नागर खण्ड · अध्याय 42
विश्वामित्र-मेनका समागम का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.42.1)
सूत उवाच॥ विश्वामित्रसमुद्भूतं कुण्डं तत्रापरं शुभम्॥ संतिष्ठते द्विजश्रेष्ठाः सर्वकामप्रदायकम्
sūta uvāca viśvāmitrasamudbhūtaṁ kuṇḍaṁ tatrāparaṁ śubham saṁtiṣṭhate dvijaśreṣṭhāḥ sarvakāmapradāyakam
सूत जी ने कहा -- हे द्विजश्रेष्ठो! वहाँ विश्वामित्र के द्वारा प्रकट किया गया एक अन्य शुभ कुण्ड है, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.6.42.2)
तत्र चैत्रतृतीयायां कृते स्नाने भवेन्नरः॥ दिव्यरूपधरः साक्षात्कामोऽन्यो द्विजसत्तमाः
tatra caitratṛtīyāyāṁ kṛte snāne bhavennaraḥ divyarūpadharaḥ sākṣātkāmo'nyo dvijasattamāḥ
वहाँ चैत्र मास की तृतीया को स्नान करने वाला मनुष्य दिव्य रूप धारण कर, हे द्विजसत्तमो! साक्षात् कामदेव के समान हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.6.42.3)
नारी वा श्रद्धयोपेता तत्र स्नात्वा प्रजावती॥ भवेत्सौभाग्यसंयुक्ता स्पृहणीयतमा क्षितौ
nārī vā śraddhayopetā tatra snātvā prajāvatī bhavetsaubhāgyasaṁyuktā spṛhaṇīyatamā kṣitau
और श्रद्धायुक्त होकर वहाँ स्नान करने वाली स्त्री संतानवती होकर सौभाग्य से युक्त तथा पृथ्वी पर सबसे अधिक वांछनीय बन जाती है।
श्लोक 4 (skanda.6.42.4)
ऋषय ऊचुः॥ तीर्थं तस्य मुनेस्तत्र कस्मिन्काले व्यवस्थितम्॥ निर्मलं केन निःशेषं वद त्वं सूतनंदन
ṛṣaya ūcuḥ tīrthaṁ tasya munestatra kasminkāle vyavasthitam nirmalaṁ kena niḥśeṣaṁ vada tvaṁ sūtanaṁdana
ऋषियों ने कहा -- हे सूतनन्दन! उस मुनि का वह पवित्र तीर्थ किस काल में और किस प्रकार वहाँ पूर्णतः निर्मल होकर स्थापित हुआ, यह हमें बताइए।
श्लोक 5 (skanda.6.42.5)
सूत उवाच॥ तत्रास्ति निर्झरः पूर्वं सामान्यो द्विजसत्तमाः॥ अवधूतो धरापृष्ठे माहात्म्येन व्यवस्थितः
sūta uvāca tatrāsti nirjharaḥ pūrvaṁ sāmānyo dvijasattamāḥ avadhūto dharāpṛṣṭhe māhātmyena vyavasthitaḥ
सूत जी ने कहा -- हे द्विजसत्तमो! वहाँ पहले एक साधारण झरना था, जो पृथ्वी की सतह पर उपेक्षित पड़ा था, किन्तु महिमा के कारण वह प्रसिद्ध हो गया।
श्लोक 6 (skanda.6.42.6)
यत्र देवनदी गंगा स्वयमेव व्यवस्थिता॥ यस्यां स्नातः पुमान्सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते
yatra devanadī gaṁgā svayameva vyavasthitā yasyāṁ snātaḥ pumānsadyaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate
वहाँ स्वयं देवनदी गंगा प्रतिष्ठित हुई हैं; उसमें स्नान करने वाला मनुष्य तुरंत ही समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 7 (skanda.6.42.7)
