नागर खण्ड · अध्याय 45
त्रिपुष्कर माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.45.1)
सूत उवाच॥ तत्रैवास्ति द्विजश्रेष्ठाः सुपुण्यं पुष्करत्रयम्॥ यत्र पूर्वं तपस्तप्तमानर्ताधिपभूभुजा
sūta uvāca tatraivāsti dvijaśreṣṭhāḥ supuṇyaṁ puṣkaratrayam yatra pūrvaṁ tapastaptamānartādhipabhūbhujā
सूत जी ने कहा -- हे द्विजश्रेष्ठो! वहीं अत्यंत पुण्यमय पुष्करत्रय (तीन पुष्कर) स्थित हैं, जहाँ पूर्वकाल में आनर्त देश के राजा ने तप किया था।
श्लोक 2 (skanda.6.45.2)
यस्तत्र कार्तिके मासि कृत्तिकास्थे निशाकरे॥ मध्याह्ने कुरुते स्नानं स गच्छति परां गतिम्
yastatra kārtike māsi kṛttikāsthe niśākare madhyāhne kurute snānaṁ sa gacchati parāṁ gatim
जो कोई वहाँ कार्तिक मास में, जब चन्द्रमा कृत्तिका नक्षत्र में हो, मध्याह्न के समय स्नान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 3 (skanda.6.45.3)
ऋषय ऊचुः॥ कथं तत्र समायातं सुपुण्यं पुष्करत्रयम्॥ कस्मिन्स्थाने च विज्ञेयं कैश्चिह्नैर्वद सूतज
ṛṣaya ūcuḥ kathaṁ tatra samāyātaṁ supuṇyaṁ puṣkaratrayam kasminsthāne ca vijñeyaṁ kaiścihnairvada sūtaja
ऋषियों ने कहा -- हे सूतपुत्र! वह अत्यंत पुण्यमय पुष्करत्रय वहाँ कैसे प्रकट हुआ, वह किस स्थान पर है, और किन चिह्नों से पहचाना जाता है, यह सब हमें बताइए।
श्लोक 4 (skanda.6.45.4)
सूत उवाच॥ अहं वः कीर्तयिष्यामि यैश्चिह्नैः पुष्करत्रयम्॥ प्राग्दृष्टं मुनिना तत्र विश्वामित्रेण धीमता
sūta uvāca ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi yaiścihnaiḥ puṣkaratrayam prāgdṛṣṭaṁ muninā tatra viśvāmitreṇa dhīmatā
सूत जी ने कहा -- मैं तुम्हें वे चिह्न बताऊँगा, जिनसे पहले बुद्धिमान मुनि विश्वामित्र ने वहाँ पुष्करत्रय को पहचाना था।
श्लोक 5 (skanda.6.45.5)
पुरा निवसतस्तस्य विश्वामित्रस्य सन्मुनेः॥ संप्राप्ता कार्तिकी पुण्या कृत्तिकायोगसंयुता
purā nivasatastasya viśvāmitrasya sanmuneḥ saṁprāptā kārtikī puṇyā kṛttikāyogasaṁyutā
प्राचीन काल में जब वहाँ निवास करते हुए उस सत्पुरुष मुनि विश्वामित्र के समय पुण्यमयी कार्तिकी पूर्णिमा कृत्तिका-योग से युक्त होकर आई।
श्लोक 6 (skanda.6.45.6)
सर्वतीर्थमयं क्षेत्रं तद्विज्ञाय तपोनिधिः॥ ततश्च चिन्तयामास स्वचित्ते गाधिनन्दनः
sarvatīrthamayaṁ kṣetraṁ tadvijñāya taponidhiḥ tataśca cintayāmāsa svacitte gādhinandanaḥ
उस क्षेत्र को समस्त तीर्थों से युक्त जानकर, तपोनिधि गाधिनन्दन (विश्वामित्र) ने अपने मन में विचार किया।
श्लोक 7 (skanda.6.45.7)
अद्येयं कार्तिकी पुण्या कृत्तिकायोगसंयुता॥ यस्यां स्नाने नरैः श्रेयः प्राप्यते पुष्करोदके॥ आद्यं तु पुष्करं दूरे न गन्तुं शक्यतेऽधुना
adyeyaṁ kārtikī puṇyā kṛttikāyogasaṁyutā yasyāṁ snāne naraiḥ śreyaḥ prāpyate puṣkarodake ādyaṁ tu puṣkaraṁ dūre na gantuṁ śakyate'dhunā
आज यह पुण्यमयी कार्तिकी कृत्तिका-योग से युक्त है, जिसमें पुष्कर के जल में स्नान करने से मनुष्यों को कल्याण प्राप्त होता है; किन्तु आदि पुष्कर (मूल पुष्कर तीर्थ) तो दूर है, अभी वहाँ जाना संभव नहीं है।
श्लोक 8 (skanda.6.45.8)
तस्मादत्र स्थितं यच्च तस्मिन्स्नानं करोम्यहम्॥ स एवं निश्चयं कृत्वा श्रद्धापूतेन चेतसा
tasmādatra sthitaṁ yacca tasminsnānaṁ karomyaham sa evaṁ niścayaṁ kṛtvā śraddhāpūtena cetasā
इसलिए जो कुछ भी यहाँ स्थित है, उसी में मैं स्नान करूँगा -- ऐसा निश्चय करके वे श्रद्धा से पवित्र हृदय के साथ आगे बढ़े।
श्लोक 9 (skanda.6.45.9)
