नागर खण्ड · अध्याय 32
सप्तर्ष्याश्रम माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.32.1)
तथान्योऽस्ति द्विजश्रेष्ठास्तस्मिन्क्षेत्रे शुभावहे । सप्तर्षीणां सुविख्यात आश्रमः सर्वकामदः
tathānyo'sti dvijaśreṣṭhāstasminkṣetre śubhāvahe | saptarṣīṇāṁ suvikhyāta āśramaḥ sarvakāmadaḥ
सूत जी ने कहा -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उस कल्याणकारी क्षेत्र में सप्तर्षियों का एक अत्यंत विख्यात आश्रम भी है, जो सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.6.32.2)
तत्र श्रावणमासस्य पंचदश्यां समाहितः । यः करोति नरः स्नानं स लभेद्वांछितं फलम्
tatra śrāvaṇamāsasya paṁcadaśyāṁ samāhitaḥ | yaḥ karoti naraḥ snānaṁ sa labhedvāṁchitaṁ phalam
जो मनुष्य श्रावण मास की पूर्णिमा को वहाँ एकाग्रचित्त होकर स्नान करता है, वह मनोवांछित फल पाता है।
श्लोक 3 (skanda.6.32.3)
कन्दमूलफलैः शाकैर्यस्तत्र श्राद्धमाचरेत् । स प्राप्नोति फलं कृत्स्नं राजसूयाश्वमेधयोः
kandamūlaphalaiḥ śākairyastatra śrāddhamācaret | sa prāpnoti phalaṁ kṛtsnaṁ rājasūyāśvamedhayoḥ
जो वहाँ कन्द, मूल, फल और शाक से श्राद्ध करता है, उसे राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का सम्पूर्ण फल मिलता है।
श्लोक 4 (skanda.6.32.4)
पंचम्यां शुक्लपक्षे तु मासि भाद्रपदे द्विजाः । यस्तान्पूजयते भक्त्या पुष्पधूपानुलेपनैः । विधिनानेन विप्रेन्द्राः सर्वानेव यथाक्रमम् । ॐ अत्रये नमः । ॐ वसिष्ठाय नमः । ॐ कश्यपाय नमः । ॐ भरद्वाजाय नमः । ॐ गौतमाय नमः । ॐ कौशिकाय नमः । ॐ जमदग्नये नमः । ॐ अरुंधत्यै नमः
paṁcamyāṁ śuklapakṣe tu māsi bhādrapade dvijāḥ | yastānpūjayate bhaktyā puṣpadhūpānulepanaiḥ | vidhinānena viprendrāḥ sarvāneva yathākramam | oṁ atraye namaḥ | oṁ vasiṣṭhāya namaḥ | oṁ kaśyapāya namaḥ | oṁ bharadvājāya namaḥ | oṁ gautamāya namaḥ | oṁ kauśikāya namaḥ | oṁ jamadagnaye namaḥ | oṁ aruṁdhatyai namaḥ
हे ब्राह्मणो! जो भाद्रपद मास की शुक्ल पंचमी को इस विधि से पुष्प, धूप और अनुलेपन द्वारा उन सबको क्रमशः भक्तिपूर्वक पूजता है -- ॐ अत्रि को नमस्कार, ॐ वसिष्ठ को नमस्कार, ॐ कश्यप को नमस्कार, ॐ भरद्वाज को नमस्कार, ॐ गौतम को नमस्कार, ॐ कौशिक (विश्वामित्र) को नमस्कार, ॐ जमदग्नि को नमस्कार, ॐ अरुन्धती को नमस्कार --
श्लोक 5 (skanda.6.32.5)
पूजामन्त्रः । जह्नुकन्यापवित्रांगा गृहीतजपमालिकाः । गृह्णंत्वर्घं मया दत्तमृषयः सर्वकामदाः
pūjāmantraḥ | jahnukanyāpavitrāṁgā gṛhītajapamālikāḥ | gṛhṇaṁtvarghaṁ mayā dattamṛṣayaḥ sarvakāmadāḥ
पूजामंत्र -- जिनके अंग जह्नु-कन्या (गंगा) से पवित्र हैं, जिन्होंने जपमाला धारण कर रखी है, वे समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले ऋषिगण मेरे द्वारा दिए गए इस अर्घ्य को ग्रहण करें।
श्लोक 6 (skanda.6.32.6)
ऋषयः उवाच । तत्र सप्तर्षिभिस्तीर्थं कस्मिन्काले व्यवस्थितम् । विस्तरात्सूतज ब्रूहि परं कौतूहलं हि नः
ṛṣayaḥ uvāca | tatra saptarṣibhistīrthaṁ kasminkāle vyavasthitam | vistarātsūtaja brūhi paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ
ऋषियों ने कहा -- हे सूतपुत्र! उस तीर्थ की स्थापना सप्तर्षियों द्वारा किस काल में हुई, यह विस्तार से बताइए, हमें बड़ी उत्सुकता है।
श्लोक 7 (skanda.6.32.7)
सूत उवाच । अनावृष्टिः पुरा जाता लोके द्वादशवार्षिकी । सर्वोषधिक्षयो जातस्ततो लोकाः क्षयार्दिताः
sūta uvāca | anāvṛṣṭiḥ purā jātā loke dvādaśavārṣikī | sarvoṣadhikṣayo jātastato lokāḥ kṣayārditāḥ
सूत जी ने कहा -- पूर्वकाल में लोक में बारह वर्ष का अनावृष्टि (सूखा) पड़ा था, जिससे सारी औषधियाँ नष्ट हो गईं और प्रजा दुर्भिक्ष से पीड़ित हो गई।
श्लोक 8 (skanda.6.32.8)
अस्थिशेषा निरुत्साहास्त्यक्तधर्मव्रतक्रियाः । अभक्ष्यभक्षणपरास्तथैवापेयपायिनः
asthiśeṣā nirutsāhāstyaktadharmavratakriyāḥ | abhakṣyabhakṣaṇaparāstathaivāpeyapāyinaḥ
लोग हड्डी मात्र शेष रह गए, उत्साहहीन हो गए, धर्म-व्रत-क्रियाएँ छोड़ बैठे, तथा अभक्ष्य भक्षण एवं अपेय पान में लग गए।
श्लोक 9 (skanda.6.32.9)
त्यजंति मातरः पुत्रान्कलत्राणि तथा नराः । भृत्यान्स्वानपि वित्तेशाः का कथान्यसमुद्भवान्
tyajaṁti mātaraḥ putrānkalatrāṇi tathā narāḥ | bhṛtyānsvānapi vitteśāḥ kā kathānyasamudbhavān
माताएँ अपने पुत्रों को त्यागने लगीं, पुरुष अपनी पत्नियों को, और धनवान लोग अपने ही सेवकों को -- फिर दूसरों की तो बात ही क्या!
