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नागर खण्ड · अध्याय 49

कलशेश्वर आख्यान में कलश नृप को दुर्वासा के शाप से व्याघ्र-रूप प्राप्ति का वर्णन

अध्याय 48अध्याय-सूचीअध्याय 50

श्लोक 1 (skanda.6.49.1)

सूत उवाच॥ तत्रैवास्ति महापुण्यो ह्रदतीरे व्यवस्थितः॥ कलशेश्वर इत्याख्यः सर्वपापप्रणाशनः

sūta uvāca tatraivāsti mahāpuṇyo hradatīre vyavasthitaḥ kalaśeśvara ityākhyaḥ sarvapāpapraṇāśanaḥ

सूत जी ने कहा -- वहीं उस सरोवर के तट पर अत्यंत पुण्यमय, कलशेश्वर नामक, समस्त पापों का नाश करने वाला एक शिवलिंग स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.6.49.2)

दृष्ट्वा प्रमुच्यते पापान्मनुष्यः कलशेश्वरम्

dṛṣṭvā pramucyate pāpānmanuṣyaḥ kalaśeśvaram

कलशेश्वर के दर्शन मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.6.49.3)

पुरासीत्कलशोनाम यदुवंशसमुद्भवः॥ यज्वा दानपतिर्दक्षः सर्वलोकहिते रतः

purāsītkalaśonāma yaduvaṁśasamudbhavaḥ yajvā dānapatirdakṣaḥ sarvalokahite rataḥ

प्राचीन काल में यदुवंश में उत्पन्न कलश नामक राजा था, जो यज्ञ करने वाला, दानपति, कुशल तथा समस्त लोक के हित में सदा तत्पर रहता था।

श्लोक 4 (skanda.6.49.4)

कस्यचित्त्वथ कालस्य दुर्वासा मुनि सत्तमः॥ चातुर्मास्यव्रतं कृत्वा तद्गृहं समुपस्थितः

kasyacittvatha kālasya durvāsā muni sattamaḥ cāturmāsyavrataṁ kṛtvā tadgṛhaṁ samupasthitaḥ

फिर किसी समय, दुर्वासा नामक श्रेष्ठ मुनि चातुर्मास्य व्रत को पूर्ण कर उसके घर आए।

श्लोक 5 (skanda.6.49.5)

अथोत्थाय नृपस्तूर्णं सम्मुखः प्रययौ मुदा॥ स्वागतं स्वागतं तेस्तु ब्रुवाण इति सादरम्

athotthāya nṛpastūrṇaṁ sammukhaḥ prayayau mudā svāgataṁ svāgataṁ testu bruvāṇa iti sādaram

तब राजा तुरंत उठकर हर्षपूर्वक उनके सामने गया, और आदरपूर्वक "स्वागत है, स्वागत है" कहता रहा।

श्लोक 6 (skanda.6.49.6)

ततः प्रणम्य तं भक्त्या प्रक्षाल्य चरणौ स्वयम्॥ दत्त्वार्घमिति होवाच हर्षबाष्पाकुलेक्षणः

tataḥ praṇamya taṁ bhaktyā prakṣālya caraṇau svayam dattvārghamiti hovāca harṣabāṣpākulekṣaṇaḥ

फिर भक्तिपूर्वक प्रणाम कर, स्वयं उनके चरण धोकर तथा अर्घ्य देकर, हर्ष के आँसुओं से भरे नेत्रों के साथ राजा ने यह कहा।

श्लोक 7 (skanda.6.49.7)

इदं राज्यममी पुत्रा इमा नार्य इदं धनम्॥ ब्रूहि सर्वं मुने त्वं च तव कार्यं ददाम्यहम्

idaṁ rājyamamī putrā imā nārya idaṁ dhanam brūhi sarvaṁ mune tvaṁ ca tava kāryaṁ dadāmyaham

यह राज्य, ये मेरे पुत्र, ये स्त्रियाँ, यह धन -- सब कुछ आपका है; हे मुने! जो भी आपको चाहिए, कहिए, मैं आपको वह सब दूँगा।

