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नागर खण्ड · अध्याय 41

जलशायी की उत्पत्ति का वर्णन

अध्याय 40अध्याय-सूचीअध्याय 42

श्लोक 1 (skanda.6.41.1)

सूत उवाच॥ तस्यैवोत्तरदिग्भागे देवस्य जलशायिनः॥ स्थानमस्ति सुविख्यातं सर्वपातकनाशनम्

sūta uvāca tasyaivottaradigbhāge devasya jalaśāyinaḥ sthānamasti suvikhyātaṁ sarvapātakanāśanam

सूत जी बोले -- उसी (हाटकेश्वर क्षेत्र) के उत्तर भाग में जलशायी देव का अत्यंत प्रसिद्ध और समस्त पापों का नाश करने वाला स्थान है।

श्लोक 2 (skanda.6.41.2)

यस्तत्पूजयते भक्त्या शयने बोधने हरेः॥ उपवासपरो भूत्वा स गच्छेद्वैष्णवं पदम्

yastatpūjayate bhaktyā śayane bodhane hareḥ upavāsaparo bhūtvā sa gacchedvaiṣṇavaṁ padam

जो कोई भक्तिपूर्वक उपवासपरायण होकर हरि के शयन और जागरण के समय उसकी पूजा करता है, वह विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (skanda.6.41.3)

अशून्यशयनानाम द्वितीया दयिता तिथिः॥ सदैव देवदेवस्य कृष्णा सुप्तस्य या भवेत्

aśūnyaśayanānāma dvitīyā dayitā tithiḥ sadaiva devadevasya kṛṣṇā suptasya yā bhavet

"अशून्यशयन" के लिए द्वितीया तिथि सदा प्रिय है, वह कृष्णपक्ष की द्वितीया, जब देवाधिदेव सोए हुए होते हैं।

श्लोक 4 (skanda.6.41.4)

तस्यां यः पूजयेत्तत्र तं देवं जलशायिनम्॥ शास्त्रोक्तेन विधानेन स गच्छति हरेः पदम्

tasyāṁ yaḥ pūjayettatra taṁ devaṁ jalaśāyinam śāstroktena vidhānena sa gacchati hareḥ padam

उस तिथि पर जो कोई शास्त्रोक्त विधि से उस जलशायी देव की पूजा करता है, वह हरि के पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 5 (skanda.6.41.5)

ऋषय ऊचुः॥ जलशायी कथं तत्र संप्राप्तः सूतनन्दन॥ पूज्यते विधिना केन तत्सर्वं विस्तराद्वद

ṛṣaya ūcuḥ jalaśāyī kathaṁ tatra saṁprāptaḥ sūtanandana pūjyate vidhinā kena tatsarvaṁ vistarādvada

ऋषियों ने कहा -- हे सूतनन्दन! जलशायी वहाँ कैसे प्रकट हुए और किस विधि से उनकी पूजा की जाती है? यह सब हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 6 (skanda.6.41.6)

सूत उवाच॥ पुरासीद्बाष्कलिर्नाम दानवेन्द्रो महाबलः॥ अजेयः सर्वदेवानां गन्धर्वोरगरक्षसाम्

sūta uvāca purāsīdbāṣkalirnāma dānavendro mahābalaḥ ajeyaḥ sarvadevānāṁ gandharvoragarakṣasām

सूत जी ने कहा -- प्राचीन काल में बाष्कलि नामक अत्यंत बलशाली दानवराज था, जो देवताओं, गन्धर्वों, नागों और राक्षसों के लिए भी अजेय था।

श्लोक 7 (skanda.6.41.7)

अथासौ भूतलं सर्वं वशीकृत्वा महाबलः॥ ततो दैत्यगणैः सार्द्धं जगाम त्रिदशालयम्

athāsau bhūtalaṁ sarvaṁ vaśīkṛtvā mahābalaḥ tato daityagaṇaiḥ sārddhaṁ jagāma tridaśālayam

उस महाबली ने समस्त पृथ्वी को अपने वश में कर लिया और फिर दैत्यगणों के साथ स्वर्गलोक की ओर चढ़ आया।

