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नागर खण्ड · अध्याय 37

दुःशीलाख्य प्रासाद उत्पत्ति वर्णन

अध्याय 36अध्याय-सूचीअध्याय 38

श्लोक 1 (skanda.6.37.1)

सूत उवाच । अथापश्यत्स विप्राणां वृन्दं वृन्दारकोपमम् । संनिविष्टं धरापृष्ठे लीलाभाजि द्विजोत्तमाः

sūta uvāca | athāpaśyatsa viprāṇāṁ vṛndaṁ vṛndārakopamam | saṁniviṣṭaṁ dharāpṛṣṭhe līlābhāji dvijottamāḥ

सूत जी ने कहा -- हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! तब उन्होंने (दुर्वासा ने) देवताओं के समान तेजस्वी ब्राह्मणों के एक समूह को देखा, जो पृथ्वी पर लीलापूर्वक बैठा हुआ था।

श्लोक 2 (skanda.6.37.2)

एके वेदविदस्तत्र वेदव्याख्यानतत्पराः । परस्परं सुसंक्रुद्धा विवदंति जिगीषवः

eke vedavidastatra vedavyākhyānatatparāḥ | parasparaṁ susaṁkruddhā vivadaṁti jigīṣavaḥ

उनमें से कुछ वेदों के ज्ञाता, वेद के व्याख्यान में तत्पर थे, जो परस्पर अत्यंत क्रुद्ध होकर विजय की इच्छा से वाद-विवाद कर रहे थे।

श्लोक 3 (skanda.6.37.3)

यज्ञविद्याविदोऽन्येऽपि यज्ञाख्यानपरायणाः । तत्र विप्राः प्रदृश्यंते शतशो ब्रह्मवादिनः

yajñavidyāvido'nye'pi yajñākhyānaparāyaṇāḥ | tatra viprāḥ pradṛśyaṁte śataśo brahmavādinaḥ

यज्ञ-विद्या के ज्ञाता, यज्ञ-कथाओं में तल्लीन, ऐसे सैकड़ों ब्रह्मवादी ब्राह्मण भी वहाँ दिखाई देते थे।

श्लोक 4 (skanda.6.37.4)

अन्ये ब्राह्मणशार्दूला वेदांगेषु विचक्षणाः । प्रवदंति च संदेहान्वृन्दानामग्रतः स्थिताः

anye brāhmaṇaśārdūlā vedāṁgeṣu vicakṣaṇāḥ | pravadaṁti ca saṁdehānvṛndānāmagrataḥ sthitāḥ

अन्य वेदांगों में निपुण श्रेष्ठ ब्राह्मण, समूहों के आगे खड़े होकर संदेहों का समाधान कर रहे थे।

श्लोक 5 (skanda.6.37.5)

वेदाभ्यासपराश्चान्ये तारनादेन सर्वशः । नादयंतो दिशां चक्रं तत्र सम्यग्द्विजोत्तमाः

vedābhyāsaparāścānye tāranādena sarvaśaḥ | nādayaṁto diśāṁ cakraṁ tatra samyagdvijottamāḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वेदाभ्यास में लीन अन्य ब्राह्मण अपने ऊँचे स्वर से चारों दिशाओं को गुंजायमान कर रहे थे।

श्लोक 6 (skanda.6.37.6)

अन्ये कौतूहलाविष्टाः संचरान्विषमान्मिथः । पप्रच्छुर्जहसुश्चान्ये ज्ञात्वा मार्गप्रवर्तिनम्

anye kautūhalāviṣṭāḥ saṁcarānviṣamānmithaḥ | papracchurjahasuścānye jñātvā mārgapravartinam

उत्सुकता से भरे अन्य लोग आपस में कठिन प्रश्न पूछते थे, और कुछ, प्रश्नकर्ता को जानकर, हँसते भी थे।

श्लोक 7 (skanda.6.37.7)

स्मृतिवादपराश्चान्ये तथान्ये श्रुतिपाठकाः । संदेहान्स्मृतिजानन्ये पृच्छंति च परस्परम्

smṛtivādaparāścānye tathānye śrutipāṭhakāḥ | saṁdehānsmṛtijānanye pṛcchaṁti ca parasparam

