नागर खण्ड · अध्याय 47
महाकालेश्वर माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.47.1)
ऋषय ऊचुः॥ महाकालस्य माहात्म्यं विस्तरेण महामते॥ अस्माकं सूतज ब्रूहि सर्वं वेत्ति यतो भवान्
ṛṣaya ūcuḥ mahākālasya māhātmyaṁ vistareṇa mahāmate asmākaṁ sūtaja brūhi sarvaṁ vetti yato bhavān
ऋषियों ने कहा -- हे महामते सूतपुत्र! महाकाल का माहात्म्य विस्तार से हमें बताइए, क्योंकि आप सब कुछ जानते हैं।
श्लोक 2 (skanda.6.47.2)
सूत उवाच॥ आसीत्पूर्वं महीपाल इक्ष्वाकुकुलनन्दनः॥ रुद्रसेन इति ख्यातः सर्वशत्रुनिषूदनः
sūta uvāca āsītpūrvaṁ mahīpāla ikṣvākukulanandanaḥ rudrasena iti khyātaḥ sarvaśatruniṣūdanaḥ
सूत जी ने कहा -- पूर्वकाल में इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न रुद्रसेन नामक विख्यात राजा था, जो समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला था।
श्लोक 3 (skanda.6.47.3)
समुद्र इव गांभीर्ये सौम्यत्वे शशिसंनिभः॥ वीर्ये यथा सहस्राक्षो रूपे कन्दर्पसन्निभः
samudra iva gāṁbhīrye saumyatve śaśisaṁnibhaḥ vīrye yathā sahasrākṣo rūpe kandarpasannibhaḥ
वह गंभीरता में समुद्र के समान, सौम्यता में चन्द्रमा के समान, पराक्रम में इन्द्र के समान, तथा रूप में कामदेव के समान था।
श्लोक 4 (skanda.6.47.4)
तस्य कांतीति विख्याता पुरी सर्वगुणान्विता॥ राजधान्यभवच्छ्रेष्ठा प्रोच्चप्राकारतोरणा
tasya kāṁtīti vikhyātā purī sarvaguṇānvitā rājadhānyabhavacchreṣṭhā proccaprākāratoraṇā
उसकी राजधानी कान्ती नाम से प्रसिद्ध थी, जो समस्त गुणों से युक्त थी, ऊँची चारदीवारी और द्वारों से सुशोभित सबसे श्रेष्ठ नगरी थी।
श्लोक 5 (skanda.6.47.5)
तथैवासीत्प्रिया तस्य भार्या परमसंमता॥ ख्याता पद्मवतीनाम रूपौदार्य गुणान्विता
tathaivāsītpriyā tasya bhāryā paramasaṁmatā khyātā padmavatīnāma rūpaudārya guṇānvitā
उसकी प्रिय पत्नी, जो उसे परम प्रिय थी, पद्मवती नाम से प्रसिद्ध थी, जो रूप, उदारता और सद्गुणों से युक्त थी।
श्लोक 6 (skanda.6.47.6)
स तया सहितो राजा वैशाख्या दिवसे सदा॥ समभ्येति निजस्थानात्सैन्येनाल्पेन संवृतः
sa tayā sahito rājā vaiśākhyā divase sadā samabhyeti nijasthānātsainyenālpena saṁvṛtaḥ
वह राजा उसके साथ प्रतिवर्ष वैशाखी के दिन अपने स्थान से, थोड़ी-सी सेना के साथ, वहाँ आता था।
श्लोक 7 (skanda.6.47.7)
चमत्कारपुरे क्षेत्रे पीठे तत्र द्विजोत्तमाः॥ महाकालस्य देवस्य पुरतो रात्रिजागरम्॥ करोति श्रद्धया युक्तः सभार्यः स महीपतिः
camatkārapure kṣetre pīṭhe tatra dvijottamāḥ mahākālasya devasya purato rātrijāgaram karoti śraddhayā yuktaḥ sabhāryaḥ sa mahīpatiḥ
हे द्विजोत्तमो! उस चमत्कारपुर क्षेत्र के उस पीठ में, वह राजा अपनी पत्नी सहित श्रद्धापूर्वक देव महाकाल के सामने रात्रि-जागरण करता था।
श्लोक 8 (skanda.6.47.8)
उपवासपरो भूत्वा ध्यायमानो महेश्वरम्॥ गीतवाद्येन हृद्येन नृत्येन द्विजसत्तमाः॥ धर्माख्यानेन विप्राणां वेदाध्ययनविस्तरैः
upavāsaparo bhūtvā dhyāyamāno maheśvaram gītavādyena hṛdyena nṛtyena dvijasattamāḥ dharmākhyānena viprāṇāṁ vedādhyayanavistaraiḥ
हे द्विजसत्तमो! वह उपवास करते हुए महेश्वर का ध्यान करता था, तथा मनोहर गीत-वाद्य, नृत्य, ब्राह्मणों के धर्म-आख्यान और विस्तृत वेदाध्ययन के साथ वह रात बिताता था।
श्लोक 9 (skanda.6.47.9)
ततः प्रातः समुत्थाय स्नात्वा धौतांबरः शुचिः॥ ददौ दानानि विप्रेभ्यस्तपस्विभ्यो विशेषतः
