61 (skanda.6.31.61)

ततश्चान्वेषयामास श्राद्धार्हान्ब्राह्मणान्नृपः । यत्नतोऽपि न लेभे स धनाढ्या ब्राह्मणा यतः

tataścānveṣayāmāsa śrāddhārhānbrāhmaṇānnṛpaḥ | yatnato'pi na lebhe sa dhanāḍhyā brāhmaṇā yataḥ

तब उस राजा ने श्राद्ध के योग्य ब्राह्मणों को खोजा, पर प्रयत्न करने पर भी वह धनी ब्राह्मणों को न पा सका, क्योंकि --

श्लोक 62 (skanda.6.31.62)

न तत्र दुःखितः कश्चिद्दरिद्रोऽपि न दुःखितः । नाकर्मनिरतो वापि पाखण्डनिरतोऽथवा

na tatra duḥkhitaḥ kaściddaridro'pi na duḥkhitaḥ | nākarmanirato vāpi pākhaṇḍanirato'thavā

-- वहाँ न कोई दुःखी था, न कोई दरिद्र दुःखी था, न कोई कर्महीन था और न कोई पाखंड में रत था।

श्लोक 63 (skanda.6.31.63)

स्थानेस्थाने महानादा उत्सवाश्च गृहेगृहे । वेदविद्याविनोदाश्च स्मृति वादास्तथैव च

sthānesthāne mahānādā utsavāśca gṛhegṛhe | vedavidyāvinodāśca smṛti vādāstathaiva ca

स्थान-स्थान पर महान् घोष हो रहा था, घर-घर में उत्सव मनाए जा रहे थे, तथा वेदाध्ययन और स्मृति के शास्त्रार्थ चल रहे थे।

श्लोक 64 (skanda.6.31.64)

श्रूयंते याज्ञिकानां च यज्ञकर्मसमुद्भवाः । न दुर्भिक्षं न च व्याधिर्नाकालमरणं नृणाम् । न मृत्युः कस्यचित्तत्र पुरे ब्राह्मण सेविते

śrūyaṁte yājñikānāṁ ca yajñakarmasamudbhavāḥ | na durbhikṣaṁ na ca vyādhirnākālamaraṇaṁ nṛṇām | na mṛtyuḥ kasyacittatra pure brāhmaṇa sevite

यज्ञ करने वालों के यज्ञ-कर्म से उत्पन्न ध्वनियाँ चारों ओर सुनाई देती थीं। उस ब्राह्मण-सेवित नगर में न दुर्भिक्ष था, न रोग था, न किसी की अकाल मृत्यु होती थी, न वहाँ किसी की मृत्यु ही होती थी।

श्लोक 65 (skanda.6.31.65)

यथर्तुवर्षी पर्जन्यः सस्यानि गुणवन्ति च । भूरिक्षीरस्रवा गावः क्षीराण्याजाविकानि च

yathartuvarṣī parjanyaḥ sasyāni guṇavanti ca | bhūrikṣīrasravā gāvaḥ kṣīrāṇyājāvikāni ca

मेघ ऋतु के अनुसार वर्षा करता था, फसलें गुणवान थीं, गौएँ प्रचुर दूध देती थीं, और बकरी-भेड़ों का दूध भी भरपूर था।

श्लोक 66 (skanda.6.31.66)

यंयं प्रार्थयते विप्रं स श्राद्धार्थं महीपतिः । स स तं भर्त्सयामास दुरुक्तैः कोपसंयुतः

yaṁyaṁ prārthayate vipraṁ sa śrāddhārthaṁ mahīpatiḥ | sa sa taṁ bhartsayāmāsa duruktaiḥ kopasaṁyutaḥ

राजा जिस-जिस ब्राह्मण से श्राद्ध के लिए प्रार्थना करता, वह-वह क्रोध से भरकर कटु वचनों से उसे फटकारता था।

श्लोक 67 (skanda.6.31.67)

धिग्धिक्पापसमाचार क्षत्रियापसदात्मक । किं कश्चिद्ब्राह्मणोऽश्नाति प्रेतश्राद्धे विशेषतः

dhigdhikpāpasamācāra kṣatriyāpasadātmaka | kiṁ kaścidbrāhmaṇo'śnāti pretaśrāddhe viśeṣataḥ

"धिक्कार है, धिक्कार है तुझे, पापाचारी और क्षत्रियों में अधम! क्या कोई ब्राह्मण प्रेत-श्राद्ध का, विशेषकर, भोजन करता है?"

