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नागर खण्ड · अध्याय 48

उमामहेश्वर की उत्पत्ति के माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 47अध्याय-सूचीअध्याय 49

श्लोक 1 (skanda.6.48.1)

सूत उवाच॥ तत्रैवास्य समुद्देशे हरिश्चंद्रस्य भूपतेः॥ आश्रमो ऽस्ति सुविख्यातो नानाद्रुमसमावृतः

sūta uvāca tatraivāsya samuddeśe hariścaṁdrasya bhūpateḥ āśramo 'sti suvikhyāto nānādrumasamāvṛtaḥ

सूत जी ने कहा -- वहीं उसी क्षेत्र में राजा हरिश्चंद्र का अत्यंत प्रसिद्ध आश्रम है, जो नाना प्रकार के वृक्षों से घिरा हुआ है।

श्लोक 2 (skanda.6.48.2)

यत्र तेन तपस्तप्तं संस्थाप्योमामहेश्वरौ॥ यच्छता विविधं दानं ब्राह्मणेभ्योऽभिवांछितम्

yatra tena tapastaptaṁ saṁsthāpyomāmaheśvarau yacchatā vividhaṁ dānaṁ brāhmaṇebhyo'bhivāṁchitam

वहाँ उसने उमा-महेश्वर की प्रतिमा स्थापित कर तप किया था, तथा ब्राह्मणों को उनके इच्छित विविध दान दिए थे।

श्लोक 3 (skanda.6.48.3)

आसीद्राजा हरिश्चंद्रस्त्रिशंकुतनयः पुरा॥ अयोध्याधिपतिः श्रीमान्सूर्यवंशसमुद्भवः

āsīdrājā hariścaṁdrastriśaṁkutanayaḥ purā ayodhyādhipatiḥ śrīmānsūryavaṁśasamudbhavaḥ

प्राचीन काल में त्रिशंकु के पुत्र राजा हरिश्चंद्र थे, जो अयोध्या के श्रीमान अधिपति और सूर्यवंश में उत्पन्न हुए थे।

श्लोक 4 (skanda.6.48.4)

न दुर्भिक्षं न च व्याधिर्नाकालमरणं ध्रुवम्॥ तस्मिञ्छासति धर्मेण न च चौरकृतं भयम्

na durbhikṣaṁ na ca vyādhirnākālamaraṇaṁ dhruvam tasmiñchāsati dharmeṇa na ca caurakṛtaṁ bhayam

उसके धर्मपूर्वक शासन करने पर न दुर्भिक्ष था, न रोग था, न असमय मृत्यु होती थी, और न ही चोरों से कोई भय था।

श्लोक 5 (skanda.6.48.5)

कालवर्षी सदा मेघः सस्यानि प्रचुराणि च॥ रसवंति च तोयानि सर्वर्तुफलिता द्रुमाः

kālavarṣī sadā meghaḥ sasyāni pracurāṇi ca rasavaṁti ca toyāni sarvartuphalitā drumāḥ

बादल सदा समय पर वर्षा करते थे, फसलें प्रचुर मात्रा में होती थीं, जल स्वादिष्ट था, तथा वृक्ष सभी ऋतुओं में फल देते थे।

श्लोक 6 (skanda.6.48.6)

दंडस्तत्राभवद्वास्तौ गृहरोधोऽक्षदेवने॥ एको दोषाकरश्चंद्रः प्रियदोषाश्च कौशिकाः

daṁḍastatrābhavadvāstau gṛharodho'kṣadevane eko doṣākaraścaṁdraḥ priyadoṣāśca kauśikāḥ

वहाँ दण्ड केवल भवन-निर्माण के विवादों और जुए में ही होता था; रात्रि उत्पन्न करने वाला (दोषाकर) तो केवल चन्द्रमा था, और रात्रि-प्रिय (प्रियदोष) तो केवल उल्लू थे -- अर्थात् प्रजा में न कोई अपराधी था, न कोई पापी।

श्लोक 7 (skanda.6.48.7)

स्नेहक्षयश्च दीपेषु विवाहे च करग्रहः॥ वृत्तभंगस्तथा गद्ये दानोत्थितिर्गजानने

snehakṣayaśca dīpeṣu vivāhe ca karagrahaḥ vṛttabhaṁgastathā gadye dānotthitirgajānane

