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नागर खण्ड · अध्याय 34

देवासुरसंग्राम वर्णन

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

श्लोक 1 (skanda.6.34.1)

ऋषयः उवाच । यदेतद्भवता प्रोक्तं तं मुनिं प्रति सूतज । त्वया पुरा सुरार्थाय प्रपीतः पयसांनिधिः

ṛṣayaḥ uvāca | yadetadbhavatā proktaṁ taṁ muniṁ prati sūtaja | tvayā purā surārthāya prapītaḥ payasāṁnidhiḥ

ऋषियों ने कहा -- हे सूतपुत्र! आपने उस मुनि के विषय में जो यह कहा था कि आपने पहले देवताओं के हित के लिए समुद्र को पी लिया था --

श्लोक 2 (skanda.6.34.2)

तत्त्वं सूतज नो ब्रूहि विस्तरेण महामते । यथा तेन पुरा पीतो मुनिना पयसांनिधिः

tattvaṁ sūtaja no brūhi vistareṇa mahāmate | yathā tena purā pīto muninā payasāṁnidhiḥ

हे महामते सूतपुत्र! वह हमें विस्तार से बताइए कि उन मुनि ने पहले किस प्रकार समुद्र को पिया था।

श्लोक 3 (skanda.6.34.3)

सूत उवाच । कालेया इति विख्याताः पुरा दानवसत्तमाः । संभूताः सर्वदेवानां वीर्योत्साहप्रणाशकाः

sūta uvāca | kāleyā iti vikhyātāḥ purā dānavasattamāḥ | saṁbhūtāḥ sarvadevānāṁ vīryotsāhapraṇāśakāḥ

सूत जी ने कहा -- पूर्वकाल में कालेय नाम से विख्यात श्रेष्ठ दानव उत्पन्न हुए, जो समस्त देवताओं के बल और उत्साह का नाश करने वाले थे।

श्लोक 4 (skanda.6.34.4)

ततस्तैः पीडितं दृष्ट्वा विष्णुना प्रभविष्णुना । त्रैलोक्यं शक्तियोगेन प्रोक्तो देवो महेश्वरः

tatastaiḥ pīḍitaṁ dṛṣṭvā viṣṇunā prabhaviṣṇunā | trailokyaṁ śaktiyogena prokto devo maheśvaraḥ

तब उनके द्वारा पीड़ित तीनों लोकों को देखकर, प्रभावशाली विष्णु ने योग-शक्ति के द्वारा भगवान महेश्वर से यह कहा --

श्लोक 5 (skanda.6.34.5)

एतदीशान दैतेयैस्त्रैलोक्यं परिपीडितम् । कालिकेयैर्महावीर्येस्तस्मात्कार्यो महाहवः । अद्यैव तैः समं देव समासाद्य धरातलम्

etadīśāna daiteyaistrailokyaṁ paripīḍitam | kālikeyairmahāvīryestasmātkāryo mahāhavaḥ | adyaiva taiḥ samaṁ deva samāsādya dharātalam

"हे ईशान! ये तीनों लोक महावीर्यशाली कालिकेय दैत्यों द्वारा पूर्णतः पीड़ित हो चुके हैं; इसलिए हे देव! आज ही पृथ्वीतल पर जाकर उनके साथ महासंग्राम करना चाहिए।"

श्लोक 6 (skanda.6.34.6)

ततो विष्णुश्च रुद्रश्च सहस्राक्षः सुरैः सह । शितशस्त्रधराः सर्वे संप्राप्ता धरणीतलम्

tato viṣṇuśca rudraśca sahasrākṣaḥ suraiḥ saha | śitaśastradharāḥ sarve saṁprāptā dharaṇītalam

तब विष्णु, रुद्र और सहस्राक्ष इन्द्र, देवताओं के साथ, सभी तीक्ष्ण शस्त्र धारण किए हुए पृथ्वीतल पर आ पहुँचे।

श्लोक 7 (skanda.6.34.7)

अथ ते दानवाः सर्वे श्रुत्वा देवान्समागतान् । युद्धार्थं सहसा जग्मुः संमुखाः कोपसंयुताः

atha te dānavāḥ sarve śrutvā devānsamāgatān | yuddhārthaṁ sahasā jagmuḥ saṁmukhāḥ kopasaṁyutāḥ

