नागर खण्ड · अध्याय 50
कलशेश्वर माहात्म्य में गौ-व्याघ्र संवाद का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.50.1)
एवं तस्य नरेन्द्रस्य व्याघ्ररूपस्य कानने॥ जगाम सुमहान्कालो निघ्नतो विविधान्द्विज
evaṁ tasya narendrasya vyāghrarūpasya kānane jagāma sumahānkālo nighnato vividhāndvija
हे द्विज! इस प्रकार व्याघ्र-रूप हुए उस राजा का वन में विविध प्राणियों को मारते हुए बहुत लंबा समय बीत गया।
श्लोक 2 (skanda.6.50.2)
कस्यचित्त्वथ कालस्य तस्मिन्देशे द्विजोत्तमाः॥ आ यातं गोकुलं रम्यं गोपगोपीसमाकुलम्
kasyacittvatha kālasya tasmindeśe dvijottamāḥ ā yātaṁ gokulaṁ ramyaṁ gopagopīsamākulam
हे द्विजोत्तमो! फिर किसी समय उस देश में एक रमणीय गोकुल आ बसा, जो गोप-गोपियों से भरा हुआ था।
श्लोक 3 (skanda.6.50.3)
तत्रास्ति नन्दिनीनाम धेनुः पीनपयोधरा॥ विस्तीर्णजघनाभोगा हंसवर्णा घटस्रवा
tatrāsti nandinīnāma dhenuḥ pīnapayodharā vistīrṇajaghanābhogā haṁsavarṇā ghaṭasravā
वहाँ नंदिनी नामक एक गाय थी, जिसके स्तन दूध से भरे हुए थे, जिसकी देह विशाल थी, जो हंस के समान श्वेत वर्ण की थी, और जिसका दूध घड़ों में बहता था।
श्लोक 4 (skanda.6.50.4)
अथ सा निजयूथस्य सदाग्रे तृणवांछया॥ भ्रममाणा निकुञ्जांते लिंगं देवस्य शूलिनः
atha sā nijayūthasya sadāgre tṛṇavāṁchayā bhramamāṇā nikuñjāṁte liṁgaṁ devasya śūlinaḥ
वह सदा अपने झुंड से आगे-आगे घास की इच्छा से घूमती हुई, एक लता-कुंज के भीतर त्रिशूलधारी देव के लिंग को,
श्लोक 5 (skanda.6.50.5)
अपश्यत्तेजसा युक्तं स्वयमेव व्यवस्थितम्॥ द्वादशार्कप्रतीकाशं चित्ताह्लादकरं परम्
apaśyattejasā yuktaṁ svayameva vyavasthitam dvādaśārkapratīkāśaṁ cittāhlādakaraṁ param
तेज से युक्त, स्वयंभू रूप से स्थित, बारह सूर्यों के समान तेजस्वी तथा मन को परम आह्लाद देने वाला देखा।
श्लोक 6 (skanda.6.50.6)
ततस्तस्योपरि स्थित्वा सुस्राव सुमहत्पयः॥ श्रद्धया परया युक्ता तस्य स्नानकृते द्विजाः
tatastasyopari sthitvā susrāva sumahatpayaḥ śraddhayā parayā yuktā tasya snānakṛte dvijāḥ
हे द्विजो! फिर परम श्रद्धा से युक्त होकर वह उसके ऊपर खड़ी होकर उसे स्नान कराने के लिए अपना विपुल दूध बहाने लगी।
श्लोक 7 (skanda.6.50.7)
एवं तां स्नपनं तस्य सदा लिंगस्य कुर्वतीम्॥ न जानाति जनः कश्चिद्वने वृक्षसमाकुले
evaṁ tāṁ snapanaṁ tasya sadā liṁgasya kurvatīm na jānāti janaḥ kaścidvane vṛkṣasamākule
इस प्रकार उस लिंग को सदा स्नान कराती हुई उसे, वृक्षों से भरे उस वन में, कोई भी मनुष्य नहीं जानता था।
श्लोक 8 (skanda.6.50.8)
अन्यस्मिन्दिवसे तत्र स्थाने व्याघ्रः समागतः॥ तीक्ष्णदंष्ट्रो महाकायः सर्वजन्तुभयावहः
anyasmindivase tatra sthāne vyāghraḥ samāgataḥ tīkṣṇadaṁṣṭro mahākāyaḥ sarvajantubhayāvahaḥ
फिर किसी दूसरे दिन उस स्थान पर एक व्याघ्र आ पहुँचा, जो तीक्ष्ण दाढ़ों वाला, विशालकाय तथा समस्त प्राणियों के लिए भयकारी था।
श्लोक 9 (skanda.6.50.9)
