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नागर खण्ड · अध्याय 33

अगस्त्याश्रम माहात्म्य वर्णन

अध्याय 32अध्याय-सूचीअध्याय 34

श्लोक 1 (skanda.6.33.1)

सूत उवाच । अगस्त्यस्याश्रमोऽन्योस्ति तथा तत्र द्विजोत्तमाः । यत्र तिष्ठति विश्वात्मा स्वयं देवो महेश्वरः

sūta uvāca | agastyasyāśramo'nyosti tathā tatra dvijottamāḥ | yatra tiṣṭhati viśvātmā svayaṁ devo maheśvaraḥ

सूत जी ने कहा -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वहाँ अगस्त्य का एक और आश्रम है, जहाँ विश्वात्मा भगवान महेश्वर स्वयं निवास करते हैं।

श्लोक 2 (skanda.6.33.2)

शुक्लपक्षे चतुर्दश्यां चैत्रमासे दिवाकरः । स्वयमभ्येत्य देवेशं पूजयत्येव शंकरम्

śuklapakṣe caturdaśyāṁ caitramāse divākaraḥ | svayamabhyetya deveśaṁ pūjayatyeva śaṁkaram

चैत्र मास की शुक्ल चतुर्दशी को सूर्य स्वयं वहाँ आकर देवेश्वर शंकर की पूजा करते हैं।

श्लोक 3 (skanda.6.33.3)

तस्मादन्योऽपि यस्तस्यां भक्त्या चागत्य शंकरम् । तमेव पूजयेद्भक्त्या स याति देवमन्दिरम्

tasmādanyo'pi yastasyāṁ bhaktyā cāgatya śaṁkaram | tameva pūjayedbhaktyā sa yāti devamandiram

इसलिए जो कोई भी उस दिन भक्तिपूर्वक वहाँ आकर शंकर की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह देव-मंदिर (शिवलोक) को प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (skanda.6.33.4)

यस्तत्र कुरुते श्राद्धं सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः । पितरस्तस्य तृप्यंते पितृमेधे कृते यथा

yastatra kurute śrāddhaṁ samyakchraddhāsamanvitaḥ | pitarastasya tṛpyaṁte pitṛmedhe kṛte yathā

जो वहाँ श्रद्धापूर्वक भलीभाँति श्राद्ध करता है, उसके पितर उतने ही तृप्त होते हैं जितने पितृमेध यज्ञ करने से होते हैं।

श्लोक 5 (skanda.6.33.5)

ऋषयः उवाच । अगस्त्यस्याश्रमं प्राप्य कस्माद्देवो दिवाकरः । प्रदक्षिणां प्रकुरुते वदैतन्मे सुविस्तरम्

ṛṣayaḥ uvāca | agastyasyāśramaṁ prāpya kasmāddevo divākaraḥ | pradakṣiṇāṁ prakurute vadaitanme suvistaram

ऋषियों ने कहा -- सूर्यदेव अगस्त्य के आश्रम में जाकर उसकी प्रदक्षिणा क्यों करते हैं? यह हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 6 (skanda.6.33.6)

सूत उवाच । कथयामि कथामेतां शृणुत द्विज सत्तमाः । अस्ति विंध्य इति ख्यातः पर्वतः पृथिवीतले

sūta uvāca | kathayāmi kathāmetāṁ śṛṇuta dvija sattamāḥ | asti viṁdhya iti khyātaḥ parvataḥ pṛthivītale

सूत जी ने कहा -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! सुनो, मैं यह कथा कहता हूँ। पृथ्वी पर विन्ध्य नाम से विख्यात एक पर्वत है।

श्लोक 7 (skanda.6.33.7)

यस्य वृक्षाग्रशाखायां संलग्नास्तरणेः कराः । पुष्पपूगा इवाधःस्थैर्लक्ष्यंते मुग्धसि द्धकैः

yasya vṛkṣāgraśākhāyāṁ saṁlagnāstaraṇeḥ karāḥ | puṣpapūgā ivādhaḥsthairlakṣyaṁte mugdhasi ddhakaiḥ

जिसके वृक्षों की ऊँची शाखाओं में लगी हुई सूर्य की किरणें, नीचे खड़े भोले सिद्धों को मानो पुष्पों के गुच्छे-सी प्रतीत होती हैं।

श्लोक 8 (skanda.6.33.8)

