नागर खण्ड · अध्याय 57
भीष्म की तीर्थयात्रा और चमत्कारपुर के मंदिर
श्लोक 1 (skanda.6.57.1)
सूत उवाच॥ तस्मिन्क्षेत्रे तथादित्यः स्थापितो द्विजसत्तमाः॥ भीष्मेण ब्राह्मणेंद्राणां संमतेन तथात्मना
sūta uvāca tasminkṣetre tathādityaḥ sthāpito dvijasattamāḥ bhīṣmeṇa brāhmaṇeṁdrāṇāṁ saṁmatena tathātmanā
सूत जी ने कहा -- हे द्विजसत्तमो, उस क्षेत्र में भीष्म ने भी ब्राह्मणश्रेष्ठों की सम्मति से तथा स्वयं की इच्छा से आदित्य की स्थापना की।
श्लोक 2 (skanda.6.57.2)
शंतनोर्दयितः पुत्रो गांगेय इति विश्रुतः॥ आसीत्पुरा वरो नृणामूर्ध्वरेताः सुविश्रुतः
śaṁtanordayitaḥ putro gāṁgeya iti viśrutaḥ āsītpurā varo nṛṇāmūrdhvaretāḥ suviśrutaḥ
शंतनु के प्रिय पुत्र, जो गांगेय नाम से विख्यात थे, पूर्वकाल में मनुष्यों में श्रेष्ठ थे और ऊर्ध्वरेता (आजीवन ब्रह्मचारी) के रूप में सुविख्यात थे।
श्लोक 3 (skanda.6.57.3)
तस्यासीत्तुमुलं युद्धं भार्गवेण समं महत्॥ त्रयोविंशद्दिनान्येव देवासुररणोपमम्॥ अंबाकृते शितैः शस्त्रैरस्त्रैश्च तदनंतरम्
tasyāsīttumulaṁ yuddhaṁ bhārgaveṇa samaṁ mahat trayoviṁśaddinānyeva devāsuraraṇopamam aṁbākṛte śitaiḥ śastrairastraiśca tadanaṁtaram
उनका भार्गव (परशुराम) के साथ अंबा के कारण तेईस दिनों तक एक भीषण और महान युद्ध हुआ, जो तीक्ष्ण शस्त्रों और अस्त्रों से युक्त, देवासुर संग्राम के समान भयंकर था।
श्लोक 4 (skanda.6.57.4)
ततो ब्रह्मादयो देवाः स्वयमेव व्यवस्थिताः॥ ताभ्यां निवारणार्थाय शांत्यर्थं सर्वदेहिनान्॥ गताश्च ते समुत्थाप्य पुनरेव त्रिविष्टपम्
tato brahmādayo devāḥ svayameva vyavasthitāḥ tābhyāṁ nivāraṇārthāya śāṁtyarthaṁ sarvadehinān gatāśca te samutthāpya punareva triviṣṭapam
तब ब्रह्मा आदि देवता स्वयं वहाँ आए, दोनों को रोकने और समस्त प्राणियों की शांति के लिए, और उन्हें युद्ध से विरत कराकर वे पुनः स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 5 (skanda.6.57.5)
अंबापि प्राप्य परमं गांगेयोत्थं पराभवम्॥ प्रविष्टा कोपरक्ताक्षी सुसमिद्धे हुताशने
aṁbāpi prāpya paramaṁ gāṁgeyotthaṁ parābhavam praviṣṭā koparaktākṣī susamiddhe hutāśane
अंबा भी गांगेय द्वारा किए गए परम अपमान को पाकर, क्रोध से लाल नेत्रों वाली होकर प्रज्वलित अग्नि में प्रविष्ट हो गई।
श्लोक 6 (skanda.6.57.6)
भर्त्सयित्वा नदीपुत्रं बाष्पव्याकुललोचना॥ ततःप्रोवाच मध्यस्था वह्नेः कुरुपितामहम्
bhartsayitvā nadīputraṁ bāṣpavyākulalocanā tataḥprovāca madhyasthā vahneḥ kurupitāmaham
आँसुओं से व्याकुल नेत्रों वाली वह अग्नि के मध्य खड़ी होकर नदीपुत्र (भीष्म) को धिक्कारते हुए कुरुपितामह से बोली --
श्लोक 7 (skanda.6.57.7)
यस्माद्भीष्म त्वया त्यक्ता कामार्ताहं सुदुर्मते॥ तस्मात्तव वधायाशु भविष्यामि पुनः क्षितौ
yasmādbhīṣma tvayā tyaktā kāmārtāhaṁ sudurmate tasmāttava vadhāyāśu bhaviṣyāmi punaḥ kṣitau
