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नागर खण्ड · अध्याय 61

विषकन्या की उत्पत्ति

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श्लोक 1 (skanda.6.61.1)

ऋषय ऊचुः॥ शर्मिष्ठातीर्थमित्युक्तं त्वया यच्च महामते॥ कथं जातं महाभाग किंप्रभावं तु तद्वद

ṛṣaya ūcuḥ śarmiṣṭhātīrthamityuktaṁ tvayā yacca mahāmate kathaṁ jātaṁ mahābhāga kiṁprabhāvaṁ tu tadvada

ऋषियों ने कहा — हे महामते! आपने जिस शर्मिष्ठा-तीर्थ का उल्लेख किया, हे महाभाग! वह कैसे उत्पन्न हुआ और उसका क्या प्रभाव है, वह हमें बताइए।

श्लोक 2 (skanda.6.61.2)

सूत उवाच॥ आसीद्राजा वृकोनाम सोमवंश समुद्भवः॥ ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च सर्वलोकहिते रतः

sūta uvāca āsīdrājā vṛkonāma somavaṁśa samudbhavaḥ brahmaṇyaśca śaraṇyaśca sarvalokahite rataḥ

सूत जी ने कहा — सोमवंश में उत्पन्न वृक नामक एक राजा था, जो ब्राह्मणों का हितैषी, शरणागतों का आश्रयदाता और सम्पूर्ण जगत के कल्याण में सदा रत रहने वाला था।

श्लोक 3 (skanda.6.61.3)

तस्य भार्याऽभवत्साध्वी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी॥ सर्वलक्षणसंपन्ना पतिव्रतपरायणा

tasya bhāryā'bhavatsādhvī prāṇebhyo'pi garīyasī sarvalakṣaṇasaṁpannā pativrataparāyaṇā

उसकी पत्नी अत्यंत साध्वी थी, जो उसे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थी; वह सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त तथा पतिव्रत-धर्म में सर्वदा तत्पर रहने वाली थी।

श्लोक 4 (skanda.6.61.4)

अथ तस्यां समुत्पन्ना प्राप्ते वयसि पश्चिमे॥ कन्यका दिवसे प्राप्ते सर्वशास्त्रविगर्हिते

atha tasyāṁ samutpannā prāpte vayasi paścime kanyakā divase prāpte sarvaśāstravigarhite

तदनन्तर, जब वह राजा अपनी अवस्था के अंतिम भाग को प्राप्त हो चुका था, तब उस रानी के गर्भ से एक कन्या उत्पन्न हुई — वह भी ऐसे दिन में, जिसे समस्त शास्त्रों ने निंदित बताया है।

श्लोक 5 (skanda.6.61.5)

तत आनीय विप्रान्स ज्योतिर्ज्ञानविचक्षणान्॥ पप्रच्छ कीदृशी कन्या ममेयं संभविष्यति

tata ānīya viprānsa jyotirjñānavicakṣaṇān papraccha kīdṛśī kanyā mameyaṁ saṁbhaviṣyati

तब उसने ज्योतिष-विद्या में निपुण ब्राह्मणों को बुलाकर पूछा — यह मेरी कन्या भविष्य में कैसी होगी?

श्लोक 6 (skanda.6.61.6)

ब्राह्मणा ऊचुः॥ या कन्या प्राप्नुयाज्जन्म चित्रासंस्थे दिवाकरे॥ चंद्रे वापि चतुर्दश्यां सा भवेद्विषकन्यका

brāhmaṇā ūcuḥ yā kanyā prāpnuyājjanma citrāsaṁsthe divākare caṁdre vāpi caturdaśyāṁ sā bhavedviṣakanyakā

ब्राह्मणों ने कहा — जो कन्या सूर्य के चित्रा नक्षत्र में स्थित होने पर जन्म ले, अथवा चतुर्दशी तिथि को चन्द्रमा के उस स्थान में जन्म ले, वह विषकन्या होती है।

श्लोक 7 (skanda.6.61.7)

यस्तस्याः प्रतिगृह्णाति पाणिं पार्थिवसत्तम॥ षण्मासाभ्यंतरे मृत्युं स प्राप्नोति नरो ध्रुवम्

yastasyāḥ pratigṛhṇāti pāṇiṁ pārthivasattama ṣaṇmāsābhyaṁtare mṛtyuṁ sa prāpnoti naro dhruvam

हे राजश्रेष्ठ! जो पुरुष उसका पाणिग्रहण करेगा, वह निश्चय ही छह मास के भीतर मृत्यु को प्राप्त होगा।

श्लोक 8 (skanda.6.61.8)

यस्मिन्सा जायते हर्म्ये षण्मासाभ्यंतरे च तत्॥ करोति विभवैर्हीनं धनदस्याप्यसंशयम्

yasminsā jāyate harmye ṣaṇmāsābhyaṁtare ca tat karoti vibhavairhīnaṁ dhanadasyāpyasaṁśayam

