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नागर खण्ड · अध्याय 40

चित्रशिला माहात्म्य वर्णन

अध्याय 39अध्याय-सूचीअध्याय 41

श्लोक 1 (skanda.6.40.1)

ऋषयः उवाच । यदेषा भवता प्रोक्ता ब्राह्मी तत्र महाशिला । मोक्षदा सर्वजंतूनां तथा पातकनाशिनी

ṛṣayaḥ uvāca | yadeṣā bhavatā proktā brāhmī tatra mahāśilā | mokṣadā sarvajaṁtūnāṁ tathā pātakanāśinī

ऋषियों ने कहा -- आपने जो यह कहा कि वहाँ ब्रह्मा की वह महाशिला समस्त प्राणियों को मोक्ष देने वाली और पातकों का नाश करने वाली है --

श्लोक 2 (skanda.6.40.2)

सा कथं स्थापिता तत्र किंप्रभावा च सूतज । एतन्नो ब्रूहि निःशेषं न हि तृप्यामहे वयम्

sā kathaṁ sthāpitā tatra kiṁprabhāvā ca sūtaja | etanno brūhi niḥśeṣaṁ na hi tṛpyāmahe vayam

-- वह वहाँ किस प्रकार स्थापित हुई, और उसका क्या प्रभाव है, हे सूतपुत्र? यह हमें पूरी तरह बताइए, हम इससे तृप्त नहीं होते।

श्लोक 3 (skanda.6.40.3)

सूत उवाच । ब्रह्मलोकनिविष्टस्य ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । पुराऽभून्महती चिन्ता तीर्थयात्रासमुद्भवा

sūta uvāca | brahmalokaniviṣṭasya brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ | purā'bhūnmahatī cintā tīrthayātrāsamudbhavā

सूत जी ने कहा -- ब्रह्मलोक में निवास करने वाले, अव्यक्त से जन्मे ब्रह्मा को पूर्वकाल में तीर्थयात्रा से उत्पन्न एक बड़ी चिंता हुई।

श्लोक 4 (skanda.6.40.4)

सर्वेषामेव देवानां संति तीर्थानि भूतले । मुक्त्वा मां तन्मया कार्यं तीर्थमेकं धरातले

sarveṣāmeva devānāṁ saṁti tīrthāni bhūtale | muktvā māṁ tanmayā kāryaṁ tīrthamekaṁ dharātale

उन्होंने सोचा -- सभी देवताओं के तीर्थ पृथ्वीतल पर हैं, केवल मुझे छोड़कर; इसलिए मुझे भी पृथ्वी पर एक तीर्थ बनाना चाहिए,

श्लोक 5 (skanda.6.40.5)

यत्र त्रिकालमासाद्य कर्म संध्यासमुद्भवम् । मर्त्यलोकं समासाद्य करोमि तदनंतरम्

yatra trikālamāsādya karma saṁdhyāsamudbhavam | martyalokaṁ samāsādya karomi tadanaṁtaram

जहाँ मैं मृत्युलोक में जाकर तीनों संध्याओं में संध्या-कर्म कर सकूँ।

श्लोक 6 (skanda.6.40.6)

तथान्यदपि यत्किञ्चित्कर्म धर्म्यं हितावहम् । तत्करोमि यथान्येऽपि चक्रुर्देवाः शिवादयः

tathānyadapi yatkiñcitkarma dharmyaṁ hitāvaham | tatkaromi yathānye'pi cakrurdevāḥ śivādayaḥ

और जैसे शिव आदि अन्य देवताओं ने किया है, वैसे ही मैं भी अन्य जो कुछ भी धर्मानुकूल और हितकारी कर्म हो, वह करूँ।

श्लोक 7 (skanda.6.40.7)

न स्वर्गेऽस्ति हि कृत्यानामधिकारोऽत्र कश्चन । शुभानां कर्मणामेव केवलं भुज्यते फलम्

na svarge'sti hi kṛtyānāmadhikāro'tra kaścana | śubhānāṁ karmaṇāmeva kevalaṁ bhujyate phalam

क्योंकि स्वर्ग में तो शुभ कर्मों को करने का कोई अधिकार ही नहीं है, वहाँ तो केवल उनके फल का ही भोग किया जाता है।

श्लोक 8 (skanda.6.40.8)

तस्माद्यत्र धरापृष्ठे शिलेयं निपतिष्यति । त्रिसंध्यं तत्र गन्तव्यमनुष्ठानार्थमेव हि

tasmādyatra dharāpṛṣṭhe śileyaṁ nipatiṣyati | trisaṁdhyaṁ tatra gantavyamanuṣṭhānārthameva hi

इसलिए पृथ्वीतल पर जहाँ भी यह शिला गिरेगी, वहीं मुझे तीनों संध्याओं का अनुष्ठान करने के लिए जाना होगा।

श्लोक 9 (skanda.6.40.9)

एवमुक्त्वा सुविस्तीर्णां शिलां तामासनोद्भवाम् । प्रचिक्षेप धरापृष्ठं समुद्दिश्य पितामहः

evamuktvā suvistīrṇāṁ śilāṁ tāmāsanodbhavām | pracikṣepa dharāpṛṣṭhaṁ samuddiśya pitāmahaḥ