स्नेह का क्षय केवल दीपकों में होता था, न कि प्रेम में; हाथ पकड़ना केवल विवाह में होता था, न कि कर वसूलना; वृत्त (छंद) का भंग केवल गद्य में होता था, न कि आचरण का; और मद का उठना केवल हाथियों में होता था, न कि कंजूसी का।

श्लोक 8 (skanda.6.48.8)

तस्यैवं गुणयुक्तस्य सार्वभौमस्य भूपतेः॥ एक एव महानासीद्दोषः पुत्रविवर्जितः

tasyaivaṁ guṇayuktasya sārvabhaumasya bhūpateḥ eka eva mahānāsīddoṣaḥ putravivarjitaḥ

इस प्रकार समस्त सद्गुणों से युक्त उस सम्राट राजा को केवल एक ही महान दोष था -- वह पुत्रहीन था।

श्लोक 9 (skanda.6.48.9)

ततः पुत्रकृते गत्वा चकार सुमहत्तपः॥ चमत्कारपुरे क्षेत्रे लिंगं संस्थाप्य भक्तितः

tataḥ putrakṛte gatvā cakāra sumahattapaḥ camatkārapure kṣetre liṁgaṁ saṁsthāpya bhaktitaḥ

तब वह पुत्र-प्राप्ति के लिए चमत्कारपुर क्षेत्र में जाकर, भक्तिपूर्वक लिंग की स्थापना कर महान तप करने लगा।

श्लोक 10 (skanda.6.48.10)

पंचाग्निसाधको ग्रीष्मे वर्षास्वाकाशसंस्थितः॥ जलाश्रयश्च हेमंते स ध्यायति महेश्वरम्

paṁcāgnisādhako grīṣme varṣāsvākāśasaṁsthitaḥ jalāśrayaśca hemaṁte sa dhyāyati maheśvaram

ग्रीष्म में पंचाग्नि-साधना करते हुए, वर्षा ऋतु में आकाश के नीचे खुले में रहते हुए, और शीत ऋतु में जल में खड़े होकर, वह महेश्वर का ध्यान करता रहा।

श्लोक 11 (skanda.6.48.11)

ततो वर्षसहस्रांते तस्य तुष्टो महेश्वरः॥ प्रत्यक्षोऽभूत्समं गौर्या गणसंघैः समावृतः

tato varṣasahasrāṁte tasya tuṣṭo maheśvaraḥ pratyakṣo'bhūtsamaṁ gauryā gaṇasaṁghaiḥ samāvṛtaḥ

फिर एक हजार वर्षों के अंत में उससे प्रसन्न होकर महेश्वर, गौरी सहित और गणों के समूह से घिरकर, साक्षात् प्रकट हुए।

श्लोक 12 (skanda.6.48.12)

उवाच वरदोऽस्मीति प्रार्थयस्व यथेप्सितम्॥ अहं ते संप्रदास्यामि यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्

uvāca varado'smīti prārthayasva yathepsitam ahaṁ te saṁpradāsyāmi yadyapi syātsudurlabham

उन्होंने कहा -- मैं वरदाता हूँ, अपनी इच्छा के अनुसार वर माँगो; मैं तुम्हें वह प्रदान करूँगा, चाहे वह कितना भी दुर्लभ क्यों न हो।

श्लोक 13 (skanda.6.48.13)

ततस्तं प्रणिपत्योच्चैः स्तुत्वा सूक्तैः श्रुतैरपि॥ प्रोवाच विनयोपेतः कृतांजलिपुटः स्थितः

tatastaṁ praṇipatyoccaiḥ stutvā sūktaiḥ śrutairapi provāca vinayopetaḥ kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ

तब उन्हें भलीभाँति प्रणाम कर, वैदिक सूक्तों से उनकी स्तुति करके, वह विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर खड़ा होकर बोला।

श्लोक 14 (skanda.6.48.14)