स्मृति-शास्त्र की चर्चा में लीन अन्य ब्राह्मण, तथा श्रुति-पाठक अन्य ब्राह्मण, स्मृति से उत्पन्न संदेहों को आपस में पूछ रहे थे।

श्लोक 8 (skanda.6.37.8)

कीर्तयंति तथा चान्ये पुराणं ब्राह्मणोत्तमाः । वृद्धानां पुरतस्तत्र सभामध्ये व्यवस्थिताः

kīrtayaṁti tathā cānye purāṇaṁ brāhmaṇottamāḥ | vṛddhānāṁ puratastatra sabhāmadhye vyavasthitāḥ

और वहाँ सभा के मध्य वृद्धजनों के सामने बैठे कुछ अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मण पुराण-कथा सुना रहे थे।

श्लोक 9 (skanda.6.37.9)

अथ तान्स मुनिर्दृष्ट्वा ब्राह्मणान्संशितव्रतान् । अभिवाद्य ततः प्राह सादरं विनयान्वितः

atha tānsa munirdṛṣṭvā brāhmaṇānsaṁśitavratān | abhivādya tataḥ prāha sādaraṁ vinayānvitaḥ

तब उन दृढ़व्रती ब्राह्मणों को देखकर उन मुनि ने अभिवादन करके, विनयपूर्वक आदरसहित यह कहा --

श्लोक 10 (skanda.6.37.10)

मम बुद्धिः समुत्पन्ना शम्भोरायतनं प्रति । कर्तुं ब्राह्मणशार्दूलास्तस्मात्स्थानं प्रदर्श्यताम्

mama buddhiḥ samutpannā śambhorāyatanaṁ prati | kartuṁ brāhmaṇaśārdūlāstasmātsthānaṁ pradarśyatām

"हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मेरे मन में शम्भु का मंदिर बनाने की इच्छा उत्पन्न हुई है; इसलिए मुझे कोई उपयुक्त स्थान दिखाइए।"

श्लोक 11 (skanda.6.37.11)

तवाहं देवदेवस्य शम्भोः प्रासादमुत्तमम् । विधायाराधयिष्यामि तमेव वृषभध्वजम्

tavāhaṁ devadevasya śambhoḥ prāsādamuttamam | vidhāyārādhayiṣyāmi tameva vṛṣabhadhvajam

"मैं देवदेव उन्हीं वृषभध्वज शम्भु का एक उत्तम मंदिर बनाकर उन्हीं की आराधना करूँगा।"

श्लोक 12 (skanda.6.37.12)

स एवं जल्पमानोऽपि मुहुर्मुहुरतंद्रितः । न तेषामुत्तरं लेभे शुभं वा यदि वाशुभम्

sa evaṁ jalpamāno'pi muhurmuhurataṁdritaḥ | na teṣāmuttaraṁ lebhe śubhaṁ vā yadi vāśubham

इस प्रकार बिना थके बार-बार बोलते रहने पर भी, उन्हें उन ब्राह्मणों से न तो शुभ और न ही अशुभ, कोई उत्तर प्राप्त हुआ।

श्लोक 13 (skanda.6.37.13)

ततः कोपपरीतात्मा समुनिस्तान्द्विजोत्तमान् । शशाप तारशब्देन यथा शृण्वंति कृत्स्नशः

tataḥ kopaparītātmā samunistāndvijottamān | śaśāpa tāraśabdena yathā śṛṇvaṁti kṛtsnaśaḥ

तब क्रोध से भरकर उन मुनि ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को ऊँची आवाज़ में शाप दिया, ताकि सभी उसे सुन सकें।

श्लोक 14 (skanda.6.37.14)

दुर्वासा उवाच । विद्यामदो धनमदस्तृतीयोऽभिजनोद्भवः । एते मदावलिप्तानामेत एव सतां दमाः

durvāsā uvāca | vidyāmado dhanamadastṛtīyo'bhijanodbhavaḥ | ete madāvaliptānāmeta eva satāṁ damāḥ

