नागर खण्ड · अध्याय 62
शर्मिष्ठा-तीर्थ का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.6.62.1)
सूत उवाच॥ एवं स निश्चयं कृत्वा पार्थिवो द्विजसत्तमाः॥ नात्यजत्तां तथोक्तोऽपि दैवज्ञैर्विषकन्यकाम्॥ दीयमानामपि प्रीत्या न च गृह्णाति भूभुजा
sūta uvāca evaṁ sa niścayaṁ kṛtvā pārthivo dvijasattamāḥ nātyajattāṁ tathokto'pi daivajñairviṣakanyakām dīyamānāmapi prītyā na ca gṛhṇāti bhūbhujā
सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो! ऐसा निश्चय करके राजा ने, ज्योतिषियों के कहने पर भी, उस विषकन्या को नहीं त्यागा; परन्तु जब उसे प्रेमपूर्वक विवाह हेतु प्रस्तुत किया गया, तो भी कोई राजा उसे स्वीकार नहीं करता था।
श्लोक 2 (skanda.6.62.2)
शर्मणष्ठीवनं यस्मात्तया स्वपितुराहितम्॥ शर्मिष्ठेति सुविख्याता ततः सा ह्यभवद्भुवि
śarmaṇaṣṭhīvanaṁ yasmāttayā svapiturāhitam śarmiṣṭheti suvikhyātā tataḥ sā hyabhavadbhuvi
चूँकि उसने अपने पिता को शांति और सुख प्रदान की, इसलिए वह पृथ्वी पर 'शर्मिष्ठा' के नाम से सुप्रसिद्ध हुई।
श्लोक 3 (skanda.6.62.3)
एतस्मिन्नंतरे तस्य शत्रवः पृथिवीपतेः॥ सर्वतः पीडयामास राष्ट्रं क्रोधसमन्विताः
etasminnaṁtare tasya śatravaḥ pṛthivīpateḥ sarvataḥ pīḍayāmāsa rāṣṭraṁ krodhasamanvitāḥ
इसी बीच उस राजा के शत्रु क्रोध से भरकर चारों ओर से उसके राज्य को पीड़ित करने लगे।
श्लोक 4 (skanda.6.62.4)
अथा सौ पार्थिवः क्रुद्धः स्वसैन्यपरिवारितः॥ युद्धाय निर्ययौ स्थानान्मृत्युं कृत्वा निवर्तने
athā sau pārthivaḥ kruddhaḥ svasainyaparivāritaḥ yuddhāya niryayau sthānānmṛtyuṁ kṛtvā nivartane
तब वह राजा क्रुद्ध होकर अपनी सेना के साथ युद्ध के लिए अपने स्थान से निकल पड़ा, यह निश्चय करके कि वापस लौटने की अपेक्षा मृत्यु को ही स्वीकार करेगा।
श्लोक 5 (skanda.6.62.5)
ततः संप्राप्य ताञ्छत्रूंश्चकार स महाहवम्॥ चतुरंगेन सैन्येन यमराष्ट्रविवर्धनम्
tataḥ saṁprāpya tāñchatrūṁścakāra sa mahāhavam caturaṁgena sainyena yamarāṣṭravivardhanam
तत्पश्चात् उन शत्रुओं तक पहुँचकर उसने अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ ऐसा महायुद्ध किया, जिसने यमराज के राज्य को बढ़ा दिया।
श्लोक 6 (skanda.6.62.6)
ततश्च दशमे प्राप्ते शत्रुभिः स महीपतिः॥ निहतो दिवसे सर्वैर्वेष्टयित्वा समन्ततः
tataśca daśame prāpte śatrubhiḥ sa mahīpatiḥ nihato divase sarvairveṣṭayitvā samantataḥ
और फिर दसवें दिन, समस्त शत्रुओं ने चारों ओर से घेरकर उस राजा को मार डाला।
