नागर खण्ड · अध्याय 60
माहित्था और नरादित्य माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.6.60.1)
ऋषय ऊचुः॥ माहित्थेयं त्वयाख्याता या पुरा सूतनन्दन॥ केन संस्थापिता तत्र वद सर्वमशेषतः
ṛṣaya ūcuḥ māhittheyaṁ tvayākhyātā yā purā sūtanandana kena saṁsthāpitā tatra vada sarvamaśeṣataḥ
ऋषियों ने कहा -- हे सूतनंदन, यह माहित्था जिनके विषय में तुमने पहले बताया था, वहाँ किसके द्वारा स्थापित की गई? हमें यह सब विस्तार से बताइए।
श्लोक 2 (skanda.6.60.2)
सूत उवाच॥ शोषणीनाम या विद्या पुरागस्त्येन साधिता॥ आथर्वणेन मन्त्रेण स्वयं च परमेश्वरी
sūta uvāca śoṣaṇīnāma yā vidyā purāgastyena sādhitā ātharvaṇena mantreṇa svayaṁ ca parameśvarī
सूत जी ने कहा -- शोषणी नामक जो विद्या पूर्वकाल में अगस्त्य ने आथर्वण मंत्र से सिद्ध की थी, वह स्वयं परमेश्वरी ही थीं।
श्लोक 3 (skanda.6.60.3)
ततः संशोषितस्तेन स समुद्रो महात्मना॥ मित्रावरुणपुत्रेण सा प्रोक्ता पुरतः स्थिता
tataḥ saṁśoṣitastena sa samudro mahātmanā mitrāvaruṇaputreṇa sā proktā purataḥ sthitā
तब उस महात्मा मित्रावरुणपुत्र (अगस्त्य) के द्वारा वह समुद्र सुखा दिया गया; तब उन्होंने अपने सामने स्थित उस देवी से कहा --
श्लोक 4 (skanda.6.60.4)
माहित्थं साधितं यस्मात्त्वया मे सकलं शुभम्॥ माहित्थानाम तस्मात्त्वं देवता संभविष्यसि
māhitthaṁ sādhitaṁ yasmāttvayā me sakalaṁ śubham māhitthānāma tasmāttvaṁ devatā saṁbhaviṣyasi
"चूँकि तुमने मेरे लिए यह महान कार्य सिद्ध किया है और यह सारा कल्याण हुआ है, इसलिए तुम माहित्था नाम की देवी बनोगी।"
श्लोक 5 (skanda.6.60.5)
चमत्कारपुरक्षेत्रे पूजां प्राप्स्यस्यनुत्तमाम्॥ यस्त्वामाथर्वणैर्मन्त्रैस्तत्रस्थां भक्तिसंयुतः
camatkārapurakṣetre pūjāṁ prāpsyasyanuttamām yastvāmātharvaṇairmantraistatrasthāṁ bhaktisaṁyutaḥ
"चमत्कारपुर क्षेत्र में तुम्हें सर्वोत्तम पूजा प्राप्त होगी; जो कोई भक्तियुक्त होकर वहाँ स्थित तुम्हें आथर्वण मंत्रों से पूजेगा,"
श्लोक 6 (skanda.6.60.6)
पूजयिष्यति वृद्धिं च सर्वकालमवाप्स्यति॥ तस्मात्तत्र द्रुतं गच्छ मया सार्द्धं पुरोत्तमे
pūjayiṣyati vṛddhiṁ ca sarvakālamavāpsyati tasmāttatra drutaṁ gaccha mayā sārddhaṁ purottame
"-- वह सदा वृद्धि को प्राप्त करेगा। इसलिए मेरे साथ शीघ्र उस उत्तम नगर में चलो।"
श्लोक 7 (skanda.6.60.7)
द्विजानां रक्षणार्थाय नित्यं संनिहिता भव॥ एवं सा तत्र संभूता माहित्था वरदेवता
dvijānāṁ rakṣaṇārthāya nityaṁ saṁnihitā bhava evaṁ sā tatra saṁbhūtā māhitthā varadevatā