अनभिज्ञास्तमिस्रस्य यस्य सानुनिवासिनः । रत्नप्रभाप्रणुन्नस्य कृष्णपक्षनिशास्वपि

anabhijñāstamisrasya yasya sānunivāsinaḥ | ratnaprabhāpraṇunnasya kṛṣṇapakṣaniśāsvapi

जिसके पर्वत-शिखरों पर बसे हुए लोग अंधकार से अनजान रहते हैं, क्योंकि वहाँ की रत्न-प्रभा से कृष्णपक्ष की रातों में भी अंधकार दूर हो जाता है।

श्लोक 9 (skanda.6.33.9)

यस्य सानुषु मुंचंतो भांति पुष्पाणि पादपाः । वायुवेगवशान्नूनं नीरौघ नीरदा इव

yasya sānuṣu muṁcaṁto bhāṁti puṣpāṇi pādapāḥ | vāyuvegavaśānnūnaṁ nīraugha nīradā iva

जिसके शिखरों पर पवन के वेग से पुष्प बिखेरते हुए वृक्ष, मानो जलधारा बरसाते बादलों के समान शोभा पाते हैं।

श्लोक 10 (skanda.6.33.10)

यस्मिन्नानामृगा भांति धावमाना इतस्ततः । कलत्रपुत्रपुष्ट्यर्थं लोभार्थं मानवा इव

yasminnānāmṛgā bhāṁti dhāvamānā itastataḥ | kalatraputrapuṣṭyarthaṁ lobhārthaṁ mānavā iva

जिस पर्वत पर इधर-उधर दौड़ते हुए भाँति-भाँति के मृग ऐसे शोभा पाते हैं, मानो पत्नी और पुत्रों के पालन-पोषण के लिए लोभवश दौड़ते हुए मनुष्य हों।

श्लोक 11 (skanda.6.33.11)

निर्यासच्छद्मना बाष्पं वासिताशेषदिङ्मुखम् । मुञ्चंति तरवो यत्र दन्तिदन्तक्षतत्वचः

niryāsacchadmanā bāṣpaṁ vāsitāśeṣadiṅmukham | muñcaṁti taravo yatra dantidantakṣatatvacaḥ

जिसके वृक्ष, हाथियों के दाँतों से जिनकी छाल छिल गई है, अपने राल के बहाने मानो आँसू बहाते हैं, जिनकी सुगंध से समस्त दिशाएँ सुवासित हो जाती हैं।

श्लोक 12 (skanda.6.33.12)

चीरिकाविरुतैर्दीर्घै रुदंत इव चापरे । हस्तिहस्तहता वृक्षा मन्यन्ते यस्य सानुषु

cīrikāvirutairdīrghai rudaṁta iva cāpare | hastihastahatā vṛkṣā manyante yasya sānuṣu

जिसके शिखरों पर हाथियों की सूँड़ों से आहत हुए अन्य वृक्ष, चिड़ियों की लम्बी बोलियों में मानो रोते हुए-से प्रतीत होते हैं।

श्लोक 13 (skanda.6.33.13)

इतश्चेतश्च गच्छद्भिर्निर्झरांभोभिरावृतः । शुशुभे सितवस्त्राढ्यैः पुमानिव विभूषितः

itaścetaśca gacchadbhirnirjharāṁbhobhirāvṛtaḥ | śuśubhe sitavastrāḍhyaiḥ pumāniva vibhūṣitaḥ

इधर-उधर बहते हुए झरनों के जल से घिरा हुआ वह पर्वत, श्वेत वस्त्रों से अलंकृत किसी पुरुष के समान शोभा पाता था।

श्लोक 14 (skanda.6.33.14)

यस्य स्पर्द्धा समुत्पन्ना पूर्वं सह सुमेरुणा । ततः प्राह सहस्रांशुं गत्वा स क्रोधमूर्च्छितः

yasya sparddhā samutpannā pūrvaṁ saha sumeruṇā | tataḥ prāha sahasrāṁśuṁ gatvā sa krodhamūrcchitaḥ

उस विन्ध्य पर्वत की सुमेरु के साथ पहले प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हुई थी; तब क्रोध से बेसुध होकर वह सूर्य के पास जाकर बोला --

श्लोक 15 (skanda.6.33.15)

कस्माद्भास्कर मेरोस्त्वं प्रकरोषि प्रदक्षिणाम् । कुलपर्वतसंज्ञेऽपि न करोषि कथं मयि

kasmādbhāskara merostvaṁ prakaroṣi pradakṣiṇām | kulaparvatasaṁjñe'pi na karoṣi kathaṁ mayi

"हे भास्कर! तुम मेरु की प्रदक्षिणा क्यों करते हो? मुझ कुलपर्वत की संज्ञा वाले की प्रदक्षिणा क्यों नहीं करते?"