श्लोक 10 (skanda.6.32.10)
संत्यक्तान्यग्निहोत्राणि ब्राह्मणैर्याजकैरपि । व्रतानि व्रतिभिर्दांतैरपि वृद्धतमैर्द्विजाः
saṁtyaktānyagnihotrāṇi brāhmaṇairyājakairapi | vratāni vratibhirdāṁtairapi vṛddhatamairdvijāḥ
हे ब्राह्मणो! याजक ब्राह्मणों ने अग्निहोत्र छोड़ दिए, तथा संयमी और वृद्धतम व्रतधारियों ने भी अपने व्रत छोड़ दिए।
श्लोक 11 (skanda.6.32.11)
दृश्यते चैव यत्रैव सस्यं वापि कथंचन । ह्रियते लज्जया हीनैस्तत्र क्षुत्क्षामकैर्नरैः
dṛśyate caiva yatraiva sasyaṁ vāpi kathaṁcana | hriyate lajjayā hīnaistatra kṣutkṣāmakairnaraiḥ
जहाँ कहीं भी किसी प्रकार का अन्न दिखाई देता, वहीं भूख से दुर्बल, लज्जाहीन लोग उसे छीन लेते थे।
श्लोक 12 (skanda.6.32.12)
एवमन्नक्षये जाते पीडिते धरणीतले । सप्तर्षयः क्षुधाविष्टा बभ्रमुस्तत्रतत्र च
evamannakṣaye jāte pīḍite dharaṇītale | saptarṣayaḥ kṣudhāviṣṭā babhramustatratatra ca
इस प्रकार अन्न के नष्ट हो जाने पर, पीड़ित पृथ्वीतल पर भूख से व्याकुल सप्तर्षि भी इधर-उधर भटकने लगे।
श्लोक 13 (skanda.6.32.13)
अत्रिश्चैव वसिष्ठश्च कश्यपः सुमहातपाः । भरद्वाजस्तथा चान्यो गौतमः संशितव्रतः । कौशिको जमदग्निश्च तथैवारुंधती सती
atriścaiva vasiṣṭhaśca kaśyapaḥ sumahātapāḥ | bharadvājastathā cānyo gautamaḥ saṁśitavrataḥ | kauśiko jamadagniśca tathaivāruṁdhatī satī
अत्रि, वसिष्ठ, महातपस्वी कश्यप, भरद्वाज, दृढ़व्रती गौतम, कौशिक (विश्वामित्र), जमदग्नि, और साध्वी अरुन्धती --
श्लोक 14 (skanda.6.32.14)
अथ तेषां समस्तानां चंडाभूत्परिचारिका । पशुवक्त्रस्तथा भृत्यो विनयेन समवितः
atha teṣāṁ samastānāṁ caṁḍābhūtparicārikā | paśuvaktrastathā bhṛtyo vinayena samavitaḥ
-- इन सबकी परिचारिका चंडा नाम की एक स्त्री थी, तथा विनयवान पशुमुख नाम का एक सेवक भी उनके साथ था।
श्लोक 15 (skanda.6.32.15)
ततस्ते विषयं प्राप्ता वृषादर्भिमहीपतेः । क्षुत्क्षामा मुनयोऽत्यर्थं देशे चानर्तसंज्ञके
tataste viṣayaṁ prāptā vṛṣādarbhimahīpateḥ | kṣutkṣāmā munayo'tyarthaṁ deśe cānartasaṁjñake
अत्यंत भूख से दुर्बल हुए वे मुनि तब राजा वृषादर्भि के अनर्त नामक देश में पहुँचे।
श्लोक 16 (skanda.6.32.16)
तत्र भिक्षाकृते भ्रांतास्ततश्चैव गृहाद्गृहम् । न ग्रासमपि सस्यस्य प्राप्नुवंस्ते द्विजोत्तमाः
tatra bhikṣākṛte bhrāṁtāstataścaiva gṛhādgṛham | na grāsamapi sasyasya prāpnuvaṁste dvijottamāḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वहाँ भिक्षा के लिए घर-घर भटकते हुए भी उन्हें अन्न का एक कौर तक न मिला।
श्लोक 17 (skanda.6.32.17)
ततस्तैः पतितो भूमौ दृष्टो मृतकुमारकः । मंत्रयित्वा मिथः पश्चाद्गृहीतो भक्षणाय च
tatastaiḥ patito bhūmau dṛṣṭo mṛtakumārakaḥ | maṁtrayitvā mithaḥ paścādgṛhīto bhakṣaṇāya ca
तब उन्होंने भूमि पर पड़ा हुआ एक मृत बालक देखा, और आपस में विचार-विमर्श करके उसे भक्षण के लिए उठा लिया।
श्लोक 18 (skanda.6.32.18)
अपचन्यावदग्नौ तं क्षुधया परिपीडिताः । वृषादर्भिर्नृपः प्राप्तः श्रुत्वा तेषां विचेष्टितम्
apacanyāvadagnau taṁ kṣudhayā paripīḍitāḥ | vṛṣādarbhirnṛpaḥ prāptaḥ śrutvā teṣāṁ viceṣṭitam
भूख से अत्यंत पीड़ित वे उसे अग्नि पर पका ही रहे थे, कि तभी उनका यह कृत्य सुनकर राजा वृषादर्भि वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 19 (skanda.6.32.19)
वृषादर्भिः उवाच । किमिदं गर्हितं कर्म क्रियते मुनिसत्तमाः । राक्षसानामयं धर्मो महामांसस्य भक्षणम्
vṛṣādarbhiḥ uvāca | kimidaṁ garhitaṁ karma kriyate munisattamāḥ | rākṣasānāmayaṁ dharmo mahāmāṁsasya bhakṣaṇam
वृषादर्भि ने कहा -- हे मुनिश्रेष्ठो! यह कैसा निंदित कर्म आप कर रहे हैं? मानव-मांस का भक्षण तो राक्षसों का धर्म है।
श्लोक 20 (skanda.6.32.20)
सोऽहं सस्यं प्रदास्यामि ग्रामान्व्रीहीन्यवानपि । मम वाक्यादसंदिग्धं त्यजर्ध्वं मृतबालकम्
so'haṁ sasyaṁ pradāsyāmi grāmānvrīhīnyavānapi | mama vākyādasaṁdigdhaṁ tyajardhvaṁ mṛtabālakam
मैं आपको अन्न, गाँव, धान और जौ दूँगा; मेरे वचन पर निःसंदेह विश्वास कर इस मृत बालक को त्याग दीजिए।
श्लोक 21 (skanda.6.32.21)
ऋषयः उवाच । प्रायश्चित्तं समादिष्टं महामांसस्य भक्षणात् । प्रतिग्रहस्य भूपाला दापत्कालेऽपि नो नृप
ṛṣayaḥ uvāca | prāyaścittaṁ samādiṣṭaṁ mahāmāṁsasya bhakṣaṇāt | pratigrahasya bhūpālā dāpatkāle'pi no nṛpa
ऋषियों ने कहा -- हे राजन्! मानव-मांस भक्षण का प्रायश्चित्त शास्त्रों में बताया गया है, परन्तु आपत्काल में भी हमें राजा से दान लेने का विधान नहीं है।
श्लोक 22 (skanda.6.32.22)
पश्चात्तपश्चरिष्यामो महामांससमुद्भवम् । पातकं नाशयिष्यामो भक्षयामो वयं ततः
paścāttapaścariṣyāmo mahāmāṁsasamudbhavam | pātakaṁ nāśayiṣyāmo bhakṣayāmo vayaṁ tataḥ
बाद में हम तप करेंगे और इस मानव-मांस भक्षण से उत्पन्न पाप को नष्ट कर देंगे; अभी तो हम इसे खा ही लेंगे।
श्लोक 23 (skanda.6.32.23)
वृषादर्भिः उवाच । प्रतिग्रहो द्विजातीनां प्रोक्ता वृत्तिरनिंदिता । ग्राह्यो मत्तस्ततः सर्वैर्नात्र कार्या विचारणा
vṛṣādarbhiḥ uvāca | pratigraho dvijātīnāṁ proktā vṛttiraniṁditā | grāhyo mattastataḥ sarvairnātra kāryā vicāraṇā
वृषादर्भि ने कहा -- ब्राह्मणों के लिए दान ग्रहण करना निंदित वृत्ति नहीं कहा गया है, इसलिए आप सब मुझसे इसे स्वीकार करें, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
श्लोक 24 (skanda.6.32.24)
ऋषयः उवाच । राज प्रतिग्रहो घोरो मध्वास्वादो विषोपमः । स दूराद्ब्राह्मणैस्त्याज्यो विशेषात्कृतिभिर्नृप
ṛṣayaḥ uvāca | rāja pratigraho ghoro madhvāsvādo viṣopamaḥ | sa dūrādbrāhmaṇaistyājyo viśeṣātkṛtibhirnṛpa
ऋषियों ने कहा -- हे राजन्! राजा से लिया गया दान भयंकर है, वह मधु के स्वाद जैसा किन्तु विष के समान है; विशेष रूप से सुसंस्कृत ब्राह्मणों को इसे दूर से ही त्याग देना चाहिए।
श्लोक 25 (skanda.6.32.25)
दशसूनासमश्चक्री दशचक्रिसमो ध्वजी । दश ध्वजिसमा वेश्या दशवेश्यासमो नृपः
daśasūnāsamaścakrī daśacakrisamo dhvajī | daśa dhvajisamā veśyā daśaveśyāsamo nṛpaḥ
दस कसाइयों के बराबर एक कुम्हार (चक्री) है, दस कुम्हारों के बराबर एक ध्वजाधारी (शिकारी) है, दस ध्वजाधारियों के बराबर एक वेश्या है, और दस वेश्याओं के बराबर एक राजा है।
श्लोक 26 (skanda.6.32.26)
दशसूनासहस्रेण तुल्यो राजप्रतिग्रहः । कस्तस्य प्रतिगृह्णाति लोभाढ्यो ब्राह्मणो यथा
daśasūnāsahasreṇa tulyo rājapratigrahaḥ | kastasya pratigṛhṇāti lobhāḍhyo brāhmaṇo yathā
इस प्रकार राजा से लिया गया दान दस हजार कसाइयों के पाप के बराबर होता है; लोभ से भरा हुआ ब्राह्मण ही उसे ग्रहण करता है, अन्य कौन करेगा?