और जिस भवन में वह जन्म लेती है, वह भवन छह मास के भीतर ही समस्त वैभव से रहित हो जाता है — चाहे वह कुबेर का ही घर क्यों न हो, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 9 (skanda.6.61.9)

सेयं तव सुता राजन्यथोक्ता विष कन्यका॥ पैतृकं श्वाशुरीयं च हनिष्यति गृहद्वयम्

seyaṁ tava sutā rājanyathoktā viṣa kanyakā paitṛkaṁ śvāśurīyaṁ ca haniṣyati gṛhadvayam

हे राजन्! यह आपकी पुत्री वैसी ही है जैसा वर्णित किया गया — एक विषकन्या; यह अपने पितृगृह और श्वसुरगृह — दोनों ही कुलों का नाश करेगी।

श्लोक 10 (skanda.6.61.10)

तस्मादिमां परित्यज्य सुखी भव नराधिप॥ श्रद्दधासि वचोऽस्माकं हित मुक्तं यदि प्रभो

tasmādimāṁ parityajya sukhī bhava narādhipa śraddadhāsi vaco'smākaṁ hita muktaṁ yadi prabho

अतः हे नराधिप! इसे त्याग दीजिए और सुखी रहिए — यदि आप हमारे इस हितकारी वचन पर विश्वास करते हैं, हे प्रभो!

श्लोक 11 (skanda.6.61.11)

राजोवाच॥ त्यक्ष्यामि यदि नामैतां धारयिष्यामि वा गृहे॥ अन्यदेहोद्भवं कर्म फलिष्यति तथापि मे

rājovāca tyakṣyāmi yadi nāmaitāṁ dhārayiṣyāmi vā gṛhe anyadehodbhavaṁ karma phaliṣyati tathāpi me

राजा ने कहा — चाहे मैं इसे त्याग दूँ अथवा घर में रखूँ, फिर भी दूसरे शरीर (पूर्वजन्म) में किया गया कर्म तो मुझे अपना फल देगा ही।

श्लोक 12 (skanda.6.61.12)

शुभं वा यदि वा पापं न तु शक्यं प्ररक्षितुम्॥ तस्मात्कर्म पुरस्कृत्य नैव त्यक्ष्यामि कन्यकाम्

śubhaṁ vā yadi vā pāpaṁ na tu śakyaṁ prarakṣitum tasmātkarma puraskṛtya naiva tyakṣyāmi kanyakām

चाहे वह शुभ हो या अशुभ, उससे बचा नहीं जा सकता। अतः कर्म को ही प्रधान मानकर मैं इस कन्या को कदापि नहीं त्यागूँगा।

श्लोक 13 (skanda.6.61.13)

येनयेन शरीरेण यद्यत्कर्म करोति यः॥ तेनतेनैव भूयः स प्राप्नोति सकलं फलम्

yenayena śarīreṇa yadyatkarma karoti yaḥ tenatenaiva bhūyaḥ sa prāpnoti sakalaṁ phalam

मनुष्य जिस-जिस शरीर से जो-जो कर्म करता है, उस-उस शरीर से ही वह उस कर्म का सम्पूर्ण फल पुनः प्राप्त करता है।

श्लोक 14 (skanda.6.61.14)

यस्यां यस्यामवस्थायां क्रियतेऽत्र शुभाशुभम्॥ तस्यां तस्यां ध्रुवं तस्य फलं तद्भुज्यते नरैः

yasyāṁ yasyāmavasthāyāṁ kriyate'tra śubhāśubham tasyāṁ tasyāṁ dhruvaṁ tasya phalaṁ tadbhujyate naraiḥ

जिस-जिस अवस्था में यहाँ शुभ अथवा अशुभ कर्म किया जाता है, उसी-उसी अवस्था में मनुष्य निश्चय ही उसका फल भोगते हैं।

श्लोक 15 (skanda.6.61.15)

न नश्यति पुराकर्म कृतं सर्वेंद्रियैरिह॥ अकृतं जायते नैव तस्मान्नास्ति भयं मम

na naśyati purākarma kṛtaṁ sarveṁdriyairiha akṛtaṁ jāyate naiva tasmānnāsti bhayaṁ mama

यहाँ समस्त इन्द्रियों द्वारा किया गया पूर्वकर्म कभी नष्ट नहीं होता, और जो कर्म नहीं किया गया, वह कभी उत्पन्न भी नहीं होता। इसीलिए मुझे कोई भय नहीं है।

श्लोक 16 (skanda.6.61.16)

आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च॥ पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः

āyuḥ karma ca vittaṁ ca vidyā nidhanameva ca pañcaitāni hi sṛjyante garbhasthasyaiva dehinaḥ

आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु — ये पाँचों बातें जीव के गर्भ में रहते हुए ही निश्चित हो जाती हैं।

श्लोक 17 (skanda.6.61.17)

यथा वृक्षेषु वल्लीषु कुसुमानि फलानि च॥ स्वकालं नातिवर्तंते तद्वत्कर्म पुराकृतम्

yathā vṛkṣeṣu vallīṣu kusumāni phalāni ca svakālaṁ nātivartaṁte tadvatkarma purākṛtam

जैसे वृक्षों और लताओं में फूल और फल अपने निश्चित समय का उल्लंघन नहीं करते, वैसे ही पूर्वकाल में किया गया कर्म भी अपने काल का उल्लंघन नहीं करता।

श्लोक 18 (skanda.6.61.18)

येनैव यद्यथा पूर्वं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ स एव तत्तथा भुंक्ते नित्यं विहितमात्मनः

yenaiva yadyathā pūrvaṁ kṛtaṁ karma śubhāśubham sa eva tattathā bhuṁkte nityaṁ vihitamātmanaḥ

जिसने जैसा शुभ या अशुभ कर्म पहले किया है, वही व्यक्ति सदैव उसे उसी रूप में भोगता है, जो उसके लिए स्वयं ही विहित है।

श्लोक 19 (skanda.6.61.19)

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्॥ तथैवं कोटिमध्यस्थं कर्तारं कर्म विन्दति

yathā dhenusahasreṣu vatso vindati mātaram tathaivaṁ koṭimadhyasthaṁ kartāraṁ karma vindati

जैसे हज़ारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माता को खोज लेता है, वैसे ही कर्म भी करोड़ों प्राणियों के बीच अपने कर्ता को खोज लेता है।

श्लोक 20 (skanda.6.61.20)

अन्यदेहकृतं कर्म न कश्चित्पुरुषो भुवि॥ बलेन प्रज्ञया वापि समर्थः कर्तुमन्यथा

anyadehakṛtaṁ karma na kaścitpuruṣo bhuvi balena prajñayā vāpi samarthaḥ kartumanyathā

संसार में कोई भी पुरुष, चाहे वह बलशाली हो या बुद्धिमान, दूसरे शरीर (पूर्वजन्म) में किए गए कर्म को बदलने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 21 (skanda.6.61.21)

अन्यथा शास्त्रगर्भिण्या धिया धीरो महीयते॥ स्वामिवत्प्राक्कृतं कर्म विदधाति तदन्यथा

anyathā śāstragarbhiṇyā dhiyā dhīro mahīyate svāmivatprākkṛtaṁ karma vidadhāti tadanyathā

यद्यपि यह प्रतीत होता है कि धीर पुरुष शास्त्र-ज्ञान से पूर्ण बुद्धि द्वारा महिमा को प्राप्त होता है, तथापि वास्तव में स्वामी के समान पूर्वकृत कर्म ही उसे उस रूप में विधान करता है।

श्लोक 22 (skanda.6.61.22)

स्वकृतान्युपतिष्ठंति सुखदुःखानि देहिनाम्॥ हेतुभूतो हि यस्तेषां सोऽहंकारेण बध्यते

svakṛtānyupatiṣṭhaṁti sukhaduḥkhāni dehinām hetubhūto hi yasteṣāṁ so'haṁkāreṇa badhyate

प्राणियों के सुख-दुःख उन्हीं के स्वयं किए हुए कर्मों से उपस्थित होते हैं। जो उनका प्रत्यक्ष कारण प्रतीत होता है, वह वस्तुतः अहंकार से ही बँधा होता है।

श्लोक 23 (skanda.6.61.23)

सुशीघ्रमभिधावन्तं निजं कर्मानुधावति॥ शेते सह शयानेन तिष्ठन्तमनुतिष्ठति

suśīghramabhidhāvantaṁ nijaṁ karmānudhāvati śete saha śayānena tiṣṭhantamanutiṣṭhati

अपना कर्म तीव्र गति से दौड़ने वाले के पीछे भी दौड़ता है, सोने वाले के साथ सोता है, और खड़े होने वाले के साथ खड़ा रहता है।

श्लोक 24 (skanda.6.61.24)

यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम्॥ तथा कर्म च कर्ता च नात्र कार्या विचारणा

yathā chāyātapau nityaṁ susaṁbaddhau parasparam tathā karma ca kartā ca nātra kāryā vicāraṇā

जैसे छाया और धूप सदैव परस्पर अविभाज्य रूप से जुड़े रहते हैं, वैसे ही कर्म और कर्ता भी जुड़े रहते हैं — इसमें किसी सन्देह की आवश्यकता नहीं है।

श्लोक 25 (skanda.6.61.25)

