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नागर खण्ड · अध्याय 53

भ्रूणगर्ता माहात्म्य और राजा सौदास की मुक्ति

अध्याय 52अध्याय-सूचीअध्याय 54

श्लोक 1 (skanda.6.53.1)

सूत उवाच॥ तत्रैवोज्जयनीपीठमस्ति कामप्रदं नृणाम्॥ प्रभूताश्चर्यसंयुक्तं बहुसिद्धनिषेवितम्

sūta uvāca tatraivojjayanīpīṭhamasti kāmapradaṁ nṛṇām prabhūtāścaryasaṁyuktaṁ bahusiddhaniṣevitam

सूत जी ने कहा -- वहीं मनुष्यों की कामनाएँ पूर्ण करने वाला उज्जयनी पीठ है, जो अनेक आश्चर्यों से युक्त और बहुत से सिद्धों द्वारा सेवित है।

श्लोक 2 (skanda.6.53.2)

यस्य मध्यगतो नित्यं स्वयमेव महेश्वरः॥ महाकालस्वरूपेण स तिष्ठति द्विजोत्तमाः

yasya madhyagato nityaṁ svayameva maheśvaraḥ mahākālasvarūpeṇa sa tiṣṭhati dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो, उसके मध्य में स्वयं महेश्वर सदा महाकाल के स्वरूप में विराजमान रहते हैं।

श्लोक 3 (skanda.6.53.3)

वैशाख्यां यो नरस्तत्र कृत्वा श्राद्धं समाहितः॥ ततः पश्यति देवेशं महाकाल इति स्मृतम्॥ पूजयेद्दक्षिणां मूर्तिं समाश्रित्य द्विजोत्तमाः

vaiśākhyāṁ yo narastatra kṛtvā śrāddhaṁ samāhitaḥ tataḥ paśyati deveśaṁ mahākāla iti smṛtam pūjayeddakṣiṇāṁ mūrtiṁ samāśritya dvijottamāḥ

जो मनुष्य वैशाख मास में समाहित मन से वहाँ श्राद्ध करके महाकाल नाम से प्रसिद्ध देवेश का दर्शन करता है, और हे द्विजोत्तमो, उनकी दक्षिणामूर्ति की शरण लेकर पूजा करता है,

श्लोक 4 (skanda.6.53.4)

दश पूर्वान्दशातीतानात्मानं च द्विजोत्तमाः॥ पुरुषान्स समुद्धृत्य शिवलोके महीयते

daśa pūrvāndaśātītānātmānaṁ ca dvijottamāḥ puruṣānsa samuddhṛtya śivaloke mahīyate

हे द्विजोत्तमो, वह अपने से पूर्व दस पीढ़ियों को, आगे की दस पीढ़ियों को और स्वयं को भी उद्धार कर शिवलोक में महिमामंडित होता है।

श्लोक 5 (skanda.6.53.5)

यो यं काममभिध्याय तत्र पीठं प्रपूजयेत्॥ संपूज्य योगिनीवृंदं कन्यकावृन्दमेव च

yo yaṁ kāmamabhidhyāya tatra pīṭhaṁ prapūjayet saṁpūjya yoginīvṛṁdaṁ kanyakāvṛndameva ca

जो कोई किसी कामना का ध्यान करके उस पीठ की पूजा करता है, तथा योगिनी-समूह और कन्या-समूह की भी विधिपूर्वक पूजा करता है,

श्लोक 6 (skanda.6.53.6)

स तत्कृत्स्नमवाप्नोति यदपि स्यात्सुदुर्लभम्॥ तत्र वैशाखमासस्य पौर्णमास्यां समाहितः

sa tatkṛtsnamavāpnoti yadapi syātsudurlabham tatra vaiśākhamāsasya paurṇamāsyāṁ samāhitaḥ

वह वैशाख मास की पूर्णिमा को वहाँ समाहित रहकर, अपनी अत्यंत दुर्लभ कामना को भी संपूर्ण रूप से प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 7 (skanda.6.53.7)

श्रद्धायुक्तो नरो यो वा उपवासपरः शुचिः॥ करोति जागरं तस्य पुरतः श्रद्धयान्वितः॥ स याति परमं स्थानं जरामरणवर्जितम्

śraddhāyukto naro yo vā upavāsaparaḥ śuciḥ karoti jāgaraṁ tasya purataḥ śraddhayānvitaḥ sa yāti paramaṁ sthānaṁ jarāmaraṇavarjitam

और जो श्रद्धायुक्त, पवित्र, उपवासपरायण मनुष्य श्रद्धापूर्वक उसके सामने रात्रि-जागरण करता है, वह जरा-मृत्यु से रहित परम स्थान को प्राप्त होता है।

श्लोक 8 (skanda.6.53.8)

किं व्रतैः किं वृथा दानैः किं जपैर्नियमेन वा॥ महाकालस्य ते सर्वे कलां नार्हंति षोडशीम्

kiṁ vrataiḥ kiṁ vṛthā dānaiḥ kiṁ japairniyamena vā mahākālasya te sarve kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

व्रतों से क्या, व्यर्थ दानों से क्या, जप और नियम से क्या लाभ? ये सब मिलकर भी महाकाल के माहात्म्य के सोलहवें अंश की भी बराबरी नहीं कर सकते।

श्लोक 9 (skanda.6.53.9)

सूत उवाच॥ तत्रैवास्ति महाभागा भ्रूणगर्तेति विश्रुता॥ गर्ता सुविपुलाकारा सर्वपातकनाशिनी

sūta uvāca tatraivāsti mahābhāgā bhrūṇagarteti viśrutā gartā suvipulākārā sarvapātakanāśinī

सूत जी ने कहा -- वहीं भ्रूणगर्ता नाम से विख्यात एक अत्यंत पुण्यमयी गर्त है, जो अत्यंत विशाल आकार वाला और सभी पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 10 (skanda.6.53.10)

ब्रह्महत्याविनिर्मुक्तः सौदासो यत्र पार्थिवः॥ स्त्रीहत्यया विनिर्मुक्तः सुषेणो वसुधाधिपः

brahmahatyāvinirmuktaḥ saudāso yatra pārthivaḥ strīhatyayā vinirmuktaḥ suṣeṇo vasudhādhipaḥ

वहाँ राजा सौदास ब्रह्महत्या से मुक्त हुए, और राजा सुषेण स्त्रीहत्या से मुक्त हुए।

श्लोक 11 (skanda.6.53.11)

ऋषय ऊचुः॥ ब्रह्महत्या कथं तस्य सौदासस्य महीपतेः॥ ब्रह्मण्यस्यापि संजाता तदस्माकं प्रकीर्तय

ṛṣaya ūcuḥ brahmahatyā kathaṁ tasya saudāsasya mahīpateḥ brahmaṇyasyāpi saṁjātā tadasmākaṁ prakīrtaya

ऋषियों ने कहा -- ब्राह्मणभक्त होते हुए भी राजा सौदास को ब्रह्महत्या कैसे लगी? हमें यह बताइए।

श्लोक 12 (skanda.6.53.12)

श्रूयते स महीपालो ब्राह्मणानां हिते रतः॥ कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्मघ्नः सोऽभवत्कथम्

śrūyate sa mahīpālo brāhmaṇānāṁ hite rataḥ karmaṇā manasā vācā brahmaghnaḥ so'bhavatkatham

सुना जाता है कि वह राजा कर्म, मन और वचन से ब्राह्मणों के हित में रत था; तो वह ब्रह्मघाती कैसे हुआ?