दुर्वासा ने कहा -- विद्या का मद, धन का मद, और कुलीनता से उत्पन्न तीसरा मद -- ये ही मदमत्त लोगों के लिए, और यही सज्जनों के लिए संयम के साधन हैं।

श्लोक 15 (skanda.6.37.15)

तत्र येऽपि हि युष्माकं मदा एव व्यवस्थिताः । यतस्ततोऽन्वयेऽप्येवं भविष्यति मदान्विताः

tatra ye'pi hi yuṣmākaṁ madā eva vyavasthitāḥ | yatastato'nvaye'pyevaṁ bhaviṣyati madānvitāḥ

चूँकि तुम सब में इन्हीं मदों की प्रधानता स्थापित हो गई है, इसलिए तुम्हारे वंश में भी सदा इसी प्रकार के मदयुक्त लोग उत्पन्न होंगे।

श्लोक 16 (skanda.6.37.16)

सदा सौहृदनिर्मुक्ताः पितरोऽपि सुतैः सह । भविष्यंति पुरे ह्यस्मिन्किं पुनर्बांधवादयः

sadā sauhṛdanirmuktāḥ pitaro'pi sutaiḥ saha | bhaviṣyaṁti pure hyasminkiṁ punarbāṁdhavādayaḥ

इस नगर में पिता भी अपने पुत्रों के साथ सदा स्नेह-रहित हो जाएँगे, फिर बंधु-बांधवों की तो बात ही क्या!

श्लोक 17 (skanda.6.37.17)

एवमुक्त्वा स विप्रेन्द्रो निवृत्तस्तदनन्तरम् । अपमानं परं प्राप्य ब्राह्मणानां द्विजोत्तमाः

evamuktvā sa viprendro nivṛttastadanantaram | apamānaṁ paraṁ prāpya brāhmaṇānāṁ dvijottamāḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ऐसा कहकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण (दुर्वासा), ब्राह्मणों से घोर अपमान पाकर, वहाँ से लौट पड़े।

श्लोक 18 (skanda.6.37.18)

अथ तन्मध्यगो विप्र आसीद्वृद्धतमः सुधीः । सुशील इति विख्यातो वेदवेदांगपारगः

atha tanmadhyago vipra āsīdvṛddhatamaḥ sudhīḥ | suśīla iti vikhyāto vedavedāṁgapāragaḥ

उस समूह के बीच एक अत्यंत वृद्ध और बुद्धिमान ब्राह्मण था, जो सुशील नाम से विख्यात और वेद-वेदांगों में पारंगत था।

श्लोक 19 (skanda.6.37.19)

स दृष्ट्वा तं मुनिं क्रुद्धं गच्छंतमपमानितम् । सत्वरं प्रययौ पृष्ठे तिष्ठ तिष्ठेति च ब्रुवन्

sa dṛṣṭvā taṁ muniṁ kruddhaṁ gacchaṁtamapamānitam | satvaraṁ prayayau pṛṣṭhe tiṣṭha tiṣṭheti ca bruvan

अपमानित होकर क्रोध में जाते हुए उन मुनि को देखकर, वह "ठहरो, ठहरो" कहते हुए शीघ्र उनके पीछे गया।

श्लोक 20 (skanda.6.37.20)

अथासाद्य गतं दूरं प्रणिपत्य मुनिं च सः । प्रोवाच क्षम्यतां विप्र विप्राणां वचनान्मम

athāsādya gataṁ dūraṁ praṇipatya muniṁ ca saḥ | provāca kṣamyatāṁ vipra viprāṇāṁ vacanānmama

दूर तक जा चुके उन मुनि तक पहुँचकर, उन्हें प्रणाम करके वह बोला -- "हे विप्र! ब्राह्मणों के व्यवहार के लिए मेरी बात मानकर क्षमा कीजिए।"

श्लोक 21 (skanda.6.37.21)

एतैः स्वाध्यायसंपन्नैर्न श्रुतं वचनं तव । नोत्तरं तेन संदत्तं सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम्

etaiḥ svādhyāyasaṁpannairna śrutaṁ vacanaṁ tava | nottaraṁ tena saṁdattaṁ satyametadbravīmyaham

