नागर खण्ड · अध्याय 36
चित्रेश्वरीपीठ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.36.1)
ऋषयः उवाच । चित्रेश्वरमिदं पीठमगस्त्यमुनिनिर्मितम् । यत्प्रमाणं यत्प्रभावं तदस्माकं प्रकीर्तय
ṛṣayaḥ uvāca | citreśvaramidaṁ pīṭhamagastyamuninirmitam | yatpramāṇaṁ yatprabhāvaṁ tadasmākaṁ prakīrtaya
ऋषियों ने कहा -- अगस्त्य मुनि द्वारा निर्मित इस चित्रेश्वर पीठ का जो प्रमाण और जो प्रभाव है, वह हमें बताइए।
श्लोक 2 (skanda.6.36.2)
सूत उवाच । तस्य पीठस्य माहात्म्यं वक्तुं नो शक्यते द्विजाः । सहस्रेणापि वर्षाणां मुखानामयुतैरपि
sūta uvāca | tasya pīṭhasya māhātmyaṁ vaktuṁ no śakyate dvijāḥ | sahasreṇāpi varṣāṇāṁ mukhānāmayutairapi
सूत जी ने कहा -- हे ब्राह्मणो! उस पीठ का माहात्म्य सहस्र वर्षों में और दस हजार मुखों से भी कहा नहीं जा सकता।
श्लोक 3 (skanda.6.36.3)
तत्र सिद्धिमनुप्राप्ताः शतशोऽथ सहस्रशः । अनुध्यानसमायुक्ता योगिनः शंसितव्रताः
tatra siddhimanuprāptāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ | anudhyānasamāyuktā yoginaḥ śaṁsitavratāḥ
वहाँ ध्यान में लीन, दृढ़व्रती सैकड़ों-हजारों योगियों ने सिद्धि प्राप्त की है।
श्लोक 4 (skanda.6.36.4)
अन्यपीठेषु या सिद्धिर्वर्षानुष्ठानतो भवेत् । दिनेनैकेन तां सिद्धिं लभंते योगिनो ध्रुवम्
anyapīṭheṣu yā siddhirvarṣānuṣṭhānato bhavet | dinenaikena tāṁ siddhiṁ labhaṁte yogino dhruvam
जो सिद्धि अन्य पीठों में एक वर्ष के अनुष्ठान से प्राप्त होती है, वही सिद्धि योगीजन यहाँ निश्चय ही एक ही दिन में पा लेते हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.36.5)
यस्तत्राथर्वणान्मंत्राञ्जपेच्छ्रद्धासमन्वितः । तेषामर्थोद्भवं कृत्स्नं फलं प्राप्नोति स ध्रुवम्
yastatrātharvaṇānmaṁtrāñjapecchraddhāsamanvitaḥ | teṣāmarthodbhavaṁ kṛtsnaṁ phalaṁ prāpnoti sa dhruvam
जो वहाँ श्रद्धापूर्वक अथर्ववेद के मंत्रों का जप करता है, वह उनके अर्थ से उत्पन्न होने वाला सम्पूर्ण फल निश्चय ही प्राप्त करता है।
श्लोक 6 (skanda.6.36.6)
पुत्रकामो नरस्तत्र पुंलिंगान्यो जपेन्नरः । स लभेतेप्सितान्पुत्रान्यद्यपि स्याज्जरान्वितः
putrakāmo narastatra puṁliṁgānyo japennaraḥ | sa labhetepsitānputrānyadyapi syājjarānvitaḥ
पुत्र की कामना करने वाला जो मनुष्य वहाँ पुंलिंग मंत्रों का जप करता है, वह वृद्धावस्था में भी मनोवांछित पुत्रों को पा लेता है।
श्लोक 7 (skanda.6.36.7)
गर्भोपनिषदं तत्र पुत्रकामो जपेन्नरः । अपि वन्ध्याप्रसंगेन स्यात्स पुत्रसमन्वितः
garbhopaniṣadaṁ tatra putrakāmo japennaraḥ | api vandhyāprasaṁgena syātsa putrasamanvitaḥ
जो पुत्रकामी वहाँ गर्भोपनिषद् का जप करता है, वह अपनी बाँझ पत्नी के संग से भी पुत्रवान हो जाता है।
श्लोक 8 (skanda.6.36.8)
शत्रुलोकविनाशाय यो जपेच्छतरुद्रियम् । तस्मिन्पीठेऽरयस्तस्य सद्यो गच्छंति संक्षयम्
śatrulokavināśāya yo japecchatarudriyam | tasminpīṭhe'rayastasya sadyo gacchaṁti saṁkṣayam