यस्तत्र कुरुते श्राद्धं पितॄनुद्दिश्य भावितः॥ तदक्षयं भवेच्छ्राद्धं पितॄणां तृप्तिकारकम्
yastatra kurute śrāddhaṁ pitṝnuddiśya bhāvitaḥ tadakṣayaṁ bhavecchrāddhaṁ pitṝṇāṁ tṛptikārakam
जो कोई श्रद्धापूर्वक वहाँ पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध करता है, वह श्राद्ध अक्षय होकर पितरों को तृप्त करने वाला होता है।
श्लोक 8 (skanda.6.42.8)
यत्किंचिद्दीयत दानं तस्मिंस्तीर्थवरे द्विजाः॥ हुतजप्यादिकं चैव तदनंतफलं भवेत्
yatkiṁciddīyata dānaṁ tasmiṁstīrthavare dvijāḥ hutajapyādikaṁ caiva tadanaṁtaphalaṁ bhavet
हे द्विजो! उस श्रेष्ठ तीर्थ में जो भी दान दिया जाता है, तथा जो भी हवन-जप आदि किया जाता है, वह अनंत फलदायी होता है।
श्लोक 9 (skanda.6.42.9)
कस्यचित्त्वथ कालस्य मृगी व्याधशराहता॥ प्रविष्टा सलिले तस्मिंस्तत्र पञ्चत्वमागता
kasyacittvatha kālasya mṛgī vyādhaśarāhatā praviṣṭā salile tasmiṁstatra pañcatvamāgatā
किसी समय एक हिरणी व्याध के बाण से आहत होकर उस जल में जा घुसी और वहीं उसकी मृत्यु हो गई।
श्लोक 10 (skanda.6.42.10)
चैत्रशुक्लतृतीयायां मध्याह्ने द्विजसत्तमाः॥ नक्षत्रे यमदैवत्ये मार्तंडस्य च वासरे
caitraśuklatṛtīyāyāṁ madhyāhne dvijasattamāḥ nakṣatre yamadaivatye mārtaṁḍasya ca vāsare
हे द्विजसत्तमो! यह घटना चैत्र शुक्ल तृतीया को मध्याह्न काल में, यम-देवता के नक्षत्र में तथा रविवार के दिन घटी।
श्लोक 11 (skanda.6.42.11)
अथ तत्तोयमाहात्म्यान्मेनकानाम साऽभवत्॥ अप्सरास्त्रिदशेंद्रस्य समंताच्चारुहासिनी
atha tattoyamāhātmyānmenakānāma sā'bhavat apsarāstridaśeṁdrasya samaṁtāccāruhāsinī
फिर उस जल की महिमा से वह हिरणी मेनका नामक इन्द्र की अप्सरा बन गई, जो चारों ओर मनोहर हास्य बिखेरती थी।
श्लोक 12 (skanda.6.42.12)
स्मरमाणाऽथ सा तस्य प्रभावं वरवर्णिनी॥ तीर्थमागत्य सद्भक्त्या स्नानं तत्र समाचरत्॥ चैत्रशुक्लतृतीयायां यामर्क्षे सूर्यवासरे
smaramāṇā'tha sā tasya prabhāvaṁ varavarṇinī tīrthamāgatya sadbhaktyā snānaṁ tatra samācarat caitraśuklatṛtīyāyāṁ yāmarkṣe sūryavāsare
वह सुंदरी उस तीर्थ के प्रभाव का स्मरण करते हुए, उसी चैत्र शुक्ल तृतीया को, उसी नक्षत्र और रविवार के दिन, वहाँ आकर सच्ची भक्ति से स्नान करती थी।
श्लोक 13 (skanda.6.42.13)
एकदा दिवसे तस्मिन्भ्रममाणो मुनीश्वरः॥ विश्वामित्र इति ख्यातस्तत्रायातस्तपोऽन्वितः
ekadā divase tasminbhramamāṇo munīśvaraḥ viśvāmitra iti khyātastatrāyātastapo'nvitaḥ
एक बार उसी दिन घूमते हुए विश्वामित्र नामक प्रसिद्ध मुनीश्वर तपस्या में लीन होकर वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 14 (skanda.6.42.14)