"ब्राह्मणों की रक्षा के लिए तुम वहाँ सदा सन्निहित रहो।" इस प्रकार वहाँ वह वरदायिनी देवी माहित्था प्रकट हुईं।
श्लोक 8 (skanda.6.60.8)
ययाऽयं चलितः शैलः स्वशक्त्या निश्चलीकृतः॥ स्कन्देनेह द्विजश्रेष्ठाः शक्त्या विद्धस्तदग्रतः
yayā'yaṁ calitaḥ śailaḥ svaśaktyā niścalīkṛtaḥ skandeneha dvijaśreṣṭhāḥ śaktyā viddhastadagrataḥ
हे द्विजश्रेष्ठो, जिनकी शक्ति से यह चलायमान पर्वत निश्चल बना दिया गया, जब स्कंद ने अपनी शक्ति (भाले) से उसके सामने उसे बींध दिया था।
श्लोक 9 (skanda.6.60.9)
नरादित्यस्ततश्चान्यो यो नरेण प्रतिष्ठितः॥ षष्ठ्यां तं सूर्यवारेण दृष्ट्वा पापात्प्रमुच्यते
narādityastataścānyo yo nareṇa pratiṣṭhitaḥ ṣaṣṭhyāṁ taṁ sūryavāreṇa dṛṣṭvā pāpātpramucyate
उसके पास ही एक अन्य नरादित्य हैं, जो नर (अर्जुन) द्वारा स्थापित हैं; उनका सूर्यवार-युक्त षष्ठी को दर्शन करने से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 10 (skanda.6.60.10)
न शत्रूणां पराभूतिं प्रयास्यति यथार्जुनः॥ रोगी विमुच्यते रोगाद्दरिद्रो धनमाप्नुयात्
na śatrūṇāṁ parābhūtiṁ prayāsyati yathārjunaḥ rogī vimucyate rogāddaridro dhanamāpnuyāt
वह शत्रुओं से कभी पराजित नहीं होता, जैसे अर्जुन नहीं हुए थे; रोगी रोग से मुक्त होता है और निर्धन धन प्राप्त करता है।
श्लोक 11 (skanda.6.60.11)
तथा गोवर्धनधरं तत्र देवं जनार्दनम्॥ यः पश्येत्कार्तिके शुक्ले संप्राप्ते प्रथमे दिने॥ तस्य गावः प्रभूताः स्युर्नीरोगा द्विसत्तमाः
tathā govardhanadharaṁ tatra devaṁ janārdanam yaḥ paśyetkārtike śukle saṁprāpte prathame dine tasya gāvaḥ prabhūtāḥ syurnīrogā dvisattamāḥ
और हे द्विजसत्तमो, जो कोई कार्तिक शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन गोवर्धनधारी देव जनार्दन का वहाँ दर्शन करता है, उसकी गायें अत्यंत समृद्ध और नीरोग होती हैं।
श्लोक 12 (skanda.6.60.12)
नरसिंहवपुः साक्षात्तथा देवो हरिः स्वयम्॥ तथा विनायकस्तत्र सर्वकामप्रदायकः॥ सर्वविघ्नहरश्चैव स्थापितश्चार्जुनेन हि
narasiṁhavapuḥ sākṣāttathā devo hariḥ svayam tathā vināyakastatra sarvakāmapradāyakaḥ sarvavighnaharaścaiva sthāpitaścārjunena hi
वहाँ साक्षात हरि देव नरसिंह के रूप में, तथा सर्वकामनाओं को पूर्ण करने वाले और सभी विघ्नों को हरने वाले विनायक भी, अर्जुन द्वारा स्थापित हैं।
श्लोक 13 (skanda.6.60.13)
यस्तं पूजयते भक्त्या चतुर्थ्यां मोदकाशनैः॥ स सर्वविघ्ननिर्मुक्तो लभते वांछितं फलम्॥ तत्र स्थितो द्विजेंद्राणां हिताय द्विजसत्तमाः
