नागर खण्ड · अध्याय 51
राजा कलश की मुक्ति और कलशेश्वर माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.6.51.1)
सूत उवाच॥ अथ ताच्छपथाञ्छ्रुत्वा स व्याघ्रो विस्मयान्वितः॥ सत्यं मत्वा पुनः प्राह नन्दिनीं पुत्रवत्सलाम्
sūta uvāca atha tācchapathāñchrutvā sa vyāghro vismayānvitaḥ satyaṁ matvā punaḥ prāha nandinīṁ putravatsalām
सूत जी ने कहा -- तब वे शपथें सुनकर व्याघ्र आश्चर्यचकित हो गया और सत्य मानकर पुत्रवत्सला नंदिनी से पुनः बोला।
श्लोक 2 (skanda.6.51.2)
यद्येवं तद्गृहं गच्छ वीक्षयस्व निजात्मजम्॥ सखीनामर्पयित्वाथ भूय आगमनं कुरु
yadyevaṁ tadgṛhaṁ gaccha vīkṣayasva nijātmajam sakhīnāmarpayitvātha bhūya āgamanaṁ kuru
"यदि ऐसा है तो अपने घर जाओ, अपने पुत्र को देखो। सखियों को सौंपकर फिर लौट आना।"
श्लोक 3 (skanda.6.51.3)
सूत उवाच॥ इति व्याघ्रवचः श्रुत्वा सुशीला नन्दिनी तदा॥ गतालयं समुद्दिश्य यत्र बालः सुतः स्थितः
sūta uvāca iti vyāghravacaḥ śrutvā suśīlā nandinī tadā gatālayaṁ samuddiśya yatra bālaḥ sutaḥ sthitaḥ
सूत जी ने कहा -- व्याघ्र के इन वचनों को सुनकर सुशीला नंदिनी उसी स्थान की ओर गई, जहाँ उसका बालक पुत्र था।
श्लोक 4 (skanda.6.51.4)
अथाकालागतां दृष्ट्वा मातरं त्रस्तचेतसम्॥ रंभमाणां समालोक्य वत्सः प्रोवाच विस्मयात्
athākālāgatāṁ dṛṣṭvā mātaraṁ trastacetasam raṁbhamāṇāṁ samālokya vatsaḥ provāca vismayāt
तब असमय आई हुई, भयभीत मन वाली और रँभाती हुई माता को देखकर वत्स ने आश्चर्य से कहा।
श्लोक 5 (skanda.6.51.5)
कस्मात्प्राप्तासि कालेतु कस्मादुद्भ्रान्तमानसा॥ वाष्पक्लिन्नमुखी कस्माद्वद मातर्द्रुतं मम
kasmātprāptāsi kāletu kasmādudbhrāntamānasā vāṣpaklinnamukhī kasmādvada mātardrutaṁ mama
"माता! तुम असमय क्यों आई हो? तुम्हारा मन इतना व्याकुल क्यों है और तुम्हारा मुख आँसुओं से भीगा हुआ क्यों है? शीघ्र बताओ।"
श्लोक 6 (skanda.6.51.6)
नंदिन्युवाच॥ यदि पृच्छसि मां पुत्र स्तनपानं समाचर॥ येन तृप्तस्य ते सर्वं वृत्तांतं तद्वदाम्यहम्
naṁdinyuvāca yadi pṛcchasi māṁ putra stanapānaṁ samācara yena tṛptasya te sarvaṁ vṛttāṁtaṁ tadvadāmyaham
नंदिनी ने कहा -- "यदि तुम मुझसे पूछते हो, पुत्र, तो पहले स्तनपान करो; तृप्त होने पर मैं तुम्हें सारा वृत्तांत बताऊँगी।"
श्लोक 7 (skanda.6.51.7)
सूत उवाच॥ सोऽपि तद्वचनं श्रुत्वा पीत्वा क्षीरं यथोचितम्॥ आघ्रातश्च तया मूर्ध्नि ततः प्रोवाच सत्वरम्
sūta uvāca so'pi tadvacanaṁ śrutvā pītvā kṣīraṁ yathocitam āghrātaśca tayā mūrdhni tataḥ provāca satvaram
सूत जी ने कहा -- उसका वचन सुनकर उसने यथोचित दूध पिया, और माथे को सुँघाए जाने पर वह शीघ्र बोला।
श्लोक 8 (skanda.6.51.8)
सर्वं कीर्तय वृत्तांतमद्यारण्यसमुद्भवम्॥ येन मे जायते स्वास्थ्यं श्रुत्वा मातस्तवास्यतः
sarvaṁ kīrtaya vṛttāṁtamadyāraṇyasamudbhavam yena me jāyate svāsthyaṁ śrutvā mātastavāsyataḥ
"आज वन में हुआ सारा वृत्तांत कहो, जिसे तुम्हारे मुख से सुनकर, माता, मुझे स्वस्थता प्राप्त हो।"
श्लोक 9 (skanda.6.51.9)
नंदिन्युवाच॥ अहं गता महारण्ये ह्यद्य पुत्र यथेच्छया॥ व्याघ्रेणासादिता तत्र भ्रममाणा इतस्ततः
naṁdinyuvāca ahaṁ gatā mahāraṇye hyadya putra yathecchayā vyāghreṇāsāditā tatra bhramamāṇā itastataḥ
नंदिनी ने कहा -- "पुत्र, मैं आज इच्छानुसार महावन में गई थी; इधर-उधर भटकते हुए वहाँ मुझे एक व्याघ्र ने पकड़ लिया।"
श्लोक 10 (skanda.6.51.10)
स मया प्रार्थितः पुत्र भक्षमाणो नखायुधः॥ शपथैरागमिष्यामि गोकुले वीक्ष्य चात्मजम्
sa mayā prārthitaḥ putra bhakṣamāṇo nakhāyudhaḥ śapathairāgamiṣyāmi gokule vīkṣya cātmajam
"पुत्र, नखरूपी शस्त्रधारी उस व्याघ्र से, जब वह मुझे खाने को उद्यत था, मैंने प्रार्थना की और शपथपूर्वक कहा -- 'मैं गोकुल में अपने पुत्र को देखकर लौट आऊँगी।'"