साऽपि स्वर्गात्समायाता देवतादर्शनार्थतः॥ पूजयित्वाथ तं देवं प्रस्थिता त्रिदिवं प्रति
sā'pi svargātsamāyātā devatādarśanārthataḥ pūjayitvātha taṁ devaṁ prasthitā tridivaṁ prati
वह भी स्वर्ग से देवदर्शन के लिए वहाँ आई थी; और उस देव की पूजा करके स्वर्ग की ओर लौटने को थी।
श्लोक 15 (skanda.6.42.15)
सा दृष्ट्वा तं मुनिं तत्र भ्रममाणमितस्ततः॥ यौवनस्थं सुरूपाढ्यं पंचबाणमिवापरम्
sā dṛṣṭvā taṁ muniṁ tatra bhramamāṇamitastataḥ yauvanasthaṁ surūpāḍhyaṁ paṁcabāṇamivāparam
उसने वहाँ इधर-उधर घूमते हुए उस मुनि को देखा, जो युवावस्था में था, सुंदर रूप से युक्त था, मानो साक्षात् कामदेव हो।
श्लोक 16 (skanda.6.42.16)
व्रतप्रभावजैर्व्याप्तं तेजोभिर्भास्करं यथा॥ बाल्यात्प्रभृति चीर्णेन तपसा दग्धकिल्बिषम्
vrataprabhāvajairvyāptaṁ tejobhirbhāskaraṁ yathā bālyātprabhṛti cīrṇena tapasā dagdhakilbiṣam
वह व्रत के प्रभाव से उत्पन्न तेज से सूर्य के समान व्याप्त था, और बाल्यकाल से किए गए तप द्वारा उसके समस्त पाप भस्म हो चुके थे।
श्लोक 17 (skanda.6.42.17)
सा तस्य दर्शनादेव कामबाणप्रपीडिता॥ सानंदाः सुरतार्थाय समीपं समुपाद्रवत्
sā tasya darśanādeva kāmabāṇaprapīḍitā sānaṁdāḥ suratārthāya samīpaṁ samupādravat
उसे देखते ही वह कामबाण से पीड़ित हो उठी और आनंदित होकर रति-सुख के लिए उसके समीप दौड़ी।
श्लोक 18 (skanda.6.42.18)
स दृष्ट्वाऽदृष्टपूर्वां तां मार्गपृच्छाकृते ततः॥ सम्मुखः प्रययौ तूर्णं प्रहृष्टेनांतरात्मना
sa dṛṣṭvā'dṛṣṭapūrvāṁ tāṁ mārgapṛcchākṛte tataḥ sammukhaḥ prayayau tūrṇaṁ prahṛṣṭenāṁtarātmanā
उसे पहले कभी न देखी हुई पाकर, मार्ग पूछने के बहाने, वह मुनि भी प्रसन्न मन से शीघ्र ही उसके सम्मुख गया।
श्लोक 19 (skanda.6.42.19)
उवाच देशं तां पृच्छन्स्त्रीधर्मांश्च विशेषतः॥ शुभलाभोऽस्तु ते भद्रे मनसा कर्मणा गिरा
uvāca deśaṁ tāṁ pṛcchanstrīdharmāṁśca viśeṣataḥ śubhalābho'stu te bhadre manasā karmaṇā girā
उसने उस देश के बारे में पूछते हुए विशेष रूप से स्त्रीधर्मों के विषय में भी उससे पूछा -- हे भद्रे! तुम्हें मन, कर्म और वाणी से शुभ लाभ प्राप्त हो।
श्लोक 20 (skanda.6.42.20)
सदैव वासुदेवस्य भक्तिश्चाव्यभिचारिणी॥ कच्चित्त्वं वर्तसे पुत्रि पतिपादपरायणा॥ चारित्रविनयोपेता सर्वदा प्रियवादिनी
sadaiva vāsudevasya bhaktiścāvyabhicāriṇī kaccittvaṁ vartase putri patipādaparāyaṇā cāritravinayopetā sarvadā priyavādinī
क्या तुम सदा वासुदेव के प्रति अटूट भक्ति रखती हो? हे पुत्री! क्या तुम अपने पति के चरणों में समर्पित, सदाचार और विनय से युक्त तथा सर्वदा मधुर वचन बोलने वाली हो?
