नागर खण्ड · अध्याय 59
विदुर द्वारा निर्मित देवप्रासाद और विदुरेश्वर माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.6.59.1)
सूत उवाच॥ तस्मिन्क्षेत्रे रविः पूर्वं विदुरेण प्रतिष्ठितम्॥ शिवश्च परया भक्त्या तथा विष्णुर्द्विजोत्तमाः
sūta uvāca tasminkṣetre raviḥ pūrvaṁ vidureṇa pratiṣṭhitam śivaśca parayā bhaktyā tathā viṣṇurdvijottamāḥ
सूत जी ने कहा -- हे द्विजोत्तमो, उस क्षेत्र में पूर्वकाल में विदुर द्वारा परम भक्ति से सूर्य, शिव और विष्णु की प्रतिष्ठा की गई थी।
श्लोक 2 (skanda.6.59.2)
यस्तान्पूजयते भक्त्या मानुषो भक्तितस्ततः॥ स यास्यति परं स्थानं यज्ञैरपि सुदुर्लभम्
yastānpūjayate bhaktyā mānuṣo bhaktitastataḥ sa yāsyati paraṁ sthānaṁ yajñairapi sudurlabham
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह उस परम स्थान को प्राप्त करता है, जो यज्ञों से भी अत्यंत दुर्लभ है।
श्लोक 3 (skanda.6.59.3)
हस्तिनापुरसंस्थेन विदुरेण पुरा द्विजाः॥ गालवो मुनिशार्दूलः पृष्टः स्वगृहमागतः
hastināpurasaṁsthena vidureṇa purā dvijāḥ gālavo muniśārdūlaḥ pṛṣṭaḥ svagṛhamāgataḥ
हे द्विजो, पूर्वकाल में हस्तिनापुर में रहने वाले विदुर ने अपने घर आए हुए मुनिश्रेष्ठ गालव से यह पूछा --
श्लोक 4 (skanda.6.59.4)
अपुत्रस्य गतिर्लोके कीदृक्संजायते परे॥ एतन्मे पृच्छतो ब्रूहि कृत्वा सद्भावमुत्तमम्
aputrasya gatirloke kīdṛksaṁjāyate pare etanme pṛcchato brūhi kṛtvā sadbhāvamuttamam
"पुत्रहीन मनुष्य की परलोक में कैसी गति होती है? मुझे यह पूछते हुए, कृपापूर्वक बताइए।"
श्लोक 5 (skanda.6.59.5)
गालव उवाच॥ अपुत्रस्य गतिर्नास्ति मृतः स्वर्गं न गच्छति॥ द्वादशानामपि तथा यद्येकोऽपि न विद्यते
gālava uvāca aputrasya gatirnāsti mṛtaḥ svargaṁ na gacchati dvādaśānāmapi tathā yadyeko'pi na vidyate
गालव ने कहा -- पुत्रहीन की कोई गति नहीं होती, वह मरकर स्वर्ग नहीं जाता, यदि उसके पास बारह प्रकार के पुत्रों में से एक भी न हो।
श्लोक 6 (skanda.6.59.6)
औरसः क्षेत्रजश्चैव क्रयक्रीतश्च पालितः॥ पौनर्भवः पुनर्दत्तः कुंडो गोलस्तथा परः॥ कानीनश्च सहोढश्च अश्वत्थो ब्रह्मवृक्षकः
aurasaḥ kṣetrajaścaiva krayakrītaśca pālitaḥ paunarbhavaḥ punardattaḥ kuṁḍo golastathā paraḥ kānīnaśca sahoḍhaśca aśvattho brahmavṛkṣakaḥ
औरस, क्षेत्रज, क्रीत, पालित, पौनर्भव, पुनर्दत्त, कुण्ड और गोल, कानीन और सहोढ, तथा अश्वत्थ और ब्रह्मवृक्षक --
श्लोक 7 (skanda.6.59.7)
