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नागर खण्ड · अध्याय 46

सरस्वती तीर्थ माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

श्लोक 1 (skanda.6.46.1)

ऋषय ऊचुः॥ अन्यानि तत्र तीर्थानि यानि संति महामते॥ तानि कीर्तय सर्वाणि परं कौतूहलं हि नः

ṛṣaya ūcuḥ anyāni tatra tīrthāni yāni saṁti mahāmate tāni kīrtaya sarvāṇi paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

ऋषियों ने कहा -- हे महामते! वहाँ जो अन्य तीर्थ हैं, वे सब हमें बताइए; हमें उनके विषय में अत्यंत कुतूहल है।

श्लोक 2 (skanda.6.46.2)

सूत उवाच॥ तत्र सारस्वतं तीर्थमन्यदस्ति सुशोभनम्॥ यत्र स्नातोऽतिमूकोऽपि भवेद्वाक्यविचक्षणः

sūta uvāca tatra sārasvataṁ tīrthamanyadasti suśobhanam yatra snāto'timūko'pi bhavedvākyavicakṣaṇaḥ

सूत जी ने कहा -- वहाँ एक और अत्यंत सुंदर सारस्वत तीर्थ है, जिसमें स्नान करने पर एक अत्यंत गूँगा व्यक्ति भी वाणी में निपुण हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.6.46.3)

लभते चेप्सितान्कामान्मानुषान्दैविकानपि॥ ब्रह्मलोकादिपर्यतांस्तथालोकान्द्विजोत्तमाः

labhate cepsitānkāmānmānuṣāndaivikānapi brahmalokādiparyatāṁstathālokāndvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! वह मनुष्य वहाँ अपनी इच्छित मानवीय और दैवीय कामनाओं को भी प्राप्त करता है, तथा ब्रह्मलोक तक के लोकों को भी प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 4 (skanda.6.46.4)

पुरासीत्पार्थिवो ना्ना विख्यातो बलवर्धनः॥ समुद्रवलयामुर्वीं बुभुजे यो भुजार्जिताम्

purāsītpārthivo nānā vikhyāto balavardhanaḥ samudravalayāmurvīṁ bubhuje yo bhujārjitām

प्राचीन काल में बलवर्धन नामक विख्यात राजा था, जो समुद्र से घिरी पृथ्वी को अपने बाहुबल से अर्जित कर उसका उपभोग करता था।

श्लोक 5 (skanda.6.46.5)

तस्य पुत्रः समुत्पन्नः सर्वलक्षणसंयुतः॥ तस्य नाम पिता चक्रे संप्राप्ते द्वादशेऽहनि॥ अम्बुवीचिरिति स्पष्टं समाहूय द्विजोत्तमान्

tasya putraḥ samutpannaḥ sarvalakṣaṇasaṁyutaḥ tasya nāma pitā cakre saṁprāpte dvādaśe'hani ambuvīciriti spaṣṭaṁ samāhūya dvijottamān

उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो समस्त शुभ लक्षणों से युक्त था; उसके पिता ने बारहवें दिन ब्राह्मणों को बुलाकर स्पष्ट रूप से उसका नाम "अम्बुवीचि" रखा।

श्लोक 6 (skanda.6.46.6)

ततः स ववृधे बालो लालितस्तेन भूभुजा॥ मूकभावं समापन्नो न शक्रोति प्रजल्पितुम्

tataḥ sa vavṛdhe bālo lālitastena bhūbhujā mūkabhāvaṁ samāpanno na śakroti prajalpitum

फिर वह बालक उस राजा द्वारा दुलारा जाता हुआ बड़ा हुआ, किन्तु वह गूँगा था और बोलने में असमर्थ था।

श्लोक 7 (skanda.6.46.7)