श्लोक 11 (skanda.6.51.11)
साहं तेन विनिर्मुक्ता शपथैर्बहुभिः कृतैः॥ भूयस्तत्रैव यास्यामि दृष्टः संभाषितो भवान्
sāhaṁ tena vinirmuktā śapathairbahubhiḥ kṛtaiḥ bhūyastatraiva yāsyāmi dṛṣṭaḥ saṁbhāṣito bhavān
"इस प्रकार अनेक शपथें करके मैं उससे मुक्त हुई; अब तुम्हें देखकर और तुमसे बातचीत करके मुझे फिर वहीं जाना है।"
श्लोक 12 (skanda.6.51.12)
वत्स उवाच॥ अहं तत्रैव यास्यामि यत्र त्वं हि प्रगच्छसि॥ श्लाघ्यं हि मरणं सम्यङ्मातुरग्रे ममाधुना
vatsa uvāca ahaṁ tatraiva yāsyāmi yatra tvaṁ hi pragacchasi ślāghyaṁ hi maraṇaṁ samyaṅmāturagre mamādhunā
वत्स ने कहा -- "मैं भी वहीं जाऊँगा, जहाँ तुम जाओगी; माता के सामने मरण अब मेरे लिए वास्तव में सराहनीय होगा।"
श्लोक 13 (skanda.6.51.13)
एकाकिनापि मर्तव्यं त्वया हीनेन वै मया॥ विनापि क्षीरपानेन स्वल्पेन समयेन तु
ekākināpi martavyaṁ tvayā hīnena vai mayā vināpi kṣīrapānena svalpena samayena tu
"तुम्हारे बिना अकेला रहकर भी मुझे दूध पीए बिना थोड़े ही समय में मरना है।"
श्लोक 14 (skanda.6.51.14)
यदि मातस्त्वया सार्धं व्याघ्रो मां सूदयिष्यति॥ या गतिर्मातृभक्तानां सा मे नूनं भविष्यति
yadi mātastvayā sārdhaṁ vyāghro māṁ sūdayiṣyati yā gatirmātṛbhaktānāṁ sā me nūnaṁ bhaviṣyati
"माता, यदि व्याघ्र तुम्हारे साथ मुझे भी मार डाले, तो जो गति माता-भक्तों की होती है, वही निश्चय ही मुझे प्राप्त होगी।"
श्लोक 15 (skanda.6.51.15)
अथवा ये त्वया तस्य विहिताः शपथाः शुभे॥ ते संतु मम तिष्ठ त्वं तस्मादत्रैव गोकुले
athavā ye tvayā tasya vihitāḥ śapathāḥ śubhe te saṁtu mama tiṣṭha tvaṁ tasmādatraiva gokule
"अथवा, हे शुभे, जो शपथें तुमने उससे कीं, वे मेरी हो जाएँ; इसलिए तुम इसी गोकुल में रहो।"
श्लोक 16 (skanda.6.51.16)
नास्ति मातृसमो बन्धुर्बालानां क्षीरजीविनाम्॥ नास्ति मातृसमो नाथो नास्ति मातृसमा गतिः
nāsti mātṛsamo bandhurbālānāṁ kṣīrajīvinām nāsti mātṛsamo nātho nāsti mātṛsamā gatiḥ
"दूध पीने वाले बालकों के लिए माता के समान कोई बंधु नहीं है, माता के समान कोई स्वामी नहीं है, माता के समान कोई गति नहीं है।"
श्लोक 17 (skanda.6.51.17)
नास्ति मातृसमः पूज्यो नास्ति मातृसमः सखा॥ नास्ति मातृसमो देव इह लोके परत्र च
nāsti mātṛsamaḥ pūjyo nāsti mātṛsamaḥ sakhā nāsti mātṛsamo deva iha loke paratra ca
"माता के समान कोई पूज्य नहीं है, माता के समान कोई मित्र नहीं है, इस लोक और परलोक में माता के समान कोई देवता नहीं है।"
श्लोक 18 (skanda.6.51.18)
एवं मत्वा सदा मातुः कर्तव्या भक्तिरुत्तमैः॥ तमेनं परमं धर्मं प्रजापतिविनिर्मितम्॥ अनुतिष्ठंति ये पुत्रास्ते यांति परमां गतिम्
evaṁ matvā sadā mātuḥ kartavyā bhaktiruttamaiḥ tamenaṁ paramaṁ dharmaṁ prajāpativinirmitam anutiṣṭhaṁti ye putrāste yāṁti paramāṁ gatim
"ऐसा जानकर श्रेष्ठ पुरुषों को सदा माता की भक्ति करनी चाहिए; प्रजापति द्वारा रचित इस परम धर्म का जो पुत्र पालन करते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।"
श्लोक 19 (skanda.6.51.19)
तस्मादहं गमिष्यामि त्वं च तिष्ठात्र गोकुले॥ आत्मप्राणैस्तव प्राणान्रक्षयिष्याम्यसंशयम्
tasmādahaṁ gamiṣyāmi tvaṁ ca tiṣṭhātra gokule ātmaprāṇaistava prāṇānrakṣayiṣyāmyasaṁśayam
"इसलिए मैं जाऊँगा, तुम यहीं गोकुल में रहो; अपने प्राणों से मैं तुम्हारे प्राणों की निश्चय ही रक्षा करूँगा।"
श्लोक 20 (skanda.6.51.20)
नंदिन्युवाच॥ ममैव विहितो मृत्युर्न ते पुत्राद्य वासरे॥ तत्कथं मम जीवं त्वं रक्षस्यसुभिरात्मनः
naṁdinyuvāca mamaiva vihito mṛtyurna te putrādya vāsare tatkathaṁ mama jīvaṁ tvaṁ rakṣasyasubhirātmanaḥ
नंदिनी ने कहा -- "पुत्र, आज मृत्यु तो मेरे लिए ही नियत है, तुम्हारे लिए नहीं; तो तुम अपने प्राणों से मेरे प्राण की रक्षा कैसे कर सकते हो?"