श्लोक 8 (skanda.6.41.8)

तत्राभवन्महायुद्धं देवासुरविनाशकम्॥ देवानां दानवानां च क्रुद्धानामितरेतरम्

tatrābhavanmahāyuddhaṁ devāsuravināśakam devānāṁ dānavānāṁ ca kruddhānāmitaretaram

वहाँ देवताओं और असुरों के बीच एक-दूसरे पर क्रुद्ध होकर देव और दानव दोनों का नाश करने वाला महायुद्ध हुआ।

श्लोक 9 (skanda.6.41.9)

वर्षाणामयुतं तावदहन्यहनि दारुणम्॥ तत्रासृक्कर्दमो जातः पर्वतश्चास्थि संभवः

varṣāṇāmayutaṁ tāvadahanyahani dāruṇam tatrāsṛkkardamo jātaḥ parvataścāsthi saṁbhavaḥ

दस हजार वर्षों तक प्रतिदिन वह भीषण युद्ध चलता रहा, जिसमें बहे रक्त से कीचड़ बन गया और हड्डियों के ढेर से पर्वत खड़ा हो गया।

श्लोक 10 (skanda.6.41.10)

ततो वर्षसहस्रांते दशमे समुपस्थिते॥ जितस्तेन सहस्राक्षः ससैन्यः सपरिग्रहः

tato varṣasahasrāṁte daśame samupasthite jitastena sahasrākṣaḥ sasainyaḥ saparigrahaḥ

फिर जब दसवाँ सहस्र वर्ष पूरा हुआ, तब उसने अपनी सेना और परिजनों सहित सहस्राक्ष (इन्द्र) को पराजित कर दिया।

श्लोक 11 (skanda.6.41.11)

ततः स्वर्गं परित्यज्य सर्वदेवगणैः सह॥ जगाम शरणं विष्णोः श्वेतद्वीपं प्रतिश्रयम्

tataḥ svargaṁ parityajya sarvadevagaṇaiḥ saha jagāma śaraṇaṁ viṣṇoḥ śvetadvīpaṁ pratiśrayam

तब स्वर्ग को त्यागकर इन्द्र समस्त देवगणों के साथ विष्णु की शरण में, उनके निवास श्वेतद्वीप को गया।

श्लोक 12 (skanda.6.41.12)

यत्रास्ते भगवान्विष्णुर्योगनिद्रावशंगतः॥ शयानः शेषपर्यंके लक्ष्म्या संवाहितांघ्रियुक्

yatrāste bhagavānviṣṇuryoganidrāvaśaṁgataḥ śayānaḥ śeṣaparyaṁke lakṣmyā saṁvāhitāṁghriyuk

वहाँ भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन शेषशय्या पर शयन करते हैं, जिनके चरणों को लक्ष्मी दबाती रहती हैं।

श्लोक 13 (skanda.6.41.13)

ततो वेदोद्भवैः सूक्तैः स्तुतिं चक्रुः समंततः॥ तस्य देवस्य सद्भक्ताः सर्वे देवाः सवासवाः

tato vedodbhavaiḥ sūktaiḥ stutiṁ cakruḥ samaṁtataḥ tasya devasya sadbhaktāḥ sarve devāḥ savāsavāḥ

तब उस देव के सच्चे भक्त इन्द्र सहित समस्त देवताओं ने वेदों से उत्पन्न सूक्तों द्वारा चारों ओर से उनकी स्तुति की।

श्लोक 14 (skanda.6.41.14)

अथोत्थाय जगन्नाथः प्रोवाच बलसूदनम्॥ कच्चित्क्षेमं सहस्राक्ष सांप्रतं भुवनत्रये॥ यत्त्वं देवगणैः सार्द्धं स्वयमेव इहागतः

athotthāya jagannāthaḥ provāca balasūdanam kaccitkṣemaṁ sahasrākṣa sāṁprataṁ bhuvanatraye yattvaṁ devagaṇaiḥ sārddhaṁ svayameva ihāgataḥ

तब उठकर जगन्नाथ ने बलासुर के संहारक इन्द्र से कहा -- हे सहस्राक्ष! क्या तीनों लोकों में अभी कुशल है, कि तुम स्वयं देवगणों सहित यहाँ आए हो?

