नागर खण्ड · अध्याय 35
अगस्त्यकृत समुद्रप्राशन एवं चित्रेश्वरपीठ वरप्रदान वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.35.1)
सूत उवाच । एवं तेषु प्रभग्नेषु हतेषु च सुरोत्तमाः । प्रहृष्टमनसः सर्वे स्तुत्वा देवं महेश्वरम्
sūta uvāca | evaṁ teṣu prabhagneṣu hateṣu ca surottamāḥ | prahṛṣṭamanasaḥ sarve stutvā devaṁ maheśvaram
सूत जी ने कहा -- हे श्रेष्ठ देवगण! इस प्रकार उन दानवों के भग्न और मारे जाने पर, सभी देवता प्रसन्नचित्त होकर भगवान महेश्वर की स्तुति करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.6.35.2)
तेनैव चाथ निर्मुक्ताः प्रणम्य च मुहुर्मुहुः । स्वंस्वं स्थानमथाजग्मुः शक्रविष्णुपुरःसराः
tenaiva cātha nirmuktāḥ praṇamya ca muhurmuhuḥ | svaṁsvaṁ sthānamathājagmuḥ śakraviṣṇupuraḥsarāḥ
फिर उन्हीं के द्वारा विदा किए जाने पर, बार-बार प्रणाम करके इन्द्र और विष्णु आदि सभी देवता अपने-अपने स्थान को चले गए।
श्लोक 3 (skanda.6.35.3)
तेऽपि दानवशार्दूला हताशाश्च सुरोत्तमैः । मंत्रं प्रचक्रिरे सर्वे नाशाय त्रिदिवौकसाम्
te'pi dānavaśārdūlā hatāśāśca surottamaiḥ | maṁtraṁ pracakrire sarve nāśāya tridivaukasām
उधर श्रेष्ठ देवताओं द्वारा निराश किए गए वे दानवश्रेष्ठ भी, देवताओं के विनाश के लिए आपस में मंत्रणा करने लगे।
श्लोक 4 (skanda.6.35.4)
तेषां मंत्रयतामेष निश्चयः समपद्यत । नान्यत्र धर्मविध्वंसाद्देवानां जायते क्षयः
teṣāṁ maṁtrayatāmeṣa niścayaḥ samapadyata | nānyatra dharmavidhvaṁsāddevānāṁ jāyate kṣayaḥ
उनकी मंत्रणा में यह निश्चय हुआ कि धर्म के विध्वंस के अतिरिक्त और किसी उपाय से देवताओं का क्षय नहीं हो सकता।
श्लोक 5 (skanda.6.35.5)
तस्मात्तपस्विनो यै च ये च यज्ञपरायणाः । तथान्ये निरता धर्मे निहन्तव्या निशागमे
tasmāttapasvino yai ca ye ca yajñaparāyaṇāḥ | tathānye niratā dharme nihantavyā niśāgame
इसलिए जो भी तपस्वी हों, जो यज्ञपरायण हों, तथा अन्य जो धर्म में लगे हों, उन सबका रात्रि में वध किया जाना चाहिए।
श्लोक 6 (skanda.6.35.6)
एवं ते निश्चयं कृत्वा निष्क्रम्य वरुणालयात् । रात्रौ सदैव निघ्नंति जनान्धर्मपरायणान्
evaṁ te niścayaṁ kṛtvā niṣkramya varuṇālayāt | rātrau sadaiva nighnaṁti janāndharmaparāyaṇān
ऐसा निश्चय करके वे वरुण के निवास (समुद्र) से निकलकर, रात में सदा धर्मपरायण लोगों का वध करने लगे।
श्लोक 7 (skanda.6.35.7)
यत्र यत्र भवेद्यज्ञः सत्रं ऽप्युत्सवोऽथवा । तत्र गत्वा निशायोगे प्रकुर्वंति जनक्षयम्
yatra yatra bhavedyajñaḥ satraṁ 'pyutsavo'thavā | tatra gatvā niśāyoge prakurvaṁti janakṣayam
जहाँ-जहाँ भी कोई यज्ञ, सत्र या उत्सव होता, वहाँ रात के समय पहुँचकर वे लोगों का संहार करने लगे।
श्लोक 8 (skanda.6.35.8)
तैः प्रसूता मखा ध्वस्ता दीक्षिता विनिपातिताः । ऋत्विजश्च तथान्येऽपि सामान्या द्विजसत्तमाः