श्लोक 21 (skanda.6.51.21)
अपश्चिममिदं पुत्र मातृसंदिष्टमुत्तमम्॥ त्वया कार्यं प्रयत्नेन मद्वाक्यमनुतिष्ठता
apaścimamidaṁ putra mātṛsaṁdiṣṭamuttamam tvayā kāryaṁ prayatnena madvākyamanutiṣṭhatā
"पुत्र, यह मेरा अंतिम और सर्वोत्तम आदेश है; मेरे वचन का पालन करते हुए इसे तुम्हें प्रयत्नपूर्वक करना है।"
श्लोक 22 (skanda.6.51.22)
भ्रममाणो वने पुत्र मा प्रमादं करिष्यसि॥ लोभात्संजायते नाश इहलोके परत्र च
bhramamāṇo vane putra mā pramādaṁ kariṣyasi lobhātsaṁjāyate nāśa ihaloke paratra ca
"पुत्र, वन में भटकते समय कभी प्रमाद मत करना; लोभ से इस लोक और परलोक दोनों में विनाश होता है।"
श्लोक 23 (skanda.6.51.23)
समुद्रमटवीं युद्धं विशंते लोभमोहिताः॥ इह तन्नास्ति लोभेन यत्र कुर्वंति मानवाः
samudramaṭavīṁ yuddhaṁ viśaṁte lobhamohitāḥ iha tannāsti lobhena yatra kurvaṁti mānavāḥ
"लोभ से मोहित होकर मनुष्य समुद्र, वन और युद्ध में प्रवेश करते हैं; लोभ के कारण मनुष्य ऐसा कुछ भी नहीं छोड़ते, जो न करें।"
श्लोक 24 (skanda.6.51.24)
लोभात्प्रमादाद्विश्रंभात्पुरुषो वध्यते त्रिभिः॥ तस्माल्लोभो न कर्तव्यो न प्रमादो न विश्वसेत्
lobhātpramādādviśraṁbhātpuruṣo vadhyate tribhiḥ tasmāllobho na kartavyo na pramādo na viśvaset
"मनुष्य लोभ, प्रमाद और अति विश्वास -- इन तीनों से नष्ट होता है; इसलिए लोभ नहीं करना चाहिए, प्रमाद नहीं करना चाहिए और अंधविश्वास नहीं करना चाहिए।"
श्लोक 25 (skanda.6.51.25)
आत्मा पुत्र त्वया रक्ष्यः सर्वदैव प्रयत्नतः॥ सर्वेभ्यः श्वापदेभ्यश्च भ्रमता गहने वने
ātmā putra tvayā rakṣyaḥ sarvadaiva prayatnataḥ sarvebhyaḥ śvāpadebhyaśca bhramatā gahane vane
"पुत्र, घने वन में भटकते समय तुम्हें सभी हिंसक पशुओं से सदा प्रयत्नपूर्वक अपनी रक्षा करनी चाहिए।"
श्लोक 26 (skanda.6.51.26)
विषमस्थं तृणान्नाद्यं कथंचित्पुत्रक त्वया॥ नैकाकिना प्रगंतव्यं यूथं त्यक्त्वा निजं क्वचित्
viṣamasthaṁ tṛṇānnādyaṁ kathaṁcitputraka tvayā naikākinā pragaṁtavyaṁ yūthaṁ tyaktvā nijaṁ kvacit
"हे पुत्रक, तुम्हें किसी भी प्रकार विषम स्थान की घास कभी नहीं खानी चाहिए, और अपने झुंड को छोड़कर कभी अकेले नहीं जाना चाहिए।"
श्लोक 27 (skanda.6.51.27)
एवं संभाष्य तं वत्समवलिह्य मुहुर्मुहुः॥ शोकेन महताविष्टा बाष्पव्याकुललोचना
evaṁ saṁbhāṣya taṁ vatsamavalihya muhurmuhuḥ śokena mahatāviṣṭā bāṣpavyākulalocanā
इस प्रकार उस वत्स से बातचीत करके और उसे बार-बार चाटकर, महाशोक से आविष्ट और आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाली नंदिनी,
श्लोक 28 (skanda.6.51.28)
ततः सखीजनं सर्वं गता द्रष्टुं द्विजोत्तमाः॥ नन्दिनीं पुत्रशोकेन पीडितांगी सुविह्वला
tataḥ sakhījanaṁ sarvaṁ gatā draṣṭuṁ dvijottamāḥ nandinīṁ putraśokena pīḍitāṁgī suvihvalā
हे द्विजोत्तमो, पुत्रशोक से पीड़ित अंगों वाली और अत्यंत व्याकुल नंदिनी अपने सभी सखीजनों को देखने गई।
श्लोक 29 (skanda.6.51.29)
ततः प्रोवाच ताः सर्वा गत्वाऽरण्यं द्विजोत्तमाः॥ चरंतीः स्वेच्छया हृष्टा वांछितानि तृणानि ताः
tataḥ provāca tāḥ sarvā gatvā'raṇyaṁ dvijottamāḥ caraṁtīḥ svecchayā hṛṣṭā vāṁchitāni tṛṇāni tāḥ
हे द्विजोत्तमो, तब वन में जाकर, इच्छानुसार प्रसन्नतापूर्वक इच्छित घास चरती हुई उन सब गायों से उसने कहा --
श्लोक 30 (skanda.6.51.30)
बहुले चंपके दामे वसुधारे घटस्रवे॥ हंसनादि प्रियानंदे शुभक्षीरे महोदये
bahule caṁpake dāme vasudhāre ghaṭasrave haṁsanādi priyānaṁde śubhakṣīre mahodaye
"बहुला, चंपका, दामा, वसुधारा, घटस्रवा, हंसनादा, प्रियानंदा, शुभक्षीरा और महोदया,
श्लोक 31 (skanda.6.51.31)
तथान्या धेनवो याश्च संस्थिता गोकुलांतिके॥ शृण्वंतु वचनं मह्यं कुर्वंतु च ततः परम्॥ अद्याहं निजयूथस्य भ्रमंती नातिदूरतः
tathānyā dhenavo yāśca saṁsthitā gokulāṁtike śṛṇvaṁtu vacanaṁ mahyaṁ kurvaṁtu ca tataḥ param adyāhaṁ nijayūthasya bhramaṁtī nātidūrataḥ
और गोकुल के समीप रहने वाली अन्य सभी गायों को -- सबको मेरी बात सुननी चाहिए और फिर उसका पालन करना चाहिए। 'आज मैं अपने झुंड से अधिक दूर न जाकर,
श्लोक 32 (skanda.6.51.32)
ततश्च गहनं प्राप्ता वनं मानुषवर्जितम्॥ व्याघ्रेणासादिता तत्र भ्रमंती तृणवांछया
tataśca gahanaṁ prāptā vanaṁ mānuṣavarjitam vyāghreṇāsāditā tatra bhramaṁtī tṛṇavāṁchayā
मैं उस घने वन में पहुँच गई, जो मनुष्यों से रहित था, और घास की इच्छा से वहाँ भटकते हुए मुझे एक व्याघ्र ने पकड़ लिया।'
श्लोक 33 (skanda.6.51.33)
युष्माकं दर्शनार्थाय सुतसंभाषणाय च॥ संप्राप्ता शपथैः कृच्छ्रात्तं विश्वास्य नखायुधम्
yuṣmākaṁ darśanārthāya sutasaṁbhāṣaṇāya ca saṁprāptā śapathaiḥ kṛcchrāttaṁ viśvāsya nakhāyudham
'तुम्हारे दर्शन के लिए और पुत्र से बातचीत के लिए, बड़ी कठिनाई से शपथें देकर, उस नखधारी को विश्वास दिलाकर मैं यहाँ आई हूँ।'
श्लोक 34 (skanda.6.51.34)
दृष्टः संभाषितः पुत्रः शासितश्च मया हि सः॥ अधुना भवतीनां च प्रदत्तः पुत्रको यथा
dṛṣṭaḥ saṁbhāṣitaḥ putraḥ śāsitaśca mayā hi saḥ adhunā bhavatīnāṁ ca pradattaḥ putrako yathā
'मैंने अपने पुत्र को देखा, उससे बातें कीं और उसे शिक्षा दी; अब वह तुम सबको सौंपा गया है, मानो वह तुम्हारा ही पुत्र हो।'
श्लोक 35 (skanda.6.51.35)
अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि भवतीनां मया कृतम्॥ यत्किंचिद्दुष्कृतं भद्रास्तत्क्षंतव्यं प्रसादतः
ajñānājjñānato vāpi bhavatīnāṁ mayā kṛtam yatkiṁcidduṣkṛtaṁ bhadrāstatkṣaṁtavyaṁ prasādataḥ
'हे कल्याणियो, अज्ञानवश या जानते हुए मैंने तुम्हारे प्रति जो भी दुष्कृत्य किया हो, वह कृपापूर्वक क्षमा किया जाए।'
श्लोक 36 (skanda.6.51.36)
अनाथो ह्यबलो दीनः क्षीरपो मम बालकः॥ मातृशोकाभिसंतप्तः पाल्यः सर्वाभिरेव सः
anātho hyabalo dīnaḥ kṣīrapo mama bālakaḥ mātṛśokābhisaṁtaptaḥ pālyaḥ sarvābhireva saḥ
'मेरा बालक अनाथ, असहाय, दीन, अभी दूध पीने वाला और माता के शोक से संतप्त है; उसकी रक्षा तुम सबको करनी है।'
श्लोक 37 (skanda.6.51.37)
भ्रममाणोऽसमे स्थाने व्रजमानोऽन्यगोकुले॥ अकार्येषु च संसक्तो निवार्यः सर्वदाऽऽदरात्
bhramamāṇo'same sthāne vrajamāno'nyagokule akāryeṣu ca saṁsakto nivāryaḥ sarvadā''darāt
'यदि वह किसी असम्यक् स्थान में भटके, किसी अन्य गोकुल में चला जाए, या अनुचित कार्यों में लग जाए, तो सदा आदरपूर्वक उसे रोकना है।'
श्लोक 38 (skanda.6.51.38)
अहं तत्र गमिष्यामि स व्याघ्रो यत्र संस्थितः॥ अपश्चिमप्रणामोऽयं सर्वासां विहितो मया
ahaṁ tatra gamiṣyāmi sa vyāghro yatra saṁsthitaḥ apaścimapraṇāmo'yaṁ sarvāsāṁ vihito mayā
'मैं अब वहीं जाऊँगी, जहाँ वह व्याघ्र स्थित है; यह मेरा अंतिम प्रणाम तुम सबको समर्पित है।'
श्लोक 39 (skanda.6.51.39)
धेनव ऊचुः॥ न गंतव्यं त्वया तत्र कथंचिदपि नंदिनि॥ आपद्धर्मं न वेत्सि त्वं नूनं येन प्रगच्छसि
dhenava ūcuḥ na gaṁtavyaṁ tvayā tatra kathaṁcidapi naṁdini āpaddharmaṁ na vetsi tvaṁ nūnaṁ yena pragacchasi
गायों ने कहा -- "हे नंदिनी, तुम्हें किसी भी प्रकार वहाँ नहीं जाना चाहिए; निश्चय ही तुम आपद्धर्म को नहीं जानतीं, इसीलिए ऐसा करने चल पड़ी हो।"
श्लोक 40 (skanda.6.51.40)
न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु जातिर्न विवाहकाले॥ प्राणात्यये सर्वधनापहारे पंचानृतान्याहुरपातकानि
na narmayuktaṁ vacanaṁ hinasti na strīṣu jātirna vivāhakāle prāṇātyaye sarvadhanāpahāre paṁcānṛtānyāhurapātakāni
"हास्यवश कहा गया वचन सत्य को भंग नहीं करता, न स्त्रियों के विषय में, न जाति के विषय में, न विवाह के समय; प्राणसंकट में और सर्वस्व हरण के समय -- इन पाँच स्थितियों में बोला गया असत्य पाप नहीं माना जाता।"
श्लोक 41 (skanda.6.51.41)
तस्मात्तत्र न गंतव्यं दोषो नास्त्यत्र ते शुभे॥ पालयस्व निजं पुत्रं व्रजास्माभिर्निजं गृहम्
tasmāttatra na gaṁtavyaṁ doṣo nāstyatra te śubhe pālayasva nijaṁ putraṁ vrajāsmābhirnijaṁ gṛham
"इसलिए वहाँ नहीं जाना चाहिए, हे शुभे, इसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं है; अपने पुत्र की रक्षा करो और हमारे साथ अपने घर चलो।"
श्लोक 42 (skanda.6.51.42)
नंदिन्युवाच॥ परेषां प्राणयात्रार्थं तत्कर्तुं युज्यते शुभाः॥ आत्मप्राणहितार्थाय न साधूनां प्रशस्यते
naṁdinyuvāca pareṣāṁ prāṇayātrārthaṁ tatkartuṁ yujyate śubhāḥ ātmaprāṇahitārthāya na sādhūnāṁ praśasyate
नंदिनी ने कहा -- "हे शुभाओ, दूसरों के प्राण बचाने के लिए ऐसा करना उचित है; परंतु केवल अपने प्राणों के हित के लिए ऐसा करना साधुजनों में प्रशंसनीय नहीं माना जाता।"
श्लोक 43 (skanda.6.51.43)
सत्ये प्रतिष्ठितो लोको धर्मः सत्ये प्रतिष्ठितः॥ उदधिः सत्यवाक्येन मर्यादां न विलंघयेत्
satye pratiṣṭhito loko dharmaḥ satye pratiṣṭhitaḥ udadhiḥ satyavākyena maryādāṁ na vilaṁghayet
"संसार सत्य पर टिका है, धर्म भी सत्य पर टिका है; सत्यवचन के कारण ही समुद्र अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता।"
श्लोक 44 (skanda.6.51.44)
विष्णवे पृथिवीं दत्त्वा बलिः पातालमाश्रितः॥ सत्यवाक्यं समाश्रित्य न निष्क्रामति दैत्यपः
viṣṇave pṛthivīṁ dattvā baliḥ pātālamāśritaḥ satyavākyaṁ samāśritya na niṣkrāmati daityapaḥ
"पृथ्वी विष्णु को दान करके बलि पाताल में चला गया; सत्यवचन का पालन करते हुए वह दैत्यराज वहाँ से बाहर नहीं निकलता।"
श्लोक 45 (skanda.6.51.45)
यः स्वं वाक्यं प्रतिज्ञाय न करोति यथोदितम्॥ किं तेन न कृतं पापं चौरेणाकृत बुद्धिना
yaḥ svaṁ vākyaṁ pratijñāya na karoti yathoditam kiṁ tena na kṛtaṁ pāpaṁ caureṇākṛta buddhinā
"जो अपनी प्रतिज्ञा करके फिर उसे उसी प्रकार पूरा नहीं करता, उसने कौन-सा पाप नहीं किया? वह चोर के समान ही दुर्बुद्धि है।"
श्लोक 46 (skanda.6.51.46)
सख्य ऊचुः॥ त्वं नंदिनि नमस्कार्या सर्वेरपि सुरासुरैः॥ या त्वं सत्यप्रतिष्ठार्थं प्राणांस्त्यजसि दुस्त्यजान्
sakhya ūcuḥ tvaṁ naṁdini namaskāryā sarverapi surāsuraiḥ yā tvaṁ satyapratiṣṭhārthaṁ prāṇāṁstyajasi dustyajān
सखियों ने कहा -- "हे नंदिनी, तुम देवताओं और असुरों दोनों से नमस्कार पाने योग्य हो, क्योंकि सत्य की प्रतिष्ठा के लिए तुम अत्यंत दुस्त्याज्य प्राणों का त्याग कर रही हो।"
श्लोक 47 (skanda.6.51.47)
किं त्वां कल्याणि वक्ष्यामः स्वयं धर्मार्थवादिनीम्॥ सवरेंपि गुणैर्युक्ता नित्यं सत्ये प्रतिष्ठिताम्
kiṁ tvāṁ kalyāṇi vakṣyāmaḥ svayaṁ dharmārthavādinīm savareṁpi guṇairyuktā nityaṁ satye pratiṣṭhitām
"हे कल्याणी, तुम्हें हम क्या कहें, जो स्वयं धर्म और सत्य की वक्ता हो, सभी उत्तम गुणों से युक्त और सदा सत्य में प्रतिष्ठित हो?"