श्लोक 13 (skanda.6.53.13)

विमुक्तश्च कथं भूयो भ्रूणगर्तामुपाश्रितः॥ सापि गर्ता कथं जाता सर्वं नो वद विस्तरात्

vimuktaśca kathaṁ bhūyo bhrūṇagartāmupāśritaḥ sāpi gartā kathaṁ jātā sarvaṁ no vada vistarāt

और भ्रूणगर्ता की शरण लेकर वह पुनः कैसे मुक्त हुआ? तथा वह गर्ता स्वयं कैसे बनी? यह सब हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 14 (skanda.6.53.14)

सूत उवाच॥ यदा लिंगस्य पातोऽभूद्देवदेवस्य शूलिनः॥ तदा स लज्जयाविष्टो लिंगाभावाद्द्विजोत्तमाः

sūta uvāca yadā liṁgasya pāto'bhūddevadevasya śūlinaḥ tadā sa lajjayāviṣṭo liṁgābhāvāddvijottamāḥ

सूत जी ने कहा -- हे द्विजोत्तमो, जब शूलधारी देवदेव के लिंग का पतन हुआ, तब लिंग के अभाव से लज्जा से आविष्ट होकर,

श्लोक 15 (skanda.6.53.15)

कृत्वाऽतिविपुलां गर्तां प्रविवेश ततः परम्॥ न कस्यचित्तदात्मानं दर्शयामास शूलधृक्

kṛtvā'tivipulāṁ gartāṁ praviveśa tataḥ param na kasyacittadātmānaṁ darśayāmāsa śūladhṛk

उन्होंने एक अत्यंत विशाल गर्त बनाकर उसमें प्रवेश किया; उस शूलधारी ने फिर किसी को भी अपना दर्शन नहीं दिया।

श्लोक 16 (skanda.6.53.16)

एवं सा तत्र संजाता गर्ता ब्राह्मणसत्तमाः॥ यथा तस्यां विपाप्माभूत्सौदासस्तद्वदाम्यहम्

evaṁ sā tatra saṁjātā gartā brāhmaṇasattamāḥ yathā tasyāṁ vipāpmābhūtsaudāsastadvadāmyaham

हे ब्राह्मणसत्तमो, इस प्रकार वह गर्त वहाँ उत्पन्न हुई; अब मैं बताता हूँ कि सौदास उसमें कैसे पापरहित हुआ।

श्लोक 17 (skanda.6.53.17)

आसीन्मित्रसहोनाम राजा परमधार्मिकः॥ सौदासस्तत्सुतः साक्षात्सूर्यवंशसमुद्भवः

āsīnmitrasahonāma rājā paramadhārmikaḥ saudāsastatsutaḥ sākṣātsūryavaṁśasamudbhavaḥ

मित्रसह नामक एक परम धार्मिक राजा थे; सौदास सूर्यवंश में उत्पन्न उन्हीं के साक्षात् पुत्र थे।

श्लोक 18 (skanda.6.53.18)

तेनेष्टं विपुलैर्यज्ञैः सुवर्णवरदक्षिणैः॥ असंख्यातानि दानानि प्रदत्तानि महात्मना

teneṣṭaṁ vipulairyajñaiḥ suvarṇavaradakṣiṇaiḥ asaṁkhyātāni dānāni pradattāni mahātmanā

उस महात्मा ने स्वर्ण की उत्तम दक्षिणा वाले अनेक विशाल यज्ञ किए और असंख्य दान दिए।

श्लोक 19 (skanda.6.53.19)

कस्यचित्त्वथ कालस्य सत्रे द्वादशवार्षिके॥ वर्तमाने यथान्यायं विधिदृष्टेन कर्मणा

kasyacittvatha kālasya satre dvādaśavārṣike vartamāne yathānyāyaṁ vidhidṛṣṭena karmaṇā

कुछ समय बाद, जब विधिपूर्वक बारह वर्षों वाला एक सत्र यथान्याय चल रहा था,

श्लोक 20 (skanda.6.53.20)

क्रूराक्षः क्रूरबुद्धिश्च राक्षसौ बलवत्तरौ॥ यज्ञविघ्नाय संप्राप्तौ संप्राप्ते रजनीमुखे

krūrākṣaḥ krūrabuddhiśca rākṣasau balavattarau yajñavighnāya saṁprāptau saṁprāpte rajanīmukhe

क्रूराक्ष और क्रूरबुद्धि नामक दो अत्यंत बलवान राक्षस रात्रि के आरंभ में यज्ञ में विघ्न डालने आए।

श्लोक 21 (skanda.6.53.21)

राक्षसैर्बहुभिः सार्धं तथान्यैर्भूतसंज्ञितैः॥ पिशाचैश्च दुराधर्षैर्यज्ञविध्वंसतत्परैः

rākṣasairbahubhiḥ sārdhaṁ tathānyairbhūtasaṁjñitaiḥ piśācaiśca durādharṣairyajñavidhvaṁsatatparaiḥ

वे अनेक अन्य राक्षसों, भूतगणों और दुर्दम्य पिशाचों के साथ आए, जो सब यज्ञ के विध्वंस में तत्पर थे।

श्लोक 22 (skanda.6.53.22)

अथ ते राक्षसाः सर्वे किंचिच्छिद्रमवेक्ष्य च॥ विविशुर्यज्ञवाटं तं प्रसर्पन्तः समंततः

atha te rākṣasāḥ sarve kiṁcicchidramavekṣya ca viviśuryajñavāṭaṁ taṁ prasarpantaḥ samaṁtataḥ

तब वे सभी राक्षस कोई छिद्र देखकर चारों ओर से रेंगते हुए उस यज्ञमंडप में घुस आए।

श्लोक 23 (skanda.6.53.23)

निघ्नन्तो ब्राह्मणश्रेष्ठान्भक्षयन्तो हवींषि च॥ तथा यानि विचित्राणि यज्ञार्थे कल्पितानि च

nighnanto brāhmaṇaśreṣṭhānbhakṣayanto havīṁṣi ca tathā yāni vicitrāṇi yajñārthe kalpitāni ca

वे श्रेष्ठ ब्राह्मणों को मारने और हवि तथा यज्ञ के लिए सजाई गई विविध सामग्री को भक्षण करने लगे।

श्लोक 24 (skanda.6.53.24)

एतस्मिन्नंतरे तत्र हाहाकारो महानभूत्॥ भक्ष्यमाणेषु विप्रेषु राक्षसैर्बलवत्तरैः

etasminnaṁtare tatra hāhākāro mahānabhūt bhakṣyamāṇeṣu vipreṣu rākṣasairbalavattaraiḥ

इसी बीच वहाँ महान हाहाकार मच गया, क्योंकि बलवान राक्षसों द्वारा ब्राह्मणों को भक्षण किया जा रहा था।

श्लोक 25 (skanda.6.53.25)

ततो मैत्रसहिः क्रुद्धस्त्यक्त्वा दीक्षाव्रतं नृपः॥ आदाय सशरं चापं ध्वंसयामास वीक्ष्य तान्

tato maitrasahiḥ kruddhastyaktvā dīkṣāvrataṁ nṛpaḥ ādāya saśaraṁ cāpaṁ dhvaṁsayāmāsa vīkṣya tān

तब मित्रसह के पुत्र (सौदास) क्रोधित होकर दीक्षाव्रत त्यागकर, धनुष-बाण लेकर, उन्हें देखते ही उनका विध्वंस करने लगे।

श्लोक 26 (skanda.6.53.26)

कृतरक्षो वसिष्ठेन स्वयमेव पुरोधसा॥ क्रूराक्षं सूदयामास राक्षसैर्बहुभिः सह

kṛtarakṣo vasiṣṭhena svayameva purodhasā krūrākṣaṁ sūdayāmāsa rākṣasairbahubhiḥ saha

