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नागर खण्ड · अध्याय 56

सांबादित्य माहात्म्य

अध्याय 55अध्याय-सूचीअध्याय 57

श्लोक 1 (skanda.6.56.1)

सूत उवाच॥ तस्यापि नातिदूरस्थं सांबादित्यं सुरेश्वरम्॥ दृष्ट्वा कामानवाप्नोति सर्वान्मर्त्यो हृदि स्थितान्

sūta uvāca tasyāpi nātidūrasthaṁ sāṁbādityaṁ sureśvaram dṛṣṭvā kāmānavāpnoti sarvānmartyo hṛdi sthitān

सूत जी ने कहा -- उनसे भी अधिक दूर नहीं सांबादित्य सुरेश्वर विराजमान हैं; उनका दर्शन करने से मनुष्य अपने हृदय में स्थित सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 2 (skanda.6.56.2)

यस्तु माघस्य शुक्लायां सप्तम्यां रविवासरे॥ भक्त्या संपश्यते मर्त्यो नरकान्न स पश्यति

yastu māghasya śuklāyāṁ saptamyāṁ ravivāsare bhaktyā saṁpaśyate martyo narakānna sa paśyati

और जो मनुष्य माघ मास की शुक्ल सप्तमी को रविवार के दिन भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करता है, वह मनुष्य नरकों को कभी नहीं देखता।

श्लोक 3 (skanda.6.56.3)

आसीत्पूर्वं द्विजो नाम गालवः स महामुनिः॥ स्वाध्यायनिरतो नित्यं वेदवेदांगपारगः

āsītpūrvaṁ dvijo nāma gālavaḥ sa mahāmuniḥ svādhyāyanirato nityaṁ vedavedāṁgapāragaḥ

पूर्वकाल में गालव नामक एक ब्राह्मण थे, वे महामुनि थे, सदा स्वाध्याय में लीन और वेद-वेदांगों में पारंगत थे।

श्लोक 4 (skanda.6.56.4)

शुचिव्रतपरः शांतो देवद्विजपरायणः॥ कृतज्ञश्च सुशीलश्च यज्ञकर्मविचक्षणः

śucivrataparaḥ śāṁto devadvijaparāyaṇaḥ kṛtajñaśca suśīlaśca yajñakarmavicakṣaṇaḥ

वे पवित्र व्रतों में तत्पर, शांत, देव-द्विजपरायण, कृतज्ञ, सुशील और यज्ञकर्म में निपुण थे।

श्लोक 5 (skanda.6.56.5)

तस्यैवं वर्तमानस्य संप्राप्तं पश्चिमं वयः॥ अपुत्रस्य द्विजश्रेष्ठास्ततो दुःखं व्यजायत

tasyaivaṁ vartamānasya saṁprāptaṁ paścimaṁ vayaḥ aputrasya dvijaśreṣṭhāstato duḥkhaṁ vyajāyata

हे द्विजश्रेष्ठो, इस प्रकार रहते हुए उनकी अंतिम अवस्था आ पहुँची, और पुत्रहीन होने के कारण उन्हें बड़ा दुःख हुआ।

श्लोक 6 (skanda.6.56.6)

ततः सर्वं परित्यज्य गृहकृत्यं स भक्तिमान्॥ सूर्यमाराधयामास क्षेत्रेऽत्रैव समाहितः

tataḥ sarvaṁ parityajya gṛhakṛtyaṁ sa bhaktimān sūryamārādhayāmāsa kṣetre'traiva samāhitaḥ

तब सभी गृहकृत्यों को त्यागकर वे भक्तिमान मुनि इसी क्षेत्र में समाहित होकर सूर्य की आराधना करने लगे।

श्लोक 7 (skanda.6.56.7)

वटवृक्षं समाश्रित्य श्रद्धया परया युतः॥ स्थापयित्वा रवेरर्चां यथोक्तां पंचरात्रिके

vaṭavṛkṣaṁ samāśritya śraddhayā parayā yutaḥ sthāpayitvā raverarcāṁ yathoktāṁ paṁcarātrike

एक वटवृक्ष का आश्रय लेकर, परम श्रद्धा से युक्त होकर उन्होंने पंचरात्रिक विधि में कथित रूप से सूर्य की प्रतिमा स्थापित की।

