नागर खण्ड · अध्याय 44
विश्वामित्रेश्वर माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.44.1)
मेनकोवाच॥ नूनं हि कामधर्मे त्वं न प्रवीणो महाद्युते॥ तेन मामीदृशैर्वाक्यैर्निवारयसि रागिणीम्
menakovāca nūnaṁ hi kāmadharme tvaṁ na pravīṇo mahādyute tena māmīdṛśairvākyairnivārayasi rāgiṇīm
मेनका ने कहा -- हे महाद्युते! निश्चय ही तुम कामधर्म में निपुण नहीं हो, इसीलिए ऐसे वचनों से अनुरक्त मुझे रोक रहे हो।
श्लोक 2 (skanda.6.44.2)
सूत उवाच॥ एवमुक्तस्ततो भूयो विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम्॥ कोपेन महता युक्तो निःस्पृहस्तत्परिग्रहे
sūta uvāca evamuktastato bhūyo viśvāmitro'bravīdidam kopena mahatā yukto niḥspṛhastatparigrahe
सूत जी ने कहा -- ऐसा कहे जाने पर विश्वामित्र ने पुनः यह कहा, वे महान क्रोध से युक्त थे और उसे स्वीकार करने की कोई इच्छा नहीं रखते थे।
श्लोक 3 (skanda.6.44.3)
विश्वामित्र उवाच॥ त्वं जीव गच्छ वा मृत्युं नाहं कर्तास्मि ते वचः॥ व्रतनाशात्तु यत्पापमधिकं स्त्रीवधाद्भवेत्
viśvāmitra uvāca tvaṁ jīva gaccha vā mṛtyuṁ nāhaṁ kartāsmi te vacaḥ vratanāśāttu yatpāpamadhikaṁ strīvadhādbhavet
विश्वामित्र ने कहा -- चाहे तुम जीवित रहो या मृत्यु को प्राप्त हो जाओ, मैं तुम्हारी बात नहीं मानूँगा; क्योंकि व्रत के नाश से जो पाप होता है, वह स्त्री-हत्या से भी अधिक है।
श्लोक 4 (skanda.6.44.4)
प्रायश्चित्तं बुधैरुक्तं व्रतिनां स्त्रीवधे कृते॥ न संगात्तु पुनस्तासां तस्मात्त्वं गन्तुमर्हसि
prāyaścittaṁ budhairuktaṁ vratināṁ strīvadhe kṛte na saṁgāttu punastāsāṁ tasmāttvaṁ gantumarhasi
विद्वानों ने वह प्रायश्चित्त भी बताया है जो व्रतियों को स्त्री-हत्या हो जाने पर करना होता है, किन्तु उनके संग से होने वाले व्रत-नाश का कोई प्रायश्चित्त नहीं है; इसलिए तुम्हें यहाँ से चले जाना ही उचित है।
श्लोक 5 (skanda.6.44.5)
न केवलं व्रतोपेताः स्त्रीसंगात्पापमाप्नुयुः॥ व्रतबाह्या अपि नराः सक्ताः स्त्रीषु पतंत्यधः
na kevalaṁ vratopetāḥ strīsaṁgātpāpamāpnuyuḥ vratabāhyā api narāḥ saktāḥ strīṣu pataṁtyadhaḥ
केवल व्रतधारी ही स्त्री-संग से पाप को प्राप्त नहीं करते, बल्कि व्रत से रहित मनुष्य भी स्त्रियों में आसक्त होकर अधोगति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 6 (skanda.6.44.6)
संसारभ्रमणं नारी प्रथमेपि समागमे॥ वह्निप्रदक्षिणा व्याजन्यायेनैव प्रदर्शयेत्
saṁsārabhramaṇaṁ nārī prathamepi samāgame vahnipradakṣiṇā vyājanyāyenaiva pradarśayet
प्रथम भेंट में ही स्त्री, अग्नि की परिक्रमा के बहाने की भाँति छलपूर्वक, मनुष्य को संसार-भ्रमण अर्थात् जन्म-मरण के चक्र की ओर प्रवृत्त कर देती है।
श्लोक 7 (skanda.6.44.7)
तस्मात्स्त्रीभिः समं प्राज्ञः संभाषामपि वर्जयेत्॥ आस्तां तावत्समासंगं य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः
tasmātstrībhiḥ samaṁ prājñaḥ saṁbhāṣāmapi varjayet āstāṁ tāvatsamāsaṁgaṁ ya icchecchreya ātmanaḥ