श्लोक 48 (skanda.6.51.48)
तस्माद्गच्छ महाभागे न शोच्यः पुत्रकस्तव॥ भवत्या यद्वयं प्रोक्तास्तत्करिष्याम एव हि
tasmādgaccha mahābhāge na śocyaḥ putrakastava bhavatyā yadvayaṁ proktāstatkariṣyāma eva hi
"इसलिए जाओ, हे महाभागे, तुम्हारे पुत्र के लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं; तुमने जो हमसे कहा है, हम वही करेंगे।"
श्लोक 49 (skanda.6.51.49)
एतत्पुनर्वयं विद्मः सदा सत्यवतां नृणाम्॥ न निष्फलः क्रियारंभः कथंचिदपि जायते
etatpunarvayaṁ vidmaḥ sadā satyavatāṁ nṛṇām na niṣphalaḥ kriyāraṁbhaḥ kathaṁcidapi jāyate
"हम यह भी जानते हैं कि सत्यवादी मनुष्यों का आरंभ किया गया कार्य कभी निष्फल नहीं होता।"
श्लोक 50 (skanda.6.51.50)
सूत उवाच॥ एवं संभाष्य तं सर्वं नंदिनी स्वसखीजनम्॥ प्रस्थिता व्याघ्रमुद्दिश्य पुत्रशोकेन पीडिता
sūta uvāca evaṁ saṁbhāṣya taṁ sarvaṁ naṁdinī svasakhījanam prasthitā vyāghramuddiśya putraśokena pīḍitā
सूत जी ने कहा -- इस प्रकार अपने सभी सखीजनों से बातचीत करके, पुत्रशोक से पीड़ित नंदिनी व्याघ्र की ओर चल पड़ी।
श्लोक 51 (skanda.6.51.51)
शोकाग्निनापि संतप्ता निराशा पुत्रदर्शने॥ वियुक्ता चक्रवाकीव लतेव पतिता तरोः
śokāgnināpi saṁtaptā nirāśā putradarśane viyuktā cakravākīva lateva patitā taroḥ
शोकाग्नि से संतप्त, पुत्र-दर्शन की आशा से रहित, वह अपने साथी से बिछुड़ी चक्रवाकी के समान और वृक्ष से गिरी लता के समान थी।
श्लोक 52 (skanda.6.51.52)
अंधेव दृष्टिनिर्मुक्ता प्रस्खलंती पदेपदे॥ वनाधिदेवताः सर्वाः प्राऽर्थयच्च सुतार्थतः
aṁdheva dṛṣṭinirmuktā praskhalaṁtī padepade vanādhidevatāḥ sarvāḥ prā'rthayacca sutārthataḥ
दृष्टिहीन अंधे के समान पग-पग पर लड़खड़ाती हुई, उसने अपने पुत्र के लिए सभी वनदेवताओं से प्रार्थना की --
श्लोक 53 (skanda.6.51.53)
प्रसुप्तं भ्रममाणं वा मम पुत्रं सुबालकम्॥ वनाधिदेवताः सर्वा रक्षंतु वचनान्मम
prasuptaṁ bhramamāṇaṁ vā mama putraṁ subālakam vanādhidevatāḥ sarvā rakṣaṁtu vacanānmama
"सोता हुआ हो या भटकता हुआ, मेरे उस सुंदर बालक की सभी वनदेवता मेरे वचन से रक्षा करें।"
श्लोक 54 (skanda.6.51.54)
एवं प्रलप्य मनसा संप्राप्ता तत्र यत्र सः॥ आस्ते विस्फूर्जितास्यश्च तीक्ष्णदंष्ट्रो भयावहः
evaṁ pralapya manasā saṁprāptā tatra yatra saḥ āste visphūrjitāsyaśca tīkṣṇadaṁṣṭro bhayāvahaḥ
इस प्रकार मन में विलाप करते हुए वह वहाँ पहुँची, जहाँ फैले हुए मुख वाला, तीक्ष्ण दाढ़ों वाला, भयावह व्याघ्र बैठा था।
श्लोक 55 (skanda.6.51.55)
व्याघ्रः क्षुत्क्षामकण्ठश्च तस्या मार्गावलोककः॥ संरंभाटोपसंयुक्तः सृक्किणी परिलेहयन्
vyāghraḥ kṣutkṣāmakaṇṭhaśca tasyā mārgāvalokakaḥ saṁraṁbhāṭopasaṁyuktaḥ sṛkkiṇī parilehayan
वह व्याघ्र भूख से क्षीणकंठ हुआ, उसके मार्ग की ओर देखता हुआ, क्रोधावेश से युक्त, बार-बार अपने होंठों के कोनों को चाट रहा था।
श्लोक 56 (skanda.6.51.56)
नंदिन्युवाच॥ आगताहं महाव्याघ्र सत्ये च शपथे स्थिता॥ कुरु तृप्तिं यथाकामं मम मांसेन सांप्रतम्
naṁdinyuvāca āgatāhaṁ mahāvyāghra satye ca śapathe sthitā kuru tṛptiṁ yathākāmaṁ mama māṁsena sāṁpratam
नंदिनी ने कहा -- "हे महाव्याघ्र, मैं आ गई हूँ, सत्य और शपथ में स्थिर रहते हुए; अब यथेच्छ मेरे मांस से तृप्ति प्राप्त करो।"
श्लोक 57 (skanda.6.51.57)
तां दृष्ट्वा सोऽपि दुष्टात्मा वैराग्यं परमं गतः॥ सत्याशया पुनः प्राप्ता संत्यज्य प्राणजं भयम्
tāṁ dṛṣṭvā so'pi duṣṭātmā vairāgyaṁ paramaṁ gataḥ satyāśayā punaḥ prāptā saṁtyajya prāṇajaṁ bhayam
उसे देखकर वह दुष्टात्मा भी परम वैराग्य को प्राप्त हुआ, क्योंकि सत्य की आशा से, प्राणों के भय को त्यागकर, वह पुनः लौट आई थी।