taiḥ prasūtā makhā dhvastā dīkṣitā vinipātitāḥ | ṛtvijaśca tathānye'pi sāmānyā dvijasattamāḥ
उनके द्वारा प्रारंभ हुए यज्ञ ध्वस्त कर दिए गए, दीक्षित यजमान मार डाले गए, तथा ऋत्विज और अन्य सामान्य श्रेष्ठ ब्राह्मण भी मारे गए।
श्लोक 9 (skanda.6.35.9)
आश्रमे मुनिमुख्यस्य शांडिल्यस्य महात्मनः । सहस्रं ब्राह्मणेंद्राणां भक्षितं तैर्दुरात्मभिः
āśrame munimukhyasya śāṁḍilyasya mahātmanaḥ | sahasraṁ brāhmaṇeṁdrāṇāṁ bhakṣitaṁ tairdurātmabhiḥ
महात्मा मुनिश्रेष्ठ शांडिल्य के आश्रम में उन दुरात्माओं ने एक सहस्र श्रेष्ठ ब्राह्मणों को खा डाला।
श्लोक 10 (skanda.6.35.10)
शतानि च सहस्राणि निहतानि द्विजन्मनाम् । विश्वामित्रस्य पञ्चैव सप्तात्रेश्चैव धीमतः
śatāni ca sahasrāṇi nihatāni dvijanmanām | viśvāmitrasya pañcaiva saptātreścaiva dhīmataḥ
विश्वामित्र के आश्रम में पाँच सौ, और बुद्धिमान अत्रि के आश्रम में सात सौ ब्राह्मण मारे गए।
श्लोक 11 (skanda.6.35.11)
एतस्मिन्नेव काले तु समस्तं धरणीतलम् । नष्टयज्ञोत्सवं जातं कालेयभयपीडितम्
etasminneva kāle tu samastaṁ dharaṇītalam | naṣṭayajñotsavaṁ jātaṁ kāleyabhayapīḍitam
इसी काल में सम्पूर्ण पृथ्वीतल पर कालेय दानवों के भय से पीड़ित होकर यज्ञ और उत्सव नष्ट हो गए।
श्लोक 12 (skanda.6.35.12)
न कश्चिच्छयनं रात्रौ प्रकरोति मही तले । धृतायुधा जनाः सर्वे तिष्ठंति सह तापसैः
na kaścicchayanaṁ rātrau prakaroti mahī tale | dhṛtāyudhā janāḥ sarve tiṣṭhaṁti saha tāpasaiḥ
पृथ्वीतल पर कोई भी रात में शयन नहीं करता था; सभी लोग तपस्वियों के साथ शस्त्र धारण किए जागते रहते थे।
श्लोक 13 (skanda.6.35.13)
रात्रौ स्वपंति ये केचिद्विश्वस्ता धर्मभाजनाः । तेषामस्थीनि दृश्यंते प्रातरेव हि केवलम्
rātrau svapaṁti ye kecidviśvastā dharmabhājanāḥ | teṣāmasthīni dṛśyaṁte prātareva hi kevalam
जो कोई निश्चिंत होकर रात में सो जाते थे, वे धर्मात्मा भी -- उनकी केवल हड्डियाँ ही प्रातःकाल दिखाई देती थीं।
श्लोक 14 (skanda.6.35.14)
अथ देवगणाः सर्वे यज्ञभागविनाकृताः । प्रजग्मुः परमामार्ति ब्रह्मविष्णुपुरस्सराः
atha devagaṇāḥ sarve yajñabhāgavinākṛtāḥ | prajagmuḥ paramāmārti brahmaviṣṇupurassarāḥ
तब यज्ञ-भाग से वंचित हुए सभी देवगण ब्रह्मा और विष्णु को आगे करके परम पीड़ा को प्राप्त हुए।
श्लोक 15 (skanda.6.35.15)
ततो गत्वा समुद्रांतं वधाय सुरविद्विषाम् । न शेकुर्विषमस्थांस्तान्मनसापि प्रधर्षितुम्
tato gatvā samudrāṁtaṁ vadhāya suravidviṣām | na śekurviṣamasthāṁstānmanasāpi pradharṣitum
तब समुद्र के तट पर जाकर, देव-शत्रुओं के वध के लिए, वे उन विषम स्थान में बसे दानवों को मन से भी आक्रमित नहीं कर सके।
श्लोक 16 (skanda.6.35.16)
ततः समुद्रनाशाय मंत्रं चक्रुः सुदुःखिताः । तस्मिन्नष्टे भवन्त्येव वध्या दानवसत्तमाः