अथ सा तत्र आयाता पतिता दृष्टिगोचरे॥ नन्दिनी द्वीपिनस्तस्य दैवयोगाद्द्विजोत्तमाः
atha sā tatra āyātā patitā dṛṣṭigocare nandinī dvīpinastasya daivayogāddvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो! तब वहाँ आई हुई नंदिनी, दैवयोग से, उस व्याघ्र की दृष्टि में पड़ गई।
श्लोक 10 (skanda.6.50.10)
ततः सा गोकुले बद्धं स्मृत्वा स्वं लघुवत्सकम्॥ अतृणादं पयोवृत्तिं करुणं पर्यदेवयत्
tataḥ sā gokule baddhaṁ smṛtvā svaṁ laghuvatsakam atṛṇādaṁ payovṛttiṁ karuṇaṁ paryadevayat
तब वह गोकुल में बंधे हुए अपने उस छोटे बछड़े का, जो अभी घास नहीं खाता था और केवल दूध पर निर्भर था, स्मरण करके करुणापूर्वक विलाप करने लगी।
श्लोक 11 (skanda.6.50.11)
अद्यैकाहं च संप्राप्ता कानने जनवर्जिते॥ पुत्रं बालं परित्यज्य गोपैर्गोष्ठे नियंत्रितम्
adyaikāhaṁ ca saṁprāptā kānane janavarjite putraṁ bālaṁ parityajya gopairgoṣṭhe niyaṁtritam
आज मैं अकेली ही इस निर्जन वन में आ पहुँची हूँ, अपने बालक पुत्र को छोड़कर, जिसे गोपों ने गोशाला में बाँध रखा है।
श्लोक 12 (skanda.6.50.12)
येन सत्येन भक्त्याद्य स्नपनायाहमागता॥ शिवस्य तेन सत्येन भूयान्मे सुतसंगमः
yena satyena bhaktyādya snapanāyāhamāgatā śivasya tena satyena bhūyānme sutasaṁgamaḥ
जिस सत्य-भक्ति से मैं आज शिव को स्नान कराने के लिए आई हूँ, उसी सत्य के बल से मेरे पुत्र से पुनः मिलन हो।
श्लोक 13 (skanda.6.50.13)
एवं सा करुणं यावन्नन्दिनी विलपत्यलम्॥ तावद्व्याघ्रः स्मितं कृत्वा प्रोवाच परुषाक्षरम्
evaṁ sā karuṇaṁ yāvannandinī vilapatyalam tāvadvyāghraḥ smitaṁ kṛtvā provāca paruṣākṣaram
इस प्रकार जब नंदिनी करुणापूर्वक अत्यंत विलाप कर रही थी, तभी व्याघ्र ने मुस्कुराते हुए कठोर वचन कहे।
श्लोक 14 (skanda.6.50.14)
व्याघ्र उवाच॥ प्रलापान्किं मुधा धेनो करोषि वशगा मम॥ तस्मादिष्टतमं देवं स्मर स्वर्गकृते शुभे
vyāghra uvāca pralāpānkiṁ mudhā dheno karoṣi vaśagā mama tasmādiṣṭatamaṁ devaṁ smara svargakṛte śubhe
व्याघ्र ने कहा -- हे धेनु! अब मेरे वश में होकर व्यर्थ में विलाप क्यों करती है? इसलिए हे शुभे! स्वर्ग-प्राप्ति के लिए अपने प्रियतम देव का स्मरण कर।
श्लोक 15 (skanda.6.50.15)
धेनुरुवाच॥ नाहमात्मकृते व्याघ्र विलपामि सुदुः खिता॥ शिवार्चनकृते मृत्युर्मम जातः शुभावहः
dhenuruvāca nāhamātmakṛte vyāghra vilapāmi suduḥ khitā śivārcanakṛte mṛtyurmama jātaḥ śubhāvahaḥ
धेनु ने कहा -- हे व्याघ्र! मैं अपने लिए दुःखी होकर विलाप नहीं कर रही; शिव-पूजा के कारण उत्पन्न हुई यह मेरी मृत्यु तो शुभदायक ही है।
श्लोक 16 (skanda.6.50.16)
वत्सो मे गोकुले बद्धः स्मरमाणो ममागमम्॥ सन्तिष्ठते पयोवृत्तिः कथं स्यात्स मया विना
vatso me gokule baddhaḥ smaramāṇo mamāgamam santiṣṭhate payovṛttiḥ kathaṁ syātsa mayā vinā
मेरा बछड़ा गोकुल में बंधा हुआ, मेरे आने की प्रतीक्षा करता हुआ, केवल दूध पर जीवित रहता है -- मेरे बिना उसका क्या होगा?