"हे भीष्म, हे दुर्बुद्धे, चूँकि कामार्त होते हुए भी तुमने मुझे त्याग दिया, इसलिए मैं तुम्हारे वध के लिए शीघ्र ही पुनः इस पृथ्वी पर जन्म लूँगी।"
श्लोक 8 (skanda.6.57.8)
स्त्रीहत्यया समायुक्तस्त्वं च नूनं भविष्यसि॥ प्रमाणं यदि धर्मोऽत्र स्मृतिशास्त्रसमुद्भवः
strīhatyayā samāyuktastvaṁ ca nūnaṁ bhaviṣyasi pramāṇaṁ yadi dharmo'tra smṛtiśāstrasamudbhavaḥ
"और यदि स्मृतिशास्त्र से उत्पन्न धर्म इस विषय में प्रमाण है, तो तुम भी निश्चय ही स्त्रीहत्या से युक्त हो जाओगे।"
श्लोक 9 (skanda.6.57.9)
ततः स घृणयाऽऽविष्टो भीष्मः कुरुपितामहः॥ मार्कंडेयं मुनिश्रेष्ठं पप्रच्छ विनयान्वितः
tataḥ sa ghṛṇayā''viṣṭo bhīṣmaḥ kurupitāmahaḥ mārkaṁḍeyaṁ muniśreṣṭhaṁ papraccha vinayānvitaḥ
तब दया और चिंता से आविष्ट होकर कुरुपितामह भीष्म ने विनयपूर्वक मुनिश्रेष्ठ मार्कंडेय से पूछा --
श्लोक 10 (skanda.6.57.10)
भगवन्काशिराजस्य सुतया मे प्रजल्पितम्॥ मम मृत्युकरं पापं सकलं ते भविष्यति
bhagavankāśirājasya sutayā me prajalpitam mama mṛtyukaraṁ pāpaṁ sakalaṁ te bhaviṣyati
"हे भगवन्, काशिराज की पुत्री ने मुझसे यह कहा है कि मेरी मृत्युकारक पूरा पाप तुम्हें ही लगेगा।"
श्लोक 11 (skanda.6.57.11)
तत्किं स्याद्वाक्यमात्रेण नो वा ब्राह्मणसत्तम॥ अत्र मे संशयस्तत्त्वं यथावद्वक्तुमर्हसि
tatkiṁ syādvākyamātreṇa no vā brāhmaṇasattama atra me saṁśayastattvaṁ yathāvadvaktumarhasi
"हे ब्राह्मणसत्तम, क्या यह केवल वाक्य मात्र से सत्य होगा या नहीं? मुझे इस विषय में संशय है; आप कृपया मुझे यथार्थ बताइए।"
श्लोक 12 (skanda.6.57.12)
श्रीमार्कंडेय उवाच॥ आक्षिप्तस्ताडितो वापि यमुद्दिश्य त्यजेदसून्॥ स्त्रीजनो वा द्विजो वापि तस्य पापं तु तद्भवेत्
śrīmārkaṁḍeya uvāca ākṣiptastāḍito vāpi yamuddiśya tyajedasūn strījano vā dvijo vāpi tasya pāpaṁ tu tadbhavet
श्रीमार्कंडेय ने कहा -- "यदि कोई स्त्री अथवा ब्राह्मण अपमानित अथवा प्रताड़ित होकर किसी के कारण अपने प्राण त्याग दे, तो वह पाप उसी व्यक्ति को लगता है।"
श्लोक 13 (skanda.6.57.13)
स्त्रियं वा ब्राह्मणं वापि तस्मान्नैव प्रकोपयेत्॥ निघ्नंतं वा शपंतं वा यदीच्छेच्छुभमात्मनः
striyaṁ vā brāhmaṇaṁ vāpi tasmānnaiva prakopayet nighnaṁtaṁ vā śapaṁtaṁ vā yadīcchecchubhamātmanaḥ
इसलिए, यदि अपना कल्याण चाहे तो किसी स्त्री अथवा ब्राह्मण को कभी क्रुद्ध नहीं करना चाहिए, चाहे वे स्वयं मारें अथवा शाप दें।
श्लोक 14 (skanda.6.57.14)
त्वया पुनर्वराकी सा कामार्ता समुपेक्षिता॥ जित्वा स्वयंवरे पूर्वं तत्कथं स्यान्न पापभाक्
tvayā punarvarākī sā kāmārtā samupekṣitā jitvā svayaṁvare pūrvaṁ tatkathaṁ syānna pāpabhāk
और तुमने पहले स्वयंवर में उस बेचारी कामार्त कन्या को जीतकर भी उसकी उपेक्षा कर दी; तो फिर तुम पापभागी कैसे न होगे?