एतेषामपि यद्येकः पुरुषाणां न जायते॥ तन्नूनं नरके वासः पुंसंज्ञे वै प्रजायते
eteṣāmapi yadyekaḥ puruṣāṇāṁ na jāyate tannūnaṁ narake vāsaḥ puṁsaṁjñe vai prajāyate
-- इनमें से भी यदि किसी पुरुष को एक भी पुत्र प्राप्त न हो, तो निश्चय ही उसे 'पुत्' नामक नरक में निवास प्राप्त होता है।
श्लोक 8 (skanda.6.59.8)
सूत उवाच॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य गालवस्य महात्मनः॥ अपुत्रत्वात्परं दुःखं जगाम विदुरस्तदा
sūta uvāca tacchrutvā vacanaṁ tasya gālavasya mahātmanaḥ aputratvātparaṁ duḥkhaṁ jagāma vidurastadā
सूत जी ने कहा -- महात्मा गालव के ये वचन सुनकर विदुर पुत्रहीनता के कारण अत्यंत दुःखी हो गए।
श्लोक 9 (skanda.6.59.9)
तप्तस्तं गालवः प्राह मा त्वं दुःखपदं व्रज॥ मद्वाक्यात्पुत्रकं वृक्षं विष्णुसंज्ञं द्रुतं कुरु
taptastaṁ gālavaḥ prāha mā tvaṁ duḥkhapadaṁ vraja madvākyātputrakaṁ vṛkṣaṁ viṣṇusaṁjñaṁ drutaṁ kuru
उन्हें संतप्त देखकर गालव ने कहा -- "तुम दुःखी मत होओ; मेरे वचन से एक विष्णु-नामक वृक्ष को शीघ्र पुत्र बना लो।"
श्लोक 10 (skanda.6.59.10)
तस्मात्प्राप्स्यसि निःशेषं फलं पुत्रसमुद्भवम्॥ गत्वा पुण्यतमे देशे रक्तशृंगस्य मूर्धनि
tasmātprāpsyasi niḥśeṣaṁ phalaṁ putrasamudbhavam gatvā puṇyatame deśe raktaśṛṁgasya mūrdhani
"इससे तुम्हें पुत्र-जन्म का संपूर्ण फल प्राप्त होगा; तुम रक्तशृंग के शिखर पर स्थित उस परम पुण्यमय देश में जाओ।"
श्लोक 11 (skanda.6.59.11)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे सर्ववृद्धिशुभोदये॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विदुरस्तत्क्षणाद्ययौ
hāṭakeśvaraje kṣetre sarvavṛddhiśubhodaye tasya tadvacanaṁ śrutvā vidurastatkṣaṇādyayau
"-- वह हाटकेश्वर क्षेत्र है, जो सब प्रकार की वृद्धि और शुभ का उदय करने वाला है।" उनका यह वचन सुनकर विदुर उसी क्षण वहाँ के लिए चल पड़े।
श्लोक 12 (skanda.6.59.12)
तत्स्थानं गालवोद्दिष्टं हर्षेण महतान्वितः॥ तत्राश्वत्थतरुं स्थाप्य पुत्रत्वे चाभिषेच्य च
tatsthānaṁ gālavoddiṣṭaṁ harṣeṇa mahatānvitaḥ tatrāśvatthataruṁ sthāpya putratve cābhiṣecya ca
महान हर्ष से युक्त होकर वे गालव द्वारा बताए गए उस स्थान पर पहुँचे, और वहाँ एक पीपल का वृक्ष लगाकर उसे पुत्र-रूप में अभिषिक्त किया,
श्लोक 13 (skanda.6.59.13)
वैवाहिकेन विधिना कृतकृत्यो बभूव ह॥ ततो बभ्राम तत्क्षेत्रं तीर्थयात्रापरायणः
vaivāhikena vidhinā kṛtakṛtyo babhūva ha tato babhrāma tatkṣetraṁ tīrthayātrāparāyaṇaḥ