श्लोक 15 (skanda.6.41.15)

शक्र उवाच॥ बाष्कलिर्नाम देत्येन्द्रो हरलब्धवरो बली॥ अजेयः संगरे देवैस्तेनाहं विजितो रणे

śakra uvāca bāṣkalirnāma detyendro haralabdhavaro balī ajeyaḥ saṁgare devaistenāhaṁ vijito raṇe

शक्र ने कहा -- बाष्कलि नामक दैत्यराज, जिसने शिवजी से वरदान पाया है और अत्यंत बलवान तथा युद्ध में देवताओं के लिए अजेय है, उसी ने मुझे रणभूमि में पराजित किया है।

श्लोक 16 (skanda.6.41.16)

संस्थितिश्च कृता स्वर्गे सांप्रतं मधु सूदन॥ तेनैष शरणं प्राप्तो देवैः सार्द्धं सुरोत्तम

saṁsthitiśca kṛtā svarge sāṁprataṁ madhu sūdana tenaiṣa śaraṇaṁ prāpto devaiḥ sārddhaṁ surottama

हे मधुसूदन! उसने अभी स्वर्ग में अपना अधिकार जमा लिया है, इसीलिए हे सुरोत्तम! मैं देवताओं सहित तुम्हारी शरण में आया हूँ।

श्लोक 17 (skanda.6.41.17)

हिरण्याक्षभयाद्देवा हिरण्यकशिपोः पुरा॥ त्वया त्राता वयं सर्वे तथान्येषां दुरात्मनाम्

hiraṇyākṣabhayāddevā hiraṇyakaśipoḥ purā tvayā trātā vayaṁ sarve tathānyeṣāṁ durātmanām

पूर्वकाल में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के भय से तथा अन्य दुरात्माओं से भी तुमने हम सब देवताओं की रक्षा की थी।

श्लोक 18 (skanda.6.41.18)

तस्मादस्मादपि त्राहि दानवाद्बलवत्तरात्॥ बाष्कलेर्नास्ति देवेश त्वां मुक्त्वान्या परा गतिः

tasmādasmādapi trāhi dānavādbalavattarāt bāṣkalernāsti deveśa tvāṁ muktvānyā parā gatiḥ

इसलिए इस अत्यंत बलवान दानव से भी हमारी रक्षा करो; हे देवेश! बाष्कलि से बचने का तुम्हें छोड़कर कोई अन्य उपाय नहीं है।

श्लोक 19 (skanda.6.41.19)

श्रीभगवानुवाच॥ अहं तं निग्रहीष्यामि संप्राप्ते समये स्वयम्॥ तस्मात्त्वं समयंयावत्कुरु शक्र तपो महत्

śrībhagavānuvāca ahaṁ taṁ nigrahīṣyāmi saṁprāpte samaye svayam tasmāttvaṁ samayaṁyāvatkuru śakra tapo mahat

श्रीभगवान ने कहा -- उचित समय आने पर मैं स्वयं उसका निग्रह करूँगा; इसलिए हे शक्र! तब तक तुम महान तप करो।

श्लोक 20 (skanda.6.41.20)

येन ते जायते शक्तिस्तपोवीर्येण वासव॥ वधाय तस्य दैत्यस्य बलयुक्तस्य बाष्कलेः

yena te jāyate śaktistapovīryeṇa vāsava vadhāya tasya daityasya balayuktasya bāṣkaleḥ

हे वासव! तपस्या के बल से तुम्हें वह शक्ति प्राप्त होगी, जिससे तुम उस बलशाली दैत्य बाष्कलि का वध कर सकोगे।

श्लोक 21 (skanda.6.41.21)

शक्र उवाच॥ कस्मिन्क्षेत्रे जगन्नाथ करोमि सुमहत्तपः॥ तस्य दैत्यस्य नाशार्थं तद स्माकं प्रकीर्तय

śakra uvāca kasminkṣetre jagannātha karomi sumahattapaḥ tasya daityasya nāśārthaṁ tada smākaṁ prakīrtaya