श्लोक 15 (skanda.6.57.15)
भीष्म उवाच॥ तदर्थं वद मे ब्रह्मन्प्रायश्चित्तं विशुद्धये॥ तपो वा यदि वा दानं व्रतं नियममेव वा
bhīṣma uvāca tadarthaṁ vada me brahmanprāyaścittaṁ viśuddhaye tapo vā yadi vā dānaṁ vrataṁ niyamameva vā
भीष्म ने कहा -- "हे ब्रह्मन्, इसके लिए मुझे शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त बताइए -- चाहे वह तप हो, दान हो, व्रत हो अथवा नियम हो।"
श्लोक 16 (skanda.6.57.16)
मार्कंडेय उवाच॥ दशानां ब्राह्मणेंद्राणां यद्वधे पातकं स्मृतम्॥ तत्पापं स्त्रीवधे कृत्स्नं जायते भरतर्षभ
mārkaṁḍeya uvāca daśānāṁ brāhmaṇeṁdrāṇāṁ yadvadhe pātakaṁ smṛtam tatpāpaṁ strīvadhe kṛtsnaṁ jāyate bharatarṣabha
मार्कंडेय ने कहा -- "हे भरतर्षभ, जो पाप दस श्रेष्ठ ब्राह्मणों की हत्या से स्मृत है, वही संपूर्ण पाप स्त्रीहत्या में होता है।"
श्लोक 17 (skanda.6.57.17)
तदत्र विषये दानं न तपो न व्रतादिकम्॥ तीर्थसेवां परित्यज्य तस्मात्त्वं तां समाचर
tadatra viṣaye dānaṁ na tapo na vratādikam tīrthasevāṁ parityajya tasmāttvaṁ tāṁ samācara
इस विषय में न दान काम आता है, न तप, न व्रत आदि; इसलिए तुम अन्य सब त्यागकर तीर्थसेवा का ही आचरण करो।
श्लोक 18 (skanda.6.57.18)
सूत उवाच॥ स तस्य वचनं श्रुत्वा भीष्मः कुरुपितामहः॥ तीर्थयात्रापरो भूत्वा बभ्राम क्षितिमंडले
sūta uvāca sa tasya vacanaṁ śrutvā bhīṣmaḥ kurupitāmahaḥ tīrthayātrāparo bhūtvā babhrāma kṣitimaṁḍale
सूत जी ने कहा -- उनका वचन सुनकर कुरुपितामह भीष्म तीर्थयात्रा में तत्पर होकर पृथ्वीमंडल में घूमने लगे।
श्लोक 19 (skanda.6.57.19)
ततः क्रमात्समायातो भ्रममाणो महीतले॥ चमत्कारपुरे क्षेत्रे नानातीर्थसमाकुले
tataḥ kramātsamāyāto bhramamāṇo mahītale camatkārapure kṣetre nānātīrthasamākule
तब पृथ्वी पर भटकते हुए वे क्रमशः अनेक तीर्थों से भरे चमत्कारपुर क्षेत्र में आ पहुँचे।
श्लोक 20 (skanda.6.57.20)
अथापश्यन्महात्मा स सुपुण्यं तद्गयाशिरः॥ स्नात्वा श्राद्धं च विधिवद्यावच्छ्रद्धासमन्वितः
athāpaśyanmahātmā sa supuṇyaṁ tadgayāśiraḥ snātvā śrāddhaṁ ca vidhivadyāvacchraddhāsamanvitaḥ
तब उस महात्मा ने वहाँ अत्यंत पुण्यमय गयाशिर तीर्थ देखा, और स्नान करके श्रद्धापूर्वक विधिवत श्राद्ध करने ही वाले थे,
श्लोक 21 (skanda.6.57.21)
चक्रे तावन्नभोवाणी वाक्यमेतदुवाच ह॥ भीष्मभीष्म महाबाहो नार्हस्त्वं श्राद्धजं विधिम्