ऐसा कहकर पितामह ने अपने ही आसन से उत्पन्न उस विशाल शिला को पृथ्वीतल की ओर लक्ष्य करके फेंक दिया।

श्लोक 10 (skanda.6.40.10)

अथ सा पतिता भूमौ सर्वरत्नमयी शिला । चमत्कारपुरे क्षेत्रे सर्वक्षेत्रमहोदये

atha sā patitā bhūmau sarvaratnamayī śilā | camatkārapure kṣetre sarvakṣetramahodaye

वह सर्वरत्नमयी शिला सभी क्षेत्रों में सर्वोत्तम चमत्कारपुर क्षेत्र में भूमि पर आ गिरी।

श्लोक 11 (skanda.6.40.11)

तत आगत्य लोकेशः स्वयमेव धरातलम् । तत्क्षेत्रं वीक्षयामास व्याप्तं तीर्थैः समन्ततः

tata āgatya lokeśaḥ svayameva dharātalam | tatkṣetraṁ vīkṣayāmāsa vyāptaṁ tīrthaiḥ samantataḥ

तब लोकेश ब्रह्मा स्वयं ही पृथ्वीतल पर आकर, तीर्थों से चारों ओर व्याप्त उस क्षेत्र को देखने लगे।

श्लोक 12 (skanda.6.40.12)

ततः पुण्यतमे देशे दृष्ट्वा तां समुपस्थिताम् । शिलामानंदमापन्नः प्रोवाच तदनन्तरम्

tataḥ puṇyatame deśe dṛṣṭvā tāṁ samupasthitām | śilāmānaṁdamāpannaḥ provāca tadanantaram

फिर उस अत्यंत पुण्यमय स्थान में अपनी वहाँ पहुँची हुई शिला को देखकर, आनंद से भरकर उन्होंने यह कहा --

श्लोक 13 (skanda.6.40.13)

अहो धन्यतमो मत्तो नान्योऽस्ति भुवनत्रये । सर्वतीर्थमये क्षेत्रे यतो जातात्र संस्थितिः

aho dhanyatamo matto nānyo'sti bhuvanatraye | sarvatīrthamaye kṣetre yato jātātra saṁsthitiḥ

"अहो! इन तीनों लोकों में मुझसे बढ़कर कोई धन्य नहीं है, क्योंकि सभी तीर्थों से युक्त इस क्षेत्र में मेरा यह निवास हो गया है।"

श्लोक 14 (skanda.6.40.14)

सलिलेन विना यस्मान्न क्रिया संप्रवर्तते । तस्मादत्र मया कार्यः शुचितोयो महाह्रदः

salilena vinā yasmānna kriyā saṁpravartate | tasmādatra mayā kāryaḥ śucitoyo mahāhradaḥ

"चूँकि जल के बिना कोई भी क्रिया सम्पन्न नहीं हो सकती, इसलिए मुझे यहाँ शुद्ध जल वाला एक महान सरोवर बनाना चाहिए।"

श्लोक 15 (skanda.6.40.15)

ततः संचिंतयामास स्वसुतां च सरस्वतीम् । जनसंस्पर्शभीत्या च पातालतलवाहिनीम्

tataḥ saṁciṁtayāmāsa svasutāṁ ca sarasvatīm | janasaṁsparśabhītyā ca pātālatalavāhinīm

तब उन्होंने अपनी पुत्री सरस्वती का स्मरण किया, जो लोगों के स्पर्श के भय से पाताल-तल में प्रवाहित होती है।

श्लोक 16 (skanda.6.40.16)

अथ भूमितलं भित्त्वा प्रादुर्भूता महानदी । तां शिलाममलैस्तोयैः क्षालयन्ती समंततः

atha bhūmitalaṁ bhittvā prādurbhūtā mahānadī | tāṁ śilāmamalaistoyaiḥ kṣālayantī samaṁtataḥ

तब पृथ्वीतल को भेदकर वह महानदी प्रकट हुई, और अपने निर्मल जल से उस शिला को चारों ओर से धोने लगी।

श्लोक 17 (skanda.6.40.17)

अथ मूर्तिमती भूत्वा प्रोवाच प्रपितामहम् । किमर्थं संस्मृता देवममादेशः प्रदीयताम्

atha mūrtimatī bhūtvā provāca prapitāmaham | kimarthaṁ saṁsmṛtā devamamādeśaḥ pradīyatām

फिर मूर्तिमती (साकार) होकर उसने प्रपितामह से कहा -- "हे देव! किस प्रयोजन से मुझे स्मरण किया गया? मुझे आज्ञा दीजिए।"

श्लोक 18 (skanda.6.40.18)

ब्रह्मा उवाच । त्वयात्रैव सदा स्थेयं शिलायां मम संनिधौ । संध्यात्रयेऽपि त्वत्तोयैर्येन कृत्यं करोम्यहम्

brahmā uvāca | tvayātraiva sadā stheyaṁ śilāyāṁ mama saṁnidhau | saṁdhyātraye'pi tvattoyairyena kṛtyaṁ karomyaham