त्वत्प्रसादात्सुरश्रेष्ठ यत्किंचिद्धरणीतले॥ तदस्ति मे गृहे सर्वं वांछितं स्वेन चेतसा

tvatprasādātsuraśreṣṭha yatkiṁciddharaṇītale tadasti me gṛhe sarvaṁ vāṁchitaṁ svena cetasā

हे देवश्रेष्ठ! तुम्हारी कृपा से पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह सब मेरे घर में विद्यमान है, यहाँ तक कि मेरे मन की समस्त इच्छाएँ भी पूर्ण हैं।

श्लोक 15 (skanda.6.48.15)

सुरूपाणि कलत्राणि राज्यं निहतकंटकम्॥ शरीरं रोगनिर्मुक्तं संख्याहीनं तथा धनम्

surūpāṇi kalatrāṇi rājyaṁ nihatakaṁṭakam śarīraṁ roganirmuktaṁ saṁkhyāhīnaṁ tathā dhanam

सुंदर पत्नियाँ, कंटकरहित राज्य, रोगमुक्त शरीर, तथा असंख्य धन -- यह सब मुझे प्राप्त है।

श्लोक 16 (skanda.6.48.16)

एकं मे सुमहद्दुःखं यदपत्यं न विद्यते॥ तस्माद्देहि सुतं देव प्रसन्नो यदि शंकर

ekaṁ me sumahadduḥkhaṁ yadapatyaṁ na vidyate tasmāddehi sutaṁ deva prasanno yadi śaṁkara

मेरा केवल एक ही महान दुःख है, कि मेरे कोई संतान नहीं है; इसलिए हे शंकर! यदि तुम प्रसन्न हो, तो मुझे पुत्र प्रदान करो।

श्लोक 17 (skanda.6.48.17)

श्रीभगवानुवाच॥ अचिरेण नृपश्रेष्ठ पुत्रस्तव भविष्यति॥ मत्प्रसादान्न संदेहस्तस्माद्गच्छ द्रुतं गृहम्

śrībhagavānuvāca acireṇa nṛpaśreṣṭha putrastava bhaviṣyati matprasādānna saṁdehastasmādgaccha drutaṁ gṛham

श्रीभगवान ने कहा -- हे राजश्रेष्ठ! शीघ्र ही तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा; मेरी कृपा से इसमें कोई संदेह नहीं है, इसलिए तुम शीघ्र घर जाओ।

श्लोक 18 (skanda.6.48.18)

सूत उवाच॥ एतस्मिन्नंतरे गौरी कोपसंरक्तलोचना॥ भर्त्सयित्वा महादेवं ततः प्रोवाच तं नृपम्

sūta uvāca etasminnaṁtare gaurī kopasaṁraktalocanā bhartsayitvā mahādevaṁ tataḥ provāca taṁ nṛpam

सूत जी ने कहा -- इसी बीच क्रोध से लाल नेत्रों वाली गौरी ने महादेव को उलाहना देकर, फिर उस राजा से यह कहा।

श्लोक 19 (skanda.6.48.19)

यस्मात्त्वया महामूर्ख न प्रणामः कृतो मम॥ हरादनंतरं तस्माच्छापं दास्याम्यहं तव

yasmāttvayā mahāmūrkha na praṇāmaḥ kṛto mama harādanaṁtaraṁ tasmācchāpaṁ dāsyāmyahaṁ tava

हे महामूर्ख! चूँकि हर को प्रणाम करने के बाद तुमने मुझे प्रणाम नहीं किया, इसलिए मैं तुम्हें शाप दूँगी।

श्लोक 20 (skanda.6.48.20)

तव संलप्स्यते पुत्रो यथोक्तः शूलपाणिना॥ परं तन्मृत्युजं दुःखं त्वं शिशुत्वेपि लप्स्यसे

tava saṁlapsyate putro yathoktaḥ śūlapāṇinā paraṁ tanmṛtyujaṁ duḥkhaṁ tvaṁ śiśutvepi lapsyase

तुम्हें पुत्र तो अवश्य प्राप्त होगा, जैसा त्रिशूलधारी ने कहा है, किन्तु तुम उस बालक की मृत्यु से उत्पन्न दुःख को उसकी शिशु-अवस्था में ही प्राप्त करोगे।

श्लोक 21 (skanda.6.48.21)