श्लोक 58 (skanda.6.51.58)
व्याघ्र उवाच॥ स्वागतं तव कल्याणि सुधेनो सत्यवादिनि॥ न हि सत्यवतां किंचिदशुभं विद्यते क्वचित्
vyāghra uvāca svāgataṁ tava kalyāṇi sudheno satyavādini na hi satyavatāṁ kiṁcidaśubhaṁ vidyate kvacit
व्याघ्र ने कहा -- "हे कल्याणी, हे सत्यवादिनी उत्तम धेनु, तुम्हारा स्वागत है; सत्यवादियों का कभी कुछ भी अशुभ नहीं होता।"
श्लोक 59 (skanda.6.51.59)
त्वयोक्तं शपथैर्भद्रे आगमिष्याम्यहं पुनः॥ तेन मे कौतुकं जातं किमेषा प्रकरिष्यति
tvayoktaṁ śapathairbhadre āgamiṣyāmyahaṁ punaḥ tena me kautukaṁ jātaṁ kimeṣā prakariṣyati
"हे भद्रे, तुमने शपथपूर्वक कहा था 'मैं फिर आऊँगी'; इससे मुझे कौतूहल हुआ कि यह क्या करेगी।"
श्लोक 60 (skanda.6.51.60)
सोऽहं भद्रे दुराचारो नृशंसो जीवघातकः॥ यास्यामि नरकं घोरं कर्मणानेन सर्वदा
so'haṁ bhadre durācāro nṛśaṁso jīvaghātakaḥ yāsyāmi narakaṁ ghoraṁ karmaṇānena sarvadā
"हे भद्रे, मैं दुराचारी, क्रूर और जीवों का घातक हूँ; इसी कर्म के कारण मैं सदा घोर नरक में जाऊँगा।"
श्लोक 61 (skanda.6.51.61)
तस्मात्त्वं मे महाभागे पापास्यातिदुरात्मनः॥ उपदेशप्रदानेन प्रसादं कर्तुमर्हसि
tasmāttvaṁ me mahābhāge pāpāsyātidurātmanaḥ upadeśapradānena prasādaṁ kartumarhasi
"इसलिए, हे महाभागे, अत्यंत पापी और दुरात्मा मुझ पर उपदेश देकर तुम्हें कृपा करनी चाहिए।"
श्लोक 62 (skanda.6.51.62)
येन मे स्यात्परं श्रेय इह लोके परत्र च॥ न तेऽस्त्यविदितं किंचित्सत्याचारान्मतिर्मम
yena me syātparaṁ śreya iha loke paratra ca na te'styaviditaṁ kiṁcitsatyācārānmatirmama
"जिससे मुझे इस लोक और परलोक में परम कल्याण प्राप्त हो; तुम्हें कुछ भी अज्ञात नहीं है, और मेरा मन सदाचार में लगा है।"
श्लोक 63 (skanda.6.51.63)
तस्मात्त्वं धर्मसर्वस्वं संक्षेपान्मम कीर्तय॥ सत्संगमफलं येन मम संजायतेऽखिलम्
tasmāttvaṁ dharmasarvasvaṁ saṁkṣepānmama kīrtaya satsaṁgamaphalaṁ yena mama saṁjāyate'khilam
"इसलिए तुम मुझे संक्षेप में धर्म का सर्वस्व बताओ, जिससे सत्संग का संपूर्ण फल मुझे प्राप्त हो।"
श्लोक 64 (skanda.6.51.64)
नंदिन्युवाच॥ तपः कृते प्रशंसंति त्रेतायां ध्यानमेव च॥ द्वापरे यज्ञयोगं च दानमेकं कलौ युगे॥ सर्वेषामेव दानानां नास्ति दानमतः परम्
naṁdinyuvāca tapaḥ kṛte praśaṁsaṁti tretāyāṁ dhyānameva ca dvāpare yajñayogaṁ ca dānamekaṁ kalau yuge sarveṣāmeva dānānāṁ nāsti dānamataḥ param
नंदिनी ने कहा -- "कृतयुग में तप की, त्रेता में ध्यान की, द्वापर में यज्ञ की, और कलियुग में केवल दान की प्रशंसा की जाती है; परंतु सभी दानों में इससे बढ़कर कोई दान नहीं है --"
श्लोक 65 (skanda.6.51.65)
चराचराणां भूतानामभयं यः प्रयच्छति॥ स सर्वभयनिर्मुक्तः परं ब्रह्मा धिगच्छति
carācarāṇāṁ bhūtānāmabhayaṁ yaḥ prayacchati sa sarvabhayanirmuktaḥ paraṁ brahmā dhigacchati
"जो चराचर प्राणियों को अभय प्रदान करता है, वह सब भयों से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त करता है।"
श्लोक 66 (skanda.6.51.66)
व्याघ्र उवाच॥ अन्येषां चैव भूतानां तद्दानं युज्यते शुभे॥ अहिंसया भवेद्येषां प्राणयात्रान्नपूर्वकम्
vyāghra uvāca anyeṣāṁ caiva bhūtānāṁ taddānaṁ yujyate śubhe ahiṁsayā bhavedyeṣāṁ prāṇayātrānnapūrvakam
व्याघ्र ने कहा -- "हे शुभे, अभयदान अन्य उन प्राणियों के लिए उपयुक्त है, जिनका जीवन-निर्वाह हिंसा के बिना संभव है।"
श्लोक 67 (skanda.6.51.67)
न हिंसया विनाऽस्माकं यतः स्यात्प्राणधारणम्॥ तस्माद्ब्रूहि महाभागे किञ्चिन्मम सुखावहम्॥ उपदेशं सुधर्माय हिंसकस्यापि देहिनाम्
na hiṁsayā vinā'smākaṁ yataḥ syātprāṇadhāraṇam tasmādbrūhi mahābhāge kiñcinmama sukhāvaham upadeśaṁ sudharmāya hiṁsakasyāpi dehinām