श्लोक 7 (skanda.6.62.7)
ततस्तस्य नरेन्द्रस्य हतशेषाश्च ये नराः॥ भयार्तास्ते द्रुतं जग्मुः स्वपुरं प्रति दुःखिताः
tatastasya narendrasya hataśeṣāśca ye narāḥ bhayārtāste drutaṁ jagmuḥ svapuraṁ prati duḥkhitāḥ
तत्पश्चात् उस राजा की सेना में जो सैनिक मारे जाने से बच गए, वे भय से पीड़ित और दुःखी होकर तेज़ी से अपने नगर की ओर भाग गए।
श्लोक 8 (skanda.6.62.8)
तेपि शत्रुगणाः सर्वे संप्रहृष्टा जिगीषवः॥ तत्पुरं वेष्टयामासुस्तत्पुत्रोच्छेदनाय वै
tepi śatrugaṇāḥ sarve saṁprahṛṣṭā jigīṣavaḥ tatpuraṁ veṣṭayāmāsustatputrocchedanāya vai
वे समस्त शत्रुगण भी अत्यंत हर्षित और विजय की इच्छा से युक्त होकर, उसके पुत्र का नाश करने के लिए उस नगर को घेरने लगे।
श्लोक 9 (skanda.6.62.9)
एतस्मिन्नंतरे पौराः सर्वे शोकपरायणाः॥ जगर्हुः परुषैर्वाक्यैर्दुष्टां तां विषकन्यकाम्
etasminnaṁtare paurāḥ sarve śokaparāyaṇāḥ jagarhuḥ paruṣairvākyairduṣṭāṁ tāṁ viṣakanyakām
इसी बीच शोकमग्न सभी नगरवासी उस दुष्ट विषकन्या को कठोर वचनों से धिक्कारने लगे।
श्लोक 10 (skanda.6.62.10)
अस्या दोषेण पापाया मृतश्च स महीपतिः॥ तथा राष्ट्रस्य विध्वंसे भविष्यति पुरः क्षयः
asyā doṣeṇa pāpāyā mṛtaśca sa mahīpatiḥ tathā rāṣṭrasya vidhvaṁse bhaviṣyati puraḥ kṣayaḥ
'इस पापिनी के दोष के कारण ही राजा की मृत्यु हुई है, और अब राज्य का विनाश तथा नगर का क्षय होने वाला है।'
श्लोक 11 (skanda.6.62.11)
उक्तः स नृपतिः पूर्वं ब्राह्मणैर्ज्ञानिभिस्तदा॥ त्यजैनां बहुदोषाढ्यां निन्दितां विषकन्यकाम्
uktaḥ sa nṛpatiḥ pūrvaṁ brāhmaṇairjñānibhistadā tyajaināṁ bahudoṣāḍhyāṁ ninditāṁ viṣakanyakām
'उस राजा से पूर्व ही ज्ञानी ब्राह्मणों ने कहा था — अनेक दोषों से युक्त इस निंदित विषकन्या को त्याग दो।'
श्लोक 12 (skanda.6.62.12)
न तेन तत्कृतं वाक्यमपि तेषां हितैषिणाम्॥ स्नेहपाशनिबद्धेन दयाढ्येन महात्मना
na tena tatkṛtaṁ vākyamapi teṣāṁ hitaiṣiṇām snehapāśanibaddhena dayāḍhyena mahātmanā
'किंतु उन हितैषियों के उस वचन का पालन उस दयालु महात्मा राजा ने नहीं किया, क्योंकि वह स्नेह के बंधन में बँधा हुआ था।'
श्लोक 13 (skanda.6.62.13)
तस्मादद्यापि पापैषा वध्यतामाशु कन्यका॥ निर्यास्यतां पुरादस्माद्यावन्न स्यात्पुरक्षयः
tasmādadyāpi pāpaiṣā vadhyatāmāśu kanyakā niryāsyatāṁ purādasmādyāvanna syātpurakṣayaḥ
'अतः अब भी इस पापिनी कन्या को शीघ्र ही मार डाला जाए, अथवा इस नगर से निकाल दिया जाए, इससे पहले कि नगर का विनाश हो जाए।'