तब देवताओं के आने की बात सुनकर वे सारे दानव क्रोध से भरकर युद्ध के लिए तुरंत उनके सामने आ गए।

श्लोक 8 (skanda.6.34.8)

ततोऽभवन्महायुद्धं देवानां दानवैः सह । त्रैलोक्यं कंपितं येन समस्तं भयविह्वलम्

tato'bhavanmahāyuddhaṁ devānāṁ dānavaiḥ saha | trailokyaṁ kaṁpitaṁ yena samastaṁ bhayavihvalam

तब देवताओं और दानवों के बीच ऐसा महायुद्ध हुआ, जिससे सारे तीनों लोक काँप उठे और भय से व्याकुल हो गए।

श्लोक 9 (skanda.6.34.9)

अथ कालप्रभोनाम दानवो बलगर्वितः । स शक्रं पुरतो दृष्ट्वा वज्रोच्छ्रितकरं स्थितम् । प्रोवाच प्रहसन्वाक्यं मेघगम्भीरनिःस्वनः

atha kālaprabhonāma dānavo balagarvitaḥ | sa śakraṁ purato dṛṣṭvā vajrocchritakaraṁ sthitam | provāca prahasanvākyaṁ meghagambhīraniḥsvanaḥ

तब बल के अहंकार से भरा कालप्रभ नामक दानव, इन्द्र को अपने सामने वज्र उठाए खड़ा देखकर, मेघ के समान गम्भीर स्वर में हँसते हुए बोला --

श्लोक 10 (skanda.6.34.10)

मुंच वज्र सहस्राक्ष पश्यामि तव पौरुषम् । चिरात्प्राप्तोऽसि मे दृष्टिं दिष्ट्या त्वं त्रिदिवेश्वरः

muṁca vajra sahasrākṣa paśyāmi tava pauruṣam | cirātprāpto'si me dṛṣṭiṁ diṣṭyā tvaṁ tridiveśvaraḥ

"हे सहस्राक्ष! वज्र चला, मैं तेरा पौरुष देखूँ। हे त्रिदिवेश्वर! बड़े सौभाग्य से आज तू मेरी दृष्टि के सामने आया है, बहुत समय बाद।"

श्लोक 11 (skanda.6.34.11)

ततश्चिक्षेप संक्रुद्धस्तस्य वज्रं शतक्रतुः । सोऽपि तल्लीलया धृत्वा जगृहे सव्यपाणिना

tataścikṣepa saṁkruddhastasya vajraṁ śatakratuḥ | so'pi tallīlayā dhṛtvā jagṛhe savyapāṇinā

तब क्रोध से भरे शतक्रतु (इन्द्र) ने उस पर वज्र चलाया, और उसने भी सहज ही उसे बाएँ हाथ से पकड़ लिया।

श्लोक 12 (skanda.6.34.12)

ततः शक्रं समुद्दिश्य गदां गुर्वीं मुमोच सः । सर्वायसमयीं रौद्रां यमजिह्वामिवापराम्

tataḥ śakraṁ samuddiśya gadāṁ gurvīṁ mumoca saḥ | sarvāyasamayīṁ raudrāṁ yamajihvāmivāparām

फिर उसने इन्द्र की ओर लक्ष्य करके सम्पूर्ण लोहे की बनी हुई एक भारी और भयंकर गदा चलाई, जो मानो यम की दूसरी जिह्वा थी।

श्लोक 13 (skanda.6.34.13)

तया हतः सहस्राक्षो विसंज्ञो रुधिरप्लुतः । ध्वजयष्टिं समाश्रित्य संनिविष्टो रथोपरि

tayā hataḥ sahasrākṣo visaṁjño rudhiraplutaḥ | dhvajayaṣṭiṁ samāśritya saṁniviṣṭo rathopari

उससे आहत होकर सहस्राक्ष इन्द्र चेतनाशून्य हो गए, रक्त से लथपथ हो गए, और अपने रथ की ध्वज-दंड का सहारा लेकर रथ में ही बैठ गए।

श्लोक 14 (skanda.6.34.14)