श्लोक 68 (skanda.6.31.68)

तस्माद्गच्छ द्रुतं यावन्न कश्चिच्छपते द्विजः । निहन्ति वा प्रकोपेन स्वर्गमार्गनिरोधकम्

tasmādgaccha drutaṁ yāvanna kaścicchapate dvijaḥ | nihanti vā prakopena svargamārganirodhakam

"इसलिए शीघ्र यहाँ से चला जा, इससे पहले कि कोई ब्राह्मण, स्वर्ग-मार्ग को रोकने वाले तुझे, क्रोध में शाप दे दे या नष्ट कर दे।"

श्लोक 69 (skanda.6.31.69)

सूत उवाच । ततः स दुःखितो राजा निश्चक्राम भयार्दितः । चमत्कारपुरात्तस्माद्वैलक्ष्यं परमं गतः

sūta uvāca | tataḥ sa duḥkhito rājā niścakrāma bhayārditaḥ | camatkārapurāttasmādvailakṣyaṁ paramaṁ gataḥ

सूत जी ने कहा -- तब वह दुःखी राजा भय से पीड़ित होकर, अत्यंत लज्जा को प्राप्त हुआ, उस चमत्कारपुर से निकल गया।

श्लोक 70 (skanda.6.31.70)

चिन्तयामास राजेंद्र स्मृत्वावस्थां पितुश्च ताम् । किं करोमि क्व गच्छामि कथं मे स्यात्पितुर्गतिः

cintayāmāsa rājeṁdra smṛtvāvasthāṁ pituśca tām | kiṁ karomi kva gacchāmi kathaṁ me syātpiturgatiḥ

हे राजेन्द्र! अपने पिता की उस दशा का स्मरण करके वह सोचने लगा -- मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मेरे पिता की सद्गति कैसे हो?

श्लोक 71 (skanda.6.31.71)

ततः स सचिवान्सर्वान्प्रेषयित्वा गृहं प्रति । एकाकी भिक्षुरूपेण स्थितस्तत्रैव सत्पुरे

tataḥ sa sacivānsarvānpreṣayitvā gṛhaṁ prati | ekākī bhikṣurūpeṇa sthitastatraiva satpure

तब उसने अपने सभी मंत्रियों को घर वापस भेजकर, स्वयं भिक्षु का रूप धारण कर, अकेले उसी श्रेष्ठ नगर में रहने लगा।

श्लोक 72 (skanda.6.31.72)

स ज्ञात्वा नगरे तत्र ब्राह्मणं शंसितव्रतम् । सर्वेषां ब्राह्मणेंद्राणां मध्ये दाक्षिण्यभाजनम्

sa jñātvā nagare tatra brāhmaṇaṁ śaṁsitavratam | sarveṣāṁ brāhmaṇeṁdrāṇāṁ madhye dākṣiṇyabhājanam

उस नगर में उसने दृढ़व्रती एक ब्राह्मण का पता लगाया, जो समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों में दाक्षिण्य (सौजन्य) का पात्र माना जाता था,

श्लोक 73 (skanda.6.31.73)

देवशर्माभिधानं तु शरणागतवत्सलम् । आहिताग्निं चतुर्वेदं स्मृतिमार्गानुयायिनम्

devaśarmābhidhānaṁ tu śaraṇāgatavatsalam | āhitāgniṁ caturvedaṁ smṛtimārgānuyāyinam

-- जिसका नाम देवशर्मा था, जो शरणागतों पर वत्सल था, अग्निहोत्री, चारों वेदों का ज्ञाता तथा स्मृति-मार्ग का अनुयायी था।

श्लोक 74 (skanda.6.31.74)

ततस्तु प्रातरुत्थाय कृत्वांत्यजमयं वपुः । शोधयामास कृच्छ्रेण मलोत्सर्गनिकेतनम्

tatastu prātarutthāya kṛtvāṁtyajamayaṁ vapuḥ | śodhayāmāsa kṛcchreṇa malotsarganiketanam

तब प्रातःकाल उठकर, अपने शरीर को अंत्यज (चांडाल) के रूप में बनाकर, वह कठिनाई से मल-निवारण-स्थान (शौचालय) की सफाई करने लगा।

श्लोक 75 (skanda.6.31.75)