येन यत्रोपभोक्तव्यं सुखं वा दुःखमेव वा॥ नरः स बद्धो रज्ज्वेव बलात्तत्रैव नीयते

yena yatropabhoktavyaṁ sukhaṁ vā duḥkhameva vā naraḥ sa baddho rajjveva balāttatraiva nīyate

जिस मनुष्य को जहाँ जो सुख अथवा दुःख भोगना है, वह मानो रस्सी से बँधा हुआ बलपूर्वक वहीं ले जाया जाता है।

श्लोक 26 (skanda.6.61.26)

प्रमाणं कर्मभूतानां सुखदुःखोपपादने॥ सावधानतया यच्च जाग्रतां स्वपतामपि

pramāṇaṁ karmabhūtānāṁ sukhaduḥkhopapādane sāvadhānatayā yacca jāgratāṁ svapatāmapi

कर्म से उत्पन्न प्राणियों के सुख-दुःख की प्राप्ति में कर्म ही प्रमाण है; और यह सजगता से, जागते हुए और सोते हुए — दोनों ही अवस्थाओं में कार्य करता रहता है।

श्लोक 27 (skanda.6.61.27)

तैलक्षये यथा दीपो निर्वाणमधिगच्छति॥ कर्मक्षये तथा जंतुर्निर्वाणमधिगच्छति

tailakṣaye yathā dīpo nirvāṇamadhigacchati karmakṣaye tathā jaṁturnirvāṇamadhigacchati

जैसे तेल के समाप्त हो जाने पर दीपक बुझ जाता है, वैसे ही कर्म के क्षीण हो जाने पर प्राणी भी निर्वाण (शांति) को प्राप्त होता है।

श्लोक 28 (skanda.6.61.28)

न मन्त्रा न तपो दानं न तीर्थं न च संयमः॥ समर्था रक्षितुं जंतुं पीडितं पूर्वकर्मभिः

na mantrā na tapo dānaṁ na tīrthaṁ na ca saṁyamaḥ samarthā rakṣituṁ jaṁtuṁ pīḍitaṁ pūrvakarmabhiḥ

न मंत्र, न तप, न दान, न तीर्थ और न ही संयम — कोई भी उस प्राणी की रक्षा करने में समर्थ नहीं है, जो अपने पूर्वजन्म के कर्मों से पीड़ित हो।

श्लोक 29 (skanda.6.61.29)

संगत्या जठरे न्यस्तो रेतोबिन्दुरचेतनः॥ ऋतुकाले मनुष्येण वृद्धिं गच्छति कर्मतः

saṁgatyā jaṭhare nyasto retobinduracetanaḥ ṛtukāle manuṣyeṇa vṛddhiṁ gacchati karmataḥ

संयोग से गर्भ में स्थापित हुआ चेतनाहीन वीर्य-बिन्दु, उचित समय पर, केवल कर्म के प्रभाव से ही बढ़कर मनुष्य का रूप धारण करता है।

श्लोक 30 (skanda.6.61.30)

अन्नपानानि जीर्यंति यत्र भक्ष्यं च भक्षितम्॥ तस्मिन्नेवोदरे गर्भः कथं नाम न जीर्यति

annapānāni jīryaṁti yatra bhakṣyaṁ ca bhakṣitam tasminnevodare garbhaḥ kathaṁ nāma na jīryati

जिस उदर में खाया-पीया अन्न और भोज्य पदार्थ पच जाते हैं, उसी उदर में स्थित गर्भ आखिर क्यों नहीं पचता?

श्लोक 31 (skanda.6.61.31)

तस्मात्कर्मकृतं सर्वं देहिनामत्र जायते॥ शुभं वा यदि वा पापमिति मे निश्चयः सदा

tasmātkarmakṛtaṁ sarvaṁ dehināmatra jāyate śubhaṁ vā yadi vā pāpamiti me niścayaḥ sadā

अतः यहाँ प्राणियों को जो कुछ भी घटित होता है — शुभ हो या अशुभ — वह सब कर्म द्वारा ही किया गया है; यही मेरा सदा का दृढ़ निश्चय है।

श्लोक 32 (skanda.6.61.32)

अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति॥ जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे न जीवति

arakṣitaṁ tiṣṭhati daivarakṣitaṁ surakṣitaṁ daivahataṁ vinaśyati jīvatyanātho'pi vane visarjitaḥ kṛtaprayatno'pi gṛhe na jīvati

जिसकी रक्षा दैव करता है, वह असुरक्षित रहकर भी बचा रहता है; और जिसे दैव मार डालना चाहता है, वह भली-भाँति सुरक्षित होकर भी नष्ट हो जाता है। वन में त्यागा हुआ अनाथ भी जीवित रहता है, जबकि घर में समस्त प्रयत्नों के बावजूद भी कोई जीवित नहीं रहता।

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