ततश्चान्वेषयामास पुष्कराणि समंततः॥ बहुत्वात्तत्र तीर्थानां निश्चयं नान्वपद्यत
tataścānveṣayāmāsa puṣkarāṇi samaṁtataḥ bahutvāttatra tīrthānāṁ niścayaṁ nānvapadyata
उन्होंने चारों ओर पुष्करों की खोज की, किन्तु वहाँ तीर्थों की अधिकता के कारण वे कोई निश्चय नहीं कर सके।
श्लोक 10 (skanda.6.45.10)
दृष्ट्वादृष्ट्वा जलस्थानं स्नानं चक्रे ततः परम्॥ स तदा श्रममापन्नो भ्रममाण इतस्ततः
dṛṣṭvādṛṣṭvā jalasthānaṁ snānaṁ cakre tataḥ param sa tadā śramamāpanno bhramamāṇa itastataḥ
प्रत्येक जलस्थान को देख-देखकर उन्होंने वहीं स्नान कर लिया; इस प्रकार इधर-उधर भटकते हुए वे थक गए।
श्लोक 11 (skanda.6.45.11)
वृक्षमूलं समाश्रित्य निविष्टश्च क्षितौ ततः॥ तुष्टावाथ शुचिर्भूत्वा श्रद्धया च त्रिपुष्करम्॥ मध्यमाद्योजनं स्वर्गः कनिष्ठादर्ध योजनम्॥ ज्येष्ठकुण्डात्पुनः ख्यातो हस्तप्रायः शुभात्मभिः
vṛkṣamūlaṁ samāśritya niviṣṭaśca kṣitau tataḥ tuṣṭāvātha śucirbhūtvā śraddhayā ca tripuṣkaram madhyamādyojanaṁ svargaḥ kaniṣṭhādardha yojanam jyeṣṭhakuṇḍātpunaḥ khyāto hastaprāyaḥ śubhātmabhiḥ
तब वे एक वृक्ष की जड़ के सहारे भूमि पर बैठ गए, और पवित्र होकर श्रद्धापूर्वक त्रिपुष्कर की स्तुति करने लगे। मध्यम पुष्कर से एक योजन दूरी तक स्वर्ग-तुल्य फल मिलता है, कनिष्ठ पुष्कर से आधा योजन तक, और ज्येष्ठ कुण्ड से पवित्रात्माओं द्वारा प्रायः एक हस्त-मात्र दूरी बताई गई है।
श्लोक 12 (skanda.6.45.12)
पावयंति हि तीर्थानि स्नानदानादसंशयम्॥ पुष्करालोकनादेव नरः पापात्प्रमु च्यते
pāvayaṁti hi tīrthāni snānadānādasaṁśayam puṣkarālokanādeva naraḥ pāpātpramu cyate
तीर्थ निःसंदेह स्नान और दान से मनुष्य को पवित्र करते हैं, किन्तु पुष्कर के दर्शन मात्र से ही मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 13 (skanda.6.45.13)
पुष्करारण्यमाश्रित्य शाकमूलफलैरपि॥ एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता
puṣkarāraṇyamāśritya śākamūlaphalairapi ekasminbhojite vipre koṭirbhavati bhojitā
पुष्कर के वन में रहकर यदि साग, मूल और फल से भी एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाए, तो वह मानो एक करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान होता है।
श्लोक 14 (skanda.6.45.14)
पुष्करे दुष्करं स्नानं पुष्करे दुष्करं तपः॥ पुष्करे दुष्करो वासः सर्वं पुष्करदुष्करम्
puṣkare duṣkaraṁ snānaṁ puṣkare duṣkaraṁ tapaḥ puṣkare duṣkaro vāsaḥ sarvaṁ puṣkaraduṣkaram
पुष्कर में स्नान करना दुष्कर है, पुष्कर में तप करना दुष्कर है, पुष्कर में वास करना दुष्कर है -- पुष्कर में सब कुछ दुष्कर, अर्थात् अत्यंत फलदायी और दुर्लभ, है।
श्लोक 15 (skanda.6.45.15)
कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे पुष्करे स्नाति यो नरः॥ स क्षणान्मुच्यते पापादाजन्ममरणोद्भवात्
kārtikyāṁ kṛttikāyoge puṣkare snāti yo naraḥ sa kṣaṇānmucyate pāpādājanmamaraṇodbhavāt
जो मनुष्य कार्तिकी में, कृत्तिका-योग के समय, पुष्कर में स्नान करता है, वह जन्म से लेकर मृत्यु तक संचित समस्त पापों से क्षण भर में मुक्त हो जाता है।
श्लोक 16 (skanda.6.45.16)
ज्येष्ठे प्रातश्च मध्याह्ने मध्यमे स्नाति यो नरः॥ कनिष्ठेऽस्तमिते भानौ सकृत्स्वर्गमवाप्नुयात्
jyeṣṭhe prātaśca madhyāhne madhyame snāti yo naraḥ kaniṣṭhe'stamite bhānau sakṛtsvargamavāpnuyāt
जो मनुष्य ज्येष्ठ पुष्कर में प्रातःकाल, मध्यम में मध्याह्न में, और कनिष्ठ में सूर्यास्त होने पर एक बार भी स्नान करता है, वह स्वर्ग को प्राप्त करता है।