अपने पुरोहित वसिष्ठ द्वारा स्वयं रक्षित होकर उन्होंने क्रूराक्ष को अनेक राक्षसों सहित मार डाला।

श्लोक 27 (skanda.6.53.27)

क्रूरबुद्धिरथो वीक्ष्य हतं श्रेष्ठं सहोदरम्॥ तं च पार्थिवशार्दूलमगम्यं ब्रह्मतेजसा

krūrabuddhiratho vīkṣya hataṁ śreṣṭhaṁ sahodaram taṁ ca pārthivaśārdūlamagamyaṁ brahmatejasā

तब क्रूरबुद्धि ने अपने ज्येष्ठ भाई को मरा हुआ देखा, और यह भी देखा कि वह श्रेष्ठ राजा ब्रह्मतेज के कारण अगम्य था।

श्लोक 28 (skanda.6.53.28)

हतशेषान्समादाय राक्षसान्बलसंयुतः॥ पलायनं भयाच्चक्रे क्षतांगस्तस्य सायकैः

hataśeṣānsamādāya rākṣasānbalasaṁyutaḥ palāyanaṁ bhayāccakre kṣatāṁgastasya sāyakaiḥ

शेष बचे राक्षसों को साथ लेकर, बलवान होते हुए भी, राजा के बाणों से घायल अंगों वाला वह भय से भाग गया।

श्लोक 29 (skanda.6.53.29)

ततस्तद्वैरमाश्रित्य भ्रातुर्ज्येष्ठस्य राक्षसः॥ छिद्रमन्वेषयामास तद्वधाय दिवानिशम्

tatastadvairamāśritya bhrāturjyeṣṭhasya rākṣasaḥ chidramanveṣayāmāsa tadvadhāya divāniśam

तब अपने ज्येष्ठ भाई के वैर का आश्रय लेकर वह राक्षस दिन-रात राजा को मारने के लिए छिद्र ढूँढ़ता रहा।

श्लोक 30 (skanda.6.53.30)

एवं सवीक्षमाणस्य तस्य च्छिद्रं महात्मनः॥ समाप्तिमगमद्विप्राः सत्रं तद्द्वादशाब्दिकम्

evaṁ savīkṣamāṇasya tasya cchidraṁ mahātmanaḥ samāptimagamadviprāḥ satraṁ taddvādaśābdikam

हे विप्रो, इस प्रकार उस राक्षस के छिद्र ढूँढ़ते रहते ही उस महात्मा राजा का वह बारह वर्षों वाला सत्र समाप्त हो गया।

श्लोक 31 (skanda.6.53.31)

न सूक्ष्ममपि संप्राप्तं छिद्रं तेन दुरात्मना॥ वसिष्ठविहिता रक्षा सत्रे तस्य महीपतेः

na sūkṣmamapi saṁprāptaṁ chidraṁ tena durātmanā vasiṣṭhavihitā rakṣā satre tasya mahīpateḥ

उस दुरात्मा को कोई सूक्ष्म छिद्र भी नहीं मिला, क्योंकि वसिष्ठ द्वारा विहित रक्षा उस राजा के सत्र में सदा बनी रही।

श्लोक 32 (skanda.6.53.32)

अथासौ ब्राह्मणान्सर्वान्विसृज्याहितदक्षिणान्॥ कृतांजलिपुटो भूत्वा वसिष्ठमिदमब्रवीत्

athāsau brāhmaṇānsarvānvisṛjyāhitadakṣiṇān kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā vasiṣṭhamidamabravīt

तब उन्होंने सभी ब्राह्मणों को यथोचित दक्षिणा देकर विदा किया और हाथ जोड़कर वसिष्ठ से यह कहा --

श्लोक 33 (skanda.6.53.33)

स्वहस्तेन गुरोद्याहं त्वां भोजयितुमुत्सहे॥ क्रियतां तत्प्रसादो मे भुक्त्वाद्य मम मन्दिरे

svahastena gurodyāhaṁ tvāṁ bhojayitumutsahe kriyatāṁ tatprasādo me bhuktvādya mama mandire

"हे गुरुदेव, आज मैं अपने हाथों से आपको भोजन कराना चाहता हूँ; आज मेरे भवन में भोजन करके मुझ पर यह कृपा कीजिए।"

श्लोक 34 (skanda.6.53.34)

सूत उवाच॥ स तथेति प्रतिज्ञाय वसिष्ठो मुनिसत्तमः॥ क्षालितांघ्रिः स्वयं तेन निविष्टो भोजनाय वै

sūta uvāca sa tatheti pratijñāya vasiṣṭho munisattamaḥ kṣālitāṁghriḥ svayaṁ tena niviṣṭo bhojanāya vai

सूत जी ने कहा -- मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ ने "ऐसा ही हो" कहकर स्वीकार किया, और राजा द्वारा स्वयं पैर धुलाकर वे भोजन के लिए बैठ गए।

श्लोक 35 (skanda.6.53.35)

कूरबुद्धिरथो वीक्ष्य तदर्थं चामिषं शुभम्॥ सुसंस्कृतं विधानेन सूपकारैर्द्विजोत्तमाः

kūrabuddhiratho vīkṣya tadarthaṁ cāmiṣaṁ śubham susaṁskṛtaṁ vidhānena sūpakārairdvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो, तब क्रूरबुद्धि ने देखा कि उस अवसर के लिए रसोइयों द्वारा विधिपूर्वक शुद्ध मांस तैयार किया गया था,

श्लोक 36 (skanda.6.53.36)

उखां कृत्वा ततस्तादृक्तत्प्रमाणामतर्किताम्॥ महामांसाभृतां कृत्वा तां जहारामिषान्विताम्

ukhāṁ kṛtvā tatastādṛktatpramāṇāmatarkitām mahāmāṁsābhṛtāṁ kṛtvā tāṁ jahārāmiṣānvitām

उसने उसी आकार का एक वैसा ही अज्ञात पात्र बनाया, उसमें मनुष्य-मांस भरा और उस मांस-भरे पात्र को असली के स्थान पर रख दिया।

श्लोक 37 (skanda.6.53.37)

अथासौ मुनिशार्दूलो भुंजानो बुबुधे हि तत्॥ महामांसमिति क्रुद्धस्तत्र प्रोवाच मन्युमान्

athāsau muniśārdūlo bhuṁjāno bubudhe hi tat mahāmāṁsamiti kruddhastatra provāca manyumān

तब वह मुनिश्रेष्ठ भोजन करते समय पहचान गए कि यह मनुष्य-मांस है, और क्रोधित तथा रोषयुक्त होकर वहाँ बोले --

श्लोक 38 (skanda.6.53.38)

महामांसाशनं यस्मात्कारितोऽहं त्वयाधम॥ रक्षोवद्राक्षसस्तस्मात्त्वमद्यैव भविष्यसि

mahāmāṁsāśanaṁ yasmātkārito'haṁ tvayādhama rakṣovadrākṣasastasmāttvamadyaiva bhaviṣyasi

"हे अधम, चूँकि तूने मुझसे मनुष्य-मांस खिलाया है, इसलिए तू आज ही राक्षस के समान राक्षस बन जाएगा।"

श्लोक 39 (skanda.6.53.39)

ततः संशोधयामास तस्य मांसस्य चागमम्॥ निपुणं सूपकारांस्तान्दृष्ट्वा राजा पृथक्पृथक्

tataḥ saṁśodhayāmāsa tasya māṁsasya cāgamam nipuṇaṁ sūpakārāṁstāndṛṣṭvā rājā pṛthakpṛthak