विवाह-विधि से उसका यह कृत्य संपन्न करके वे कृतकृत्य हुए; फिर वे तीर्थयात्रा में तत्पर होकर उस क्षेत्र में घूमने लगे।
श्लोक 14 (skanda.6.59.14)
कीर्तितानि विचित्राणि राजर्षीणां महात्मनाम्॥ श्रुत्वा स्थानानि गत्वा च ददर्श स्थानदेवताः
kīrtitāni vicitrāṇi rājarṣīṇāṁ mahātmanām śrutvā sthānāni gatvā ca dadarśa sthānadevatāḥ
महात्मा राजर्षियों के विचित्र और प्रसिद्ध स्थानों को सुनकर, वहाँ जाकर उन्होंने उन स्थानों की देवताओं का दर्शन किया।
श्लोक 15 (skanda.6.59.15)
स दृष्ट्वा कुरुवृद्धस्य कीर्तनानि महात्मनः॥ ततश्चक्रे मतिं तत्र दिव्यप्रासादकर्मणि
sa dṛṣṭvā kuruvṛddhasya kīrtanāni mahātmanaḥ tataścakre matiṁ tatra divyaprāsādakarmaṇi
कुरुवृद्ध महात्मा भीष्म के कीर्तनों को देखकर उन्होंने भी वहाँ एक दिव्य प्रासाद बनवाने का संकल्प किया।
श्लोक 16 (skanda.6.59.16)
ततो माहेश्वरं लिंगं वटाधस्ताद्विधाय सः॥ विष्णुं च स्थापयामास अश्वत्थस्य तरोरधः
tato māheśvaraṁ liṁgaṁ vaṭādhastādvidhāya saḥ viṣṇuṁ ca sthāpayāmāsa aśvatthasya taroradhaḥ
तब उन्होंने वटवृक्ष के नीचे महेश्वर का लिंग स्थापित किया, और विष्णु को अश्वत्थ वृक्ष के नीचे स्थापित किया।
श्लोक 17 (skanda.6.59.17)
निवेश्य च तथा दिव्यं ब्राह्मणेभ्यो न्यवेदयत्॥ एतद्देवत्रयं क्षेत्रे युष्माकं हि मया कृतम्॥ भवद्भिः सकला चास्य चिन्ताकार्या सदैव हि
niveśya ca tathā divyaṁ brāhmaṇebhyo nyavedayat etaddevatrayaṁ kṣetre yuṣmākaṁ hi mayā kṛtam bhavadbhiḥ sakalā cāsya cintākāryā sadaiva hi
और इस प्रकार उन दिव्य प्रतिमाओं की स्थापना करके उन्होंने ब्राह्मणों से निवेदन किया -- "इस क्षेत्र में मैंने यह देवत्रय तुम्हारे लिए बनाया है; इसकी संपूर्ण देखभाल तुम सबको सदा करनी है।"
श्लोक 18 (skanda.6.59.18)
ब्राह्मणा ऊचुः॥ वयमस्य करिष्यामो यात्राद्याः सकलाः क्रियाः
brāhmaṇā ūcuḥ vayamasya kariṣyāmo yātrādyāḥ sakalāḥ kriyāḥ
ब्राह्मणों ने कहा -- "हम इसके लिए यात्रा आदि सभी क्रियाएँ करेंगे।"
श्लोक 19 (skanda.6.59.19)
तथा वंशोद्भवा ये च पुत्राः पौत्रास्तथापरे॥ करिष्यंति क्रियाः सर्वास्त्वं गच्छ स्वगृहं प्रति
tathā vaṁśodbhavā ye ca putrāḥ pautrāstathāpare kariṣyaṁti kriyāḥ sarvāstvaṁ gaccha svagṛhaṁ prati
"और हमारे वंश में उत्पन्न होने वाले जो पुत्र-पौत्र तथा अन्य वंशज होंगे, वे भी ये सभी क्रियाएँ करते रहेंगे; तुम अपने घर जाओ।"
श्लोक 20 (skanda.6.59.20)