tataḥ samudranāśāya maṁtraṁ cakruḥ suduḥkhitāḥ | tasminnaṣṭe bhavantyeva vadhyā dānavasattamāḥ
तब अत्यंत दुःखी होकर उन्होंने समुद्र के ही विनाश के लिए मंत्रणा की, क्योंकि उसके नष्ट हो जाने पर ही वे श्रेष्ठ दानव वध्य हो सकते थे।
श्लोक 17 (skanda.6.35.17)
अगस्त्येन विना नैष शोषं यास्यति सागरः । तस्मात्संप्रार्थयामोत्र कृत्ये गत्वा मुनीश्वरम्
agastyena vinā naiṣa śoṣaṁ yāsyati sāgaraḥ | tasmātsaṁprārthayāmotra kṛtye gatvā munīśvaram
अगस्त्य के बिना यह सागर सूख नहीं सकता; इसलिए इस कार्य के लिए हमें उन मुनीश्वर के पास जाकर प्रार्थना करनी चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.6.35.18)
चमत्कारपुरे क्षेत्रे स तिष्ठति च सन्मुनिः । तस्मात्तत्रैव गच्छामो येन गच्छति सत्वरम्
camatkārapure kṣetre sa tiṣṭhati ca sanmuniḥ | tasmāttatraiva gacchāmo yena gacchati satvaram
वे साधु मुनि चमत्कारपुर क्षेत्र में निवास करते हैं; इसलिए हम वहीं चलें, जिससे यह कार्य शीघ्र सम्पन्न हो सके।
श्लोक 19 (skanda.6.35.19)
एवं निश्चित्य ते सर्वे त्रिदशास्तस्य चाश्रमम् । संप्राप्ता मुनिमुख्यस्य मित्रावरुण जन्मनः
evaṁ niścitya te sarve tridaśāstasya cāśramam | saṁprāptā munimukhyasya mitrāvaruṇa janmanaḥ
ऐसा निश्चय करके वे सभी देवता मित्रावरुण-पुत्र उन मुनिश्रेष्ठ के आश्रम में जा पहुँचे।
श्लोक 20 (skanda.6.35.20)
सोऽपि सर्वान्समालोक्य संप्राप्तान्सुरसत्तमान् । प्रहृष्टः सम्मुखस्तूर्णं जगामातीव सन्मुनिः
so'pi sarvānsamālokya saṁprāptānsurasattamān | prahṛṣṭaḥ sammukhastūrṇaṁ jagāmātīva sanmuniḥ
उन श्रेष्ठ देवताओं को आया हुआ देखकर, वे साधु मुनि भी अत्यंत प्रसन्न होकर तुरंत उनके सामने गए।
श्लोक 21 (skanda.6.35.21)
प्रोवाच प्रांजलिर्वाक्यं हर्ष गद्गदया गिरा । ब्रह्मादींस्तान्सुरान्दृष्ट्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः
provāca prāṁjalirvākyaṁ harṣa gadgadayā girā | brahmādīṁstānsurāndṛṣṭvā vismayotphullalocanaḥ
ब्रह्मा आदि उन देवताओं को देखकर, आश्चर्य से चकित नेत्रों वाले वे मुनि हाथ जोड़कर हर्ष से गद्गद वाणी में बोले --
श्लोक 22 (skanda.6.35.22)
चमत्कारपुरं क्षेत्रमेतन्मेध्यमपि स्थितम् । भूयो मेध्यतरं जातं युष्माकं हि समाश्रयात्
camatkārapuraṁ kṣetrametanmedhyamapi sthitam | bhūyo medhyataraṁ jātaṁ yuṣmākaṁ hi samāśrayāt
"यह चमत्कारपुर क्षेत्र यों तो पहले से ही पवित्र है, किन्तु आप सबके इस आगमन से यह और भी अधिक पवित्र हो गया है।"
श्लोक 23 (skanda.6.35.23)
तस्माद्वदत यत्कृत्यं मया संसिद्ध्यतेऽधुना । तत्सर्वं प्रकरिष्यामि यद्यपि स्यात्सुदुष्करम्
tasmādvadata yatkṛtyaṁ mayā saṁsiddhyate'dhunā | tatsarvaṁ prakariṣyāmi yadyapi syātsuduṣkaram
