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नागर खण्ड · अध्याय 54

नल द्वारा स्थापित चर्ममुण्डा माहात्म्य

अध्याय 53अध्याय-सूचीअध्याय 55

श्लोक 1 (skanda.6.54.1)

सूत उवाच॥ चर्ममुंडा तथा देवी तस्मिन्स्थाने व्यवस्थिता॥ नलेन स्थापिता पूर्वं स्वयमेव महात्मना

sūta uvāca carmamuṁḍā tathā devī tasminsthāne vyavasthitā nalena sthāpitā pūrvaṁ svayameva mahātmanā

सूत जी ने कहा -- उस स्थान में चर्ममुंडा देवी भी विराजमान हैं, जिन्हें पूर्वकाल में स्वयं महात्मा नल ने स्थापित किया था।

श्लोक 2 (skanda.6.54.2)

अभ्यर्चयति तां भक्त्या यो महानवमी दिने॥ स कामान्वांछिताँल्लब्ध्वा पदं प्राप्नोति शाश्वतम्

abhyarcayati tāṁ bhaktyā yo mahānavamī dine sa kāmānvāṁchitā~llabdhvā padaṁ prāpnoti śāśvatam

जो कोई महानवमी के दिन भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह अपनी इच्छित कामनाओं को पाकर शाश्वत पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (skanda.6.54.3)

वीरसेनसुतः पूर्वं नलोनाम महीपतिः॥ आसीत्सर्वगुणोपेतः सर्वशत्रुक्षयावहः

vīrasenasutaḥ pūrvaṁ nalonāma mahīpatiḥ āsītsarvaguṇopetaḥ sarvaśatrukṣayāvahaḥ

पूर्वकाल में वीरसेन के पुत्र नल नामक एक राजा थे, जो सभी गुणों से संपन्न और अपने सभी शत्रुओं का नाश करने वाले थे।

श्लोक 4 (skanda.6.54.4)

भार्या तस्याभवत्साध्वी प्राणेभ्योपि गरीयसी॥ दमयंतीति विख्याता विदर्भाधिपतेः सुता

bhāryā tasyābhavatsādhvī prāṇebhyopi garīyasī damayaṁtīti vikhyātā vidarbhādhipateḥ sutā

उनकी पत्नी एक साध्वी स्त्री थीं, जो उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय थीं -- दमयंती नाम से विख्यात, विदर्भ के राजा की पुत्री।

श्लोक 5 (skanda.6.54.5)

अथासौ कलिनाविष्टो द्यूतं चक्रे महीपतिः॥ पुष्करेण समं विप्रा दायादेन दिवानिशम्

athāsau kalināviṣṭo dyūtaṁ cakre mahīpatiḥ puṣkareṇa samaṁ viprā dāyādena divāniśam

हे विप्रो, तब कलि से ग्रस्त होकर उस राजा ने अपने ही बंधु पुष्कर के साथ दिन-रात द्यूत खेला।

श्लोक 6 (skanda.6.54.6)

ततः स व्यसनासक्तो वार्यमाणोऽपि सज्जनैः॥ हारयामास सप्तांगं राज्यं मुक्त्वा च तां प्रियाम्

tataḥ sa vyasanāsakto vāryamāṇo'pi sajjanaiḥ hārayāmāsa saptāṁgaṁ rājyaṁ muktvā ca tāṁ priyām

तब उस दुर्व्यसन में आसक्त राजा ने सज्जनों द्वारा रोके जाने पर भी अपने सप्तांग राज्य को हार दिया, केवल अपनी प्रिय पत्नी को छोड़कर।

श्लोक 7 (skanda.6.54.7)

अथ तां स समादाय प्रविष्टो गहनं वनम्॥ निर्जलं लज्जयाविष्टो दुःखव्याकुलितेंद्रियः

atha tāṁ sa samādāya praviṣṭo gahanaṁ vanam nirjalaṁ lajjayāviṣṭo duḥkhavyākuliteṁdriyaḥ

