नागर खण्ड · अध्याय 43
विश्वामित्र-मेनका संवाद का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.43.1)
मेनकोवाच॥ अन्यास्ता नायिका विप्र यासां धर्मस्त्वयोदितः॥ स्वेच्छाचारविहारिण्यो वयं वेश्या दिवौकसाम्
menakovāca anyāstā nāyikā vipra yāsāṁ dharmastvayoditaḥ svecchācāravihāriṇyo vayaṁ veśyā divaukasām
मेनका ने कहा -- हे विप्र! जिन स्त्रियों का धर्म तुमने अभी बताया, वे तो अन्य नायिकाएँ हैं; हम तो स्वर्ग की वेश्याएँ हैं, जो स्वेच्छा से विचरण करती हैं।
श्लोक 2 (skanda.6.43.2)
स त्वं वद महाभाग कस्माद्देशात्समागतः॥ मम चित्तहरो वापि तीर्थे धर्मिष्ठसंश्रये
sa tvaṁ vada mahābhāga kasmāddeśātsamāgataḥ mama cittaharo vāpi tīrthe dharmiṣṭhasaṁśraye
हे महाभाग! अब तुम बताओ, तुम किस देश से आए हो, जो इस धर्मपरायणों के आश्रयभूत तीर्थ में मेरे मन को हर लिया है?
श्लोक 3 (skanda.6.43.3)
त्वां दृष्ट्वाहं महाभाग कामदेव समाकृतिम्॥ पुलकांचितसर्वांगी कामबाणप्रपीडिता
tvāṁ dṛṣṭvāhaṁ mahābhāga kāmadeva samākṛtim pulakāṁcitasarvāṁgī kāmabāṇaprapīḍitā
हे महाभाग! कामदेव जैसे रूपवाले तुम्हें देखकर मेरा सारा शरीर रोमांचित हो उठा है, और मैं काम के बाण से पीड़ित हो गई हूँ।
श्लोक 4 (skanda.6.43.4)
तस्माद्भजस्व मां रक्तां नो चेद्यास्यामि संक्षयम्॥ कामबाणप्रदग्धा वै पुरोऽपि तव तापस॥ ततः स्त्रीवधपापेन लिप्यसे त्वं न संशयः
tasmādbhajasva māṁ raktāṁ no cedyāsyāmi saṁkṣayam kāmabāṇapradagdhā vai puro'pi tava tāpasa tataḥ strīvadhapāpena lipyase tvaṁ na saṁśayaḥ
इसलिए तुम्हारी अनुरक्त मुझ मेनका को अपना लो, अन्यथा मैं नष्ट हो जाऊँगी; हे तपस्वी! काम के बाण से जलती हुई मैं तुम्हारे सामने ही मर जाऊँगी, और तब निःसंदेह तुम स्त्री-हत्या के पाप से लिप्त हो जाओगे।
श्लोक 5 (skanda.6.43.5)
तापस उवाच॥ वयं व्रतधराः सुभ्रु ब्रह्मचर्यपरायणाः॥ मूर्खाः कामविधौ भद्रे निरताः शिवशासने
tāpasa uvāca vayaṁ vratadharāḥ subhru brahmacaryaparāyaṇāḥ mūrkhāḥ kāmavidhau bhadre niratāḥ śivaśāsane
तापस ने कहा -- हे सुभ्रु! हम व्रतधारी और ब्रह्मचर्य में परायण हैं; हे भद्रे! जो शिव के शासन में निरत होकर भी काम-विधि में रत होते हैं, वे मूर्ख हैं।
श्लोक 6 (skanda.6.43.6)
सर्वेषां व्रतिनां मूलं ब्रह्मचर्यमुदाहृतम्॥ विशेषाच्छिवभक्तानामेवं भूयो विधास्यसि
sarveṣāṁ vratināṁ mūlaṁ brahmacaryamudāhṛtam viśeṣācchivabhaktānāmevaṁ bhūyo vidhāsyasi
समस्त व्रतधारियों का मूल ब्रह्मचर्य ही कहा गया है, विशेषकर शिवभक्तों के लिए; अतः अब से तुम भी ऐसा ही आचरण करना।
श्लोक 7 (skanda.6.43.7)
अपि वर्षशतं साग्रं यत्तपः कुरुते व्रती॥ सकृत्स्त्रीसंगमान्नाशं याति पाशुपतस्य च
api varṣaśataṁ sāgraṁ yattapaḥ kurute vratī sakṛtstrīsaṁgamānnāśaṁ yāti pāśupatasya ca
यदि कोई व्रती सौ वर्षों से भी अधिक तप करे, तो भी एक बार स्त्री-संगम करने मात्र से उसका पाशुपत-व्रत नष्ट हो जाता है।
श्लोक 8 (skanda.6.43.8)
मां च पाशुपतं लुब्धा कस्मात्त्वं भीरु भाषसे॥ ईदृक्पापतमं कर्म गर्हितं शिवशासने
māṁ ca pāśupataṁ lubdhā kasmāttvaṁ bhīru bhāṣase īdṛkpāpatamaṁ karma garhitaṁ śivaśāsane
हे लोभिनी! फिर तुम मुझ पाशुपत-व्रती से भयभीत हुए बिना ऐसी बात क्यों कह रही हो? शिव के शासन में ऐसा घोर पापपूर्ण कर्म निंदित है।
श्लोक 9 (skanda.6.43.9)
यः स्त्रीं भजति पापात्मा वृथा पाशुपतव्रती॥ सोऽतीतान्दश चाधाय पुरुषान्नरके पचेत्
yaḥ strīṁ bhajati pāpātmā vṛthā pāśupatavratī so'tītāndaśa cādhāya puruṣānnarake pacet
जो पापात्मा पाशुपत-व्रती व्यर्थ में ही किसी स्त्री का संग करता है, वह अपने दस पूर्वज पुरुषों को भी साथ लेकर नरक में पकाया जाता है।
श्लोक 10 (skanda.6.43.10)
आस्तां तावत्समा संगं संस्पर्शं च वरानने॥ संभाषमपि पापाय स्त्रीभिः पाशुपतस्य च
āstāṁ tāvatsamā saṁgaṁ saṁsparśaṁ ca varānane saṁbhāṣamapi pāpāya strībhiḥ pāśupatasya ca
हे वरानने! समागम और स्पर्श की तो बात ही क्या, पाशुपत-व्रती के लिए स्त्रियों के साथ बातचीत करना मात्र भी पापकारी होता है।
श्लोक 11 (skanda.6.43.11)
तस्माद् द्रुततरं गच्छ स्थानादस्माद्वरांगने॥ यत्रावाप्स्यसि चाभीष्टं तत्र त्वं गन्तुमर्हसि
tasmād drutataraṁ gaccha sthānādasmādvarāṁgane yatrāvāpsyasi cābhīṣṭaṁ tatra tvaṁ gantumarhasi
इसलिए हे वरांगने! तुम शीघ्र ही इस स्थान से चली जाओ; जहाँ तुम्हें अभीष्ट की प्राप्ति हो, वहीं जाना तुम्हारे लिए उचित है।