श्लोक 17 (skanda.6.45.17)
तावत्तिष्ठति देहेषु पातकं सर्वदेहिनाम्॥ यावन्न पौष्करैस्तोयैः स्नानं वै कुर्वते नराः
tāvattiṣṭhati deheṣu pātakaṁ sarvadehinām yāvanna pauṣkaraistoyaiḥ snānaṁ vai kurvate narāḥ
सभी प्राणियों के शरीरों में तब तक ही पाप ठहरता है, जब तक मनुष्य पुष्कर के जल से स्नान नहीं करते।
श्लोक 18 (skanda.6.45.18)
दिवाकरकरैः स्पृष्टं तमो यद्वत्प्रणश्यति॥ पुष्करोदकसंस्पर्शाच्छीघ्रं गच्छति पातकम्
divākarakaraiḥ spṛṣṭaṁ tamo yadvatpraṇaśyati puṣkarodakasaṁsparśācchīghraṁ gacchati pātakam
जैसे सूर्य की किरणों के स्पर्श से अंधकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही पुष्कर के जल के स्पर्श से पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
श्लोक 19 (skanda.6.45.19)
ब्रह्महत्यादिकं पापं कृत्वापि पुरुषो भुवि॥ कार्तिक्यां पुष्करे स्नात्वा निर्दोषत्वं प्रपद्यते
brahmahatyādikaṁ pāpaṁ kṛtvāpi puruṣo bhuvi kārtikyāṁ puṣkare snātvā nirdoṣatvaṁ prapadyate
पृथ्वी पर ब्रह्महत्या आदि पाप करने वाला मनुष्य भी कार्तिकी के दिन पुष्कर में स्नान करके निर्दोष हो जाता है।
श्लोक 20 (skanda.6.45.20)
किं दानैः किं व्रतैर्होमैः किं यज्ञैर्वहुविस्तरैः॥ कार्तिक्यां पुष्करे स्नानैः सर्वेषां लभ्यते फलम्
kiṁ dānaiḥ kiṁ vratairhomaiḥ kiṁ yajñairvahuvistaraiḥ kārtikyāṁ puṣkare snānaiḥ sarveṣāṁ labhyate phalam
दान से क्या लाभ, व्रतों और होम से क्या लाभ, विस्तृत यज्ञों से क्या लाभ -- कार्तिकी के दिन पुष्कर में स्नान करने से इन सबका फल प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 21 (skanda.6.45.21)
यद्येषा भारती सत्या मया सम्यमुदीरिता॥ तन्मे स्याद्दर्शनं शीघ्रं सद्यः पुष्करसंभवम्
yadyeṣā bhāratī satyā mayā samyamudīritā tanme syāddarśanaṁ śīghraṁ sadyaḥ puṣkarasaṁbhavam
यदि मेरे द्वारा भलीभाँति कही गई यह वाणी सत्य है, तो मुझे तत्काल पुष्कर से उत्पन्न दर्शन प्राप्त हो।
श्लोक 22 (skanda.6.45.22)
एवं तस्य ब्रुवाणस्य विश्वामित्रस्य धीमतः॥ अशरीराऽभवद्वाणी गगनाद्द्विजसत्तमाः
evaṁ tasya bruvāṇasya viśvāmitrasya dhīmataḥ aśarīrā'bhavadvāṇī gaganāddvijasattamāḥ
इस प्रकार बुद्धिमान विश्वामित्र के यह कहते ही, हे द्विजसत्तमो! आकाश से एक अशरीरी वाणी हुई।
श्लोक 23 (skanda.6.45.23)
विश्वामित्र मुनिश्रेष्ठ सदा मे गगने स्थितिः॥ मुक्त्वैकां कार्तिकीं चैव कृत्तिकायोगसंयुताम्
viśvāmitra muniśreṣṭha sadā me gagane sthitiḥ muktvaikāṁ kārtikīṁ caiva kṛttikāyogasaṁyutām
हे मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र! एक कृत्तिका-योग से युक्त कार्तिकी को छोड़कर, मेरा निवास सदा आकाश में ही रहता है।
श्लोक 24 (skanda.6.45.24)
तदत्र दिवसे वासो मम भूमितले ध्रुवम्॥ अस्मिन्नेव वने पुण्ये तत्त्वं स्नानं समाचर
tadatra divase vāso mama bhūmitale dhruvam asminneva vane puṇye tattvaṁ snānaṁ samācara
किन्तु इस दिन मेरा वास अवश्य ही इस पृथ्वी पर, इसी पुण्य वन में होता है; इसलिए तुम यहीं स्नान करो।
श्लोक 25 (skanda.6.45.25)
विश्वामित्र उवाच॥ सर्वेषामेव तीर्थानां श्रूयते च समाश्रयः॥ तत्कथं वेद्मि तीर्थेश त्वामत्रैव व्यवस्थितम्
viśvāmitra uvāca sarveṣāmeva tīrthānāṁ śrūyate ca samāśrayaḥ tatkathaṁ vedmi tīrtheśa tvāmatraiva vyavasthitam
विश्वामित्र ने कहा -- हे तीर्थेश! यहाँ तो सुना जाता है कि समस्त तीर्थों का सामान्य आश्रय है, तो मैं यह कैसे जानूँ कि तुम यहीं स्थित हो?