अथ यः कुरुते कर्म तत्र विष्ठाप्रशोधनम् । सोऽभ्येत्य तमुवाचेदं कोपसंरक्तलोचनः

atha yaḥ kurute karma tatra viṣṭhāpraśodhanam | so'bhyetya tamuvācedaṁ kopasaṁraktalocanaḥ

तब जो व्यक्ति वहाँ मल की सफाई का काम करता था, वह क्रोध से लाल आँखें किए उसके पास आकर यह बोला --

श्लोक 76 (skanda.6.31.76)

कुतस्त्वमिह संप्राप्तो मद्वृत्तेरुपघातकृत् । तस्माद्गच्छ द्रुतं नो चेन्नयिष्ये यमसादनम्

kutastvamiha saṁprāpto madvṛtterupaghātakṛt | tasmādgaccha drutaṁ no cennayiṣye yamasādanam

"तू यहाँ कहाँ से आ गया, मेरी आजीविका छीनने वाला? इसलिए शीघ्र यहाँ से चला जा, नहीं तो मैं तुझे यमलोक पहुँचा दूँगा।"

श्लोक 77 (skanda.6.31.77)

तस्यैवं वदतोऽप्याशु बलात्स पृथिवीपतिः । शोधयामास तत्स्थानं देवशर्मसमुद्भवम्

tasyaivaṁ vadato'pyāśu balātsa pṛthivīpatiḥ | śodhayāmāsa tatsthānaṁ devaśarmasamudbhavam

उसके ऐसा कहने पर भी वह राजा बलपूर्वक देवशर्मा के घर के उस स्थान को साफ करता रहा।

श्लोक 78 (skanda.6.31.78)

ततः संवत्सरस्यांते चंडालेन द्विजोत्तमाः । स प्रोक्त उचिते काले प्रणिपत्य च दूरतः

tataḥ saṁvatsarasyāṁte caṁḍālena dvijottamāḥ | sa prokta ucite kāle praṇipatya ca dūrataḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! फिर एक वर्ष के अंत में, उचित समय पर, उस चांडाल ने दूर से प्रणाम करके देवशर्मा से कहा --

श्लोक 79 (skanda.6.31.79)

स्वामिंस्तव कुलेप्येवं गूथाशोधनकर्मकृत् । तदस्माकं न चान्यस्य तत्किमन्यः प्रवेशितः

svāmiṁstava kulepyevaṁ gūthāśodhanakarmakṛt | tadasmākaṁ na cānyasya tatkimanyaḥ praveśitaḥ

"स्वामी! आपके कुल में सदा से मल-सफाई का यह कार्य हम ही करते आए हैं, किसी अन्य ने नहीं; तो फिर किसी दूसरे को इस कार्य में क्यों लगाया गया?"

श्लोक 80 (skanda.6.31.80)

अथ श्रुत्वा च तद्वाक्यं स प्राह द्विजसत्तमः । न मया कश्चिदन्योऽत्र निर्दिष्टो गोप्यकर्मणि । अधिकारस्त्वयात्मीयस्तथा कार्यो यथा पुरा

atha śrutvā ca tadvākyaṁ sa prāha dvijasattamaḥ | na mayā kaścidanyo'tra nirdiṣṭo gopyakarmaṇi | adhikārastvayātmīyastathā kāryo yathā purā

यह सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने कहा -- मैंने तो इस गुप्त कार्य में किसी अन्य को नियुक्त नहीं किया; तुम अपना अधिकार पहले की भाँति ही निभाते रहो।

श्लोक 81 (skanda.6.31.81)

तदान्यदिवसे प्राप्ते सोंऽत्यजः कोपसंयुतः । शस्त्रमादाय संप्राप्तो वधार्थं तस्य भूपतेः

tadānyadivase prāpte soṁ'tyajaḥ kopasaṁyutaḥ | śastramādāya saṁprāpto vadhārthaṁ tasya bhūpateḥ

तब दूसरे दिन आने पर वह चांडाल क्रोध से भरकर शस्त्र लेकर उस राजा को मार डालने के लिए आया।

श्लोक 82 (skanda.6.31.82)

शस्त्रोद्यतकरं दृष्ट्वा प्रहारेकृतनिश्चयम् । ततस्तं लीलया भूयो मुष्टिना मूर्ध्न्यताडयत्

śastrodyatakaraṁ dṛṣṭvā prahārekṛtaniścayam | tatastaṁ līlayā bhūyo muṣṭinā mūrdhnyatāḍayat