इसलिए जो अपने कल्याण की इच्छा रखता है, ऐसा बुद्धिमान पुरुष स्त्रियों के साथ संग की तो बात ही क्या, बातचीत करना भी त्याग दे।
श्लोक 8 (skanda.6.44.8)
अंगार सदृशा नारी घृतकुंभसमः पुमान्॥ अस्पर्शाद्दृढतामेति तत्संपर्काद्विलीयते
aṁgāra sadṛśā nārī ghṛtakuṁbhasamaḥ pumān asparśāddṛḍhatāmeti tatsaṁparkādvilīyate
स्त्री अंगारे के समान है और पुरुष घी से भरे घड़े के समान; बिना स्पर्श किए वह दृढ़ बना रहता है, किन्तु उससे संपर्क होने पर पिघल जाता है।
श्लोक 9 (skanda.6.44.9)
स्त्रियो मूलमनर्थानां सर्वेषां प्राणिनां भुवि॥ तस्मात्त्याज्या सुदूरेण ताः स्वर्गस्य निरोधकाः
striyo mūlamanarthānāṁ sarveṣāṁ prāṇināṁ bhuvi tasmāttyājyā sudūreṇa tāḥ svargasya nirodhakāḥ
पृथ्वी पर समस्त प्राणियों के लिए स्त्रियाँ ही समस्त अनर्थों की जड़ हैं; इसलिए उन्हें दूर से ही त्याग देना चाहिए, क्योंकि वे स्वर्ग-प्राप्ति में बाधक हैं।
श्लोक 10 (skanda.6.44.10)
कुलीना वित्तवत्यश्च नाथवत्योऽपि योषितः॥ एकस्मिन्नंतरे रागं कुर्वंत्येताः सुचञ्चलाः
kulīnā vittavatyaśca nāthavatyo'pi yoṣitaḥ ekasminnaṁtare rāgaṁ kurvaṁtyetāḥ sucañcalāḥ
कुलीन, धनवती और पति वाली स्त्रियाँ भी अत्यंत चंचल होती हैं, वे क्षण भर में ही किसी अन्य के प्रति अनुराग कर बैठती हैं।
श्लोक 11 (skanda.6.44.11)
न स्त्रीभ्यः किंचिदन्यद्धि पापाय विद्यते भुवि॥ यासां संगसमासाद्य संसारे भ्रमते जनः॥ नीचोऽपि कुरुते सेवां यस्तासां विजनेष्वथ॥ विरूपं वापि नीचं वा तं सेवन्ते हि ताः स्त्रियः
na strībhyaḥ kiṁcidanyaddhi pāpāya vidyate bhuvi yāsāṁ saṁgasamāsādya saṁsāre bhramate janaḥ nīco'pi kurute sevāṁ yastāsāṁ vijaneṣvatha virūpaṁ vāpi nīcaṁ vā taṁ sevante hi tāḥ striyaḥ
पृथ्वी पर स्त्रियों से बढ़कर पाप का कोई अन्य साधन नहीं है, जिनका संग पाकर मनुष्य संसार में भटकता रहता है। जो भी पुरुष, चाहे वह नीच ही क्यों न हो, एकांत में उनकी सेवा करता है, चाहे वह कुरूप हो या नीच, वे स्त्रियाँ उसी की सेवा करने लगती हैं।
श्लोक 12 (skanda.6.44.12)
अनर्थत्वान्मनुष्याणां भयात्परिजनस्य च॥ मर्यादायाममर्यादाः स्त्रियस्तिष्ठन्ति भर्तृषु
anarthatvānmanuṣyāṇāṁ bhayātparijanasya ca maryādāyāmamaryādāḥ striyastiṣṭhanti bhartṛṣu
पुरुषों की हानि होने के भय से तथा परिजनों के भय से ही, स्वभाव से मर्यादाहीन स्त्रियाँ बाहर से मर्यादा में रहते हुए अपने पतियों के प्रति आज्ञाकारी बनी रहती हैं।
श्लोक 13 (skanda.6.44.13)
सूत उवाच॥ एवं संभर्त्सिता तेन मेनका कोपसंयुता॥ शशाप तं मुनिश्रेष्ठं स्फुरमाणोष्ठसंपुटा
sūta uvāca evaṁ saṁbhartsitā tena menakā kopasaṁyutā śaśāpa taṁ muniśreṣṭhaṁ sphuramāṇoṣṭhasaṁpuṭā
सूत जी ने कहा -- इस प्रकार उसके द्वारा भर्त्सना किए जाने पर, क्रोध से भरी मेनका ने काँपते हुए अधरों से उस श्रेष्ठ मुनि को शाप दे दिया।
श्लोक 14 (skanda.6.44.14)
यस्मात्त्वया परित्यक्ता सकामाहं सुदुर्मते॥ त्यजता कामजं धर्मं तस्माच्छापं गृहाण मे