सूत उवाच॥ ततो जगाम विदुरः स्वपुरं प्रति हर्षितः॥ कृतकृत्यो द्विजास्ते च चक्रुर्वाक्यं तदुद्भवम्
sūta uvāca tato jagāma viduraḥ svapuraṁ prati harṣitaḥ kṛtakṛtyo dvijāste ca cakrurvākyaṁ tadudbhavam
सूत जी ने कहा -- तब कृतकृत्य होकर विदुर प्रसन्नतापूर्वक अपने नगर को गए; और उन ब्राह्मणों ने इस विषय में यह वचन कहा --
श्लोक 21 (skanda.6.59.21)
माघमासस्य सप्तम्यां सूर्यवारेण यो नरः॥ पूजयेद्भास्करं तत्र स याति परमां गतिम्
māghamāsasya saptamyāṁ sūryavāreṇa yo naraḥ pūjayedbhāskaraṁ tatra sa yāti paramāṁ gatim
"जो मनुष्य माघ मास की सूर्यवार-युक्त सप्तमी को वहाँ भास्कर की पूजा करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।"
श्लोक 22 (skanda.6.59.22)
शिवं वा सोमवारेण शुक्लाष्टम्यां विशेषतः॥ शयने बोधने विष्णुं सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः
śivaṁ vā somavāreṇa śuklāṣṭamyāṁ viśeṣataḥ śayane bodhane viṣṇuṁ samyakchraddhāsamanvitaḥ
"अथवा विशेष रूप से सोमवार-युक्त शुक्ल अष्टमी को शिव की, या सम्यक श्रद्धा के साथ विष्णु के शयन और जागरण पर्व पर उनकी पूजा करता है।"
श्लोक 23 (skanda.6.59.23)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन देवानां तत्त्रयं शुभम्॥ पूजनीयं विशेषेण नरैः स्वर्गतिमीप्सुभिः
tasmātsarvaprayatnena devānāṁ tattrayaṁ śubham pūjanīyaṁ viśeṣeṇa naraiḥ svargatimīpsubhiḥ
"इसलिए स्वर्गगति चाहने वाले मनुष्यों को विशेष रूप से पूर्ण प्रयत्नपूर्वक इन शुभ देवत्रय की पूजा करनी चाहिए।"
श्लोक 24 (skanda.6.59.24)
तत्र सिद्धिं गताः पूर्वं मुनयः संशितव्रताः॥ विदुरेश्वरमाराध्य शतशोऽथ सहस्रशः
tatra siddhiṁ gatāḥ pūrvaṁ munayaḥ saṁśitavratāḥ vidureśvaramārādhya śataśo'tha sahasraśaḥ
वहाँ पूर्वकाल में सैकड़ों-हजारों दृढ़व्रती मुनि विदुरेश्वर की आराधना करके सिद्धि को प्राप्त हुए।
श्लोक 25 (skanda.6.59.25)
ततस्तत्सिद्धिदं ज्ञात्वा लिंगं वै पाकशासनः॥ पांसुभिः पूरयामास यथा कश्चिन्न बुध्यते
tatastatsiddhidaṁ jñātvā liṁgaṁ vai pākaśāsanaḥ pāṁsubhiḥ pūrayāmāsa yathā kaścinna budhyate
तब उस लिंग को सिद्धिदायक जानकर इंद्र ने उसे धूल से इस प्रकार ढक दिया कि कोई उसे पहचान न सके।
श्लोक 26 (skanda.6.59.26)
कस्यचित्त्वथ कालस्य विदुरस्तत्र चागतः॥ दृष्ट्वा लोपगतं लिंगं दुःखेन महतान्वितः
kasyacittvatha kālasya vidurastatra cāgataḥ dṛṣṭvā lopagataṁ liṁgaṁ duḥkhena mahatānvitaḥ