तब राजा ने उस मांस के स्रोत की सावधानीपूर्वक जाँच की, और उन रसोइयों से अलग-अलग पूछताछ की।

श्लोक 40 (skanda.6.53.40)

तेऽब्रुवन्नैतदस्माभिः श्रपितं मांसमीदृशम्॥ श्रद्धीयतां महीपाल नान्येन मनुजेन वा

te'bruvannaitadasmābhiḥ śrapitaṁ māṁsamīdṛśam śraddhīyatāṁ mahīpāla nānyena manujena vā

उन्होंने कहा -- "हे राजन्, यह मांस हमारे द्वारा नहीं पकाया गया, विश्वास कीजिए, और न ही यह किसी मनुष्य द्वारा पकाया गया है।"

श्लोक 41 (skanda.6.53.41)

राक्षसं वा पिशाचं वा दानवं वा विना विभो॥ एतज्ज्ञात्वा ततो नाथ यद्युक्तं तत्समाचर

rākṣasaṁ vā piśācaṁ vā dānavaṁ vā vinā vibho etajjñātvā tato nātha yadyuktaṁ tatsamācara

"हे विभो, यह किसी राक्षस, पिशाच अथवा दानव के अतिरिक्त और किसी का कार्य नहीं हो सकता; हे नाथ, यह जानकर जो उचित हो वह कीजिए।"

श्लोक 42 (skanda.6.53.42)

एतस्मिन्नंतरे तस्य नारदो मुनिसत्तमः॥ समागत्याब्रवीत्सर्वं तद्राक्षसविचेष्टितम्

etasminnaṁtare tasya nārado munisattamaḥ samāgatyābravītsarvaṁ tadrākṣasaviceṣṭitam

इसी बीच मुनिश्रेष्ठ नारद वहाँ आए और उन्होंने राजा को उस राक्षस के इस पूरे कृत्य के बारे में बताया।

श्लोक 43 (skanda.6.53.43)

तच्छ्रुत्वा कोपमापन्नः स राजा शप्तुमुद्यतः॥ वसिष्ठं स्वकरे कृत्वा जलं सौदासभूपतिः॥ शापोद्यतं च तं दृष्ट्वा नारदो वाक्यमब्रवीत्

tacchrutvā kopamāpannaḥ sa rājā śaptumudyataḥ vasiṣṭhaṁ svakare kṛtvā jalaṁ saudāsabhūpatiḥ śāpodyataṁ ca taṁ dṛṣṭvā nārado vākyamabravīt

यह सुनकर राजा सौदास क्रोधित हो गए और हाथ में जल लेकर वसिष्ठ को शाप देने को उद्यत हुए; उन्हें शाप देने को उद्यत देखकर नारद ने यह वचन कहा --

श्लोक 44 (skanda.6.53.44)

निघ्नन्तो वा शपन्तो वा द्विषन्तो वा द्विजातयः॥ नमस्कार्या महीपाल तथापि स्वहितेच्छुना॥ गुरुरेष पुनर्मान्यस्तव पार्थिवसत्तम

nighnanto vā śapanto vā dviṣanto vā dvijātayaḥ namaskāryā mahīpāla tathāpi svahitecchunā gurureṣa punarmānyastava pārthivasattama

"हे राजन्, ब्राह्मण चाहे मारें, शाप दें अथवा द्वेष करें, फिर भी अपने हित की इच्छा रखने वाले को उन्हें नमस्कार ही करना चाहिए; और हे राजश्रेष्ठ, यह तो आपके अपने गुरु हैं, अतः विशेष रूप से माननीय हैं।"

श्लोक 45 (skanda.6.53.45)

तस्मान्नार्हसि शप्तुं त्वं प्रतिशापेन सन्मुनिम्॥ निषिद्धः स तथा भूपस्ततस्तत्सलिलं करात्॥ पादयोः कृत्स्नमुपरि प्रमुमोच ततः परम्

tasmānnārhasi śaptuṁ tvaṁ pratiśāpena sanmunim niṣiddhaḥ sa tathā bhūpastatastatsalilaṁ karāt pādayoḥ kṛtsnamupari pramumoca tataḥ param

"इसलिए तुम्हें प्रतिशाप देकर इस सन्मुनि को शाप नहीं देना चाहिए।" इस प्रकार रोके जाने पर राजा ने वह जल अपने हाथ से अपने ही दोनों पैरों पर उँडेल दिया।

श्लोक 46 (skanda.6.53.46)

अथ तौ चरणौ तस्य तप्तशापोदकप्लुतौ॥ दग्धौ कृष्णत्वमापन्नौ तत्क्षणाद्द्विजसत्तमाः

atha tau caraṇau tasya taptaśāpodakaplutau dagdhau kṛṣṇatvamāpannau tatkṣaṇāddvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो, तब उस शापयुक्त, तप्त जल से भीगे हुए राजा के दोनों चरण उसी क्षण जल गए और काले पड़ गए।

श्लोक 47 (skanda.6.53.47)

कल्माषपाद इत्युक्तस्ततःप्रभृति स क्षितौ॥ भूपालो द्विजशार्दूला नाम्ना तेन विशेषतः

kalmāṣapāda ityuktastataḥprabhṛti sa kṣitau bhūpālo dvijaśārdūlā nāmnā tena viśeṣataḥ

हे द्विजश्रेष्ठो, उसी समय से वह राजा पृथ्वी पर विशेष रूप से कल्माषपाद इस नाम से जाना जाने लगा।

श्लोक 48 (skanda.6.53.48)

सूत उवाच॥ एतस्मिन्नंतरे विप्रो वसिष्ठो लज्जयान्वितः॥ ज्ञात्वा दत्तं वृथा शापं तस्य भूमिपतेस्तदा

sūta uvāca etasminnaṁtare vipro vasiṣṭho lajjayānvitaḥ jñātvā dattaṁ vṛthā śāpaṁ tasya bhūmipatestadā

सूत जी ने कहा -- इसी बीच ब्राह्मण वसिष्ठ ने यह जानकर कि उस राजा को व्यर्थ ही शाप दिया गया, लज्जा से भर गए,

श्लोक 49 (skanda.6.53.49)

उवाच व्यर्थः शापोऽयं तव दत्तो मया नृप॥ न च मे जायते वाक्यमसत्यं हि कथंचन

uvāca vyarthaḥ śāpo'yaṁ tava datto mayā nṛpa na ca me jāyate vākyamasatyaṁ hi kathaṁcana

उन्होंने कहा -- "हे राजन्, तुम्हें दिया गया यह मेरा शाप व्यर्थ है; परंतु मेरा वचन किसी भी प्रकार असत्य नहीं हो सकता।"

श्लोक 50 (skanda.6.53.50)

तस्मात्त्वं राक्षसो भूत्वा कञ्चित्कालं नृपोत्तम॥ स्वरूपं लप्स्यसे भूयो यस्मिन्काले शृणुष्व तम्

tasmāttvaṁ rākṣaso bhūtvā kañcitkālaṁ nṛpottama svarūpaṁ lapsyase bhūyo yasminkāle śṛṇuṣva tam

"इसलिए, हे नृपोत्तम, तुम कुछ समय के लिए राक्षस बनोगे; जिस समय तुम्हें पुनः अपना स्वरूप प्राप्त होगा, वह सुनो।"

श्लोक 51 (skanda.6.53.51)