yasmāttvayā parityaktā sakāmāhaṁ sudurmate tyajatā kāmajaṁ dharmaṁ tasmācchāpaṁ gṛhāṇa me
हे दुर्बुद्धे! चूँकि तुमने काम-जनित धर्म को त्यागकर, कामातुर मुझको भी त्याग दिया है, इसलिए अब मेरा यह शाप ग्रहण करो।
श्लोक 15 (skanda.6.44.15)
अद्यैव भव दुबुर्द्धे वलीपलितसंयुतः॥ जराजर्ज्जरितांगश्च तुच्छदृष्टिर्विरंगितः
adyaiva bhava duburddhe valīpalitasaṁyutaḥ jarājarjjaritāṁgaśca tucchadṛṣṭirviraṁgitaḥ
हे दुर्बुद्धे! इसी क्षण से तुम झुर्रियों और सफेद बालों से युक्त, वृद्धावस्था से जर्जरित शरीर वाले, धुँधली दृष्टि वाले तथा कांतिहीन हो जाओ।
श्लोक 16 (skanda.6.44.16)
सूत उवाच॥ उक्तमात्रे तु वचने तत्क्षणान्मुनिसत्तमः॥ बभूव तादृशः सद्यस्तया यादृक्प्रकीर्तितः
sūta uvāca uktamātre tu vacane tatkṣaṇānmunisattamaḥ babhūva tādṛśaḥ sadyastayā yādṛkprakīrtitaḥ
सूत जी ने कहा -- यह वचन कहे जाने के तत्क्षण ही वह श्रेष्ठ मुनि उसी क्षण वैसा ही हो गया, जैसा उसने कहा था।
श्लोक 17 (skanda.6.44.17)
ततः कोपपरीतात्मा सोऽपि तां शप्तुमुद्यतः॥ कमण्डलोर्जलं गृह्य संतापाद्रक्तलोचनः
tataḥ kopaparītātmā so'pi tāṁ śaptumudyataḥ kamaṇḍalorjalaṁ gṛhya saṁtāpādraktalocanaḥ
तब क्रोध से भरे हुए वे भी उसे शाप देने को उद्यत हो गए, संताप से उनके नेत्र लाल हो गए और उन्होंने अपने कमंडल से जल उठा लिया।
श्लोक 18 (skanda.6.44.18)
निर्दोषोऽपि त्वया यस्माच्छप्तोऽहं गणिकाधमे॥ तस्माद्भव त्वमप्याशु जराजर्जरितांगिका
nirdoṣo'pi tvayā yasmācchapto'haṁ gaṇikādhame tasmādbhava tvamapyāśu jarājarjaritāṁgikā
हे नीच गणिके! चूँकि निर्दोष होते हुए भी तुमने मुझे शाप दिया है, इसलिए तुम भी शीघ्र ही वृद्धावस्था से जर्जरित अंगों वाली हो जाओ।
श्लोक 19 (skanda.6.44.19)
सापि तद्वचनात्सद्यस्तादृग्रूपा व्यजायत॥ यादृशोऽसौ मुनिश्रेष्ठो वलीपलितगात्रभृत्
sāpi tadvacanātsadyastādṛgrūpā vyajāyata yādṛśo'sau muniśreṣṭho valīpalitagātrabhṛt
उसके इस वचन से वह भी तत्काल वैसे ही रूप को प्राप्त हो गई, जैसा वह श्रेष्ठ मुनि झुर्रियों और सफेद बालों से युक्त शरीर धारण किए हुए था।
श्लोक 20 (skanda.6.44.20)
अथ तादृक्स्वरूपेण स्नाता तत्र जला शये॥ भूयोऽपि तादृशी जाता यादृशी संस्थिता पुरा
atha tādṛksvarūpeṇa snātā tatra jalā śaye bhūyo'pi tādṛśī jātā yādṛśī saṁsthitā purā
फिर उसी वृद्ध रूप में उस जलाशय में स्नान करके, वह पुनः वैसी ही हो गई, जैसी वह पहले थी।
श्लोक 21 (skanda.6.44.21)
तद्दृष्ट्वा परमाश्चर्यमतीव त्वरयान्वितः॥ सोऽपि तत्राकरोत्स्नानं संजातश्च यथा पुरा
taddṛṣṭvā paramāścaryamatīva tvarayānvitaḥ so'pi tatrākarotsnānaṁ saṁjātaśca yathā purā
इस परम आश्चर्य को देखकर, अत्यंत शीघ्रता से वे भी वहाँ स्नान करने लगे, और फिर से पहले जैसे ही हो गए।
श्लोक 22 (skanda.6.44.22)
ततस्तौ तीर्थमाहात्म्याद्रूपौदार्यगुणान्वितौ॥ मिथ आमंत्र्य संहृष्टौ गतौ देशं यथेप्सितम्