जो शत्रु-लोकों के विनाश के लिए उस पीठ में शतरुद्रिय का जप करता है, उसके शत्रु तुरंत ही नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 9 (skanda.6.36.9)
भूतप्रेतपिशाचादिरक्षार्थं तत्र मानवः । यो जपेद्वामदेव्यं च स स्याद्धि निरुपद्रवः
bhūtapretapiśācādirakṣārthaṁ tatra mānavaḥ | yo japedvāmadevyaṁ ca sa syāddhi nirupadravaḥ
भूत, प्रेत, पिशाच आदि से रक्षा के लिए जो मनुष्य वहाँ वामदेव्य का जप करता है, वह निश्चय ही सर्व उपद्रवों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 10 (skanda.6.36.10)
कोऽदादिति नरस्तत्र कन्यार्थं यो जपेदृचम् । यां कन्यां ध्यायमानस्तु स तां प्राप्नोत्यसंशयम्
ko'dāditi narastatra kanyārthaṁ yo japedṛcam | yāṁ kanyāṁ dhyāyamānastu sa tāṁ prāpnotyasaṁśayam
"कोऽदात्" इस ऋचा का जो मनुष्य वहाँ कन्या-प्राप्ति के लिए जप करता है, वह जिस कन्या का ध्यान करता है, उसे निःसंदेह प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 11 (skanda.6.36.11)
यो भूपालप्रसादार्थमिमं देवा निशं जपेत् । निरर्गलः प्रसादः स्यात्तस्य पार्थिवसंभवः
yo bhūpālaprasādārthamimaṁ devā niśaṁ japet | nirargalaḥ prasādaḥ syāttasya pārthivasaṁbhavaḥ
जो राजा की प्रसन्नता के लिए वहाँ "इमं देवाः" इस मंत्र का रात्रि में जप करता है, उसे राजा की ओर से अबाध कृपा प्राप्त होती है।
श्लोक 12 (skanda.6.36.12)
स्वस्त्रीस्नेहकृतेयस्तु तं पत्नीभिरिति द्विजाः । जपेद्भार्या भवेत्साध्वी तस्य सा स्नेहवत्सला
svastrīsnehakṛteyastu taṁ patnībhiriti dvijāḥ | japedbhāryā bhavetsādhvī tasya sā snehavatsalā
हे ब्राह्मणो! जो अपनी पत्नी के स्नेह के लिए "तं पत्नीभिः" इस मंत्र का जप करता है, उसकी पत्नी सुशील और स्नेहमयी हो जाती है।
श्लोक 13 (skanda.6.36.13)
यो लोकानुग्रहार्थाय जपेददितिरित्यपि । तस्य लोकानुरागः स्यात्सलाभश्च विशेषतः
yo lokānugrahārthāya japedaditirityapi | tasya lokānurāgaḥ syātsalābhaśca viśeṣataḥ
जो लोगों के अनुग्रह के लिए "अदितिः" इस मंत्र का जप करता है, उसे लोगों का अनुराग और विशेष लाभ प्राप्त होता है।
श्लोक 14 (skanda.6.36.14)
वित्तार्थी यो जपेत्तत्र श्रीसूक्तं मनुजो द्विजाः । सर्वतस्तस्य वित्तानि समागच्छंत्यनेकशः
vittārthī yo japettatra śrīsūktaṁ manujo dvijāḥ | sarvatastasya vittāni samāgacchaṁtyanekaśaḥ
हे ब्राह्मणो! धन की कामना करने वाला जो मनुष्य वहाँ श्रीसूक्त का जप करता है, उसके पास सब ओर से अनेक प्रकार का धन आ जुटता है।
श्लोक 15 (skanda.6.36.15)
भूमीति यो जपेत्साम भूम्यर्थं तत्र मानवः । स भवेद्भूपतिर्नूनं नीचजातिरपि ध्रुवम्
bhūmīti yo japetsāma bhūmyarthaṁ tatra mānavaḥ | sa bhavedbhūpatirnūnaṁ nīcajātirapi dhruvam
भूमि के लिए जो मनुष्य वहाँ "भूमिः" इस सामगान का जप करता है, वह नीच कुल में उत्पन्न हुआ हो तो भी निश्चय ही भूपति बन जाता है।
श्लोक 16 (skanda.6.36.16)
जपेद्रथंतरं साम यानार्थं तत्र यो नरः । स प्राप्नोति हि यानानि शीघ्रगानि शुभानि च