तब उसे साथ लेकर, लज्जा से आविष्ट और दुःख से व्याकुल इंद्रियों वाला वह राजा एक घोर, जलरहित वन में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 8 (skanda.6.54.8)

ततः स चिंतयामास यद्येषा भीममंदिरे॥ याति तन्मुच्यते कष्टाद्वनवाससमुद्भवात्

tataḥ sa ciṁtayāmāsa yadyeṣā bhīmamaṁdire yāti tanmucyate kaṣṭādvanavāsasamudbhavāt

तब उसने सोचा -- "यदि यह भीम के महल में चली जाए, तो यह वनवास से उत्पन्न कष्ट से मुक्त हो जाएगी।"

श्लोक 9 (skanda.6.54.9)

न मया तत्र गंतव्यं कथंचिदपि मानिना॥ तस्मादेनां परित्यज्य रात्रौ गच्छामि दूरतः

na mayā tatra gaṁtavyaṁ kathaṁcidapi māninā tasmādenāṁ parityajya rātrau gacchāmi dūrataḥ

"किंतु स्वाभिमानी होने के कारण मुझे किसी भी प्रकार वहाँ नहीं जाना चाहिए; इसलिए इसे छोड़कर मैं रात्रि में दूर चला जाऊँगा।"

श्लोक 10 (skanda.6.54.10)

येन त्यक्ता मया साध्वी कुण्डिनं याति तत्पुरम्॥ स एवं निश्चयं कृत्वा सुखसुप्तां विहाय ताम्॥ प्रजगाम वनं घोरं वन्यश्वापदसंकुलम्

yena tyaktā mayā sādhvī kuṇḍinaṁ yāti tatpuram sa evaṁ niścayaṁ kṛtvā sukhasuptāṁ vihāya tām prajagāma vanaṁ ghoraṁ vanyaśvāpadasaṁkulam

"जिससे यह साध्वी मेरे द्वारा त्यक्त होकर कुंडिनपुर चली जाए" -- ऐसा निश्चय करके उसने सुखपूर्वक सोई हुई उसे छोड़ दिया, और वन्य पशुओं से भरे भयंकर वन में चला गया।

श्लोक 11 (skanda.6.54.11)

प्रत्यूषे चापि सोत्थाय यावत्पश्यति भाभिनी॥ तावत्पश्यतिशून्यं स्वं पार्श्वं यत्र नलः स्थितः

pratyūṣe cāpi sotthāya yāvatpaśyati bhābhinī tāvatpaśyatiśūnyaṁ svaṁ pārśvaṁ yatra nalaḥ sthitaḥ

प्रातःकाल जब वह सुंदरी उठकर देखने लगी, तो उसने अपने उस पार्श्व को शून्य पाया, जहाँ नल स्थित थे।

श्लोक 12 (skanda.6.54.12)

ततो विलप्य दुःखार्ता करुणं तत्र कानने॥ जगाम मार्गमाश्रित्थ पितुर्हर्म्यं शनैःशनैः

tato vilapya duḥkhārtā karuṇaṁ tatra kānane jagāma mārgamāśrittha piturharmyaṁ śanaiḥśanaiḥ

तब दुःख से पीड़ित होकर उस वन में करुण विलाप करते हुए वह मार्ग का सहारा लेकर धीरे-धीरे अपने पिता के महल की ओर चली गई।

श्लोक 13 (skanda.6.54.13)

नलोऽपि च वने तस्मिन्भ्रममाणो महीपतिः॥ एकाकी वृक्षकुंजानि सेवयामास सर्वदा

nalo'pi ca vane tasminbhramamāṇo mahīpatiḥ ekākī vṛkṣakuṁjāni sevayāmāsa sarvadā

राजा नल भी उस वन में भटकते हुए, अकेले, सदा वृक्षों के कुंजों का ही आश्रय लेते रहे।

श्लोक 14 (skanda.6.54.14)