श्लोक 14 (skanda.6.62.14)
सूत उवाच॥ सापि श्रुत्वा जनोक्तांस्तानपवादान्पृथग्विधान्॥ वैराग्यं परमं गत्वा निंदां चक्रे तथात्मनः
sūta uvāca sāpi śrutvā janoktāṁstānapavādānpṛthagvidhān vairāgyaṁ paramaṁ gatvā niṁdāṁ cakre tathātmanaḥ
सूत जी ने कहा — वह भी लोगों द्वारा कहे गए उन विभिन्न प्रकार के निंदा-वचनों को सुनकर परम वैराग्य को प्राप्त हुई और स्वयं को भी धिक्कारने लगी।
श्लोक 15 (skanda.6.62.15)
ततो रात्रौ विनिष्क्रम्य भयशोकसमन्विता॥ प्रतस्थेऽरण्यमासाद्य मरणे कृतनिश्चया
tato rātrau viniṣkramya bhayaśokasamanvitā pratasthe'raṇyamāsādya maraṇe kṛtaniścayā
तत्पश्चात् वह रात्रि में निकलकर, भय और शोक से युक्त होकर, मृत्यु का निश्चय करके वन की ओर चल पड़ी।
श्लोक 16 (skanda.6.62.16)
अथ दृष्टं तया क्षेत्रं हाटकेश्वरजं महत्॥ तपस्विभिः समाकीर्णं चित्ताह्लादकरं परम्
atha dṛṣṭaṁ tayā kṣetraṁ hāṭakeśvarajaṁ mahat tapasvibhiḥ samākīrṇaṁ cittāhlādakaraṁ param
तब उसने हाटकेश्वर के उस महान् क्षेत्र को देखा, जो तपस्वियों से भरा हुआ और मन को अत्यंत आह्लादित करने वाला था।
श्लोक 17 (skanda.6.62.17)
अथ तस्याः स्मृतिर्जाता पूर्वजन्मसमुद्भवा॥ चंडालत्वे मया पूर्वं गौरेका वितृषीकृता
atha tasyāḥ smṛtirjātā pūrvajanmasamudbhavā caṁḍālatve mayā pūrvaṁ gaurekā vitṛṣīkṛtā
तब उसे अपने पूर्वजन्म से उत्पन्न एक स्मृति हुई — 'पूर्वजन्म में चांडाल-जाति में रहते हुए मैंने एक गाय की प्यास बुझाई थी।'
श्लोक 18 (skanda.6.62.18)
तत्प्रभावादहं जाता सुपुण्ये नृपमंदिरे॥ क्षेत्रस्यास्य प्रभावेन तस्मादत्रैव मे स्थितिः
tatprabhāvādahaṁ jātā supuṇye nṛpamaṁdire kṣetrasyāsya prabhāvena tasmādatraiva me sthitiḥ
'उसी के प्रभाव से मैं इस पुण्यमय राजभवन में जन्मी; और इस क्षेत्र के ही प्रभाव से मुझे यहीं रहना चाहिए।'
श्लोक 19 (skanda.6.62.19)
सूत उवाच॥ अन्यदेहांतरे ह्यासीच्चंडाली सा विगर्हिता॥ बहुप्रसूतिसंयुक्ता दरिद्रेण कदर्थिता
sūta uvāca anyadehāṁtare hyāsīccaṁḍālī sā vigarhitā bahuprasūtisaṁyuktā daridreṇa kadarthitā
सूत जी ने कहा — किसी अन्य पूर्वजन्म में वह एक निंदित चांडाल स्त्री थी, जो अनेक संतानों से युक्त थी और दरिद्रता से पीड़ित थी।
श्लोक 20 (skanda.6.62.20)
अथ सा भ्रममाणाऽत्र क्षेत्रे प्राप्ता तृषार्दिता॥ मध्यंदिनगतेसूर्ये ज्येष्ठमासे सुदारुणे
atha sā bhramamāṇā'tra kṣetre prāptā tṛṣārditā madhyaṁdinagatesūrye jyeṣṭhamāse sudāruṇe