ब्रह्मा ने कहा -- तुम्हें सदा यहीं, मेरी इस शिला के निकट, बने रहना है, जिससे तीनों संध्याओं में तुम्हारे ही जल से मैं अपना कृत्य सम्पन्न कर सकूँ।

श्लोक 19 (skanda.6.40.19)

तथा ये मानवाः स्नानं करिष्यंति जले तव । ते यास्यंति परां सिद्धिं दुर्लभां देवा मानुषैः

tathā ye mānavāḥ snānaṁ kariṣyaṁti jale tava | te yāsyaṁti parāṁ siddhiṁ durlabhāṁ devā mānuṣaiḥ

और जो मनुष्य तुम्हारे इस जल में स्नान करेंगे, वे देवताओं और मनुष्यों को भी दुर्लभ परम सिद्धि को प्राप्त होंगे।

श्लोक 20 (skanda.6.40.20)

सरस्वती उवाच । अहं कन्या सुरश्रेष्ठ पातालतलवाहिनी । जनस्पर्शभयाद्भीता नागच्छामि महीतले

sarasvatī uvāca | ahaṁ kanyā suraśreṣṭha pātālatalavāhinī | janasparśabhayādbhītā nāgacchāmi mahītale

सरस्वती ने कहा -- हे देवश्रेष्ठ! मैं एक कुमारी हूँ, पाताल-तल में प्रवाहित होती हूँ, और लोगों के स्पर्श के भय से डरकर पृथ्वीतल पर नहीं आती।

श्लोक 21 (skanda.6.40.21)

तवादेशोऽन्यथा नैव मया कार्यः कथंचन । एवं मत्वा सुरश्रेष्ठ यद्युक्तं तत्समाचर

tavādeśo'nyathā naiva mayā kāryaḥ kathaṁcana | evaṁ matvā suraśreṣṭha yadyuktaṁ tatsamācara

फिर भी आपकी आज्ञा को मैं किसी भी प्रकार से अन्यथा नहीं कर सकती; ऐसा जानकर, हे देवश्रेष्ठ! जो उचित हो वह कीजिए।

श्लोक 22 (skanda.6.40.22)

ब्रह्मा उवाच । तवार्थे कल्पयिष्यामि स्थानेऽत्रैव महाह्रदम् । अगम्यं सर्वमर्त्यानां तत्र त्वं स्थातुमर्हसि

brahmā uvāca | tavārthe kalpayiṣyāmi sthāne'traiva mahāhradam | agamyaṁ sarvamartyānāṁ tatra tvaṁ sthātumarhasi

ब्रह्मा ने कहा -- तुम्हारे ही लिए मैं इसी स्थान पर एक महान सरोवर बनाऊँगा, जो समस्त मनुष्यों के लिए अगम्य होगा; तुम वहीं रहना।

श्लोक 23 (skanda.6.40.23)

सूत उवाच । एवमुक्त्वा स देवेशश्चखान च महाह्रदम् । ततः सरस्वती तत्र स्वस्थानमकरोदथ

sūta uvāca | evamuktvā sa deveśaścakhāna ca mahāhradam | tataḥ sarasvatī tatra svasthānamakarodatha

सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर उन देवेश ने एक महान सरोवर खोदा, और तब सरस्वती ने वहीं अपना निवास-स्थान बना लिया।

श्लोक 24 (skanda.6.40.24)

ततो दृष्टिविषान्सर्पानादिदेश पितामहः । युष्माभिः सर्वदा स्थेयं ह्रदेस्मिञ्छासनान्मम

tato dṛṣṭiviṣānsarpānādideśa pitāmahaḥ | yuṣmābhiḥ sarvadā stheyaṁ hradesmiñchāsanānmama

फिर पितामह ने दृष्टि-विष वाले सर्पों को आज्ञा दी -- मेरी इस आज्ञा से तुम्हें सदा इसी सरोवर में रहना है,

श्लोक 25 (skanda.6.40.25)

यथा सरस्वतीं मर्त्या न स्पृशंति कथंचन । भवद्भिः सर्वथा कार्यं तथा पन्नगसत्तमाः

yathā sarasvatīṁ martyā na spṛśaṁti kathaṁcana | bhavadbhiḥ sarvathā kāryaṁ tathā pannagasattamāḥ

हे श्रेष्ठ नागो! ऐसा करना कि मनुष्य किसी भी प्रकार से सरस्वती का स्पर्श न कर सकें, यह तुम्हें सर्वथा सुनिश्चित करना है।

श्लोक 26 (skanda.6.40.26)

सूत उवाच । एवं ब्रह्मा व्यवस्थाप्य तत्र क्षेत्रे सरस्वतीम् । तां च चित्रशिलां मध्ये ब्रह्मलोकं जगाम ह

sūta uvāca | evaṁ brahmā vyavasthāpya tatra kṣetre sarasvatīm | tāṁ ca citraśilāṁ madhye brahmalokaṁ jagāma ha