श्लोक 27 (skanda.6.32.27)
रौरवादिषु सर्वेषु नरकेषु स पच्यते । तस्माद्गच्छ गृहे भूप स्वस्ति तेऽस्तु सदैव हि
rauravādiṣu sarveṣu narakeṣu sa pacyate | tasmādgaccha gṛhe bhūpa svasti te'stu sadaiva hi
ऐसा ब्राह्मण रौरव आदि समस्त नरकों में पकाया जाता है; इसलिए हे राजन्! आप अपने घर लौट जाइए, आपका सदा कल्याण हो।
श्लोक 28 (skanda.6.32.28)
वयमन्यत्र यास्यामो ग्रहीष्यामो न ते धनम्
vayamanyatra yāsyāmo grahīṣyāmo na te dhanam
हम अन्यत्र चले जाएँगे; आपका धन हम नहीं लेंगे।
श्लोक 29 (skanda.6.32.29)
सूत उवाच । एवमुक्त्वाथ ते सर्वे मुनयः शंसितव्रताः । परित्यज्य कुमारं तं मृतं तमपि भूमिपम् । चमत्कारपुरं क्षेत्रं समुद्दिश्य ततो ययुः
sūta uvāca | evamuktvātha te sarve munayaḥ śaṁsitavratāḥ | parityajya kumāraṁ taṁ mṛtaṁ tamapi bhūmipam | camatkārapuraṁ kṣetraṁ samuddiśya tato yayuḥ
सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर दृढ़व्रती वे सभी मुनि, उस मृत बालक को और उस राजा को भी छोड़कर, चमत्कारपुर क्षेत्र की ओर चल पड़े।
श्लोक 30 (skanda.6.32.30)
सोऽपि राजा ततस्तैस्तु भर्त्सितोऽतिरुषान्वितः । जिज्ञासार्थं ततस्तेषां चक्रे कर्म द्विजोत्तमाः
so'pi rājā tatastaistu bhartsito'tiruṣānvitaḥ | jijñāsārthaṁ tatasteṣāṁ cakre karma dvijottamāḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उनके द्वारा फटकारे जाने पर वह राजा भी अत्यंत क्रुद्ध हो उठा, और फिर उनकी परीक्षा लेने के लिए एक उपाय किया।
श्लोक 31 (skanda.6.32.31)
ततः सुवर्णपूर्णानि विधायोदुम्बराणि च । तेषां मार्गाग्रतो भूमौ समंतादथ चाक्षिपत्
tataḥ suvarṇapūrṇāni vidhāyodumbarāṇi ca | teṣāṁ mārgāgrato bhūmau samaṁtādatha cākṣipat
उसने सोने से भरे हुए गूलर के फल बनवाकर, उन्हें उनके मार्ग के आगे चारों ओर भूमि पर बिखेर दिया।
श्लोक 32 (skanda.6.32.32)
सूत उवाच । अथ ते मुनयो दृष्ट्वा पतितानि धरातले । उदुम्बराणि संदृष्ट्वा जगृहुः क्षुधयार्दिताः
sūta uvāca | atha te munayo dṛṣṭvā patitāni dharātale | udumbarāṇi saṁdṛṣṭvā jagṛhuḥ kṣudhayārditāḥ
सूत जी ने कहा -- तब भूख से पीड़ित उन मुनियों ने भूमि पर पड़े उन गूलर के फलों को देखकर उन्हें उठा लिया।
श्लोक 33 (skanda.6.32.33)
अथ तानि समालक्ष्य गुरूणि मुनिसत्तमाः । अत्रिरेकं परिस्फोट्य सुवर्णं वीक्ष्य चाब्रवीत्
atha tāni samālakṣya gurūṇi munisattamāḥ | atrirekaṁ parisphoṭya suvarṇaṁ vīkṣya cābravīt
उन फलों को असाधारण रूप से भारी देखकर, उन मुनि-श्रेष्ठों में से अत्रि ने एक फल को तोड़कर उसमें सोना देखा और यह कहा --
श्लोक 34 (skanda.6.32.34)
अत्रिः उवाच । नास्माकं मुनयोऽज्ञानं नास्माकं गृहबुद्धयः । हैमानिमान्विजानंतो ग्रहीष्याम उदुम्बरान्
atriḥ uvāca | nāsmākaṁ munayo'jñānaṁ nāsmākaṁ gṛhabuddhayaḥ | haimānimānvijānaṁto grahīṣyāma udumbarān
अत्रि ने कहा -- हमें, मुनियों को, न तो अज्ञान है और न गृहस्थों जैसी बुद्धि; क्या हम इन्हें सोने से भरा जानते हुए भी गूलर के फल समझकर ग्रहण कर लें?