शक्र ने कहा -- हे जगन्नाथ! उस दैत्य के नाश के लिए मैं किस क्षेत्र में महान तप करूँ? हमें वह बताइए।

श्लोक 22 (skanda.6.41.22)

सूत उवाच॥ तच्छ्रुत्वा भगवान्विष्णुः प्रोवाचाथ पुरंदरम्॥ चिरं मनसि निश्चित्य क्षेत्राण्यायतनानि च

sūta uvāca tacchrutvā bhagavānviṣṇuḥ provācātha puraṁdaram ciraṁ manasi niścitya kṣetrāṇyāyatanāni ca

सूत जी ने कहा -- यह सुनकर भगवान विष्णु ने चिरकाल तक मन में विभिन्न क्षेत्रों और तीर्थस्थानों पर विचार करके इन्द्र से कहा।

श्लोक 23 (skanda.6.41.23)

चमत्कारपुरं क्षेत्रं शक्र सिद्धिप्रदायकम्॥ तस्मात्तत्र द्रुतं गत्वा तद्वधार्थं तपः कुरु

camatkārapuraṁ kṣetraṁ śakra siddhipradāyakam tasmāttatra drutaṁ gatvā tadvadhārthaṁ tapaḥ kuru

हे शक्र! चमत्कारपुर नामक क्षेत्र सिद्धि प्रदान करने वाला है; इसलिए वहाँ शीघ्र जाकर उसके वध के लिए तप करो।

श्लोक 24 (skanda.6.41.24)

शक्र उवाच॥ न वयं भवता हीना यास्यामोऽन्यत्र केशव॥ बाष्कलेर्दानवेन्द्रस्य भयाद्भीताः कथंचन

śakra uvāca na vayaṁ bhavatā hīnā yāsyāmo'nyatra keśava bāṣkalerdānavendrasya bhayādbhītāḥ kathaṁcana

शक्र ने कहा -- हे केशव! तुम्हारे बिना हम कहीं और नहीं जाएँगे, क्योंकि हम दानवराज बाष्कलि के भय से किसी भी प्रकार भयभीत हैं।

श्लोक 25 (skanda.6.41.25)

तस्मादागच्छ तत्र त्वं स्वयमेव सुरेश्वर॥ त्वया संरक्षितो येन करोमि सुमहत्तपः

tasmādāgaccha tatra tvaṁ svayameva sureśvara tvayā saṁrakṣito yena karomi sumahattapaḥ

इसलिए हे सुरेश्वर! तुम स्वयं वहाँ हमारे साथ चलो, जिससे तुम्हारी सुरक्षा में मैं महान तप कर सकूँ।

श्लोक 26 (skanda.6.41.26)

सूत उवाच॥ ततः स भगवान्विष्णुस्तथेत्युक्त्वा सुरैः सह॥ चमत्कारपुरं क्षेत्रमाजगाम सह श्रिया

sūta uvāca tataḥ sa bhagavānviṣṇustathetyuktvā suraiḥ saha camatkārapuraṁ kṣetramājagāma saha śriyā

सूत जी ने कहा -- तब भगवान विष्णु ने "ऐसा ही हो" कहकर देवताओं के साथ लक्ष्मी सहित चमत्कारपुर क्षेत्र में पधारे।

श्लोक 27 (skanda.6.41.27)

अथ देवगणाः सर्वे तत्र गत्वा तदाऽऽश्रमान्॥ चक्रुः पृथक्पृथग्घृष्टास्तपोऽर्थं कृतनिश्चयाः

atha devagaṇāḥ sarve tatra gatvā tadā''śramān cakruḥ pṛthakpṛthagghṛṣṭāstapo'rthaṁ kṛtaniścayāḥ

फिर वहाँ पहुँचकर समस्त देवगण प्रसन्न होकर, तप के लिए दृढ़ निश्चय करके, अपने-अपने पृथक आश्रम बनाए।

श्लोक 28 (skanda.6.41.28)

वासुदेवोऽपि संस्मृत्य क्षीरोदं तत्र सागरम्॥ आनिनायाशु विस्तीर्णं ह्रदे तस्मिन्पुरातने

vāsudevo'pi saṁsmṛtya kṣīrodaṁ tatra sāgaram ānināyāśu vistīrṇaṁ hrade tasminpurātane