श्लोक 8 (skanda.6.56.8)

वर्षास्वाकाशशायी च हेमंते जलसंश्रयः॥ पंचाग्निसाधको ग्रीष्मे निराहारो जितेन्द्रियः

varṣāsvākāśaśāyī ca hemaṁte jalasaṁśrayaḥ paṁcāgnisādhako grīṣme nirāhāro jitendriyaḥ

वर्षा ऋतु में वे आकाश के नीचे सोते, हेमंत में जल में खड़े रहते, ग्रीष्म में पंचाग्नि साधना करते, और निराहार तथा जितेंद्रिय रहते।

श्लोक 9 (skanda.6.56.9)

ततः पंचदशे वर्षे संप्राप्ते भगवान्रविः॥ वटवृक्षं समाश्रित्य समीपस्थमुवाच तम्

tataḥ paṁcadaśe varṣe saṁprāpte bhagavānraviḥ vaṭavṛkṣaṁ samāśritya samīpasthamuvāca tam

तब पंद्रहवाँ वर्ष आने पर, भगवान सूर्य ने उस वटवृक्ष के समीप स्थित होकर, अपने पास खड़े उस मुनि से कहा --

श्लोक 10 (skanda.6.56.10)

श्रीसूर्य उवाच॥ वरदोस्म्यद्य भद्रं ते वरं प्रार्थय गालव॥ अतिदुर्लभमप्याशु तव दास्याम्यसंशयम्

śrīsūrya uvāca varadosmyadya bhadraṁ te varaṁ prārthaya gālava atidurlabhamapyāśu tava dāsyāmyasaṁśayam

श्रीसूर्य ने कहा -- "हे गालव, आज मैं वर देने वाला हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; वर माँगो, अत्यंत दुर्लभ वर भी मैं तुम्हें शीघ्र और निःसंदेह प्रदान करूँगा।"

श्लोक 11 (skanda.6.56.11)

गालव उवाच॥ अपुत्रोऽहं सुरश्रेष्ठ पश्चिमे वयसि स्थितः॥ तस्माद्देहि सुतं मह्यं वंशवृद्धिकरं परम्

gālava uvāca aputro'haṁ suraśreṣṭha paścime vayasi sthitaḥ tasmāddehi sutaṁ mahyaṁ vaṁśavṛddhikaraṁ param

गालव ने कहा -- "हे सुरश्रेष्ठ, मैं पुत्रहीन हूँ और जीवन की अंतिम अवस्था में हूँ; इसलिए मुझे एक ऐसा उत्तम पुत्र दीजिए, जो मेरे वंश की वृद्धि करे।"

श्लोक 12 (skanda.6.56.12)

श्रीसूर्य उवाच॥ वंशवृद्धिकरो विप्र पुत्रस्तव भविष्यति॥ तेजस्वी च यशस्वी च शास्त्रज्ञो वेदपारगः

śrīsūrya uvāca vaṁśavṛddhikaro vipra putrastava bhaviṣyati tejasvī ca yaśasvī ca śāstrajño vedapāragaḥ

श्रीसूर्य ने कहा -- "हे विप्र, तुम्हें एक ऐसा पुत्र प्राप्त होगा जो तुम्हारे वंश की वृद्धि करेगा -- तेजस्वी, यशस्वी, शास्त्रज्ञ और वेदपारगामी।"

श्लोक 13 (skanda.6.56.13)

येयं त्वया कृता मेऽर्चा सांबसूर्यस्य संनिधौ॥ सांबसूर्याभिधानोऽयं भविष्यति धरातले

yeyaṁ tvayā kṛtā me'rcā sāṁbasūryasya saṁnidhau sāṁbasūryābhidhāno'yaṁ bhaviṣyati dharātale

"तुमने मेरी जो यह प्रतिमा साम्बसूर्य के सान्निध्य में बनाई है, यह पृथ्वी पर साम्बसूर्य नाम से ही प्रसिद्ध होगी।"

श्लोक 14 (skanda.6.56.14)

अन्योऽपि श्रद्रयोपेतो य एनं पूजयिष्यति॥ सप्तम्यां सूर्यवारेण यावद्द्वादश भास्कराः

anyo'pi śradrayopeto ya enaṁ pūjayiṣyati saptamyāṁ sūryavāreṇa yāvaddvādaśa bhāskarāḥ