श्लोक 21 (skanda.6.42.21)
कच्चित्त्वं सर्वदाभीष्टा पत्युर्दानैस्तथार्च्चनैः॥ बंधून्स्वमित्रवर्गं च तत्पुरः पृष्ठतोपि वा
kaccittvaṁ sarvadābhīṣṭā patyurdānaistathārccanaiḥ baṁdhūnsvamitravargaṁ ca tatpuraḥ pṛṣṭhatopi vā
क्या तुम दान और पूजन के द्वारा सदा अपने पति को प्रिय रहती हो? क्या तुम उसके सामने या पीठ पीछे भी उसके बंधुजनों और मित्रों का समादर करती हो?
श्लोक 22 (skanda.6.42.22)
कच्चिद्भर्तरि संसुप्ते त्वं निशवशमेष्यसि॥ उत्थानमप्रबुद्धे च करोषि वरवर्णिनि
kaccidbhartari saṁsupte tvaṁ niśavaśameṣyasi utthānamaprabuddhe ca karoṣi varavarṇini
हे वरवर्णिनी! क्या पति के सो जाने पर ही तुम रात्रि में सोती हो, और क्या पति के जागने से पहले ही तुम उठ जाती हो?
श्लोक 23 (skanda.6.42.23)
कच्चित्प्रातः समुत्थाय करोषि गृहमार्जनम्॥ स्वयमेव वरारोहे मण्डनं चोपमण्डनम्
kaccitprātaḥ samutthāya karoṣi gṛhamārjanam svayameva varārohe maṇḍanaṁ copamaṇḍanam
हे वरारोहे! क्या तुम प्रातःकाल उठकर स्वयं ही घर की सफाई करती हो और स्वयं ही श्रृंगार तथा अन्य सजावट करती हो?
श्लोक 24 (skanda.6.42.24)
कच्चिदेवान्नमस्कृत्य गुरुं च तदनंतरम्॥ करोषि त्वं प्राणयात्रां दत्त्वान्नं शक्तितो जलम्
kaccidevānnamaskṛtya guruṁ ca tadanaṁtaram karoṣi tvaṁ prāṇayātrāṁ dattvānnaṁ śaktito jalam
क्या तुम पहले गुरुजनों को प्रणाम करने के बाद ही अपनी जीवन-यात्रा (भोजन आदि) करती हो, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न-जल देती हो?
श्लोक 25 (skanda.6.42.25)
कच्चिदस्तंगते सूर्ये नान्नमश्नासि भाभिनि॥ अदत्त्वा वा स्वभृत्येभ्यः साधुभ्यश्च विशेषतः
kaccidastaṁgate sūrye nānnamaśnāsi bhābhini adattvā vā svabhṛtyebhyaḥ sādhubhyaśca viśeṣataḥ
हे भाभिनि! क्या तुम सूर्यास्त होने पर बिना अपने सेवकों और विशेष रूप से साधुजनों को भोजन दिए, स्वयं भोजन नहीं करती?
श्लोक 26 (skanda.6.42.26)
कच्चित्पिबसि पानीयं सप्तवारविशोधितम्॥ निबिडेन स्ववस्त्रेण पालयंती जलोद्भवान्
kaccitpibasi pānīyaṁ saptavāraviśodhitam nibiḍena svavastreṇa pālayaṁtī jalodbhavān
क्या तुम अपने घने वस्त्र से जल में उत्पन्न होने वाले जीवों की रक्षा करते हुए, सात बार छाना हुआ जल ही पीती हो?
श्लोक 27 (skanda.6.42.27)
कच्चिद्दयासमोपेता गात्रक्लेशकरानपि॥ यूकामत्कुणदंशादीन्पुत्रवत्परिरक्षसि
kacciddayāsamopetā gātrakleśakarānapi yūkāmatkuṇadaṁśādīnputravatparirakṣasi
क्या तुम दया से युक्त होकर शरीर को कष्ट देने वाले जूँ, खटमल आदि दंश करने वाले जीवों की भी संतान के समान रक्षा करती हो?