tataḥ prātaḥ samutthāya snātvā dhautāṁbaraḥ śuciḥ dadau dānāni viprebhyastapasvibhyo viśeṣataḥ
फिर प्रातःकाल उठकर, स्नान कर, धुले हुए वस्त्र धारण कर, पवित्र होकर वह ब्राह्मणों को, विशेषकर तपस्वियों को दान देता था।
श्लोक 10 (skanda.6.47.10)
दीनांधकृपणेभ्यश्च तथान्येभ्यः सहस्रशः॥ वर्षेवर्षे सदैवं स समभ्येत्य महीपतिः॥ वैशाख्यां जागरं तस्य देवस्य पुरतोऽकरोत्
dīnāṁdhakṛpaṇebhyaśca tathānyebhyaḥ sahasraśaḥ varṣevarṣe sadaivaṁ sa samabhyetya mahīpatiḥ vaiśākhyāṁ jāgaraṁ tasya devasya purato'karot
तथा दीनों, अंधों और कंगालों को, और अन्य हजारों लोगों को भी वह दान देता था; इस प्रकार वह राजा प्रतिवर्ष वहाँ आकर वैशाखी के दिन उस देव के सामने जागरण करता था।
श्लोक 11 (skanda.6.47.11)
यथायथा स भूपालः कुरुते रात्रिजागरम्॥ महाकालाग्रतस्तस्य तथा वृद्धिः प्रजायते
yathāyathā sa bhūpālaḥ kurute rātrijāgaram mahākālāgratastasya tathā vṛddhiḥ prajāyate
जैसे-जैसे वह राजा महाकाल के सामने रात्रि-जागरण करता, वैसे-वैसे उसकी समृद्धि बढ़ती जाती थी।
श्लोक 12 (skanda.6.47.12)
शत्रवो विलयं यांति लक्ष्मीर्वृद्धिं प्रगच्छति॥ एकदा स समायातस्तत्र यावन्महीपतिः
śatravo vilayaṁ yāṁti lakṣmīrvṛddhiṁ pragacchati ekadā sa samāyātastatra yāvanmahīpatiḥ
उसके शत्रु नष्ट होते गए और लक्ष्मी बढ़ती गई। एक बार जब वह राजा वहाँ आया,
श्लोक 13 (skanda.6.47.13)
तत्रैव दिवसे तावन्महाकालस्य चाग्रतः॥ अपश्यद्ब्राह्मणश्रेष्ठान्नानादिग्भ्यः समागतान्
tatraiva divase tāvanmahākālasya cāgrataḥ apaśyadbrāhmaṇaśreṣṭhānnānādigbhyaḥ samāgatān
उसी दिन उसने महाकाल के सामने विभिन्न दिशाओं से आए हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देखा।
श्लोक 14 (skanda.6.47.14)
वेदाध्ययनसंपन्नान्व्रतनिष्ठापरायणान्॥ एके तत्र कथाश्चक्रुः सुपुण्या ब्राह्मणोत्तमाः
vedādhyayanasaṁpannānvrataniṣṭhāparāyaṇān eke tatra kathāścakruḥ supuṇyā brāhmaṇottamāḥ
वे वेदाध्ययन से संपन्न और व्रतों के पालन में तत्पर थे; उन पुण्यात्मा श्रेष्ठ ब्राह्मणों में से कुछ वहाँ कथाएँ सुना रहे थे,
श्लोक 15 (skanda.6.47.15)
राजर्षीणां पुराणानां देवर्षीणां तथा परे॥ तीर्थानां च तथा चान्ये ब्रह्मर्षीणां तथा परे॥ यज्ञानां सागराणां च द्वीपानां च मनोहराः
rājarṣīṇāṁ purāṇānāṁ devarṣīṇāṁ tathā pare tīrthānāṁ ca tathā cānye brahmarṣīṇāṁ tathā pare yajñānāṁ sāgarāṇāṁ ca dvīpānāṁ ca manoharāḥ
राजर्षियों की, प्राचीन गाथाओं की, देवर्षियों की, तथा अन्य कथाएँ तीर्थों की, ब्रह्मर्षियों की, यज्ञों की, समुद्रों की और द्वीपों की भी मनोहर कथाएँ सुना रहे थे।
श्लोक 16 (skanda.6.47.16)
अथ तान्पृथिवीपालः स प्रणम्य यथाक्रमम्॥ उपविष्टः सभामध्ये तैः सर्वैश्चाभिनंदितः
atha tānpṛthivīpālaḥ sa praṇamya yathākramam upaviṣṭaḥ sabhāmadhye taiḥ sarvaiścābhinaṁditaḥ
तब उस राजा ने क्रमपूर्वक उन सबको प्रणाम करके सभा के मध्य में बैठ गया, और उन सबने उसका स्वागत किया।
श्लोक 17 (skanda.6.47.17)
कस्मिंश्चिदथ संप्राप्ते कथांते ते मुनीश्वराः॥ पप्रच्छुर्भूमिपालं तु कौतूहलसमन्विताः
kasmiṁścidatha saṁprāpte kathāṁte te munīśvarāḥ papracchurbhūmipālaṁ tu kautūhalasamanvitāḥ
फिर किसी कथा के समाप्त होने पर, उन मुनीश्वरों ने कुतूहल से भरकर उस राजा से पूछा।
श्लोक 18 (skanda.6.47.18)
वैशाखीदिवसे राजंस्त्वं सदाभ्येत्य दूरतः॥ वर्षेवर्षेऽस्य देवस्य पुरतो रात्रिजागरम्