भटकते हुए वह प्यास से व्याकुल होकर इसी क्षेत्र में आ पहुँची, उस समय जब सूर्य मध्याह्न में था और भीषण ज्येष्ठ मास चल रहा था।
श्लोक 21 (skanda.6.62.21)
अथापश्यत्स्तोकजलां सा तत्र लघुकूपिकाम्॥ तृषार्तां कपिलां गां वर्तमानां तदां तिके
athāpaśyatstokajalāṁ sā tatra laghukūpikām tṛṣārtāṁ kapilāṁ gāṁ vartamānāṁ tadāṁ tike
वहाँ उसने थोड़े जल वाला एक छोटा कुआँ देखा, और उसके निकट प्यास से व्याकुल एक कपिला भूरी गाय को खड़ी देखा।
श्लोक 22 (skanda.6.62.22)
ततो दयां समाश्रित्य त्यक्त्वा स्नेहं सुतोद्भवम्॥ आत्मनश्च तथा प्राणान्गां वितृष्णामथाकरोत्
tato dayāṁ samāśritya tyaktvā snehaṁ sutodbhavam ātmanaśca tathā prāṇāngāṁ vitṛṣṇāmathākarot
तब दया से प्रेरित होकर, अपने पुत्रों के प्रति स्नेह और अपने प्राणों की भी परवाह किए बिना, उसने उस गाय की प्यास बुझा दी।
श्लोक 23 (skanda.6.62.23)
जलाभावे तथा सा च समस्तैर्बालकैः सह॥ वैवस्वतगृहं प्राप्ता गोभक्तिधृतमानसा
jalābhāve tathā sā ca samastairbālakaiḥ saha vaivasvatagṛhaṁ prāptā gobhaktidhṛtamānasā
फिर जल के अभाव में, वह अपने सभी बालकों सहित यमराज के धाम को प्राप्त हुई — उसका मन गौ-भक्ति में ही लीन था।
श्लोक 24 (skanda.6.62.24)
ततो नृपगृहे जाता तत्प्रभावाद्द्विजोत्तमाः॥ पूर्वकर्मविपाकेन संजाता विष कन्यका
tato nṛpagṛhe jātā tatprabhāvāddvijottamāḥ pūrvakarmavipākena saṁjātā viṣa kanyakā
तब हे द्विजोत्तमो! उसी के प्रभाव से वह राजभवन में जन्मी; परंतु किसी अन्य पूर्व कर्म के फल के परिपाक से वह विषकन्या बनकर उत्पन्न हुई।
श्लोक 25 (skanda.6.62.25)
ऋषय ऊचुः॥ केन कर्मविपाकेन संजाता विषकन्यका॥ स्वकुलोच्छेदनकरी सर्वं सूत ब्रवीहि नः
ṛṣaya ūcuḥ kena karmavipākena saṁjātā viṣakanyakā svakulocchedanakarī sarvaṁ sūta bravīhi naḥ
ऋषियों ने कहा — किस कर्म के फल से वह अपने ही कुल का नाश करने वाली विषकन्या बनी? हे सूत! हमें सब कुछ बताइए।
श्लोक 26 (skanda.6.62.26)
सूत उवाच॥ चंडालत्वे तया विप्रा वर्तंत्या भ्रममाणया॥ देवतायतने दृष्टा गौरी हेममयी शुभा
sūta uvāca caṁḍālatve tayā viprā vartaṁtyā bhramamāṇayā devatāyatane dṛṣṭā gaurī hemamayī śubhā
सूत जी ने कहा — हे विप्रो! चांडाल-जाति में रहते हुए, भटकते समय उसने एक मंदिर में स्वर्णमयी सुन्दर गौरी की मूर्ति देखी।
श्लोक 27 (skanda.6.62.27)
ततस्तां विजने प्राप्य गत्वा देशांतरं मुदा॥ यावत्करोति खंडानि विक्रयार्थं सुनिंदिता॥ तावदन्वेषमाणास्तां संप्राप्ता नृपसेवकाः
tatastāṁ vijane prāpya gatvā deśāṁtaraṁ mudā yāvatkaroti khaṁḍāni vikrayārthaṁ suniṁditā tāvadanveṣamāṇāstāṁ saṁprāptā nṛpasevakāḥ