श्लोक 28 (skanda.6.42.28)
कच्चित्साधुमुखान्नित्यं शिवधर्मं सुभक्तितः॥ शृणोषि भक्तितो भद्रे प्रकरोषि च सादरम्
kaccitsādhumukhānnityaṁ śivadharmaṁ subhaktitaḥ śṛṇoṣi bhaktito bhadre prakaroṣi ca sādaram
हे भद्रे! क्या तुम प्रतिदिन साधुजनों के मुख से भक्तिपूर्वक शिवधर्म को सुनती हो और आदरपूर्वक उसका पालन करती हो?
श्लोक 29 (skanda.6.42.29)
क्वचिच्छ्रुत्वाऽऽगमं पुण्यं प्रकरोषि च पूजनम्॥ शास्त्रस्य वाचकस्यापि व्याख्यातुश्च विशेषतः
kvacicchrutvā''gamaṁ puṇyaṁ prakaroṣi ca pūjanam śāstrasya vācakasyāpi vyākhyātuśca viśeṣataḥ
कभी पवित्र आगम-शास्त्र सुनकर क्या तुम उस शास्त्र के पाठक और विशेष रूप से व्याख्याता की भी पूजा करती हो?
श्लोक 30 (skanda.6.42.30)
कच्चित्पुराणशास्त्राणि प्रणीतानि जनेश्वरैः॥ संलेख्याक्षररम्याणि साधुभ्यः संप्रयच्छसि
kaccitpurāṇaśāstrāṇi praṇītāni janeśvaraiḥ saṁlekhyākṣararamyāṇi sādhubhyaḥ saṁprayacchasi
क्या तुम राजाओं (मुनीश्वरों) द्वारा रचित पुराण-शास्त्रों को सुंदर अक्षरों में लिखवाकर साधुजनों को भेंट करती हो?
श्लोक 31 (skanda.6.42.31)
यः श्रुत्वा सर्व शास्त्राणि निष्क्रयं न प्रयच्छति॥ शास्त्रचौरः स विज्ञेयो न चैवाप्नोति तत्फलम्
yaḥ śrutvā sarva śāstrāṇi niṣkrayaṁ na prayacchati śāstracauraḥ sa vijñeyo na caivāpnoti tatphalam
जो व्यक्ति समस्त शास्त्रों को सुनकर भी उसका मूल्य (दक्षिणा) नहीं देता, वह शास्त्र-चोर समझा जाता है और उसे उसका फल कभी प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 32 (skanda.6.42.32)
कच्चिच्छिवालये नृत्यगीतवाद्यादिकाः क्रियाः॥ बलिपूजोपहारांश्च त्वं करोषि च शक्तितः
kaccicchivālaye nṛtyagītavādyādikāḥ kriyāḥ balipūjopahārāṁśca tvaṁ karoṣi ca śaktitaḥ
क्या तुम शिवालय में नृत्य, गीत, वाद्य आदि क्रियाएँ तथा बलि, पूजा और उपहार आदि अपनी सामर्थ्य के अनुसार करती हो?
श्लोक 33 (skanda.6.42.33)
कच्चित्प्रावरणं वस्त्रं सुभगे सर्वमेव च॥ संप्रयच्छसि साधुभ्यः प्रणिपातपुरःसरम्
kaccitprāvaraṇaṁ vastraṁ subhage sarvameva ca saṁprayacchasi sādhubhyaḥ praṇipātapuraḥsaram
हे सुभगे! क्या तुम प्रणाम करते हुए साधुजनों को ओढ़ने के वस्त्र तथा अन्य सब कुछ भेंट करती हो?
श्लोक 34 (skanda.6.42.34)
वृथा पर्यटनं नित्यं कच्चिन्न परमंदिरे॥ त्वं करोषि विशालाक्षि विशेषेण निशागमे
vṛthā paryaṭanaṁ nityaṁ kaccinna paramaṁdire tvaṁ karoṣi viśālākṣi viśeṣeṇa niśāgame
हे विशालाक्षि! क्या तुम प्रतिदिन, विशेष रूप से रात्रि होने पर, व्यर्थ में दूसरों के घरों में इधर-उधर नहीं घूमती?