श्लोक 26 (skanda.6.45.26)
तदोत्थिता पुनर्वाणी तारा गगनगोचरा॥ विश्वामित्रं मुनिश्रेष्ठं हर्षयंती द्विजोत्तमाः
tadotthitā punarvāṇī tārā gaganagocarā viśvāmitraṁ muniśreṣṭhaṁ harṣayaṁtī dvijottamāḥ
तब आकाश में स्थित तारे के समान वह वाणी पुनः उठी, जो मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र को हर्षित करने वाली थी।
श्लोक 27 (skanda.6.45.27)
नातिदूरे वनादस्मादत्र संति जलाशयाः॥ तेषामेकतमे पद्मं विद्यतेऽधोमुखं स्थितम्
nātidūre vanādasmādatra saṁti jalāśayāḥ teṣāmekatame padmaṁ vidyate'dhomukhaṁ sthitam
इस वन से बहुत दूर नहीं यहाँ जलाशय स्थित हैं; उनमें से एक में नीचे की ओर मुख किए हुए एक कमल है।
श्लोक 28 (skanda.6.45.28)
ऊर्ध्ववक्त्रं द्वितीये च तिर्यग्वक्त्रं तृतीयके॥ तत्रोर्ध्वास्यैः सरोजैश्च विज्ञेयं ज्येष्ठपुष्करम्
ūrdhvavaktraṁ dvitīye ca tiryagvaktraṁ tṛtīyake tatrordhvāsyaiḥ sarojaiśca vijñeyaṁ jyeṣṭhapuṣkaram
दूसरे में ऊपर की ओर मुख किए हुए, और तीसरे में तिरछे मुख वाला कमल है; उनमें से जिसमें ऊर्ध्वमुखी कमल हों, वह ज्येष्ठ पुष्कर जानना चाहिए।
श्लोक 29 (skanda.6.45.29)
पार्श्ववक्त्रैर्द्विजश्रेष्ठ मध्यमं परिकीर्तितम्॥ अधोवक्त्रैस्तथा ज्ञेयं कनिष्ठं पुष्करं क्षितौ
pārśvavaktrairdvijaśreṣṭha madhyamaṁ parikīrtitam adhovaktraistathā jñeyaṁ kaniṣṭhaṁ puṣkaraṁ kṣitau
हे द्विजश्रेष्ठ! जिसमें तिरछे मुख वाले कमल हों, वह मध्यम पुष्कर कहा गया है, और जिसमें नीचे की ओर मुख किए कमल हों, वह पृथ्वी पर कनिष्ठ पुष्कर जानना चाहिए।
श्लोक 30 (skanda.6.45.30)
एतैश्चिह्नैर्मुनिश्रेष्ठ ज्ञात्वा स्नानं समाचर॥ तच्छ्रुत्वा स मुनिस्तूर्णं समुत्थाय ययौ ततः
etaiścihnairmuniśreṣṭha jñātvā snānaṁ samācara tacchrutvā sa munistūrṇaṁ samutthāya yayau tataḥ
हे मुनिश्रेष्ठ! इन्हीं चिह्नों से पहचानकर तुम स्नान करो। यह सुनकर वे मुनि तुरंत उठकर वहाँ से चल पड़े।
श्लोक 31 (skanda.6.45.31)
तादृशैः कमलैस्तत्र संस्थितास्ते जलाशयाः॥ तान्दृष्ट्वा श्रद्धयोपेतः कृत्वा स्नानं यथाक्रमम्
tādṛśaiḥ kamalaistatra saṁsthitāste jalāśayāḥ tāndṛṣṭvā śraddhayopetaḥ kṛtvā snānaṁ yathākramam
वहाँ वैसे ही कमलों से युक्त वे जलाशय स्थित थे; उन्हें देखकर श्रद्धायुक्त होकर उन्होंने क्रमपूर्वक स्नान किया।
श्लोक 32 (skanda.6.45.32)
ततश्च विधिना सम्यक्चकारपितृतर्पणम्
tataśca vidhinā samyakcakārapitṛtarpaṇam
फिर उन्होंने विधिपूर्वक भलीभाँति पितृ-तर्पण किया।
श्लोक 33 (skanda.6.45.33)
ततः शाकैश्च मूलैश्च नीवारैः फलसंयुतैः॥ चकार विधिना श्राद्धं तत्रैव द्विजसत्तमाः
tataḥ śākaiśca mūlaiśca nīvāraiḥ phalasaṁyutaiḥ cakāra vidhinā śrāddhaṁ tatraiva dvijasattamāḥ
हे द्विजसत्तमो! फिर उन्होंने साग, मूल, जंगली चावल तथा फलों से वहीं विधिपूर्वक श्राद्ध किया।
श्लोक 34 (skanda.6.45.34)
तत्र तस्यैव तीरस्थो वीक्षांचक्रे समाहितः॥ कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे चिह्नदर्शनलालसः
tatra tasyaiva tīrastho vīkṣāṁcakre samāhitaḥ kārtikyāṁ kṛttikāyoge cihnadarśanalālasaḥ
वहाँ उसी के तट पर स्थित होकर, एकाग्रचित्त होकर, कार्तिकी कृत्तिका-योग के उस चिह्न को देखने की इच्छा से वे देखने लगे।
श्लोक 35 (skanda.6.45.35)
ब्राह्मणा ऊचुः॥ कीदृशं जायते चिह्नं कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे॥ संप्राप्ते कृत्तिकायोगे सर्वं तत्र वदाशु नः