vaiśākhīdivase rājaṁstvaṁ sadābhyetya dūrataḥ varṣevarṣe'sya devasya purato rātrijāgaram
हे राजन्! तुम प्रतिवर्ष वैशाखी के दिन दूर से आकर इस देव के सामने रात्रि-जागरण करते हो,
श्लोक 19 (skanda.6.47.19)
प्रकरोषि प्रयत्नेन त्यक्त्वान्याः सकलाः क्रियाः॥ स्नानदानादिका याश्च निर्दिष्टाः शास्त्रचिंतकैः
prakaroṣi prayatnena tyaktvānyāḥ sakalāḥ kriyāḥ snānadānādikā yāśca nirdiṣṭāḥ śāstraciṁtakaiḥ
तथा शास्त्रकारों द्वारा बताई गई स्नान-दान आदि अन्य समस्त क्रियाओं को त्यागकर, प्रयत्नपूर्वक इसी को करते हो।
श्लोक 20 (skanda.6.47.20)
न ते यदि रहस्यं स्यात्तदाऽशेषं प्रकीर्तय॥ नूनं त्वं वेत्सि तत्सर्वं यत्फलं रात्रिजागरे
na te yadi rahasyaṁ syāttadā'śeṣaṁ prakīrtaya nūnaṁ tvaṁ vetsi tatsarvaṁ yatphalaṁ rātrijāgare
यदि यह तुम्हारा कोई गोपनीय रहस्य न हो, तो हमें वह सब पूरी तरह बताओ; निश्चय ही तुम रात्रि-जागरण का समस्त फल जानते हो।
श्लोक 21 (skanda.6.47.21)
राजोवाच॥ रहस्यं परमं चैव यत्पृष्टोऽहं द्विजोत्तमाः॥ युष्माभिः कीर्तयिष्यामि तथाप्यखिलमेव हि
rājovāca rahasyaṁ paramaṁ caiva yatpṛṣṭo'haṁ dvijottamāḥ yuṣmābhiḥ kīrtayiṣyāmi tathāpyakhilameva hi
राजा ने कहा -- हे द्विजोत्तमो! यद्यपि तुमने मुझसे जो पूछा है, वह मेरा परम गोपनीय रहस्य है, फिर भी मैं तुम्हें वह सब पूरी तरह बताऊँगा।
श्लोक 22 (skanda.6.47.22)
अहमासं वणिग्जात्या पुरा वै वैदिशे पुरे॥ निर्धनो बंधुभिर्मुक्तः परिभूतः पदेपदे
ahamāsaṁ vaṇigjātyā purā vai vaidiśe pure nirdhano baṁdhubhirmuktaḥ paribhūtaḥ padepade
पूर्वकाल में मैं वैदिश नगर में जाति से वणिक् था, निर्धन, बंधुओं से त्यागा हुआ तथा पग-पग पर अपमानित होने वाला।
श्लोक 23 (skanda.6.47.23)
कस्यचित्त्वथ कालस्य भगवान्पाकशासनः॥ वैदिशे नाकरोद्वृष्टिं सप्त वर्षाणि पंच च
kasyacittvatha kālasya bhagavānpākaśāsanaḥ vaidiśe nākarodvṛṣṭiṁ sapta varṣāṇi paṁca ca
फिर एक समय, भगवान इन्द्र ने वैदिश में बारह वर्षों तक वर्षा नहीं की।
श्लोक 24 (skanda.6.47.24)
ततो वृष्टिनिरोधेन सर्वे लोकाः क्षुधार्द्दिताः॥ अन्नाभावान्मृताः केचित्केचिद्देशांतरे गताः
tato vṛṣṭinirodhena sarve lokāḥ kṣudhārdditāḥ annābhāvānmṛtāḥ kecitkeciddeśāṁtare gatāḥ
वर्षा के रुक जाने से समस्त लोग भूख से पीड़ित हो गए; अन्न के अभाव से कुछ लोग मर गए, कुछ अन्य देशों में चले गए।
श्लोक 25 (skanda.6.47.25)
ततोऽहं स्वां समादाय पत्नीं क्षुत्क्षामगात्रिकाम्॥ अश्रुपूर्णमुखीं दीनां प्रस्खलन्तीं पदेपदे
tato'haṁ svāṁ samādāya patnīṁ kṣutkṣāmagātrikām aśrupūrṇamukhīṁ dīnāṁ praskhalantīṁ padepade
तब मैं भी अपनी पत्नी को साथ लेकर चल पड़ा, जिसका शरीर भूख से दुर्बल हो चुका था, जिसका मुख आँसुओं से भरा था, जो दीन थी और पग-पग पर लड़खड़ाती थी।
श्लोक 26 (skanda.6.47.26)
सौराष्ट्रं मनसि ध्यात्वा प्रस्थितस्तदनन्तरम्॥ सुभिक्षं लोकतः श्रुत्वा जीवनाय द्विजोत्तमाः
saurāṣṭraṁ manasi dhyātvā prasthitastadanantaram subhikṣaṁ lokataḥ śrutvā jīvanāya dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो! तब मैं सौराष्ट्र देश का मन में ध्यान कर वहाँ जीवन-निर्वाह के लिए चल पड़ा, क्योंकि लोगों से सुना था कि वहाँ भरपूर अन्न है।
श्लोक 27 (skanda.6.47.27)
क्रमेण गच्छमानोऽथ भिक्षान्नकृतभोजनः॥ आनर्तविषयं प्राप्तश्चमत्कारपुरांतिके
krameṇa gacchamāno'tha bhikṣānnakṛtabhojanaḥ ānartaviṣayaṁ prāptaścamatkārapurāṁtike