श्लोक 35 (skanda.6.32.35)
तस्मादेतानि संत्यज्य हेमगर्भाणि दूरतः । उदुम्बराणि यास्यामः फलानि विगतस्पृहाः
tasmādetāni saṁtyajya hemagarbhāṇi dūrataḥ | udumbarāṇi yāsyāmaḥ phalāni vigataspṛhāḥ
इसलिए इन सोने से भरे फलों को दूर से ही त्याग कर, हम आकांक्षारहित होकर गूलर के [सामान्य] फलों की ओर चलें।
श्लोक 36 (skanda.6.32.36)
सार्वभौमो महीपाल एकोऽन्यश्च निरीहकः । सुभगस्तु तयोर्नित्यं भूयाद्भूयो निरीहकः
sārvabhaumo mahīpāla eko'nyaśca nirīhakaḥ | subhagastu tayornityaṁ bhūyādbhūyo nirīhakaḥ
एक ओर सार्वभौम सम्राट है और दूसरी ओर निःस्पृह पुरुष है; इन दोनों में सदा सुखी और श्रेयस्कर वही है जो अधिक निःस्पृह है।
श्लोक 37 (skanda.6.32.37)
धर्मार्थमपि विप्राणां संचयोऽर्थस्य गर्हितः । प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरम्
dharmārthamapi viprāṇāṁ saṁcayo'rthasya garhitaḥ | prakṣālanāddhi paṁkasya dūrādasparśanaṁ varam
ब्राह्मणों के लिए धर्म के निमित्त भी धन का संचय निंदित है; क्योंकि कीचड़ को धोने से बेहतर तो यही है कि उसे दूर से ही न छुआ जाए।
श्लोक 38 (skanda.6.32.38)
त्यजतः संचयान्सर्वान्यांति हानिमुपद्रवाः । न हि सर्वार्थवान्कश्चिद्दृश्यते निरुपद्रवः
tyajataḥ saṁcayānsarvānyāṁti hānimupadravāḥ | na hi sarvārthavānkaściddṛśyate nirupadravaḥ
जो सारे संचय को त्याग देता है, उससे सारे उपद्रव भी क्षीण हो जाते हैं; क्योंकि सब कुछ रखने वाला कोई भी उपद्रवरहित नहीं देखा जाता।
श्लोक 39 (skanda.6.32.39)
निर्धनत्वं तथा राज्यं तुलायां धारयेद्बुधः । अकिंचनत्वमधिकं जायते संमतिर्मम
nirdhanatvaṁ tathā rājyaṁ tulāyāṁ dhārayedbudhaḥ | akiṁcanatvamadhikaṁ jāyate saṁmatirmama
बुद्धिमान को निर्धनता और राज्य को तराजू में तौलकर देखना चाहिए; मेरा तो यही मत है कि निर्धनता ही श्रेष्ठतर है।
श्लोक 40 (skanda.6.32.40)
कश्यपः उवाच । अनर्थोऽयं मुने प्राप्तो यदर्थस्य परिग्रहः । अर्थैश्वर्यविमूढात्मा श्रेयसा मुच्यते हि सः
kaśyapaḥ uvāca | anartho'yaṁ mune prāpto yadarthasya parigrahaḥ | arthaiśvaryavimūḍhātmā śreyasā mucyate hi saḥ
कश्यप ने कहा -- हे मुनि! धन का ग्रहण करना ही सबसे बड़ा अनर्थ है; क्योंकि धन और ऐश्वर्य से मोहित मनुष्य कल्याण से वंचित हो जाता है।
श्लोक 41 (skanda.6.32.41)
अर्थसंपद्विमोहाय विमोहो नरकाय च । तस्मादर्थं प्रयत्नेन श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत्
arthasaṁpadvimohāya vimoho narakāya ca | tasmādarthaṁ prayatnena śreyo'rthī dūratastyajet
धन की सम्पत्ति मोह के लिए है, और मोह नरक के लिए; इसलिए कल्याण चाहने वाले को प्रयत्नपूर्वक धन को दूर से ही त्याग देना चाहिए।
श्लोक 42 (skanda.6.32.42)
योर्थेन साध्यते धर्मः क्षयिष्णुः स प्रकीर्तितः । यः पुनस्तपसा साध्यः स मोक्षायेति मे मतिः
yorthena sādhyate dharmaḥ kṣayiṣṇuḥ sa prakīrtitaḥ | yaḥ punastapasā sādhyaḥ sa mokṣāyeti me matiḥ
जो धर्म धन के द्वारा सिद्ध होता है, वह क्षयशील कहा गया है; परन्तु जो तप के द्वारा सिद्ध होता है, वही मोक्ष के लिए है -- यह मेरा मत है।
श्लोक 43 (skanda.6.32.43)
भरद्वाजः उवाच । जीर्यंति जीर्यतः केशा दंता जीर्यंति जीर्यतः । चक्षुः श्रोत्रे तथा पुंसस्तृष्णैका तरुणायते
bharadvājaḥ uvāca | jīryaṁti jīryataḥ keśā daṁtā jīryaṁti jīryataḥ | cakṣuḥ śrotre tathā puṁsastṛṣṇaikā taruṇāyate
भरद्वाज ने कहा -- वृद्ध होते मनुष्य के केश जीर्ण हो जाते हैं, दाँत जीर्ण हो जाते हैं, आँखें और कान भी जीर्ण हो जाते हैं, परन्तु उसकी तृष्णा अकेली ही सदा युवा बनी रहती है।
श्लोक 44 (skanda.6.32.44)
सूच्या सूत्रं यथा वस्त्रं संचारयति सूचिका । तद्वत्संसारसूत्रं च वांछयात्मा नयत्यसौ
sūcyā sūtraṁ yathā vastraṁ saṁcārayati sūcikā | tadvatsaṁsārasūtraṁ ca vāṁchayātmā nayatyasau
जैसे सुई धागे के द्वारा वस्त्र को आगे बढ़ाती है, वैसे ही यह आत्मा वासना के द्वारा संसार-सूत्र में आगे बढ़ता जाता है।
श्लोक 45 (skanda.6.32.45)
यथा शृंगं हि कायेन वर्द्धमानेन वर्धते । तद्वत्तृष्णापि वित्तेन वर्द्धमानेन वर्द्धते
yathā śṛṁgaṁ hi kāyena varddhamānena vardhate | tadvattṛṣṇāpi vittena varddhamānena varddhate
जैसे सींग शरीर के बढ़ने के साथ ही बढ़ता जाता है, वैसे ही तृष्णा भी धन के बढ़ने के साथ ही बढ़ती जाती है।
श्लोक 46 (skanda.6.32.46)
अनंतपारा दुष्पूरा तृष्णा दुःखशतावहा । अधर्मबहुला चैव तस्मात्तां परिवर्जयेत्
anaṁtapārā duṣpūrā tṛṣṇā duḥkhaśatāvahā | adharmabahulā caiva tasmāttāṁ parivarjayet
तृष्णा अनंत है, कभी न भरने वाली है, सैकड़ों दुःखों को लाने वाली है, और अधर्म से भरी है; इसलिए उसे त्याग ही देना चाहिए।
श्लोक 47 (skanda.6.32.47)
गौतमः उवाच । संतुष्टः केन चाल्योऽस्ति फलैरपि विवर्जितः । सर्वोपीन्द्रियलौल्येन संकटे भ्रमति द्विजाः
gautamaḥ uvāca | saṁtuṣṭaḥ kena cālyo'sti phalairapi vivarjitaḥ | sarvopīndriyalaulyena saṁkaṭe bhramati dvijāḥ
गौतम ने कहा -- हे ब्राह्मणो! संतुष्ट मनुष्य को फलों के अभाव में भी कौन विचलित कर सकता है? किन्तु सभी लोग इन्द्रियों की चंचलता के कारण ही संकट में भटकते रहते हैं।
श्लोक 48 (skanda.6.32.48)
सर्वत्र संपदस्तस्य संतुष्टं यस्य मानसम् । उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मास्तृतेव भूः
sarvatra saṁpadastasya saṁtuṣṭaṁ yasya mānasam | upānadgūḍhapādasya nanu carmāstṛteva bhūḥ
जिसका मन संतुष्ट है, उसके लिए सर्वत्र ही सम्पदा है; जैसे जूता पहने हुए पुरुष के लिए सारी पृथ्वी ही मानो चमड़े से आच्छादित हो जाती है।
श्लोक 49 (skanda.6.32.49)
संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शांतचेतसाम् । कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्
saṁtoṣāmṛtatṛptānāṁ yatsukhaṁ śāṁtacetasām | kutastaddhanalubdhānāmitaścetaśca dhāvatām
संतोष के अमृत से तृप्त, शांतचित्त लोगों को जो सुख मिलता है, वह धन के लोभ में इधर-उधर दौड़ते फिरने वालों को कहाँ मिल सकता है?