तब सुनसान स्थान में उसे पाकर, वह अत्यंत निंदनीय स्त्री हर्षपूर्वक दूसरे देश को चली गई; और जैसे ही वह उसे बेचने के लिए टुकड़े-टुकड़े कर रही थी, राजा के सेवक उसे ढूँढते हुए वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 28 (skanda.6.62.28)
अथ ते तां समालोक्य भर्त्सयित्वा मुहुर्मुहुः॥ संताड्य लकुटाघातैर्लोष्टघातैश्च मुष्टिभिः
atha te tāṁ samālokya bhartsayitvā muhurmuhuḥ saṁtāḍya lakuṭāghātairloṣṭaghātaiśca muṣṭibhiḥ
तब उसे देखकर उन्होंने बार-बार उसे धिक्कारा और लाठियों, मिट्टी के ढेलों तथा मुक्कों से उसे पीटा।
श्लोक 29 (skanda.6.62.29)
ततः सुवर्णमादाय त्यक्त्वा तां रुधिरप्लुताम्॥ अवध्यैषेति संचिंत्य स्वपुरं प्रति ते गताः
tataḥ suvarṇamādāya tyaktvā tāṁ rudhiraplutām avadhyaiṣeti saṁciṁtya svapuraṁ prati te gatāḥ
तब वे स्वर्ण को लेकर तथा रक्त से लथपथ उसे वहीं छोड़कर, यह सोचकर कि 'यह वध के योग्य नहीं है', अपने नगर को लौट गए।
श्लोक 30 (skanda.6.62.30)
यत्तया पार्वती स्पृष्टा ततो वै खण्डशः कृता॥ तेन कर्मविपाकेन संजाता विषकन्यका
yattayā pārvatī spṛṣṭā tato vai khaṇḍaśaḥ kṛtā tena karmavipākena saṁjātā viṣakanyakā
चूँकि उसने पार्वती की उस मूर्ति को स्पर्श करके उसे टुकड़े-टुकड़े कर दिया था, इसी कर्म के फल से वह विषकन्या बनकर उत्पन्न हुई।
श्लोक 31 (skanda.6.62.31)
ततः संस्मृतिमासाद्य पूर्वजन्मसमुद्भवाम्॥ माहात्म्यं जलदानस्य गोपीतस्य विचार्य च॥ चकार कूपिकास्थाने तडागं विमलोदकम्
tataḥ saṁsmṛtimāsādya pūrvajanmasamudbhavām māhātmyaṁ jaladānasya gopītasya vicārya ca cakāra kūpikāsthāne taḍāgaṁ vimalodakam
तब पूर्वजन्म से उत्पन्न उस स्मृति को प्राप्त कर तथा गौ को पिलाए गए जल के माहात्म्य पर विचार करके, उसने उस कुइया के स्थान पर स्वच्छ जल से युक्त एक सरोवर का निर्माण कराया।
श्लोक 32 (skanda.6.62.32)
समुद्रप्रतिमं चारु पद्मिनीखंडमंडितम्॥ मत्स्यकच्छपसंकीर्णं शिशुमारविराजितम्
samudrapratimaṁ cāru padminīkhaṁḍamaṁḍitam matsyakacchapasaṁkīrṇaṁ śiśumāravirājitam
वह सरोवर समुद्र के समान सुन्दर था, कमल-समूहों से सुशोभित, मछलियों और कछुओं से भरा हुआ तथा जलचरों से सुशोभित था।
श्लोक 33 (skanda.6.62.33)
सेवितं बहुभिर्हंसैर्बकैश्चक्रैः समंततः॥ अगाधसलिलं पुण्यं सेवितं जलजंतुभिः
sevitaṁ bahubhirhaṁsairbakaiścakraiḥ samaṁtataḥ agādhasalilaṁ puṇyaṁ sevitaṁ jalajaṁtubhiḥ