यदा त्वं क्रूरबुद्धिं तं राक्षसं निहनिष्यसि॥ तदा त्वं लप्स्यसे मोक्षं राक्षसत्वात्सुदारुणात्

yadā tvaṁ krūrabuddhiṁ taṁ rākṣasaṁ nihaniṣyasi tadā tvaṁ lapsyase mokṣaṁ rākṣasatvātsudāruṇāt

"जब तुम उस क्रूरबुद्धि राक्षस को मार डालोगे, तभी तुम्हें उस अत्यंत भयंकर राक्षसत्व से मुक्ति मिलेगी।"

श्लोक 52 (skanda.6.53.52)

सूत उवाच॥ एतस्मिन्नन्तरे राजा यातुधानो बभूव सः॥ ऊर्ध्वकेशो महाकायः कृष्णदन्तो भयानकः

sūta uvāca etasminnantare rājā yātudhāno babhūva saḥ ūrdhvakeśo mahākāyaḥ kṛṣṇadanto bhayānakaḥ

सूत जी ने कहा -- उसी क्षण वह राजा राक्षस बन गया -- ऊर्ध्व केशों वाला, विशालकाय, काले दाँतों वाला और भयानक।

श्लोक 53 (skanda.6.53.53)

ततो जघान विप्रेन्द्रान्राक्षसं भावमाश्रितः॥ यज्ञान्विध्वंसयामास मुनीनामाश्रमानपि

tato jaghāna viprendrānrākṣasaṁ bhāvamāśritaḥ yajñānvidhvaṁsayāmāsa munīnāmāśramānapi

तब राक्षस-स्वभाव को धारण करके उसने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को मारना आरंभ कर दिया, और यज्ञों तथा मुनियों के आश्रमों को भी नष्ट कर दिया।

श्लोक 54 (skanda.6.53.54)

कस्यचित्त्वथ कालस्य क्रूरबुद्धिः स राक्षसः॥ ज्ञात्वा तं राक्षसीभूतमेकदाऽऽयुधवर्जितम्

kasyacittvatha kālasya krūrabuddhiḥ sa rākṣasaḥ jñātvā taṁ rākṣasībhūtamekadā''yudhavarjitam

कुछ समय बाद राक्षस क्रूरबुद्धि ने यह जानकर कि राजा राक्षस बन चुका है और एक बार वह शस्त्ररहित है,

श्लोक 55 (skanda.6.53.55)

भ्रातुर्वधकृतं वैरं स्मरमाणस्ततः परम्॥ तद्वधार्थं समायातो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः

bhrāturvadhakṛtaṁ vairaṁ smaramāṇastataḥ param tadvadhārthaṁ samāyāto rākṣasairbahubhirvṛtaḥ

तथा अपने भाई की हत्या से उत्पन्न वैर का स्मरण करते हुए, अनेक राक्षसों से घिरा हुआ वह उसे मारने के लिए वहाँ आ पहुँचा।

श्लोक 56 (skanda.6.53.56)

ततस्तं वेष्टयित्वापि समंताद्राक्षसो नृपम्॥ प्रोवाच वचनं क्रुद्धो नादेनापूरयन्दिशः

tatastaṁ veṣṭayitvāpi samaṁtādrākṣaso nṛpam provāca vacanaṁ kruddho nādenāpūrayandiśaḥ

तब उस राक्षस ने राजा को चारों ओर से घेरकर, क्रोधित होकर, अपनी गर्जना से दिशाओं को गुँजाते हुए कहा --

श्लोक 57 (skanda.6.53.57)

त्वया यो निहतोऽस्माकं ज्येष्ठो भ्राता सुदुर्मते॥ वसिष्ठस्य बलाद्यज्ञे तस्याद्य फलमाप्नुहि

tvayā yo nihato'smākaṁ jyeṣṭho bhrātā sudurmate vasiṣṭhasya balādyajñe tasyādya phalamāpnuhi

"हे दुर्मते, तूने वसिष्ठ के बल से यज्ञ में हमारे ज्येष्ठ भाई को मारा था; आज उसका फल पा।"

श्लोक 58 (skanda.6.53.58)

राजोवाच॥ यद्ब्रवीषि दुराचार कर्मणा तत्समाचर॥ शारदस्येव मेघस्य गर्जितं तव निष्फलम्

rājovāca yadbravīṣi durācāra karmaṇā tatsamācara śāradasyeva meghasya garjitaṁ tava niṣphalam

राजा ने कहा -- "हे दुराचारी, जो कहता है वह कर्म से करके दिखा; तेरी गर्जना शरद ऋतु के मेघ की गर्जना के समान निष्फल है।"

श्लोक 59 (skanda.6.53.59)

एवमुक्त्वा समादाय ततो वृक्षं स पार्थिवः॥ प्राद्रवत्संमुखं तस्य गर्जमानो यथा घनः

evamuktvā samādāya tato vṛkṣaṁ sa pārthivaḥ prādravatsaṁmukhaṁ tasya garjamāno yathā ghanaḥ

ऐसा कहकर उस राजा ने एक वृक्ष उठाया और मेघ के समान गरजते हुए उसकी ओर दौड़ा।

श्लोक 60 (skanda.6.53.60)

सोऽपि वृक्षं समुत्पाट्य क्रोधसंरक्तलोचनः॥ त्रिशंखां भृकुटीं कृत्वा तस्याप्यभिमुखं ययौ

so'pi vṛkṣaṁ samutpāṭya krodhasaṁraktalocanaḥ triśaṁkhāṁ bhṛkuṭīṁ kṛtvā tasyāpyabhimukhaṁ yayau

वह राक्षस भी एक वृक्ष उखाड़कर, क्रोध से लाल आँखों वाला और त्रिशाखा भृकुटी बनाए हुए उसके सामने आ गया।

श्लोक 61 (skanda.6.53.61)

एवं द्वावपि तौ शूरौ वृक्षयुद्धं महाबलौ॥ कृतवन्तौ वने तत्र बहुवृक्षक्षयावहम्

evaṁ dvāvapi tau śūrau vṛkṣayuddhaṁ mahābalau kṛtavantau vane tatra bahuvṛkṣakṣayāvaham

इस प्रकार वे दोनों महाबली शूरवीर उस वन में वृक्षों से युद्ध करने लगे, जिससे अनेक वृक्ष नष्ट हो गए।

श्लोक 62 (skanda.6.53.62)

अथ तं श्रांतमालोक्य कूरबुद्धिं महीपतिः॥ प्रगृह्य पादयोर्वेगाद्भ्रामयामास पुष्करे

atha taṁ śrāṁtamālokya kūrabuddhiṁ mahīpatiḥ pragṛhya pādayorvegādbhrāmayāmāsa puṣkare

तब क्रूरबुद्धि को थका हुआ देखकर राजा ने उसे पैरों से पकड़कर वेगपूर्वक आकाश में घुमाया।

श्लोक 63 (skanda.6.53.63)

ततश्चास्फोटयामास भूमौ कोपसमन्वितः॥ चक्रे चामिषखण्डं स पिष्ट्वापिष्ट्वा मुहुर्मुहुः

tataścāsphoṭayāmāsa bhūmau kopasamanvitaḥ cakre cāmiṣakhaṇḍaṁ sa piṣṭvāpiṣṭvā muhurmuhuḥ

फिर क्रोध से भरकर उसने उसे भूमि पर पटक दिया, और बार-बार पीसते हुए उसे मांस के टुकड़ों में बदल दिया।

श्लोक 64 (skanda.6.53.64)

तस्मिंस्तु निहते शूरे राक्षसे स महीपतिः॥ राक्षसत्वाद्विनिर्मुक्तो लेभे कायं नृपोद्भवम्

tasmiṁstu nihate śūre rākṣase sa mahīpatiḥ rākṣasatvādvinirmukto lebhe kāyaṁ nṛpodbhavam