japedrathaṁtaraṁ sāma yānārthaṁ tatra yo naraḥ | sa prāpnoti hi yānāni śīghragāni śubhāni ca
जो मनुष्य वहाँ वाहन के लिए रथंतर सामगान का जप करता है, वह शीघ्रगामी और शुभ वाहनों को प्राप्त करता है।
श्लोक 17 (skanda.6.36.17)
गजार्थी यो जपेत्तत्र गणानां द्विजसत्तमाः । स प्राप्नोति गजान्मर्त्यो मदप्लावितभूतलान्
gajārthī yo japettatra gaṇānāṁ dvijasattamāḥ | sa prāpnoti gajānmartyo madaplāvitabhūtalān
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हाथी की कामना करने वाला जो मनुष्य वहाँ गणों के मंत्र का जप करता है, वह मद से पृथ्वी को आप्लावित करने वाले हाथियों को प्राप्त करता है।
श्लोक 18 (skanda.6.36.18)
न तद्रक्षेति यो मन्त्रं जपेद्रक्षाकृते नरः । तस्य स्यात्सर्वतो रक्षा समेषु विषमेषु च
na tadrakṣeti yo mantraṁ japedrakṣākṛte naraḥ | tasya syātsarvato rakṣā sameṣu viṣameṣu ca
रक्षा के लिए जो मनुष्य "न तद्रक्षः" इस मंत्र का जप करता है, उसकी सम और विषम दोनों स्थितियों में सब ओर से रक्षा होती है।
श्लोक 19 (skanda.6.36.19)
सप्तर्षय इति श्रेष्ठां यो जपेत्तु समाहितः । ऋचं रोगविनाशाय स रोगैः परिमुच्यते
saptarṣaya iti śreṣṭhāṁ yo japettu samāhitaḥ | ṛcaṁ rogavināśāya sa rogaiḥ parimucyate
जो एकाग्रचित्त होकर रोग-नाश के लिए "सप्तर्षयः" नामक श्रेष्ठ ऋचा का जप करता है, वह रोगों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है।
श्लोक 20 (skanda.6.36.20)
यदुभी यो जपेत्तत्र ग्रहपीडार्दितो जनः । सानुकूला ग्रहास्तस्य प्रभवंति न संशयः
yadubhī yo japettatra grahapīḍārdito janaḥ | sānukūlā grahāstasya prabhavaṁti na saṁśayaḥ
ग्रह-पीड़ा से पीड़ित जो व्यक्ति वहाँ "यद् उभे" इस मंत्र का जप करता है, उसके ग्रह निःसंदेह अनुकूल हो जाते हैं।
श्लोक 21 (skanda.6.36.21)
भूतपीडार्दितो यश्च बृहत्साम जपेन्नरः । पितृवज्जायते तस्य स भूतोऽप्यंतकोऽपि चेत्
bhūtapīḍārdito yaśca bṛhatsāma japennaraḥ | pitṛvajjāyate tasya sa bhūto'pyaṁtako'pi cet
भूत-पीड़ा से पीड़ित जो मनुष्य वहाँ बृहत्साम का जप करता है, यमराज या भूत भी उसके लिए पिता के समान हो जाता है।
श्लोक 22 (skanda.6.36.22)
यात्रासिद्धिकृते यश्च जपेत्सूक्तं च शाकुनम् । तस्य संसिध्यते यात्रा यद्यपि स्यादकिंचनः
yātrāsiddhikṛte yaśca japetsūktaṁ ca śākunam | tasya saṁsidhyate yātrā yadyapi syādakiṁcanaḥ
यात्रा की सिद्धि के लिए जो शाकुन सूक्त का जप करता है, उसकी यात्रा निर्धन होते हुए भी सफल हो जाती है।
श्लोक 23 (skanda.6.36.23)
सर्पनाशाय यस्तत्र सार्पसूक्तं जपेन्नरः । न तस्य मंदिरे सर्पाः प्रविशंति कथंचन
sarpanāśāya yastatra sārpasūktaṁ japennaraḥ | na tasya maṁdire sarpāḥ praviśaṁti kathaṁcana
सर्प-नाश के लिए जो मनुष्य वहाँ सार्प सूक्त का जप करता है, उसके घर में सर्प कभी भी प्रवेश नहीं करते।
श्लोक 24 (skanda.6.36.24)