श्लोक 16 (skanda.6.33.16)

भास्कर उवाच । न वयं श्रद्धया तस्य गिरेः कुर्मः प्रदक्षिणाम् । एष मे विहितः पन्था येनेदं विहितं जगत्

bhāskara uvāca | na vayaṁ śraddhayā tasya gireḥ kurmaḥ pradakṣiṇām | eṣa me vihitaḥ panthā yenedaṁ vihitaṁ jagat

भास्कर ने कहा -- हम श्रद्धावश उस पर्वत की प्रदक्षिणा नहीं करते; यह मार्ग तो मेरे लिए उसी ने नियत किया है, जिसने इस सारे जगत् की रचना की है।

श्लोक 17 (skanda.6.33.17)

तस्य तुंगानि शृंगाणि व्याप्य खं संश्रितानि च । तेन संजायते तस्य बलादेव प्रदक्षिणा

tasya tuṁgāni śṛṁgāṇi vyāpya khaṁ saṁśritāni ca | tena saṁjāyate tasya balādeva pradakṣiṇā

उसके ऊँचे शिखर आकाश को व्याप्त कर उसका आश्रय लिए हुए हैं; इसीलिए बलपूर्वक ही उसकी प्रदक्षिणा हो जाती है, न कि श्रद्धावश।

श्लोक 18 (skanda.6.33.18)

एतच्छ्रुत्वा विशेषेण संक्रुद्धो विंध्यपर्वतः । प्रोवाच पश्य भानो त्वं तर्हि तुंगत्वमद्य मे । रुरोधाथ नभोमार्गं येन गच्छति भास्करः

etacchrutvā viśeṣeṇa saṁkruddho viṁdhyaparvataḥ | provāca paśya bhāno tvaṁ tarhi tuṁgatvamadya me | rurodhātha nabhomārgaṁ yena gacchati bhāskaraḥ

यह सुनकर विन्ध्य पर्वत अत्यंत क्रुद्ध हो उठा और बोला -- "हे भानु! तो आज मेरी ही ऊँचाई देखो!" और उसने आकाश के उस मार्ग को ही रोक दिया, जिससे सूर्य चलता था।

श्लोक 19 (skanda.6.33.19)

अथ रुद्धं समालोक्य मार्गं वासरनायकः । चिन्तयामास चित्ते स्वे सांप्रतं किं करोम्यहम्

atha ruddhaṁ samālokya mārgaṁ vāsaranāyakaḥ | cintayāmāsa citte sve sāṁprataṁ kiṁ karomyaham

अपना मार्ग अवरुद्ध हुआ देखकर दिन के स्वामी सूर्य अपने मन में सोचने लगे -- अब मैं क्या करूँ?

श्लोक 20 (skanda.6.33.20)

करोमि यद्यहं चास्य पर्वतस्य प्रदक्षिणाम् । तद्भविष्यति कालस्य चलनं भुवनत्रये

karomi yadyahaṁ cāsya parvatasya pradakṣiṇām | tadbhaviṣyati kālasya calanaṁ bhuvanatraye

यदि मैं इस पर्वत की प्रदक्षिणा करने लग जाऊँ, तो इससे तीनों लोकों में समय की गति में ही विक्षोभ हो जाएगा।

श्लोक 21 (skanda.6.33.21)

मासर्तुभुवनानां च तथा भावी विपर्ययः । अग्निष्टोमादिकाः सर्वाः क्रिया यास्यंति संक्षयम् । नष्टयज्ञोत्सवे लोके देवानां स्यान्महाव्यथा

māsartubhuvanānāṁ ca tathā bhāvī viparyayaḥ | agniṣṭomādikāḥ sarvāḥ kriyā yāsyaṁti saṁkṣayam | naṣṭayajñotsave loke devānāṁ syānmahāvyathā

महीनों, ऋतुओं और लोकों में उलट-फेर हो जाएगा, अग्निष्टोम आदि सारी यज्ञ-क्रियाएँ नष्ट हो जाएँगी, और यज्ञोत्सव के लुप्त हो जाने से देवताओं को भी महान कष्ट होगा।