"पर हमारे लिए हिंसा के बिना प्राण धारण संभव नहीं है; इसलिए हे महाभागे, मुझ जैसे हिंसक प्राणी के लिए भी कोई सुखकारी सद्धर्म का उपदेश बताओ।"
श्लोक 68 (skanda.6.51.68)
नन्दिन्युवाच॥ अत्रास्ति सुमहल्लिंगं पुरा बाणप्रतिष्ठितम्॥ गहने यत्प्रभावेन त्वया मुक्तास्म्यहं ध्रुवम्
nandinyuvāca atrāsti sumahalliṁgaṁ purā bāṇapratiṣṭhitam gahane yatprabhāvena tvayā muktāsmyahaṁ dhruvam
नंदिनी ने कहा -- "यहाँ बाण द्वारा पूर्वकाल में स्थापित एक अति महान लिंग है; इसी के प्रभाव से मैं इस घने वन में निश्चय ही मुक्त हुई हूँ।"
श्लोक 69 (skanda.6.51.69)
तस्य त्वं प्रातरुत्थाय कुरु नित्यं प्रदक्षिणाम्॥ प्रणामं च ततः सिद्धिं वांछितां समवाप्स्यसि
tasya tvaṁ prātarutthāya kuru nityaṁ pradakṣiṇām praṇāmaṁ ca tataḥ siddhiṁ vāṁchitāṁ samavāpsyasi
"प्रातः उठकर तुम सदा उसकी प्रदक्षिणा करो और प्रणाम करो; तब तुम्हें अपनी इच्छित सिद्धि प्राप्त होगी।"
श्लोक 70 (skanda.6.51.70)
नान्यस्य कर्मणः शक्तिर्विद्यते ते नखायुध॥ पूजादिकस्य हीनत्वाद्धस्ताभ्यामिति मे मतिः
nānyasya karmaṇaḥ śaktirvidyate te nakhāyudha pūjādikasya hīnatvāddhastābhyāmiti me matiḥ
"हे नखायुध, तुम्हारे लिए किसी अन्य कर्म की शक्ति नहीं है, क्योंकि पूजादि के साधन तुम्हारे पास नहीं हैं; अतः हाथों की सहायता के बिना, अपने शरीर से प्रदक्षिणा करना ही मेरे मत में उचित है।"
श्लोक 71 (skanda.6.51.71)
सूत उवाच॥ एवमुक्त्वाथ सा धेनुर्व्याघ्रस्याथ वनांतिके॥ तल्लिंगं दर्शयामास पुरः स्थित्वा द्विजोत्तमाः
sūta uvāca evamuktvātha sā dhenurvyāghrasyātha vanāṁtike talliṁgaṁ darśayāmāsa puraḥ sthitvā dvijottamāḥ
सूत जी ने कहा -- हे द्विजोत्तमो, ऐसा कहकर वह गाय वन के किनारे व्याघ्र के सामने खड़ी होकर उसे वह लिंग दिखलाने लगी।
श्लोक 72 (skanda.6.51.72)
सोऽपि संदर्शनात्तस्य तत्क्षणान्मुक्तिमाप्तवान्॥ व्याघ्रत्वात्पार्थिवो भूयः स बभूव यथा पुरा
so'pi saṁdarśanāttasya tatkṣaṇānmuktimāptavān vyāghratvātpārthivo bhūyaḥ sa babhūva yathā purā
उसके दर्शनमात्र से वह तत्क्षण मुक्ति को प्राप्त हुआ; व्याघ्रत्व से मुक्त होकर वह पूर्ववत् राजा हो गया।
श्लोक 73 (skanda.6.51.73)
शापं दुर्वाससा दत्तं राज्यं स्वं सहितैः सुतैः॥ सस्मार स नृपश्रेष्ठस्ततः प्रोवाच नंदिनीम्
śāpaṁ durvāsasā dattaṁ rājyaṁ svaṁ sahitaiḥ sutaiḥ sasmāra sa nṛpaśreṣṭhastataḥ provāca naṁdinīm
उसे दुर्वासा द्वारा दिया गया शाप, अपना राज्य और अपने पुत्रों की याद आई; तब उस श्रेष्ठ राजा ने नंदिनी से कहा --
श्लोक 74 (skanda.6.51.74)
नृपः कलशनामाहं हैहयान्वयसंभवः॥ शप्तो दुर्वाससा पूर्वं कस्मिंश्चित्कारणांतरे
nṛpaḥ kalaśanāmāhaṁ haihayānvayasaṁbhavaḥ śapto durvāsasā pūrvaṁ kasmiṁścitkāraṇāṁtare
"मैं हैहय वंश में उत्पन्न कलश नामक राजा हूँ; पूर्वकाल में किसी अन्य कारण से दुर्वासा ने मुझे शाप दिया था।"
श्लोक 75 (skanda.6.51.75)
ततः प्रसादितेनोक्तस्तेनाहं नंदिनी यदा॥ दर्शयिष्यति तल्लिंगं तदा मुक्तिर्भविष्यति
tataḥ prasāditenoktastenāhaṁ naṁdinī yadā darśayiṣyati talliṁgaṁ tadā muktirbhaviṣyati
"तब प्रसन्न होकर उन्होंने मुझसे कहा था कि जब नंदिनी नामक गाय मुझे वह लिंग दिखाएगी, तभी मुझे मुक्ति मिलेगी।"
श्लोक 76 (skanda.6.51.76)
सा नूनं नन्दिनी त्वं हि ज्ञाता शापान्ततो मया॥ तत्त्वं ब्रूहि प्रदेशोऽयं कतमो वरधेनुके
sā nūnaṁ nandinī tvaṁ hi jñātā śāpāntato mayā tattvaṁ brūhi pradeśo'yaṁ katamo varadhenuke
"निश्चय ही तुम वही नंदिनी हो -- अब उस शाप से मैंने तुम्हें पहचान लिया है; तो बताओ, हे उत्तम धेनु, यह प्रदेश कौन-सा है?"