brāhmaṇā ūcuḥ kīdṛśaṁ jāyate cihnaṁ kārtikyāṁ jyeṣṭhapuṣkare saṁprāpte kṛttikāyoge sarvaṁ tatra vadāśu naḥ
ब्राह्मणों ने कहा -- कार्तिकी के दिन, कृत्तिका-योग होने पर, ज्येष्ठ पुष्कर में कैसा चिह्न प्रकट होता है? वह सब हमें शीघ्र बताइए।
श्लोक 36 (skanda.6.45.36)
सूत उवाच॥ कार्तिक्यां कृत्तिकायोगे यदा गच्छति चंद्रमाः॥ तदा निष्क्रामति श्रेष्ठं कमलं जलमध्यतः
sūta uvāca kārtikyāṁ kṛttikāyoge yadā gacchati caṁdramāḥ tadā niṣkrāmati śreṣṭhaṁ kamalaṁ jalamadhyataḥ
सूत जी ने कहा -- कार्तिकी के दिन, जब चन्द्रमा कृत्तिका-योग में प्रवेश करता है, तब जल के मध्य से एक श्रेष्ठ कमल प्रकट होता है।
श्लोक 37 (skanda.6.45.37)
तन्मध्येंऽगुष्ठमात्रस्तु पुरुषो दृश्यते जनैः॥ सुस्नातैः श्रद्धयोपेतैस्ततस्तीर्थफलं लभेत्
tanmadhyeṁ'guṣṭhamātrastu puruṣo dṛśyate janaiḥ susnātaiḥ śraddhayopetaistatastīrthaphalaṁ labhet
उसके मध्य में अँगूठे के बराबर एक पुरुष दिखाई देता है, जिसे भलीभाँति स्नान किए हुए श्रद्धायुक्त लोग देखते हैं और उन्हें तीर्थ का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 38 (skanda.6.45.38)
एतस्मात्कारणात्स्नात्वा विश्वामित्रो महामुनिः॥ तच्चिह्नं वीक्षयामास महद्यत्नं समाश्रितः
etasmātkāraṇātsnātvā viśvāmitro mahāmuniḥ taccihnaṁ vīkṣayāmāsa mahadyatnaṁ samāśritaḥ
इसी कारण स्नान करके महामुनि विश्वामित्र ने महान प्रयत्न से उस चिह्न को देखने का प्रयास किया।
श्लोक 39 (skanda.6.45.39)
तस्यैवं वीक्षमाणस्य विश्वामित्रस्य धीमतः॥ आनर्ताधिपतिस्तत्र प्राप्तो राजा बृहद्बलः
tasyaivaṁ vīkṣamāṇasya viśvāmitrasya dhīmataḥ ānartādhipatistatra prāpto rājā bṛhadbalaḥ
जब बुद्धिमान विश्वामित्र इस प्रकार देख रहे थे, तभी वहाँ आनर्त देश के राजा बृहद्बल आ पहुँचे।
श्लोक 40 (skanda.6.45.40)
अत्यंतं मृगयाश्रांतो हत्वा मृगगणान्बहून्॥ ऋक्षांश्चैव वराहांश्च सारंगानथ संबरान्
atyaṁtaṁ mṛgayāśrāṁto hatvā mṛgagaṇānbahūn ṛkṣāṁścaiva varāhāṁśca sāraṁgānatha saṁbarān
वे शिकार खेलते-खेलते अत्यंत थक गए थे, अनेक हिरणों के झुंडों को, भालुओं को, सूअरों को, सारंगों और सांभरों को मार चुके थे।
श्लोक 41 (skanda.6.45.41)
सिंहान्व्याघ्रान्वृकांश्चैव हिंसानारण्यचारिणः॥ तथान्यानपि मध्याह्ने तेन मार्गेण संगतः
siṁhānvyāghrānvṛkāṁścaiva hiṁsānāraṇyacāriṇaḥ tathānyānapi madhyāhne tena mārgeṇa saṁgataḥ
सिंहों, बाघों, भेड़ियों तथा वन में विचरने वाले अन्य हिंसक पशुओं को भी मार चुके थे; मध्याह्न के समय वे उसी मार्ग से वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 42 (skanda.6.45.42)
अथापश्यद्द्रुमोपांते विश्वामित्रं मुनीश्वरम्॥ उपविष्टं कृतस्नानं वीक्षमाणं जलाशयम्
athāpaśyaddrumopāṁte viśvāmitraṁ munīśvaram upaviṣṭaṁ kṛtasnānaṁ vīkṣamāṇaṁ jalāśayam
तब उन्होंने वृक्ष के समीप बैठे हुए, स्नान किए हुए तथा जलाशय की ओर देख रहे मुनीश्वर विश्वामित्र को देखा।
श्लोक 43 (skanda.6.45.43)
ततस्तं प्रणिपत्योच्चैरवतीर्य तुरंगमात्॥ श्रमार्त्तः सलिले तस्मिन्प्रविवेश नृपोत्तमः
tatastaṁ praṇipatyoccairavatīrya turaṁgamāt śramārttaḥ salile tasminpraviveśa nṛpottamaḥ
तब वह श्रेष्ठ राजा घोड़े से उतरकर उन्हें भलीभाँति प्रणाम कर, थकान से पीड़ित होकर उस जल में प्रविष्ट हो गया।
श्लोक 44 (skanda.6.45.44)
एतस्मिन्नंतरे तोयात्कमलं तद्विनिर्गतम्॥ सहस्रपत्रसंजुष्टं द्वादशार्कसमप्रभम्