"कोई अन्य श्रद्धायुक्त मनुष्य भी, जो सूर्यवार युक्त सप्तमी को इसकी पूजा करेगा, बारह ऐसी सप्तमियों तक,"

श्लोक 15 (skanda.6.56.15)

सप्तम्यश्च द्विजश्रेष्ठ निराहारस्तु भक्तितः या॥ स प्राप्स्यति न संदेहः पुत्रं वंशविवर्धनम्

saptamyaśca dvijaśreṣṭha nirāhārastu bhaktitaḥ yā sa prāpsyati na saṁdehaḥ putraṁ vaṁśavivardhanam

"हे द्विजश्रेष्ठ, उन सप्तमियों को भक्तिपूर्वक निराहार रहकर करने से, वह निःसंदेह अपने वंश की वृद्धि करने वाला पुत्र प्राप्त करेगा।"

श्लोक 16 (skanda.6.56.16)

एवमुक्त्वा च सप्ताश्वो विरराम दिवाकरः॥ गालवोऽपि प्रहृष्टात्मा जगाम निजमंदिरम्

evamuktvā ca saptāśvo virarāma divākaraḥ gālavo'pi prahṛṣṭātmā jagāma nijamaṁdiram

ऐसा कहकर सप्ताश्व सूर्य मौन हो गए; और गालव भी परम प्रसन्न होकर अपने निवास को गए।

श्लोक 17 (skanda.6.56.17)

नातिदीर्घेण कालेन ततस्तस्याभवत्सुतः॥ यथोक्तस्तेन देवेन सर्वलक्षणलक्षितः

nātidīrgheṇa kālena tatastasyābhavatsutaḥ yathoktastena devena sarvalakṣaṇalakṣitaḥ

थोड़े ही समय बाद उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ, जो उस देव के कथनानुसार सभी शुभ लक्षणों से युक्त था।

श्लोक 18 (skanda.6.56.18)

ततश्चक्रे पिता नाम वटेश्वर इति स्वयम्॥ वटस्थेन यतो दत्तः संतुष्टेनांशुमालिना

tataścakre pitā nāma vaṭeśvara iti svayam vaṭasthena yato dattaḥ saṁtuṣṭenāṁśumālinā

तब पिता ने स्वयं उसका नाम वटेश्वर रखा, क्योंकि वटवृक्ष के समीप स्थित प्रसन्न सूर्यदेव ने ही उसे प्रदान किया था।

श्लोक 19 (skanda.6.56.19)

वटेश्वरसुतान्दृष्ट्वा पौत्रांश्च द्विजसत्तमाः॥ गालवः सूर्यमापन्नः कृत्वा सुविपुलं तपः

vaṭeśvarasutāndṛṣṭvā pautrāṁśca dvijasattamāḥ gālavaḥ sūryamāpannaḥ kṛtvā suvipulaṁ tapaḥ

हे द्विजसत्तमो, वटेश्वर के पुत्रों और पौत्रों को देखकर गालव ने अत्यंत विशाल तपस्या करके सूर्यलोक को प्राप्त किया।

श्लोक 20 (skanda.6.56.20)

वटेश्वरोऽपि संज्ञाय पित्रा संस्थापितं रविम्॥ तदर्थं कारयामास प्रासादं सुमनोहरम्

vaṭeśvaro'pi saṁjñāya pitrā saṁsthāpitaṁ ravim tadarthaṁ kārayāmāsa prāsādaṁ sumanoharam

वटेश्वर ने भी अपने पिता द्वारा स्थापित सूर्य को पहचानकर, उनके लिए एक अत्यंत मनोहर प्रासाद बनवाया।

श्लोक 21 (skanda.6.56.21)

ततःप्रभृति लोके च स वटादित्यसंज्ञितः॥ पुत्रप्रदो ह्यपुत्राणां विख्यातो भुवनत्रये

tataḥprabhṛti loke ca sa vaṭādityasaṁjñitaḥ putraprado hyaputrāṇāṁ vikhyāto bhuvanatraye

तभी से वे संसार में वटादित्य के नाम से प्रसिद्ध हुए, और तीनों लोकों में पुत्रहीनों को पुत्र देने वाले के रूप में विख्यात हुए।