cakre tāvannabhovāṇī vākyametaduvāca ha bhīṣmabhīṣma mahābāho nārhastvaṁ śrāddhajaṁ vidhim
कि उसी क्षण आकाशवाणी हुई, जिसने यह वचन कहा -- "हे भीष्म, हे भीष्म, हे महाबाहो, तुम श्राद्ध का यह विधान करने के अधिकारी नहीं हो।"
श्लोक 22 (skanda.6.57.22)
कर्तुं स्त्रीहत्ययायुक्तस्तस्माच्छृणु वचो मम॥ शर्मिष्ठातीर्थमित्येव ख्यातं पातकनाशनम्
kartuṁ strīhatyayāyuktastasmācchṛṇu vaco mama śarmiṣṭhātīrthamityeva khyātaṁ pātakanāśanam
"क्योंकि तुम स्त्रीहत्या से युक्त हो; इसलिए मेरा वचन सुनो -- यहाँ शर्मिष्ठा तीर्थ नाम से प्रसिद्ध, पापनाशक तीर्थ है।"
श्लोक 23 (skanda.6.57.23)
अस्मात्स्थानात्समीपस्थं वारुण्यां दिशि पुण्यकृत्॥ कृष्णांगारकषष्ठ्यां यो नरः स्नानं समाचरेत्
asmātsthānātsamīpasthaṁ vāruṇyāṁ diśi puṇyakṛt kṛṣṇāṁgārakaṣaṣṭhyāṁ yo naraḥ snānaṁ samācaret
"यह इस स्थान के समीप, पश्चिम दिशा में स्थित एक पुण्यकारी स्थान है; जो मनुष्य कृष्ण पक्ष की मंगलवार-युक्त षष्ठी को वहाँ स्नान करता है,"
श्लोक 24 (skanda.6.57.24)
स स्त्रीहत्याकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥ तस्मादद्य दिने पुत्र भौमवारसमन्विता
sa strīhatyākṛtātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ tasmādadya dine putra bhaumavārasamanvitā
"-- वह स्त्रीहत्या से उत्पन्न पाप से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। हे पुत्र, आज का दिन मंगलवार से युक्त है,"
श्लोक 25 (skanda.6.57.25)
सैव षष्ठी तिथिः पुण्या तस्मात्तत्र द्रुतं व्रज॥ अहं तव पिता पुत्र शंतनुः पृथिवीपतिः
saiva ṣaṣṭhī tithiḥ puṇyā tasmāttatra drutaṁ vraja ahaṁ tava pitā putra śaṁtanuḥ pṛthivīpatiḥ
"-- और वही पुण्यमयी षष्ठी तिथि भी है; इसलिए वहाँ शीघ्र जाओ। हे पुत्र, मैं तुम्हारे पिता, राजा शंतनु हूँ,"
श्लोक 26 (skanda.6.57.26)
स्त्रीहत्ययान्वितं ज्ञात्वा ततस्तूर्णमिहागतः॥ ततो भीष्मो द्रुतं गत्वा तत्र स्थाने समाहितः
strīhatyayānvitaṁ jñātvā tatastūrṇamihāgataḥ tato bhīṣmo drutaṁ gatvā tatra sthāne samāhitaḥ
"-- तुम्हें स्त्रीहत्या से युक्त जानकर मैं तत्काल यहाँ आ गया हूँ।" तब भीष्म शीघ्र ही उस स्थान पर जाकर, समाहित होकर,
श्लोक 27 (skanda.6.57.27)
स्नानं कृत्वा ततः श्राद्धं चक्रे श्रद्धासमन्वितः॥ ततो भूयः समागत्य स तं प्रोवाच शतनुः