क्रमशः चलते हुए, भिक्षा में मिले अन्न से भोजन करते हुए, मैं आनर्त देश में चमत्कारपुर के निकट पहुँचा।
श्लोक 28 (skanda.6.47.28)
तत्र रम्यं मया दृष्टं पद्मिनीखण्डमंडितम्॥ सरः स्वच्छोदकापूर्णं जलपक्षिभिरावृतम्
tatra ramyaṁ mayā dṛṣṭaṁ padminīkhaṇḍamaṁḍitam saraḥ svacchodakāpūrṇaṁ jalapakṣibhirāvṛtam
वहाँ मैंने एक अत्यंत रमणीय सरोवर देखा, जो कमलिनियों के समूह से सुशोभित था, स्वच्छ जल से भरा था, तथा जलपक्षियों से घिरा हुआ था।
श्लोक 29 (skanda.6.47.29)
ततोऽहं तत्समासाद्य स्नातः शीतेन वारिणा॥ क्षुधार्तश्च तृषार्तश्च श्रमार्तश्च विशेषतः
tato'haṁ tatsamāsādya snātaḥ śītena vāriṇā kṣudhārtaśca tṛṣārtaśca śramārtaśca viśeṣataḥ
तब मैंने वहाँ पहुँचकर उसके शीतल जल में स्नान किया, क्योंकि मैं भूख, प्यास और थकान से विशेष रूप से पीड़ित था।
श्लोक 30 (skanda.6.47.30)
अथाहं भार्यया प्रोक्तो गृहाणेश जलाशयात्॥ जलजानि क्रयार्थाय येन स्यादद्य भोजनम्
athāhaṁ bhāryayā prokto gṛhāṇeśa jalāśayāt jalajāni krayārthāya yena syādadya bhojanam
तब मेरी पत्नी ने मुझसे कहा -- हे स्वामी! इस जलाशय से कमल ले लो, जिन्हें बेचकर आज हमें भोजन मिल सके।
श्लोक 31 (skanda.6.47.31)
एतत्संदृश्यते दूरात्पुरंदरपुरोपमम्॥ पुरश्रेष्ठं समासाद्य विक्रयं कर्तुमर्हसि
etatsaṁdṛśyate dūrātpuraṁdarapuropamam puraśreṣṭhaṁ samāsādya vikrayaṁ kartumarhasi
दूर से इन्द्रपुरी के समान दिखाई देने वाला यह श्रेष्ठ नगर दिखाई दे रहा है, वहाँ जाकर इनका विक्रय करना उचित होगा।
श्लोक 32 (skanda.6.47.32)
ततो मया गृहीतानि पद्मानि द्विजसत्तमाः॥ विक्रयार्थं प्रभूतानि वाच्छमानेन भोजनम्
tato mayā gṛhītāni padmāni dvijasattamāḥ vikrayārthaṁ prabhūtāni vācchamānena bhojanam
हे द्विजसत्तमो! तब भोजन की इच्छा रखते हुए मैंने विक्रय के लिए बहुत सारे कमल तोड़ लिए।
श्लोक 33 (skanda.6.47.33)
चमत्कारपुरं प्राप्य ततोऽहं द्विजसत्तमाः॥ भ्रांतस्त्रिकेषु सर्वेषु चत्वरेषु गृहेषु च
camatkārapuraṁ prāpya tato'haṁ dvijasattamāḥ bhrāṁtastrikeṣu sarveṣu catvareṣu gṛheṣu ca
हे द्विजसत्तमो! चमत्कारपुर पहुँचकर मैं वहाँ के समस्त तिराहों, चौराहों तथा घरों में भटकता रहा।
श्लोक 34 (skanda.6.47.34)
न कश्चित्प्रतिगृह्णाति तानि पद्मानि मानवः॥ मम भाग्यवशाल्लोको जातः क्रयपराङ्मुखः
na kaścitpratigṛhṇāti tāni padmāni mānavaḥ mama bhāgyavaśālloko jātaḥ krayaparāṅmukhaḥ
किन्तु किसी भी मनुष्य ने वे कमल नहीं लिए; मेरे दुर्भाग्य के कारण मानो सारी दुनिया उन्हें खरीदने से विमुख हो गई थी।
श्लोक 35 (skanda.6.47.35)
अथ क्षुत्क्षामकण्ठस्य श्रांतस्य मम भास्करः॥ अस्ताचलमनुप्राप्तः संध्याकालस्ततोऽभवत्
atha kṣutkṣāmakaṇṭhasya śrāṁtasya mama bhāskaraḥ astācalamanuprāptaḥ saṁdhyākālastato'bhavat
फिर भूख से मेरा कंठ क्षीण हो गया, मैं थक गया, और तभी सूर्य अस्ताचल को प्राप्त हो गया तथा संध्या का समय हो गया।
श्लोक 36 (skanda.6.47.36)
ततो वैराग्यमापन्नः सुप्तोऽहं भग्नमंदिरे॥ तानि पद्मानि भूपृष्ठे निधाय सह भार्यया
tato vairāgyamāpannaḥ supto'haṁ bhagnamaṁdire tāni padmāni bhūpṛṣṭhe nidhāya saha bhāryayā
तब निराश होकर, उन कमलों को भूमि पर रखकर, मैं अपनी पत्नी के साथ एक भग्न मंदिर में सो गया।
श्लोक 37 (skanda.6.47.37)
अथार्धरात्रे संप्राप्ते श्रुतो गीतध्वनिर्मया॥ ततश्च चिंतितं चित्ते जागरोऽयमसंशयम्