श्लोक 22 (skanda.6.56.22)

सप्तम्यां सूर्यवारेण उपवासपरायणः॥ यस्तं पूजयते भक्त्या सप्तमीर्द्वादश क्रमात्॥ स प्राप्नोति सुतं श्रेष्ठं स्ववंशस्य विवर्धनम्

saptamyāṁ sūryavāreṇa upavāsaparāyaṇaḥ yastaṁ pūjayate bhaktyā saptamīrdvādaśa kramāt sa prāpnoti sutaṁ śreṣṭhaṁ svavaṁśasya vivardhanam

जो उपवासपरायण होकर सूर्यवार सप्तमी को क्रमशः बारह सप्तमियों तक भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह अपने वंश की वृद्धि करने वाला श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करता है।

श्लोक 23 (skanda.6.56.23)

निष्कामो वा नरो यस्तु तं पूजयति मानवः॥ स मोक्षमाप्नुयान्नूनं दुर्लभं त्रिदशैरपि

niṣkāmo vā naro yastu taṁ pūjayati mānavaḥ sa mokṣamāpnuyānnūnaṁ durlabhaṁ tridaśairapi

और जो मनुष्य निष्काम भाव से उनकी पूजा करता है, वह निश्चय ही उस मोक्ष को प्राप्त करता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 24 (skanda.6.56.24)

अथ गाथा पुरा गीता नारदेन सुरर्षिणा॥ दृष्ट्वा पुत्रप्रदं देवं वटादित्यं सुरेश्वरम्

atha gāthā purā gītā nāradena surarṣiṇā dṛṣṭvā putrapradaṁ devaṁ vaṭādityaṁ sureśvaram

और यहाँ एक गाथा है, जो पूर्वकाल में देवर्षि नारद द्वारा, पुत्रप्रद देव वटादित्य सुरेश्वर का दर्शन करके गाई गई थी --

श्लोक 25 (skanda.6.56.25)

अपि वर्षशता नारी वंध्या वा दुर्भगापि वा॥ सांबसूर्यप्रसादेन सद्यो गर्भवती भवेत्

api varṣaśatā nārī vaṁdhyā vā durbhagāpi vā sāṁbasūryaprasādena sadyo garbhavatī bhavet

"सौ वर्षों तक बाँझ अथवा अत्यंत अभागी स्त्री भी साम्बसूर्य की कृपा से तत्काल गर्भवती हो जाती है।"

श्लोक 26 (skanda.6.56.26)

किं दानैः किं व्रतैर्ध्यानैः किं जपैः सोपवासकैः॥ पुत्रार्थं विद्यमानेऽथ सांबसूर्ये सुरेश्वरे

kiṁ dānaiḥ kiṁ vratairdhyānaiḥ kiṁ japaiḥ sopavāsakaiḥ putrārthaṁ vidyamāne'tha sāṁbasūrye sureśvare

"जब पुत्र-प्राप्ति के लिए स्वयं सुरेश्वर साम्बसूर्य विद्यमान हैं, तो दान, व्रत, ध्यान अथवा उपवाससहित जप से क्या लाभ?"

श्लोक 27 (skanda.6.56.27)

वर्षमेकं नरो भक्त्या यः पश्येत्सूर्यवासरे॥ कृतक्षणोऽत्र पुत्रं स लभते चोत्तमं सुखम्

varṣamekaṁ naro bhaktyā yaḥ paśyetsūryavāsare kṛtakṣaṇo'tra putraṁ sa labhate cottamaṁ sukham

"जो मनुष्य एक वर्ष तक प्रत्येक रविवार को समय निकालकर भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करता है, वह पुत्र और उत्तम सुख प्राप्त करता है।"

श्लोक 28 (skanda.6.56.28)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तं देवं यत्नतो द्विजाः॥ पश्येदात्महितार्थाय स्ववंशपरिवृद्धये

tasmātsarvaprayatnena taṁ devaṁ yatnato dvijāḥ paśyedātmahitārthāya svavaṁśaparivṛddhaye

इसलिए, हे द्विजो, अपने हित के लिए और अपने वंश की वृद्धि के लिए पूर्ण प्रयत्नपूर्वक उस देव का दर्शन करना चाहिए।

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