विषनाशाय यस्तत्र जपेच्छ्रद्धासमन्वितः । उत्तिष्ठेति विषं सद्यस्तस्य नाशं प्रयास्यति
viṣanāśāya yastatra japecchraddhāsamanvitaḥ | uttiṣṭheti viṣaṁ sadyastasya nāśaṁ prayāsyati
विष-नाश के लिए जो श्रद्धापूर्वक वहाँ "उत्तिष्ठ" इस मंत्र का जप करता है, उसका विष तुरंत नष्ट हो जाता है।
श्लोक 25 (skanda.6.36.25)
स्थावरजगमं वापि कृत्रिमं यदि वा विषम् । तस्य नाम्ना विनिर्याति तमः सूर्योदये यथा
sthāvarajagamaṁ vāpi kṛtrimaṁ yadi vā viṣam | tasya nāmnā viniryāti tamaḥ sūryodaye yathā
स्थावर हो या जंगम, अथवा कृत्रिम विष हो, उस मंत्र के नाम से ही वह ऐसे निकल जाता है जैसे सूर्योदय होने पर अंधकार निकल जाता है।
श्लोक 26 (skanda.6.36.26)
व्याघ्रसाम जपेद्यस्तु तत्र श्रद्धासमन्वितः । तस्य व्याघ्रादयो व्याला जायंते सौम्यचेतसः
vyāghrasāma japedyastu tatra śraddhāsamanvitaḥ | tasya vyāghrādayo vyālā jāyaṁte saumyacetasaḥ
जो श्रद्धापूर्वक वहाँ व्याघ्रसाम का जप करता है, उसके प्रति बाघ आदि हिंस्र पशु भी सौम्यचित्त हो जाते हैं।
श्लोक 27 (skanda.6.36.27)
कृषिकर्मप्रसिद्ध्यर्थं यो जपेल्लांगलानि च । वृष्टिहीनेऽपि लोकेऽस्मिन्कृषिस्तस्य प्रसिध्यति
kṛṣikarmaprasiddhyarthaṁ yo japellāṁgalāni ca | vṛṣṭihīne'pi loke'sminkṛṣistasya prasidhyati
कृषि-कर्म की सिद्धि के लिए जो "लांगलानि" इस मंत्र का जप करता है, वर्षा-रहित इस संसार में भी उसकी खेती सफल होती है।
श्लोक 28 (skanda.6.36.28)
ईतिनाशाय तत्रैव जपेद्देवव्रतं नरः । ततः संकीर्त्तना देव ईतयो यांति संक्षयम्
ītināśāya tatraiva japeddevavrataṁ naraḥ | tataḥ saṁkīrttanā deva ītayo yāṁti saṁkṣayam
उपद्रवों (ईति) के नाश के लिए जो मनुष्य वहाँ देवव्रत मंत्र का जप करता है, उससे "संकीर्तना देव" कहते ही सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 29 (skanda.6.36.29)
अनावृष्टिहते लोके पंचेंद्रं तत्र यो जपेत् । तस्य हस्तकृते होमे तन्मंत्रैः स्याज्जलागमः
anāvṛṣṭihate loke paṁceṁdraṁ tatra yo japet | tasya hastakṛte home tanmaṁtraiḥ syājjalāgamaḥ
अनावृष्टि से पीड़ित संसार में जो वहाँ पंचेन्द्र मंत्र का जप करता है, उन्हीं मंत्रों से उसके हाथों किए गए होम से वर्षा हो जाती है।
श्लोक 30 (skanda.6.36.30)
दंष्ट्राभ्यामिति यस्तत्र नरश्चौरार्दितः पठेत् । नोपद्रवो भवेत्तस्य कदाचिच्चौरसंभवः
daṁṣṭrābhyāmiti yastatra naraścaurārditaḥ paṭhet | nopadravo bhavettasya kadāciccaurasaṁbhavaḥ
चोरों से पीड़ित जो मनुष्य वहाँ "दंष्ट्राभ्याम्" इस मंत्र का पाठ करता है, उसे चोरों से कभी भी कोई उपद्रव नहीं होता।
श्लोक 31 (skanda.6.36.31)
विवादार्थं जपेद्यस्तु संसृष्टमिति तत्र च । विवादे विजयस्तस्य पापस्यापि प्रजायते
vivādārthaṁ japedyastu saṁsṛṣṭamiti tatra ca | vivāde vijayastasya pāpasyāpi prajāyate
विवाद के लिए जो "संसृष्टम्" इस मंत्र का जप करता है, वह पापी होते हुए भी विवाद में विजय पाता है।
श्लोक 32 (skanda.6.36.32)
यो रिपूच्चाटनार्थाय नरो रुद्रशिरो जपेत् । तस्य ते रिपवो यांति देशं त्यक्त्वा कुबुद्धितः