शस्त्र उठाए, प्रहार करने पर तुला हुआ उसे देखकर, राजा ने सहज ही उसके सिर पर एक मुक्का जड़ दिया।

श्लोक 83 (skanda.6.31.83)

ततस्तस्य विनिष्क्रांते लोचने तत्क्षणाद्द्विजाः । सुस्राव रुधिरं पश्चात्पपात गतजीवितः

tatastasya viniṣkrāṁte locane tatkṣaṇāddvijāḥ | susrāva rudhiraṁ paścātpapāta gatajīvitaḥ

हे ब्राह्मणो! उसी क्षण उसकी आँखें बाहर निकल आईं, फिर उससे रक्त बहने लगा, और वह प्राणहीन होकर गिर पड़ा।

श्लोक 84 (skanda.6.31.84)

तं श्रुत्वा निहतं तेन चंडालं निजकिंकरम् । देवशर्मातिकोपेन तद्वधार्थमुपागतः

taṁ śrutvā nihataṁ tena caṁḍālaṁ nijakiṁkaram | devaśarmātikopena tadvadhārthamupāgataḥ

अपने ही सेवक उस चांडाल के मारे जाने की बात सुनकर देवशर्मा अत्यंत क्रोध में उसे मार डालने के लिए आया।

श्लोक 85 (skanda.6.31.85)

ततः पुत्रैश्च पौत्रैश्च सहितोऽन्यैश्च बन्धुभिः । लोष्टैस्तं ताडयामास भर्त्समानो मुहुर्मुहुः

tataḥ putraiśca pautraiśca sahito'nyaiśca bandhubhiḥ | loṣṭaistaṁ tāḍayāmāsa bhartsamāno muhurmuhuḥ

तब पुत्रों, पौत्रों तथा अन्य बन्धु-बांधवों के साथ मिलकर उसने बार-बार डाँटते हुए उस पर मिट्टी के ढेले फेंककर मारा।

श्लोक 86 (skanda.6.31.86)

सोऽपि संताड्यमानस्तु प्रहारैर्जर्जरीकृतः । वेदोच्चारं ततश्चक्रे दर्शयित्वोपवीतकम्

so'pi saṁtāḍyamānastu prahārairjarjarīkṛtaḥ | vedoccāraṁ tataścakre darśayitvopavītakam

इस प्रकार प्रहारों से घायल हो जाने पर भी वह अपना यज्ञोपवीत दिखाकर वेद-पाठ करने लगा।

श्लोक 87 (skanda.6.31.87)

अथ ते विस्मिताः सर्वे देवशर्मपुरःसराः । ब्राह्मणास्तं समुद्वीक्ष्य वेदोच्चारपरायणम्

atha te vismitāḥ sarve devaśarmapuraḥsarāḥ | brāhmaṇāstaṁ samudvīkṣya vedoccāraparāyaṇam

तब देवशर्मा को आगे किए हुए वे सभी ब्राह्मण उसे वेद-पाठ में तत्पर देखकर आश्चर्यचकित हो गए।

श्लोक 88 (skanda.6.31.88)

पृष्टश्च किमिदं कर्म तवांत्यजजनोचितम् । एषा वेदात्मिका वाणी स्पष्टाक्षरकलस्वना । तत्किं शापपरिभ्रष्टस्त्वं कश्चिद्ब्राह्मणोत्तमः

pṛṣṭaśca kimidaṁ karma tavāṁtyajajanocitam | eṣā vedātmikā vāṇī spaṣṭākṣarakalasvanā | tatkiṁ śāpaparibhraṣṭastvaṁ kaścidbrāhmaṇottamaḥ

उन्होंने पूछा -- यह अंत्यज जन के योग्य कार्य तुम क्यों करते हो, जबकि तुम्हारी यह वाणी वेद जैसी, स्पष्ट अक्षरों वाली और मधुर है? क्या तुम शाप से भ्रष्ट कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण हो?