athārdharātre saṁprāpte śruto gītadhvanirmayā tataśca ciṁtitaṁ citte jāgaro'yamasaṁśayam
फिर आधी रात को मैंने गीत की ध्वनि सुनी, तब मन में सोचा कि निःसंदेह यह कोई जागरण हो रहा है।
श्लोक 38 (skanda.6.47.38)
तस्माद्गच्छामि चेत्कश्चित्पद्मान्येतानि मे नरः॥ मूल्येन प्रतिगृह्णाति भोजनं जायते ततः
tasmādgacchāmi cetkaścitpadmānyetāni me naraḥ mūlyena pratigṛhṇāti bhojanaṁ jāyate tataḥ
इसलिए यदि मैं वहाँ जाऊँ, तो शायद कोई मनुष्य मूल्य देकर ये कमल ले ले, जिससे हमें भोजन मिल सके।
श्लोक 39 (skanda.6.47.39)
एवं विनिश्चयं कृत्वा पद्मान्यादाय सत्वरम्॥ सभार्यः प्रस्थितस्तत्र यत्र गीतस्य निःस्वनः
evaṁ viniścayaṁ kṛtvā padmānyādāya satvaram sabhāryaḥ prasthitastatra yatra gītasya niḥsvanaḥ
ऐसा निश्चय करके, कमलों को शीघ्रता से लेकर, मैं अपनी पत्नी सहित उस ओर चल पड़ा, जहाँ से गीत की ध्वनि आ रही थी।
श्लोक 40 (skanda.6.47.40)
ततश्चायतने तस्मिन्प्राप्तोऽहं मुनिपुंगवाः॥ अपश्यं देवदेवेशं महाकालं प्रपूजितम्॥ अग्रस्थितैर्द्विजश्रेष्ठैर्जपगीतपरायणैः
tataścāyatane tasminprāpto'haṁ munipuṁgavāḥ apaśyaṁ devadeveśaṁ mahākālaṁ prapūjitam agrasthitairdvijaśreṣṭhairjapagītaparāyaṇaiḥ
हे मुनिपुंगवो! फिर उस मंदिर में पहुँचकर मैंने देखा कि देवाधिदेव महाकाल की, सामने खड़े श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा, जो जप और गीत में लीन थे, भलीभाँति पूजा की जा रही थी।
श्लोक 41 (skanda.6.47.41)
एके नृत्यं प्रकुर्वंति गीतमन्ये जपं परे॥ अन्ये होमं द्विजश्रेष्ठा धर्माख्यानमथापरे
eke nṛtyaṁ prakurvaṁti gītamanye japaṁ pare anye homaṁ dvijaśreṣṭhā dharmākhyānamathāpare
हे द्विजश्रेष्ठो! उनमें से कुछ नृत्य कर रहे थे, कुछ गीत गा रहे थे, कुछ जप कर रहे थे, कुछ हवन कर रहे थे, और कुछ धर्म-कथा कह रहे थे।
श्लोक 42 (skanda.6.47.42)
ततः कश्चिन्मया पृष्टः क्रियते जागरोऽत्र किम्॥ क एते जागरासक्ता लोकाः कीर्तय मे द्रुतम्
tataḥ kaścinmayā pṛṣṭaḥ kriyate jāgaro'tra kim ka ete jāgarāsaktā lokāḥ kīrtaya me drutam
तब मैंने किसी से पूछा -- यहाँ यह कैसा जागरण किया जा रहा है? ये जागरण में लीन लोग कौन हैं? मुझे शीघ्र बताइए।
श्लोक 43 (skanda.6.47.43)
तेनोक्तमेष देवस्य महाकालस्य जागरः॥ क्रियते ब्राह्मणैर्भक्त्या उपवासपरायणैः
tenoktameṣa devasya mahākālasya jāgaraḥ kriyate brāhmaṇairbhaktyā upavāsaparāyaṇaiḥ
उसने कहा -- यह देव महाकाल का जागरण है, जो उपवासपरायण ब्राह्मणों द्वारा भक्तिपूर्वक किया जाता है।
श्लोक 44 (skanda.6.47.44)
अद्य पुण्यतिथिर्नाम वैशाखी पुण्यदा परा॥ यस्यामस्य पुरो भक्त्या नरः कुर्यात्प्रजागरम्॥ महाकालस्य देवस्य सौख्यं प्राप्नोत्यसंशयम्
adya puṇyatithirnāma vaiśākhī puṇyadā parā yasyāmasya puro bhaktyā naraḥ kuryātprajāgaram mahākālasya devasya saukhyaṁ prāpnotyasaṁśayam
आज वह पुण्य तिथि है जिसका नाम वैशाखी है, जो परम पुण्यदायी है; इस तिथि पर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक देव महाकाल के सामने रात्रि-जागरण करता है, वह निःसंदेह सुख प्राप्त करता है।
श्लोक 45 (skanda.6.47.45)
संति पद्मानि मे यच्छ मूल्यमादाय भद्रक॥ भोजनार्थमहं दद्मि कलधौतपलत्रयम्
saṁti padmāni me yaccha mūlyamādāya bhadraka bhojanārthamahaṁ dadmi kaladhautapalatrayam
मुझे कमलों की आवश्यकता है, हे भद्र! मूल्य लेकर इन्हें मुझे दे दो; भोजन के लिए मैं तीन पल चाँदी दूँगा।