"इसलिए बताइए, अभी कौन-सा कार्य मुझसे सम्पन्न कराना चाहते हैं; चाहे वह कितना ही दुष्कर क्यों न हो, मैं वह सब कर दूँगा।"
श्लोक 24 (skanda.6.35.24)
देवाः उवाच । कालेया इति दैत्या ये हतशेषाः सुरैः कृताः । ते समुद्रं समाश्रित्य निघ्नंति शुभकारिणः
devāḥ uvāca | kāleyā iti daityā ye hataśeṣāḥ suraiḥ kṛtāḥ | te samudraṁ samāśritya nighnaṁti śubhakāriṇaḥ
देवताओं ने कहा -- कालेय नामक जो दैत्य देवताओं के हाथों वध किए जाने के बाद भी शेष रह गए हैं, वे समुद्र का आश्रय लेकर पुण्यकर्मी लोगों का वध कर रहे हैं।
श्लोक 25 (skanda.6.35.25)
शुभे नाशमनुप्राप्ते ध्रुवं नाशो दिवौकसाम् । तस्मात्तेषां वधार्थाय त्वं शोषय महार्णवम्
śubhe nāśamanuprāpte dhruvaṁ nāśo divaukasām | tasmātteṣāṁ vadhārthāya tvaṁ śoṣaya mahārṇavam
पुण्यकर्म के नष्ट हो जाने पर देवताओं का विनाश निश्चित है; इसलिए उनके वध के लिए आप इस महासागर को सुखा दीजिए।
श्लोक 26 (skanda.6.35.26)
येन ते गोचरं प्राप्ता दृष्टेर्दानवसत्तमाः । बध्यंते विबुधैः सर्वे जायंते च मखा इह
yena te gocaraṁ prāptā dṛṣṭerdānavasattamāḥ | badhyaṁte vibudhaiḥ sarve jāyaṁte ca makhā iha
जिससे वे श्रेष्ठ दानव दृष्टिगोचर होकर देवताओं द्वारा मारे जा सकें, और यहाँ फिर से यज्ञ हो सकें।
श्लोक 27 (skanda.6.35.27)
अगस्त्य उवाच । अहं संवत्सरस्यांते शोषयिष्यामि सागरम् । विद्याबलं समाश्रित्य योगिनीनां सुरोत्तमाः
agastya uvāca | ahaṁ saṁvatsarasyāṁte śoṣayiṣyāmi sāgaram | vidyābalaṁ samāśritya yoginīnāṁ surottamāḥ
अगस्त्य ने कहा -- हे श्रेष्ठ देवगण! योगिनियों की विद्या के बल का आश्रय लेकर, मैं एक वर्ष के अंत में इस सागर को सुखा दूँगा।
श्लोक 28 (skanda.6.35.28)
तस्माद्व्रजत हर्म्याणि यूयं याति हि वत्सरम् । यावद्भूयोऽपि वर्षांते कार्यमागमनं ध्रुवम्
tasmādvrajata harmyāṇi yūyaṁ yāti hi vatsaram | yāvadbhūyo'pi varṣāṁte kāryamāgamanaṁ dhruvam
इसलिए तुम सब अपने-अपने भवनों को जाओ, यह एक वर्ष का समय बीतने दो; वर्ष के अंत में तुम्हें फिर यहाँ अवश्य आना होगा।
श्लोक 29 (skanda.6.35.29)
ततो मया समं गत्वा शोषिते वरुणालये । हंतव्या दानवा दुष्टा हन्त यैः पीड्यते जगत्
tato mayā samaṁ gatvā śoṣite varuṇālaye | haṁtavyā dānavā duṣṭā hanta yaiḥ pīḍyate jagat
तब मेरे साथ जाकर, वरुण के आलय के सूख जाने पर, उन दुष्ट दानवों का वध करना, जिनके द्वारा यह जगत् पीड़ित है।
श्लोक 30 (skanda.6.35.30)
सूत उवाच । ततो देवगणाः सर्वे गताः स्वेस्वे निकेतने । अगस्त्योऽपि समुद्योगं चक्रे विद्यासमुद्भवम्
sūta uvāca | tato devagaṇāḥ sarve gatāḥ svesve niketane | agastyo'pi samudyogaṁ cakre vidyāsamudbhavam
सूत जी ने कहा -- तब सभी देवगण अपने-अपने निवास स्थान को चले गए, और अगस्त्य ने भी विद्या-साधना का उद्योग आरंभ किया।
श्लोक 31 (skanda.6.35.31)
ततः सर्वाणि पीठानि यानि संति धरातले । तानि तत्रानयामास मंत्रशक्त्या महामुनिः
