नागर खण्ड · अध्याय 55
नलेश्वर माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.6.55.1)
सूत उवाच॥ तस्या एव समीपस्थं देवदेवं नलेश्वरम्॥ दृष्ट्वा विमुच्युते पापात्स्थापितं नलभूभुजा
sūta uvāca tasyā eva samīpasthaṁ devadevaṁ naleśvaram dṛṣṭvā vimucyute pāpātsthāpitaṁ nalabhūbhujā
सूत जी ने कहा -- उन्हीं के समीप देवदेव नलेश्वर विराजमान हैं, जिन्हें राजा नल ने स्थापित किया था; उनका दर्शन करने से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.6.55.2)
यस्तं पश्येन्नरो भक्त्या माघे षष्ठ्यां सिते द्विजाः॥ सर्वरोगविनिर्मुक्तः प्राप्नोति परमं पदम्
yastaṁ paśyennaro bhaktyā māghe ṣaṣṭhyāṁ site dvijāḥ sarvarogavinirmuktaḥ prāpnoti paramaṁ padam
हे द्विजो, जो मनुष्य माघ मास की शुक्ल षष्ठी को भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करता है, वह सभी रोगों से मुक्त होकर परम पद प्राप्त करता है।
श्लोक 3 (skanda.6.55.3)
कण्डूः पामाथ दद्रूणि मंडलानि विचर्चिका॥ दर्शनात्तस्य नश्यन्ति जन्तूनां भावितात्मनाम्
kaṇḍūḥ pāmātha dadrūṇi maṁḍalāni vicarcikā darśanāttasya naśyanti jantūnāṁ bhāvitātmanām
खुजली, खाज, दाद, चकत्ते और विचर्चिका -- ये सभी भावशुद्ध प्राणियों के उनके दर्शनमात्र से नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.6.55.4)
अस्ति तस्याग्रतः कुण्डं स्वच्छोदकसुपूरितम्॥ मत्स्यकूर्मसमाकीर्णं पद्मिनीखंडमंडितम्
asti tasyāgrataḥ kuṇḍaṁ svacchodakasupūritam matsyakūrmasamākīrṇaṁ padminīkhaṁḍamaṁḍitam
उनके सामने एक कुंड है, जो स्वच्छ जल से भरपूर, मछलियों और कछुओं से युक्त, तथा कमल-समूहों से सुशोभित है।
श्लोक 5 (skanda.6.55.5)
यस्तत्र कुरुते स्नानं प्रत्यूषे सोमवासरे॥ अपि कुष्ठामयमस्तः स भूयः स्यात्पुनर्नवः
yastatra kurute snānaṁ pratyūṣe somavāsare api kuṣṭhāmayamastaḥ sa bhūyaḥ syātpunarnavaḥ
जो कोई सोमवार को प्रातःकाल वहाँ स्नान करता है, वह कोढ़ जैसे रोग से ग्रस्त होने पर भी पुनः नया-सा स्वस्थ हो जाता है।
श्लोक 6 (skanda.6.55.6)
यदा संस्थापितः शंभुर्नलेन पृथिवीभुजा॥ तदा तुष्टेन स प्रोक्तो ब्रूहि किं ते करोम्यहम्
yadā saṁsthāpitaḥ śaṁbhurnalena pṛthivībhujā tadā tuṣṭena sa prokto brūhi kiṁ te karomyaham
जब राजा नल द्वारा शंभु की स्थापना की गई, तब प्रसन्न होकर उन्होंने राजा से कहा -- "बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?"