एवमुक्त्वा भगवती सार्धं देवेन शंभुना॥ अदर्शनं ययौ पश्चात्तथान्यैरपि पार्श्वगैः

evamuktvā bhagavatī sārdhaṁ devena śaṁbhunā adarśanaṁ yayau paścāttathānyairapi pārśvagaiḥ

ऐसा कहकर वह भगवती देव शंभु के साथ, तथा अपने अन्य पार्षदों सहित, अदृश्य हो गईं।

श्लोक 22 (skanda.6.48.22)

सोऽपि राजा वरं लब्ध्वा शापं च तदनंतरम्॥ न जगाम गृहं भूयश्चकार सुमहत्तपः

so'pi rājā varaṁ labdhvā śāpaṁ ca tadanaṁtaram na jagāma gṛhaṁ bhūyaścakāra sumahattapaḥ

वह राजा भी वर और उसके बाद शाप, दोनों को प्राप्त कर घर नहीं गया, बल्कि फिर से महान तप करने लगा।

श्लोक 23 (skanda.6.48.23)

एकासनं समारूढौ कृत्वा गौरी महेश्वरौ॥ ततश्चाराधयामास समं पुष्पानुलेपनैः

ekāsanaṁ samārūḍhau kṛtvā gaurī maheśvarau tataścārādhayāmāsa samaṁ puṣpānulepanaiḥ

फिर उसने गौरी और महेश्वर दोनों को एक ही आसन पर स्थापित कर, पुष्पों और चंदन-लेप से समान रूप से उनकी आराधना की।

श्लोक 24 (skanda.6.48.24)

विशेषेण ददौ दानं ब्राह्मणेभ्यो महीपतिः॥ भूमिशायी प्रशांतात्मा षष्ठकालकृताशनः

viśeṣeṇa dadau dānaṁ brāhmaṇebhyo mahīpatiḥ bhūmiśāyī praśāṁtātmā ṣaṣṭhakālakṛtāśanaḥ

उस राजा ने ब्राह्मणों को विशेष रूप से दान दिया, भूमि पर सोता रहा, शांत मन से रहा, तथा छठे समय अर्थात् बहुत विरले समय ही भोजन करता था।

श्लोक 25 (skanda.6.48.25)

ततः संवत्सरस्यांते भगवान्वृषभध्वजः॥ पार्वत्या सहितो भूयस्तस्य संदर्शनं गतः

tataḥ saṁvatsarasyāṁte bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ pārvatyā sahito bhūyastasya saṁdarśanaṁ gataḥ

फिर एक वर्ष के अंत में वृषभध्वज भगवान पुनः पार्वती सहित उसे दर्शन देने आए।

श्लोक 26 (skanda.6.48.26)

ततः स नृपतिस्ताभ्यां युगपद्विधिपूर्वकम्॥ कृत्वा नतिं ततो वाक्यं विनयादिदमब्रवीत्

tataḥ sa nṛpatistābhyāṁ yugapadvidhipūrvakam kṛtvā natiṁ tato vākyaṁ vinayādidamabravīt

तब उस राजा ने उन दोनों को एक साथ विधिपूर्वक प्रणाम करके, विनम्रतापूर्वक यह वचन कहा।

श्लोक 27 (skanda.6.48.27)

पुरा देवि मयानंदपूरे व्याकुल चेतसा॥ न नता त्वं न मे कोपं तस्मात्त्वं कर्तुमर्हसि

purā devi mayānaṁdapūre vyākula cetasā na natā tvaṁ na me kopaṁ tasmāttvaṁ kartumarhasi

हे देवि! पहले आनंद से भरे उस समय में मेरा मन व्याकुल था, इसीलिए मैंने तुम्हें प्रणाम नहीं किया था; इसलिए तुम्हें मुझ पर क्रोध नहीं करना चाहिए।

श्लोक 28 (skanda.6.48.28)

देहार्धधारिणी देवि सदा त्वं शूलधारिणः॥ तदैकस्मिन्नते कस्मान्न नता त्वं वदस्व मे

dehārdhadhāriṇī devi sadā tvaṁ śūladhāriṇaḥ tadaikasminnate kasmānna natā tvaṁ vadasva me

हे देवि! तुम सदा त्रिशूलधारी के शरीर का आधा भाग धारण करती हो; तो फिर एक को प्रणाम करने पर, तुम मुझसे यह बताओ कि तुम्हें क्यों प्रणाम नहीं हुआ?