उस वीर राक्षस के मारे जाने पर वह राजा राक्षसत्व से मुक्त हो गया और उसे पुनः राजोचित शरीर प्राप्त हुआ।

श्लोक 65 (skanda.6.53.65)

ततस्ते राक्षसाः शेषाः समंतात्तं महीपतिम्॥ परिवार्य महावृक्षैर्जघ्नुः पाषाणवृष्टिभिः

tataste rākṣasāḥ śeṣāḥ samaṁtāttaṁ mahīpatim parivārya mahāvṛkṣairjaghnuḥ pāṣāṇavṛṣṭibhiḥ

तब शेष बचे राक्षसों ने उस राजा को चारों ओर से घेरकर बड़े-बड़े वृक्षों और पत्थरों की वर्षा से प्रहार किया।

श्लोक 66 (skanda.6.53.66)

ततस्तानपि भूपालो जघान प्रहसन्निव॥ वृक्षहस्तस्तु विश्रब्धो लीलया द्विजसत्तमाः

tatastānapi bhūpālo jaghāna prahasanniva vṛkṣahastastu viśrabdho līlayā dvijasattamāḥ

हे द्विजसत्तमो, तब हाथ में वृक्ष लिए, निश्चिंत राजा ने हँसते हुए मानो खेल-खेल में उन्हें भी मार डाला।

श्लोक 67 (skanda.6.53.67)

ततश्च स्वपुरं प्राप्तः संप्रहृष्टतनूरुहः॥ राक्षसानां वधं कृत्वा लब्ध्वा देहं पुरातनम्

tataśca svapuraṁ prāptaḥ saṁprahṛṣṭatanūruhaḥ rākṣasānāṁ vadhaṁ kṛtvā labdhvā dehaṁ purātanam

तब राक्षसों का वध करके और अपना पूर्व शरीर पुनः प्राप्त करके, हर्ष से रोमांचित होकर वह अपनी नगरी को लौट आया।

श्लोक 68 (skanda.6.53.68)

ततस्तं तेजसा हीनं दुर्गंधेन समावृतम्॥ ब्रह्महत्योद्भवैश्चिह्नैरन्यैरपि पृथग्विधैः

tatastaṁ tejasā hīnaṁ durgaṁdhena samāvṛtam brahmahatyodbhavaiścihnairanyairapi pṛthagvidhaiḥ

परंतु तब उसे तेजरहित, दुर्गंध से घिरा हुआ और ब्रह्महत्या से उत्पन्न अन्य विविध चिह्नों से युक्त देखकर,

श्लोक 69 (skanda.6.53.69)

दृष्ट्वा ते मंत्रिणस्तस्य पुत्र पौत्रास्तथा परे॥ नोपसर्पंति भूपालं पापस्पर्शभयान्विताः

dṛṣṭvā te maṁtriṇastasya putra pautrāstathā pare nopasarpaṁti bhūpālaṁ pāpasparśabhayānvitāḥ

उसके मंत्रियों, पुत्रों, पौत्रों तथा अन्य जनों ने पाप के स्पर्श के भय से राजा के समीप जाना छोड़ दिया।

श्लोक 70 (skanda.6.53.70)

ऊचुश्च पार्थिवश्रेष्ठ न त्वमर्हसि संगमम्॥ कर्तुं सार्धमिहास्माभिर्ब्रह्महत्यान्वितो यतः

ūcuśca pārthivaśreṣṭha na tvamarhasi saṁgamam kartuṁ sārdhamihāsmābhirbrahmahatyānvito yataḥ

उन्होंने कहा -- "हे राजश्रेष्ठ, चूँकि आप ब्रह्महत्या से युक्त हैं, इसलिए आप यहाँ हमारे साथ मिलने योग्य नहीं हैं।"

श्लोक 71 (skanda.6.53.71)

तस्माद्वसिष्ठमाहूय प्रायश्चित्तं समाचर॥ अशुद्धं शुद्धिमायाति येन गात्रमिदं तव

tasmādvasiṣṭhamāhūya prāyaścittaṁ samācara aśuddhaṁ śuddhimāyāti yena gātramidaṁ tava

"इसलिए वसिष्ठ को बुलाकर प्रायश्चित्त कीजिए, जिससे आपका यह अशुद्ध शरीर शुद्धि प्राप्त कर सके।"

श्लोक 72 (skanda.6.53.72)

ततः स पार्थिवस्तूर्णं वसिष्ठं मुनिपुंगवम्॥ समाहूयाब्रवीद्वाक्यं दूरस्थो विनयान्वितः

tataḥ sa pārthivastūrṇaṁ vasiṣṭhaṁ munipuṁgavam samāhūyābravīdvākyaṁ dūrastho vinayānvitaḥ

तब उस राजा ने तुरंत मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ को बुलाकर, विनयपूर्वक दूर खड़े होकर यह वचन कहा --

श्लोक 73 (skanda.6.53.73)

तव प्रसादतो विप्र स हतो राक्षसो मया॥ मुक्तशापोऽस्मि संजातः परं शृणु वचो मुने

tava prasādato vipra sa hato rākṣaso mayā muktaśāpo'smi saṁjātaḥ paraṁ śṛṇu vaco mune

"हे विप्र, आपकी कृपा से मैंने उस राक्षस को मार डाला है, और मैं शाप से मुक्त हो गया हूँ; परंतु हे मुनि, मेरी एक बात और सुनिए।"

श्लोक 74 (skanda.6.53.74)

मम गात्रात्सुदुर्गंधः समुद्गच्छति सर्वतः॥ भाराक्रांतानि गात्राणि सर्वाण्येवाचलानि च

mama gātrātsudurgaṁdhaḥ samudgacchati sarvataḥ bhārākrāṁtāni gātrāṇi sarvāṇyevācalāni ca

"मेरे शरीर से चारों ओर अत्यंत दुर्गंध निकल रही है, और मेरे सभी अंग भारी और मानो जड़वत् हो गए हैं।"

श्लोक 75 (skanda.6.53.75)

तत्किमेतद्द्विजश्रेष्ठ तेजो हानिरतीव मे॥ मंत्रिणोऽपि तथा पुत्रा न स्पृशंति यतोऽद्य माम्

tatkimetaddvijaśreṣṭha tejo hāniratīva me maṁtriṇo'pi tathā putrā na spṛśaṁti yato'dya mām

"हे द्विजश्रेष्ठ, यह क्या है? मेरा तेज अत्यधिक क्षीण हो गया है, यहाँ तक कि आज मेरे मंत्री और पुत्र भी मुझे नहीं छूते।"

श्लोक 76 (skanda.6.53.76)

वसिष्ठ उवाच॥ राक्षसत्वं प्रपन्नेन त्वया पार्थिवसत्तम॥ ब्राह्मणा बहवो ध्वस्तास्तथा विध्वंसिता मखाः॥ तेषां त्वं पार्थिवश्रेष्ठ संस्पृष्टो ब्रह्महत्यया

vasiṣṭha uvāca rākṣasatvaṁ prapannena tvayā pārthivasattama brāhmaṇā bahavo dhvastāstathā vidhvaṁsitā makhāḥ teṣāṁ tvaṁ pārthivaśreṣṭha saṁspṛṣṭo brahmahatyayā

वसिष्ठ ने कहा -- "हे राजश्रेष्ठ, राक्षसत्व को प्राप्त होकर आपने अनेक ब्राह्मणों का नाश किया और अनेक यज्ञों को भी नष्ट किया; उन्हीं के कारण, हे नृपश्रेष्ठ, आप ब्रह्महत्या से संस्पृष्ट हैं।"