"इन स्वाध्याय में लीन लोगों ने तुम्हारा वचन ही नहीं सुना, इसीलिए इन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया; मैं यह सत्य ही कह रहा हूँ।"

श्लोक 22 (skanda.6.37.22)

तस्माद्भूमिर्मया दत्ता शंभुहर्म्यकृते तव । अस्मिन्स्थाने द्विजश्रेष्ठ प्रासादं कर्तुमर्हसि

tasmādbhūmirmayā dattā śaṁbhuharmyakṛte tava | asminsthāne dvijaśreṣṭha prāsādaṁ kartumarhasi

"इसलिए हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! मैंने शम्भु के मंदिर के लिए तुम्हें यह भूमि दे दी है; इसी स्थान पर तुम मंदिर बनाओ।"

श्लोक 23 (skanda.6.37.23)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दुर्वासा हर्षसंयुतः । क्षितिदानोद्भवां चक्रे स्वस्ति ब्राह्मणसत्तमाः । प्रासादं निर्ममे पश्चात्तस्य वाक्ये व्यवस्थितः

tasya tadvacanaṁ śrutvā durvāsā harṣasaṁyutaḥ | kṣitidānodbhavāṁ cakre svasti brāhmaṇasattamāḥ | prāsādaṁ nirmame paścāttasya vākye vyavasthitaḥ

उसकी यह बात सुनकर दुर्वासा हर्षित हुए, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! भूमि-दान से उत्पन्न हुए मंगल-कार्य किए, और फिर उसी के वचन पर स्थित होकर वहाँ मंदिर बनवाया।

श्लोक 24 (skanda.6.37.24)

अथ ते ब्राह्मणा ज्ञात्वा सुशीलेन वसुन्धरा । देवतायतनार्थाय दत्ता तस्मै तपस्विने

atha te brāhmaṇā jñātvā suśīlena vasundharā | devatāyatanārthāya dattā tasmai tapasvine

तब जब उन ब्राह्मणों को यह पता चला कि सुशील ने उस तपस्वी को देव-मंदिर के लिए भूमि दे दी है --

श्लोक 25 (skanda.6.37.25)

सर्वे कोपसमायुक्ताः सुशीलं प्रति ते द्विजाः

sarve kopasamāyuktāḥ suśīlaṁ prati te dvijāḥ

-- तो वे सारे ब्राह्मण सुशील के प्रति क्रोध से भर उठे।

श्लोक 26 (skanda.6.37.26)

ततः प्रोचुः समासाद्य येन शप्ता दुरात्मना । वयं तस्मै त्वया दत्ता प्रासादार्थं वसुन्धरा

tataḥ procuḥ samāsādya yena śaptā durātmanā | vayaṁ tasmai tvayā dattā prāsādārthaṁ vasundharā

तब वे उसके पास जाकर बोले -- "जिस दुरात्मा ने हमें शाप दिया, तुमने उसी को मंदिर के लिए भूमि दे दी!"

श्लोक 27 (skanda.6.37.27)

तस्मात्त्वमपि चास्माकं बाह्य एव भविष्यसि । सुशीलोऽपि हि दुःशीलो नाम्ना संकीर्त्यसे बुधैः

tasmāttvamapi cāsmākaṁ bāhya eva bhaviṣyasi | suśīlo'pi hi duḥśīlo nāmnā saṁkīrtyase budhaiḥ

"इसलिए तुम भी अब हमसे बाह्य (बहिष्कृत) ही हो जाओगे; सुशील होते हुए भी अब बुद्धिमान लोग तुम्हें 'दुःशील' के नाम से पुकारेंगे।"

श्लोक 28 (skanda.6.37.28)

एषोऽपि तापसो दुष्टो यः करोति शिवालयम् । नैव तस्य भवेत्सिद्धिश्चापि वर्षशतैरपि

eṣo'pi tāpaso duṣṭo yaḥ karoti śivālayam | naiva tasya bhavetsiddhiścāpi varṣaśatairapi