snānaṁ kṛtvā tataḥ śrāddhaṁ cakre śraddhāsamanvitaḥ tato bhūyaḥ samāgatya sa taṁ provāca śatanuḥ
स्नान करके श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया; तब शंतनु फिर से उनके पास आकर उनसे बोले --
श्लोक 28 (skanda.6.57.28)
विपाप्मा त्वं कुरुश्रेष्ठ संजातोऽसि न संशयः॥ तस्मान्निजं गृहं गच्छ राज्यचिंतां समाचर
vipāpmā tvaṁ kuruśreṣṭha saṁjāto'si na saṁśayaḥ tasmānnijaṁ gṛhaṁ gaccha rājyaciṁtāṁ samācara
"हे कुरुश्रेष्ठ, निःसंदेह तुम पापरहित हो गए हो; इसलिए अपने घर जाओ और राज्य की चिंता करो।"
श्लोक 29 (skanda.6.57.29)
ततः स विस्मयाविष्टो ज्ञात्वा तीर्थमनुत्तमम्॥ वासुदेवात्मिकामर्चां तथान्यां कुरुसत्तमः
tataḥ sa vismayāviṣṭo jñātvā tīrthamanuttamam vāsudevātmikāmarcāṁ tathānyāṁ kurusattamaḥ
तब उस अनुपम तीर्थ को पहचानकर आश्चर्यचकित हुए उस कुरुश्रेष्ठ ने वासुदेव की प्रतिमा तथा एक अन्य प्रतिमा भी,
श्लोक 30 (skanda.6.57.30)
पारिजातमयीं मूर्तिं रवेर्लक्षणलक्षिताम्॥ सुप्रमाणां सुरूपां च श्रद्धापूतेन चेतसा
pārijātamayīṁ mūrtiṁ raverlakṣaṇalakṣitām supramāṇāṁ surūpāṁ ca śraddhāpūtena cetasā
-- सूर्य के लक्षणों से युक्त, सुसंगत और सुंदर, पारिजात-काष्ठ की प्रतिमा भी, श्रद्धा से पवित्र मन के साथ स्थापित की।
श्लोक 31 (skanda.6.57.31)
तथान्यत्स्थापयामास लिंगं देवस्य शूलिनः॥ दुर्गां च भक्तिसंयुक्तो विधिदृष्टेन कर्मणा
tathānyatsthāpayāmāsa liṁgaṁ devasya śūlinaḥ durgāṁ ca bhaktisaṁyukto vidhidṛṣṭena karmaṇā
और भक्तियुक्त होकर विधिदृष्ट कर्म से शूलधारी देव का लिंग तथा दुर्गा की प्रतिमा भी स्थापित की।
श्लोक 32 (skanda.6.57.32)
ततः सर्वान्समाहूय स विप्रान्पुरसंभवान्॥ प्रोवाच कौरवो भीष्मो विनयावनतः स्थितः
tataḥ sarvānsamāhūya sa viprānpurasaṁbhavān provāca kauravo bhīṣmo vinayāvanataḥ sthitaḥ
तब उस नगर में जन्मे सभी ब्राह्मणों को बुलाकर कौरव भीष्म ने विनयपूर्वक झुककर उनसे कहा --
श्लोक 33 (skanda.6.57.33)
मया विनिर्मितं विप्रा देवागारचतुष्टयम्॥ एतत्क्षेत्रे च युष्माकं दयां कृत्वा ममोपरि
mayā vinirmitaṁ viprā devāgāracatuṣṭayam etatkṣetre ca yuṣmākaṁ dayāṁ kṛtvā mamopari
"हे विप्रो, मैंने इस क्षेत्र में देवताओं के ये चार मंदिर बनवाए हैं; तुम लोग मुझ पर दया करके,"
श्लोक 34 (skanda.6.57.34)
पालयध्वं प्रयास्यामि स्वगृहं प्रति सत्वरम्॥ प्रेरितः पितृभिर्दिव्यैः स्वर्गमार्गसमाश्रितैः