श्लोक 8 (skanda.6.49.8)

दुर्वासा उवाच॥ युक्तमेतन्महाराज वक्तुं ते कार्यमीदृशम्॥ गृहागताय विप्राय व्रतिनेऽस्मद्विधाय च

durvāsā uvāca yuktametanmahārāja vaktuṁ te kāryamīdṛśam gṛhāgatāya viprāya vratine'smadvidhāya ca

दुर्वासा ने कहा -- हे महाराज! घर आए हुए, व्रतधारी और मेरे जैसे ब्राह्मण के लिए ऐसा कहना तुम्हें शोभा देता है।

श्लोक 9 (skanda.6.49.9)

न मे किञ्चिद्धनैः कार्यं न राज्येन नृपोत्तम॥ चातुर्मास्यव्रतोऽतोऽहं पारणं कर्तृमुत्सहे

na me kiñciddhanaiḥ kāryaṁ na rājyena nṛpottama cāturmāsyavrato'to'haṁ pāraṇaṁ kartṛmutsahe

किन्तु हे नृपोत्तम! मुझे धन से कोई प्रयोजन नहीं है, न राज्य से; मैं चातुर्मास्य-व्रती हूँ, इसलिए अब मैं व्रत का पारण करना चाहता हूँ।

श्लोक 10 (skanda.6.49.10)

तस्माद्यत्किञ्चिदन्नं ते सिद्धमस्ति गृहे नृप॥ तद्देहि भोजनार्थं मे बुभुक्षातीव वर्धते

tasmādyatkiñcidannaṁ te siddhamasti gṛhe nṛpa taddehi bhojanārthaṁ me bubhukṣātīva vardhate

इसलिए हे राजन्! तुम्हारे घर में जो भी अन्न तैयार हो, वही मुझे भोजन के लिए दो; मेरी भूख अत्यंत बढ़ रही है।

श्लोक 11 (skanda.6.49.11)

सूत उवाच॥ ततः स पृथिवीपालो यथासिद्धं सुसंस्कृम्॥ अन्नं भोज्यकृते तस्मै प्रददौ स्वयमेव हि

sūta uvāca tataḥ sa pṛthivīpālo yathāsiddhaṁ susaṁskṛm annaṁ bhojyakṛte tasmai pradadau svayameva hi

सूत जी ने कहा -- तब उस राजा ने जो कुछ भी सुसंस्कृत अन्न पहले से तैयार था, वह सब स्वयं ही उन्हें भोजन के लिए दे दिया।

श्लोक 12 (skanda.6.49.12)

व्यञ्जनानि विचित्राणि पक्वान्नानि बहूनि च॥ पेयं चोष्यं च खाद्यं च लेह्यमन्नमनेकधा॥ तथा मांसं विचित्रं च लवणाद्यैः सुसंस्कृतम्

vyañjanāni vicitrāṇi pakvānnāni bahūni ca peyaṁ coṣyaṁ ca khādyaṁ ca lehyamannamanekadhā tathā māṁsaṁ vicitraṁ ca lavaṇādyaiḥ susaṁskṛtam

नाना प्रकार के व्यंजन, अनेक पक्वान्न, पेय, चूसने योग्य, खाने योग्य तथा चाटने योग्य विविध अन्न, तथा नमक आदि से सुसंस्कारित विविध मांस भी उसने परोसा।

श्लोक 13 (skanda.6.49.13)

अथासौ बुभुजे विप्रः क्षुत्क्षामस्त्वरयान्वितः॥ अविन्दन्न रसास्वादं बृहद्ग्रासैर्मुदान्वितः

athāsau bubhuje vipraḥ kṣutkṣāmastvarayānvitaḥ avindanna rasāsvādaṁ bṛhadgrāsairmudānvitaḥ

तब भूख से कृश हुए वे ब्राह्मण शीघ्रतापूर्वक बड़े-बड़े ग्रास लेकर प्रसन्नतापूर्वक खाने लगे, और स्वाद का अनुभव भी न कर सके।

श्लोक 14 (skanda.6.49.14)