"और यह दुष्ट तापसी भी, जो शिव-मंदिर बना रहा है -- इसे सैकड़ों वर्षों में भी सिद्धि प्राप्त नहीं होगी।"

श्लोक 29 (skanda.6.37.29)

तथा कीर्तिकृतां लोके कीर्तनं क्रियते नरैः । ततः संपश्यतां चास्य कीर्तिर्नास्य तु दुर्मतेः

tathā kīrtikṛtāṁ loke kīrtanaṁ kriyate naraiḥ | tataḥ saṁpaśyatāṁ cāsya kīrtirnāsya tu durmateḥ

"जैसे संसार में यशस्वी लोगों का लोग कीर्तन करते हैं, वैसे उन (दुर्वासा) की तो कीर्ति सभी के देखते-देखते बनी रहेगी, परन्तु इस दुर्बुद्धि सुशील की कोई कीर्ति नहीं होगी।"

श्लोक 30 (skanda.6.37.30)

एष दुःशीलसंज्ञो वै तव नाम्ना भविष्यति । प्रासादो नाममात्रेण न संपूर्णः कदाचन

eṣa duḥśīlasaṁjño vai tava nāmnā bhaviṣyati | prāsādo nāmamātreṇa na saṁpūrṇaḥ kadācana

"तुम्हारे ही नाम से यह मंदिर 'दुःशील' नाम से जाना जाएगा, और नाममात्र होकर भी यह कभी पूर्ण नहीं होगा।"

श्लोक 31 (skanda.6.37.31)

यस्मात्सौहृदनिर्मुक्ताः कृतास्तेन वयं द्विजाः । मदैस्त्रिभिः समायुक्ताः सर्वान्वयसमन्विताः

yasmātsauhṛdanirmuktāḥ kṛtāstena vayaṁ dvijāḥ | madaistribhiḥ samāyuktāḥ sarvānvayasamanvitāḥ

"चूँकि उसने हमें, तीनों मदों से युक्त तथा अपने संपूर्ण वंश सहित, स्नेह-रहित बना दिया है --"

श्लोक 32 (skanda.6.37.32)

तस्मादेषोऽपि पापात्मा भविष्यति स कोपभाक् । तप्तं तप्तं तपो येन संप्रयास्यति संक्षयम्

tasmādeṣo'pi pāpātmā bhaviṣyati sa kopabhāk | taptaṁ taptaṁ tapo yena saṁprayāsyati saṁkṣayam

"-- इसलिए यह पापात्मा भी क्रोध का भागी होगा, जिसके कारण उसका तपाया हुआ तप बार-बार नष्ट होता रहेगा।"

श्लोक 33 (skanda.6.37.33)

एवमुक्त्वाथ ते विप्राः कोपसंरक्तलोचनाः । दुःशीलं संपरित्यज्य प्रविष्टाः स्वपुरे ततः

evamuktvātha te viprāḥ kopasaṁraktalocanāḥ | duḥśīlaṁ saṁparityajya praviṣṭāḥ svapure tataḥ

ऐसा कहकर क्रोध से लाल आँखों वाले वे ब्राह्मण दुःशील को त्यागकर अपने नगर में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 34 (skanda.6.37.34)

दुःशीलोऽपि बहिश्चक्रे गृहं तस्य पुरस्य च । देवशर्मा यथापूर्वं संत्यक्तः पुरवासिभिः

duḥśīlo'pi bahiścakre gṛhaṁ tasya purasya ca | devaśarmā yathāpūrvaṁ saṁtyaktaḥ puravāsibhiḥ

जैसे पहले नगरवासियों द्वारा देवशर्मा त्याग दिए गए थे, वैसे ही दुःशील ने भी अपना घर उस नगर के बाहर बना लिया।

श्लोक 35 (skanda.6.37.35)

तस्यान्वयेऽपि ये जातास्ते बाह्याः संप्रकीर्तिताः । बाह्याः क्रियासु सर्वासु सर्वेषां पुरवासिनाम्

tasyānvaye'pi ye jātāste bāhyāḥ saṁprakīrtitāḥ | bāhyāḥ kriyāsu sarvāsu sarveṣāṁ puravāsinām