श्लोक 29 (skanda.6.48.29)

यस्तं नमति देवेशं तेन त्वं सर्वदा नता॥ नतायां त्वयि देवेशो नतः स्यादिति मे मतिः

yastaṁ namati deveśaṁ tena tvaṁ sarvadā natā natāyāṁ tvayi deveśo nataḥ syāditi me matiḥ

जो कोई भी उस देवेश को प्रणाम करता है, वह सदा तुम्हें भी प्रणाम कर चुका है; और यही मेरा मत है कि तुम्हें प्रणाम करने पर देवेश को भी प्रणाम हो जाता है।

श्लोक 30 (skanda.6.48.30)

तथापि च पृथक्त्वेन मया त्वं तु नता सह॥ एकासनं समारूढा तत्समं देवि पूजिता

tathāpi ca pṛthaktvena mayā tvaṁ tu natā saha ekāsanaṁ samārūḍhā tatsamaṁ devi pūjitā

फिर भी हे देवि! मैंने तुम्हें पृथक रूप से भी प्रणाम किया है; तुम दोनों को एक ही आसन पर स्थापित कर मैंने समान रूप से पूजा की है।

श्लोक 31 (skanda.6.48.31)

तस्मात्कुरु प्रसादं मे यः पुरोक्तः पुरारिणा॥ सोस्तु वै सफलः सद्यो वरः पुत्रकृते मम

tasmātkuru prasādaṁ me yaḥ puroktaḥ purāriṇā sostu vai saphalaḥ sadyo varaḥ putrakṛte mama

इसलिए मुझ पर कृपा करो, जिससे पुरारि के द्वारा पूर्व में मुझे पुत्र-प्राप्ति के लिए दिया गया वह वर तत्काल सफल हो।

श्लोक 32 (skanda.6.48.32)

यया वंशधरः पुत्रो दीर्घायुर्दृढविक्रमः॥ त्वत्प्रसादाद्भवेद्देवि तथा त्वं कर्तुमर्हसि

yayā vaṁśadharaḥ putro dīrghāyurdṛḍhavikramaḥ tvatprasādādbhaveddevi tathā tvaṁ kartumarhasi

हे देवि! जिसके फलस्वरूप तुम्हारी कृपा से मुझे वंशधर, दीर्घायु और दृढ़-पराक्रमी पुत्र प्राप्त हो, वैसा ही तुम करो।

श्लोक 33 (skanda.6.48.33)

श्रीदेव्युवाच॥ नान्यथा मे वचो राजञ्जायतेऽत्र कथंचन॥ तस्माद्बालोऽपि ते पुत्रः पंचत्वं समुपैष्यति

śrīdevyuvāca nānyathā me vaco rājañjāyate'tra kathaṁcana tasmādbālo'pi te putraḥ paṁcatvaṁ samupaiṣyati

श्री देवी ने कहा -- हे राजन्! मेरा वचन किसी भी प्रकार अन्यथा नहीं हो सकता; इसलिए तुम्हारा पुत्र बालावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त होगा।

श्लोक 34 (skanda.6.48.34)

दर्शयित्वा तु ते दुःखमल्पमृत्युसमुद्भवम्॥ भूयः संप्राप्स्यति प्राणानचिरान्मे प्रसादतः

darśayitvā tu te duḥkhamalpamṛtyusamudbhavam bhūyaḥ saṁprāpsyati prāṇānacirānme prasādataḥ

किन्तु वह तुम्हें उस अल्प मृत्यु से उत्पन्न दुःख का अनुभव कराकर, मेरी कृपा से शीघ्र ही पुनः प्राणों को प्राप्त कर लेगा।

श्लोक 35 (skanda.6.48.35)

भविष्यति च दीर्घायुस्ततो वंशधरो जयी॥ सार्वभौमप्रधानश्च दानी यज्वा च धर्मवित्

bhaviṣyati ca dīrghāyustato vaṁśadharo jayī sārvabhaumapradhānaśca dānī yajvā ca dharmavit