श्लोक 7 (skanda.6.55.7)
नल उवाच॥ अत्र स्थेयं त्वया देव सदा सन्निहितेन च॥ सर्वलोकहितार्थाय रोगनाशाय शंकर
nala uvāca atra stheyaṁ tvayā deva sadā sannihitena ca sarvalokahitārthāya roganāśāya śaṁkara
नल ने कहा -- "हे देव, हे शंकर, आप यहाँ सदा सन्निहित रहकर विराजें, सम्पूर्ण जगत के हित और रोगनाश के लिए।"
श्लोक 8 (skanda.6.55.8)
शंकर उवाच॥ अहं त्वद्वचनाद्राजन्संप्राप्ते सोमवासरे॥ प्रत्यूषे च निवत्स्यामि प्रासादे नात्र संशयः
śaṁkara uvāca ahaṁ tvadvacanādrājansaṁprāpte somavāsare pratyūṣe ca nivatsyāmi prāsāde nātra saṁśayaḥ
शंकर ने कहा -- "हे राजन्, तुम्हारे वचन से मैं जब भी सोमवार आएगा, प्रातःकाल इस प्रासाद में निवास करूँगा -- इसमें संदेह नहीं है।"
श्लोक 9 (skanda.6.55.9)
माघाष्टम्यामहोरात्रं सकलं च महीपते॥ प्राणिनां रोगनाशाय शुक्लपक्षे विशेषतः
māghāṣṭamyāmahorātraṁ sakalaṁ ca mahīpate prāṇināṁ roganāśāya śuklapakṣe viśeṣataḥ
और हे राजन्, माघ की अष्टमी को, विशेषतः शुक्ल पक्ष में, मैं संपूर्ण दिन-रात प्राणियों के रोगनाश के लिए यहाँ रहूँगा।
श्लोक 10 (skanda.6.55.10)
यो मामत्र स्थितं तत्र दिवसे वीक्षयिष्यति॥ स्नात्वा सुविमले कुंडे सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः॥ तस्य नाशं प्रयास्यंति व्याधयो गात्रसंभवाः
yo māmatra sthitaṁ tatra divase vīkṣayiṣyati snātvā suvimale kuṁḍe samyakchraddhāsamanvitaḥ tasya nāśaṁ prayāsyaṁti vyādhayo gātrasaṁbhavāḥ
जो मनुष्य इस अत्यंत निर्मल कुंड में स्नान करके, सम्यक श्रद्धा से युक्त होकर, उस दिन यहाँ विराजमान मुझे देखता है, उसके शरीर में उत्पन्न सभी व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं।
श्लोक 11 (skanda.6.55.11)
योऽस्य कुंडस्य संभूतां मृत्तिकामपि मानवः॥ संधास्यति निजे देहे सोमवारे निशाक्षये॥ सोऽपि रोगैर्विनिर्मुक्तः संभविष्यति पुष्टिमान्
yo'sya kuṁḍasya saṁbhūtāṁ mṛttikāmapi mānavaḥ saṁdhāsyati nije dehe somavāre niśākṣaye so'pi rogairvinirmuktaḥ saṁbhaviṣyati puṣṭimān
और जो मनुष्य सोमवार की रात्रि के अंत में इस कुंड से उत्पन्न मिट्टी को भी अपने शरीर पर लगाता है, वह भी रोगों से मुक्त होकर पुष्टिमान हो जाएगा।
श्लोक 12 (skanda.6.55.12)
निष्कामस्तु पुनर्यो मां तस्मिन्काले नृपोत्तम॥ पूजयिष्यति सद्भक्त्या पुष्पधूपानुलेपनैः॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो मम लोकं स यास्यति
niṣkāmastu punaryo māṁ tasminkāle nṛpottama pūjayiṣyati sadbhaktyā puṣpadhūpānulepanaiḥ sarvapāpavinirmukto mama lokaṁ sa yāsyati
परंतु, हे नृपोत्तम, जो निष्काम भाव से उस समय पुष्प, धूप और अनुलेपन से सच्ची भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर मेरे लोक को प्राप्त होगा।
श्लोक 13 (skanda.6.55.13)
सूत उवाच॥ एवमुक्त्वा स भगवांस्त्रैलोक्यदीपको हरः॥ अन्तर्धानं गतो विप्रा यथा दीपोऽत्र तत्क्षणात्
sūta uvāca evamuktvā sa bhagavāṁstrailokyadīpako haraḥ antardhānaṁ gato viprā yathā dīpo'tra tatkṣaṇāt
सूत जी ने कहा -- हे विप्रो, ऐसा कहकर त्रैलोक्य के दीपक भगवान हर उसी क्षण दीपक के समान अंतर्धान हो गए।