श्लोक 89 (skanda.6.31.89)

येनैवं कुरुषे कर्म गर्हितं चांत्यजैरपि । ततः स प्रहसन्नाह क्षत्रियोऽहं महीपतिः । विष्णुसेन इति ख्यातो हैहयान्वयसंभवः

yenaivaṁ kuruṣe karma garhitaṁ cāṁtyajairapi | tataḥ sa prahasannāha kṣatriyo'haṁ mahīpatiḥ | viṣṇusena iti khyāto haihayānvayasaṁbhavaḥ

"...कि तुम ऐसा कार्य करते हो जो अंत्यजों के द्वारा भी निंदित है?" तब वह हँसते हुए बोला -- मैं क्षत्रिय हूँ, एक राजा हूँ, विष्णुसेन नाम से विख्यात, हैहय वंश में उत्पन्न।

श्लोक 90 (skanda.6.31.90)

सोहमाराधनार्थाय त्वस्मिन्स्थान उपागतः । अद्य संवत्सरो जातः कर्मण्यस्मिन्रतस्य च

sohamārādhanārthāya tvasminsthāna upāgataḥ | adya saṁvatsaro jātaḥ karmaṇyasminratasya ca

मैं इसी आराधना के लिए इस स्थान पर आया हूँ; इस कार्य में लगे हुए मुझे आज एक वर्ष पूरा हुआ है।

श्लोक 91 (skanda.6.31.91)

सूत उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स विप्रः कृपयान्वितः । कृतांजलिपुटो भूत्वा तमुवाच महीपतिम्

sūta uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā sa vipraḥ kṛpayānvitaḥ | kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā tamuvāca mahīpatim

सूत जी ने कहा -- उसकी यह बात सुनकर वह ब्राह्मण करुणा से भर उठा, और हाथ जोड़कर उस राजा से कहने लगा --

श्लोक 92 (skanda.6.31.92)

किं तत्कृत्यं समुद्दिश्य त्वयैतत्कर्म गर्हितम् । कृतं कीर्तय येनाशु तवाभीष्टं करोम्यहम्

kiṁ tatkṛtyaṁ samuddiśya tvayaitatkarma garhitam | kṛtaṁ kīrtaya yenāśu tavābhīṣṭaṁ karomyaham

"किस कार्य के उद्देश्य से तुमने यह निंदित कर्म किया, वह बताओ, जिससे मैं शीघ्र तुम्हारी इच्छा पूरी कर सकूँ।"

श्लोक 93 (skanda.6.31.93)

नास्ति मे किञ्चिदप्राप्तं तथाऽसाध्यं महीपते । तस्मात्तव करिष्यामि कृत्यं यद्यपि दुर्लभम्

nāsti me kiñcidaprāptaṁ tathā'sādhyaṁ mahīpate | tasmāttava kariṣyāmi kṛtyaṁ yadyapi durlabham

"हे राजन्! मेरे लिए कुछ भी अप्राप्य या असाध्य नहीं है; इसलिए मैं तुम्हारा कार्य अवश्य पूरा करूँगा, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।"

श्लोक 94 (skanda.6.31.94)

राजा उवाच । पिता ममाहिना दष्टः प्रेतत्वं समुपागतः । सोऽत्र नागह्रदे श्राद्धे कृते मुक्तिमवाप्नुयात्

rājā uvāca | pitā mamāhinā daṣṭaḥ pretatvaṁ samupāgataḥ | so'tra nāgahrade śrāddhe kṛte muktimavāpnuyāt

राजा ने कहा -- मेरे पिता को सर्प ने डस लिया था, इसलिए वे प्रेत-योनि को प्राप्त हुए हैं; इसी नागह्रद में श्राद्ध किए जाने पर ही वे मुक्ति पा सकते हैं।

श्लोक 95 (skanda.6.31.95)

तस्मात्तत्तारणार्थाय विप्रकृत्यं समाचर । एतदर्थं मयैतत्ते कृतं कर्म विगर्हितम्

tasmāttattāraṇārthāya viprakṛtyaṁ samācara | etadarthaṁ mayaitatte kṛtaṁ karma vigarhitam

"इसलिए उनके उद्धार के लिए ब्राह्मण-कृत्य (भोजन ग्रहण) कीजिए; इसी उद्देश्य से मैंने आपके लिए यह निंदित कार्य किया है।"

श्लोक 96 (skanda.6.31.96)

देवशर्मा उवाच । एवं कुरु नृपश्रेष्ठ श्राद्धेऽहं ते पितुः स्वयम् । ब्राह्मणः संभविष्यामि तस्माच्छ्राद्धं समाचर

devaśarmā uvāca | evaṁ kuru nṛpaśreṣṭha śrāddhe'haṁ te pituḥ svayam | brāhmaṇaḥ saṁbhaviṣyāmi tasmācchrāddhaṁ samācara

देवशर्मा ने कहा -- हे राजश्रेष्ठ! ऐसा ही करो; तुम्हारे पिता के श्राद्ध में मैं स्वयं ब्राह्मण बनूँगा, इसलिए श्राद्ध की तैयारी करो।