श्लोक 46 (skanda.6.47.46)
ततोऽवधारितं चित्ते मया ब्राह्मणसत्तमाः॥ पूजयामि महाकालं पद्मैरेतैः सुरेश्वरम्
tato'vadhāritaṁ citte mayā brāhmaṇasattamāḥ pūjayāmi mahākālaṁ padmairetaiḥ sureśvaram
हे ब्राह्मणसत्तमो! तब मैंने अपने मन में निश्चय किया कि मैं इन्हीं कमलों से देवेश्वर महाकाल की पूजा करूँगा।
श्लोक 47 (skanda.6.47.47)
न मया सुकृतं किंचिदन्यदेहांतरे कृतम्॥ नियतं तेन संभूत इत्थंभूतोऽस्मि दुर्गतः
na mayā sukṛtaṁ kiṁcidanyadehāṁtare kṛtam niyataṁ tena saṁbhūta itthaṁbhūto'smi durgataḥ
मैंने पूर्वजन्म में कोई पुण्य कर्म नहीं किया था, इसीलिए निश्चय ही इस जन्म में उत्पन्न होकर मैं ऐसी दुर्गति को प्राप्त हुआ हूँ।
श्लोक 48 (skanda.6.47.48)
परं क्षुत्क्षामकंठेयं भार्या मे प्रियवादिनी॥ अन्नाभावान्न संदेहः प्रातर्यास्यति संक्षयम्
paraṁ kṣutkṣāmakaṁṭheyaṁ bhāryā me priyavādinī annābhāvānna saṁdehaḥ prātaryāsyati saṁkṣayam
किन्तु मेरी यह मधुरभाषिणी पत्नी भूख से कृशकंठ हो गई है; अन्न के अभाव में निःसंदेह वह प्रातःकाल तक मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी।
श्लोक 49 (skanda.6.47.49)
एवं चिंतयमानस्य मम सा दयिता ततः॥ प्रोवाच मधुरं वाक्यं विनयावनता स्थिता
evaṁ ciṁtayamānasya mama sā dayitā tataḥ provāca madhuraṁ vākyaṁ vinayāvanatā sthitā
इस प्रकार मेरे चिंतन करते समय, मेरी वह प्रिय पत्नी विनम्रतापूर्वक झुककर खड़ी होकर मधुर वचन बोली।
श्लोक 50 (skanda.6.47.50)
मा नाथ कुरु पद्मानां विक्रयं धनलोभतः॥ कुरुष्व च हितं वाक्यं यत्ते वक्ष्यामि सांप्रतम्
mā nātha kuru padmānāṁ vikrayaṁ dhanalobhataḥ kuruṣva ca hitaṁ vākyaṁ yatte vakṣyāmi sāṁpratam
हे स्वामी! धन के लोभ से इन कमलों का विक्रय मत करो; अभी जो हितकारी वचन मैं तुमसे कहती हूँ, उसे मानो।
श्लोक 51 (skanda.6.47.51)
उपवासो बलाज्जातः सस्याभावादसंशयम्॥ अस्माकं जागरं चापि भविष्यति बुभुक्षया
upavāso balājjātaḥ sasyābhāvādasaṁśayam asmākaṁ jāgaraṁ cāpi bhaviṣyati bubhukṣayā
अन्न के अभाव के कारण हमारा उपवास तो निःसंदेह बलपूर्वक ही हो गया है, और भूख के कारण हमारा जागरण भी अपने आप हो जाएगा।
श्लोक 52 (skanda.6.47.52)
तत्रोभाभ्यां कृतं स्नानं दिवा सरसि शोभने॥ घर्मार्त्ताभ्यां श्रमार्त्ताभ्यां कृतदेवार्चनं तथा
tatrobhābhyāṁ kṛtaṁ snānaṁ divā sarasi śobhane gharmārttābhyāṁ śramārttābhyāṁ kṛtadevārcanaṁ tathā
वहाँ हम दोनों ने दिन में उस सुंदर सरोवर में स्नान किया, और गर्मी तथा थकान से पीड़ित होते हुए भी देव की अर्चना की थी।
श्लोक 53 (skanda.6.47.53)
तस्माद्देवं महाकालं पूजयामोऽधुना वयम्॥ पद्मैरेतैः परं श्रेय आवयोर्येन जायते
tasmāddevaṁ mahākālaṁ pūjayāmo'dhunā vayam padmairetaiḥ paraṁ śreya āvayoryena jāyate
इसलिए अब हम इन्हीं कमलों से देव महाकाल की पूजा करें, जिससे हम दोनों का परम कल्याण हो।
श्लोक 54 (skanda.6.47.54)
राजोवाच॥ उभाभ्यामथ हृष्टाभ्यां पूजितोऽयं महेश्वरः॥ तैः पद्मैः सत्त्वमास्थाय कृत्वा पूजां द्विजोत्तमाः
rājovāca ubhābhyāmatha hṛṣṭābhyāṁ pūjito'yaṁ maheśvaraḥ taiḥ padmaiḥ sattvamāsthāya kṛtvā pūjāṁ dvijottamāḥ
राजा ने कहा -- हे द्विजोत्तमो! तब हम दोनों ने प्रसन्न होकर, धैर्य धारण कर, उन्हीं कमलों से महेश्वर की पूजा की।
श्लोक 55 (skanda.6.47.55)
क्षुत्पीडया समायाता नैव निद्रा कथंचन॥ स्वल्पापि मंदिरे चात्र स्थितयोर्हरसन्निधौ