yo ripūccāṭanārthāya naro rudraśiro japet | tasya te ripavo yāṁti deśaṁ tyaktvā kubuddhitaḥ
शत्रुओं को भगाने के लिए जो मनुष्य रुद्रशिर मंत्र का जप करता है, उसके शत्रु दुर्बुद्धि से ग्रस्त होकर अपना ही देश छोड़कर चले जाते हैं।
श्लोक 33 (skanda.6.36.33)
मोहनाय रिपूणां च यो जपेद्विष्णुसंहिताम् । तस्य मोहाभिभूतास्ते जायंते रिपवो ध्रुवम्
mohanāya ripūṇāṁ ca yo japedviṣṇusaṁhitām | tasya mohābhibhūtāste jāyaṁte ripavo dhruvam
शत्रुओं को मोहित करने के लिए जो विष्णुसंहिता का जप करता है, उसके शत्रु निश्चय ही मोह से अभिभूत हो जाते हैं।
श्लोक 34 (skanda.6.36.34)
वशीकरणहेतोर्यः कूष्मांडीः प्रजपेन्नरः । शत्रवोऽपि वशे तस्य किं पुनः प्रमदादयः
vaśīkaraṇahetoryaḥ kūṣmāṁḍīḥ prajapennaraḥ | śatravo'pi vaśe tasya kiṁ punaḥ pramadādayaḥ
वशीकरण के लिए जो मनुष्य कूष्मांडी मंत्रों का जप करता है, उसके तो शत्रु भी वश में हो जाते हैं, फिर स्त्रियों आदि की तो बात ही क्या!
श्लोक 35 (skanda.6.36.35)
यः स्तंभाय रिपूणां वै प्राजापत्यं च वारुणम् । मंत्रं जपेद्द्विजश्रेष्ठाः सम्यक्छ्रद्धापरायणः । मंत्रसंस्तंभितास्तस्य जायंते सर्वशत्रवः
yaḥ staṁbhāya ripūṇāṁ vai prājāpatyaṁ ca vāruṇam | maṁtraṁ japeddvijaśreṣṭhāḥ samyakchraddhāparāyaṇaḥ | maṁtrasaṁstaṁbhitāstasya jāyaṁte sarvaśatravaḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो शत्रुओं को स्तंभित करने के लिए भलीभाँति श्रद्धापूर्वक प्राजापत्य और वारुण मंत्रों का जप करता है, उसके सभी शत्रु उन मंत्रों से स्तंभित हो जाते हैं।
श्लोक 36 (skanda.6.36.36)
जपेत्काली करालीति यः शोषाय नरो द्विजाः । स शोषयति तत्कृत्स्नं यच्चित्ते धारयेन्नरः
japetkālī karālīti yaḥ śoṣāya naro dvijāḥ | sa śoṣayati tatkṛtsnaṁ yaccitte dhārayennaraḥ
हे ब्राह्मणो! जो मनुष्य शोषण के लिए "काली कराली" इस मंत्र का जप करता है, वह जिस भी वस्तु को अपने मन में धारण करता है, उसे पूरी तरह सुखा देता है।
श्लोक 37 (skanda.6.36.37)
एष मंत्रस्तदा जप्तो ह्यगस्त्येन महात्मना । यत्प्रभावान्नदीनाथस्तेन संशोषितो ध्रुवम्
eṣa maṁtrastadā japto hyagastyena mahātmanā | yatprabhāvānnadīnāthastena saṁśoṣito dhruvam
इसी मंत्र का जप महात्मा अगस्त्य ने उस समय किया था, जिसके प्रभाव से उनके द्वारा निश्चय ही समुद्र सुखा दिया गया था।
श्लोक 38 (skanda.6.36.38)
एतत्प्रभावं यत्पीठं मंत्राणां सिद्धिकारकम् । ऐहिकानां फलानां च तन्मया वः प्रकीर्तितम्
etatprabhāvaṁ yatpīṭhaṁ maṁtrāṇāṁ siddhikārakam | aihikānāṁ phalānāṁ ca tanmayā vaḥ prakīrtitam
जो पीठ इतना प्रभावशाली है और मंत्रों तथा ऐहिक फलों की सिद्धि करने वाला है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया है।
श्लोक 39 (skanda.6.36.39)
यो वांछति पुनः स्वर्गं स तत्र द्विजसत्तमाः । स्नानं करोतु दानं च श्राद्धं चापि विशेषतः