श्लोक 50 (skanda.6.32.50)
असंतोषः परं दुःखं संतोषः परमं सुखम् । सुखार्थी पुरुषस्तस्मात्संतुष्टः सततं भवेत्
asaṁtoṣaḥ paraṁ duḥkhaṁ saṁtoṣaḥ paramaṁ sukham | sukhārthī puruṣastasmātsaṁtuṣṭaḥ satataṁ bhavet
असंतोष ही परम दुःख है और संतोष ही परम सुख है; इसलिए सुख चाहने वाले पुरुष को सदा संतुष्ट रहना चाहिए।
श्लोक 51 (skanda.6.32.51)
विश्वामित्रः उवाच । कामं कामयमानस्य यदि कामः स सिध्यति । तथान्यो जायते पुंसस्तत्क्षणादेव कल्पितः
viśvāmitraḥ uvāca | kāmaṁ kāmayamānasya yadi kāmaḥ sa sidhyati | tathānyo jāyate puṁsastatkṣaṇādeva kalpitaḥ
विश्वामित्र ने कहा -- कामना करने वाले पुरुष की यदि एक कामना सिद्ध भी हो जाए, तो उसी क्षण उसकी कल्पना से दूसरी कामना उत्पन्न हो जाती है।
श्लोक 52 (skanda.6.32.52)
न जातु कामी कामानां सहस्रैरपि तुष्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव वांछा तस्य विवर्धते
na jātu kāmī kāmānāṁ sahasrairapi tuṣyati | haviṣā kṛṣṇavartmeva vāṁchā tasya vivardhate
कामी पुरुष सहस्रों कामनाओं की पूर्ति से भी कभी तृप्त नहीं होता; हवि से जैसे अग्नि, वैसे ही उसकी इच्छा और भी बढ़ती जाती है।
श्लोक 53 (skanda.6.32.53)
कामानभिलषन्मोहान्न नरः सुखमाप्नुयात् । श्येनालयतरुच्छायां व्रजन्निव कपिञ्जलः
kāmānabhilaṣanmohānna naraḥ sukhamāpnuyāt | śyenālayatarucchāyāṁ vrajanniva kapiñjalaḥ
मोहवश कामनाओं की इच्छा करने वाला मनुष्य सुख नहीं पाता, ठीक वैसे ही जैसे बटेर पक्षी बाज के घोंसले वाले वृक्ष की छाया में जाने पर सुख नहीं पाता।
श्लोक 54 (skanda.6.32.54)
नित्यं सागरपर्यन्तां यो भुङ्क्ते पृथिवीमिमाम् । तुल्याश्मकाश्चनश्चैव स कृतार्थो महीपतिः
nityaṁ sāgaraparyantāṁ yo bhuṅkte pṛthivīmimām | tulyāśmakāścanaścaiva sa kṛtārtho mahīpatiḥ
जो राजा पत्थर और सोने को समान समझते हुए सागर-पर्यंत इस पृथ्वी को सदा भोगता है, वही सच्चे अर्थ में कृतार्थ है।
श्लोक 55 (skanda.6.32.55)
जमदग्निः उवाच । योऽर्थं प्राप्याधमो विप्रः शोचितव्येपि हृष्यति । न च पश्यति मन्दात्मा नरकं चा कुतोभयः
jamadagniḥ uvāca | yo'rthaṁ prāpyādhamo vipraḥ śocitavyepi hṛṣyati | na ca paśyati mandātmā narakaṁ cā kutobhayaḥ
जमदग्नि ने कहा -- जो अधम ब्राह्मण धन पाकर शोक करने योग्य अवस्था में भी हर्षित होता है, वह मंदबुद्धि नरक को नहीं देखता और न ही आने वाले भय को।
श्लोक 56 (skanda.6.32.56)
प्रतिग्रहसमर्थानां निवृत्तानां प्रतिग्रहात् । य एव ददतां लोकास्त एवाप्रतिगृह्णताम्
pratigrahasamarthānāṁ nivṛttānāṁ pratigrahāt | ya eva dadatāṁ lokāsta evāpratigṛhṇatām
जो लोक दानशीलों को प्राप्त होते हैं, वे ही लोक -- दान लेने में समर्थ होते हुए भी दान न लेने वालों को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 57 (skanda.6.32.57)
अरुन्धती उवाच । बिसतंतुर्यथाऽनन्तो नालमासाद्य संस्थितः । तृष्णा चैवमनाद्यन्ता स्थिता देहे शरीरिणाम्
arundhatī uvāca | bisataṁturyathā'nanto nālamāsādya saṁsthitaḥ | tṛṣṇā caivamanādyantā sthitā dehe śarīriṇām
अरुन्धती ने कहा -- जैसे कमलनाल का सूत्र नाल के भीतर अंतहीन-सा फैला रहता है, वैसे ही तृष्णा भी बिना आदि-अंत के प्राणियों के शरीर में स्थित रहती है।
श्लोक 58 (skanda.6.32.58)
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः । याऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्
yā dustyajā durmatibhiryā na jīryati jīryataḥ | yā'sau prāṇāntiko rogastāṁ tṛṣṇāṁ tyajataḥ sukham
जो दुर्बुद्धियों के लिए त्यागनी कठिन है, जो शरीर के जीर्ण होने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती, जो प्राणांतक रोग के समान है -- ऐसी उस तृष्णा को त्याग देने में ही सुख है।
श्लोक 59 (skanda.6.32.59)
चण्डा उवाच । सर्पादिवद्धनाद्यस्माद्बिभ्यतीमे ममेश्वराः । यतस्ततो विशेषेण कस्मात्तस्माद्भयं मम
caṇḍā uvāca | sarpādivaddhanādyasmādbibhyatīme mameśvarāḥ | yatastato viśeṣeṇa kasmāttasmādbhayaṁ mama
चण्डा ने कहा -- जिस धन से मेरे स्वामी सर्प के समान डरते हैं, उसी कारण से मुझे भी उससे विशेष रूप से भय क्यों न हो?