etasminnaṁtare toyātkamalaṁ tadvinirgatam sahasrapatrasaṁjuṣṭaṁ dvādaśārkasamaprabham
इसी बीच उस जल से वह कमल प्रकट हुआ, जो सहस्र पंखुड़ियों से युक्त था और बारह सूर्यों के समान तेजस्वी था।
श्लोक 45 (skanda.6.45.45)
तद्दृष्ट्वा स महीपालः पद्ममत्यद्भुतं महत्॥ जग्राह कौतुकाविष्टः स्वयं सव्येन पाणिना
taddṛṣṭvā sa mahīpālaḥ padmamatyadbhutaṁ mahat jagrāha kautukāviṣṭaḥ svayaṁ savyena pāṇinā
उस अत्यंत अद्भुत और विशाल कमल को देखकर, कुतूहल से भर उठे उस राजा ने स्वयं अपने बाएँ हाथ से उसे पकड़ लिया।
श्लोक 46 (skanda.6.45.46)
स्पृष्टमात्रे ततस्तस्मिन्कमले द्विजसत्तमाः॥ उत्थितः सुमहाञ्छब्दो विश्वं येन प्रपूरितम्
spṛṣṭamātre tatastasminkamale dvijasattamāḥ utthitaḥ sumahāñchabdo viśvaṁ yena prapūritam
हे द्विजसत्तमो! उस कमल के छूते ही वहाँ से एक अत्यंत महान ध्वनि उठी, जिसने समस्त विश्व को भर दिया।
श्लोक 47 (skanda.6.45.47)
तं शब्दं स महीपालः श्रुत्वा मूर्छामुपाविशत्॥ पतितश्च जले तस्मिन्पद्मं चादर्शनं गतम्
taṁ śabdaṁ sa mahīpālaḥ śrutvā mūrchāmupāviśat patitaśca jale tasminpadmaṁ cādarśanaṁ gatam
उस ध्वनि को सुनकर राजा मूर्छित होकर उस जल में गिर पड़ा, और वह कमल भी वहीं से अदृश्य हो गया।
श्लोक 48 (skanda.6.45.48)
ततः कृच्छ्रेण महता कर्षितः सलिलाद्बहिः॥ सेवकैर्दुःखशोकार्त्तैर्हाहेति प्रतिजल्पकैः
tataḥ kṛcchreṇa mahatā karṣitaḥ salilādbahiḥ sevakairduḥkhaśokārttairhāheti pratijalpakaiḥ
तब दुःख और शोक से व्याकुल तथा "हा! हा!" पुकारते हुए सेवकों ने उसे बड़ी कठिनाई से जल के बाहर निकाला।
श्लोक 49 (skanda.6.45.49)
ततस्तीरं समासाद्य कृच्छ्रात्प्राप्याथ चेतनाम्॥ यावद्वीक्षयति स्वांगं तावत्कुष्ठं समागतम्
tatastīraṁ samāsādya kṛcchrātprāpyātha cetanām yāvadvīkṣayati svāṁgaṁ tāvatkuṣṭhaṁ samāgatam
तट पर पहुँचकर बड़ी कठिनाई से होश में आते ही, जैसे ही उसने अपने शरीर को देखा, वैसे ही वह कोढ़ (कुष्ठ रोग) से ग्रस्त पाया गया।
श्लोक 50 (skanda.6.45.50)
ततो विषादमापन्नो दृष्ट्वा तादृङ्निजं वपुः॥ शीर्णघ्राणांघ्रिहस्तं च घर्घरस्वरसंयुतम्
tato viṣādamāpanno dṛṣṭvā tādṛṅnijaṁ vapuḥ śīrṇaghrāṇāṁghrihastaṁ ca ghargharasvarasaṁyutam
अपने शरीर को इस प्रकार देखकर, जिसकी नाक, पैर और हाथ गल चुके थे तथा जिसका स्वर घरघराहट से युक्त था, वह अत्यंत विषाद को प्राप्त हुआ।
श्लोक 51 (skanda.6.45.51)
अथ गत्वा मुनेः पार्श्वे विश्वामित्रस्य भूमिपः॥ उवाच वचनं दीनं बाष्पगद्गदया गिरा
atha gatvā muneḥ pārśve viśvāmitrasya bhūmipaḥ uvāca vacanaṁ dīnaṁ bāṣpagadgadayā girā
तब वह राजा मुनि विश्वामित्र के पास जाकर आँसुओं से रुँधे स्वर में दीन वचन कहने लगा।
श्लोक 52 (skanda.6.45.52)
भगवन्पश्य मे जातं यादृशं वपुरेव हि॥ अकस्मादेव मग्नस्य सलिलेऽत्र विगर्हितम्
bhagavanpaśya me jātaṁ yādṛśaṁ vapureva hi akasmādeva magnasya salile'tra vigarhitam
हे भगवन्! देखिए, इस जल में अकस्मात् डूब जाने के कारण मेरा शरीर कैसा निंदनीय हो गया है!
श्लोक 53 (skanda.6.45.53)
तत्किं पानीयदोषो वा किं वा भूमेर्मुनी श्वर॥ येनेदृक्सहसा यातं विकृतिं मे शरीरकम्
tatkiṁ pānīyadoṣo vā kiṁ vā bhūmermunī śvara yenedṛksahasā yātaṁ vikṛtiṁ me śarīrakam
हे मुनीश्वर! क्या यह जल का दोष है, या भूमि का, जिसके कारण मेरा शरीर अचानक ऐसी विकृति को प्राप्त हो गया?