श्लोक 22 (skanda.6.33.22)

एवं संचिन्त्य चित्तेन बहुधा तीक्ष्णदीधितिः । जगाम मनसा भीतः सोऽगस्त्यं मुनिपुंगवम्

evaṁ saṁcintya cittena bahudhā tīkṣṇadīdhitiḥ | jagāma manasā bhītaḥ so'gastyaṁ munipuṁgavam

मन में इस प्रकार अनेक बार विचार करके, भयभीत होकर तेजस्वी सूर्य मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य के पास गया।

श्लोक 23 (skanda.6.33.23)

नान्योस्ति वारणे शक्तो विंधस्यास्य हि तं विना । अगस्त्यं ब्राह्मणश्रेष्ठं मित्रावरुणसंभवम्

nānyosti vāraṇe śakto viṁdhasyāsya hi taṁ vinā | agastyaṁ brāhmaṇaśreṣṭhaṁ mitrāvaruṇasaṁbhavam

क्योंकि इस विन्ध्य को रोकने में मित्रावरुण-पुत्र, श्रेष्ठ ब्राह्मण अगस्त्य के अतिरिक्त और कोई भी समर्थ नहीं था।

श्लोक 24 (skanda.6.33.24)

ततो द्विजमयं रूपं स कृत्वा तीक्ष्णदीधितिः । चमत्कारपुरक्षेत्रे तस्याश्रमपदं ययौ

tato dvijamayaṁ rūpaṁ sa kṛtvā tīkṣṇadīdhitiḥ | camatkārapurakṣetre tasyāśramapadaṁ yayau

तब तेजस्वी सूर्य ब्राह्मण का रूप धारण करके चमत्कारपुर क्षेत्र में उनके आश्रम को गया।

श्लोक 25 (skanda.6.33.25)

ततस्तु वैश्वदेवांते वेदोच्चारपरायणः । प्रोवाच सोऽतिथिः प्राप्तस्तवाहं मुनिसत्तम

tatastu vaiśvadevāṁte vedoccāraparāyaṇaḥ | provāca so'tithiḥ prāptastavāhaṁ munisattama

वैश्वदेव के अंत में, वेद-पाठ में तत्पर उन अगस्त्य से उसने कहा -- हे मुनिश्रेष्ठ! मैं आपके यहाँ अतिथि बनकर आया हूँ।

श्लोक 26 (skanda.6.33.26)

ततोऽगस्त्यः कृतानन्दः स्वागतं ते महामुने । मनोरथ इवाध्यातो योऽग्निकार्यांत आगतः

tato'gastyaḥ kṛtānandaḥ svāgataṁ te mahāmune | manoratha ivādhyāto yo'gnikāryāṁta āgataḥ

तब आनंदित हुए अगस्त्य बोले -- हे महामुने! तुम्हारा स्वागत है, तुम तो मानो मेरे मनोरथ के समान ही अग्निकार्य के अंत में आए हो।

श्लोक 27 (skanda.6.33.27)

तत्त्वं ब्रूहि मुनिश्रेष्ठ यद्ददामि तवेप्सितम् । अदेयं नास्ति मे किञ्चित्कालेऽस्मिन्प्रार्थितस्य च

tattvaṁ brūhi muniśreṣṭha yaddadāmi tavepsitam | adeyaṁ nāsti me kiñcitkāle'sminprārthitasya ca

"हे मुनिश्रेष्ठ! तुम बताओ, मैं तुम्हें क्या दूँ जो तुम्हें अभीष्ट हो; इस समय माँगी गई किसी भी वस्तु को देने में मुझे कोई अशक्यता नहीं है।"

श्लोक 28 (skanda.6.33.28)

भास्कर उवाच । अहं भास्कर आयातो विप्ररूपेण सन्मुने । सर्वकार्यक्षमं मत्वा त्वामेकं भुवनत्रये

bhāskara uvāca | ahaṁ bhāskara āyāto viprarūpeṇa sanmune | sarvakāryakṣamaṁ matvā tvāmekaṁ bhuvanatraye

भास्कर ने कहा -- हे सन्मुने! मैं भास्कर (सूर्य) हूँ, जो ब्राह्मण-रूप धारण कर आया हूँ, यह जानकर कि तीनों लोकों में केवल आप ही समस्त कार्यों को पूर्ण करने में समर्थ हैं।