सूत जी ने कहा -- इस प्रकार ब्रह्मा उस क्षेत्र में सरस्वती को और उस चित्रशिला को मध्य में स्थापित करके ब्रह्मलोक को चले गए।

श्लोक 27 (skanda.6.40.27)

अथ मंकणकोनाम महर्षिः संशितव्रतः । क्षेत्रे तत्र समायातो विषविद्याविचक्षणः

atha maṁkaṇakonāma maharṣiḥ saṁśitavrataḥ | kṣetre tatra samāyāto viṣavidyāvicakṣaṇaḥ

तब मंकणक नामक एक दृढ़व्रती महर्षि, जो विष-विद्या में निपुण थे, उस क्षेत्र में आ पहुँचे।

श्लोक 28 (skanda.6.40.28)

सक्रमाद्भ्रममाणस्तु तस्मिन्सर्पाभिरक्षिते । तं मुनिं वेष्टयामासुर्बबन्धुश्चैव पाशकैः

sakramādbhramamāṇastu tasminsarpābhirakṣite | taṁ muniṁ veṣṭayāmāsurbabandhuścaiva pāśakaiḥ

उस सर्पों द्वारा रक्षित सरोवर में क्रमशः घूमते हुए, उन सर्पों ने उन मुनि को घेर लिया और पाशों से बाँध भी दिया।

श्लोक 29 (skanda.6.40.29)

सोऽपि विद्याबलात्सर्पान्निर्विषांस्तांश्चकारह । तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा कृत्वा च पितृतर्पणम् । निष्क्रांतः सलिलात्तस्मात्कृतकृत्यो मुदान्वितः

so'pi vidyābalātsarpānnirviṣāṁstāṁścakāraha | tatra snātvā śucirbhūtvā kṛtvā ca pitṛtarpaṇam | niṣkrāṁtaḥ salilāttasmātkṛtakṛtyo mudānvitaḥ

उन्होंने भी अपनी विद्या के बल से उन सर्पों को विषरहित कर दिया, और वहाँ स्नान करके, शुद्ध होकर, पितृ-तर्पण करके, कृतकृत्य होकर प्रसन्नतापूर्वक उस जल से बाहर निकले।

श्लोक 30 (skanda.6.40.30)

ततश्चक्रे मुनिर्यावत्सम्यक्कुशपरिग्रहम् । दर्भाग्रेणास्य हस्ताग्रं पाटितं तावदेव हि

tataścakre muniryāvatsamyakkuśaparigraham | darbhāgreṇāsya hastāgraṁ pāṭitaṁ tāvadeva hi

फिर जैसे ही उन मुनि ने कुश-दर्भ को भलीभाँति उठाया, वैसे ही उस दर्भ की नोक से उनकी उँगली का अगला भाग कट गया।

श्लोक 31 (skanda.6.40.31)

अथ तस्मात्क्षताज्जातस्तस्य शाकरसो महान् । तं दृष्ट्वा स विशेषेण हर्षितो विस्मयान्वितः

atha tasmātkṣatājjātastasya śākaraso mahān | taṁ dṛṣṭvā sa viśeṣeṇa harṣito vismayānvitaḥ

उस घाव से उनके शरीर से रक्त के बदले शाक-रस (हरा रस) बहने लगा; उसे देखकर वे विशेष रूप से हर्षित और विस्मित हो उठे।

श्लोक 32 (skanda.6.40.32)

सिद्धोऽहमिति विज्ञाय नृत्यं चक्रे ततः परम् । ब्राह्मीं शिलां समारुह्य आनंदाश्रुपरिप्लुतः

siddho'hamiti vijñāya nṛtyaṁ cakre tataḥ param | brāhmīṁ śilāṁ samāruhya ānaṁdāśrupariplutaḥ

"मैं सिद्ध हो गया हूँ" ऐसा जानकर, आनंद के आँसुओं से भीगे हुए, वे उस ब्रह्मा की शिला पर चढ़कर नाचने लगे।

श्लोक 33 (skanda.6.40.33)

अथैवं नृत्यमानस्य मुनेस्तस्य महात्मनः । लास्यं चक्रे ततः सर्वं जगत्स्थावरजंगमम्

athaivaṁ nṛtyamānasya munestasya mahātmanaḥ | lāsyaṁ cakre tataḥ sarvaṁ jagatsthāvarajaṁgamam

जब वह महात्मा मुनि इस प्रकार नाचने लगे, तब स्थावर और जंगम -- संपूर्ण जगत् ही उनके साथ नाचने लगा।

श्लोक 34 (skanda.6.40.34)

चमत्कारपुरं कृत्स्नं भग्नं नष्टा द्विजोत्तमाः । प्रासादैर्ध्वंसितैस्तत्र हाहाकारो महानभूत्

camatkārapuraṁ kṛtsnaṁ bhagnaṁ naṣṭā dvijottamāḥ | prāsādairdhvaṁsitaistatra hāhākāro mahānabhūt

सम्पूर्ण चमत्कारपुर टूटने लगा, मंदिर ध्वस्त होने लगे, श्रेष्ठ ब्राह्मण नष्ट होने लगे, और वहाँ चारों ओर बड़ा हाहाकार मच गया।