yo vāṁchati punaḥ svargaṁ sa tatra dvijasattamāḥ | snānaṁ karotu dānaṁ ca śrāddhaṁ cāpi viśeṣataḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जो स्वर्ग की कामना करता है, वह वहाँ स्नान, दान और विशेष रूप से श्राद्ध करे।
श्लोक 40 (skanda.6.36.40)
अथ वांछति यो मोक्षं विरक्तो भवसागरात् । निष्कामस्तत्र संतुष्टस्तपस्तप्येत्सुबुद्धिमान्
atha vāṁchati yo mokṣaṁ virakto bhavasāgarāt | niṣkāmastatra saṁtuṣṭastapastapyetsubuddhimān
और जो संसार-सागर से विरक्त होकर मोक्ष की कामना करता है, वह बुद्धिमान मनुष्य वहाँ निष्काम और संतुष्ट होकर तप करे।
श्लोक 41 (skanda.6.36.41)
ऋषयः उवाच । मंत्रजाप्यस्य माहात्म्यं यत्त्वया नः प्रकीर्तितम् । तत्कथं सिद्धिमायाति मंत्रजाप्यं हि सूतज
ṛṣayaḥ uvāca | maṁtrajāpyasya māhātmyaṁ yattvayā naḥ prakīrtitam | tatkathaṁ siddhimāyāti maṁtrajāpyaṁ hi sūtaja
ऋषियों ने कहा -- आपने हमें मंत्र-जप का जो माहात्म्य बताया, हे सूतपुत्र! वह मंत्र-जप सिद्धि को किस प्रकार प्राप्त होता है?
श्लोक 42 (skanda.6.36.42)
सूत उवाच । अत्र तत्कथयिष्यामि यन्मया पितृतः श्रुतम् । वदतो ब्राह्मणेंद्रस्य पुरा दुर्वाससो मुनेः
sūta uvāca | atra tatkathayiṣyāmi yanmayā pitṛtaḥ śrutam | vadato brāhmaṇeṁdrasya purā durvāsaso muneḥ
सूत जी ने कहा -- इस विषय में मैं वही बताऊँगा जो मैंने अपने पिता से सुना था, जब पहले श्रेष्ठ ब्राह्मण दुर्वासा मुनि यह प्रश्न पूछ रहे थे।
श्लोक 43 (skanda.6.36.43)
तेन पूर्वं पिताऽस्माकं पृष्टो दुर्वाससा द्विजाः । मंत्रवादकृते यच्च शृणुध्वं सुसमाहिताः
tena pūrvaṁ pitā'smākaṁ pṛṣṭo durvāsasā dvijāḥ | maṁtravādakṛte yacca śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ
हे ब्राह्मणो! पहले मेरे पिता से दुर्वासा ने मंत्र-सिद्धि के विषय में जो प्रश्न पूछा था, उसे तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो।
श्लोक 44 (skanda.6.36.44)
दुर्वासा उवाच । साधयिष्याम्यहं मन्त्रमभीष्टं कमपि व्रती । तस्य सिद्धिकृते ब्रूहि विधानं शास्त्रसंभवम्
durvāsā uvāca | sādhayiṣyāmyahaṁ mantramabhīṣṭaṁ kamapi vratī | tasya siddhikṛte brūhi vidhānaṁ śāstrasaṁbhavam
दुर्वासा ने कहा -- व्रतधारी होकर मैं किसी अभीष्ट मंत्र को सिद्ध करना चाहता हूँ; उसकी सिद्धि के लिए शास्त्रोक्त विधान बताइए।
श्लोक 45 (skanda.6.36.45)
लोमहर्षण उवाच । मंत्राणां साधनं कष्टं सर्वेषामपि सन्मुने । प्रत्यवायसमोपेतं बहुच्छिद्रसमाकुलम्
lomaharṣaṇa uvāca | maṁtrāṇāṁ sādhanaṁ kaṣṭaṁ sarveṣāmapi sanmune | pratyavāyasamopetaṁ bahucchidrasamākulam
लोमहर्षण ने कहा -- हे साधु मुने! सभी मंत्रों की साधना कठिन है, अनेक दोषों से युक्त और बहुत सी त्रुटियों से भरी होती है।
श्लोक 46 (skanda.6.36.46)
तस्मान्मंत्रकृते सिद्धिं यदि त्वं वांछसि द्विज । चमत्कारपुरे क्षेत्रे तत्र त्वं गंतुमर्हसि
tasmānmaṁtrakṛte siddhiṁ yadi tvaṁ vāṁchasi dvija | camatkārapure kṣetre tatra tvaṁ gaṁtumarhasi
