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नागर खण्ड · अध्याय 38

धुन्धुमारेश्वर माहात्म्य वर्णन

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

श्लोक 1 (skanda.6.38.1)

सूत उवाच । तत्रैव स्थापितं लिंगं धुन्धुमारेण भूभुजा । सर्वरत्नमयं कृत्वा प्रासादं सुमनोहरम्

sūta uvāca | tatraiva sthāpitaṁ liṁgaṁ dhundhumāreṇa bhūbhujā | sarvaratnamayaṁ kṛtvā prāsādaṁ sumanoharam

सूत जी ने कहा -- राजा धुन्धुमार ने वहीं सब रत्नों से बने एक मनोहर मंदिर का निर्माण करके एक लिंग की स्थापना की।

श्लोक 2 (skanda.6.38.2)

तत्र कृत्वाऽऽश्रमं श्रेष्ठं तपस्तेपे सुदारुणम् । यत्प्रभावादयं देवस्तस्मिँल्लिङ्गे व्यवस्थितः

tatra kṛtvā''śramaṁ śreṣṭhaṁ tapastepe sudāruṇam | yatprabhāvādayaṁ devastasmi~lliṅge vyavasthitaḥ

वहाँ एक उत्तम आश्रम बनाकर उसने घोर तप किया, जिसके प्रभाव से यह देव उसी लिंग में सदा स्थित हो गए।

श्लोक 3 (skanda.6.38.3)

तस्य संनिहिता वापी कृता तेन महात्मना । सुनिर्मलजलापूर्णा सर्वतीर्थोपमा शुभा

tasya saṁnihitā vāpī kṛtā tena mahātmanā | sunirmalajalāpūrṇā sarvatīrthopamā śubhā

उस महात्मा ने उसके निकट ही एक शुभ बावड़ी भी बनाई, जो अत्यंत निर्मल जल से भरी हुई और समस्त तीर्थों के समान थी।

श्लोक 4 (skanda.6.38.4)

धुन्धुमारेश्वरं पश्येत्तत्र स्नात्वा नरोत्तमः । न स पश्यति दुर्गाणि नरकाणि यमालये

dhundhumāreśvaraṁ paśyettatra snātvā narottamaḥ | na sa paśyati durgāṇi narakāṇi yamālaye

जो श्रेष्ठ मनुष्य वहाँ स्नान करके धुन्धुमारेश्वर का दर्शन करता है, वह यमलोक के दुर्गम नरकों को कभी नहीं देखता।

श्लोक 5 (skanda.6.38.5)

ऋषयः उवाच । धुंधुमारो महीपालः कस्मिन्वंशे बभूव सः । कस्मिन्काले तपस्तप्तं तेनात्र सुमहात्मना

ṛṣayaḥ uvāca | dhuṁdhumāro mahīpālaḥ kasminvaṁśe babhūva saḥ | kasminkāle tapastaptaṁ tenātra sumahātmanā

ऋषियों ने कहा -- राजा धुन्धुमार किस वंश में उत्पन्न हुए थे, और उस महात्मा ने यहाँ किस काल में तप किया था?

श्लोक 6 (skanda.6.38.6)

सूत उवाच । सूर्यवंशसमुद्भूतो बृहदश्वसुतो बली । ख्यातः कुवलयाश्वेति धंधुमारस्तथैव सः

sūta uvāca | sūryavaṁśasamudbhūto bṛhadaśvasuto balī | khyātaḥ kuvalayāśveti dhaṁdhumārastathaiva saḥ

सूत जी ने कहा -- सूर्यवंश में उत्पन्न, बृहदश्व के बलवान पुत्र, कुवलयाश्व नाम से विख्यात वही धुन्धुमार थे।

श्लोक 7 (skanda.6.38.7)

तेन धुन्धुर्महादैत्यो निहतो मरुजांगले । धुन्धुमारः स्मृतस्तेन विख्यातो भुवनत्रये

tena dhundhurmahādaityo nihato marujāṁgale | dhundhumāraḥ smṛtastena vikhyāto bhuvanatraye

उसने मरु प्रदेश में धुन्धु नामक महादैत्य को मार डाला था, इसीलिए वह तीनों लोकों में धुन्धुमार नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 8 (skanda.6.38.8)

चमत्कारपुरं क्षेत्रं स गत्वा पावनं महत् । तपस्तेपे वयोंऽते च ध्यायमानो महेश्वरम्

camatkārapuraṁ kṣetraṁ sa gatvā pāvanaṁ mahat | tapastepe vayoṁ'te ca dhyāyamāno maheśvaram