pālayadhvaṁ prayāsyāmi svagṛhaṁ prati satvaram preritaḥ pitṛbhirdivyaiḥ svargamārgasamāśritaiḥ
"इनकी रक्षा करना; मैं अपने दिव्य पितरों की, जो स्वर्गमार्ग में स्थित हैं, प्रेरणा से शीघ्र अपने घर जाऊँगा।"
श्लोक 35 (skanda.6.57.35)
ब्राह्मणा ऊचुः॥ गच्छगच्छ कुरुश्रेष्ठ सुविश्रब्धः स्वमायया॥ वयं सर्वे करिष्यामो युष्मच्छ्रेयोऽभिवर्धनम्
brāhmaṇā ūcuḥ gacchagaccha kuruśreṣṭha suviśrabdhaḥ svamāyayā vayaṁ sarve kariṣyāmo yuṣmacchreyo'bhivardhanam
ब्राह्मणों ने कहा -- "हे कुरुश्रेष्ठ, तुम निश्चिंत होकर अपनी शक्ति के अनुसार जाओ; हम सब तुम्हारे कल्याण की वृद्धि करेंगे।"
श्लोक 36 (skanda.6.57.36)
देवश्रेणिरियं राजन्या त्वयात्र विनिर्मिता॥ अस्याः पूजादिकं सर्वं करिष्यामः सदा वयम्
devaśreṇiriyaṁ rājanyā tvayātra vinirmitā asyāḥ pūjādikaṁ sarvaṁ kariṣyāmaḥ sadā vayam
"हे राजन्, तुमने यहाँ जो यह देव-पंक्ति बनवाई है, उसकी पूजा आदि समस्त कर्म हम सदा करते रहेंगे।"
श्लोक 37 (skanda.6.57.37)
तवापि विनयं दृष्ट्वा परितुष्टा वयं नृप॥ सर्वान्प्रार्थय तस्मात्त्वं वरं स्वं मनसि स्थितम्
tavāpi vinayaṁ dṛṣṭvā parituṣṭā vayaṁ nṛpa sarvānprārthaya tasmāttvaṁ varaṁ svaṁ manasi sthitam
"हे राजन्, तुम्हारी विनम्रता देखकर हम भी अत्यंत प्रसन्न हैं; इसलिए तुम अपने मन में स्थित वर हम सबसे माँग लो।"
श्लोक 38 (skanda.6.57.38)
भीष्म उवाच॥ एष एव वरोऽस्माकं यत्संतुष्टा द्विजोत्तमाः॥ तथाप्याशु वचः कार्यं युष्मदीयं मयाधुना
bhīṣma uvāca eṣa eva varo'smākaṁ yatsaṁtuṣṭā dvijottamāḥ tathāpyāśu vacaḥ kāryaṁ yuṣmadīyaṁ mayādhunā
भीष्म ने कहा -- "हे द्विजोत्तमो, तुम सबका संतुष्ट होना ही मेरे लिए वर है; फिर भी मुझे अभी तुमसे शीघ्र एक बात कहनी है।"
श्लोक 39 (skanda.6.57.39)
एतानि देवसद्मानि मदीयानि नरो भुवि॥ यो यं काममभिध्याय पूजयेच्छ्रद्धयाऽन्वितः॥ प्रसादादेव युष्माकं तस्य तत्स्यादसंशयम्
etāni devasadmāni madīyāni naro bhuvi yo yaṁ kāmamabhidhyāya pūjayecchraddhayā'nvitaḥ prasādādeva yuṣmākaṁ tasya tatsyādasaṁśayam
"पृथ्वी पर जो मनुष्य किसी कामना का ध्यान करके श्रद्धापूर्वक मेरे इन देवमंदिरों की पूजा करे, तुम्हारी ही कृपा से निःसंदेह उसे वह कामना प्राप्त हो।"
श्लोक 40 (skanda.6.57.40)
ब्राह्मणा ऊचुः॥ आदित्यस्य करिष्यामो यात्रां भाद्रपदे वयम्॥ सप्तम्यां सूर्यवारेण सर्वदैव समाहिताः