कुछ समय बाद विदुर पुनः वहाँ आए, और उस लिंग को लुप्त देखकर वे अत्यंत दुःखी हो गए।
श्लोक 27 (skanda.6.59.27)
एतस्मिन्नेव काले तु वागुवाचाशरीरिणी॥ मा त्वं कुरु विषादं हि लिंगार्थे विदुराधुना
etasminneva kāle tu vāguvācāśarīriṇī mā tvaṁ kuru viṣādaṁ hi liṁgārthe vidurādhunā
उसी क्षण एक अशरीरी वाणी हुई -- "हे विदुर, अब तुम इस लिंग के विषय में विषाद न करो।"
श्लोक 28 (skanda.6.59.28)
योऽयं स दृश्यते वालो वटस्तस्य तले स्थिता॥ देवद्रोणिः सुरेशेन पांसुभिः परिपूरिता
yo'yaṁ sa dṛśyate vālo vaṭastasya tale sthitā devadroṇiḥ sureśena pāṁsubhiḥ paripūritā
"यह जो युवा वटवृक्ष दिखाई दे रहा है, उसके नीचे वह देवद्रोणि है, जिसे सुरेश ने धूल से भर दिया है।"
श्लोक 29 (skanda.6.59.29)
ततो गजाह्वयात्तूर्णं समानीय धनं बहु॥ शोधयामास तत्स्थानं दिवारात्रमतन्द्रितः
tato gajāhvayāttūrṇaṁ samānīya dhanaṁ bahu śodhayāmāsa tatsthānaṁ divārātramatandritaḥ
तब उन्होंने गजाह्वय (हस्तिनापुर) से शीघ्र बहुत सा धन मँगाकर, दिन-रात बिना थके उस स्थान को साफ करवाया।
श्लोक 30 (skanda.6.59.30)
ततो विलोक्य तान्देवान्हर्षेण महतान्वितः॥ प्रासादं निर्ममे तेषां योग्यं साध्वभिसंस्थितम्
tato vilokya tāndevānharṣeṇa mahatānvitaḥ prāsādaṁ nirmame teṣāṁ yogyaṁ sādhvabhisaṁsthitam
तब उन देवताओं को पुनः देखकर, अत्यंत हर्षित होकर, उन्होंने उनके योग्य एक सुदृढ़ प्रासाद बनवाया।
श्लोक 31 (skanda.6.59.31)
कैलासशिखराकारं भास्करार्थे महामुनिः॥ जटामध्यगतं दृष्ट्वा वटस्य च महेश्वरम्
kailāsaśikharākāraṁ bhāskarārthe mahāmuniḥ jaṭāmadhyagataṁ dṛṣṭvā vaṭasya ca maheśvaram
उस महामुनि ने वटवृक्ष की जटाओं में स्थित महेश्वर को देखकर, सूर्य के लिए कैलास शिखर के आकार का प्रासाद बनवाया।
श्लोक 32 (skanda.6.59.32)
प्रासादं नाकरोत्तत्र लिंगं यावन्न चालयेत्॥ वासुदेवस्य योग्यां च कृत्वा शालां बृहत्तराम्
prāsādaṁ nākarottatra liṁgaṁ yāvanna cālayet vāsudevasya yogyāṁ ca kṛtvā śālāṁ bṛhattarām
उन्होंने वहाँ प्रासाद इस प्रकार बनवाया कि लिंग विचलित न हो, और वासुदेव के लिए एक विशाल, योग्य शाला भी बनवाई।
श्लोक 33 (skanda.6.59.33)
दत्त्वा वृत्तिं च संहृष्टो ब्राह्मणेभ्यो निवेद्य च॥ जगाम स्वाश्रमं भूयो विप्रानामंत्र्य तांस्ततः
dattvā vṛttiṁ ca saṁhṛṣṭo brāhmaṇebhyo nivedya ca jagāma svāśramaṁ bhūyo viprānāmaṁtrya tāṁstataḥ
वृत्ति प्रदान करके, प्रसन्न होकर ब्राह्मणों को यह सब निवेदन करके, उन्हें विदा लेकर वे पुनः अपने आश्रम को चले गए।