ततोऽस्य सप्तमे वर्षे संप्राप्ते बलवर्धनः॥ पंचत्वं समनुप्राप्तः संग्रामे शत्रुभिर्हतः

tato'sya saptame varṣe saṁprāpte balavardhanaḥ paṁcatvaṁ samanuprāptaḥ saṁgrāme śatrubhirhataḥ

फिर जब उसका सातवाँ वर्ष आया, तब बलवर्धन युद्ध में शत्रुओं द्वारा मारे जाकर मृत्यु को प्राप्त हो गए।

श्लोक 8 (skanda.6.46.8)

ततो मूकोऽपि बालोपि मंत्रिभिस्तस्य भूपतेः॥ स सुतः स्थापितो राज्ये अभावेऽन्यसुतस्य च

tato mūko'pi bālopi maṁtribhistasya bhūpateḥ sa sutaḥ sthāpito rājye abhāve'nyasutasya ca

तब उस राजा का वह पुत्र, गूँगा और बालक होते हुए भी, अन्य किसी पुत्र के न होने के कारण मंत्रियों द्वारा राजगद्दी पर बैठा दिया गया।

श्लोक 9 (skanda.6.46.9)

एवं तस्य महीपस्य राज्यस्थस्य जडात्मनः॥ बालत्वे वर्तमानस्य राज्यं विप्लवमध्यगात्

evaṁ tasya mahīpasya rājyasthasya jaḍātmanaḥ bālatve vartamānasya rājyaṁ viplavamadhyagāt

इस प्रकार उस मूढ़-बुद्धि, बालावस्था में स्थित राजा के राज्यासीन होने पर, राज्य अव्यवस्था में पड़ गया।

श्लोक 10 (skanda.6.46.10)

ततो जलचरन्यायः संप्रवृत्तो महीतले॥ पीड्यंते सर्वलोकास्तु दुर्बला बलवत्तरैः

tato jalacaranyāyaḥ saṁpravṛtto mahītale pīḍyaṁte sarvalokāstu durbalā balavattaraiḥ

तब पृथ्वी पर "मत्स्य-न्याय" अर्थात् जलचरों का नियम प्रवृत्त हो गया, जिसमें बड़ी मछली छोटी को खा जाती है; सभी दुर्बल लोग बलवानों द्वारा पीड़ित होने लगे।

श्लोक 11 (skanda.6.46.11)

ततस्ते मंत्रिणः प्रोचुर्वसिष्ठं स्वपुरोहितम्॥ वचोऽर्थं नृपतेरस्य कुरूपायं महामुने

tataste maṁtriṇaḥ procurvasiṣṭhaṁ svapurohitam vaco'rthaṁ nṛpaterasya kurūpāyaṁ mahāmune

तब उन मंत्रियों ने अपने पुरोहित वसिष्ठ से कहा -- हे महामुने! इस राजा के हित के लिए कोई उपाय कीजिए।

श्लोक 12 (skanda.6.46.12)

पश्य कृत्स्नं धरापृष्ठे शून्यतां समुपस्थितम्॥ जडत्वान्नृपतेरस्य तस्मात्कुरु यथोचितम्

paśya kṛtsnaṁ dharāpṛṣṭhe śūnyatāṁ samupasthitam jaḍatvānnṛpaterasya tasmātkuru yathocitam

देखिए, राजा के जड़त्व (गूँगेपन) के कारण समस्त पृथ्वी पर शून्यता अर्थात् अराजकता फैल गई है; इसलिए जो उचित हो, वह कीजिए।

श्लोक 13 (skanda.6.46.13)

ततस्तु सुचिरं ध्यात्वा दीनान्प्रोवाच मंत्रिणः॥ सर्वानार्तिसमोपेताञ्छृण्वतस्तस्य भूपतेः

tatastu suciraṁ dhyātvā dīnānprovāca maṁtriṇaḥ sarvānārtisamopetāñchṛṇvatastasya bhūpateḥ

