नागर खण्ड · अध्याय 52
रुद्रकोटि माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.6.52.1)
सूत उवाच॥ उमामहेश्वरौ तत्र स्थापितौ तेन भूभुजा॥ प्रासादं परमं कृत्वा साधुदृष्टिसुखप्रदम्
sūta uvāca umāmaheśvarau tatra sthāpitau tena bhūbhujā prāsādaṁ paramaṁ kṛtvā sādhudṛṣṭisukhapradam
सूत जी ने कहा -- वहाँ उस राजा ने उमा-महेश्वर की स्थापना की और साधुजनों की दृष्टि को सुख देने वाला परम प्रासाद बनवाया।
श्लोक 2 (skanda.6.52.2)
तस्याग्रतः शुभं कुंडं तत्र चैव विनिर्मितम्॥ स्वच्छोदकेन सम्पूर्णं पद्मिनीखंडमंडितम्
tasyāgrataḥ śubhaṁ kuṁḍaṁ tatra caiva vinirmitam svacchodakena sampūrṇaṁ padminīkhaṁḍamaṁḍitam
उसके सामने एक शुभ कुंड भी बनवाया गया, जो स्वच्छ जल से पूर्ण और कमलों के समूह से सुशोभित था।
श्लोक 3 (skanda.6.52.3)
स्नात्वा तत्र नरो भक्त्या तौ पश्येद्यः समाहितः॥ माघशुक्लचतुर्दश्यां न स भूयोऽत्र जायते
snātvā tatra naro bhaktyā tau paśyedyaḥ samāhitaḥ māghaśuklacaturdaśyāṁ na sa bhūyo'tra jāyate
जो मनुष्य वहाँ स्नान करके भक्तिपूर्वक समाहित मन से माघ शुक्ल चतुर्दशी को उन दोनों का दर्शन करता है, वह फिर यहाँ जन्म नहीं लेता।
श्लोक 4 (skanda.6.52.4)
तस्यैव पूर्वदिग्भागेऽगस्त्यकुण्डसमीपतः॥ अस्ति वापी महापुण्या सर्वपातकनाशिनी
tasyaiva pūrvadigbhāge'gastyakuṇḍasamīpataḥ asti vāpī mahāpuṇyā sarvapātakanāśinī
उसी के पूर्व दिशा में, अगस्त्यकुंड के समीप, एक अत्यंत पुण्यमयी बावड़ी है, जो सभी पापों का नाश करने वाली है।
श्लोक 5 (skanda.6.52.5)
तस्यां यः कुरुते स्नानं मासि वै फाल्गुने नरः॥ सोपवासः सिताष्टम्यां वांछितं लभते च सः
tasyāṁ yaḥ kurute snānaṁ māsi vai phālgune naraḥ sopavāsaḥ sitāṣṭamyāṁ vāṁchitaṁ labhate ca saḥ
जो मनुष्य फाल्गुन मास में शुक्ल अष्टमी को उपवास करके वहाँ स्नान करता है, वह इच्छित फल प्राप्त करता है।
श्लोक 6 (skanda.6.52.6)
तस्या दक्षिणदिग्भागे तत्रास्ति कपिला नदी॥ कपिलो यत्र संप्राप्तः सिद्धिं सांख्यसमुद्भवाम्
tasyā dakṣiṇadigbhāge tatrāsti kapilā nadī kapilo yatra saṁprāptaḥ siddhiṁ sāṁkhyasamudbhavām
उसके दक्षिण दिशा में कपिला नामक नदी है, जहाँ कपिल मुनि ने सांख्य से उत्पन्न सिद्धि प्राप्त की थी।
श्लोक 7 (skanda.6.52.7)
कपिलायाश्च पूर्वेण सिद्धक्षेत्रं प्रकीर्तितम्॥ यत्र सिद्धिं गताः सिद्धाः पुरा शत सहस्रशः
kapilāyāśca pūrveṇa siddhakṣetraṁ prakīrtitam yatra siddhiṁ gatāḥ siddhāḥ purā śata sahasraśaḥ
कपिला के पूर्व में सिद्धक्षेत्र नामक स्थान प्रसिद्ध है, जहाँ पूर्वकाल में सैकड़ों-हजारों सिद्ध सिद्धि को प्राप्त हुए थे।
श्लोक 8 (skanda.6.52.8)
यो यं काममभिध्याय तपस्तत्र समाचरेत्॥ षण्मासाभ्यंतरे नूनं स तमाप्नोति मानवः