kṣutpīḍayā samāyātā naiva nidrā kathaṁcana svalpāpi maṁdire cātra sthitayorharasannidhau
भूख की पीड़ा के कारण, उस मंदिर में हर की समीपता में स्थित हम दोनों को थोड़ी भी नींद नहीं आई।
श्लोक 56 (skanda.6.47.56)
ततः प्रभातसमये प्रोद्गते रविमंडले॥ मृतोऽहं क्षुधयाविष्टः स्थानेऽत्रैव द्विजोत्तमाः
tataḥ prabhātasamaye prodgate ravimaṁḍale mṛto'haṁ kṣudhayāviṣṭaḥ sthāne'traiva dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो! फिर प्रातःकाल जब सूर्यमंडल उदय हुआ, तब भूख से अभिभूत होकर मैं उसी स्थान पर मर गया।
श्लोक 57 (skanda.6.47.57)
अथ सा दयिता मह्यं तदादाय कलेवरम्॥ हर्षेण महताविष्टा प्रविष्टा हव्यवाहनम्
atha sā dayitā mahyaṁ tadādāya kalevaram harṣeṇa mahatāviṣṭā praviṣṭā havyavāhanam
तब मेरी उस प्रिय पत्नी ने मेरे शरीर को लेकर, अत्यंत हर्ष से भरकर, अग्नि में प्रवेश कर लिया।
श्लोक 58 (skanda.6.47.58)
तत्प्रभावादहं जातः कांतीनाथो महीपतिः॥ दशार्णाधिपतेः कन्या सापि जातिस्मरा सती
tatprabhāvādahaṁ jātaḥ kāṁtīnātho mahīpatiḥ daśārṇādhipateḥ kanyā sāpi jātismarā satī
उसी के प्रभाव से मैं कान्ती नगरी का स्वामी राजा बनकर उत्पन्न हुआ, और वह भी दशार्ण देश के राजा की पूर्वजन्म-स्मरण रखने वाली सती कन्या बनकर उत्पन्न हुई।
श्लोक 59 (skanda.6.47.59)
ततः स्वयंवरं प्राप्ता मां विज्ञाय निजं पतिम्॥ मयापि सैव विज्ञाय पूर्वपत्नी समाहृता
tataḥ svayaṁvaraṁ prāptā māṁ vijñāya nijaṁ patim mayāpi saiva vijñāya pūrvapatnī samāhṛtā
फिर स्वयंवर में पहुँचकर उसने मुझे अपना पूर्वजन्म का पति पहचान लिया, और मैंने भी उसे पहचानकर अपनी पूर्वजन्म की पत्नी के रूप में ग्रहण कर लिया।
श्लोक 60 (skanda.6.47.60)
एतस्मात्कारणादस्य महाकालस्य जागरम्॥ वर्षेवर्षे च वैशाख्यां करोमि द्विजसत्तमाः
etasmātkāraṇādasya mahākālasya jāgaram varṣevarṣe ca vaiśākhyāṁ karomi dvijasattamāḥ
हे द्विजसत्तमो! इसी कारण मैं प्रतिवर्ष वैशाखी के दिन इस महाकाल का जागरण करता हूँ।
श्लोक 61 (skanda.6.47.61)
अनया प्रियया सार्धं पुष्पधूपानुलेपनैः॥ पूजयित्वा महाकालं सत्यमेतन्मयोदितम्
anayā priyayā sārdhaṁ puṣpadhūpānulepanaiḥ pūjayitvā mahākālaṁ satyametanmayoditam
इसी प्रिय पत्नी के साथ पुष्प, धूप और चंदन-लेप से महाकाल की पूजा करते हुए -- यह सब मैंने सत्य बताया है।
श्लोक 62 (skanda.6.47.62)
कृतो विप्रा मया त्वेष स तदा रात्रिजागरः॥ यथाप्येतत्फलं जातं देवस्यास्य प्रभावतः
kṛto viprā mayā tveṣa sa tadā rātrijāgaraḥ yathāpyetatphalaṁ jātaṁ devasyāsya prabhāvataḥ
हे विप्रो! तभी वह रात्रि-जागरण मुझसे किया गया था, और उसी का यह फल इस देव के प्रभाव से प्राप्त हुआ।
श्लोक 63 (skanda.6.47.63)
अधुना श्रद्धया युक्तो यथोक्तविधिना ततः॥ यत्करोमि न जानामि किं मे संयच्छते फलम्
adhunā śraddhayā yukto yathoktavidhinā tataḥ yatkaromi na jānāmi kiṁ me saṁyacchate phalam
अब मैं जो श्रद्धापूर्वक शास्त्रोक्त विधि से यह जागरण कर रहा हूँ, उसका मुझे कैसा फल मिलेगा, यह मैं नहीं जानता।
श्लोक 64 (skanda.6.47.64)
एतद्वः सर्वमाख्यातं मया सत्यं द्विजोत्तमाः॥ येन सत्येन तेनैष महाकालः प्रसीदतु
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ mayā satyaṁ dvijottamāḥ yena satyena tenaiṣa mahākālaḥ prasīdatu
हे द्विजोत्तमो! यह सब मैंने तुम्हें सत्य बताया है; इस सत्य के बल से यह महाकाल प्रसन्न हों।