श्लोक 35 (skanda.6.40.35)

ततो देवगणाः सर्वे तद्दृष्ट्वा तस्य चेष्टितम् । लास्यस्य वारणार्थाय प्रोचुर्वृषभवाहनम्

tato devagaṇāḥ sarve taddṛṣṭvā tasya ceṣṭitam | lāsyasya vāraṇārthāya procurvṛṣabhavāhanam

तब सभी देवगण उनकी यह चेष्टा देखकर, उस नृत्य को रोकने के लिए, वृषभवाहन शिव से बोले --

श्लोक 36 (skanda.6.40.36)

अनेन नृत्यमानेन जगत्स्थावरजंगमम् । नृत्यं करोति देवेश तस्माद्गत्वा निवारय

anena nṛtyamānena jagatsthāvarajaṁgamam | nṛtyaṁ karoti deveśa tasmādgatvā nivāraya

"हे देवेश! इस नाचते हुए व्यक्ति के कारण स्थावर और जंगम -- सारा जगत् ही नाच रहा है; इसलिए आप जाकर इसे रोकिए।"

श्लोक 37 (skanda.6.40.37)

नान्यः शक्तः सुरश्रेष्ठ मुनिमेनं कथंचन । निषेधयितुमीशान ततः कुरु जगद्धितम्

nānyaḥ śaktaḥ suraśreṣṭha munimenaṁ kathaṁcana | niṣedhayitumīśāna tataḥ kuru jagaddhitam

"हे ईशान! हे देवश्रेष्ठ! इस मुनि को रोकने में और कोई भी समर्थ नहीं है; इसलिए आप ही जगत् का हित कीजिए।"

श्लोक 38 (skanda.6.40.38)

सूत उवाच । अथ तेषां वचः श्रुत्वा भगवान्वृषभध्वजः । कृत्वा रूपं द्विजेंद्रस्य तत्सकाशमुपाद्रवत्

sūta uvāca | atha teṣāṁ vacaḥ śrutvā bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ | kṛtvā rūpaṁ dvijeṁdrasya tatsakāśamupādravat

सूत जी ने कहा -- उनकी यह बात सुनकर भगवान वृषभध्वज ने एक श्रेष्ठ ब्राह्मण का रूप धारण कर उनके पास जाकर --

श्लोक 39 (skanda.6.40.39)

अब्रवीच्च मुने कस्मात्त्वयैतन्नृत्यतेऽधुना । तस्मात्कार्यं वदाशु त्वं परं कौतूहलं हि नः

abravīcca mune kasmāttvayaitannṛtyate'dhunā | tasmātkāryaṁ vadāśu tvaṁ paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

-- और बोले -- हे मुने! आप यह नृत्य अभी क्यों कर रहे हैं? इसका कारण शीघ्र बताइए, हमें बड़ी उत्सुकता है।

श्लोक 40 (skanda.6.40.40)

सूत उवाच । एवमुक्तः स विप्रेंद्रः शंकरेण द्विजोत्तमाः । हस्तं संदर्शयामास तस्य शाकरसान्वितम्

sūta uvāca | evamuktaḥ sa vipreṁdraḥ śaṁkareṇa dvijottamāḥ | hastaṁ saṁdarśayāmāsa tasya śākarasānvitam

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! शंकर द्वारा ऐसा पूछे जाने पर उस श्रेष्ठ मुनि ने अपना शाक-रस से भरा हुआ हाथ उन्हें दिखाया।

श्लोक 41 (skanda.6.40.41)

किं नपश्यसि मे ब्रह्मन्कराच्छाकरसो महान् । संजातः क्षतवक्त्रेण तस्मात्सिद्धिरुपस्थिता

kiṁ napaśyasi me brahmankarācchākaraso mahān | saṁjātaḥ kṣatavaktreṇa tasmātsiddhirupasthitā

"हे ब्रह्मन्! क्या आप नहीं देखते कि मेरे हाथ के घाव से यह विशाल शाक-रस उत्पन्न हुआ है? इसी से सिद्ध हुआ कि मुझे सिद्धि प्राप्त हो गई है।"

श्लोक 42 (skanda.6.40.42)

एतस्मात्कारणाद्विप्र नृत्यमेतत्करोम्यहम् । आनंदं परमं प्राप्य सिद्धिजं सिद्धसत्तम

etasmātkāraṇādvipra nṛtyametatkaromyaham | ānaṁdaṁ paramaṁ prāpya siddhijaṁ siddhasattama

"हे विप्र! इसी कारण से, हे सिद्धश्रेष्ठ! सिद्धि से उत्पन्न परम आनंद पाकर मैं यह नृत्य कर रहा हूँ।"

श्लोक 43 (skanda.6.40.43)

सूत उवाच । एवं तु वदतस्तस्य भगवान्वृषभध्वजः । अंगुष्ठं ताडयामास स्वांगुल्यग्रेण तत्क्षणात्

sūta uvāca | evaṁ tu vadatastasya bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ | aṁguṣṭhaṁ tāḍayāmāsa svāṁgulyagreṇa tatkṣaṇāt