tataḥ sarvāṇi pīṭhāni yāni saṁti dharātale | tāni tatrānayāmāsa maṁtraśaktyā mahāmuniḥ
तब उन महामुनि ने पृथ्वीतल पर स्थित सभी शक्तिपीठों को अपनी मंत्र-शक्ति से वहीं ला दिया।
श्लोक 32 (skanda.6.35.32)
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां तेषु संपूज्य भक्तितः । योगिनीनां च वृन्दानि कन्यकानां विशेषतः
aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ teṣu saṁpūjya bhaktitaḥ | yoginīnāṁ ca vṛndāni kanyakānāṁ viśeṣataḥ
अष्टमी और चतुर्दशी को उन पीठों में भक्तिपूर्वक योगिनियों के समूहों की, विशेष रूप से कन्याओं की भी पूजा की,
श्लोक 33 (skanda.6.35.33)
विद्यां विशोषिणीनाम समाराधयत द्विजः । पूजयित्वा दिशां पालान्क्षेत्रपालानपि द्विजः । आकाशचारिणीं चैव देवतां श्रद्धया द्विजः
vidyāṁ viśoṣiṇīnāma samārādhayata dvijaḥ | pūjayitvā diśāṁ pālānkṣetrapālānapi dvijaḥ | ākāśacāriṇīṁ caiva devatāṁ śraddhayā dvijaḥ
उस ब्राह्मण ने समुद्र-शोषण करने वाली महाविद्या की आराधना की, दिक्पालों तथा क्षेत्रपालों की भी पूजा की, और श्रद्धापूर्वक आकाशचारिणी देवी की भी अर्चना की।
श्लोक 34 (skanda.6.35.34)
ततः संवत्सरस्यांते प्रसन्ना तस्य देवता । प्रोवाच वद यत्कृत्यं सिद्धाहं तव सन्मुने
tataḥ saṁvatsarasyāṁte prasannā tasya devatā | provāca vada yatkṛtyaṁ siddhāhaṁ tava sanmune
तब वर्ष के अंत में वह देवी उन पर प्रसन्न हुई, और बोली -- हे साधु मुने! जो कार्य हो, बताओ, मैं तुम्हारे लिए सिद्ध हूँ।
श्लोक 35 (skanda.6.35.35)
अगस्त्य उवाच । यदि देवि प्रसन्ना मे तदास्यं विश सत्वरम् । येन संशोषयाम्याशु समुद्रं देवि वाग्यतः
agastya uvāca | yadi devi prasannā me tadāsyaṁ viśa satvaram | yena saṁśoṣayāmyāśu samudraṁ devi vāgyataḥ
अगस्त्य ने कहा -- हे देवी! यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो, तो तुरंत मेरे मुख में प्रवेश करो, जिससे मैं मौन रहते हुए भी शीघ्र ही समुद्र को सुखा सकूँ।
श्लोक 36 (skanda.6.35.36)
सूत उवाच । सा तथेति प्रतिज्ञाय प्रविष्टा सत्वरं मुखे । संशोषणी महाविद्या तस्यर्षेर्भावितात्मनः
sūta uvāca | sā tatheti pratijñāya praviṣṭā satvaraṁ mukhe | saṁśoṣaṇī mahāvidyā tasyarṣerbhāvitātmanaḥ
सूत जी ने कहा -- "ऐसा ही होगा" कहकर, वह समुद्र-शोषण करने वाली महाविद्या उस भावित-आत्मा ऋषि के मुख में शीघ्र प्रविष्ट हो गई।
श्लोक 37 (skanda.6.35.37)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्ताः सर्वे देवाः सवासवाः । धृतायुधकरा हृष्टाः संनद्धा युद्धहेतवे
etasminnaṁtare prāptāḥ sarve devāḥ savāsavāḥ | dhṛtāyudhakarā hṛṣṭāḥ saṁnaddhā yuddhahetave
इसी बीच इन्द्र सहित सभी देवता, हाथों में शस्त्र धारण किए, प्रसन्न और युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 38 (skanda.6.35.38)