श्लोक 54 (skanda.6.45.54)
विश्वामित्र उवाच॥ सावित्रं पद्ममेवैतद्यत्स्पृष्टं भूपते त्वया॥ उच्छिष्टेन रविर्मध्ये स्वयं यस्य व्यवस्थितः
viśvāmitra uvāca sāvitraṁ padmamevaitadyatspṛṣṭaṁ bhūpate tvayā ucchiṣṭena ravirmadhye svayaṁ yasya vyavasthitaḥ
विश्वामित्र ने कहा -- हे भूपते! तुमने जिस कमल को स्पर्श किया, वह साक्षात् सावित्र (सूर्य-संबंधी) कमल था, जिसके मध्य में स्वयं सूर्य विराजमान रहते हैं, और तुमने उसे जूठे हाथ से स्पर्श किया।
श्लोक 55 (skanda.6.45.55)
यदा स्यात्कृत्तिकायोगः कार्तिके मासि पार्थिव॥ शशांकस्य तदा चैतज्जायते पौष्करे जले
yadā syātkṛttikāyogaḥ kārtike māsi pārthiva śaśāṁkasya tadā caitajjāyate pauṣkare jale
हे राजन्! कार्तिक मास में जब चन्द्रमा का कृत्तिका-योग होता है, तभी यह कमल पुष्कर के जल में प्रकट होता है।
श्लोक 56 (skanda.6.45.56)
तदिदं पुष्करं ज्येष्ठं भवान्यत्र श्रमातुरः॥ प्रविष्टः कार्तिकी चाद्य कृत्तिकायोगसंयुता
tadidaṁ puṣkaraṁ jyeṣṭhaṁ bhavānyatra śramāturaḥ praviṣṭaḥ kārtikī cādya kṛttikāyogasaṁyutā
यह वही ज्येष्ठ पुष्कर है, जिसमें तुम थकान से पीड़ित होकर प्रविष्ट हुए, और आज वही कृत्तिका-योग से युक्त कार्तिकी तिथि है।
श्लोक 57 (skanda.6.45.57)
एतद्वीक्ष्य नरो ह्यत्र स्नानं कुर्याज्जलाशये॥ श्रद्धया परया युक्तः स गच्छति परां गतिम्
etadvīkṣya naro hyatra snānaṁ kuryājjalāśaye śraddhayā parayā yuktaḥ sa gacchati parāṁ gatim
इस दृश्य को देखकर जो मनुष्य इस जलाशय में परम श्रद्धा से युक्त होकर स्नान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 58 (skanda.6.45.58)
उच्छिष्टेन त्वया राजन्हरणाय हि केवलम्॥ एतत्सरोरुहं स्पृष्टं तेनेदृक्संस्थितं फलम्
ucchiṣṭena tvayā rājanharaṇāya hi kevalam etatsaroruhaṁ spṛṣṭaṁ tenedṛksaṁsthitaṁ phalam
किन्तु हे राजन्! तुमने जूठे हाथ से केवल इसे उठाने के लिए ही इस कमल को छुआ था, इसीलिए तुम्हें ऐसा फल प्राप्त हुआ है।
श्लोक 59 (skanda.6.45.59)
बृहद्बल उवाच॥ कथं मे स्यान्मुनिश्रेष्ठ कुष्ठव्याधिपरिक्षयः॥ तपसा नियमेनापि व्रतेनापि कृतेन वै
bṛhadbala uvāca kathaṁ me syānmuniśreṣṭha kuṣṭhavyādhiparikṣayaḥ tapasā niyamenāpi vratenāpi kṛtena vai
बृहद्बल ने कहा -- हे मुनिश्रेष्ठ! तप, नियम अथवा व्रत के पालन से मेरे इस कुष्ठ रोग का नाश कैसे हो सकता है?
श्लोक 60 (skanda.6.45.60)
विश्वामित्र उवाच॥ आराधय सहस्रांशुमस्मिन्क्षेत्रे महीपते॥ ततः प्राप्स्यसि संसिद्धिं कुष्ठनाशसमुद्भवाम्
viśvāmitra uvāca ārādhaya sahasrāṁśumasminkṣetre mahīpate tataḥ prāpsyasi saṁsiddhiṁ kuṣṭhanāśasamudbhavām
विश्वामित्र ने कहा -- हे महीपते! इसी क्षेत्र में सहस्रकिरण (सूर्य) की आराधना करो, तब तुम्हें कुष्ठ-नाश से उत्पन्न सिद्धि की प्राप्ति होगी।
श्लोक 61 (skanda.6.45.61)
तच्छ्रुत्वा स मुनेर्वाक्यं भूमिपालो बृहद्बलः॥ तत्क्षणात्स्थापयामास सूर्यस्य प्रतिमां तदा
tacchrutvā sa munervākyaṁ bhūmipālo bṛhadbalaḥ tatkṣaṇātsthāpayāmāsa sūryasya pratimāṁ tadā
मुनि का यह वचन सुनकर राजा बृहद्बल ने उसी क्षण वहाँ सूर्य की प्रतिमा स्थापित कर दी।
श्लोक 62 (skanda.6.45.62)
अर्चयामास विधिवत्पुष्पधूपानुलेपनैः॥ श्रद्धया परया युक्तो रविवारे विशेषतः
arcayāmāsa vidhivatpuṣpadhūpānulepanaiḥ śraddhayā parayā yukto ravivāre viśeṣataḥ
उसने विधिपूर्वक पुष्प, धूप और चंदन-लेप से उसकी पूजा की, विशेष रूप से रविवार को परम श्रद्धा से युक्त होकर।
श्लोक 63 (skanda.6.45.63)
उपवासपरो भूत्वा रक्तचन्दनसंयुतैः॥ पूजयन्रक्तपुष्पैश्च श्रद्धया परया युतः
upavāsaparo bhūtvā raktacandanasaṁyutaiḥ pūjayanraktapuṣpaiśca śraddhayā parayā yutaḥ
उपवास का पालन करते हुए, लाल चंदन से युक्त तथा लाल पुष्पों से परम श्रद्धापूर्वक वह पूजा करता रहा।
श्लोक 64 (skanda.6.45.64)
ततः संवत्सरस्यांते स बभूव महीपतिः॥ कुष्ठ व्याधि विनिर्मुक्तो द्वादशार्कसमप्रभः