श्लोक 60 (skanda.6.32.60)
पशुमुखः उवाच । यदाचरन्ति विद्वांसः सदा धर्मपरायणाः । तदेव विदुषा कार्यमात्मनो हितमिच्छता
paśumukhaḥ uvāca | yadācaranti vidvāṁsaḥ sadā dharmaparāyaṇāḥ | tadeva viduṣā kāryamātmano hitamicchatā
पशुमुख ने कहा -- सदा धर्मपरायण विद्वान लोग जो आचरण करते हैं, अपना हित चाहने वाले बुद्धिमान को वही आचरण करना चाहिए।
श्लोक 61 (skanda.6.32.61)
सूत उवाच । इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि त्यक्त्वा तानि फलानि च । ऋषयो जग्मुरन्यत्र सर्व एव दृढव्रताः
sūta uvāca | ityuktvā hemagarbhāṇi tyaktvā tāni phalāni ca | ṛṣayo jagmuranyatra sarva eva dṛḍhavratāḥ
सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर उन सोने से भरे फलों को त्यागकर, दृढ़व्रती वे सभी ऋषि अन्यत्र चल पड़े।
श्लोक 62 (skanda.6.32.62)
चमत्कारपुरेक्षेत्रे विविशुस्ते ततः परम् । ददृशुः सहसा प्राप्तं परिव्राजं शुनोमुखम्
camatkārapurekṣetre viviśuste tataḥ param | dadṛśuḥ sahasā prāptaṁ parivrājaṁ śunomukham
फिर वे चमत्कारपुर क्षेत्र में प्रविष्ट हुए, और वहाँ अचानक शुनोमुख नामक एक परिव्राजक (संन्यासी) को देखा।
श्लोक 63 (skanda.6.32.63)
तेनैव सहितास्तत्र गत्वा किञ्चिद्वनान्तरम् । दृष्टवन्तस्ततो हृद्यं सरः पंकजशोभितम्
tenaiva sahitāstatra gatvā kiñcidvanāntaram | dṛṣṭavantastato hṛdyaṁ saraḥ paṁkajaśobhitam
उसी के साथ मिलकर वे वन के भीतरी भाग में कुछ दूर गए, और वहाँ कमलों से सुशोभित एक मनोहर सरोवर देखा।
श्लोक 64 (skanda.6.32.64)
ततो बुभुक्षयाविष्टा बिसान्यादाय भूरिशः । तीरे निक्षिप्य सरसश्चक्रुः पुण्यां जल क्रियाम्
tato bubhukṣayāviṣṭā bisānyādāya bhūriśaḥ | tīre nikṣipya sarasaścakruḥ puṇyāṁ jala kriyām
तब भूख से व्याकुल होकर उन्होंने बहुत सारे कमलनाल लिए, उन्हें सरोवर के तट पर रखकर पवित्र जल-क्रिया (स्नान-संध्यादि) की।
श्लोक 65 (skanda.6.32.65)
अथोत्तीर्यजलात्सर्वे ते समेत्य परस्परम् । बिसानि तान्यपश्यन्त इदं वचनमब्रुवन्
athottīryajalātsarve te sametya parasparam | bisāni tānyapaśyanta idaṁ vacanamabruvan
फिर जल से बाहर निकलकर वे सब एक साथ मिले, किन्तु उन कमलनालों को न पाकर यह वचन बोले --
श्लोक 66 (skanda.6.32.66)
ऋषयः उवाच । केन क्षुधाभितप्तानामस्माकं निर्दयात्मना । मृणालानि समस्तानि स्थानादस्माद्धृतानि च
ṛṣayaḥ uvāca | kena kṣudhābhitaptānāmasmākaṁ nirdayātmanā | mṛṇālāni samastāni sthānādasmāddhṛtāni ca
ऋषियों ने कहा -- भूख से संतप्त हम लोगों के ये सारे कमलनाल किस निर्दय व्यक्ति ने इस स्थान से हर लिए हैं?
श्लोक 67 (skanda.6.32.67)
ते शंकमाना अन्योन्यमृषयः शंसितव्रताः । प्रचक्रुः शपथान्रौद्रानात्मनः प्रविशुद्धये
te śaṁkamānā anyonyamṛṣayaḥ śaṁsitavratāḥ | pracakruḥ śapathānraudrānātmanaḥ praviśuddhaye
एक-दूसरे पर संदेह करते हुए दृढ़व्रती उन ऋषियों ने अपनी शुद्धि सिद्ध करने के लिए भयंकर शपथें लीं।
श्लोक 68 (skanda.6.32.68)
कश्यपः उवाच । सर्वभक्षः सदा सोऽस्तु न्यासलोभं करोतु वा । कूटसाक्षित्वमभ्येतु बिसस्तैन्यं करोति यः
kaśyapaḥ uvāca | sarvabhakṣaḥ sadā so'stu nyāsalobhaṁ karotu vā | kūṭasākṣitvamabhyetu bisastainyaṁ karoti yaḥ
कश्यप ने कहा -- जिसने कमलनाल की चोरी की हो, वह सदा सर्वभक्षी बने, धरोहर का लोभ करे, तथा झूठी गवाही देने वाला हो।
श्लोक 69 (skanda.6.32.69)
धर्मं करोतु दंभेन राजानं चोपसेवताम् । मधुमांसं सदाश्नातु बिसस्तैन्यं करोति यः
dharmaṁ karotu daṁbhena rājānaṁ copasevatām | madhumāṁsaṁ sadāśnātu bisastainyaṁ karoti yaḥ
जिसने कमलनाल की चोरी की हो, वह ढोंग से धर्माचरण करे, राजा की सेवा में लगा रहे, और सदा मद्य-मांस का सेवन करता रहे।
श्लोक 70 (skanda.6.32.70)
वसिष्ठः उवाच । अनृतौ मैथुनं यातु दिवा वाप्यथ पर्वणि । अतिथिः स्यात्ततोऽन्योन्यं बिसस्तैन्यं करोति यः
vasiṣṭhaḥ uvāca | anṛtau maithunaṁ yātu divā vāpyatha parvaṇi | atithiḥ syāttato'nyonyaṁ bisastainyaṁ karoti yaḥ
वसिष्ठ ने कहा -- जिसने कमलनाल की चोरी की हो, वह अनृतुकाल में या दिन में, अथवा पर्व के दिनों में मैथुन करे, तथा दूसरों के यहाँ बार-बार अतिथि बनकर जाने वाला बने।
श्लोक 71 (skanda.6.32.71)
भरद्वाजः उवाच । योधिगम्य गुरोः शास्त्रं निष्क्रयं न प्रयच्छति । तस्यैनसा स युक्तोस्तु बिसस्तैन्यं करोति यः
bharadvājaḥ uvāca | yodhigamya guroḥ śāstraṁ niṣkrayaṁ na prayacchati | tasyainasā sa yuktostu bisastainyaṁ karoti yaḥ
भरद्वाज ने कहा -- जो गुरु से शास्त्र पढ़कर उसकी दक्षिणा नहीं देता, कमलनाल का चोर उसी के पाप से युक्त हो।
श्लोक 72 (skanda.6.32.72)
नृशंसोऽस्तु स सर्वत्र समृद्ध्या चाप्यहंकृतः । मत्सरी पिशुनश्चैव बिसस्तैन्यं करोति यः
nṛśaṁso'stu sa sarvatra samṛddhyā cāpyahaṁkṛtaḥ | matsarī piśunaścaiva bisastainyaṁ karoti yaḥ
कमलनाल का चोर सर्वत्र क्रूर बने, समृद्धि से अहंकारी हो, तथा ईर्ष्यालु और चुगलखोर बना रहे।
श्लोक 73 (skanda.6.32.73)
विश्वामित्रः उवाच । एकाकी मृष्टमश्नातु प्रशंस्यादथ चात्मनः । वेदविक्रयकर्तास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः
viśvāmitraḥ uvāca | ekākī mṛṣṭamaśnātu praśaṁsyādatha cātmanaḥ | vedavikrayakartāstu bisastainyaṁ karoti yaḥ
विश्वामित्र ने कहा -- कमलनाल का चोर अकेला ही स्वादिष्ट भोजन करे, अपनी ही प्रशंसा करे, और वेद को बेचने वाला बने।
श्लोक 74 (skanda.6.32.74)