उसके वंश में जो लोग उत्पन्न हुए, वे "बाह्य" (बहिष्कृत) कहलाए, तथा सभी नगरवासियों की समस्त क्रियाओं से बाहर रहे।

श्लोक 36 (skanda.6.37.36)

सूत उवाच । एवं तेषु द्विजेंद्रेषु शापं दत्त्वा गतेषु च । दुर्वासाः प्राह दुःशीलं कोपसंरक्तलोचनः

sūta uvāca | evaṁ teṣu dvijeṁdreṣu śāpaṁ dattvā gateṣu ca | durvāsāḥ prāha duḥśīlaṁ kopasaṁraktalocanaḥ

सूत जी ने कहा -- इस प्रकार शाप देकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों के चले जाने पर, क्रोध से लाल आँखों वाले दुर्वासा ने दुःशील से कहा --

श्लोक 37 (skanda.6.37.37)

मम सिद्धिं गता मंत्राः समर्थाः शत्रुसंक्षये । आथर्वणास्तथा चान्ये वेदत्रयसमुद्भवाः

mama siddhiṁ gatā maṁtrāḥ samarthāḥ śatrusaṁkṣaye | ātharvaṇāstathā cānye vedatrayasamudbhavāḥ

"मेरे मंत्र सिद्ध हो चुके हैं, जो शत्रु के विनाश में समर्थ हैं -- अथर्ववेद के तथा तीनों वेदों से उत्पन्न अन्य मंत्र भी।"

श्लोक 38 (skanda.6.37.38)

तस्मादेतत्पुरं कृत्स्नं पशुपक्षि समन्वितम् । नाशमद्य नयिष्यामि यथा शत्रोर्हि दुष्टकः

tasmādetatpuraṁ kṛtsnaṁ paśupakṣi samanvitam | nāśamadya nayiṣyāmi yathā śatrorhi duṣṭakaḥ

"इसलिए मैं आज ही इस सम्पूर्ण नगर को, पशु-पक्षियों सहित, वैसे ही नष्ट कर दूँगा जैसे किसी दुष्ट शत्रु को किया जाता है।"

श्लोक 39 (skanda.6.37.39)

दुःशील उवाच । नैतद्युक्तं नरश्रेष्ठ तव कर्तुं कथंचन । ब्राह्मणानां कृते कर्म ब्राह्मणस्य विशेषतः

duḥśīla uvāca | naitadyuktaṁ naraśreṣṭha tava kartuṁ kathaṁcana | brāhmaṇānāṁ kṛte karma brāhmaṇasya viśeṣataḥ

दुःशील ने कहा -- हे नरश्रेष्ठ! ब्राह्मणों के विरुद्ध यह कार्य, विशेषकर एक ब्राह्मण के लिए, आपको किसी भी प्रकार से करना उचित नहीं है।

श्लोक 40 (skanda.6.37.40)

निघ्नंतो वा शपंतो वा वदंतो वापि निष्ठुरम् । पूजनीयाः सदा विप्रा दिव्याँल्लोकानभीप्सुभिः

nighnaṁto vā śapaṁto vā vadaṁto vāpi niṣṭhuram | pūjanīyāḥ sadā viprā divyā~llokānabhīpsubhiḥ

जो दिव्य लोकों की कामना करते हैं, उन्हें चाहे ब्राह्मण उन्हें मारें, शाप दें, या कठोर वचन कहें, फिर भी ब्राह्मण सदा पूजनीय ही होते हैं।

श्लोक 41 (skanda.6.37.41)

ब्राह्मणैर्निर्जितैर्मेने य आत्मानं जयान्वितम् । तामिस्रादिषु घोरेषु नरकेषु स पच्यते

brāhmaṇairnirjitairmene ya ātmānaṁ jayānvitam | tāmisrādiṣu ghoreṣu narakeṣu sa pacyate

जो व्यक्ति ब्राह्मणों को पराजित करके स्वयं को विजयी मानता है, वह तामिस्र आदि घोर नरकों में पकाया जाता है।

श्लोक 42 (skanda.6.37.42)