श्लोक 97 (skanda.6.31.97)

सूत उवाच । अथ ते सुहृदस्तस्य पुत्राः पौत्राश्च बांधवाः । प्रोचुर्नैतत्प्रयुक्तं ते श्राद्धं भोक्तुं विगर्हितम्

sūta uvāca | atha te suhṛdastasya putrāḥ pautrāśca bāṁdhavāḥ | procurnaitatprayuktaṁ te śrāddhaṁ bhoktuṁ vigarhitam

सूत जी ने कहा -- तब उसके मित्रों, पुत्रों, पौत्रों तथा बांधवों ने कहा -- "यह निंदित प्रेत-श्राद्ध खाना आपके लिए उचित नहीं है।"

श्लोक 98 (skanda.6.31.98)

तस्माद्यदि भवानस्य श्राद्धे भोक्ता ततः स्वयम् । सर्वे भवन्तं त्यक्षामस्तथान्येऽपि द्विजोत्तमाः

tasmādyadi bhavānasya śrāddhe bhoktā tataḥ svayam | sarve bhavantaṁ tyakṣāmastathānye'pi dvijottamāḥ

"इसलिए यदि आप स्वयं इस श्राद्ध में भोजन करेंगे, तो हम सब और अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मण भी आपका त्याग कर देंगे।"

श्लोक 99 (skanda.6.31.99)

देवशर्मा उवाच । कामं त्यजत मां सर्वे यूयमन्येऽपि ये द्विजाः । मयैवास्य प्रतिज्ञातं भोक्तुं श्राद्धे महीपतेः

devaśarmā uvāca | kāmaṁ tyajata māṁ sarve yūyamanye'pi ye dvijāḥ | mayaivāsya pratijñātaṁ bhoktuṁ śrāddhe mahīpateḥ

देवशर्मा ने कहा -- चाहे तुम सब और अन्य सारे ब्राह्मण मुझे त्याग दो, मैंने ही इस राजा के श्राद्ध में भोजन करने की प्रतिज्ञा की है।

श्लोक 100 (skanda.6.31.100)

सूत उवाच । एवमुक्त्वा स विप्रेंद्रस्तेनैव सहितस्तदा । नागह्रदं समासाद्य श्राद्धे वै भुक्तवानथ

sūta uvāca | evamuktvā sa vipreṁdrastenaiva sahitastadā | nāgahradaṁ samāsādya śrāddhe vai bhuktavānatha

सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण उसी राजा के साथ नागह्रद पहुँचा, और वहाँ श्राद्ध में भोजन किया।

श्लोक 101 (skanda.6.31.101)

भुक्तमात्रे ततस्तस्मिन्वागुवाचाशरीरिणी । नादयंती जगत्सर्वं हर्षयंती महीपतिम्

bhuktamātre tatastasminvāguvācāśarīriṇī | nādayaṁtī jagatsarvaṁ harṣayaṁtī mahīpatim

भोजन होते ही तब एक अशरीरी वाणी हुई, जो सारे जगत् को गुंजायमान करती हुई और राजा को हर्षित करती हुई बोली --

श्लोक 102 (skanda.6.31.102)

प्रेतभावाद्विनिर्मुक्तः पुत्राहं त्वत्प्रभावतः । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सांप्रतं त्रिदिवालयम्

pretabhāvādvinirmuktaḥ putrāhaṁ tvatprabhāvataḥ | svasti te'stu gamiṣyāmi sāṁprataṁ tridivālayam

"हे पुत्र! तुम्हारे ही प्रभाव से मैं प्रेत-भाव से मुक्त हो गया हूँ; तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं स्वर्गलोक को जाता हूँ।"

श्लोक 103 (skanda.6.31.103)

तत्कृत्वा नृपतिर्हृष्टस्तं प्रणम्य द्विजोत्तमम् । प्रोवाच कुरु मे वाक्यं यद्ब्रवीमि द्विजोत्तम

tatkṛtvā nṛpatirhṛṣṭastaṁ praṇamya dvijottamam | provāca kuru me vākyaṁ yadbravīmi dvijottama

यह होते ही राजा प्रसन्न हुआ, और उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को प्रणाम करके बोला -- हे द्विजोत्तम! मैं जो कहता हूँ, वह कीजिए।

श्लोक 104 (skanda.6.31.104)