तब बहुत देर तक विचार करके उन्होंने उन सभी व्यथित और दुःखी मंत्रियों से कहा, जो राजा के सुनते हुए वहाँ खड़े थे।

श्लोक 14 (skanda.6.46.14)

अस्ति सारस्वतं तीर्थं सर्वकामप्रदं नृणाम्॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे तत्रायं स्नातु भूपतिः

asti sārasvataṁ tīrthaṁ sarvakāmapradaṁ nṛṇām hāṭakeśvaraje kṣetre tatrāyaṁ snātu bhūpatiḥ

हाटकेश्वर क्षेत्र में एक सारस्वत तीर्थ है, जो मनुष्यों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है; वहीं यह राजा स्नान करे।

श्लोक 15 (skanda.6.46.15)

अथ तद्वचनात्सद्यः स गत्वा तत्र सत्वरम्॥ स्नानात्तीर्थेऽथ संजातस्तत्क्षणात्स कल स्वनः

atha tadvacanātsadyaḥ sa gatvā tatra satvaram snānāttīrthe'tha saṁjātastatkṣaṇātsa kala svanaḥ

तब उसके इस वचन को सुनकर वह तत्काल वहाँ शीघ्रता से गया, और उस तीर्थ में स्नान करते ही उसी क्षण उसे वाणी प्राप्त हो गई।

श्लोक 16 (skanda.6.46.16)

तत्प्रभावं सरस्वत्याः स विज्ञाय महीपतिः॥ श्रद्धया परया युक्तो ध्यायमानः सरस्वतीम्

tatprabhāvaṁ sarasvatyāḥ sa vijñāya mahīpatiḥ śraddhayā parayā yukto dhyāyamānaḥ sarasvatīm

सरस्वती की इस महिमा को जानकर वह राजा परम श्रद्धा से युक्त होकर सरस्वती का ध्यान करने लगा।

श्लोक 17 (skanda.6.46.17)

ततस्तूर्णं समादाय मृत्तिकां स नदीतटात्॥ चकार भारतीं देवीं स्वयमेव चतुर्भुजाम्

tatastūrṇaṁ samādāya mṛttikāṁ sa nadītaṭāt cakāra bhāratīṁ devīṁ svayameva caturbhujām

फिर नदी के तट से शीघ्र ही मिट्टी लेकर, उसने स्वयं ही भारती देवी की चतुर्भुज मूर्ति बनाई।

श्लोक 18 (skanda.6.46.18)

दधतीं दक्षिणे हस्ते कमलं सुमनोहरम्॥ अक्षमालां तथान्यस्मिञ्जिततारक वर्चसम्

dadhatīṁ dakṣiṇe haste kamalaṁ sumanoharam akṣamālāṁ tathānyasmiñjitatāraka varcasam

उसके दाहिने हाथ में अत्यंत मनोहर कमल और दूसरे हाथ में एक अक्षमाला थी, जिसकी कांति तारों को भी जीतने वाली थी।

श्लोक 19 (skanda.6.46.19)

कमण्डलुं तथान्यस्मिन्दिव्यवारिप्रपूरितम्॥ पुस्तकं च तथा वामे सर्वविद्यासमुद्भवम्

kamaṇḍaluṁ tathānyasmindivyavāriprapūritam pustakaṁ ca tathā vāme sarvavidyāsamudbhavam

एक अन्य हाथ में दिव्य जल से भरा कमंडलु और बाएँ हाथ में समस्त विद्याओं को उत्पन्न करने वाला ग्रंथ था।

श्लोक 20 (skanda.6.46.20)

ततो मेध्ये शिलापृष्ठे तां निवेश्य प्रयत्नतः॥ पूजयामास सद्भक्त्या धूपमाल्पानुलेपनैः

tato medhye śilāpṛṣṭhe tāṁ niveśya prayatnataḥ pūjayāmāsa sadbhaktyā dhūpamālpānulepanaiḥ