वह चारों ओर अनेक हंसों, बगुलों और चक्रवाक पक्षियों से सुशोभित था; उसका जल अथाह और पवित्र था तथा जलचर प्राणियों से भरा हुआ था।
श्लोक 34 (skanda.6.62.34)
प्रासादं तत्समीपस्थं साधु दृष्टिमनोहरम्॥ कारयित्वातिसंभक्त्या कैलासशिखरोपमम्
prāsādaṁ tatsamīpasthaṁ sādhu dṛṣṭimanoharam kārayitvātisaṁbhaktyā kailāsaśikharopamam
उसके निकट ही उसने अत्यंत भक्तिपूर्वक एक भव्य मंदिर बनवाया, जो देखने में अत्यंत मनोहर था और कैलास शिखर के समान प्रतीत होता था।
श्लोक 35 (skanda.6.62.35)
ततस्तत्र तपस्तेपे गौरीं संस्थाप्य भक्तितः॥ तदग्रे व्रतमास्थाय यथोक्तं शास्त्र संभवम्
tatastatra tapastepe gaurīṁ saṁsthāpya bhaktitaḥ tadagre vratamāsthāya yathoktaṁ śāstra saṁbhavam
फिर वहाँ गौरी की प्रतिष्ठा भक्तिपूर्वक करके, उसके समक्ष शास्त्रोक्त विधि के अनुसार व्रत धारण करके उसने तपस्या की।
श्लोक 36 (skanda.6.62.36)
प्रातः स्नात्वा तु हेमंते गौरीं संपूज्य भक्तितः॥ बलिपूजोपहारैश्च विप्रदानादिभिस्तथा
prātaḥ snātvā tu hemaṁte gaurīṁ saṁpūjya bhaktitaḥ balipūjopahāraiśca vipradānādibhistathā
प्रातःकाल स्नान करके, हेमंत ऋतु में वह भक्तिपूर्वक गौरी की पूजा बलि, उपहार और ब्राह्मणों को दान आदि से करती थी।
श्लोक 37 (skanda.6.62.37)
ततश्च शिशिरे प्राप्ते सायं प्रातः समाहिता॥ एकांतरोपवासैः सा स्नानं चक्रे नृपात्मजा
tataśca śiśire prāpte sāyaṁ prātaḥ samāhitā ekāṁtaropavāsaiḥ sā snānaṁ cakre nṛpātmajā
फिर शिशिर ऋतु आने पर वह राजकुमारी संयमित होकर प्रातः-सायं स्नान करती और एक दिन छोड़कर उपवास करती थी।
श्लोक 38 (skanda.6.62.38)
वसंते नृत्यगीतैश्च तोषयामास पार्वतीम्॥ षष्ठकालाशना साध्वी सस्यदानपरा यणा
vasaṁte nṛtyagītaiśca toṣayāmāsa pārvatīm ṣaṣṭhakālāśanā sādhvī sasyadānaparā yaṇā
वसंत ऋतु में उसने नृत्य और गीतों से पार्वती को प्रसन्न किया; वह साध्वी छठे प्रहर में ही भोजन करती थी और अन्न-दान में तत्पर रहती थी।
श्लोक 39 (skanda.6.62.39)
पञ्चाग्निसाधका ग्रीष्मे फलाहारं तपस्विनी॥ चकार श्रद्धयोपेता वृकभूमिपतेः सुता
pañcāgnisādhakā grīṣme phalāhāraṁ tapasvinī cakāra śraddhayopetā vṛkabhūmipateḥ sutā
ग्रीष्म ऋतु में राजा वृक की वह तपस्विनी पुत्री श्रद्धापूर्वक पंचाग्नि-साधना करती हुई केवल फलों का आहार करती थी।
श्लोक 40 (skanda.6.62.40)
वर्षासु च जलाहारा भूत्वा सा विष कन्यका॥ आकाशे शयनं चक्रे परित्यक्तकुटीरका
varṣāsu ca jalāhārā bhūtvā sā viṣa kanyakā ākāśe śayanaṁ cakre parityaktakuṭīrakā