ततः संप्रस्थितो विप्रो देवैः सर्वैः समाहितः । वारिराशिं समुद्दिश्य संशुष्कवदनस्तदा
tataḥ saṁprasthito vipro devaiḥ sarvaiḥ samāhitaḥ | vārirāśiṁ samuddiśya saṁśuṣkavadanastadā
तब वह ब्राह्मण, अपना मुख सुखाए हुए, सभी देवताओं से घिरे हुए, समुद्र की ओर चल पड़ा।
श्लोक 39 (skanda.6.35.39)
अथ गत्वा समुद्रांतं स्तूयमानो दिवालयैः । पिपासाकुलितोऽतीव सर्वान्देवानुवाच ह
atha gatvā samudrāṁtaṁ stūyamāno divālayaiḥ | pipāsākulito'tīva sarvāndevānuvāca ha
समुद्र-तट पर पहुँचकर, देवताओं द्वारा स्तुति किए जाते हुए, अत्यंत प्यास से व्याकुल होते हुए, उन्होंने सभी देवताओं से कहा --
श्लोक 40 (skanda.6.35.40)
एषोऽहं सागरं सद्यः शोषयिष्यामि सांप्रतम् । यूयं भवत सोद्योगा वधाय सुरविद्विषाम्
eṣo'haṁ sāgaraṁ sadyaḥ śoṣayiṣyāmi sāṁpratam | yūyaṁ bhavata sodyogā vadhāya suravidviṣām
"मैं अभी इस सागर को तुरंत सुखा दूँगा; तुम सब देव-शत्रुओं के वध के लिए सन्नद्ध हो जाओ।"
श्लोक 41 (skanda.6.35.41)
सूत उवाच । एवमुक्त्वा मुनिः सोऽथ मत्स्यकच्छपसंकुलम् । हेलया प्रपपौ कृत्स्नं ग्राहैः कीर्णं महार्णवम्
sūta uvāca | evamuktvā muniḥ so'tha matsyakacchapasaṁkulam | helayā prapapau kṛtsnaṁ grāhaiḥ kīrṇaṁ mahārṇavam
सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर उन मुनि ने मछलियों, कछुओं और मगरमच्छों से भरे उस सम्पूर्ण महासागर को सहज ही पी लिया।
श्लोक 42 (skanda.6.35.42)
ततः स्थलोपमे जाते ते दैत्याः सुरसत्तमैः । वध्यन्ते निशितैर्बाणैः समन्ताद्विजिगीषुभिः
tataḥ sthalopame jāte te daityāḥ surasattamaiḥ | vadhyante niśitairbāṇaiḥ samantādvijigīṣubhiḥ
तब समुद्र के स्थल के समान हो जाने पर, विजय के इच्छुक श्रेष्ठ देवताओं द्वारा वे दैत्य चारों ओर से तीक्ष्ण बाणों से मारे जाने लगे।
श्लोक 43 (skanda.6.35.43)
अथ कृत्वा महद्युद्धं यथा शक्त्यातिदारुणम् । हतभूयिष्ठशेषा ये भित्त्वा भूमिं गता अधः
atha kṛtvā mahadyuddhaṁ yathā śaktyātidāruṇam | hatabhūyiṣṭhaśeṣā ye bhittvā bhūmiṁ gatā adhaḥ
उन्होंने यथाशक्ति अत्यंत भयंकर महायुद्ध किया, और जो शेष बचे उनमें से अधिकांश मारे गए; कुछ शेष रह गए वे भूमि को भेदकर नीचे चले गए।
श्लोक 44 (skanda.6.35.44)
ततः प्रोचुः सुराः सर्वे स्तुत्वा तं मुनिसत्तमम् । परित्यज जलं भूयः पूरणार्थं महोदधेः
tataḥ procuḥ surāḥ sarve stutvā taṁ munisattamam | parityaja jalaṁ bhūyaḥ pūraṇārthaṁ mahodadheḥ
तब सभी देवताओं ने उन मुनिश्रेष्ठ की स्तुति करके कहा -- अब आप उस महासागर को फिर से भरने के लिए वह जल त्याग दीजिए।
श्लोक 45 (skanda.6.35.45)
नैषा वसुमती विप्र समुद्रेण विनाकृता । राजते वस्तुसंत्यक्ता यथा नारी विभूषिता
naiṣā vasumatī vipra samudreṇa vinākṛtā | rājate vastusaṁtyaktā yathā nārī vibhūṣitā