अस्ति माहिष्मतीनाम नगरी नर्मदातटे । सा चास्माकं राजधानी पितृपर्यागता विभो

asti māhiṣmatīnāma nagarī narmadātaṭe | sā cāsmākaṁ rājadhānī pitṛparyāgatā vibho

"नर्मदा के तट पर माहिष्मती नाम की एक नगरी है; हे प्रभो! वही हमारी राजधानी है, जो हमें पितरों से परम्परागत रूप से प्राप्त हुई है।"

श्लोक 105 (skanda.6.31.105)

अहं यच्छामि ते ब्रह्मन्समस्तविषयान्विताम् । मया भृत्येन तत्रस्थः कुरु राज्यमकंटकम्

ahaṁ yacchāmi te brahmansamastaviṣayānvitām | mayā bhṛtyena tatrasthaḥ kuru rājyamakaṁṭakam

"हे ब्रह्मन्! मैं वह समस्त प्रदेशों सहित आपको देता हूँ; मैं आपका सेवक बनकर, आप वहीं रहकर निष्कंटक राज्य कीजिए।"

श्लोक 106 (skanda.6.31.106)

देवशर्मा उवाच । न चैतद्युज्यते वक्तुं न विप्रो राज्यमर्हति । तस्माद्गच्छ निजं राज्यं परिपालय पार्थिव

devaśarmā uvāca | na caitadyujyate vaktuṁ na vipro rājyamarhati | tasmādgaccha nijaṁ rājyaṁ paripālaya pārthiva

देवशर्मा ने कहा -- यह कहना ही उचित नहीं है, ब्राह्मण राज्य के योग्य नहीं होता; इसलिए हे राजन्! अपने ही राज्य को जाकर पालन करो।

श्लोक 107 (skanda.6.31.107)

सूत उवाच । एवं विसर्जितस्तेन जगाम स महापतिः । स्वं देशं हर्षसंयुक्तः कृतकृत्यो द्विजोत्तमाः

sūta uvāca | evaṁ visarjitastena jagāma sa mahāpatiḥ | svaṁ deśaṁ harṣasaṁyuktaḥ kṛtakṛtyo dvijottamāḥ

सूत जी ने कहा -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस प्रकार उसके द्वारा विदा किए जाने पर वह महाराजा कृतकृत्य होकर हर्षपूर्वक अपने देश को चला गया।

श्लोक 108 (skanda.6.31.108)

सोऽपि सर्वैः परित्यक्तो ब्राह्मणैः पुरवासिभिः । देवशर्मा समुद्दिश्य दोषं श्राद्धसमुद्भवम्

so'pi sarvaiḥ parityakto brāhmaṇaiḥ puravāsibhiḥ | devaśarmā samuddiśya doṣaṁ śrāddhasamudbhavam

देवशर्मा को भी नगरवासी सभी ब्राह्मणों ने, श्राद्ध से उत्पन्न दोष का हवाला देकर, त्याग दिया।

श्लोक 109 (skanda.6.31.109)

ततो नागह्रदे तस्मिन्स कृत्वा निजमन्दिरम् । निवासमकरोत्तत्र स्वाध्यायनिरतः शुचिः

tato nāgahrade tasminsa kṛtvā nijamandiram | nivāsamakarottatra svādhyāyanirataḥ śuciḥ

तब उसने उसी नागह्रद में अपना मंदिर (आवास) बनाकर, शुद्ध होकर वहीं स्वाध्याय में लीन होकर निवास किया।

श्लोक 110 (skanda.6.31.110)

तत्रस्थस्य निरस्तस्य ये पुत्राः स्युर्द्विजोत्तमाः । तेषां संततयो ऽद्यापि ते प्रोक्ता बाह्यवासिनः

tatrasthasya nirastasya ye putrāḥ syurdvijottamāḥ | teṣāṁ saṁtatayo 'dyāpi te proktā bāhyavāsinaḥ

उस निष्कासित व्यक्ति के वहाँ रहने से जो पुत्र उत्पन्न हुए, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उनकी संतानें आज भी "बाह्यवासी" कही जाती हैं।

श्लोक 111 (skanda.6.31.111)

एतद्वः सर्वमाख्यातं नागतीर्थसमुद्भवम् । माहात्म्यं ब्राह्मणश्रेष्ठाः सर्वपातकनाशनम्

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ nāgatīrthasamudbhavam | māhātmyaṁ brāhmaṇaśreṣṭhāḥ sarvapātakanāśanam