वासुदेव ने भी क्षीरसागर का स्मरण करके उसे शीघ्र ही उस प्राचीन विस्तृत सरोवर में ले आए।

श्लोक 29 (skanda.6.41.29)

चकार शयनं तत्र श्वेतद्वीपे यथा पुरा॥ स्तूयमानः सुरैः सर्वैः समंताद्विनयान्वितैः

cakāra śayanaṁ tatra śvetadvīpe yathā purā stūyamānaḥ suraiḥ sarvaiḥ samaṁtādvinayānvitaiḥ

और वहाँ, जैसे पहले श्वेतद्वीप में करते थे, वैसे ही शयन किया, जबकि विनयशील समस्त देवता चारों ओर से उनकी स्तुति कर रहे थे।

श्लोक 30 (skanda.6.41.30)

अथाषाढस्य संप्राप्ते द्वितीयादिवसे शुभे॥ कृष्णपक्षे सहस्राक्षं स्वयमेव बृहस्पतिः॥ प्रोवाच वचनं श्लक्ष्णं बाष्पव्याकुल लोचनम्

athāṣāḍhasya saṁprāpte dvitīyādivase śubhe kṛṣṇapakṣe sahasrākṣaṁ svayameva bṛhaspatiḥ provāca vacanaṁ ślakṣṇaṁ bāṣpavyākula locanam

फिर आषाढ़ मास के शुभ कृष्णपक्ष की द्वितीया तिथि आने पर, बृहस्पति ने स्वयं आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाले इन्द्र से कोमल वचन कहे।

श्लोक 31 (skanda.6.41.31)

बृहस्पतिरुवाच॥ अशून्यशयनानाम द्वितीयाद्य पुरंदर॥ अतीव दयिता विष्णोः प्रसुप्तस्य जलाशये

bṛhaspatiruvāca aśūnyaśayanānāma dvitīyādya puraṁdara atīva dayitā viṣṇoḥ prasuptasya jalāśaye

बृहस्पति ने कहा -- हे पुरंदर! आज "अशून्यशयन" की द्वितीया तिथि है, जो जल के आश्रय में सोए हुए विष्णु को अत्यंत प्रिय है।

श्लोक 32 (skanda.6.41.32)

अस्यां संपूजितो विष्णुर्यावन्मासचतुष्टयम्॥ ददाति सकलान्कामान्ध्यातश्चेतसि सर्वदा॥ शास्त्रोक्तविधिना सम्यग्व्रतस्थो जलशायिनम्

asyāṁ saṁpūjito viṣṇuryāvanmāsacatuṣṭayam dadāti sakalānkāmāndhyātaścetasi sarvadā śāstroktavidhinā samyagvratastho jalaśāyinam

शास्त्रोक्त विधि के अनुसार यदि इस तिथि पर पूर्ण व्रत का पालन करते हुए चार महीनों तक जलशायी विष्णु की भलीभाँति पूजा की जाए और मन में सदा उनका ध्यान किया जाए, तो वे समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं।

श्लोक 33 (skanda.6.41.33)

एवं स चतुरो मासान्द्वितीयादिवसे हरिम्॥ पूजयित्वा सहस्राक्षस्तेजसा सहितोऽभवत्

evaṁ sa caturo māsāndvitīyādivase harim pūjayitvā sahasrākṣastejasā sahito'bhavat

इस प्रकार सहस्राक्ष ने चार महीनों तक द्वितीया तिथि पर हरि की पूजा करके तेज से युक्त हो गए।

श्लोक 34 (skanda.6.41.34)

तं दृष्ट्वा तेजसा युक्तं परितुष्टो जनार्दनः॥ प्रोवाच शक्र गच्छाद्य वधार्थं तस्य बाष्कलेः॥ सर्वैर्देवगणैः सार्धं विजयस्ते भविष्यति

taṁ dṛṣṭvā tejasā yuktaṁ parituṣṭo janārdanaḥ provāca śakra gacchādya vadhārthaṁ tasya bāṣkaleḥ sarvairdevagaṇaiḥ sārdhaṁ vijayaste bhaviṣyati