फिर वह दीर्घायु, वंशधर, विजयी, सार्वभौम राजाओं में श्रेष्ठ, दानशील, यज्ञकर्ता और धर्मज्ञ होगा।

श्लोक 36 (skanda.6.48.36)

तस्माद्राजन्गृहं गत्वा कुरु राज्यमभीप्सितम्॥ संप्राप्स्यसि सुतं श्रेष्ठं यादृशं कीर्तितं मया

tasmādrājangṛhaṁ gatvā kuru rājyamabhīpsitam saṁprāpsyasi sutaṁ śreṣṭhaṁ yādṛśaṁ kīrtitaṁ mayā

इसलिए हे राजन्! घर जाकर अपने इच्छित राज्य का संचालन करो; तुम्हें वैसा ही श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त होगा, जैसा मैंने बताया है।

श्लोक 37 (skanda.6.48.37)

अन्योऽपि मानवो यो मां रूपेणा नेनसंस्थिताम्॥ पूजयिष्यति चात्रैव समं देवेन शंभुना

anyo'pi mānavo yo māṁ rūpeṇā nenasaṁsthitām pūjayiṣyati cātraiva samaṁ devena śaṁbhunā

इसके अतिरिक्त जो भी अन्य मनुष्य यहाँ इसी रूप में स्थापित मुझको देव शंभु के साथ पूजेगा,

श्लोक 38 (skanda.6.48.38)

तस्याहं संप्रदास्यामि पुत्रान्हृदयवांछितान्॥ तथान्यदपि यत्किंचिदचिरान्नात्र संशयः

tasyāhaṁ saṁpradāsyāmi putrānhṛdayavāṁchitān tathānyadapi yatkiṁcidacirānnātra saṁśayaḥ

उसे मैं उसके हृदय की इच्छानुसार पुत्र तथा अन्य जो कुछ भी वांछित हो, शीघ्र ही प्रदान करूँगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 39 (skanda.6.48.39)

श्रीमहादेव उवाच॥ भूय एव नृपश्रेष्ठ मत्तः प्रार्थय वांछितम्॥ न वृथा दर्शनं मे स्यात्सत्यमेतद्ब्रवीमि ते

śrīmahādeva uvāca bhūya eva nṛpaśreṣṭha mattaḥ prārthaya vāṁchitam na vṛthā darśanaṁ me syātsatyametadbravīmi te

श्री महादेव ने कहा -- हे राजश्रेष्ठ! तुम मुझसे पुनः अपनी इच्छा माँगो; मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाना चाहिए, यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।

श्लोक 40 (skanda.6.48.40)

हरिश्चंद्र उवाच॥ कृतकृत्योस्मि देवेश सर्वमस्ति गृहे मम॥ पुत्रं त्यक्त्वा त्वया सोऽपि दत्तो वंशधरो जयी

hariścaṁdra uvāca kṛtakṛtyosmi deveśa sarvamasti gṛhe mama putraṁ tyaktvā tvayā so'pi datto vaṁśadharo jayī

हरिश्चंद्र ने कहा -- हे देवेश! मैं कृतकृत्य हूँ, मेरे घर में सब कुछ है; पुत्र भी अब तुमने ही मुझे दे दिया है, जो वंशधर और विजयी होगा।

श्लोक 41 (skanda.6.48.41)

तथापि न तवादेशो व्यर्थः कार्यः कथंचन॥ एतस्मात्कारणाद्देव याचयिष्यामि वांछितम्

tathāpi na tavādeśo vyarthaḥ kāryaḥ kathaṁcana etasmātkāraṇāddeva yācayiṣyāmi vāṁchitam

फिर भी तुम्हारा आदेश किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं जाना चाहिए; इसी कारण हे देव! मैं अपनी एक इच्छा माँगूँगा।

श्लोक 42 (skanda.6.48.42)

राजसूयकृतेऽस्माकं सदा बुद्धिः प्रवर्तते॥ निषेधयंति मां सर्वे मन्त्रिणः सुहृदस्तदा

rājasūyakṛte'smākaṁ sadā buddhiḥ pravartate niṣedhayaṁti māṁ sarve mantriṇaḥ suhṛdastadā