हे विप्र! समुद्र से रहित यह पृथ्वी वैसे ही शोभा नहीं देती, जैसे आभूषणों से सज्जित होने पर भी वस्त्र-रहित स्त्री शोभा नहीं देती।
श्लोक 46 (skanda.6.35.46)
अगस्त्य उवाच । या मयाऽऽराधिता विद्या वर्षंयावत्प्रशोषणी । तया पीतमिदं तोयं परिणामगतं तथा
agastya uvāca | yā mayā''rādhitā vidyā varṣaṁyāvatpraśoṣaṇī | tayā pītamidaṁ toyaṁ pariṇāmagataṁ tathā
अगस्त्य ने कहा -- जिस शोषणी महाविद्या की मैंने वर्षभर आराधना की थी, उसी के द्वारा यह जल पिया गया, और वह अब परिणाम को प्राप्त हो चुका है (पच चुका है)।
श्लोक 47 (skanda.6.35.47)
एष यास्यति वै पूर्तिं भूयोऽपि वरुणालयः । खातश्चागाधतां प्राप्तो गंगातोयैः सुनिर्मलैः
eṣa yāsyati vai pūrtiṁ bhūyo'pi varuṇālayaḥ | khātaścāgādhatāṁ prāpto gaṁgātoyaiḥ sunirmalaiḥ
यह वरुण का आलय फिर से भर जाएगा, और खोदा हुआ यह गहरा गड्ढा गंगा के अत्यंत निर्मल जल से पुनः अगाध हो जाएगा।
श्लोक 48 (skanda.6.35.48)
सगरोनाम भूपालो भविष्यति महीतले । तत्पुत्राः षष्टिसाहस्राः खनिष्यंति न संशयः
sagaronāma bhūpālo bhaviṣyati mahītale | tatputrāḥ ṣaṣṭisāhasrāḥ khaniṣyaṁti na saṁśayaḥ
पृथ्वी पर सगर नाम का एक राजा होगा; उसके साठ हजार पुत्र निःसंदेह इसी को खोदेंगे।
श्लोक 49 (skanda.6.35.49)
तस्यैवान्वयवान्राजा भविष्यति भगीरथः । स ज्ञातिकारणाद्गंगां ब्रह्मांडादानयिष्यति
tasyaivānvayavānrājā bhaviṣyati bhagīrathaḥ | sa jñātikāraṇādgaṁgāṁ brahmāṁḍādānayiṣyati
उसी के वंश में भगीरथ नामक एक राजा होगा; वह अपने कुटुम्बियों के उद्धार के लिए ब्रह्मांड से गंगा को यहाँ लाएगा।
श्लोक 50 (skanda.6.35.50)
प्रवाहेण ततस्तस्याः समंतादंभसांनिधिः । भविष्यति सुसंपूर्णः सत्यमेतन्मयोदितम्
pravāheṇa tatastasyāḥ samaṁtādaṁbhasāṁnidhiḥ | bhaviṣyati susaṁpūrṇaḥ satyametanmayoditam
तब उसी की धारा से चारों ओर जल की उपस्थिति होकर यह सागर पूर्णतः भर जाएगा; मैंने जो कहा है, वह सत्य है।
श्लोक 51 (skanda.6.35.51)
देवाः उवाच । देवकृत्यं मुनिश्रेष्ठ भवता ह्युपपादितम् । तस्मात्प्रार्थय चित्तस्थं वरं सर्वं मुनीश्वर
devāḥ uvāca | devakṛtyaṁ muniśreṣṭha bhavatā hyupapāditam | tasmātprārthaya cittasthaṁ varaṁ sarvaṁ munīśvara
देवताओं ने कहा -- हे मुनिश्रेष्ठ! आपने देवताओं का कार्य सिद्ध कर दिया है; इसलिए हे मुनीश्वर! अपने मन में जो भी वरदान चाहें, वह माँग लीजिए।
श्लोक 52 (skanda.6.35.52)
अगस्त्य उवाच । चमत्कारपुरे क्षेत्रे मया पीठान्यशेषतः । आनीतानि प्रभावेन मंत्राणां सुरसत्तमाः
agastya uvāca | camatkārapure kṣetre mayā pīṭhānyaśeṣataḥ | ānītāni prabhāvena maṁtrāṇāṁ surasattamāḥ
अगस्त्य ने कहा -- हे श्रेष्ठ देवगण! मैंने अपने मंत्रों के प्रभाव से चमत्कारपुर क्षेत्र में सभी शक्तिपीठों को यहाँ ला दिया है।
श्लोक 53 (skanda.6.35.53)