श्लोक 35 (skanda.6.42.35)
कच्चिन्नाश्नासि भद्रे त्वं स्वभर्तरि बुभुक्षिते॥ आज्ञाभंगं प्रयत्नेन कच्चित्तत्र प्ररक्षसि
kaccinnāśnāsi bhadre tvaṁ svabhartari bubhukṣite ājñābhaṁgaṁ prayatnena kaccittatra prarakṣasi
हे भद्रे! क्या तुम अपने भूखे पति के रहते हुए स्वयं भोजन नहीं करती, और क्या तुम प्रयत्नपूर्वक उसकी आज्ञा का भंग होने से बचाती हो?
श्लोक 36 (skanda.6.42.36)
कच्चित्प्रकुपिते कांते नोत्तराणि प्रयच्छसि॥ तस्यकोपप्रणाशार्षं प्रियं कच्चिच्च जल्पसि
kaccitprakupite kāṁte nottarāṇi prayacchasi tasyakopapraṇāśārṣaṁ priyaṁ kaccicca jalpasi
क्या पति के क्रुद्ध होने पर तुम कोई प्रत्युत्तर नहीं देतीं, और क्या उसके क्रोध को शांत करने के लिए तुम प्रिय वचन ही बोलती हो?
श्लोक 37 (skanda.6.42.37)
कच्चित्त्वं प्रोषिते कांते मलिनांबरधारिणी॥ जायसे च तथा दीना विवर्णवदना कृशा
kaccittvaṁ proṣite kāṁte malināṁbaradhāriṇī jāyase ca tathā dīnā vivarṇavadanā kṛśā
क्या पति के परदेश जाने पर तुम मलिन वस्त्र धारण करती हो, तथा दीन, विवर्णमुखी और कृश हो जाती हो?
श्लोक 38 (skanda.6.42.38)
कच्चिन्मंदिरपृष्ठे त्वं न धत्से भिन्नभाजनम्॥ उच्छिष्टं वा जनैस्त्यक्तमपि कार्योपकारकम्
kaccinmaṁdirapṛṣṭhe tvaṁ na dhatse bhinnabhājanam ucchiṣṭaṁ vā janaistyaktamapi kāryopakārakam
क्या तुम घर के पीछे टूटे हुए बर्तन या लोगों द्वारा त्यागी गई जूठन को भी, यदि वह किसी काम में उपयोगी हो तो, संभालकर नहीं फेंकतीं?
श्लोक 39 (skanda.6.42.39)
कच्चिद्व्रजसि नो रात्रौ जागरेषु कथासु च॥ निर्झरेषु विविक्तेषु पुलिनेषु वनेषु च
kaccidvrajasi no rātrau jāgareṣu kathāsu ca nirjhareṣu vivikteṣu pulineṣu vaneṣu ca
क्या तुम रात्रि में जागरण, कथा-श्रवण के बहाने या निर्जन झरनों, नदी-तटों और वनों में नहीं भटकतीं?
श्लोक 40 (skanda.6.42.40)
कच्चिन्न कुरुषे मैत्रीं बंधकीभिः समं शुभे॥ धात्रीभिर्मालिकस्त्रीभी रजकीभिश्च भामिनि
kaccinna kuruṣe maitrīṁ baṁdhakībhiḥ samaṁ śubhe dhātrībhirmālikastrībhī rajakībhiśca bhāmini
हे शुभे! क्या तुम वेश्याओं, धाइयों, मालिन स्त्रियों तथा धोबिनों के साथ मित्रता नहीं करती?
श्लोक 41 (skanda.6.42.41)
कञ्चिद्दधासि नित्यं त्वं मुखं कुंकुमरंजितम्॥ शिरः पुष्पसमाकीर्णं नेत्रे कज्जलरंजिते
kañciddadhāsi nityaṁ tvaṁ mukhaṁ kuṁkumaraṁjitam śiraḥ puṣpasamākīrṇaṁ netre kajjalaraṁjite
क्या तुम प्रतिदिन अपने मुख को कुंकुम से रंजित, सिर को फूलों से सज्जित तथा नेत्रों को काजल से अलंकृत रखती हो?