brāhmaṇā ūcuḥ ādityasya kariṣyāmo yātrāṁ bhādrapade vayam saptamyāṁ sūryavāreṇa sarvadaiva samāhitāḥ
ब्राह्मणों ने कहा -- "हम सदा समाहित होकर भाद्रपद मास में सूर्यवार युक्त सप्तमी को आदित्य की यात्रा करेंगे।"
श्लोक 41 (skanda.6.57.41)
तथा शिवस्य चाष्टम्यां चैत्रशुक्ले विशेषतः॥ चतुर्दश्यां महाभाग तव स्नेहान्न संशयः
tathā śivasya cāṣṭamyāṁ caitraśukle viśeṣataḥ caturdaśyāṁ mahābhāga tava snehānna saṁśayaḥ
"और हे महाभाग, तुम्हारे स्नेह के कारण, निःसंदेह चैत्र शुक्ल अष्टमी को तथा विशेष रूप से चतुर्दशी को शिव का उत्सव भी करेंगे।"
श्लोक 42 (skanda.6.57.42)
शयने बोधने विष्णोः संप्राप्ते द्वादशीदिने॥ विष्णोरपि च दुर्गायाः संप्राप्ते नवमीदिने
śayane bodhane viṣṇoḥ saṁprāpte dvādaśīdine viṣṇorapi ca durgāyāḥ saṁprāpte navamīdine
"-- विष्णु के शयन और जागरण के अवसर पर, द्वादशी तिथि आने पर, तथा दुर्गा की नवमी तिथि आने पर भी,"
श्लोक 43 (skanda.6.57.43)
आश्विने शुक्लपक्षे च गीतवादित्रनिस्वनैः॥ महोत्सवं तथा चित्रैर्हास्यलास्यैः पृथग्विधैः
āśvine śuklapakṣe ca gītavāditranisvanaiḥ mahotsavaṁ tathā citrairhāsyalāsyaiḥ pṛthagvidhaiḥ
"-- आश्विन शुक्ल पक्ष में गीत-वाद्य की ध्वनियों सहित, विविध चित्र-विनोदों, हास्य और नृत्य से युक्त महोत्सव करेंगे।"
श्लोक 44 (skanda.6.57.44)
यस्तत्र मानवो नित्यं श्रद्धया परया युतः॥ करिष्यति च गीतादि स यास्यति परां गतिम्
yastatra mānavo nityaṁ śraddhayā parayā yutaḥ kariṣyati ca gītādi sa yāsyati parāṁ gatim
"जो मनुष्य वहाँ सदा परम श्रद्धा से युक्त होकर गीतादि करता है, वह परम गति को प्राप्त होगा।"
श्लोक 45 (skanda.6.57.45)
वयं तस्य भविष्यामः सदैव प्रीतमानसाः॥ प्रदास्यामस्तथा कामान्मनसा वांछितान्नृप
vayaṁ tasya bhaviṣyāmaḥ sadaiva prītamānasāḥ pradāsyāmastathā kāmānmanasā vāṁchitānnṛpa
"हे राजन्, हम सदा उससे प्रसन्नचित्त रहेंगे, और उसकी मन-वांछित कामनाएँ भी प्रदान करेंगे।"
श्लोक 46 (skanda.6.57.46)
एवमुक्त्वाथ ते विप्राः स्वानि स्थानानि भेजिरे॥ भीष्मोऽपि हर्षसंयुक्तः स्वगृहं प्रस्थितस्ततः
evamuktvātha te viprāḥ svāni sthānāni bhejire bhīṣmo'pi harṣasaṁyuktaḥ svagṛhaṁ prasthitastataḥ
ऐसा कहकर वे ब्राह्मण अपने-अपने स्थानों को चले गए; और भीष्म भी हर्षयुक्त होकर वहाँ से अपने घर की ओर चल पड़े।