श्लोक 14 (skanda.6.55.14)
नलोऽपि तुष्टिमापन्नस्तमाराध्य चिरं नृपः॥ तदाहूयाखिलान्विप्रांश्चमत्कारपुरोद्भवान्
nalo'pi tuṣṭimāpannastamārādhya ciraṁ nṛpaḥ tadāhūyākhilānviprāṁścamatkārapurodbhavān
और राजा नल भी संतोष को प्राप्त होकर, चिरकाल तक उनकी आराधना करके, चमत्कारपुर के सभी ब्राह्मणों को बुलवाया।
श्लोक 15 (skanda.6.55.15)
एष संस्थापितः शंभुर्मया युष्मत्पुरोंतिके॥ येन दृष्टेन रोगाणां सर्वेषां जायते क्षयः
eṣa saṁsthāpitaḥ śaṁbhurmayā yuṣmatpuroṁtike yena dṛṣṭena rogāṇāṁ sarveṣāṁ jāyate kṣayaḥ
"यह शंभु मैंने तुम्हारे नगर के समीप स्थापित किया है, जिसके दर्शन से सभी रोगों का नाश होता है।"
श्लोक 16 (skanda.6.55.16)
अधुनाहं गमिष्यामि स्वराज्याय कृते द्विजाः॥ निषधां च पुरीमेष सर्वैः पूज्यः समाहितैः
adhunāhaṁ gamiṣyāmi svarājyāya kṛte dvijāḥ niṣadhāṁ ca purīmeṣa sarvaiḥ pūjyaḥ samāhitaiḥ
"हे द्विजो, अब मैं अपने राज्य की ओर, निषधापुरी को जाऊँगा; तुम सब समाहित होकर सदा इनकी पूजा करते रहना।"
श्लोक 17 (skanda.6.55.17)
ब्राह्मणा ऊचुः॥ एवं पार्थिवशार्दूल करिष्यामः समाहिताः॥ तव देवकृते यत्नं यात्राद्यासु क्रियासु च
brāhmaṇā ūcuḥ evaṁ pārthivaśārdūla kariṣyāmaḥ samāhitāḥ tava devakṛte yatnaṁ yātrādyāsu kriyāsu ca
ब्राह्मणों ने कहा -- "हे राजश्रेष्ठ, ऐसा ही हम समाहित होकर करेंगे; तुम्हारे लिए इस देव की यात्रादि क्रियाओं में हम यत्न करेंगे।"
श्लोक 18 (skanda.6.55.18)
तथा पूजां करिष्यामः श्रद्धया परया युताः॥ अस्माकं पुत्रपौत्रा ये भविष्यंति तथा परे॥ वंशजास्ते करिष्यंति पूजामस्य सुभक्तितः
tathā pūjāṁ kariṣyāmaḥ śraddhayā parayā yutāḥ asmākaṁ putrapautrā ye bhaviṣyaṁti tathā pare vaṁśajāste kariṣyaṁti pūjāmasya subhaktitaḥ
"और हम परम श्रद्धा से युक्त होकर उनकी पूजा करेंगे; तथा हमारे जो पुत्र-पौत्र और अन्य वंशज आगे होंगे, वे भी सुभक्तिपूर्वक इनकी पूजा करते रहेंगे।"
श्लोक 19 (skanda.6.55.19)
सूत उवाच॥ एवमुक्तः स भूपालस्तैर्विप्रैस्तुष्टिसंयुतः॥ प्रतस्थे तान्प्रणम्योच्चैः सर्वैस्तैश्चाभिनंदितः
sūta uvāca evamuktaḥ sa bhūpālastairvipraistuṣṭisaṁyutaḥ pratasthe tānpraṇamyoccaiḥ sarvaistaiścābhinaṁditaḥ
सूत जी ने कहा -- यह सुनकर संतुष्ट हुआ वह राजा उन सबको भलीभाँति प्रणाम करके, उन सबके द्वारा अभिनंदित होकर वहाँ से चल पड़ा।
श्लोक 20 (skanda.6.55.20)
एवं स भगवाञ्छंभुस्तस्मिन्स्थाने व्यवस्थितः॥ हिताय सर्वलोकानां सर्वरोगक्षयावहः
evaṁ sa bhagavāñchaṁbhustasminsthāne vyavasthitaḥ hitāya sarvalokānāṁ sarvarogakṣayāvahaḥ
इस प्रकार वे भगवान शंभु उस स्थान में विराजमान हैं, समस्त जगत के हित के लिए और सब रोगों का नाश करने वाले।
श्लोक 21 (skanda.6.55.21)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वीक्षणीयः सदा हि सः॥ विशेषात्सोमवारेण शाश्वतं श्रेय इच्छता
tasmātsarvaprayatnena vīkṣaṇīyaḥ sadā hi saḥ viśeṣātsomavāreṇa śāśvataṁ śreya icchatā
इसलिए शाश्वत कल्याण की इच्छा रखने वाले को सदा पूर्ण प्रयत्नपूर्वक, विशेषतः सोमवार को, उनका दर्शन करना चाहिए।