श्लोक 65 (skanda.6.47.65)
सूत उवाच॥ एतच्छ्रुत्वा द्विजश्रेष्ठा विस्मयोत्फुल्ललोचनाः॥ प्रचक्रुर्जपतेस्तस्य साधुवादाननेकशः
sūta uvāca etacchrutvā dvijaśreṣṭhā vismayotphullalocanāḥ pracakrurjapatestasya sādhuvādānanekaśaḥ
सूत जी ने कहा -- यह सुनकर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के नेत्र आश्चर्य से खिल उठे, और उन्होंने उस जप करने वाले राजा की अनेकों बार प्रशंसा की।
श्लोक 66 (skanda.6.47.66)
ब्राह्मणा ऊचुः॥ सत्यमुक्तं महीपाल त्वयैतदखिलं वचः॥ महाकालप्रसादेन न किंचिद्दुर्लभं भुवि
brāhmaṇā ūcuḥ satyamuktaṁ mahīpāla tvayaitadakhilaṁ vacaḥ mahākālaprasādena na kiṁciddurlabhaṁ bhuvi
ब्राह्मणों ने कहा -- हे राजन्! तुमने यह सारा वृत्तांत सत्य कहा है; महाकाल की कृपा से पृथ्वी पर कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
श्लोक 67 (skanda.6.47.67)
तस्माद्विशेषतः सर्वे वर्षेवर्षे वयं नृप॥ करिष्यामोऽस्य देवस्य श्रद्धया रात्रिजागरम्
tasmādviśeṣataḥ sarve varṣevarṣe vayaṁ nṛpa kariṣyāmo'sya devasya śraddhayā rātrijāgaram
इसलिए हे राजन्! अब से विशेष रूप से हम सब भी प्रतिवर्ष श्रद्धापूर्वक इस देव का रात्रि-जागरण किया करेंगे।
श्लोक 68 (skanda.6.47.68)
ततः स पार्थिवस्ते च सर्व एव द्विजातयः॥ प्रचक्रुर्जागरं तस्य महाकालस्य संनिधौ
tataḥ sa pārthivaste ca sarva eva dvijātayaḥ pracakrurjāgaraṁ tasya mahākālasya saṁnidhau
तब उस राजा ने और उन सभी ब्राह्मणों ने महाकाल की समीपता में वह जागरण किया।
श्लोक 69 (skanda.6.47.69)
विशेषाद्धर्षसंयुक्ता विविधैर्गीतवादनैः॥ धर्माख्यानैश्च नृत्यैश्च वेदोच्चारैः पृथग्विधैः॥ तदारभ्य नृपाः सर्वे प्रचक्रुर्विस्मयान्विताः
viśeṣāddharṣasaṁyuktā vividhairgītavādanaiḥ dharmākhyānaiśca nṛtyaiśca vedoccāraiḥ pṛthagvidhaiḥ tadārabhya nṛpāḥ sarve pracakrurvismayānvitāḥ
वे सब विशेष रूप से हर्ष से भरकर, विविध गीत-वाद्यों, धर्म-कथाओं, नृत्यों तथा नाना प्रकार के वेद-उच्चारणों के साथ जागरण करने लगे; तब से लेकर समस्त राजा आश्चर्यचकित होकर इसी प्रकार करने लगे।
श्लोक 70 (skanda.6.47.70)
ततः प्रभाते विमले समुत्थाय स भूपतिः॥ पूजयित्वा महाकालं तांश्च सर्वान्द्विजोत्तमान्॥ अनुज्ञाप्य ययौ हृष्टः ससैन्यः स्वपुरं प्रति
tataḥ prabhāte vimale samutthāya sa bhūpatiḥ pūjayitvā mahākālaṁ tāṁśca sarvāndvijottamān anujñāpya yayau hṛṣṭaḥ sasainyaḥ svapuraṁ prati
फिर स्वच्छ प्रातःकाल में उठकर उस राजा ने महाकाल की तथा उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा की, और उनसे अनुमति लेकर, प्रसन्नतापूर्वक अपनी सेना सहित अपनी नगरी की ओर चला गया।
श्लोक 71 (skanda.6.47.71)
ततः कालेन संप्राप्य देहान्तं स महीपतिः॥ संप्राप्तः परमं स्थानं जरामरणवर्जितम्
tataḥ kālena saṁprāpya dehāntaṁ sa mahīpatiḥ saṁprāptaḥ paramaṁ sthānaṁ jarāmaraṇavarjitam
फिर समय आने पर देहांत को प्राप्त कर वह राजा जरा और मृत्यु से रहित परम स्थान को प्राप्त हुआ।
श्लोक 72 (skanda.6.47.72)
एतद्वः सर्वमाख्यातं महाकालसमुद्भवम्॥ माहात्म्यं ब्राह्मण श्रेष्ठाः सर्वपातकनाशनम्
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ mahākālasamudbhavam māhātmyaṁ brāhmaṇa śreṣṭhāḥ sarvapātakanāśanam
हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! यह सब मैंने तुम्हें महाकाल से संबंधित समस्त पापों का नाश करने वाला माहात्म्य सुनाया है।