श्लोक 29 (skanda.6.33.29)

त्वया पूर्वं सुरार्थाय प्रपीतः पयसांनिधिः । वातापिश्च तथा दैत्यो भक्षितो द्विजकण्टकः

tvayā pūrvaṁ surārthāya prapītaḥ payasāṁnidhiḥ | vātāpiśca tathā daityo bhakṣito dvijakaṇṭakaḥ

आपने ही पहले देवताओं के हित के लिए समुद्र को पी लिया था, और ब्राह्मणों के लिए कंटकस्वरूप वातापि नामक दैत्य को भी खा लिया था।

श्लोक 30 (skanda.6.33.30)

तस्माद्गतिर्भवास्माकं सांप्रतं मुनिसत्तम । देवानामिह वर्णानां त्वमेव शरणं यतः

tasmādgatirbhavāsmākaṁ sāṁprataṁ munisattama | devānāmiha varṇānāṁ tvameva śaraṇaṁ yataḥ

इसलिए हे मुनिश्रेष्ठ! अभी आप ही हमारी गति हैं, क्योंकि देवताओं और मनुष्यों -- सभी वर्णों के लिए यहाँ आप ही एकमात्र शरण हैं।

श्लोक 31 (skanda.6.33.31)

सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा स मुनिर्विप्रा विशेषेण प्रहर्षितः । अर्घ्यं दत्त्वा दिनेशाय ततः प्रोवाच सादरम्

sūta uvāca | tacchrutvā sa munirviprā viśeṣeṇa praharṣitaḥ | arghyaṁ dattvā dineśāya tataḥ provāca sādaram

सूत जी ने कहा -- यह सुनकर वे मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए, और सूर्यदेव को अर्घ्य देकर आदरपूर्वक कहने लगे --

श्लोक 32 (skanda.6.33.32)

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोस्मि यन्मे त्वं गृहमागतः । तस्माद्ब्रूहि करिष्यामि तव वाक्यमखंडितम्

dhanyo'smyanugṛhītosmi yanme tvaṁ gṛhamāgataḥ | tasmādbrūhi kariṣyāmi tava vākyamakhaṁḍitam

"मैं धन्य हूँ, मुझ पर अनुग्रह हुआ है कि तुम मेरे घर आए हो; इसलिए कहो, मैं तुम्हारी बात को अवश्य पूरा करूँगा।"

श्लोक 33 (skanda.6.33.33)

भास्कर उवाच । एष विंध्याचलोऽस्माकं मार्गमावृत्य संस्थितः । स्पर्द्धया गिरिमुख्यस्य सुमेरोर्मुनिसतम

bhāskara uvāca | eṣa viṁdhyācalo'smākaṁ mārgamāvṛtya saṁsthitaḥ | sparddhayā girimukhyasya sumerormunisatama

भास्कर ने कहा -- हे मुनिश्रेष्ठ! यह विन्ध्याचल पर्वतों के प्रमुख सुमेरु के साथ स्पर्धा करके हमारे मार्ग को रोककर खड़ा है।

श्लोक 34 (skanda.6.33.34)

सामाद्यैर्विविधोपायैस्तस्मादेनं निवारय । कालात्ययो यथा न स्याद्गतेर्भंगस्तथा कुरु

sāmādyairvividhopāyaistasmādenaṁ nivāraya | kālātyayo yathā na syādgaterbhaṁgastathā kuru

इसलिए साम आदि विभिन्न उपायों से इसे रोकिए, और ऐसा कीजिए कि मेरी गति में कोई विघ्न न हो, जिससे समय का अतिक्रमण न हो।

श्लोक 35 (skanda.6.33.35)

अगस्त्य उवाच । अहं ते वारयिष्यामि वर्धमानं कुलाचलम् । स्वस्थानं गच्छ तस्मात्त्वं सुखीभव दिवाकर

agastya uvāca | ahaṁ te vārayiṣyāmi vardhamānaṁ kulācalam | svasthānaṁ gaccha tasmāttvaṁ sukhībhava divākara

अगस्त्य ने कहा -- मैं इस बढ़ते हुए कुलपर्वत को रोक दूँगा; इसलिए हे दिवाकर! तुम अपने स्थान को जाओ और सुखी रहो।

श्लोक 36 (skanda.6.33.36)