श्लोक 17 (skanda.6.50.17)
एतस्मात्कारणाद्व्याघ्र विलपामि सुदुःखिता॥ न चात्मजीवनार्थाय सत्येनात्मानमालभे
etasmātkāraṇādvyāghra vilapāmi suduḥkhitā na cātmajīvanārthāya satyenātmānamālabhe
इसी कारण, हे व्याघ्र! मैं अत्यंत दुःखी होकर विलाप कर रही हूँ; मैं अपने प्राण बचाने के लिए यह सत्य नहीं बोल रही हूँ।
श्लोक 18 (skanda.6.50.18)
तस्मान्मुंच महाव्याघ्र मां सद्यः सुतवत्सलाम्॥ सखीजनस्य तं दत्त्वा समागच्छामि तेंतिकम्
tasmānmuṁca mahāvyāghra māṁ sadyaḥ sutavatsalām sakhījanasya taṁ dattvā samāgacchāmi teṁtikam
इसलिए हे महाव्याघ्र! पुत्र-स्नेह से युक्त मुझे अभी छोड़ दो; उसे अपनी सखियों को सौंपकर मैं तुम्हारे पास लौट आऊँगी।
श्लोक 19 (skanda.6.50.19)
व्याघ्र उवाच॥ कथं मृत्युमुखं प्राप्य निष्क्रम्य च कथञ्चन॥ भूयस्तत्रैव निर्यासि तस्मात्त्वां भक्षयाम्यहम्
vyāghra uvāca kathaṁ mṛtyumukhaṁ prāpya niṣkramya ca kathañcana bhūyastatraiva niryāsi tasmāttvāṁ bhakṣayāmyaham
व्याघ्र ने कहा -- मृत्यु के मुख में पड़कर तथा किसी प्रकार उससे निकल जाकर, फिर वहीं पर कोई कैसे लौट सकता है? इसलिए मैं तुम्हें अभी ही खा जाऊँगा।
श्लोक 20 (skanda.6.50.20)
नन्दिन्युवाच॥ शपथैरागमिष्यामि यैः पुनर्व्याघ्र तेंऽतिकम्॥ तानाकर्णय मे वक्त्रात्ततो युक्तं समाचर
nandinyuvāca śapathairāgamiṣyāmi yaiḥ punarvyāghra teṁ'tikam tānākarṇaya me vaktrāttato yuktaṁ samācara
नंदिनी ने कहा -- हे व्याघ्र! मैं जिन शपथों के बल पर पुनः तुम्हारे पास लौट आऊँगी, उन्हें मेरे मुख से सुनो, फिर जो उचित हो, वही करना।
श्लोक 21 (skanda.6.50.21)
यत्पापं ब्रह्महत्यायां मातापित्रोश्च वंचने॥ तेन पापेन लिप्येहं नागच्छामि पुनर्यदि
yatpāpaṁ brahmahatyāyāṁ mātāpitrośca vaṁcane tena pāpena lipyehaṁ nāgacchāmi punaryadi
यदि मैं पुनः न आऊँ, तो मुझे ब्रह्महत्या तथा माता-पिता को धोखा देने के जो पाप हैं, उन्हीं पापों का भागी होना पड़े।
श्लोक 22 (skanda.6.50.22)
विवस्त्रं स्नानसक्तानां दिवामैथुनगामिनाम्॥ यत्पापं तेन लिप्येऽहं नागच्छामि पुनर्यदि
vivastraṁ snānasaktānāṁ divāmaithunagāminām yatpāpaṁ tena lipye'haṁ nāgacchāmi punaryadi