ततस्तद्वनमुत्सृज्य जगामान्यन्महावनम्॥ नानावृक्षगणैर्युक्तं बहुश्वापदसंकुलम्

tatastadvanamutsṛjya jagāmānyanmahāvanam nānāvṛkṣagaṇairyuktaṁ bahuśvāpadasaṁkulam

फिर उस वन को छोड़कर वे दूसरे महावन में चले गए, जो विविध वृक्ष-समूहों और अनेक वन्य पशुओं से भरा था।

श्लोक 15 (skanda.6.54.15)

एवं स पृथिवीपालो भ्रममाणोवनाद्वनम्॥ हाटकेश्वरजं क्षेत्रमाससाद ततः परम्

evaṁ sa pṛthivīpālo bhramamāṇovanādvanam hāṭakeśvarajaṁ kṣetramāsasāda tataḥ param

इस प्रकार वन-वन भटकते हुए वह राजा अंततः हाटकेश्वर क्षेत्र में जा पहुँचे।

श्लोक 16 (skanda.6.54.16)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्तं तन्महानवमीदिनम्॥ विशेषाद्यत्र भूपालाः पूजयन्ति सुरेश्वरीम्

etasminnaṁtare prāptaṁ tanmahānavamīdinam viśeṣādyatra bhūpālāḥ pūjayanti sureśvarīm

इसी बीच वह महानवमी का दिन आ पहुँचा, जिसमें राजा लोग विशेष रूप से सुरेश्वरी देवी की पूजा करते हैं।

श्लोक 17 (skanda.6.54.17)

ततः स मृन्मयीं कृत्वा चर्ममुण्डधरां नृपः॥ विभवाभावतः पश्चात्फलमूलैरतर्पयत्

tataḥ sa mṛnmayīṁ kṛtvā carmamuṇḍadharāṁ nṛpaḥ vibhavābhāvataḥ paścātphalamūlairatarpayat

तब उस राजा ने चर्म और मुंड धारण किए हुए देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाई, और साधनों के अभाव में फल-मूल से उन्हें तृप्त किया।

श्लोक 18 (skanda.6.54.18)

ततस्तस्याः स्तुतिं कृत्वा पुरः स्थित्वा कृतांजलिः॥ श्रद्धया परया युक्तो निषधाधिपतिः स्वयम्

tatastasyāḥ stutiṁ kṛtvā puraḥ sthitvā kṛtāṁjaliḥ śraddhayā parayā yukto niṣadhādhipatiḥ svayam

तब उनके सामने खड़े होकर, हाथ जोड़े हुए और परम श्रद्धा से युक्त होकर, स्वयं निषधनरेश ने उनकी यह स्तुति की --

श्लोक 19 (skanda.6.54.19)

जय सर्वगते देवि चर्ममुण्डधरे वरे॥ जय दैत्यकुलोच्छेददक्षे दक्षात्मजे शुभे

jaya sarvagate devi carmamuṇḍadhare vare jaya daityakulocchedadakṣe dakṣātmaje śubhe

"हे सर्वव्यापिनी देवी, चर्म-मुंडधारिणी वरदे, तुम्हारी जय हो! हे दैत्यकुल का विनाश करने में कुशल, शुभे दक्षपुत्री, तुम्हारी जय हो!"

श्लोक 20 (skanda.6.54.20)

कालरात्रि जयाचिन्त्ये नवम्यष्टमिवल्लभे॥ त्रिनेत्रे त्र्यंबकाभीष्टे जय देवि सुरार्चिते

kālarātri jayācintye navamyaṣṭamivallabhe trinetre tryaṁbakābhīṣṭe jaya devi surārcite

"हे कालरात्रि, हे अचिंत्ये, नवमी और अष्टमी की प्रिय, तुम्हारी जय हो! हे त्रिनेत्रे, त्र्यंबक की अभीष्टे, हे देवी सुरार्चिते, तुम्हारी जय हो!"