इसलिए हे ब्राह्मण! यदि तुम मंत्र-सिद्धि चाहते हो, तो तुम्हें चमत्कारपुर क्षेत्र में जाना चाहिए।
श्लोक 47 (skanda.6.36.47)
तत्र चित्रेश्वरीपीठमगस्त्येन विनिर्मितम् । सद्यः सिद्धिकरं प्रोक्तं मन्त्राणां हृदि वर्तिनाम्
tatra citreśvarīpīṭhamagastyena vinirmitam | sadyaḥ siddhikaraṁ proktaṁ mantrāṇāṁ hṛdi vartinām
वहाँ अगस्त्य द्वारा निर्मित चित्रेश्वरी पीठ है, जो हृदय में स्थित मंत्रों को तत्काल सिद्धिदायक कहा गया है।
श्लोक 48 (skanda.6.36.48)
न तत्र जायते छिद्रं प्रत्यवायो न च द्विज । नासिद्धिर्वरदानेन सर्वेषां त्रिदिवौकसाम्
na tatra jāyate chidraṁ pratyavāyo na ca dvija | nāsiddhirvaradānena sarveṣāṁ tridivaukasām
वहाँ न कोई त्रुटि होती है, न कोई दोष, हे ब्राह्मण! और समस्त देवताओं के वरदान के कारण वहाँ असिद्धि भी नहीं होती।
श्लोक 49 (skanda.6.36.49)
चातुर्युंग्यं हि तत्पीठं स्थितानां सिद्धिमाहरेत् । युगानुरूपतः सद्यस्ततो वक्ष्याम्यहं द्विज
cāturyuṁgyaṁ hi tatpīṭhaṁ sthitānāṁ siddhimāharet | yugānurūpataḥ sadyastato vakṣyāmyahaṁ dvija
वह पीठ चारों युगों में स्थित साधकों को उनकी सिद्धि प्रदान करता है, प्रत्येक युग के अनुरूप ही; इसलिए हे ब्राह्मण! अब मैं वह बताता हूँ।
श्लोक 50 (skanda.6.36.50)
यो यं साधयितुं मन्त्रमिच्छति द्विजसत्तम । स तस्य पूर्वमेवाथ लक्षमेकं जपेन्नरः
yo yaṁ sādhayituṁ mantramicchati dvijasattama | sa tasya pūrvamevātha lakṣamekaṁ japennaraḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! जो मनुष्य जिस मंत्र को सिद्ध करना चाहता है, उसे सबसे पहले उसका एक लाख जप करना चाहिए।
श्लोक 51 (skanda.6.36.51)
ततो भवति संसिद्धो मंत्रार्हः स नरः शुचिः । जपेद्ब्राह्मणशार्दूल ततो लक्षचतुष्टयम् । दशांशेन तु होमः स्यात्सुसमिद्धे हुताशने
tato bhavati saṁsiddho maṁtrārhaḥ sa naraḥ śuciḥ | japedbrāhmaṇaśārdūla tato lakṣacatuṣṭayam | daśāṁśena tu homaḥ syātsusamiddhe hutāśane
तब वह शुद्ध मनुष्य मंत्र के योग्य सिद्ध हो जाता है; हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! फिर उसे चार लाख जप करना चाहिए, और उसके दशांश के बराबर प्रज्वलित अग्नि में होम करना चाहिए।
श्लोक 52 (skanda.6.36.52)
ततस्तु जायते सिद्धिर्नूनं तन्मंत्रसंभवा । तत्र सौम्येषु कृत्येषु होमः सिद्धार्थकैः सितैः
tatastu jāyate siddhirnūnaṁ tanmaṁtrasaṁbhavā | tatra saumyeṣu kṛtyeṣu homaḥ siddhārthakaiḥ sitaiḥ
तब उस मंत्र से उत्पन्न होने वाली सिद्धि निश्चय ही उसे प्राप्त होती है। सौम्य कार्यों में सफेद सरसों से होम करना चाहिए,
श्लोक 53 (skanda.6.36.53)
जातीपुष्पैश्च विप्रेन्द्र स्मृतो ब्राह्मणभोजनैः । तथा रौद्रेषु कृत्येषु रक्तपुष्पैः सगुग्गुलैः । तर्पणैः कन्यकानां च होमः स्यात्स फलप्रदः