अथ तं मातलिर्दृष्ट्वा विसंज्ञं वलघातिनम् । प्राङ्मुखं च रथं चक्रे संस्मरन्सारथेर्नयम्

atha taṁ mātalirdṛṣṭvā visaṁjñaṁ valaghātinam | prāṅmukhaṁ ca rathaṁ cakre saṁsmaransārathernayam

उस वृत्रघाती इन्द्र को चेतनाशून्य देखकर, सारथी-नीति का स्मरण करते हुए मातलि ने रथ को (युद्धभूमि से) आगे-मुख कर दिया।

श्लोक 15 (skanda.6.34.15)

ततः पराङ्मुखीभूते रथे शक्रस्य संगरे । दुद्रुवुर्भयसंत्रस्ताः सर्वे देवाः समंततः

tataḥ parāṅmukhībhūte rathe śakrasya saṁgare | dudruvurbhayasaṁtrastāḥ sarve devāḥ samaṁtataḥ

फिर युद्ध में इन्द्र का रथ पीछे मुड़ते ही, भय से त्रस्त होकर सभी देवता चारों ओर भाग खड़े हुए।

श्लोक 16 (skanda.6.34.16)

आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः । व्रीडां विहाय विध्वस्ताः पृष्ठदेशे शितैः शरैः

ādityā vasavo rudrā viśvedevā marudgaṇāḥ | vrīḍāṁ vihāya vidhvastāḥ pṛṣṭhadeśe śitaiḥ śaraiḥ

आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव और मरुद्गण -- सब लज्जा को छोड़कर तीक्ष्ण बाणों से पीठ पर घायल होकर भाग गए।

श्लोक 17 (skanda.6.34.17)

अथ भग्नं बलं दृष्ट्वा दानवैर्मधुसूदनः । आरुह्य गरुडं तूर्णं कालप्रभमुपाद्रवत्

atha bhagnaṁ balaṁ dṛṣṭvā dānavairmadhusūdanaḥ | āruhya garuḍaṁ tūrṇaṁ kālaprabhamupādravat

दानवों द्वारा सेना को भग्न होते देख मधुसूदन (विष्णु) गरुड़ पर आरूढ़ होकर तुरंत कालप्रभ की ओर झपटे।

श्लोक 18 (skanda.6.34.18)

ततस्ते दानवाः सर्वे परिवार्य शितैः शरैः । सम्यगाच्छादयामासुर्गर्जमाना मुहुर्मुहुः

tataste dānavāḥ sarve parivārya śitaiḥ śaraiḥ | samyagācchādayāmāsurgarjamānā muhurmuhuḥ

तब वे सारे दानव उन्हें चारों ओर से घेरकर, बार-बार गरजते हुए, तीक्ष्ण बाणों से पूरी तरह ढक देने लगे।

श्लोक 19 (skanda.6.34.19)

स तैराच्छादितो विष्णुः शुशुभे च समंततः । सम्यक्पुलकितांगश्च रक्ताचल इवापरः

sa tairācchādito viṣṇuḥ śuśubhe ca samaṁtataḥ | samyakpulakitāṁgaśca raktācala ivāparaḥ

उनके द्वारा इस प्रकार आच्छादित हुए विष्णु, रोमांचित शरीर से, मानो एक अन्य लाल पर्वत के समान चारों ओर शोभा पाने लगे।

श्लोक 20 (skanda.6.34.20)

ततः शार्ङ्गविनिर्मुक्तैः शरैः कंकपतत्रिभिः । छेदयित्वेषुजालानि दैतेयान्निजघान सः

tataḥ śārṅgavinirmuktaiḥ śaraiḥ kaṁkapatatribhiḥ | chedayitveṣujālāni daiteyānnijaghāna saḥ

फिर अपने शार्ङ्ग धनुष से छोड़े गए, कंक-पंखों से युक्त बाणों से उन्होंने शत्रुओं के बाण-समूहों को काटकर दैत्यों का संहार किया।

श्लोक 21 (skanda.6.34.21)

ततो दैत्यगणाः सर्वे हन्यमाना सुरारिणा । त्रातारं नाभ्यगच्छंत मृगाः सिंहार्दिता इव

tato daityagaṇāḥ sarve hanyamānā surāriṇā | trātāraṁ nābhyagacchaṁta mṛgāḥ siṁhārditā iva