जमदग्निः उवाच । कन्यां यच्छतु वृद्धाय स भूयाद्वृषली पतिः । अस्तु वार्धुषिको नित्यं बिसस्तैन्यं करोति यः
jamadagniḥ uvāca | kanyāṁ yacchatu vṛddhāya sa bhūyādvṛṣalī patiḥ | astu vārdhuṣiko nityaṁ bisastainyaṁ karoti yaḥ
जमदग्नि ने कहा -- कमलनाल का चोर अपनी कन्या किसी वृद्ध को दे, वह किसी शूद्र स्त्री का पति बने, और सदा सूदखोर बना रहे।
श्लोक 75 (skanda.6.32.75)
गौतमः उवाच । स गृह्णात्वविकादानं करोतु हयविक्रयम् । प्रकरोतु गुरोर्निंदां बिसस्तैन्यं करोति यः
gautamaḥ uvāca | sa gṛhṇātvavikādānaṁ karotu hayavikrayam | prakarotu gurorniṁdāṁ bisastainyaṁ karoti yaḥ
गौतम ने कहा -- कमलनाल का चोर बकरी-भेड़ का दान ग्रहण करे, घोड़ों का व्यापार करे, और अपने गुरु की निंदा करता रहे।
श्लोक 76 (skanda.6.32.76)
अत्रिः उवाच । मातरं पितरं नित्यं दुर्मतिः सोऽवमन्यताम् । शूद्रं पृच्छतु धर्मार्थं बिसस्तैन्यं करोति यः
atriḥ uvāca | mātaraṁ pitaraṁ nityaṁ durmatiḥ so'vamanyatām | śūdraṁ pṛcchatu dharmārthaṁ bisastainyaṁ karoti yaḥ
अत्रि ने कहा -- कमलनाल का चोर दुर्बुद्धि होकर सदा अपने माता-पिता का अनादर करे, तथा धर्म के विषय में किसी शूद्र से प्रश्न पूछता फिरे।
श्लोक 77 (skanda.6.32.77)
प्रतिश्रुत्य न यो दद्याद्ब्राह्मणाय गवादिकम् । तस्यैनसा स युज्येत बिसस्तैन्यं करोति यः
pratiśrutya na yo dadyādbrāhmaṇāya gavādikam | tasyainasā sa yujyeta bisastainyaṁ karoti yaḥ
जो प्रतिज्ञा करके भी ब्राह्मण को गौ आदि नहीं देता, कमलनाल का चोर उसी के पाप से युक्त हो।
श्लोक 78 (skanda.6.32.78)
अरुंधती उवाच । करोतु पत्युः पूर्वं सा भोजनं शयनं तथा । नारी दुष्टसमाचारा बिसस्तैन्यं करोति या
aruṁdhatī uvāca | karotu patyuḥ pūrvaṁ sā bhojanaṁ śayanaṁ tathā | nārī duṣṭasamācārā bisastainyaṁ karoti yā
अरुंधती ने कहा -- कमलनाल की चोरी करने वाली स्त्री अपने पति से पहले ही भोजन और शयन करे, तथा दुराचारिणी बने।
श्लोक 79 (skanda.6.32.79)
चण्डा उवाच । स्वामिनः प्रतिकूलास्तु धर्मद्वेषं करोतु च । साधुद्वेषपरा चैव बिसस्तैन्यं करोति या
caṇḍā uvāca | svāminaḥ pratikūlāstu dharmadveṣaṁ karotu ca | sādhudveṣaparā caiva bisastainyaṁ karoti yā
चण्डा ने कहा -- कमलनाल की चोरी करने वाली स्त्री अपने स्वामी के प्रतिकूल आचरण करे, धर्म से द्वेष करे, और सज्जनों से द्वेष करने वाली बने।
श्लोक 80 (skanda.6.32.80)
पशुमुखः उवाच । स्वामिद्रोहरतो नित्यं स भूयात्पापकृन्नरः । साधु द्वेषपरश्चैव बिसस्तैन्यं करोति यः
paśumukhaḥ uvāca | svāmidroharato nityaṁ sa bhūyātpāpakṛnnaraḥ | sādhu dveṣaparaścaiva bisastainyaṁ karoti yaḥ
पशुमुख ने कहा -- कमलनाल का चोर पापकर्मी होकर सदा अपने स्वामी के प्रति द्रोह में रत रहे, तथा सज्जनों से द्वेष करने वाला बने।
श्लोक 81 (skanda.6.32.81)
शुनोमुखः उवाच । वेदान्स पठतु न्यायाद्गृहस्थः स्यात्प्रियातिथिः । सत्यं वदतु चाजस्रं बिसस्तैन्यं करोति यः
śunomukhaḥ uvāca | vedānsa paṭhatu nyāyādgṛhasthaḥ syātpriyātithiḥ | satyaṁ vadatu cājasraṁ bisastainyaṁ karoti yaḥ
शुनोमुख ने कहा -- कमलनाल का चोर विधिपूर्वक वेदों का अध्ययन करे, अतिथिप्रिय गृहस्थ बने, और सदा सत्य ही बोले।
श्लोक 82 (skanda.6.32.82)
ऋषयः उवाच । इष्ट एव द्विजातीनां यस्त्वया शपथः कृतः । बिसस्तैन्यं हि चास्माकं तन्नूनं भवता कृतम्
ṛṣayaḥ uvāca | iṣṭa eva dvijātīnāṁ yastvayā śapathaḥ kṛtaḥ | bisastainyaṁ hi cāsmākaṁ tannūnaṁ bhavatā kṛtam
ऋषियों ने कहा -- आपने जो शपथ ली है, वह तो ब्राह्मणों के लिए वरदान ही है (शुभ कर्मों की कामना है); इससे निश्चय ही यह सिद्ध होता है कि कमलनाल की चोरी आपने ही की है।
श्लोक 83 (skanda.6.32.83)
शुनोमुखः उवाच । मया हृतानि सर्वेषां बिसानीमानि वो द्विजाः । धर्मान्वै श्रोतुकामेन मां जानीत पुरंदरम्
śunomukhaḥ uvāca | mayā hṛtāni sarveṣāṁ bisānīmāni vo dvijāḥ | dharmānvai śrotukāmena māṁ jānīta puraṁdaram
शुनोमुख ने कहा -- हे ब्राह्मणो! ये सारे कमलनाल मैंने ही हरे थे, धर्म सुनने की इच्छा से; मुझे तुम इन्द्र ही समझो।
श्लोक 84 (skanda.6.32.84)
युष्माकं परितुष्टोऽस्मि लोभाभावाद्द्विजोत्तमाः । तस्मात्स्वर्गं मया सार्द्धं शीघ्रमागम्यतामिति
yuṣmākaṁ parituṣṭo'smi lobhābhāvāddvijottamāḥ | tasmātsvargaṁ mayā sārddhaṁ śīghramāgamyatāmiti
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! तुम्हारी निर्लोभता से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ; इसलिए तुम मेरे साथ शीघ्र स्वर्ग को चलो।
श्लोक 85 (skanda.6.32.85)
ऋषयः उवाच । मोक्षमार्गं समासक्ता न वयं स्वर्गलिप्सवः । तस्मात्तपश्चरिष्यामः सरसीह विमुक्तये
ṛṣayaḥ uvāca | mokṣamārgaṁ samāsaktā na vayaṁ svargalipsavaḥ | tasmāttapaścariṣyāmaḥ sarasīha vimuktaye
ऋषियों ने कहा -- हम तो मोक्ष के मार्ग में आसक्त हैं, स्वर्ग की कामना करने वाले नहीं; इसलिए हम यहाँ इसी सरोवर के तट पर मुक्ति के लिए तप करेंगे,
श्लोक 86 (skanda.6.32.86)
पूर्णा सागरपर्यंतां चरित्वा पृथिवी मिमाम् । प्राणयात्रां प्रकुर्वाणा मृणालैर्मुनिसत्तमाः । तस्माद्गच्छ तव श्रेयो भूयादस्मात्समागमात्
pūrṇā sāgaraparyaṁtāṁ caritvā pṛthivī mimām | prāṇayātrāṁ prakurvāṇā mṛṇālairmunisattamāḥ | tasmādgaccha tava śreyo bhūyādasmātsamāgamāt
हे मुनिश्रेष्ठ! सागर-पर्यंत इस समूची पृथ्वी में विचरण करते हुए, कमलनालों से ही अपना जीवन-निर्वाह करते हुए [हम तप करेंगे]। इसलिए आप जाइए, आपके इस समागम से हमारा कल्याण ही हुआ है।