और वर्षा ऋतु में वह विषकन्या केवल जल पीकर रहती थी और अपनी कुटिया त्यागकर खुले आकाश के नीचे शयन करती थी।
श्लोक 41 (skanda.6.62.41)
वायुभक्षा सती चाऽथ साऽनयच्छरदं ततः॥ कृतजप्यपरा नित्यं पार्वतीगतमानसा
vāyubhakṣā satī cā'tha sā'nayaccharadaṁ tataḥ kṛtajapyaparā nityaṁ pārvatīgatamānasā
फिर वायु मात्र का आहार करती हुई वह सती, नित्य जप में तत्पर और मन को सदा पार्वती में लगाए हुए, शरद ऋतु व्यतीत करती थी।
श्लोक 42 (skanda.6.62.42)
एवमाराधयंत्याश्च तस्या देवीं गिरेः सुताम्॥ जगाम सुमहान्कालो न लेभे फलमीहितम्
evamārādhayaṁtyāśca tasyā devīṁ gireḥ sutām jagāma sumahānkālo na lebhe phalamīhitam
इस प्रकार पर्वत-पुत्री देवी की आराधना करते हुए उसका बहुत लंबा समय बीत गया, फिर भी उसे अपने अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं हुई।
श्लोक 43 (skanda.6.62.43)
मुखं वलिभिराक्रान्तं पलितैरंकितं शिरः॥ कन्याभावेपि वर्तंत्या न च तुष्टा हरप्रिया
mukhaṁ valibhirākrāntaṁ palitairaṁkitaṁ śiraḥ kanyābhāvepi vartaṁtyā na ca tuṣṭā harapriyā
उसका मुख झुर्रियों से भर गया और सिर पर सफ़ेद बाल आ गए; कुमारी अवस्था में ही रहते हुए भी, हरप्रिया पार्वती प्रसन्न नहीं हुईं।
श्लोक 44 (skanda.6.62.44)
कस्यचित्त्वथ कालस्य तत्परीक्षार्थमेव सा॥ शक्राणीरूपमास्थाय ततः सन्दर्शनं गता
kasyacittvatha kālasya tatparīkṣārthameva sā śakrāṇīrūpamāsthāya tataḥ sandarśanaṁ gatā
तत्पश्चात् कुछ समय बीतने पर, उसकी परीक्षा लेने के लिए ही देवी ने शचि इन्द्राणी का रूप धारण करके उसके समक्ष दर्शन दिया।
श्लोक 45 (skanda.6.62.45)
सुधावदातं सूर्याभं कैलासशिखरोपमम्॥ सुप्रलंबकरं मत्तं चतुर्दंतं महागजम्
sudhāvadātaṁ sūryābhaṁ kailāsaśikharopamam supralaṁbakaraṁ mattaṁ caturdaṁtaṁ mahāgajam
वह एक विशाल हाथी पर सवार थी, जो अमृत के समान श्वेत, सूर्य के समान तेजस्वी, कैलास शिखर के समान विशाल, लम्बी सूँड वाला, मदमस्त और चार दाँतों वाला था।
श्लोक 46 (skanda.6.62.46)
समास्थाय वृता स्त्रीभिर्देवानां सर्वतो दिशम्॥ दधती मुकुटं मूर्ध्नि हारकेयूरभूषिता
samāsthāya vṛtā strībhirdevānāṁ sarvato diśam dadhatī mukuṭaṁ mūrdhni hārakeyūrabhūṣitā
उस पर सवार होकर, चारों ओर से देवताओं की पत्नियों से घिरी हुई, सिर पर मुकुट धारण किए, हार और बाजूबंदों से सुसज्जित होकर वह आई।
श्लोक 47 (skanda.6.62.47)
पांडुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि॥ सेव्यमानाऽप्सरोभिश्च स्तूयमाना च किन्नरैः