श्लोक 77 (skanda.6.53.77)

राजोवाच॥ तदर्थं देहि मे विप्र प्रायश्चित्तं विशुद्धये॥ येन निर्मुक्तपापोऽहं राज्यं प्राप्नोमि चात्मनः

rājovāca tadarthaṁ dehi me vipra prāyaścittaṁ viśuddhaye yena nirmuktapāpo'haṁ rājyaṁ prāpnomi cātmanaḥ

राजा ने कहा -- "हे विप्र, इसके लिए मुझे शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त बताइए, जिससे पापमुक्त होकर मैं अपना राज्य पुनः प्राप्त कर सकूँ।"

श्लोक 78 (skanda.6.53.78)

वसिष्ठ उवाच॥ अत्रार्थे तीर्थयात्रां त्वं कुरु पार्थिवसत्तम॥ निर्ममो निरहंकारस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि

vasiṣṭha uvāca atrārthe tīrthayātrāṁ tvaṁ kuru pārthivasattama nirmamo nirahaṁkārastataḥ siddhimavāpsyasi

वसिष्ठ ने कहा -- "हे राजश्रेष्ठ, इसके लिए ममत्व और अहंकार त्यागकर तीर्थयात्रा कीजिए; तब आपको सिद्धि प्राप्त होगी।"

श्लोक 79 (skanda.6.53.79)

ततः स पार्थिवश्रेष्ठः संयतात्मा जितेंद्रियः॥ प्रयागादिषु तीर्थेषु स्नानं चक्रे समाहितः

tataḥ sa pārthivaśreṣṭhaḥ saṁyatātmā jiteṁdriyaḥ prayāgādiṣu tīrtheṣu snānaṁ cakre samāhitaḥ

तब वह श्रेष्ठ राजा संयत मन और जितेंद्रिय होकर, प्रयाग आदि तीर्थों में समाहित होकर स्नान करता रहा।

श्लोक 80 (skanda.6.53.80)

न नश्यति स दुर्गंधो न च तेजः प्रवर्धते॥ न कायो लघुतां याति नालस्येन विमुच्यते

na naśyati sa durgaṁdho na ca tejaḥ pravardhate na kāyo laghutāṁ yāti nālasyena vimucyate

परंतु फिर भी वह दुर्गंध नष्ट नहीं हुई, न तेज बढ़ा, न शरीर हल्का हुआ, और न ही आलस्य से मुक्ति मिली।

श्लोक 81 (skanda.6.53.81)

ततः संभ्रममाणश्च कदाचिद्द्विजसत्तमाः॥ चमत्कारपुरे क्षेत्रे स्नानार्थं समुपागतः

tataḥ saṁbhramamāṇaśca kadāciddvijasattamāḥ camatkārapure kṣetre snānārthaṁ samupāgataḥ

हे द्विजसत्तमो, तब भटकते हुए वह एक बार स्नान के लिए चमत्कारपुर क्षेत्र में आ पहुँचा।

श्लोक 82 (skanda.6.53.82)

सुश्रांतः क्षुत्पिपासार्तो निशीथे तमसावृते॥ गर्तायां पतितोऽकस्मात्पूर्णायां पयसा नृपः

suśrāṁtaḥ kṣutpipāsārto niśīthe tamasāvṛte gartāyāṁ patito'kasmātpūrṇāyāṁ payasā nṛpaḥ

अत्यंत थका हुआ, भूख-प्यास से पीड़ित वह राजा गहरी अंधकारमयी रात्रि में सहसा उस जल से भरी गर्त में गिर पड़ा।

श्लोक 83 (skanda.6.53.83)

कृच्छ्रात्ततो विनिष्क्रांतस्तीर्थात्तस्मान्महीपतिः॥ यावत्पश्यति चात्मानं द्वादशार्कसमप्रभम्

kṛcchrāttato viniṣkrāṁtastīrthāttasmānmahīpatiḥ yāvatpaśyati cātmānaṁ dvādaśārkasamaprabham

तब वह राजा बड़ी कठिनाई से उस तीर्थ से बाहर निकला, और जब उसने स्वयं को देखा तो वह बारह सूर्यों के समान तेजस्वी हो गया था।

श्लोक 84 (skanda.6.53.84)

दुर्गंधेन परित्यक्तं सोद्यमं लघुतां गतम्॥ दृष्ट्वा च चिंतयामास नूनं मुक्तोऽस्मि पातकात्

durgaṁdhena parityaktaṁ sodyamaṁ laghutāṁ gatam dṛṣṭvā ca ciṁtayāmāsa nūnaṁ mukto'smi pātakāt

स्वयं को दुर्गंध से रहित, उद्यमशील और हल्का देखकर उसने सोचा -- "निश्चय ही अब मैं पाप से मुक्त हो गया हूँ।"

श्लोक 85 (skanda.6.53.85)

एतस्मिन्नेव काले तु वागुवाचाशरीरिणी॥ हर्षयन्ती महीपालं विमुक्तं ब्रह्महत्यया

etasminneva kāle tu vāguvācāśarīriṇī harṣayantī mahīpālaṁ vimuktaṁ brahmahatyayā

उसी क्षण एक अशरीरी वाणी हुई, जो ब्रह्महत्या से मुक्त हुए उस राजा को प्रसन्न करती हुई बोली --

श्लोक 86 (skanda.6.53.86)

विमुक्तोऽसि महाराज सांप्रतं पूर्वपातकैः॥ तीर्थस्यास्य प्रभावेन तस्माद्गच्छ निजं गृहम्

vimukto'si mahārāja sāṁprataṁ pūrvapātakaiḥ tīrthasyāsya prabhāvena tasmādgaccha nijaṁ gṛham

"हे महाराज, इस तीर्थ के प्रभाव से अब आप अपने पूर्व पापों से मुक्त हो गए हैं; इसलिए अपने घर जाइए।"

श्लोक 87 (skanda.6.53.87)

अत्र संनिहितो नित्यं भ्रूणरूपेण शंकरः॥ कृष्णपक्षे विशेषेण चतुर्दश्यां महीपते

atra saṁnihito nityaṁ bhrūṇarūpeṇa śaṁkaraḥ kṛṣṇapakṣe viśeṣeṇa caturdaśyāṁ mahīpate

"हे राजन्, यहाँ भ्रूण के रूप में शंकर सदा विराजमान रहते हैं, विशेषतः कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को।"

श्लोक 88 (skanda.6.53.88)

यदा प्रपतितं लिंगं देवदेवस्य शूलिनः॥ द्विजशापेन गर्तैषा तदानेन विनिर्मिता

yadā prapatitaṁ liṁgaṁ devadevasya śūlinaḥ dvijaśāpena gartaiṣā tadānena vinirmitā

"जब द्विज के शाप से शूलधारी देवदेव का लिंग गिर गया था, उसी समय उन्होंने यह गर्त बनाई थी।"

श्लोक 89 (skanda.6.53.89)

लज्जितेन स्ववासार्थं महद्दुःखयुतेन च॥ सतीवियोगयुक्तेन भ्रूणत्वं प्रगतेन च

lajjitena svavāsārthaṁ mahadduḥkhayutena ca satīviyogayuktena bhrūṇatvaṁ pragatena ca

"लज्जित होकर, अपने निवास के लिए, अत्यंत दुःख से युक्त होकर और सती-वियोग से पीड़ित होकर, उन्होंने भ्रूण-रूप धारण किया।"

श्लोक 90 (skanda.6.53.90)