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! नागतीर्थ से उत्पन्न, समस्त पापों का नाश करने वाला यह सम्पूर्ण माहात्म्य तुम्हें सुना दिया गया।

श्लोक 112 (skanda.6.31.112)

यश्चैतत्पठते भक्त्या संप्राप्ते पंचमीदिने । शृणुयाद्वा न वंशेऽपि तस्य स्यात्सार्पजं भयम्

yaścaitatpaṭhate bhaktyā saṁprāpte paṁcamīdine | śṛṇuyādvā na vaṁśe'pi tasya syātsārpajaṁ bhayam

जो कोई पंचमी के दिन आने पर इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है या सुनता है, उसके कुल में भी सर्प से उत्पन्न भय कभी नहीं होता।

श्लोक 113 (skanda.6.31.113)

तथा विमुच्यते पापाद्भक्षजातान्न संशयः । कृतादज्ञानतो विप्राः सत्यमेतन्मयोदितम्

tathā vimucyate pāpādbhakṣajātānna saṁśayaḥ | kṛtādajñānato viprāḥ satyametanmayoditam

हे ब्राह्मणो! वह अज्ञानवश किए गए भक्षण (सर्प-दंश आदि) से उत्पन्न पाप से भी निःसंदेह मुक्त हो जाता है; मैंने यह सत्य ही कहा है।

श्लोक 114 (skanda.6.31.114)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन नागतीर्थमनुत्तमम् । माहात्म्यं पठनीयं वा श्रोतव्यं वा समाहितैः

tasmātsarvaprayatnena nāgatīrthamanuttamam | māhātmyaṁ paṭhanīyaṁ vā śrotavyaṁ vā samāhitaiḥ

इसलिए एकाग्रचित्त होकर सम्पूर्ण प्रयत्न से इस सर्वोत्तम नागतीर्थ के माहात्म्य को पढ़ना या सुनना चाहिए।

श्लोक 115 (skanda.6.31.115)

श्राद्धकाले तु संप्राप्ते यश्चैतत्पठते द्विजः । स प्राप्नोति फलं कृत्स्नं गयाश्राद्धसमुद्भवम्

śrāddhakāle tu saṁprāpte yaścaitatpaṭhate dvijaḥ | sa prāpnoti phalaṁ kṛtsnaṁ gayāśrāddhasamudbhavam

श्राद्ध का समय आने पर जो ब्राह्मण इसे पढ़ता है, उसे गया में किए गए श्राद्ध से प्राप्त होने वाला सम्पूर्ण फल मिलता है।

श्लोक 116 (skanda.6.31.116)

तथा ये कीर्तिता दोषाः श्राद्धे द्रव्यसमुद्भवाः । व्रतवैक्लव्यजाश्चापि तथा ब्राह्मणसंभवाः

tathā ye kīrtitā doṣāḥ śrāddhe dravyasamudbhavāḥ | vratavaiklavyajāścāpi tathā brāhmaṇasaṁbhavāḥ

तथा श्राद्ध में द्रव्य से उत्पन्न होने वाले जो दोष बताए गए हैं, और व्रत-भंग से तथा ब्राह्मणों की ओर से उत्पन्न होने वाले जो दोष हैं --

श्लोक 117 (skanda.6.31.117)

ते सर्वे नाशमायांति कीर्त्यमाने समाहितैः । नागह्रदस्य माहात्म्ये श्राद्धकाल उपस्थिते

te sarve nāśamāyāṁti kīrtyamāne samāhitaiḥ | nāgahradasya māhātmye śrāddhakāla upasthite

-- वे सब नष्ट हो जाते हैं, जब श्राद्ध के समय उपस्थित होकर एकाग्रचित्त लोगों द्वारा नागह्रद के इस माहात्म्य का कीर्तन किया जाता है।

श्लोक 118 (skanda.6.31.118)

तथा विनिहता गोभिर्ब्राह्मणैः श्वापदैरपि । एतस्मिन्पठिते श्राद्धे गच्छंति परमां गतिम्

tathā vinihatā gobhirbrāhmaṇaiḥ śvāpadairapi | etasminpaṭhite śrāddhe gacchaṁti paramāṁ gatim

इसी प्रकार गौओं, ब्राह्मणों अथवा हिंसक पशुओं द्वारा मारे गए लोग भी, इस श्राद्ध-कथा के पढ़े जाने पर परम गति को प्राप्त होते हैं।

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