श्लोक 77 (skanda.6.51.77)
येन गच्छाम्यहं भूयः स्वगृहं प्रति सत्वरम्॥ मार्गं दृष्ट्वा महाभागे मानुषं प्राप्य कञ्चन
yena gacchāmyahaṁ bhūyaḥ svagṛhaṁ prati satvaram mārgaṁ dṛṣṭvā mahābhāge mānuṣaṁ prāpya kañcana
"जिससे मैं किसी मनुष्य से मार्ग जानकर, हे महाभागे, शीघ्र फिर अपने घर लौट सकूँ।"
श्लोक 78 (skanda.6.51.78)
नंदिन्युवाच॥ चमत्कारपुरक्षेत्रमेतत्पातकनाशनम्॥ सर्वतीर्थमयं राजन्सर्वकामप्रदायकम्
naṁdinyuvāca camatkārapurakṣetrametatpātakanāśanam sarvatīrthamayaṁ rājansarvakāmapradāyakam
नंदिनी ने कहा -- "हे राजन्, यह चमत्कारपुर क्षेत्र सभी पापों का नाश करने वाला है; यह सभी तीर्थों का स्वरूप है और सब कामनाएँ पूर्ण करने वाला है।"
श्लोक 79 (skanda.6.51.79)
यदन्यत्र भवेच्छ्रेयो वत्सरेण तपस्विनाम्॥ दिनेनैवात्र तत्सम्यग्जायते नात्र संशयः
yadanyatra bhavecchreyo vatsareṇa tapasvinām dinenaivātra tatsamyagjāyate nātra saṁśayaḥ
"जो कल्याण तपस्वियों को अन्यत्र एक वर्ष में प्राप्त होता है, वही यहाँ एक ही दिन में पूरी तरह प्राप्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है।"
श्लोक 80 (skanda.6.51.80)
एवं मत्वा मया लिंगं स्नापितं पयसा सदा॥ एतद्यूथं परित्यज्य भक्त्या पूतेन चेतसा
evaṁ matvā mayā liṁgaṁ snāpitaṁ payasā sadā etadyūthaṁ parityajya bhaktyā pūtena cetasā
"यह जानकर मैंने इस झुंड को छोड़कर, भक्तिपूर्वक पवित्र मन से सदा इस लिंग को दूध से स्नान कराया है।"
श्लोक 81 (skanda.6.51.81)
राजोवाच॥ गच्छ नन्दिनि भद्रं ते निजं प्राप्नुहि बालकम्॥ गोकुलं च सखीः स्वाश्च तथान्यं च सुहृज्जनम्
rājovāca gaccha nandini bhadraṁ te nijaṁ prāpnuhi bālakam gokulaṁ ca sakhīḥ svāśca tathānyaṁ ca suhṛjjanam
राजा ने कहा -- "जाओ नंदिनी, तुम्हारा कल्याण हो; अपने बालक को, गोकुल को, अपनी सखियों को और अन्य सुहृदजनों को प्राप्त करो।"
श्लोक 82 (skanda.6.51.82)
एतत्क्षेत्रं मया पूर्वं ब्राह्मणानां मुखाच्छ्रुतम्॥ वांछितं च सदा प्रष्टुं न च द्रष्टुं प्रपारितम्
etatkṣetraṁ mayā pūrvaṁ brāhmaṇānāṁ mukhācchrutam vāṁchitaṁ ca sadā praṣṭuṁ na ca draṣṭuṁ prapāritam
"यह क्षेत्र मैंने पहले ब्राह्मणों के मुख से सुना था और सदा इसके विषय में पूछने की इच्छा रखता था, परंतु देख पाना संभव न हो सका था।"
श्लोक 83 (skanda.6.51.83)
राज्यकर्मप्रसक्तेन भोगासक्तेन नंदिनि॥ स्वयमेवाधुना लब्धं नाहं सन्त्यक्तुमुत्सहे
rājyakarmaprasaktena bhogāsaktena naṁdini svayamevādhunā labdhaṁ nāhaṁ santyaktumutsahe
"हे नंदिनी, राज्यकार्य में लगे रहने और भोगासक्त होने के कारण, अब यह मुझे स्वयं ही प्राप्त हो गया है; मैं इसे छोड़ने में असमर्थ हूँ।"
श्लोक 84 (skanda.6.51.84)
दिष्ट्या मे मुनिना तेन दत्तः शापो महात्मना॥ कथं स्यादन्यथा प्राप्तिः क्षेत्रस्यास्य सुशोभने
diṣṭyā me muninā tena dattaḥ śāpo mahātmanā kathaṁ syādanyathā prāptiḥ kṣetrasyāsya suśobhane
"मेरे लिए यह सौभाग्य है कि उस महात्मा मुनि ने मुझे शाप दिया; अन्यथा, हे सुशोभने, इस क्षेत्र की प्राप्ति कैसे होती?"
श्लोक 85 (skanda.6.51.85)
सूत उवाच॥ एवमुक्त्वा महीपालो नन्दिनीं तां विसृज्य च॥ स्थितस्तत्रैव तल्लिंगं ध्यायमानो दिवानिशम्
sūta uvāca evamuktvā mahīpālo nandinīṁ tāṁ visṛjya ca sthitastatraiva talliṁgaṁ dhyāyamāno divāniśam
सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर राजा ने नंदिनी को विदा किया और स्वयं वहीं रहकर दिन-रात उस लिंग का ध्यान करता रहा।
श्लोक 86 (skanda.6.51.86)
प्रासादं तत्कृते मुख्यं विधायाद्भुतदर्शनम्॥ कैलासशिखराकारं तपस्तेपे तदग्रतः
prāsādaṁ tatkṛte mukhyaṁ vidhāyādbhutadarśanam kailāsaśikharākāraṁ tapastepe tadagrataḥ
उसने उसके लिए अद्भुत दर्शन वाला मुख्य प्रासाद बनवाया, जो कैलास शिखर के समान था, और उसके सामने तपस्या की।
श्लोक 87 (skanda.6.51.87)
ततस्तस्य प्रभावेन स्वल्पैरेव दिनैर्द्विजाः॥ संप्राप्तः परमां सिद्धिं दुर्लभां याज्ञिकैरपि
tatastasya prabhāvena svalpaireva dinairdvijāḥ saṁprāptaḥ paramāṁ siddhiṁ durlabhāṁ yājñikairapi
हे द्विजो, तब उसके प्रभाव से थोड़े ही दिनों में उसने वह परम सिद्धि प्राप्त कर ली, जो याज्ञिकों के लिए भी दुर्लभ है।
श्लोक 88 (skanda.6.51.88)
तत्र यः कार्तिके मासि दीपकं संप्रयच्छति॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते
tatra yaḥ kārtike māsi dīpakaṁ saṁprayacchati sarvapāpavinirmuktaḥ śivaloke mahīyate
वहाँ जो कार्तिक मास में दीपक अर्पित करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर शिवलोक में महिमामंडित होता है।
श्लोक 89 (skanda.6.51.89)
मार्गशीर्षे च सम्प्राप्ते गीतनृत्यादिकं नरः॥ तदग्रे कुरुते भक्त्या स गच्छति परां गतिम्
mārgaśīrṣe ca samprāpte gītanṛtyādikaṁ naraḥ tadagre kurute bhaktyā sa gacchati parāṁ gatim
मार्गशीर्ष मास आने पर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उसके सामने गीत-नृत्य आदि करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 90 (skanda.6.51.90)
एतद्वः सर्वमाख्यातं सर्वपातकनाशनम्॥ कलशेश्वरमाहात्म्यं विस्तरेण द्विजोत्तमाः
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ sarvapātakanāśanam kalaśeśvaramāhātmyaṁ vistareṇa dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, यह सब मैंने तुम्हें विस्तार से बताया -- कलशेश्वर का सर्वपापनाशक माहात्म्य।
श्लोक 91 (skanda.6.51.91)
भक्त्या पठति यश्चैतच्छ्रद्धया परया युतः॥ सोऽपि पापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते
bhaktyā paṭhati yaścaitacchraddhayā parayā yutaḥ so'pi pāpavinirmuktaḥ śivaloke mahīyate
जो इसे परम श्रद्धा के साथ भक्तिपूर्वक पढ़ता है, वह भी पापमुक्त होकर शिवलोक में महिमामंडित होता है।