सूत उवाच । ततः स प्रेषितस्तेन भास्करस्तीक्ष्णदीधितिः । स्वं स्थानं प्रययौ हृष्टस्तमामंत्र्य मुनीश्वरम्

sūta uvāca | tataḥ sa preṣitastena bhāskarastīkṣṇadīdhitiḥ | svaṁ sthānaṁ prayayau hṛṣṭastamāmaṁtrya munīśvaram

सूत जी ने कहा -- तब उनके द्वारा विदा किए जाने पर तेजस्वी सूर्य उन मुनीश्वर से आज्ञा लेकर प्रसन्न होकर अपने स्थान को चला गया।

श्लोक 37 (skanda.6.33.37)

अगस्त्योऽपि द्रुतं गत्वा विंध्यं प्रोवाच सादरम् । न्यूनतां व्रज मद्वाक्याच्छीघ्रं पर्वतसत्तम

agastyo'pi drutaṁ gatvā viṁdhyaṁ provāca sādaram | nyūnatāṁ vraja madvākyācchīghraṁ parvatasattama

अगस्त्य भी शीघ्र जाकर विन्ध्य से आदरपूर्वक बोले -- हे पर्वतश्रेष्ठ! मेरे वचन से तुम शीघ्र नीचे हो जाओ।

श्लोक 38 (skanda.6.33.38)

दाक्षिणात्येषु तीर्थेषु स्नाने जाताद्य मे मतिः । तवायत्ता गिरे सैव तत्कुरुष्व यथोचितम्

dākṣiṇātyeṣu tīrtheṣu snāne jātādya me matiḥ | tavāyattā gire saiva tatkuruṣva yathocitam

मेरी इच्छा आज दक्षिण के तीर्थों में स्नान करने की हुई है; हे गिरिवर! वह तुम्हारे ही अधीन है, इसलिए जैसा उचित हो वैसा करो।

श्लोक 39 (skanda.6.33.39)

सूत उवाच । स तस्य वचनं श्रुत्वा विंध्यः पर्वतसत्तमः । अभजन्निम्नतां सद्यो विनयेन समन्वितः

sūta uvāca | sa tasya vacanaṁ śrutvā viṁdhyaḥ parvatasattamaḥ | abhajannimnatāṁ sadyo vinayena samanvitaḥ

सूत जी ने कहा -- उनका वचन सुनकर पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य ने विनयपूर्वक तुरंत ही अपनी ऊँचाई कम कर दी।

श्लोक 40 (skanda.6.33.40)

अगस्त्योऽपि समासाद्य तस्यांतं दक्षिणं द्विजाः । त्वयैवं संस्थितेनाथ स्थातव्यमित्युवाच तम्

agastyo'pi samāsādya tasyāṁtaṁ dakṣiṇaṁ dvijāḥ | tvayaivaṁ saṁsthitenātha sthātavyamityuvāca tam

हे ब्राह्मणो! अगस्त्य ने उसके दक्षिणी छोर तक पहुँचकर उससे कहा -- तुम्हें इसी प्रकार स्थित रहना है,

श्लोक 41 (skanda.6.33.41)

यावदागमनं मह्यं नात्र कार्या विचारणा । नो चेच्छापं प्रदास्यामि येन संयास्यसि क्षयम्

yāvadāgamanaṁ mahyaṁ nātra kāryā vicāraṇā | no cecchāpaṁ pradāsyāmi yena saṁyāsyasi kṣayam

जब तक मैं फिर न लौटूँ; इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है। अन्यथा मैं तुम्हें ऐसा शाप दे दूँगा जिससे तुम नष्ट ही हो जाओगे।

श्लोक 42 (skanda.6.33.42)

स तथेति प्रतिज्ञाय शापाद्भीतो नगोत्तमः । न जगाम पुनर्वृद्धिं तस्यागमनवांछया

sa tatheti pratijñāya śāpādbhīto nagottamaḥ | na jagāma punarvṛddhiṁ tasyāgamanavāṁchayā

"ऐसा ही होगा" कहकर, शाप के भय से वह पर्वतश्रेष्ठ फिर कभी नहीं बढ़ा, सदा उनके पुनरागमन की प्रतीक्षा में रहा।

श्लोक 43 (skanda.6.33.43)