फिर उसे एक पवित्र शिला पर प्रयत्नपूर्वक स्थापित कर, उसने धूप, माला और चंदन-लेप से सच्ची भक्ति के साथ उसकी पूजा की।

श्लोक 21 (skanda.6.46.21)

चकार च स्तुतिं पश्चाच्छ्रद्धापूतेन चेतसा॥ तदग्रे प्रयतो भूत्वा स्वरेण महता नृपः

cakāra ca stutiṁ paścācchraddhāpūtena cetasā tadagre prayato bhūtvā svareṇa mahatā nṛpaḥ

फिर उस राजा ने उसके सम्मुख पवित्र होकर, श्रद्धा से पवित्र हृदय के साथ, ऊँचे स्वर में स्तुति की।

श्लोक 22 (skanda.6.46.22)

सदसद्देवि यत्किञ्चिद्बन्धमोक्षात्मकं पदम्॥ तत्सर्वं गुप्तया व्याप्तं त्वया काष्ठं यथाग्निना

sadasaddevi yatkiñcidbandhamokṣātmakaṁ padam tatsarvaṁ guptayā vyāptaṁ tvayā kāṣṭhaṁ yathāgninā

हे देवि! यह सत् और असत् जो कुछ भी बंधन और मोक्ष स्वरूप पद है, वह सब गुप्त रूप से तुमसे ही व्याप्त है, जैसे लकड़ी में अग्नि छिपी रहती है।

श्लोक 23 (skanda.6.46.23)

सर्वस्य सिद्धिरूपेण त्वं जनस्य हृदि स्थिता॥ वाचारूपेण जिह्वायां ज्योतीरूपेण चक्षुषि

sarvasya siddhirūpeṇa tvaṁ janasya hṛdi sthitā vācārūpeṇa jihvāyāṁ jyotīrūpeṇa cakṣuṣi

तुम समस्त प्राणियों के हृदय में सिद्धि के रूप में स्थित हो, जिह्वा में वाणी के रूप में, और नेत्रों में ज्योति के रूप में।

श्लोक 24 (skanda.6.46.24)

भक्तिग्राह्यासि देवेशि त्वमेका भुवनत्रये॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे

bhaktigrāhyāsi deveśi tvamekā bhuvanatraye śaraṇāgatadīnārtaparitrāṇaparāyaṇe

हे देवेशि! तीनों लोकों में तुम अकेली ही भक्ति से प्राप्त होने वाली हो, तथा शरणागत, दीन और पीड़ितों की रक्षा में सदा तत्पर रहती हो।

श्लोक 25 (skanda.6.46.25)

त्वं कीर्तिस्त्वं धृतिर्मेधा त्वं भक्तिस्त्वं प्रभा स्मृता॥ त्वं निद्रा त्वं क्षुधा कीर्तिः सर्वभूतनिवासिनी

tvaṁ kīrtistvaṁ dhṛtirmedhā tvaṁ bhaktistvaṁ prabhā smṛtā tvaṁ nidrā tvaṁ kṣudhā kīrtiḥ sarvabhūtanivāsinī

तुम ही कीर्ति हो, तुम ही धृति और मेधा हो, तुम ही भक्ति हो, तुम्हें ही प्रभा कहा गया है; तुम ही निद्रा हो, तुम ही क्षुधा हो, तुम ही कीर्ति हो -- तुम समस्त प्राणियों में निवास करने वाली हो।

श्लोक 26 (skanda.6.46.26)

तुष्टिः पुष्टिर्वपुः प्रीतिः स्वधा स्वाहा विभावरी॥ रतिः प्रीतिः क्षितिर्गंगा सत्यं धर्मो मनस्विनी

tuṣṭiḥ puṣṭirvapuḥ prītiḥ svadhā svāhā vibhāvarī ratiḥ prītiḥ kṣitirgaṁgā satyaṁ dharmo manasvinī