आत्मनश्च पराभूतिं तस्माद्विप्रात्सहेत वै । य इच्छेद्वसतिं स्वर्गे शाश्वतीं द्विजसत्तम

ātmanaśca parābhūtiṁ tasmādviprātsaheta vai | ya icchedvasatiṁ svarge śāśvatīṁ dvijasattama

हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! जो स्वर्ग में शाश्वत निवास चाहता है, उसे ब्राह्मण से मिली अपनी पराजय को भी सहन कर लेना चाहिए।

श्लोक 43 (skanda.6.37.43)

एतेषां ब्राह्मणेंद्राणां क्षेत्रे सिद्धिं समागताः । मंत्रास्ते तत्कथं नाशं त्वमेतेषां करिष्यसि

eteṣāṁ brāhmaṇeṁdrāṇāṁ kṣetre siddhiṁ samāgatāḥ | maṁtrāste tatkathaṁ nāśaṁ tvameteṣāṁ kariṣyasi

इन्हीं श्रेष्ठ ब्राह्मणों के क्षेत्र में आपके मंत्र सिद्धि को प्राप्त हुए हैं; फिर आप इन्हीं का विनाश कैसे करेंगे?

श्लोक 44 (skanda.6.37.44)

ब्रह्मघ्ने च सुरापे च चौरे भग्नवते तथा । निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः

brahmaghne ca surāpe ca caure bhagnavate tathā | niṣkṛtirvihitā sadbhiḥ kṛtaghne nāsti niṣkṛtiḥ

ब्रह्महत्यारे, सुरापायी, चोर तथा व्रतभंग करने वाले के लिए भी सज्जनों ने प्रायश्चित्त बताया है, परन्तु कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है।

श्लोक 45 (skanda.6.37.45)

तस्मात्कोपो न कर्तव्यः क्षेत्रे चात्र व्यवस्थितैः । क्षमां कुरु मुनिश्रेष्ठ कृपां कृत्वा ममोपरि

tasmātkopo na kartavyaḥ kṣetre cātra vyavasthitaiḥ | kṣamāṁ kuru muniśreṣṭha kṛpāṁ kṛtvā mamopari

इसलिए इस क्षेत्र में रहने वालों पर क्रोध नहीं करना चाहिए; हे मुनिश्रेष्ठ! मुझ पर कृपा करके क्षमा कीजिए।

श्लोक 46 (skanda.6.37.46)

सूत उवाच । स तथेति प्रतिज्ञाय तत्र कृत्वावसत्तपः । प्राप्तश्च परमां सिद्धिं दुर्लभां त्रिदशैरपि

sūta uvāca | sa tatheti pratijñāya tatra kṛtvāvasattapaḥ | prāptaśca paramāṁ siddhiṁ durlabhāṁ tridaśairapi

सूत जी ने कहा -- "ऐसा ही होगा" कहकर, उन्होंने वहीं रहकर तप किया, और देवताओं को भी दुर्लभ परम सिद्धि को प्राप्त किया।

श्लोक 47 (skanda.6.37.47)

दुःशीलाख्यः क्षितौ सोऽपि प्रासादः ख्याति मागतः । यस्य संदर्शनादेव नरः पापात्प्रमुच्यते

duḥśīlākhyaḥ kṣitau so'pi prāsādaḥ khyāti māgataḥ | yasya saṁdarśanādeva naraḥ pāpātpramucyate

"दुःशील" नाम से जाना जाने वाला वह मंदिर पृथ्वी पर विख्यात हुआ, जिसके दर्शनमात्र से ही मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 48 (skanda.6.37.48)

तस्य मध्यगतं लिंगं शुक्लाष्टम्यां सदा नरः । यः पश्यति क्षणं ध्यात्वा नरकं स न पश्यति

tasya madhyagataṁ liṁgaṁ śuklāṣṭamyāṁ sadā naraḥ | yaḥ paśyati kṣaṇaṁ dhyātvā narakaṁ sa na paśyati

उसके मध्य में स्थित लिंग को जो मनुष्य शुक्ल अष्टमी को सदा एक क्षण भर भी ध्यानपूर्वक देखता है, वह नरक को नहीं देखता।

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