सोऽपि तेनैवमार्गेण निवृत्तिं न करोति च । यावदद्यापि विप्रेंद्रा दक्षिणां दिशमाश्रितः

so'pi tenaivamārgeṇa nivṛttiṁ na karoti ca | yāvadadyāpi vipreṁdrā dakṣiṇāṁ diśamāśritaḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अगस्त्य भी इसी कारण उस मार्ग से लौटते नहीं, इसलिए आज तक वे दक्षिण दिशा में ही निवास करते हैं।

श्लोक 44 (skanda.6.33.44)

अथ तत्रैव चानीय लोपामुद्रां मुनीश्वरः । समाहूय सहस्रांशुं ततः प्रोवाच सादरम्

atha tatraiva cānīya lopāmudrāṁ munīśvaraḥ | samāhūya sahasrāṁśuṁ tataḥ provāca sādaram

तब उन मुनीश्वर ने लोपामुद्रा को वहीं ले जाकर, सूर्यदेव को बुलाकर, आदरपूर्वक कहा --

श्लोक 45 (skanda.6.33.45)

तव वाक्यान्मया त्यक्तः स्वाश्रमस्तीक्ष्णदीधिते । तवार्थे च न गंतव्यं भूयस्तत्र कथंचन

tava vākyānmayā tyaktaḥ svāśramastīkṣṇadīdhite | tavārthe ca na gaṁtavyaṁ bhūyastatra kathaṁcana

हे तीक्ष्णदीधिते (सूर्य)! तुम्हारे ही वचन से मैंने अपना आश्रम त्याग दिया है, और तुम्हारे ही कारण अब मैं फिर वहाँ लौट भी नहीं सकता।

श्लोक 46 (skanda.6.33.46)

तस्मान्मद्वचनाद्भानो चतुर्दश्यां मधौ सिते । यन्मया स्थापितं तत्र लिंगं पूज्यं हि तत्त्वया

tasmānmadvacanādbhāno caturdaśyāṁ madhau site | yanmayā sthāpitaṁ tatra liṁgaṁ pūjyaṁ hi tattvayā

इसलिए हे भानु! मेरे वचन से तुम्हें चैत्र मास की शुक्ल चतुर्दशी को उस लिंग की पूजा करनी होगी, जिसे मैंने वहाँ स्थापित किया है।

श्लोक 47 (skanda.6.33.47)

भास्कर उवाच । एवं मुने करिष्यामि तव वाक्यादसंशयम् । पूजयिष्यामि तल्लिंगं वर्षांते स्वयमेव हि

bhāskara uvāca | evaṁ mune kariṣyāmi tava vākyādasaṁśayam | pūjayiṣyāmi talliṁgaṁ varṣāṁte svayameva hi

भास्कर ने कहा -- हे मुने! ऐसा ही होगा, आपके वचन से मैं इसमें कोई संशय नहीं रखूँगा; प्रत्येक वर्ष के अंत में मैं स्वयं उस लिंग की पूजा करूँगा।

श्लोक 48 (skanda.6.33.48)

योऽन्यो हि तद्दिने लिंगं पूजयिष्यति मानवः । मम लोकं समासाद्य स भविष्यति मुक्तिभाक्

yo'nyo hi taddine liṁgaṁ pūjayiṣyati mānavaḥ | mama lokaṁ samāsādya sa bhaviṣyati muktibhāk

जो भी अन्य मनुष्य उस दिन उस लिंग की पूजा करेगा, वह मेरे ही लोक को प्राप्त कर मुक्ति का भागी बनेगा।

श्लोक 49 (skanda.6.33.49)

सूत उवाच । एतस्मात्कारणात्तत्र भगवांस्तीक्ष्णदीधितिः । चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां सांनिध्यं कुरुते सदा

sūta uvāca | etasmātkāraṇāttatra bhagavāṁstīkṣṇadīdhitiḥ | caitraśuklacaturdaśyāṁ sāṁnidhyaṁ kurute sadā

सूत जी ने कहा -- इसी कारण से भगवान सूर्यदेव वहाँ चैत्र मास की शुक्ल चतुर्दशी को सदा अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं।

श्लोक 50 (skanda.6.33.50)

एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोस्मि द्विजोत्तमाः । भूयो वदत वै कश्चित्संदेहश्चे द्धृदि स्थितः

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭosmi dvijottamāḥ | bhūyo vadata vai kaścitsaṁdehaśce ddhṛdi sthitaḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो कुछ तुमने पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया है; यदि तुम्हारे हृदय में कोई और संदेह हो, तो फिर पूछो।

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