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नागर खण्ड · अध्याय 39

ययातीश्वर माहात्म्य वर्णन

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40

श्लोक 1 (skanda.6.39.1)

सूत उवाच । तस्यैवोत्तरदिग्भागे धुन्धुमारेश्वरस्य च । ययातिना नरेंद्रेण स्थापितं लिंगमुत्तमम्

sūta uvāca | tasyaivottaradigbhāge dhundhumāreśvarasya ca | yayātinā nareṁdreṇa sthāpitaṁ liṁgamuttamam

सूत जी ने कहा -- उसी धुन्धुमारेश्वर के उत्तर दिशा भाग में राजा ययाति द्वारा स्थापित एक उत्तम लिंग है।

श्लोक 2 (skanda.6.39.2)

देवयान्या तथान्यच्च तथा शर्मिष्ठया द्विजाः । भार्यया भूपतेस्तस्य सर्वकामफलप्रदम्

devayānyā tathānyacca tathā śarmiṣṭhayā dvijāḥ | bhāryayā bhūpatestasya sarvakāmaphalapradam

हे ब्राह्मणो! उस राजा की पत्नियों देवयानी और शर्मिष्ठा द्वारा भी स्थापित, वह सम्पूर्ण कामनाओं का फल देने वाला है।

श्लोक 3 (skanda.6.39.3)

स यदा सर्वभोगानां तृप्तिं प्राप्तो द्विजोत्तमाः । तदा पुत्रस्य राज्यं स्वं वपुश्चैव न्यवेदयत्

sa yadā sarvabhogānāṁ tṛptiṁ prāpto dvijottamāḥ | tadā putrasya rājyaṁ svaṁ vapuścaiva nyavedayat

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जब वह राजा समस्त भोगों से तृप्त हो गया, तब उसने अपना राज्य और अपना ही शरीर (यौवन) अपने पुत्र को सौंप दिया।

श्लोक 4 (skanda.6.39.4)

जरामादाय तद्गात्राद्भार्याभ्यां सहितस्तदा । पप्रच्छ विनयोपेतो मार्कंडं मुनिसत्तमम्

jarāmādāya tadgātrādbhāryābhyāṁ sahitastadā | papraccha vinayopeto mārkaṁḍaṁ munisattamam

फिर पुत्र की जरा को अपने शरीर पर लेकर, अपनी दोनों पत्नियों के साथ, उसने विनयपूर्वक मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय से यह पूछा --

श्लोक 5 (skanda.6.39.5)

भगवन्सर्वतीर्थानां क्षेत्राणां च वदस्व मे । यत्प्रधानं पवित्रं यत्तदस्माकं प्रकीर्तय

bhagavansarvatīrthānāṁ kṣetrāṇāṁ ca vadasva me | yatpradhānaṁ pavitraṁ yattadasmākaṁ prakīrtaya

"हे भगवन्! समस्त तीर्थों और क्षेत्रों में जो सबसे प्रधान और पवित्र है, वह मुझे बताइए, वह हमें कहिए।"

श्लोक 6 (skanda.6.39.6)

श्रीमार्कंडेय उवाच । क्षेत्राणामिह सर्वेषां तीर्थैः सर्वैरलंकृतम् । चमत्कारपुरं क्षेत्रं सांप्रतं प्रतिभाति नः

śrīmārkaṁḍeya uvāca | kṣetrāṇāmiha sarveṣāṁ tīrthaiḥ sarvairalaṁkṛtam | camatkārapuraṁ kṣetraṁ sāṁprataṁ pratibhāti naḥ

श्रीमार्कण्डेय ने कहा -- यहाँ के समस्त क्षेत्रों में, समस्त तीर्थों से सुशोभित चमत्कारपुर क्षेत्र ही हमें अभी सर्वश्रेष्ठ प्रतीत होता है।

श्लोक 7 (skanda.6.39.7)

यत्र विष्णुपदी गंगा जंतूनां पापनाशिनी । स्वयं स्थिता नृपश्रेष्ठ तथा देवा हरादयः

yatra viṣṇupadī gaṁgā jaṁtūnāṁ pāpanāśinī | svayaṁ sthitā nṛpaśreṣṭha tathā devā harādayaḥ

हे राजश्रेष्ठ! जहाँ प्राणियों के पापों का नाश करने वाली विष्णुपदी गंगा स्वयं निवास करती है, तथा शिव आदि देवता भी स्वयं वहाँ स्थित हैं।