सर्वपापहरा तेन गर्तेयं पृथिवीपते॥ भ्रूणगर्तेति विख्याता तस्य नामा जगत्त्रये

sarvapāpaharā tena garteyaṁ pṛthivīpate bhrūṇagarteti vikhyātā tasya nāmā jagattraye

"हे पृथ्वीपते, उन्हीं के कारण यह गर्त सभी पापों को हरने वाली बन गई, और तीनों लोकों में उसका नाम भ्रूणगर्ता के रूप में विख्यात हुआ।"

श्लोक 91 (skanda.6.53.91)

सूत उवाच॥ एवमुक्त्वाथ सा वाणी विररामांऽतरिक्षगा॥ सोऽपि पार्थिवशार्दूलः प्रहृष्टः स्वपुरं ययौ

sūta uvāca evamuktvātha sā vāṇī virarāmāṁ'tarikṣagā so'pi pārthivaśārdūlaḥ prahṛṣṭaḥ svapuraṁ yayau

सूत जी ने कहा -- ऐसा कहकर वह आकाशवाणी शांत हो गई; और वह श्रेष्ठ राजा भी प्रसन्न होकर अपनी नगरी को गया।

श्लोक 92 (skanda.6.53.92)

ततस्तं पापनिर्मुक्तं तेजसा भास्करोपमम्॥ दृष्ट्वा पुत्रास्तथा मर्त्याः प्रणेमुस्तुष्टिसंयुताः

tatastaṁ pāpanirmuktaṁ tejasā bhāskaropamam dṛṣṭvā putrāstathā martyāḥ praṇemustuṣṭisaṁyutāḥ

तब उसे पापमुक्त और सूर्य के समान तेजस्वी देखकर उसके पुत्रों तथा प्रजाजनों ने प्रसन्नतापूर्वक उसे प्रणाम किया।

श्लोक 93 (skanda.6.53.93)

सोऽपि ब्राह्मणशार्दूलो वसिष्ठस्तं महीपतिम्॥ समभ्येत्य ततः प्राह हर्षगद्गदया गिरा

so'pi brāhmaṇaśārdūlo vasiṣṭhastaṁ mahīpatim samabhyetya tataḥ prāha harṣagadgadayā girā

तब वह ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठ भी उस राजा के पास आकर हर्ष से गद्गद वाणी में बोले --

श्लोक 94 (skanda.6.53.94)

दिष्ट्या मुक्तोसि राजेंद्र पापाद्ब्रह्मवधोद्भवात्॥ दिष्ट्या त्वं तेजसा युक्तः पुनः प्राप्तो निजं पुरम्

diṣṭyā muktosi rājeṁdra pāpādbrahmavadhodbhavāt diṣṭyā tvaṁ tejasā yuktaḥ punaḥ prāpto nijaṁ puram

"हे राजेंद्र, यह सौभाग्य है कि आप ब्रह्महत्या से उत्पन्न पाप से मुक्त हो गए; सौभाग्य है कि तेजयुक्त होकर आप पुनः अपनी नगरी को प्राप्त हुए।"

श्लोक 95 (skanda.6.53.95)

तस्मात्कीर्तय भूपाल कस्मिंस्तीर्थे समागतः॥ त्वं मुक्तः पातकाद्घोराद्ब्रह्महत्यासमुद्भवात्

tasmātkīrtaya bhūpāla kasmiṁstīrthe samāgataḥ tvaṁ muktaḥ pātakādghorādbrahmahatyāsamudbhavāt

"इसलिए, हे राजन्, बताइए कि आप किस तीर्थ में जाकर ब्रह्महत्या से उत्पन्न उस घोर पाप से मुक्त हुए।"

श्लोक 96 (skanda.6.53.96)

ततः स कथयामास भ्रूणगर्तासमुद्भवम्॥ वृत्तांतं तस्य विप्रर्षेरनुभूतं यथा तथा

tataḥ sa kathayāmāsa bhrūṇagartāsamudbhavam vṛttāṁtaṁ tasya viprarṣeranubhūtaṁ yathā tathā

तब उसने उस विप्रऋषि को भ्रूणगर्ता की उत्पत्ति का समस्त वृत्तांत, जैसा उसने स्वयं अनुभव किया था, वैसा ही बता दिया।

श्लोक 97 (skanda.6.53.97)

ततस्ते मंत्रिणो वृद्धाः स च राजा मुनीश्वरः॥ पुत्रं प्रतर्दनंनाम राज्ये संस्थाप्य तत्क्षणात्

tataste maṁtriṇo vṛddhāḥ sa ca rājā munīśvaraḥ putraṁ pratardanaṁnāma rājye saṁsthāpya tatkṣaṇāt

तब वे वृद्ध मंत्री, वह राजा और वह मुनीश्वर -- तीनों ने तत्क्षण राजा के पुत्र प्रतर्दन नामक को राज्य पर स्थापित करके,

श्लोक 98 (skanda.6.53.98)

भ्रूणगर्तां समासाद्य तामेव द्विजसत्तमाः॥ तपश्चेरुर्महादेवं ध्यायमाना दिवा निशम्

bhrūṇagartāṁ samāsādya tāmeva dvijasattamāḥ tapaścerurmahādevaṁ dhyāyamānā divā niśam

हे द्विजसत्तमो, भ्रूणगर्ता में पहुँचकर, दिन-रात महादेव का ध्यान करते हुए वहाँ तपस्या करने लगे।

श्लोक 99 (skanda.6.53.99)

गताश्च परमां सिद्धिं कालेनाल्पेन दुर्लभाम्॥ भ्रूणरूपधरं देवं पूजयित्वा महेश्वरम्

gatāśca paramāṁ siddhiṁ kālenālpena durlabhām bhrūṇarūpadharaṁ devaṁ pūjayitvā maheśvaram

भ्रूण-रूपधारी महेश्वर देव की पूजा करके वे थोड़े ही समय में उस दुर्लभ परम सिद्धि को प्राप्त हो गए।

श्लोक 100 (skanda.6.53.100)

ततःप्रभृति सा गर्ता प्रख्याता धरणीतले॥ भ्रूणगर्तेति विप्रेंद्राः सर्वपातकनाशिनी

tataḥprabhṛti sā gartā prakhyātā dharaṇītale bhrūṇagarteti vipreṁdrāḥ sarvapātakanāśinī

हे विप्रेंद्रो, तभी से वह गर्त पृथ्वी पर भ्रूणगर्ता के नाम से प्रसिद्ध हुई -- सभी पापों का नाश करने वाली।

श्लोक 101 (skanda.6.53.101)

तत्र कृष्णचतुर्दश्यां यः श्राद्धं कुरुते नरः॥ स पितॄंस्तारयेन्नूनं दश पूर्वान्दशापरान्

tatra kṛṣṇacaturdaśyāṁ yaḥ śrāddhaṁ kurute naraḥ sa pitṝṁstārayennūnaṁ daśa pūrvāndaśāparān

वहाँ कृष्ण चतुर्दशी को जो मनुष्य श्राद्ध करता है, वह निश्चय ही अपने दस पूर्वजों और दस उत्तर पीढ़ियों को तार देता है।

श्लोक 102 (skanda.6.53.102)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्र श्राद्धं समाचरेत्॥ स्नानं च ब्राह्मणश्रेष्ठा दानं वापि स्वशक्तितः

tasmātsarvaprayatnena tatra śrāddhaṁ samācaret snānaṁ ca brāhmaṇaśreṣṭhā dānaṁ vāpi svaśaktitaḥ

इसलिए, हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, वहाँ पूर्ण प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए, तथा अपनी शक्ति के अनुसार स्नान और दान भी करना चाहिए।

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