मेरे मन में सदा राजसूय यज्ञ करने का विचार बना रहता है, किन्तु मेरे सभी मंत्री और सुहृद-जन मुझे उससे रोकते हैं।

श्लोक 43 (skanda.6.48.43)

सर्वैस्तैर्जायते यज्ञः पार्थिवैः करदीकृतैः॥ युद्धं विना करं तेऽपि न यच्छन्ति यतो विभो

sarvaistairjāyate yajñaḥ pārthivaiḥ karadīkṛtaiḥ yuddhaṁ vinā karaṁ te'pi na yacchanti yato vibho

हे विभो! वह यज्ञ तभी संपन्न हो सकता है जब समस्त राजा कर देने वाले अधीन हों, किन्तु वे युद्ध के बिना कर नहीं देते।

श्लोक 44 (skanda.6.48.44)

ततो युद्धार्थिनं मां ते वारयंति हितैषिणः॥ कृतोत्साहं मखप्राप्तौ नीतिमार्गसमाश्रिताः

tato yuddhārthinaṁ māṁ te vārayaṁti hitaiṣiṇaḥ kṛtotsāhaṁ makhaprāptau nītimārgasamāśritāḥ

इसलिए युद्ध चाहने वाले मुझे मेरे हितैषी लोग रोकते हैं, यद्यपि नीति-मार्ग के अनुयायी वे स्वयं भी यज्ञ की प्राप्ति के लिए उत्साहित हैं।

श्लोक 45 (skanda.6.48.45)

तस्मात्तव प्रसादेन राजसूयो भवेन्मखः॥ अविघ्नः सिद्धिमायातु मम नान्यद्वृणोम्यहम्

tasmāttava prasādena rājasūyo bhavenmakhaḥ avighnaḥ siddhimāyātu mama nānyadvṛṇomyaham

इसलिए तुम्हारी कृपा से मेरा राजसूय यज्ञ निर्विघ्न रूप से सिद्धि को प्राप्त हो; मैं इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं माँगता।

श्लोक 46 (skanda.6.48.46)

सूत उवाच॥ स तथेति प्रतिज्ञाय जगामादर्शन हरः॥ सोऽपि लब्धवरो भूपः स्वमेव भवनं गतः

sūta uvāca sa tatheti pratijñāya jagāmādarśana haraḥ so'pi labdhavaro bhūpaḥ svameva bhavanaṁ gataḥ

सूत जी ने कहा -- "ऐसा ही हो" कहकर हर अदृश्य हो गए, और वह राजा भी वर प्राप्त कर अपने भवन को चला गया।

श्लोक 47 (skanda.6.48.47)

एवं तेन नरेन्द्रेण पूर्वं तत्र विनिर्मितौ॥ उमामहेश्वरौ पश्चान्निर्मितावितरैरपि

evaṁ tena narendreṇa pūrvaṁ tatra vinirmitau umāmaheśvarau paścānnirmitāvitarairapi

इस प्रकार उस राजा द्वारा पहली बार वहाँ उमा-महेश्वर की प्रतिमा बनाई गई, और बाद में अन्य लोगों द्वारा भी वैसी ही प्रतिमाएँ बनाई गईं।

श्लोक 48 (skanda.6.48.48)

यस्ताभ्यां कुरुते पूजां संप्राप्ते पंचमी दिने॥ फलैः सर्वेषु गात्रेषु यावत्संवत्सरं द्विजाः॥ सुतं प्राप्नोति सोऽभीष्टं स्ववंशोद्धरणक्षमम्

yastābhyāṁ kurute pūjāṁ saṁprāpte paṁcamī dine phalaiḥ sarveṣu gātreṣu yāvatsaṁvatsaraṁ dvijāḥ sutaṁ prāpnoti so'bhīṣṭaṁ svavaṁśoddharaṇakṣamam

हे द्विजो! जो कोई पंचमी तिथि आने पर, एक वर्ष तक निरंतर, उनके समस्त अंगों पर फल चढ़ाकर उन दोनों की पूजा करता है, वह अपने वंश को धारण करने में सक्षम, इच्छित पुत्र प्राप्त करता है।

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