अपने जीवन के अंतिम काल में वह उस महान पवित्र चमत्कारपुर क्षेत्र में जाकर, महेश्वर का ध्यान करते हुए तप करने लगा।

श्लोक 9 (skanda.6.38.9)

संस्थाप्य सुमहल्लिंगं प्रासादे रत्नमंडिते । बलिपूजोपहाराद्यैः पुष्पधूपानुलेपनैः

saṁsthāpya sumahalliṁgaṁ prāsāde ratnamaṁḍite | balipūjopahārādyaiḥ puṣpadhūpānulepanaiḥ

उसने रत्न-जड़ित मंदिर में एक विशाल लिंग की स्थापना कर, बलि, पूजा, उपहार, पुष्प, धूप और अनुलेपन आदि से उसकी अर्चना की।

श्लोक 10 (skanda.6.38.10)

ततस्तस्य महादेवः स्वयमेव महेश्वरः । प्रत्यक्षोऽभूद्वृषारूढो गौर्या सह तथा गणैः

tatastasya mahādevaḥ svayameva maheśvaraḥ | pratyakṣo'bhūdvṛṣārūḍho gauryā saha tathā gaṇaiḥ

तब महादेव महेश्वर स्वयं ही, बैल पर सवार होकर, गौरी और अपने गणों के साथ उसके सामने प्रकट हुए।

श्लोक 11 (skanda.6.38.11)

उवाच वरदोऽस्मीति प्रार्थयस्व यथेप्सितम् । सर्वं तेऽहं प्रदास्यामि यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्

uvāca varado'smīti prārthayasva yathepsitam | sarvaṁ te'haṁ pradāsyāmi yadyapi syātsudurlabham

उन्होंने कहा -- "मैं वर देने को तैयार हूँ, जो चाहो माँग लो; मैं तुम्हें वह सब दूँगा, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।"

श्लोक 12 (skanda.6.38.12)

धुन्धुमार उवाच । यदि देयो वरोऽस्माकं त्वया सर्वसुरेश्वर । संनिधानं प्रकर्तव्यं लिंगेऽस्मिन्वृषभध्वज

dhundhumāra uvāca | yadi deyo varo'smākaṁ tvayā sarvasureśvara | saṁnidhānaṁ prakartavyaṁ liṁge'sminvṛṣabhadhvaja

धुन्धुमार ने कहा -- हे सर्वसुरेश्वर! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो हे वृषभध्वज! आप सदा इसी लिंग में अपनी उपस्थिति बनाए रखें।

श्लोक 13 (skanda.6.38.13)

श्रीभगवान् उवाच । चैत्रे शुक्लचतुर्दश्यां सांनिध्यं नृपसत्तम । अहं सदा करिष्यामि गौर्या सार्धं न संशयः

śrībhagavān uvāca | caitre śuklacaturdaśyāṁ sāṁnidhyaṁ nṛpasattama | ahaṁ sadā kariṣyāmi gauryā sārdhaṁ na saṁśayaḥ

श्रीभगवान ने कहा -- हे राजश्रेष्ठ! चैत्र मास की शुक्ल चतुर्दशी को मैं सदा गौरी के साथ यहाँ निःसंदेह उपस्थित रहूँगा।

श्लोक 14 (skanda.6.38.14)

तत्र वाप्यां नरः स्नात्वा यो मां संपूजयिष्यति । लिंगेऽस्मिन्संस्थितं भूप मम लोकं स यास्यति

tatra vāpyāṁ naraḥ snātvā yo māṁ saṁpūjayiṣyati | liṁge'sminsaṁsthitaṁ bhūpa mama lokaṁ sa yāsyati

हे राजन्! जो मनुष्य उस बावड़ी में स्नान करके, इस लिंग में स्थित मुझे पूजेगा, वह मेरे लोक को प्राप्त होगा।

श्लोक 15 (skanda.6.38.15)

सूत उवाच । एवमुक्त्वा स भगवांस्ततश्चादर्शनं गतः । सोऽपि राजा प्रहृष्टात्मा स्थितस्तत्रैव मुक्तिभाक्

sūta uvāca | evamuktvā sa bhagavāṁstataścādarśanaṁ gataḥ | so'pi rājā prahṛṣṭātmā sthitastatraiva muktibhāk

सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर वे भगवान वहाँ से अंतर्धान हो गए, और वह राजा भी प्रसन्नचित्त होकर वहीं मुक्ति का भागी होकर स्थित हो गया।

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