तब देवशत्रुओं (विष्णु) द्वारा मारे जाते हुए सभी दैत्यगण, सिंह से पीड़ित मृगों के समान, किसी रक्षक को न पा सके।

श्लोक 22 (skanda.6.34.22)

एतस्मिन्नंतरे दैत्यः कालखंज इति स्मृतः । स कोपवशमापन्नो वासुदेवमुपाद्रवत्

etasminnaṁtare daityaḥ kālakhaṁja iti smṛtaḥ | sa kopavaśamāpanno vāsudevamupādravat

इसी बीच कालखंज नामक एक दैत्य क्रोध के वशीभूत होकर वासुदेव पर टूट पड़ा।

श्लोक 23 (skanda.6.34.23)

स हत्वा पञ्चभिर्बाणैर्वासुदेवं शिलाशितैः । जघान गरुडं क्रुद्धो दशभिर्नतपर्वभिः

sa hatvā pañcabhirbāṇairvāsudevaṁ śilāśitaiḥ | jaghāna garuḍaṁ kruddho daśabhirnataparvabhiḥ

उसने पत्थर पर तीक्ष्ण किए गए पाँच बाणों से वासुदेव पर प्रहार किया, और क्रोध में आकर गोल-पर्व वाले दस बाणों से गरुड़ को भी घायल किया।

श्लोक 24 (skanda.6.34.24)

ततः सुदर्शनं चक्रं तस्य दैत्यस्य माधवः । प्रमुमोच वधार्थाय ज्वालामालासमावृतम्

tataḥ sudarśanaṁ cakraṁ tasya daityasya mādhavaḥ | pramumoca vadhārthāya jvālāmālāsamāvṛtam

तब माधव (विष्णु) ने उस दैत्य को मार डालने के लिए अपना सुदर्शन चक्र चलाया, जो ज्वालाओं की माला से घिरा हुआ था।

श्लोक 25 (skanda.6.34.25)

सोऽपि तच्चक्रमालोक्य वासुदेवकराच्च्युतम् । आगच्छंतं प्रसार्यास्यं ग्रस्तुं तत्संमुखो ययौ

so'pi taccakramālokya vāsudevakarāccyutam | āgacchaṁtaṁ prasāryāsyaṁ grastuṁ tatsaṁmukho yayau

उस दैत्य ने भी वासुदेव के हाथ से छूटे उस चक्र को अपनी ओर आते देखकर, अपना मुख फैलाकर उसे निगल जाने के लिए उसके सामने बढ़ा।

श्लोक 26 (skanda.6.34.26)

अग्रसच्च महादैत्यस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् । वासुदेवं समुद्दिश्य ततश्चिक्षेप सायकान्

agrasacca mahādaityastiṣṭhatiṣṭheti cābravīt | vāsudevaṁ samuddiśya tataścikṣepa sāyakān

उस महादैत्य ने उस चक्र को निगल लिया, और "ठहर, ठहर" कहते हुए वासुदेव की ओर लक्ष्य करके बाण चलाने लगा।

श्लोक 27 (skanda.6.34.27)

ततश्चक्री स दैत्येन ग्रस्तचक्रेण ताडितः । सुपर्णेन समायुक्तो जगाम विषमां व्यथाम्

tataścakrī sa daityena grastacakreṇa tāḍitaḥ | suparṇena samāyukto jagāma viṣamāṁ vyathām

तब अपने ही चक्र को निगल जाने वाले उस दैत्य के प्रहारों से आहत होकर, चक्रधारी विष्णु गरुड़ सहित अत्यंत विकट पीड़ा को प्राप्त हुए।

श्लोक 28 (skanda.6.34.28)

एतस्मिन्नंतरे क्रुद्धो भगवांस्त्रिपुरांतकः । दृष्ट्वा हरिं तथाभूतं शक्रं चापि पराङ्मुखम्

etasminnaṁtare kruddho bhagavāṁstripurāṁtakaḥ | dṛṣṭvā hariṁ tathābhūtaṁ śakraṁ cāpi parāṅmukham

इसी बीच त्रिपुरांतक भगवान (शिव), विष्णु को इस दशा में और इन्द्र को भी पीठ फेरे हुए देखकर क्रोधित हो उठे।