उसे तेजस्वी देखकर संतुष्ट हुए जनार्दन ने कहा -- हे शक्र! अब जाओ, सभी देवताओं सहित बाष्कलि के वध के लिए, तुम्हारी विजय निश्चित होगी।

श्लोक 35 (skanda.6.41.35)

शक्र उवाच॥ बिभेमि तस्य देवाहं दानवेन्द्रस्य दुर्मतेः॥ त्वया विना न गच्छामि सार्धं सर्वैः सुरैरपि

śakra uvāca bibhemi tasya devāhaṁ dānavendrasya durmateḥ tvayā vinā na gacchāmi sārdhaṁ sarvaiḥ surairapi

शक्र ने कहा -- हे देव! मैं उस दुर्बुद्धि दानवराज से डरता हूँ; समस्त देवताओं के साथ होते हुए भी तुम्हारे बिना मैं नहीं जाऊँगा।

श्लोक 36 (skanda.6.41.36)

श्रीभगवानुवाच॥ त्वया सह सहस्राक्ष चक्रमेतत्सुदर्शनम्॥ गमिष्यति वधार्थाय मदीयं सुरविद्विषाम्

śrībhagavānuvāca tvayā saha sahasrākṣa cakrametatsudarśanam gamiṣyati vadhārthāya madīyaṁ suravidviṣām

श्रीभगवान ने कहा -- हे सहस्राक्ष! मेरा यह सुदर्शन चक्र देवताओं के शत्रुओं के वध के लिए तुम्हारे साथ जाएगा।

श्लोक 37 (skanda.6.41.37)

एवमुक्त्वा हरिश्चक्रं प्रमुमोच सुदर्शनम्॥ वधार्थं दानवेन्द्राणां शक्रेण सहितं तदा

evamuktvā hariścakraṁ pramumoca sudarśanam vadhārthaṁ dānavendrāṇāṁ śakreṇa sahitaṁ tadā

ऐसा कहकर हरि ने अपना सुदर्शन चक्र दानवराजों के वध के लिए इन्द्र के साथ भेज दिया।

श्लोक 38 (skanda.6.41.38)

शक्रोऽपि सहितस्तेन गत्वा चक्रेण कृत्स्नशः॥ सर्वानुत्सादयामास दानवान्रणमूर्धनि

śakro'pi sahitastena gatvā cakreṇa kṛtsnaśaḥ sarvānutsādayāmāsa dānavānraṇamūrdhani

इन्द्र भी उस चक्र सहित रणभूमि में जाकर उसके द्वारा समस्त दानवों का पूरी तरह संहार करने लगे।

श्लोक 39 (skanda.6.41.39)

स चापि बाष्कलिस्तेन च्छिन्नश्चक्रेण कृत्स्नशः॥ पपात धरणीपृष्ठे वज्राहत इवाचलः

sa cāpi bāṣkalistena cchinnaścakreṇa kṛtsnaśaḥ papāta dharaṇīpṛṣṭhe vajrāhata ivācalaḥ

और वह बाष्कलि भी उस चक्र से पूर्णतः कट कर, मानो वज्र से आहत पर्वत की भाँति, पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 40 (skanda.6.41.40)

तथान्ये बहवः शूरा दानवा बलदर्पिताः॥ हत्वा सुदर्शनं चक्रं भूयः प्राप्तं हरेः करम्

tathānye bahavaḥ śūrā dānavā baladarpitāḥ hatvā sudarśanaṁ cakraṁ bhūyaḥ prāptaṁ hareḥ karam

इसी प्रकार बल के मद में चूर अन्य कई वीर दानवों को मारकर सुदर्शन चक्र पुनः हरि के हाथ में लौट आया।

श्लोक 41 (skanda.6.41.41)

तेऽपि शक्रादयो देवाः प्रहृष्टा गतसंशयाः॥ भूयो विष्णुं समेत्याथ प्रोचुर्नत्वा ततः परम्

te'pi śakrādayo devāḥ prahṛṣṭā gatasaṁśayāḥ bhūyo viṣṇuṁ sametyātha procurnatvā tataḥ param