yastaṁ pūjayate bhaktyā caturthyāṁ modakāśanaiḥ sa sarvavighnanirmukto labhate vāṁchitaṁ phalam tatra sthito dvijeṁdrāṇāṁ hitāya dvijasattamāḥ
जो कोई चतुर्थी को भक्तिपूर्वक मोदकों का भोग लगाकर उनकी पूजा करता है, वह सभी विघ्नों से मुक्त होकर इच्छित फल प्राप्त करता है; हे द्विजसत्तमो, वे वहाँ द्विजश्रेष्ठों के हित के लिए विराजमान हैं।
श्लोक 14 (skanda.6.60.14)
यस्तमाथर्वणैर्मंत्रैः पूजयेद्द्वादशीदिने॥ कार्तिकस्य सिते पक्षे स याति परमां गतिम्
yastamātharvaṇairmaṁtraiḥ pūjayeddvādaśīdine kārtikasya site pakṣe sa yāti paramāṁ gatim
जो कोई कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को आथर्वण मंत्रों से उनकी पूजा करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 15 (skanda.6.60.15)
तथा तत्र द्विजश्रेष्ठा नरनारायणावुभौ॥ देवौ परमतेजस्वी यस्तौ पश्यति भक्तितः
tathā tatra dvijaśreṣṭhā naranārāyaṇāvubhau devau paramatejasvī yastau paśyati bhaktitaḥ
और हे द्विजश्रेष्ठो, वहाँ नर-नारायण नामक दोनों परम तेजस्वी देव भी हैं; जो कोई भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करता है,
श्लोक 16 (skanda.6.60.16)
पूजयेच्च द्विजश्रेष्ठा द्वादश्या दिवसे स्वयम्॥ स याति परमं स्थानं जरामरणवर्जितम्
pūjayecca dvijaśreṣṭhā dvādaśyā divase svayam sa yāti paramaṁ sthānaṁ jarāmaraṇavarjitam
और हे द्विजश्रेष्ठो, जो कोई स्वयं द्वादशी के दिन उनकी पूजा करता है, वह जरा-मृत्यु से रहित परम स्थान को प्राप्त होता है।
श्लोक 17 (skanda.6.60.17)
तीर्थयात्राकृतारंभः कुन्तीपुत्रो धनंजयः॥ हाटकेश्वरजे क्षेत्रे समायातो द्विजोत्तमाः
tīrthayātrākṛtāraṁbhaḥ kuntīputro dhanaṁjayaḥ hāṭakeśvaraje kṣetre samāyāto dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, तीर्थयात्रा का आरंभ करके कुंतीपुत्र धनंजय (अर्जुन) हाटकेश्वर क्षेत्र में आ पहुँचे।
श्लोक 18 (skanda.6.60.18)
दृष्ट्वा तत्पावनं क्षेत्रं तीर्थपूगप्रपूरितम्॥ आदित्यं स्थापयामास प्रासादे सुमनोहरे
dṛṣṭvā tatpāvanaṁ kṣetraṁ tīrthapūgaprapūritam ādityaṁ sthāpayāmāsa prāsāde sumanohare
उस तीर्थ-समूह से भरे पावन क्षेत्र को देखकर उन्होंने एक अत्यंत मनोहर प्रासाद में आदित्य की स्थापना की।
श्लोक 19 (skanda.6.60.19)
नरनारायणौ देवौ तस्याग्रे स्थापितौ ततः॥ तथा गोवर्धनधरस्तत्र देवः प्रतिष्ठितः
naranārāyaṇau devau tasyāgre sthāpitau tataḥ tathā govardhanadharastatra devaḥ pratiṣṭhitaḥ