अथ तृप्तेन मांसस्य ज्ञातस्तेन रसो द्विजाः॥ ततः कोपपरीतात्मा तं शशाप मुनीश्वरः

atha tṛptena māṁsasya jñātastena raso dvijāḥ tataḥ kopaparītātmā taṁ śaśāpa munīśvaraḥ

हे द्विजो! फिर जब वे तृप्त हुए, तब उन्हें मांस का स्वाद ज्ञात हुआ; तब क्रोध से भरकर उस मुनीश्वर ने राजा को शाप दे दिया।

श्लोक 15 (skanda.6.49.15)

यस्मान्मांसं त्वया दत्त्वा व्रतभंगः कृतो मम॥ तस्मात्त्वमामिषाहारो रौद्रो व्याघ्रो भविष्यसि

yasmānmāṁsaṁ tvayā dattvā vratabhaṁgaḥ kṛto mama tasmāttvamāmiṣāhāro raudro vyāghro bhaviṣyasi

चूँकि तुमने मुझे मांस देकर मेरे व्रत को भंग किया है, इसलिए तुम मांसाहारी, भयंकर व्याघ्र बन जाओगे।

श्लोक 16 (skanda.6.49.16)

ततः स भूपतिर्भीतः प्रणम्य च मुनीश्वरम्॥ प्रोवाच दीनवदनो वेपमानः सुदुःखितः

tataḥ sa bhūpatirbhītaḥ praṇamya ca munīśvaram provāca dīnavadano vepamānaḥ suduḥkhitaḥ

तब वह राजा भयभीत होकर, मुनीश्वर को प्रणाम कर, दीन मुख से काँपता हुआ, अत्यंत दुःखी होकर बोला।

श्लोक 17 (skanda.6.49.17)

तव क्षुत्क्षामकण्ठस्य मया भक्तिः कृता मुने॥ यथासिद्धेन भोज्येन तत्कस्माच्छप्तुमुद्यतः

tava kṣutkṣāmakaṇṭhasya mayā bhaktiḥ kṛtā mune yathāsiddhena bhojyena tatkasmācchaptumudyataḥ

हे मुने! तुम्हारा कंठ भूख से क्षीण था, इसलिए मैंने जो कुछ भी तैयार था, उससे भक्तिपूर्वक तुम्हारी सेवा की; फिर उसी के लिए तुम मुझे शाप देने को क्यों उद्यत हो गए?

श्लोक 18 (skanda.6.49.18)

तस्मात्कुरु प्रसादं मे भक्तस्य विनतस्य च॥ शापस्यानुग्रहेणैव शीघ्रं ब्राह्मणसत्तम

tasmātkuru prasādaṁ me bhaktasya vinatasya ca śāpasyānugraheṇaiva śīghraṁ brāhmaṇasattama

इसलिए हे ब्राह्मणसत्तम! अपने इस भक्त और विनम्र सेवक पर कृपा करो, और अपने शाप का शीघ्र ही अनुग्रहपूर्वक निवारण करो।

श्लोक 19 (skanda.6.49.19)

दुर्वासा उवाच॥ मुक्त्वा श्राद्धं तथा यज्ञं न मांसं भक्षयेद्द्विजः॥ विशेषेण व्रतस्यांते चातुर्मास्योद्भवस्य च

durvāsā uvāca muktvā śrāddhaṁ tathā yajñaṁ na māṁsaṁ bhakṣayeddvijaḥ viśeṣeṇa vratasyāṁte cāturmāsyodbhavasya ca

दुर्वासा ने कहा -- श्राद्ध और यज्ञ के अतिरिक्त ब्राह्मण को मांस नहीं खाना चाहिए, विशेषकर व्रत की समाप्ति पर, और वह भी चातुर्मास्य से उत्पन्न व्रत की समाप्ति पर।

श्लोक 20 (skanda.6.49.20)