tataḥ saṁvatsarasyāṁte sa babhūva mahīpatiḥ kuṣṭha vyādhi vinirmukto dvādaśārkasamaprabhaḥ
फिर एक वर्ष के अंत में वह राजा कुष्ठ रोग से पूर्णतः मुक्त होकर बारह सूर्यों के समान तेजस्वी हो गया।
श्लोक 65 (skanda.6.45.65)
ततः स्वं राज्यमासाद्य भुक्त्वा भोगाननेकशः॥ देहांते दिननाथस्य संप्राप्तो मंदिरं तथा
tataḥ svaṁ rājyamāsādya bhuktvā bhogānanekaśaḥ dehāṁte dinanāthasya saṁprāpto maṁdiraṁ tathā
फिर उसने अपने राज्य को प्राप्त कर अनेक भोगों को भोगा, और देहांत होने पर सूर्यदेव के धाम को प्राप्त किया।
श्लोक 66 (skanda.6.45.66)
॥ सूत उवाच॥ एवं तत्र द्विजश्रेष्ठा विश्वामित्रेण धीमता॥ प्रकटं सर्वलोकस्य विहितं पुष्करत्रयम्
sūta uvāca evaṁ tatra dvijaśreṣṭhā viśvāmitreṇa dhīmatā prakaṭaṁ sarvalokasya vihitaṁ puṣkaratrayam
सूत जी ने कहा -- हे द्विजश्रेष्ठो! इस प्रकार वहाँ बुद्धिमान विश्वामित्र द्वारा वह पुष्करत्रय समस्त लोक के लिए प्रकट रूप से प्रतिष्ठित किया गया।
श्लोक 67 (skanda.6.45.67)
यस्तत्र कार्तिके मासे कार्त्तिक्यां कृत्तिकासु च॥ प्रकरोति नरः स्नानं ब्रह्मलोकं स गच्छति
yastatra kārtike māse kārttikyāṁ kṛttikāsu ca prakaroti naraḥ snānaṁ brahmalokaṁ sa gacchati
जो मनुष्य वहाँ कार्तिक मास में, कार्तिकी के दिन, कृत्तिका नक्षत्र में स्नान करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 68 (skanda.6.45.68)
तथा यो भास्करं पश्येद्बृहद्वलप्रतिष्ठितम्॥ वत्सरं रविवारेण यावत्कृत्वा क्षणं नरः॥ स मुच्यते नरो रोगैर्यदि स्याद्रोगसंयुतः
tathā yo bhāskaraṁ paśyedbṛhadvalapratiṣṭhitam vatsaraṁ ravivāreṇa yāvatkṛtvā kṣaṇaṁ naraḥ sa mucyate naro rogairyadi syādrogasaṁyutaḥ
तथा जो मनुष्य बृहद्बल द्वारा स्थापित उस सूर्यदेव का प्रतिवर्ष रविवार को क्षण भर के लिए भी दर्शन करे, वह यदि रोगयुक्त हो तो समस्त रोगों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 69 (skanda.6.45.69)
नीरोगो वा नरः सद्यो लभते मनसेप्सितम्॥ निष्कामो मोक्षमाप्नोति प्रसादात्तीक्ष्णदीधितेः
nīrogo vā naraḥ sadyo labhate manasepsitam niṣkāmo mokṣamāpnoti prasādāttīkṣṇadīdhiteḥ
और यदि निरोग हो, तो वह तुरंत ही मन-वांछित फल प्राप्त करता है; तथा निष्काम भाव से रहने वाला व्यक्ति उस तीक्ष्ण-किरण सूर्यदेव की कृपा से मोक्ष को प्राप्त करता है।
श्लोक 70 (skanda.6.45.70)
कार्त्तिक्यां कृत्तिकायोगे वृषोत्सर्गं करोति यः॥ पुष्करेषु सुपुण्येषु सोऽश्वमेधफलं लभेत्
kārttikyāṁ kṛttikāyoge vṛṣotsargaṁ karoti yaḥ puṣkareṣu supuṇyeṣu so'śvamedhaphalaṁ labhet
जो कोई कार्तिकी के दिन, कृत्तिका-योग में, इन अत्यंत पुण्यमय पुष्करों में वृषोत्सर्ग करता है, वह अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करता है।
श्लोक 71 (skanda.6.45.71)
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोपि गयां व्रजेत्॥ यजेत वाऽश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्
eṣṭavyā bahavaḥ putrā yadyekopi gayāṁ vrajet yajeta vā'śvamedhena nīlaṁ vā vṛṣamutsṛjet
इसीलिए बहुत पुत्रों की कामना की जाती है, ताकि उनमें से एक भी गया जाए, अश्वमेध यज्ञ करे, अथवा नीला बैल छोड़े।
श्लोक 72 (skanda.6.45.72)
एकतः सर्वतीर्थानि सर्वदानानि चैकतः॥ एकतस्तु वृषोत्सर्गः कार्तिक्यां पुष्करेषु च
ekataḥ sarvatīrthāni sarvadānāni caikataḥ ekatastu vṛṣotsargaḥ kārtikyāṁ puṣkareṣu ca
एक ओर समस्त तीर्थ हैं, दूसरी ओर समस्त दान हैं, और दूसरी ओर कार्तिकी के दिन पुष्करों में किया गया वृषोत्सर्ग है -- यह अकेला ही उन सबके समान है।
श्लोक 73 (skanda.6.45.73)
यश्चैतच्छुणुयान्नित्यं पठेद्वा श्रद्धयान्वितः॥ संप्राप्य सर्वकामान्वै ब्रह्मलोके महीयते
yaścaitacchuṇuyānnityaṁ paṭhedvā śraddhayānvitaḥ saṁprāpya sarvakāmānvai brahmaloke mahīyate
जो कोई इसे नित्य श्रद्धापूर्वक सुनता या पढ़ता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त कर ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है।