तुम संतोष, पुष्टि, शरीर, प्रीति, स्वधा, स्वाहा और रात्रि हो; तुम रति, प्रीति, पृथ्वी, गंगा, सत्य, धर्म तथा मनस्विनी (बुद्धिमती) हो।

श्लोक 27 (skanda.6.46.27)

लज्जा शांतिः स्मृतिर्दक्षा क्षमा गौरी च रोहिणी॥ सिनीवाली कुहू राका देवमाता दितिस्तथा

lajjā śāṁtiḥ smṛtirdakṣā kṣamā gaurī ca rohiṇī sinīvālī kuhū rākā devamātā ditistathā

तुम लज्जा, शांति, स्मृति, दक्षता, क्षमा, गौरी और रोहिणी हो; तुम सिनीवाली, कुहू, राका, देवमाता (अदिति) और दिति भी हो।

श्लोक 28 (skanda.6.46.28)

ब्रह्माणी विनता लक्ष्मीः कद्रूर्दाक्षायणी शिवा॥ गायत्री चाथ सावित्री कृषिर्वृष्टिः श्रुतिः कला

brahmāṇī vinatā lakṣmīḥ kadrūrdākṣāyaṇī śivā gāyatrī cātha sāvitrī kṛṣirvṛṣṭiḥ śrutiḥ kalā

तुम ब्रह्माणी, विनता, लक्ष्मी, कद्रू, दाक्षायणी और शिवा हो; तुम गायत्री, सावित्री, कृषि, वृष्टि, श्रुति तथा कला हो।

श्लोक 29 (skanda.6.46.29)

बलानाडी तुष्टिकाष्ठा रसना च सरस्वती॥ यत्किञ्चित्त्रिषु लोकेषु बहुत्वाद्यन्न कीर्तितम्

balānāḍī tuṣṭikāṣṭhā rasanā ca sarasvatī yatkiñcittriṣu lokeṣu bahutvādyanna kīrtitam

तुम बल, नाड़ी, तुष्टि, दिशा तथा जिह्वा हो, और तुम ही सरस्वती हो; तीनों लोकों में जो कुछ भी अधिकता के कारण मैंने नहीं गिनाया,

श्लोक 30 (skanda.6.46.30)

इंगितं नेंगितं तच्च तद्रूपं ते सुरेश्वरि॥ गन्धर्वाः किन्नरा देवाः सिद्धविद्याधरोरगाः

iṁgitaṁ neṁgitaṁ tacca tadrūpaṁ te sureśvari gandharvāḥ kinnarā devāḥ siddhavidyādharoragāḥ

हे सुरेश्वरि! वह सब, चाहे प्रकट हो या अप्रकट, तुम्हारा ही रूप है; गंधर्व, किन्नर, देवता, सिद्ध, विद्याधर और नाग --

श्लोक 31 (skanda.6.46.31)

यक्षगुह्यकभूताश्च दैत्या ये च विनायकाः॥ त्वत्प्रसादेन ते सर्वे संसिद्धिं परमां गताः

yakṣaguhyakabhūtāśca daityā ye ca vināyakāḥ tvatprasādena te sarve saṁsiddhiṁ paramāṁ gatāḥ

यक्ष, गुह्यक, भूत, दैत्य तथा विनायकगण -- ये सब तुम्हारी ही कृपा से परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 32 (skanda.6.46.32)

तथान्येऽपि बहुत्वाद्ये न मया परिकीर्तिताः॥ आराधितास्तु कृच्छ्रेण पूजिताश्च सुविस्तरैः॥ हरंतु देवताः पापमन्ये त्वं कीर्तिताऽपि च

tathānye'pi bahutvādye na mayā parikīrtitāḥ ārādhitāstu kṛcchreṇa pūjitāśca suvistaraiḥ haraṁtu devatāḥ pāpamanye tvaṁ kīrtitā'pi ca