श्लोक 21 (skanda.6.54.21)

भीमरूपे सुरूपे च महाविद्ये महाबले॥ महोदये महाकाये जयदेवि महाव्रते

bhīmarūpe surūpe ca mahāvidye mahābale mahodaye mahākāye jayadevi mahāvrate

"हे भीमरूपे, हे सुरूपे, हे महाविद्ये, हे महाबले, हे महोदये, हे महाकाये, हे महाव्रता देवी, तुम्हारी जय हो!"

श्लोक 22 (skanda.6.54.22)

नित्यरूपे जगद्धात्रि सुरामांसवसाप्रिये॥ विकरालि महाकालि जय प्रेतजनानुगे

nityarūpe jagaddhātri surāmāṁsavasāpriye vikarāli mahākāli jaya pretajanānuge

"हे नित्यरूपे, हे जगद्धात्रि, हे सुरा-मांस-वसा की प्रिय, हे विकराले महाकालि, प्रेतगणों से घिरी हुई, तुम्हारी जय हो!"

श्लोक 23 (skanda.6.54.23)

शवयानरते रम्ये भुजंगाभरणान्विते॥ पाशहस्ते महाहस्ते रुधिरौघकृतास्पदे

śavayānarate ramye bhujaṁgābharaṇānvite pāśahaste mahāhaste rudhiraughakṛtāspade

"हे शवयान में रमने वाली रम्ये, सर्पाभूषणों से युक्त, पाशधारिणी महाहस्ते, रुधिर की धाराओं में निवास करने वाली --"

श्लोक 24 (skanda.6.54.24)

फेत्कारा रवशोभिष्ठे गीतवाद्यविराजिते॥ जयानाद्ये जय ध्येये भर्गदेहार्धसंश्रये

phetkārā ravaśobhiṣṭhe gītavādyavirājite jayānādye jaya dhyeye bhargadehārdhasaṁśraye

"हे फेत्कार ध्वनि से सुशोभित, गीत-वाद्य से विराजित, हे अनादि देवी तुम्हारी जय हो, हे ध्येये, भर्ग शिव के अर्ध शरीर में निवास करने वाली, तुम्हारी जय हो!"

श्लोक 25 (skanda.6.54.25)

त्वं रतिस्त्वं धृतिस्तुष्टिस्त्वं गौरी त्वं सुरेश्वरी॥ त्वं लक्ष्मीस्त्वं च सावित्री गायत्री त्वमसंशयम्

tvaṁ ratistvaṁ dhṛtistuṣṭistvaṁ gaurī tvaṁ sureśvarī tvaṁ lakṣmīstvaṁ ca sāvitrī gāyatrī tvamasaṁśayam

"तुम ही रति हो, तुम ही धृति हो, तुम ही तुष्टि हो, तुम ही गौरी हो, तुम ही सुरेश्वरी हो; तुम ही लक्ष्मी हो और निःसंदेह तुम ही सावित्री और गायत्री हो।"

श्लोक 26 (skanda.6.54.26)

यत्किंचित्त्रिषु लोकेषु स्त्रीरूपं देवि दृश्यते॥ तत्सर्वं त्वन्मयं नात्र विकल्पोऽस्ति मम क्वचित्

yatkiṁcittriṣu lokeṣu strīrūpaṁ devi dṛśyate tatsarvaṁ tvanmayaṁ nātra vikalpo'sti mama kvacit

"हे देवी, तीनों लोकों में जो भी स्त्री-रूप दिखाई देता है, वह सब तुम्हारा ही स्वरूप है; इसमें मुझे कहीं कोई संशय नहीं है।"

श्लोक 27 (skanda.6.54.27)

येन सत्येन तेन त्वमत्रावासं द्रुतं कुरु॥ सान्निध्यं भक्तितस्तुष्टा सुरासुरनमस्कृते

yena satyena tena tvamatrāvāsaṁ drutaṁ kuru sānnidhyaṁ bhaktitastuṣṭā surāsuranamaskṛte