उपवासपरो भूत्वा मांसमश्नाति यो द्विजः॥ वृथामांसाद्वृथा तस्य तद्व्रतं जायते ध्रुवम्

upavāsaparo bhūtvā māṁsamaśnāti yo dvijaḥ vṛthāmāṁsādvṛthā tasya tadvrataṁ jāyate dhruvam

जो ब्राह्मण उपवास करते हुए भी मांस खाता है, उस व्यर्थ मांस-भक्षण से उसका व्रत निश्चय ही व्यर्थ हो जाता है।

श्लोक 21 (skanda.6.49.21)

तस्माद्व्रतं प्रणष्टं मे चातुर्मास्यसमुद्भवम्॥ तेन शप्तोऽसि राजेंद्र मया कोपेन सांप्रतम्

tasmādvrataṁ praṇaṣṭaṁ me cāturmāsyasamudbhavam tena śapto'si rājeṁdra mayā kopena sāṁpratam

इसलिए मेरा चातुर्मास्य से उत्पन्न व्रत नष्ट हो गया है; इसीलिए हे राजेन्द्र! अभी क्रोध में आकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया है।

श्लोक 22 (skanda.6.49.22)

राजोवाच॥ तथापि कुरु मे विप्र शापस्यांतं यथेप्सितम्॥ भक्तियुक्तस्य दीनस्य निर्दोषस्य विशेषतः

rājovāca tathāpi kuru me vipra śāpasyāṁtaṁ yathepsitam bhaktiyuktasya dīnasya nirdoṣasya viśeṣataḥ

राजा ने कहा -- फिर भी हे विप्र! भक्तियुक्त, दीन और विशेषकर निर्दोष मुझ पर कृपा करके, जैसा तुम चाहो, इस शाप का अंत करो।

श्लोक 23 (skanda.6.49.23)

दुर्वासा उवाच॥ यदा ते नंदिनी धेनुर्लिंगं बाणार्चितं पुरा॥ दर्शयिष्यति ते मुक्तिस्तदा तूर्णं भविष्यति

durvāsā uvāca yadā te naṁdinī dhenurliṁgaṁ bāṇārcitaṁ purā darśayiṣyati te muktistadā tūrṇaṁ bhaviṣyati

दुर्वासा ने कहा -- जब तुम्हारी नंदिनी नामक गाय तुम्हें उस लिंग का दर्शन कराएगी, जिसकी पूर्वकाल में बाण ने पूजा की थी, तभी तुम्हारी मुक्ति शीघ्र होगी।

श्लोक 24 (skanda.6.49.24)

एवमुक्त्वा स विप्रेन्द्रो जगाम निजमाश्रमम्॥ बभूव सोऽपि भूपालो व्याघ्रो रौद्रतमाकृतिः

evamuktvā sa viprendro jagāma nijamāśramam babhūva so'pi bhūpālo vyāghro raudratamākṛtiḥ

ऐसा कहकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने आश्रम को चले गए, और वह राजा भी अत्यंत भयंकर रूप वाला व्याघ्र बन गया।

श्लोक 25 (skanda.6.49.25)

नष्टस्मृतिस्ततस्तूर्णं दृष्ट्वा जंतून्पुरःस्थितान्॥ जघानोच्चाटितोन्यैश्च प्रविवेश महावनम्

naṣṭasmṛtistatastūrṇaṁ dṛṣṭvā jaṁtūnpuraḥsthitān jaghānoccāṭitonyaiśca praviveśa mahāvanam

तब स्मृति खोकर, सामने खड़े प्राणियों को देखते ही उसने उन्हें मार डाला, और दूसरों द्वारा खदेड़े जाने पर वह एक विशाल वन में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 26 (skanda.6.49.26)

अथ ते मंत्रिणस्तस्य शापस्यातं महीपतेः॥ वांछतस्तस्य तद्राज्यं चक्रुरेव सुरक्षितम्

atha te maṁtriṇastasya śāpasyātaṁ mahīpateḥ vāṁchatastasya tadrājyaṁ cakrureva surakṣitam

तब उस राजा के मंत्रियों ने, उसके शाप की समाप्ति की कामना करते हुए, उसके राज्य की भलीभाँति रक्षा की।

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