श्लोक 29 (skanda.6.34.29)

ततः शूलप्रहारेण तं निहत्य दनोः सुतम् । शरैः पिनाकनिर्मुक्तैर्जघानोच्चैस्तथा परान्

tataḥ śūlaprahāreṇa taṁ nihatya danoḥ sutam | śaraiḥ pinākanirmuktairjaghānoccaistathā parān

तब उन्होंने त्रिशूल के प्रहार से दनु-पुत्र उस दैत्य को मार डाला, और अपने पिनाक धनुष से छोड़े गए बाणों से अन्य दैत्यों का भी वेगपूर्वक संहार किया।

श्लोक 30 (skanda.6.34.30)

कालप्रभं प्रकालं च कालास्यं कालविग्रहम् । जघान भगवाञ्छंभुस्तथान्यानपि नायकान्

kālaprabhaṁ prakālaṁ ca kālāsyaṁ kālavigraham | jaghāna bhagavāñchaṁbhustathānyānapi nāyakān

भगवान शम्भु ने कालप्रभ, प्रकाल, कालास्य और कालविग्रह को, तथा अन्य सेनापतियों को भी मार गिराया।

श्लोक 31 (skanda.6.34.31)

ततः प्रधानास्ते सर्वे दानवा अपिदारुणाः । पलायनपरा जाता निरुत्साहा द्विषज्जये

tataḥ pradhānāste sarve dānavā apidāruṇāḥ | palāyanaparā jātā nirutsāhā dviṣajjaye

तब वे सभी प्रमुख और भयंकर दानव भी उत्साहहीन होकर, शत्रु पर विजय की आशा छोड़कर भागने लगे।

श्लोक 32 (skanda.6.34.32)

ततः शक्रश्च विष्णुश्च लब्धसंज्ञौ धृतायुधौ । श्लाघयंतौ महादेवं संस्थितौ रणमूर्धनि

tataḥ śakraśca viṣṇuśca labdhasaṁjñau dhṛtāyudhau | ślāghayaṁtau mahādevaṁ saṁsthitau raṇamūrdhani

तब चेतना पुनः पाकर, शस्त्र धारण किए हुए इन्द्र और विष्णु दोनों महादेव की प्रशंसा करते हुए युद्धभूमि के अग्रभाग में खड़े हो गए।

श्लोक 33 (skanda.6.34.33)

एतस्मिन्नंतरे भग्नान्समुद्वीक्ष्य दनोः सुतान् । जघ्नुः शरशतैः शस्त्रैः सर्वे देवाः सवासवाः

etasminnaṁtare bhagnānsamudvīkṣya danoḥ sutān | jaghnuḥ śaraśataiḥ śastraiḥ sarve devāḥ savāsavāḥ

इसी बीच दनु-पुत्रों को भागते हुए देखकर, इन्द्र सहित सभी देवताओं ने सैकड़ों बाणों और शस्त्रों से उनका संहार किया।

श्लोक 34 (skanda.6.34.34)

अथ ते हतभूयिष्ठा दानवा बलवत्तराः । हन्यमानाः शितैर्बाणैस्त्रिदशैर्जितकाशिभिः

atha te hatabhūyiṣṭhā dānavā balavattarāḥ | hanyamānāḥ śitairbāṇaistridaśairjitakāśibhiḥ

तब वे अत्यंत बलवान दानव, जिनमें से अधिकांश मारे जा चुके थे, विजय-गर्वित देवताओं के तीक्ष्ण बाणों से आहत होते रहे,

श्लोक 35 (skanda.6.34.35)

अगम्यं मनसा तेषां प्रविष्टा वरुणालयम् । शस्त्रैश्च क्षतसर्वांगा हतनाथाः सुदुःखिताः

agamyaṁ manasā teṣāṁ praviṣṭā varuṇālayam | śastraiśca kṣatasarvāṁgā hatanāthāḥ suduḥkhitāḥ

-- अपने समस्त अंगों में शस्त्रों से घायल, अपने स्वामियों से रहित, अत्यंत दुःखी होकर वरुण के निवास (समुद्र) में जा घुसे, जो मन से भी अगम्य है।

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