jātīpuṣpaiśca viprendra smṛto brāhmaṇabhojanaiḥ | tathā raudreṣu kṛtyeṣu raktapuṣpaiḥ saguggulaiḥ | tarpaṇaiḥ kanyakānāṁ ca homaḥ syātsa phalapradaḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! जाति के पुष्पों तथा ब्राह्मण-भोजन के साथ किया जाना कहा गया है। तथा उग्र कार्यों में गुग्गुल-सहित लाल पुष्पों से, और कन्याओं के तर्पण के साथ किया गया होम फलदायक होता है।
श्लोक 54 (skanda.6.36.54)
एतत्कृतयुगे प्रोक्तं मंत्रसाधनमुत्तमम् । सर्वेषां साधकानां च मया प्रोक्तं द्विजोत्तम
etatkṛtayuge proktaṁ maṁtrasādhanamuttamam | sarveṣāṁ sādhakānāṁ ca mayā proktaṁ dvijottama
हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! यह सम्पूर्ण उत्तम मंत्र-साधन-विधि मैंने तुम्हें कृतयुग के लिए, सभी साधकों के लिए बताई है।
श्लोक 55 (skanda.6.36.55)
एतत्त्रेतायुगे प्रोक्तं पादोनं मन्त्रसाधनम् । युग्मार्धं द्वापरे कार्यं चतुर्थांशं कलौ युगे
etattretāyuge proktaṁ pādonaṁ mantrasādhanam | yugmārdhaṁ dvāpare kāryaṁ caturthāṁśaṁ kalau yuge
त्रेतायुग में इसी विधि का पौन भाग करना चाहिए, द्वापर में आधा, और कलियुग में चौथाई भाग ही किया जाना चाहिए।
श्लोक 56 (skanda.6.36.56)
एवं तत्र समासाद्य सिद्धिं मंत्रसमुद्भवाम् । तत्र पीठे ततः कृत्यं साधयेत्स्वेच्छया नरः
evaṁ tatra samāsādya siddhiṁ maṁtrasamudbhavām | tatra pīṭhe tataḥ kṛtyaṁ sādhayetsvecchayā naraḥ
इस प्रकार वहाँ मंत्र से उत्पन्न सिद्धि प्राप्त कर लेने पर, मनुष्य उस पीठ में फिर अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी कार्य सिद्ध कर सकता है।
श्लोक 57 (skanda.6.36.57)
शापानुग्रहसामर्थ्यसंयुतस्तेजसाऽन्वितः । अजेयः सर्वभूतानां साधूनां संमतस्तथा
śāpānugrahasāmarthyasaṁyutastejasā'nvitaḥ | ajeyaḥ sarvabhūtānāṁ sādhūnāṁ saṁmatastathā
वह शाप और अनुग्रह देने की सामर्थ्य से युक्त, तेज से सम्पन्न, सभी प्राणियों के लिए अजेय तथा साधु-पुरुषों द्वारा सम्मानित हो जाता है।
श्लोक 58 (skanda.6.36.58)
सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा स मुनिस्तस्य पितुर्मम वचोऽखिलम् । ततश्चित्रेश्वरं पीठं समायातोऽथ सन्मुनिः
sūta uvāca | tacchrutvā sa munistasya piturmama vaco'khilam | tataścitreśvaraṁ pīṭhaṁ samāyāto'tha sanmuniḥ
सूत जी ने कहा -- मेरे पिता के इन सम्पूर्ण वचनों को सुनकर वे मुनि दुर्वासा तब चित्रेश्वर पीठ में आ गए।
श्लोक 59 (skanda.6.36.59)
तत्र संसाधयामास सर्वान्मंत्रान्यथाक्रमम् । विधिना शास्त्रदृष्टेन श्रद्धया परया युतः
tatra saṁsādhayāmāsa sarvānmaṁtrānyathākramam | vidhinā śāstradṛṣṭena śraddhayā parayā yutaḥ
वहाँ उन्होंने परम श्रद्धा से युक्त होकर, शास्त्रोक्त विधि से, सभी मंत्रों को यथाक्रम सिद्ध किया।
श्लोक 60 (skanda.6.36.60)
इति संसिद्धमंत्रः स चमत्कारपुरं गतः । विप्राणां प्रार्थनार्थाय भूमिखंडकृते द्विजाः
iti saṁsiddhamaṁtraḥ sa camatkārapuraṁ gataḥ | viprāṇāṁ prārthanārthāya bhūmikhaṁḍakṛte dvijāḥ
हे ब्राह्मणो! इस प्रकार मंत्र-सिद्ध होकर वे चमत्कारपुर गए, ब्राह्मणों की प्रार्थना पर वहाँ भूमि के एक खंड के लिए।