yo yaṁ kāmamabhidhyāya tapastatra samācaret ṣaṇmāsābhyaṁtare nūnaṁ sa tamāpnoti mānavaḥ
जो मनुष्य किसी कामना का ध्यान करके वहाँ तपस्या करता है, वह छह मास के भीतर निश्चय ही उसे प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 9 (skanda.6.52.9)
तस्याधस्ताच्छिला विप्रा विद्यते वैष्णवी शुभा॥ भ्रमन्ती चतुरस्रा च सर्वपातकनाशिनी
tasyādhastācchilā viprā vidyate vaiṣṇavī śubhā bhramantī caturasrā ca sarvapātakanāśinī
हे विप्रो, उसके नीचे एक शुभ वैष्णवी शिला है, चतुष्कोण और गतिशील, जो सब पापों का नाश करने वाली है।
श्लोक 10 (skanda.6.52.10)
सदा महानदीतोयक्षालिता मुक्तिदा नृणाम्॥ गंगायमुनयोर्मध्ये संनिविष्टा सरस्वती
sadā mahānadītoyakṣālitā muktidā nṛṇām gaṁgāyamunayormadhye saṁniviṣṭā sarasvatī
महानदी के जल से सदा धुली हुई और मनुष्यों को मुक्ति देने वाली सरस्वती गंगा और यमुना के मध्य विराजमान है।
श्लोक 11 (skanda.6.52.11)
त्रिवेणी वहते तस्याः पुरतो भुक्तिमुक्तिदा॥ तस्यामुपरि दग्धानां ब्राह्मणानां विशेषतः
triveṇī vahate tasyāḥ purato bhuktimuktidā tasyāmupari dagdhānāṁ brāhmaṇānāṁ viśeṣataḥ
उसके सामने त्रिवेणी बहती है, जो भुक्ति और मुक्ति दोनों देने वाली है। विशेष रूप से जो ब्राह्मण उस पर दाह-संस्कार पाते हैं,
श्लोक 12 (skanda.6.52.12)
नूनं मुक्तिर्भवेत्तेषां चिता भस्मनि गोष्पदम्॥ दृश्यते तत्र तज्ज्ञात्वा संस्कार्या ब्राह्मणा मृताः
nūnaṁ muktirbhavetteṣāṁ citā bhasmani goṣpadam dṛśyate tatra tajjñātvā saṁskāryā brāhmaṇā mṛtāḥ
उन्हें निश्चय ही मुक्ति प्राप्त होती है -- वहाँ चिता की भस्म में गाय के खुर का चिह्न दिखाई देता है; यह जानकर मृत ब्राह्मणों का दाह-संस्कार वहाँ करना चाहिए।
श्लोक 13 (skanda.6.52.13)
तस्यैवोत्तरदिग्भागे रुद्रकोटिर्द्विजोत्तमाः॥ अस्ति संपूजिता विप्रैर्दाक्षिणात्यैर्महात्मभिः
tasyaivottaradigbhāge rudrakoṭirdvijottamāḥ asti saṁpūjitā viprairdākṣiṇātyairmahātmabhiḥ
हे द्विजोत्तमो, उसी के उत्तर दिशा में रुद्रकोटि नामक स्थान है, जो महात्मा दाक्षिणात्य ब्राह्मणों द्वारा भलीभाँति पूजित है।
श्लोक 14 (skanda.6.52.14)
महायोगिस्वरूपेण दाक्षिणात्या द्विजोत्तमाः॥ चमत्कारपुरे क्षेत्रे श्रुत्वा स्वयमुमापतिम्
mahāyogisvarūpeṇa dākṣiṇātyā dvijottamāḥ camatkārapure kṣetre śrutvā svayamumāpatim
हे द्विजोत्तमो, दाक्षिणात्य ब्राह्मणों ने सुना कि उमापति स्वयं महायोगी के रूप में चमत्कारपुर क्षेत्र में विराजमान हैं,
श्लोक 15 (skanda.6.52.15)
ततः कौतूहलाविष्टाः श्रद्धया परया युताः॥ कोटिसंख्या द्रुतं जग्मुस्तस्य दर्शनवांछया
tataḥ kautūhalāviṣṭāḥ śraddhayā parayā yutāḥ koṭisaṁkhyā drutaṁ jagmustasya darśanavāṁchayā
तब कौतूहल से युक्त और परम श्रद्धा से भरे वे करोड़ों की संख्या में उनके दर्शन की इच्छा से शीघ्र वहाँ पहुँचे।