"जो भी सत्य हो, उसी सत्य से तुम यहाँ शीघ्र निवास करो; हे सुरासुरनमस्कृते, भक्ति से प्रसन्न होकर अपना सान्निध्य प्रदान करो।"

श्लोक 28 (skanda.6.54.28)

सूत उवाच॥ एवं स्तुता च सा देवी नलेन पृथिवीभुजा॥ प्रोवाच दर्शनं गत्वा तं नृपं भक्तवत्सला

sūta uvāca evaṁ stutā ca sā devī nalena pṛthivībhujā provāca darśanaṁ gatvā taṁ nṛpaṁ bhaktavatsalā

सूत जी ने कहा -- इस प्रकार राजा नल द्वारा स्तुति किए जाने पर, भक्तवत्सला वह देवी उस राजा को दर्शन देकर बोलीं --

श्लोक 29 (skanda.6.54.29)

श्रीदेव्युवाच॥ परितुष्टाऽस्मि ते वत्स स्तोत्रेणानेन सांप्रतम्॥ तस्माद्गृहाण मत्तस्त्वं वरं मनसि संस्थितम्

śrīdevyuvāca parituṣṭā'smi te vatsa stotreṇānena sāṁpratam tasmādgṛhāṇa mattastvaṁ varaṁ manasi saṁsthitam

श्रीदेवी ने कहा -- "हे वत्स, इस स्तोत्र से अब मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; इसलिए अपने मन में स्थित वर मुझसे माँग लो।"

श्लोक 30 (skanda.6.54.30)

नल उवाच॥ दमयन्तीति मे भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी॥ सा मया निर्जने मुक्ता वने व्यालगणान्विते

nala uvāca damayantīti me bhāryā prāṇebhyo'pi garīyasī sā mayā nirjane muktā vane vyālagaṇānvite

नल ने कहा -- "मेरी पत्नी दमयंती, जो मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है, मेरे द्वारा एक निर्जन, सर्प-व्याघ्रादि से भरे वन में छोड़ दी गई थी।"

श्लोक 31 (skanda.6.54.31)

अखण्डशीलां निर्दोषां यथाहं त्वत्प्रसादतः॥ लभे भूयोऽपि तां देवि तथात्र कुरु सत्वरम्

akhaṇḍaśīlāṁ nirdoṣāṁ yathāhaṁ tvatprasādataḥ labhe bhūyo'pi tāṁ devi tathātra kuru satvaram

हे देवी, तुम्हारी कृपा से मैं उसे पुनः प्राप्त कर सकूँ -- अखंड शीलवती और निर्दोष -- ऐसा शीघ्र कर दो।

श्लोक 32 (skanda.6.54.32)

स्तोत्रेणानेन यो देवि स्तुतिं कुर्यात्पुरस्तव॥ तत्रैव दिवसे तस्मै त्वया देयं मनोगतम्

stotreṇānena yo devi stutiṁ kuryātpurastava tatraiva divase tasmai tvayā deyaṁ manogatam

हे देवी, जो कोई इस स्तोत्र से तुम्हारे समक्ष स्तुति करे, उसे उसी दिन उसका मनोवांछित फल तुम्हारे द्वारा प्रदान किया जाए।

श्लोक 33 (skanda.6.54.33)

सूत उवाच॥ सा तथेति प्रतिज्ञाय जगामादर्शनं ततः॥ सोऽपि पार्थिवशार्दूलो लेभे सर्वं तयोदितम्

sūta uvāca sā tatheti pratijñāya jagāmādarśanaṁ tataḥ so'pi pārthivaśārdūlo lebhe sarvaṁ tayoditam

सूत जी ने कहा -- वह देवी "ऐसा ही हो" कहकर स्वीकार करके अंतर्धान हो गईं; और उस श्रेष्ठ राजा को उन्होंने जो कहा था, वह सब प्राप्त हो गया।

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