इसी प्रकार अन्य भी अनेक हैं, जिन्हें मैंने अधिकता के कारण नहीं गिनाया; वे सब कठिन साधना और विस्तृत पूजा द्वारा आराधित देवता मेरे पापों का हरण करें, और तुम भी, जिसकी मैंने स्तुति की है, वैसा ही करो।

श्लोक 33 (skanda.6.46.33)

एवं स्तुता सा देवेशी भूभुजा तेन भारती॥ ययौ प्रत्यक्षतां तूर्णं प्राह चेदं सुहर्षिता

evaṁ stutā sā deveśī bhūbhujā tena bhāratī yayau pratyakṣatāṁ tūrṇaṁ prāha cedaṁ suharṣitā

इस प्रकार उस राजा द्वारा स्तुति की गई देवी भारती तत्काल साक्षात् प्रकट हुईं, और अत्यंत हर्षित होकर यह बोलीं।

श्लोक 34 (skanda.6.46.34)

सरस्वत्युवाच॥ स्तोत्रेणानेन भूपाल भक्त्या सुस्थिरया सदा॥ परितुष्टास्मि तेनाशु वरं वृणु यथेप्सितम्

sarasvatyuvāca stotreṇānena bhūpāla bhaktyā susthirayā sadā parituṣṭāsmi tenāśu varaṁ vṛṇu yathepsitam

सरस्वती ने कहा -- हे भूपाल! इस स्तोत्र से तथा तुम्हारी सदा-स्थिर भक्ति से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ; इसलिए शीघ्र ही अपनी इच्छा के अनुसार वर माँगो।

श्लोक 35 (skanda.6.46.35)

राजोवाच॥ अद्यप्रभृति मद्वाक्यात्त्वया स्थेयमसंशयम्॥ अत्रार्चायां त्रिलोकेस्मि न्यावत्कीर्तिर्मम स्थिरा

rājovāca adyaprabhṛti madvākyāttvayā stheyamasaṁśayam atrārcāyāṁ trilokesmi nyāvatkīrtirmama sthirā

राजा ने कहा -- आज से मेरे वचन के अनुसार तुम निःसंदेह यहीं इस प्रतिमा में स्थिर रहो, जब तक तीनों लोकों में मेरी कीर्ति स्थिर है।

श्लोक 36 (skanda.6.46.36)

यस्त्वामाराधयेत्सम्यगत्रस्थां मन्निमित्ततः॥ भक्त्यानुरूपमेवाशु तस्मै देयं त्वया हि तत्

yastvāmārādhayetsamyagatrasthāṁ mannimittataḥ bhaktyānurūpamevāśu tasmai deyaṁ tvayā hi tat

जो कोई भी मेरे कारण यहाँ स्थित तुम्हारी भलीभाँति आराधना करे, उसे उसकी भक्ति के अनुरूप ही तुम्हें शीघ्र वह फल देना चाहिए।

श्लोक 37 (skanda.6.46.37)

सरस्वत्युवाच॥ यो मामत्र स्थितां नित्यं स्नात्वाऽत्र सलिले शुभे॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां पूजयिष्यति मानवः

sarasvatyuvāca yo māmatra sthitāṁ nityaṁ snātvā'tra salile śubhe aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ pūjayiṣyati mānavaḥ

सरस्वती ने कहा -- जो मनुष्य यहाँ इस शुभ जल में स्नान करके, अष्टमी और चतुर्दशी को, यहाँ स्थित मुझ सरस्वती की सदा पूजा करेगा,

श्लोक 38 (skanda.6.46.38)

तस्याहं वांछितान्कामान्संप्रदास्यामि पार्थिव॥ सूत उवाच॥ एवं तत्र स्थिता देवी स्वयमेव सरस्वती

tasyāhaṁ vāṁchitānkāmānsaṁpradāsyāmi pārthiva sūta uvāca evaṁ tatra sthitā devī svayameva sarasvatī