तस्मात्तेषां सदा वासस्तत्रैवास्तु प्रभावतः । सर्वासां योगिनीनां च मातॄणां च विशेषतः
tasmātteṣāṁ sadā vāsastatraivāstu prabhāvataḥ | sarvāsāṁ yoginīnāṁ ca mātṝṇāṁ ca viśeṣataḥ
इसलिए उनके प्रभाव से, विशेषतः सभी योगिनियों और मातृकाओं का निवास सदा वहीं बना रहे।
श्लोक 54 (skanda.6.35.54)
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां तानि यः श्रद्धयाऽन्वितः । पूजयिष्यति तस्य स्यात्समस्तं मनसेप्सितम्
aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ tāni yaḥ śraddhayā'nvitaḥ | pūjayiṣyati tasya syātsamastaṁ manasepsitam
जो कोई अष्टमी और चतुर्दशी को श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा करेगा, उसे मन-वांछित सारा फल प्राप्त होगा।
श्लोक 55 (skanda.6.35.55)
देवाः उवाच । यस्माच्चित्राणि पीठानि त्वयानीतानि तत्र हि । तस्माच्चित्रेश्वरं नाम पीठमेकं भविष्यति
devāḥ uvāca | yasmāccitrāṇi pīṭhāni tvayānītāni tatra hi | tasmāccitreśvaraṁ nāma pīṭhamekaṁ bhaviṣyati
देवताओं ने कहा -- चूँकि आपने विविध (चित्र-चित्र) पीठों को वहाँ ला दिया है, इसलिए वह एक पीठ "चित्रेश्वर" नाम से विख्यात होगा।
श्लोक 56 (skanda.6.35.56)
यो यं काममभिध्याय तत्र पूजां करिष्यति । योगिनीनां च विद्यानां मातॄणां च विशेषतः
yo yaṁ kāmamabhidhyāya tatra pūjāṁ kariṣyati | yoginīnāṁ ca vidyānāṁ mātṝṇāṁ ca viśeṣataḥ
जो कोई भी वहाँ किसी कामना का ध्यान करके योगिनियों, विद्याओं और मातृकाओं की विशेष रूप से पूजा करेगा --
श्लोक 57 (skanda.6.35.57)
तंतं कामं नरः शीघ्रं संप्राप्स्यति महामुने । अस्माकं वरदानेन यद्यपि स्यात्सुपापकृत्
taṁtaṁ kāmaṁ naraḥ śīghraṁ saṁprāpsyati mahāmune | asmākaṁ varadānena yadyapi syātsupāpakṛt
-- हे महामुने! वह मनुष्य हमारे इस वरदान से उस-उस कामना को शीघ्र प्राप्त करेगा, चाहे वह कितना ही महापापी क्यों न हो।
श्लोक 58 (skanda.6.35.58)
सूत उवाच । एवमुक्त्वा सुराः सर्वे तमामन्त्र्य मुनीश्वरम् । गतास्त्रिविष्टपं हृष्टाः सोऽप्यगस्त्यः स्वमाश्रमम्
sūta uvāca | evamuktvā surāḥ sarve tamāmantrya munīśvaram | gatāstriviṣṭapaṁ hṛṣṭāḥ so'pyagastyaḥ svamāśramam
सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर सभी देवता उन मुनीश्वर से विदा लेकर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोक को चले गए, और अगस्त्य भी अपने आश्रम को लौट गए।
श्लोक 59 (skanda.6.35.59)
एतद्वः सर्वमाख्यातं यथा स पयसांनिधिः । अगस्त्येन पुरा पीतो देवकार्यप्रसिद्धये
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yathā sa payasāṁnidhiḥ | agastyena purā pīto devakāryaprasiddhaye
यह सब मैंने तुम्हें बता दिया है, कि किस प्रकार पूर्वकाल में अगस्त्य ने देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए उस समुद्र को पिया था।