श्लोक 8 (skanda.6.39.8)

तथान्यानि च तीर्थानि यानि संति धरातले । तेषां यत्र च सांनिध्यं सर्वदा नृपसत्तम

tathānyāni ca tīrthāni yāni saṁti dharātale | teṣāṁ yatra ca sāṁnidhyaṁ sarvadā nṛpasattama

हे श्रेष्ठ राजन्! पृथ्वीतल पर जितने भी अन्य तीर्थ हैं, उन सबकी उपस्थिति भी सदा वहीं बनी रहती है।

श्लोक 9 (skanda.6.39.9)

शिला यत्र द्विपञ्चाशद्धस्तानां परिसंख्यया । पितामहेन निर्मुक्ता प्रमोदाय द्विजन्मनाम्

śilā yatra dvipañcāśaddhastānāṁ parisaṁkhyayā | pitāmahena nirmuktā pramodāya dvijanmanām

जहाँ पितामह ब्रह्मा ने ब्राह्मणों के आनंद के लिए बावन हाथ की परिधि वाली एक शिला को छोड़ा था।

श्लोक 10 (skanda.6.39.10)

यदन्यत्र शुभं कर्म वर्षेणैकेन सिध्यति । तत्तत्र दिवसेनापि सिद्धिं याति क्षितीश्वर

yadanyatra śubhaṁ karma varṣeṇaikena sidhyati | tattatra divasenāpi siddhiṁ yāti kṣitīśvara

हे पृथ्वीपते! जो शुभ कर्म अन्यत्र एक वर्ष में सिद्ध होता है, वही वहाँ एक ही दिन में सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 11 (skanda.6.39.11)

तस्मात्तत्र द्रुतं गत्वा तपः कुरु महीपते । येन प्राप्स्यसि चित्तस्थाँल्लोकान्भार्यासमन्वितः

tasmāttatra drutaṁ gatvā tapaḥ kuru mahīpate | yena prāpsyasi cittasthā~llokānbhāryāsamanvitaḥ

इसलिए हे राजन्! शीघ्र वहाँ जाकर तप कीजिए, जिससे आप अपनी पत्नियों सहित अपने मन-वांछित लोकों को प्राप्त कर सकें।

श्लोक 12 (skanda.6.39.12)

सूत उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स राजा नहुषात्मजः । चमत्कारपुरे क्षेत्रे भार्याभ्यां सहितो ययौ

sūta uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā sa rājā nahuṣātmajaḥ | camatkārapure kṣetre bhāryābhyāṁ sahito yayau

सूत जी ने कहा -- उनके यह वचन सुनकर नहुष-पुत्र वह राजा (ययाति) अपनी दोनों पत्नियों सहित चमत्कारपुर क्षेत्र को गया।

श्लोक 13 (skanda.6.39.13)

ततः संस्थाप्य तल्लिंगं देवदेवस्य शूलिनः । सम्यगाराधयामास श्रद्धया परया युतः

tataḥ saṁsthāpya talliṁgaṁ devadevasya śūlinaḥ | samyagārādhayāmāsa śraddhayā parayā yutaḥ

तब त्रिशूलधारी देवदेव का वह लिंग स्थापित करके, वह परम श्रद्धा से युक्त होकर भलीभाँति उसकी आराधना करने लगा।

श्लोक 14 (skanda.6.39.14)

ततस्तस्य प्रभावेन भार्याभ्यां सहितो नृपः । विमानवरमारूढो जगाम त्रिदिवालयम्

tatastasya prabhāvena bhāryābhyāṁ sahito nṛpaḥ | vimānavaramārūḍho jagāma tridivālayam

फिर उसके प्रभाव से वह राजा अपनी दोनों पत्नियों सहित उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्गलोक को चला गया।

श्लोक 15 (skanda.6.39.15)

किन्नरैर्गीयमानश्च स्तूयमानश्च चारणैः । स्पर्द्धमानः समं देवैर्द्वादशार्कसमप्रभः

kinnarairgīyamānaśca stūyamānaśca cāraṇaiḥ | sparddhamānaḥ samaṁ devairdvādaśārkasamaprabhaḥ

किन्नरों द्वारा गाया जाता हुआ, चारणों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ, बारह सूर्यों के समान तेजस्वी वह राजा देवताओं के साथ स्पर्धा करता हुआ चला गया।

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