तब इन्द्र आदि समस्त देवता, हर्षित और निःशंक होकर, पुनः विष्णु के पास आए और उन्हें प्रणाम करके यह कहा।

श्लोक 42 (skanda.6.41.42)

प्रभावात्तव देवेश हताः सर्वेऽमरारयः॥ प्राप्तं त्रैलोक्यराज्यं च भूयो निहतकंटकम्

prabhāvāttava deveśa hatāḥ sarve'marārayaḥ prāptaṁ trailokyarājyaṁ ca bhūyo nihatakaṁṭakam

हे देवेश! तुम्हारे ही प्रभाव से देवताओं के समस्त शत्रु मारे गए, और अब कंटकरहित त्रैलोक्य का राज्य पुनः हमें प्राप्त हुआ है।

श्लोक 43 (skanda.6.41.43)

तस्मात्कीर्तय यत्कृत्यं तच्च श्रेयस्करं मम॥ सदा स्यात्पुंडरीकाक्ष तथा शत्रुभयावहम्

tasmātkīrtaya yatkṛtyaṁ tacca śreyaskaraṁ mama sadā syātpuṁḍarīkākṣa tathā śatrubhayāvaham

इसलिए हे पुण्डरीकाक्ष! अब हमें बताइए कि हम क्या करें, जिससे यह कल्याण हमारे लिए सदा बना रहे और शत्रुओं के लिए सदा भय का कारण हो।

श्लोक 44 (skanda.6.41.44)

श्रीभगवानुवाच॥ मयात्रैव सदा स्थेयं रूपेणानेन वासव॥ सर्वलोकहितार्थाय ह्रदे पुण्य जलाश्रये

śrībhagavānuvāca mayātraiva sadā stheyaṁ rūpeṇānena vāsava sarvalokahitārthāya hrade puṇya jalāśraye

श्रीभगवान ने कहा -- हे वासव! समस्त लोकों के कल्याण के लिए मैं सदा इसी रूप में इस पवित्र जलाश्रय सरोवर में यहीं निवास करूँगा।

श्लोक 45 (skanda.6.41.45)

त्वया तस्मात्समागम्य चातुर्मास्यं शचीपते॥ प्रयत्नेन प्रकर्तव्यमशून्यशयनं व्रतम्

tvayā tasmātsamāgamya cāturmāsyaṁ śacīpate prayatnena prakartavyamaśūnyaśayanaṁ vratam

इसलिए हे शचीपते! तुम्हें यहाँ आकर चातुर्मास्य में प्रयत्नपूर्वक "अशून्यशयन" व्रत का पालन करना चाहिए।

श्लोक 46 (skanda.6.41.46)

न भवंति सहस्राक्ष येन ते परि पंथिनः॥ तथाभीष्टफलावाप्तिर्मत्प्रसादादसंशयम्

na bhavaṁti sahasrākṣa yena te pari paṁthinaḥ tathābhīṣṭaphalāvāptirmatprasādādasaṁśayam

हे सहस्राक्ष! इस व्रत से तुम्हारे शत्रु नहीं रहेंगे, और मेरी कृपा से निःसंदेह तुम्हें अभीष्ट फल की प्राप्ति होगी।

श्लोक 47 (skanda.6.41.47)

अन्योऽपि यो नरो भक्त्या पूजयिष्यति मामिह॥ संप्राप्स्यति स ताँल्लोकान्दुर्लभांस्त्रि दशैरपि

anyo'pi yo naro bhaktyā pūjayiṣyati māmiha saṁprāpsyati sa tā~llokāndurlabhāṁstri daśairapi

इसके अतिरिक्त जो भी अन्य मनुष्य भक्तिपूर्वक यहाँ मेरी पूजा करेगा, वह उन लोकों को प्राप्त करेगा जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं।

श्लोक 48 (skanda.6.41.48)