हे राजन्! उसे मैं उसकी इच्छित कामनाएँ प्रदान करूँगी। सूत जी ने कहा -- इस प्रकार वहाँ स्वयं देवी सरस्वती स्थित हो गईं।

श्लोक 39 (skanda.6.46.39)

ततःप्रभृति लोकानां हिताय परमेश्वरी॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यामुपवासपरायणः

tataḥprabhṛti lokānāṁ hitāya parameśvarī aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāmupavāsaparāyaṇaḥ

तब से लेकर वह परमेश्वरी समस्त लोकों के कल्याण के लिए वहाँ रहीं; जो कोई अष्टमी और चतुर्दशी को उपवासपरायण होकर,

श्लोक 40 (skanda.6.46.40)

यस्तां पूजयते मर्त्यः श्वेतपुष्पानुलेपनैः॥ स स्याद्वाग्ग्मी सुमेधावी सदा जन्मनिजन्मनि

yastāṁ pūjayate martyaḥ śvetapuṣpānulepanaiḥ sa syādvāggmī sumedhāvī sadā janmanijanmani

श्वेत पुष्पों और चंदन-लेप से उनकी पूजा करता है, वह जन्म-जन्मांतर में सदा वाकपटु और अत्यंत बुद्धिमान होता है।

श्लोक 41 (skanda.6.46.41)

सरस्वत्याः प्रसादेन जायमानः पुनःपुनः॥ अन्वयेऽपि न तस्यैव कश्चिन्मूर्खः प्रजायते

sarasvatyāḥ prasādena jāyamānaḥ punaḥpunaḥ anvaye'pi na tasyaiva kaścinmūrkhaḥ prajāyate

सरस्वती की कृपा से बार-बार जन्म लेते हुए भी, उसके वंश में कोई भी मूर्ख उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 42 (skanda.6.46.42)

यो धर्मश्रवणं तस्याः पुरतः कुरुते नरः॥ स नूनं वसति स्वर्गे तत्प्रभावाद्युगत्रयम्

yo dharmaśravaṇaṁ tasyāḥ purataḥ kurute naraḥ sa nūnaṁ vasati svarge tatprabhāvādyugatrayam

जो मनुष्य उसके सम्मुख धर्म-श्रवण करता है, वह निश्चय ही उसके प्रभाव से तीन युगों तक स्वर्ग में निवास करता है।

श्लोक 43 (skanda.6.46.43)

विद्यादानं नरो यश्च तस्या ह्यायतने सदा॥ करोति श्रद्धया युक्तः सोऽश्वमेधफलं लभेत्

vidyādānaṁ naro yaśca tasyā hyāyatane sadā karoti śraddhayā yuktaḥ so'śvamedhaphalaṁ labhet

जो मनुष्य सदा उसके मंदिर में श्रद्धापूर्वक विद्यादान करता है, वह अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करता है।

श्लोक 44 (skanda.6.46.44)

यो यच्छति द्विजेन्द्राय धर्मशास्त्रसमुद्भवम्॥ पुस्तकं वाजिमेधस्य स समग्रं फलं लभेत्

yo yacchati dvijendrāya dharmaśāstrasamudbhavam pustakaṁ vājimedhasya sa samagraṁ phalaṁ labhet

जो कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण को धर्मशास्त्र से संबंधित ग्रंथ भेंट करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का संपूर्ण फल प्राप्त करता है।

श्लोक 45 (skanda.6.46.45)

यो वेदाध्ययनं तस्याः करोति पुरतः स्थितः॥ सोऽग्निष्टोमस्य यज्ञस्य कृत्स्नं फलमवाप्नुयात्

yo vedādhyayanaṁ tasyāḥ karoti purataḥ sthitaḥ so'gniṣṭomasya yajñasya kṛtsnaṁ phalamavāpnuyāt

जो कोई उसके सम्मुख खड़े होकर वेदाध्ययन करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञ का संपूर्ण फल प्राप्त करता है।

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47