श्लोक 87 (skanda.6.32.87)
शक्रः उवाच । न वृथा दर्शनं मे स्यात्कदाचिदपि सुव्रताः । तस्माद्गृह्णीत यच्चित्ते सदाभीष्टं व्यवस्थितम्
śakraḥ uvāca | na vṛthā darśanaṁ me syātkadācidapi suvratāḥ | tasmādgṛhṇīta yaccitte sadābhīṣṭaṁ vyavasthitam
शक्र (इन्द्र) ने कहा -- हे सुव्रतो! मेरा दर्शन कभी व्यर्थ नहीं होता; इसलिए तुम्हारे मन में जो सदा से अभीष्ट रहा हो, वह माँग लो।
श्लोक 88 (skanda.6.32.88)
ऋषयः उवाच । आश्रमोऽयं सुविख्यातो भूयाच्छक्र महीतले । नाम्नास्माकं तथा नृणां सर्वपातकनाशनः
ṛṣayaḥ uvāca | āśramo'yaṁ suvikhyāto bhūyācchakra mahītale | nāmnāsmākaṁ tathā nṛṇāṁ sarvapātakanāśanaḥ
ऋषियों ने कहा -- हे शक्र! यह आश्रम पृथ्वी पर हमारे नाम से अत्यंत विख्यात हो, तथा मनुष्यों के समस्त पापों का नाशक बने।
श्लोक 89 (skanda.6.32.89)
वयं स्थास्यामहे नित्यमत्रैव सुरसत्तम । तपोऽर्थं भावितात्मानो यावन्मोक्षगतिर्ध्रुवा
vayaṁ sthāsyāmahe nityamatraiva surasattama | tapo'rthaṁ bhāvitātmāno yāvanmokṣagatirdhruvā
हे देवश्रेष्ठ! हम भावित-आत्मा होकर सदा यहीं तप के लिए स्थित रहेंगे, जब तक हमें निश्चित मोक्ष-गति प्राप्त न हो जाए।
श्लोक 90 (skanda.6.32.90)
इन्द्रः उवाच । त्रैलोक्येऽपि सुविख्यात आश्रमो वो भविष्यति । तथा कामप्रदश्चैव लोकानां संभविष्यति
indraḥ uvāca | trailokye'pi suvikhyāta āśramo vo bhaviṣyati | tathā kāmapradaścaiva lokānāṁ saṁbhaviṣyati
इन्द्र ने कहा -- तुम्हारा यह आश्रम तीनों लोकों में अत्यंत विख्यात होगा, तथा लोगों की सारी कामनाओं को पूर्ण करने वाला होगा।
श्लोक 91 (skanda.6.32.91)
यो यं काममभिध्याय श्राद्धमत्र करिष्यति । श्रावणे पौर्णमास्यां च स तं सर्वमवाप्स्यति
yo yaṁ kāmamabhidhyāya śrāddhamatra kariṣyati | śrāvaṇe paurṇamāsyāṁ ca sa taṁ sarvamavāpsyati
जो कोई श्रावण मास की पूर्णिमा को यहाँ किसी कामना का ध्यान करके श्राद्ध करेगा, वह उस सम्पूर्ण कामना को प्राप्त करेगा।
श्लोक 92 (skanda.6.32.92)
निष्कामो वा नरो यस्तु श्राद्धं दानमथापि वा । प्रकरिष्यति मोक्षं स समवाप्स्यत्यसंशयम्
niṣkāmo vā naro yastu śrāddhaṁ dānamathāpi vā | prakariṣyati mokṣaṁ sa samavāpsyatyasaṁśayam
और जो निष्काम मनुष्य यहाँ श्राद्ध या दान करेगा, वह निःसंदेह मोक्ष को प्राप्त करेगा।
श्लोक 93 (skanda.6.32.93)
ये चात्र देहं त्यक्ष्यंति युष्माकं चाश्रमे शुभे । अपि पापसमायुक्तास्ते यास्यंति परां गतिम्
ye cātra dehaṁ tyakṣyaṁti yuṣmākaṁ cāśrame śubhe | api pāpasamāyuktāste yāsyaṁti parāṁ gatim
जो लोग तुम्हारे इस शुभ आश्रम में अपना शरीर त्यागेंगे, वे पापयुक्त होते हुए भी परम गति को प्राप्त होंगे।
श्लोक 94 (skanda.6.32.94)
इंगुदैर्बदरैर्वापि बिल्वैर्भल्लातकैरपि । पितॄनुद्दिश्य यः श्राद्धं करिष्यति समाहितः
iṁgudairbadarairvāpi bilvairbhallātakairapi | pitṝnuddiśya yaḥ śrāddhaṁ kariṣyati samāhitaḥ
जो एकाग्रचित्त होकर इंगुद, बेर, बेल अथवा भल्लातक फलों से पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध करेगा --
श्लोक 95 (skanda.6.32.95)
स यास्यति परां सिद्धिं दुर्लभां त्रिदशैरपि । सर्वपापविनिर्मुक्तः स्तूयमानश्च किंनरैः
sa yāsyati parāṁ siddhiṁ durlabhāṁ tridaśairapi | sarvapāpavinirmuktaḥ stūyamānaśca kiṁnaraiḥ
-- वह देवताओं को भी दुर्लभ परम सिद्धि को प्राप्त करेगा, सभी पापों से मुक्त होकर, किन्नरों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ।
श्लोक 96 (skanda.6.32.96)
सूत उवाच । एवमुक्त्वा सहस्राक्षस्तैः सर्वैरभिनंदितः । जगामादर्शनं तेऽपि स्थितास्तत्र द्विजोत्तमाः
sūta uvāca | evamuktvā sahasrākṣastaiḥ sarvairabhinaṁditaḥ | jagāmādarśanaṁ te'pi sthitāstatra dvijottamāḥ
सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर सहस्राक्ष (इन्द्र) उन सबसे अभिनंदित होकर अंतर्धान हो गए, और वे श्रेष्ठ ब्राह्मण भी वहीं स्थित हो गए।
श्लोक 97 (skanda.6.32.97)
ततः काले गते तेऽपि कृत्वा तीव्रं महत्तपः । संप्राप्ताः परमं स्थानं जरामरणवर्जितम्
tataḥ kāle gate te'pi kṛtvā tīvraṁ mahattapaḥ | saṁprāptāḥ paramaṁ sthānaṁ jarāmaraṇavarjitam
फिर समय बीतने पर उन्होंने भी घोर एवं महान तप करके, जरा और मृत्यु से रहित परम स्थान को प्राप्त किया।
श्लोक 98 (skanda.6.32.98)
तैस्तत्र स्थापितं लिङ्गं देवदेवस्य शूलिनः । तस्य संदर्शनादेव नरः पापाद्विमुच्यते
taistatra sthāpitaṁ liṅgaṁ devadevasya śūlinaḥ | tasya saṁdarśanādeva naraḥ pāpādvimucyate
उन्होंने वहाँ त्रिशूलधारी देवदेव (शिव) का लिंग स्थापित किया; उसके दर्शनमात्र से ही मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 99 (skanda.6.32.99)
यस्तल्लिंगं पुनर्भक्त्या पुष्पधूपानुलेपनैः । अर्चयेत्स ध्रुवं मुक्तिं प्राप्नोति द्विजसत्तमाः
yastalliṁgaṁ punarbhaktyā puṣpadhūpānulepanaiḥ | arcayetsa dhruvaṁ muktiṁ prāpnoti dvijasattamāḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो पुष्प, धूप और अनुलेपन से भक्तिपूर्वक उस लिंग की पूजा करता है, वह निश्चय ही मुक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 100 (skanda.6.32.100)
एतत्पवित्र मायुष्यं सर्वपातकनाशनम् । सप्तर्षोणां समाख्यातमाश्रमस्यानुकीर्तनम्
etatpavitra māyuṣyaṁ sarvapātakanāśanam | saptarṣoṇāṁ samākhyātamāśramasyānukīrtanam
सप्तर्षियों के इस आश्रम का यह पवित्र, आयुवर्धक और समस्त पापों का नाश करने वाला वर्णन तुम्हें सुना दिया गया।