tatastau tīrthamāhātmyādrūpaudāryaguṇānvitau mitha āmaṁtrya saṁhṛṣṭau gatau deśaṁ yathepsitam
फिर तीर्थ की महिमा से रूप, उदारता और गुणों से युक्त हुए वे दोनों, एक-दूसरे को विदा देकर, प्रसन्नतापूर्वक अपनी-अपनी इच्छित दिशा में चले गए।
श्लोक 23 (skanda.6.44.23)
एवं तीर्थस्य माहात्म्यं विज्ञाय भगवानृषिः॥ लिंगं संस्थापयामास देवदेवस्य शूलिनः
evaṁ tīrthasya māhātmyaṁ vijñāya bhagavānṛṣiḥ liṁgaṁ saṁsthāpayāmāsa devadevasya śūlinaḥ
इस प्रकार उस तीर्थ की महिमा को जानकर उस भगवान ऋषि ने त्रिशूलधारी देवाधिदेव का लिंग वहाँ स्थापित किया।
श्लोक 24 (skanda.6.44.24)
तपश्चकार सुमहत्तस्मिंस्तीर्थवरे तदा॥ कुशस्तम्बेन कृतवांस्तत्सरो विपुलं विभुः
tapaścakāra sumahattasmiṁstīrthavare tadā kuśastambena kṛtavāṁstatsaro vipulaṁ vibhuḥ
फिर उस श्रेष्ठ तीर्थ में उन्होंने महान तप किया, और उस समर्थ ऋषि ने कुश की एक झाड़ी से ही उस विशाल सरोवर का निर्माण किया।
श्लोक 25 (skanda.6.44.25)
तत्र स्नात्वा नरो यस्तु पूजयेल्लिंगमुत्तमम्॥ विश्वामित्रेश्वरं ख्यातं स गच्छेच्छिवमंदिरम्
tatra snātvā naro yastu pūjayelliṁgamuttamam viśvāmitreśvaraṁ khyātaṁ sa gacchecchivamaṁdiram
वहाँ स्नान करके जो मनुष्य विश्वामित्रेश्वर नाम से प्रसिद्ध उस उत्तम लिंग की पूजा करता है, वह शिव के धाम को प्राप्त होता है।
श्लोक 26 (skanda.6.44.26)
अद्यापि दृश्यते तत्र गंगोदकसमं जलम्॥ सर्वपापहरं पुण्यं सर्वकामप्रदायकम्
adyāpi dṛśyate tatra gaṁgodakasamaṁ jalam sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ sarvakāmapradāyakam
आज भी वहाँ गंगाजल के समान जल दिखाई देता है, जो समस्त पापों का हरण करने वाला, पवित्र और समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
श्लोक 27 (skanda.6.44.27)
यस्तत्र कुरुते स्नानं श्रद्धापूतेन चेतसा॥ स देवलोकमासाद्य पितृभिः सह मोदते
yastatra kurute snānaṁ śraddhāpūtena cetasā sa devalokamāsādya pitṛbhiḥ saha modate
जो कोई श्रद्धा से पवित्र मन के साथ वहाँ स्नान करता है, वह देवलोक को प्राप्त कर पितरों के साथ आनंद मनाता है।
श्लोक 28 (skanda.6.44.28)
ततःप्रभृति तत्तीर्थं ख्यातिं प्राप्तं महीतले॥ पाताले स्वर्गलोके च रूपौदार्यप्रदं नृणाम्
tataḥprabhṛti tattīrthaṁ khyātiṁ prāptaṁ mahītale pātāle svargaloke ca rūpaudāryapradaṁ nṛṇām
तब से लेकर वह तीर्थ पृथ्वी पर प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ, तथा पाताल और स्वर्गलोक में भी मनुष्यों को रूप और औदार्य प्रदान करने वाला बन गया।
श्लोक 29 (skanda.6.44.29)
एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि द्विजोत्तमाः॥ विश्वामित्रेश माहात्म्यं सर्वपातकनाशनम्
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi dvijottamāḥ viśvāmitreśa māhātmyaṁ sarvapātakanāśanam
हे द्विजोत्तमो! जो कुछ भी तुमने मुझसे पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया है -- यह विश्वामित्रेश का समस्त पापों का नाश करने वाला माहात्म्य है।