तस्माद्गच्छ सहस्राक्ष कुरु राज्यं त्रिविष्टपे॥ भूयोऽप्यत्रैव देवेश द्रष्टव्योऽस्मि न संशयः॥ कार्यकाले समायाते श्वेतद्वीपे यथा तथा

tasmādgaccha sahasrākṣa kuru rājyaṁ triviṣṭape bhūyo'pyatraiva deveśa draṣṭavyo'smi na saṁśayaḥ kāryakāle samāyāte śvetadvīpe yathā tathā

इसलिए हे सहस्राक्ष! अब जाओ और स्वर्ग का राज्य करो; हे देवेश! जब भी आवश्यकता का समय आएगा, तुम मुझे निःसंदेह पुनः यहीं देख सकोगे, जैसे श्वेतद्वीप में देखते हो।

श्लोक 49 (skanda.6.41.49)

सूत उवाच॥ ततः प्रणम्य तं दृष्ट्वा प्रजगाम शतक्रतुः॥ वासुदेवोऽपि तत्रैव स्थितो लोकहिताय च

sūta uvāca tataḥ praṇamya taṁ dṛṣṭvā prajagāma śatakratuḥ vāsudevo'pi tatraiva sthito lokahitāya ca

सूत जी ने कहा -- तब उन्हें देखकर और प्रणाम करके इन्द्र वहाँ से चले गए, और वासुदेव लोक-कल्याण के लिए वहीं स्थित रहे।

श्लोक 50 (skanda.6.41.50)

एवं तत्र द्विजश्रेष्ठा जलशायी जनार्दनः॥ सर्वलोकहितार्थाय संस्थितः परमेश्वरः

evaṁ tatra dvijaśreṣṭhā jalaśāyī janārdanaḥ sarvalokahitārthāya saṁsthitaḥ parameśvaraḥ

हे द्विजश्रेष्ठो! इस प्रकार वहाँ जनार्दन जलशायी, परमेश्वर, समस्त लोकों के कल्याण के लिए स्थापित हुए।

श्लोक 51 (skanda.6.41.51)

यस्तं पूजयते भक्त्या श्रद्धया परया युतः॥ चातुर्मास्ये विशेषेण स याति परमां गतिम्

yastaṁ pūjayate bhaktyā śraddhayā parayā yutaḥ cāturmāsye viśeṣeṇa sa yāti paramāṁ gatim

जो कोई श्रद्धापूर्वक भक्ति से विशेष रूप से चातुर्मास्य में उनकी पूजा करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 52 (skanda.6.41.52)

तथा देवगणैः सर्वैर्द्वारका तत्र सा कृता॥ संपूज्य तु नरा यांति चातुर्मास्ये त्रिविष्टपम्

tathā devagaṇaiḥ sarvairdvārakā tatra sā kṛtā saṁpūjya tu narā yāṁti cāturmāsye triviṣṭapam

वहाँ समस्त देवताओं ने द्वारका की भी स्थापना की; उसकी पूजा करके मनुष्य चातुर्मास्य में स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 53 (skanda.6.41.53)

शेषकालेऽपि चित्तस्थान्कामान्मर्त्यः समाप्नुयात्॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूज्या सा द्वारका नरैः॥ सर्वेष्वपि हि कालेषु चातुमास्ये विशेषतः

śeṣakāle'pi cittasthānkāmānmartyaḥ samāpnuyāt tasmātsarvaprayatnena pūjyā sā dvārakā naraiḥ sarveṣvapi hi kāleṣu cātumāsye viśeṣataḥ

शेष समय में भी मनुष्य मन-चाही कामनाओं को प्राप्त कर सकता है; इसलिए मनुष्यों को सभी समयों में, विशेषकर चातुर्मास्य में, पूर्ण प्रयत्न से उस द्वारका की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 54 (skanda.6.41.54)

एतद्वः सर्वमाख्यातं सर्वपातकनाशनम्॥ आख्यानं देवदेवस्य सुपुण्यं जलशायिनः

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ sarvapātakanāśanam ākhyānaṁ devadevasya supuṇyaṁ jalaśāyinaḥ

यह समस्त पापों का नाश करने वाला, देवाधिदेव जलशायी का यह अत्यंत पुण्यमय आख्यान मैंने तुम सबको सुनाया।

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