श्लोक 16 (skanda.6.52.16)
अहंपूर्वमहंपूर्वं वीक्षयिष्यामि तं हरम्॥ इति श्रद्धासमोपेताश्चक्रुस्ते शपथं गताः
ahaṁpūrvamahaṁpūrvaṁ vīkṣayiṣyāmi taṁ haram iti śraddhāsamopetāścakruste śapathaṁ gatāḥ
'मैं पहले, मैं पहले उस हर का दर्शन करूँगा' -- इस प्रकार समान श्रद्धा से युक्त होकर उन्होंने आपस में यह शपथ ली --
श्लोक 17 (skanda.6.52.17)
एतेषां मध्यतो यस्तं महायोगिनमीश्वरम्॥ चरमं देवमीक्षेत भविष्यति स पापकृत्
eteṣāṁ madhyato yastaṁ mahāyoginamīśvaram caramaṁ devamīkṣeta bhaviṣyati sa pāpakṛt
'इनमें से जो अंत में उस महायोगीश्वर देव का दर्शन करेगा, वह पापी माना जाएगा।'
श्लोक 18 (skanda.6.52.18)
ततस्तेषामभिप्रायं ज्ञात्वा देवो महेश्वरः॥ भक्तिप्रीतो हितार्थाय कोटिरूपैर्व्यवस्थितः
tatasteṣāmabhiprāyaṁ jñātvā devo maheśvaraḥ bhaktiprīto hitārthāya koṭirūpairvyavasthitaḥ
तब उनका अभिप्राय जानकर महेश्वर देव, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, उनके हित के लिए करोड़ों रूपों में स्थित हो गए।
श्लोक 19 (skanda.6.52.19)
हेलया दर्शनं प्राप्तः सर्वेषां द्विजसत्तमाः॥ ततः प्रभृति तत्स्थानं रुद्रकोटीतिविश्रुतम्
helayā darśanaṁ prāptaḥ sarveṣāṁ dvijasattamāḥ tataḥ prabhṛti tatsthānaṁ rudrakoṭītiviśrutam
हे द्विजसत्तमो, उन्होंने बिना किसी कठिनाई के सभी को अपना दर्शन दिया; तभी से वह स्थान रुद्रकोटि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 20 (skanda.6.52.20)
तदर्थं पठितः श्लोको नारदेन पुरा द्विजाः॥ रुद्रावर्तं समालोक्य प्रहृष्टेन द्विजोत्तमाः
tadarthaṁ paṭhitaḥ śloko nāradena purā dvijāḥ rudrāvartaṁ samālokya prahṛṣṭena dvijottamāḥ
हे द्विजो, इस विषय में पूर्वकाल में नारद द्वारा रुद्रावर्त का दर्शन करके प्रसन्नतापूर्वक एक श्लोक कहा गया था --
श्लोक 21 (skanda.6.52.21)
आषाढीं कार्तिकीं माघीं तथा चैत्रसमुद्भवाम्॥ धन्याः पृथिव्यां लप्स्यंते रुद्रावर्ते चतुर्दशीम्
āṣāḍhīṁ kārtikīṁ māghīṁ tathā caitrasamudbhavām dhanyāḥ pṛthivyāṁ lapsyaṁte rudrāvarte caturdaśīm
"'आषाढ़, कार्तिक, माघ अथवा चैत्र में जो रुद्रावर्त में चतुर्दशी को पाते हैं, वे पृथ्वी पर धन्य हैं।'"
श्लोक 22 (skanda.6.52.22)
आजन्मशतसाहस्रं कृत्वा पापं नरः क्षितौ॥ रुद्रावर्तं समालोक्य विपाप्मत्वं प्रपद्यते
ājanmaśatasāhasraṁ kṛtvā pāpaṁ naraḥ kṣitau rudrāvartaṁ samālokya vipāpmatvaṁ prapadyate
"'पृथ्वी पर जन्म से लेकर लाखों पाप करने वाला मनुष्य भी रुद्रावर्त का दर्शन करके पापरहित हो जाता है।'"
श्लोक 23 (skanda.6.52.23)
रुद्रावर्त्ते नरो गत्वा दृष्ट्वा योगेश्वरं हरम्॥ शुक्लपक्षे चतुर्दश्यां विपाप्मा जायते ध्रुवम्