यदि मैं पुनः न आऊँ, तो निर्वस्त्र होकर स्नान करने वालों तथा दिन में मैथुन करने वालों के जो पाप हैं, उन्हीं से मैं लिप्त होऊँ।
श्लोक 23 (skanda.6.50.23)
रजस्वलानुसक्तानां यत्पापं नग्नशायिनाम्॥ तेन पापेन लिप्येऽहं नागच्छामि पुनर्यदि
rajasvalānusaktānāṁ yatpāpaṁ nagnaśāyinām tena pāpena lipye'haṁ nāgacchāmi punaryadi
यदि मैं पुनः न आऊँ, तो रजस्वला स्त्री के साथ संग करने वालों तथा नग्न होकर सोने वालों के जो पाप हैं, उन्हीं से मैं लिप्त होऊँ।
श्लोक 24 (skanda.6.50.24)
विश्वासघातकानां च कृतघ्नानां च यद्भवेत्॥ तेन पापेन लिप्येऽहं नागच्छामि पुनर्यदि
viśvāsaghātakānāṁ ca kṛtaghnānāṁ ca yadbhavet tena pāpena lipye'haṁ nāgacchāmi punaryadi
यदि मैं पुनः न आऊँ, तो विश्वासघातियों और कृतघ्नों का जो पाप होता है, उन्हीं से मैं लिप्त होऊँ।
श्लोक 25 (skanda.6.50.25)
गोकन्याब्राह्मणानां च दूषकानां च यद्भवेत्॥ तेन पापेन लिप्येऽहं नागच्छामि पुनर्यदि
gokanyābrāhmaṇānāṁ ca dūṣakānāṁ ca yadbhavet tena pāpena lipye'haṁ nāgacchāmi punaryadi
यदि मैं पुनः न आऊँ, तो गौ, कन्याओं और ब्राह्मणों को दूषित करने वालों का जो पाप होता है, उन्हीं से मैं लिप्त होऊँ।
श्लोक 26 (skanda.6.50.26)
वृथापाकप्रकर्तृणां वृथामांसाशिनां च यत्॥ तेन पापेन लिप्येऽहं नागच्छामि पुनर्यदि
vṛthāpākaprakartṛṇāṁ vṛthāmāṁsāśināṁ ca yat tena pāpena lipye'haṁ nāgacchāmi punaryadi
यदि मैं पुनः न आऊँ, तो व्यर्थ भोजन पकाने वालों तथा व्यर्थ मांस खाने वालों का जो पाप होता है, उन्हीं से मैं लिप्त होऊँ।
श्लोक 27 (skanda.6.50.27)
व्रतभंगप्रकर्तृणामनृतौ गामिनां च यत्॥ तेन पापेन लिप्येऽहं नागच्छामि पुनर्यदि
vratabhaṁgaprakartṛṇāmanṛtau gāmināṁ ca yat tena pāpena lipye'haṁ nāgacchāmi punaryadi
यदि मैं पुनः न आऊँ, तो व्रत भंग करने वालों तथा असत्य में लीन रहने वालों का जो पाप होता है, उन्हीं से मैं लिप्त होऊँ।
श्लोक 28 (skanda.6.50.28)
पैशुन्यसूचकानां च यत्पापं शस्त्रकर्मणाम्॥ तेन पापेन लिप्येऽहं नागच्छामि पुनर्यदि
paiśunyasūcakānāṁ ca yatpāpaṁ śastrakarmaṇām tena pāpena lipye'haṁ nāgacchāmi punaryadi
यदि मैं पुनः न आऊँ, तो चुगली करने वालों तथा शस्त्र से हिंसा करने वालों का जो पाप होता है, उन्हीं से मैं लिप्त होऊँ।