तब उनके सामने नर-नारायण दोनों देवों की स्थापना की, और वहाँ गोवर्धनधारी देव की भी प्रतिष्ठा की।
श्लोक 20 (skanda.6.60.20)
नरसिंहं तथैवान्यं श्रद्धया परया युतः॥ एवं संस्थाप्य कौंतेयो देवगृहसुपंचकम्
narasiṁhaṁ tathaivānyaṁ śraddhayā parayā yutaḥ evaṁ saṁsthāpya kauṁteyo devagṛhasupaṁcakam
और इसी प्रकार परम श्रद्धा से युक्त होकर एक अन्य नरसिंह की प्रतिमा भी स्थापित की; इस प्रकार कौंतेय ने इन पाँच उत्तम देवमंदिरों की स्थापना की।
श्लोक 21 (skanda.6.60.21)
ततो विप्रान्समाहूय सर्वांस्तान्पुरसंभवान्॥ प्रोवाच प्रणतो भक्त्या धनं दत्त्वा सुपुष्कलम्
tato viprānsamāhūya sarvāṁstānpurasaṁbhavān provāca praṇato bhaktyā dhanaṁ dattvā supuṣkalam
तब उस नगर में जन्मे सभी ब्राह्मणों को बुलाकर, उन्हें प्रचुर धन देकर, भक्तिपूर्वक झुककर उन्होंने कहा --
श्लोक 22 (skanda.6.60.22)
मया संस्थापितः सूर्यः सर्वरोगक्षयावहः॥ तथार्पितश्च युष्माकं चिंतनीयं सदैव तु
mayā saṁsthāpitaḥ sūryaḥ sarvarogakṣayāvahaḥ tathārpitaśca yuṣmākaṁ ciṁtanīyaṁ sadaiva tu
"मेरे द्वारा स्थापित यह सूर्य सब रोगों का नाश करने वाले हैं, और अब तुम्हें सौंपे गए हैं; तुम्हें सदा इनकी चिंता करनी है।"
श्लोक 23 (skanda.6.60.23)
विप्रा ऊचुः॥ गच्छ त्वं पांडवश्रेष्ठ सुविश्रब्धः स्वमालयम्॥ वयं सर्वे करिष्यामस्तवश्रेयोऽभिवर्धनम्
viprā ūcuḥ gaccha tvaṁ pāṁḍavaśreṣṭha suviśrabdhaḥ svamālayam vayaṁ sarve kariṣyāmastavaśreyo'bhivardhanam
ब्राह्मणों ने कहा -- "हे पांडवश्रेष्ठ, तुम निश्चिंत होकर अपने घर जाओ; हम सब तुम्हारे कल्याण की वृद्धि करेंगे।"
श्लोक 24 (skanda.6.60.24)
ततोऽर्जुनः प्रहृष्टात्मा तेभ्यो दत्त्वा धनं बहु॥ तानामंत्र्य नमस्कृत्य जगाम स्वपुरं प्रति
tato'rjunaḥ prahṛṣṭātmā tebhyo dattvā dhanaṁ bahu tānāmaṁtrya namaskṛtya jagāma svapuraṁ prati
तब अर्जुन प्रसन्नचित्त होकर, उन्हें बहुत धन देकर, उनसे विदा लेकर और उन्हें नमस्कार करके अपने नगर को चले गए।
श्लोक 25 (skanda.6.60.25)
सूत उवाच॥ एतद्वः सर्वमाख्यातं नरादित्यस्य संभवम्॥ माहात्म्यं ब्राह्मणश्रेष्ठाः शृण्वतां पापनाशनम्
sūta uvāca etadvaḥ sarvamākhyātaṁ narādityasya saṁbhavam māhātmyaṁ brāhmaṇaśreṣṭhāḥ śṛṇvatāṁ pāpanāśanam
सूत जी ने कहा -- हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, मैंने तुम्हें नरादित्य की उत्पत्ति और यह पापनाशक माहात्म्य, सुनने वालों के लिए, संपूर्ण रूप से बता दिया।