rudrāvartte naro gatvā dṛṣṭvā yogeśvaraṁ haram śuklapakṣe caturdaśyāṁ vipāpmā jāyate dhruvam
"'जो मनुष्य रुद्रावर्त में जाकर शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को योगेश्वर हर का दर्शन करता है, वह निश्चय ही पापरहित हो जाता है।'"
श्लोक 24 (skanda.6.52.24)
यस्तत्र कुरुते श्राद्धं महायोगिपुरे द्विजाः॥ रुद्रावर्ते स चाप्नोति फलं शतमखोद्भवम्
yastatra kurute śrāddhaṁ mahāyogipure dvijāḥ rudrāvarte sa cāpnoti phalaṁ śatamakhodbhavam
"'हे द्विजो, जो महायोगिपुर में वहाँ श्राद्ध करता है, वह रुद्रावर्त में सौ यज्ञों से उत्पन्न फल प्राप्त करता है।'"
श्लोक 25 (skanda.6.52.25)
उपवासपरो भूत्वा यः कुर्याद्रात्रिजागरम्॥ कामगेन विमानेन स स्वर्गे याति मानवः
upavāsaparo bhūtvā yaḥ kuryādrātrijāgaram kāmagena vimānena sa svarge yāti mānavaḥ
"'जो उपवास करके रात्रि-जागरण करता है, वह मनुष्य इच्छानुसार चलने वाले विमान से स्वर्ग को जाता है।'"
श्लोक 26 (skanda.6.52.26)
तत्र यः कपिलां दद्याद्ब्राह्मणायाहिताग्नये॥ स गणः स्यान्न संदेहो हरस्य दयितस्तथा
tatra yaḥ kapilāṁ dadyādbrāhmaṇāyāhitāgnaye sa gaṇaḥ syānna saṁdeho harasya dayitastathā
"'जो वहाँ अग्निहोत्री ब्राह्मण को कपिला गाय दान करता है, वह निश्चय ही गण बनता है और हर का प्रिय होता है।'"
श्लोक 27 (skanda.6.52.27)
षडक्षरं जपेद्यस्तु महायोगिपुरः स्थितः॥ मंत्रं तस्य भवेच्छ्रेयः षङ्गुणं राजसूयतः
ṣaḍakṣaraṁ japedyastu mahāyogipuraḥ sthitaḥ maṁtraṁ tasya bhavecchreyaḥ ṣaṅguṇaṁ rājasūyataḥ
"'जो महायोगिपुर के सामने खड़ा होकर षडक्षर मंत्र का जप करता है, उसे राजसूय यज्ञ से छह गुना श्रेय प्राप्त होता है।'"
श्लोक 28 (skanda.6.52.28)
यस्तस्य पुरतो भक्त्या जपेद्वा शतरुद्रियम्॥ चतुर्णामपि वेदानां सोऽधीतानां भजेत्फलम्
yastasya purato bhaktyā japedvā śatarudriyam caturṇāmapi vedānāṁ so'dhītānāṁ bhajetphalam
"'जो उसके सामने भक्तिपूर्वक शतरुद्रिय का जप करता है, वह चारों वेदों के अध्ययन का फल प्राप्त करता है।'"
श्लोक 29 (skanda.6.52.29)
गीतं वा यदि वा नृत्यं तत्पुरः कुरुते नरः॥ स सर्वेषां भजेच्छ्रेयो मखानां नात्र संशयः
gītaṁ vā yadi vā nṛtyaṁ tatpuraḥ kurute naraḥ sa sarveṣāṁ bhajecchreyo makhānāṁ nātra saṁśayaḥ
"'जो मनुष्य उसके सामने गीत अथवा नृत्य करता है, वह सभी यज्ञों का फल प्राप्त करता है, इसमें संदेह नहीं है।'"
श्लोक 30 (skanda.6.52.30)
एवमुक्त्वा द्विजश्रेष्ठाः स मुनिर्ब्रह्मसंभवः॥ विरराम ततो हृष्टस्तीर्थयात्रां गतो द्रुतम्
evamuktvā dvijaśreṣṭhāḥ sa munirbrahmasaṁbhavaḥ virarāma tato hṛṣṭastīrthayātrāṁ gato drutam
हे द्विजश्रेष्ठो, ऐसा कहकर वह ब्रह्मा से उत्पन्न मुनि (नारद) चुप हो गए, और फिर प्रसन्न होकर शीघ्र तीर्थयात्रा पर चले गए।