सूत जी ने कहा -- उनके ऐसा कहते ही भगवान वृषभध्वज ने उसी क्षण अपनी उँगली की नोक से अपने ही अंगूठे पर आघात किया।

श्लोक 44 (skanda.6.40.44)

निश्चक्राम ततो भस्म हिमस्फटिकसंनिभम् । क्षताग्रात्सहसा तस्य महाविस्मयकारकम्

niścakrāma tato bhasma himasphaṭikasaṁnibham | kṣatāgrātsahasā tasya mahāvismayakārakam

उससे उस घाव के अगले भाग से हिम और स्फटिक के समान श्वेत भस्म तुरंत निकल आई, जिसे देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ।

श्लोक 45 (skanda.6.40.45)

ततः प्रोवाच तं विप्रं स देवो द्विजसत्तमाः । यस्यांगुष्ठाग्रतो मह्यं निष्क्रांतं भस्म पांडुरम्

tataḥ provāca taṁ vipraṁ sa devo dvijasattamāḥ | yasyāṁguṣṭhāgrato mahyaṁ niṣkrāṁtaṁ bhasma pāṁḍuram

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! तब उन देव ने उस ब्राह्मण से कहा -- मेरे अंगूठे के अगले भाग से तो यह श्वेत भस्म निकली है,

श्लोक 46 (skanda.6.40.46)

तथाप्यहं मुनिश्रेष्ठ न नृत्यं कर्तुमुत्सहे । त्वं पुनर्नृत्यसे कस्मादपि शाकरसेक्षणात्

tathāpyahaṁ muniśreṣṭha na nṛtyaṁ kartumutsahe | tvaṁ punarnṛtyase kasmādapi śākarasekṣaṇāt

"-- फिर भी हे मुनिश्रेष्ठ! मैं इसके कारण नाचने का उत्साह नहीं करता; तुम तो केवल शाक-रस देखकर ही क्यों नाच रहे हो?"

श्लोक 47 (skanda.6.40.47)

विरामं कुरु तस्मात्त्वं नृत्यादस्माद्विगर्हितात् । तपः क्षरति विप्रेन्द्र नृत्यगीताद्द्विजन्मनः

virāmaṁ kuru tasmāttvaṁ nṛtyādasmādvigarhitāt | tapaḥ kṣarati viprendra nṛtyagītāddvijanmanaḥ

"इसलिए इस निंदनीय नृत्य से तुम रुक जाओ; हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! ब्राह्मण का तप नाच-गान से क्षीण हो जाता है।"

श्लोक 48 (skanda.6.40.48)

अथासौ तत्समुद्वीक्ष्य क्षताद्भस्मविसर्जनम् । नृत्यं व्रीडान्वितस्त्यक्त्वा तस्य चक्रे नमस्कृतिम्

athāsau tatsamudvīkṣya kṣatādbhasmavisarjanam | nṛtyaṁ vrīḍānvitastyaktvā tasya cakre namaskṛtim

तब घाव से भस्म निकलती देखकर, वे लज्जित होकर नृत्य छोड़कर उन्हें प्रणाम करने लगे।

श्लोक 49 (skanda.6.40.49)

अब्रवीत्त्वामहं मन्ये नान्यं देवान्महेश्वरात् । तस्मात्कुरु प्रसादं मे यथा न स्यात्तपःक्षतिः

abravīttvāmahaṁ manye nānyaṁ devānmaheśvarāt | tasmātkuru prasādaṁ me yathā na syāttapaḥkṣatiḥ

उन्होंने कहा -- मैं आपको महेश्वर के अतिरिक्त और किसी देवता को नहीं मानता; इसलिए मुझ पर कृपा कीजिए, जिससे मेरे तप की हानि न हो।

श्लोक 50 (skanda.6.40.50)

श्रीभगवान् उवाच । तपस्ते मत्प्रसादेन वृद्धिं शस्यति नित्यशः । स्थानेऽत्र भवता सार्धमहं स्थास्यामि सर्वदा

śrībhagavān uvāca | tapaste matprasādena vṛddhiṁ śasyati nityaśaḥ | sthāne'tra bhavatā sārdhamahaṁ sthāsyāmi sarvadā

श्रीभगवान ने कहा -- मेरी कृपा से तुम्हारा तप सदा ही बढ़ता रहेगा; इस स्थान पर मैं तुम्हारे साथ सदा निवास करूँगा।

श्लोक 51 (skanda.6.40.51)

आनन्दितेन भवता प्रार्थितोऽहं यतो मुने । आनन्देश्वरसंज्ञस्तु ख्यातिं यास्यामि भूतले । एतत्पुरं च मे नाम्ना आनन्दाख्यं भविष्यति

ānanditena bhavatā prārthito'haṁ yato mune | ānandeśvarasaṁjñastu khyātiṁ yāsyāmi bhūtale | etatpuraṁ ca me nāmnā ānandākhyaṁ bhaviṣyati

हे मुने! चूँकि आनंदित होकर तुमने मुझसे प्रार्थना की है, इसलिए मैं पृथ्वी पर आनन्देश्वर नाम से विख्यात होऊँगा, और यह नगर भी मेरे इसी नाम से "आनन्द" कहलाएगा।

श्लोक 52 (skanda.6.40.52)

सूत उवाच । एवमुक्त्वा महादेवो गतश्चादर्शनं ततः । सोऽपि मंकणकस्तत्र तपस्तेपे मुनीश्वरः

sūta uvāca | evamuktvā mahādevo gataścādarśanaṁ tataḥ | so'pi maṁkaṇakastatra tapastepe munīśvaraḥ

सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर महादेव वहाँ से अंतर्धान हो गए, और वे मुनीश्वर मंकणक भी वहीं तप करने लगे।

श्लोक 53 (skanda.6.40.53)

अथ ते पन्नगाः प्रोचुः प्रणिपत्य मुनीश्वरम् । भगवन्निर्विषाः सर्वे वयं हि भवता कृताः

atha te pannagāḥ procuḥ praṇipatya munīśvaram | bhagavannirviṣāḥ sarve vayaṁ hi bhavatā kṛtāḥ

तब उन सर्पों ने उन मुनीश्वर को प्रणाम करके कहा -- हे भगवन्! आपने हम सबको विषरहित बना दिया है।

श्लोक 54 (skanda.6.40.54)

तस्मात्कुरु प्रसादं नो यथा स्याद्दारुणं विषम् । नो चेद्वयं गमिष्यामः सर्वलोकपराभवम्

tasmātkuru prasādaṁ no yathā syāddāruṇaṁ viṣam | no cedvayaṁ gamiṣyāmaḥ sarvalokaparābhavam

"इसलिए हम पर कृपा कीजिए, जिससे हमारा वह भयंकर विष फिर से लौट आए; अन्यथा हमें सारे संसार में तिरस्कार का सामना करना पड़ेगा।"

श्लोक 55 (skanda.6.40.55)

मंकणक उवाच । अनृतं न मया प्रोक्तं स्वैरेणापि कदाचन । तस्मादेवंविधाः सर्वे जलसर्पा भविष्यथ

maṁkaṇaka uvāca | anṛtaṁ na mayā proktaṁ svaireṇāpi kadācana | tasmādevaṁvidhāḥ sarve jalasarpā bhaviṣyatha

मंकणक ने कहा -- मैंने अपनी इच्छा से भी कभी असत्य वचन नहीं कहा है; इसलिए तुम सब इसी रूप में जलसर्प बन जाओगे।

श्लोक 56 (skanda.6.40.56)

सूत उवाच । ततःप्रभृति संजाता जलसर्पा महीतले । तद्वद्रूपा द्विजिह्वाश्च केवलं विषवर्जिताः

sūta uvāca | tataḥprabhṛti saṁjātā jalasarpā mahītale | tadvadrūpā dvijihvāśca kevalaṁ viṣavarjitāḥ

सूत जी ने कहा -- तभी से पृथ्वी पर उसी रूप वाले, द्विजिह्व, किन्तु केवल विषरहित जलसर्प उत्पन्न हुए।

श्लोक 57 (skanda.6.40.57)

अथ तस्मिन्ह्रदे मर्त्याः स्नात्वा सारस्वते शुभे । स्पृष्ट्वा चित्रशिलां तां च प्रयांति परमां गतिम्

atha tasminhrade martyāḥ snātvā sārasvate śubhe | spṛṣṭvā citraśilāṁ tāṁ ca prayāṁti paramāṁ gatim

उस पवित्र सारस्वत सरोवर में स्नान करके तथा उस चित्रशिला का स्पर्श करके मनुष्य परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 58 (skanda.6.40.58)

अथ भीतः सहस्राक्षो गत्वा देवं पितामहम् । यमेन सहितस्तूर्णं प्रोवाचेदं वचस्तदा

atha bhītaḥ sahasrākṣo gatvā devaṁ pitāmaham | yamena sahitastūrṇaṁ provācedaṁ vacastadā

तब भयभीत होकर सहस्राक्ष इन्द्र, यमराज के साथ, तुरंत पितामह देव के पास जाकर यह वचन बोले --

श्लोक 59 (skanda.6.40.59)

त्वत्प्रसादात्समुद्वीक्ष्य गच्छंति मनुजा दिवम् । पितामह महातीर्थं यत्त्वया विहितं क्षितौ । सारस्वतं नरास्तत्र स्नात्वा यांति त्रिविष्टपम्

tvatprasādātsamudvīkṣya gacchaṁti manujā divam | pitāmaha mahātīrthaṁ yattvayā vihitaṁ kṣitau | sārasvataṁ narāstatra snātvā yāṁti triviṣṭapam

"हे पितामह! आपकी ही कृपा से पृथ्वी पर स्थापित यह महातीर्थ देखकर मनुष्य स्वर्ग को जाने लगे हैं; उस सारस्वत तीर्थ में स्नान करके मनुष्य सीधे स्वर्गलोक चले जाते हैं।"

श्लोक 60 (skanda.6.40.60)

अपि पापसमाचाराः सर्वधर्मबहिष्कृताः । तत्र स्नात्वा शिलां स्पृष्ट्वा तदैवायांति सद्गतिम्

api pāpasamācārāḥ sarvadharmabahiṣkṛtāḥ | tatra snātvā śilāṁ spṛṣṭvā tadaivāyāṁti sadgatim

"चाहे वे पापाचारी हों, चाहे सम्पूर्ण धर्म से बहिष्कृत हों, वहाँ स्नान करके और उस शिला का स्पर्श करके वे उसी क्षण सद्गति को प्राप्त हो जाते हैं।"

श्लोक 61 (skanda.6.40.61)

यमः उवाच । अप्रमाणं विभो कर्म संप्रयातं ममोचितम् । शुभाशुभपरिज्ञानं सर्वेषामेव देहिनाम्

yamaḥ uvāca | apramāṇaṁ vibho karma saṁprayātaṁ mamocitam | śubhāśubhaparijñānaṁ sarveṣāmeva dehinām

यमराज ने कहा -- हे प्रभो! मेरा जो उचित कार्य -- सम्पूर्ण प्राणियों के शुभ-अशुभ कर्मों का ज्ञान -- वह अब प्रमाणरहित हो गया है।

श्लोक 62 (skanda.6.40.62)

तस्मात्त्यज त्वं मां देव यद्वा तत्तीर्थमुत्तमम् । यत्प्रभावाज्जनैर्हीनाः संजाता नरका मम

tasmāttyaja tvaṁ māṁ deva yadvā tattīrthamuttamam | yatprabhāvājjanairhīnāḥ saṁjātā narakā mama

"इसलिए हे देव! या तो मुझे त्याग दीजिए, या फिर उस श्रेष्ठ तीर्थ को हटा दीजिए, जिसके प्रभाव से मेरे नरक लोगों से रहित हो गए हैं।"

श्लोक 63 (skanda.6.40.63)

सूत उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा यमस्य प्रपितामहः । प्राह पार्श्वस्थितं शक्रं तत्तीर्थं नय संक्षयम्

sūta uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā yamasya prapitāmahaḥ | prāha pārśvasthitaṁ śakraṁ tattīrthaṁ naya saṁkṣayam

सूत जी ने कहा -- यमराज का यह वचन सुनकर प्रपितामह ब्रह्मा ने पास खड़े इन्द्र से कहा -- उस तीर्थ को नष्ट कर दो।

श्लोक 64 (skanda.6.40.64)

ततः शक्रो ह्रदं गत्वा पूरयामास पांसुभिः । ह्रदं सारस्वतं तं च तां च चित्रशिलां द्विजाः

tataḥ śakro hradaṁ gatvā pūrayāmāsa pāṁsubhiḥ | hradaṁ sārasvataṁ taṁ ca tāṁ ca citraśilāṁ dvijāḥ

हे ब्राह्मणो! तब इन्द्र ने उस सारस्वत सरोवर के पास जाकर, उस सरोवर को और उस चित्रशिला को भी धूल से भर दिया।

श्लोक 65 (skanda.6.40.65)

अद्यापि मनुजः सम्यक्तस्मिन्स्थाने व्यवस्थितः । यः करोति तपश्चर्यां स शीघं सिद्धिमाप्नुयात्

adyāpi manujaḥ samyaktasminsthāne vyavasthitaḥ | yaḥ karoti tapaścaryāṁ sa śīghaṁ siddhimāpnuyāt

आज भी उस स्थान पर भलीभाँति स्थित होकर जो मनुष्य तपस्या करता है, वह शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 66 (skanda.6.40.66)

सोऽपि मंकणकस्तत्र सार्द्धं देवेन शंभुना । तिष्ठत्यद्यापि विप्रेंद्र पूरितं चैव पांसुभिः

so'pi maṁkaṇakastatra sārddhaṁ devena śaṁbhunā | tiṣṭhatyadyāpi vipreṁdra pūritaṁ caiva pāṁsubhiḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! वे मंकणक भी भगवान शम्भु के साथ आज भी वहीं धूल से भरे हुए उस स्थान में विराजमान हैं।

श्लोक 67 (skanda.6.40.67)

लिंगं मंकणकन्यस्तं तत्रास्ति सुमहोदयम् । तत्स्पृष्ट्वा मानवाः पापैर्मुच्यंते द्विजसत्तमाः

liṁgaṁ maṁkaṇakanyastaṁ tatrāsti sumahodayam | tatspṛṣṭvā mānavāḥ pāpairmucyaṁte dvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वहाँ मंकणक द्वारा स्थापित एक अत्यंत महान लिंग है; उसका स्पर्श करके मनुष्य पापों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 68 (skanda.6.40.68)

माघ शुक्लचतुर्दश्यां यस्तं पूजयते नरः । स पापैरपि संयुक्तः शिवलोके महीयते

māgha śuklacaturdaśyāṁ yastaṁ pūjayate naraḥ | sa pāpairapi saṁyuktaḥ śivaloke mahīyate

जो मनुष्य माघ मास की शुक्ल चतुर्दशी को उसकी पूजा करता है, वह पापों से युक्त होते हुए भी शिवलोक में पूजित होता है।

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