pāṁḍureṇātapatreṇa dhriyamāṇena mūrdhani sevyamānā'psarobhiśca stūyamānā ca kinnaraiḥ
उसके सिर पर श्वेत छत्र धारण किया गया था; अप्सराएँ उसकी सेवा कर रही थीं और किन्नर उसकी स्तुति कर रहे थे।
श्लोक 48 (skanda.6.62.48)
गन्धर्वैर्गीयमानासीत्ततः प्रोवाच सादरम्॥ वरं यच्छामि ते पुत्रि प्रार्थयस्व यथेप्सितम्
gandharvairgīyamānāsīttataḥ provāca sādaram varaṁ yacchāmi te putri prārthayasva yathepsitam
गंधर्व उसके लिए गीत गा रहे थे। तब उसने आदरपूर्वक कहा — 'हे पुत्री! मैं तुम्हें वर देती हूँ, जो चाहो माँग लो।'
श्लोक 49 (skanda.6.62.49)
अनेन तपसा तुष्टा पुष्कलेन तवाधुना॥ अहं भार्या सुरेन्द्रस्य शचीति परिकीर्तिता॥ त्रैलोक्येऽपि स्वयं प्राप्ता दयां कृत्वा तवोपरि
anena tapasā tuṣṭā puṣkalena tavādhunā ahaṁ bhāryā surendrasya śacīti parikīrtitā trailokye'pi svayaṁ prāptā dayāṁ kṛtvā tavopari
'तुम्हारी इस महान् तपस्या से प्रसन्न होकर, मैं — जो तीनों लोकों में शचि, इन्द्र की पत्नी के नाम से विख्यात हूँ — तुम पर दया करके स्वयं यहाँ आई हूँ।'
श्लोक 50 (skanda.6.62.50)
त्वया महत्तपस्तप्तं ध्यायंत्या हरवल्लभाम्॥ तपसा तुष्टिमायाता भवानी न सुनिष्ठुरा
tvayā mahattapastaptaṁ dhyāyaṁtyā haravallabhām tapasā tuṣṭimāyātā bhavānī na suniṣṭhurā
'तुमने शिवप्रिया का ध्यान करते हुए महान् तप किया है; भवानी इतनी निष्ठुर नहीं हैं — वे तुम्हारे तप से संतुष्ट हो चुकी हैं।'
श्लोक 51 (skanda.6.62.51)
सूत उवाच॥ सा तस्या वचनं श्रुत्वा शक्राण्या विषकन्यका॥ नमस्कृत्वाऽथ तामूचे कृतांजलिपुटा स्थिता
sūta uvāca sā tasyā vacanaṁ śrutvā śakrāṇyā viṣakanyakā namaskṛtvā'tha tāmūce kṛtāṁjalipuṭā sthitā
सूत जी ने कहा — शचि के इस वचन को सुनकर विषकन्या ने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी होकर उनसे कहा।
श्लोक 52 (skanda.6.62.52)
विषकन्योवाच॥ नाहं त्वत्तो वरं देवि प्रार्थयामि कथञ्चन॥ तथान्यासामपींद्राणि देवतानामसंशयम्
viṣakanyovāca nāhaṁ tvatto varaṁ devi prārthayāmi kathañcana tathānyāsāmapīṁdrāṇi devatānāmasaṁśayam
विषकन्या ने कहा — 'हे देवि! मैं आपसे किसी भी प्रकार का वर नहीं माँगती; और हे इन्द्राणी! निःसंदेह अन्य किसी भी देवता से भी नहीं।'
श्लोक 53 (skanda.6.62.53)
अप्यहं नरकं रौद्रं प्रगच्छामींद्रवल्लभे॥ हरकांता समादेशान्न स्वर्गेऽपि तवाज्ञया
apyahaṁ narakaṁ raudraṁ pragacchāmīṁdravallabhe harakāṁtā samādeśānna svarge'pi tavājñayā
'हे इन्द्रवल्लभे! चाहे मुझे भीषण नरक में ही क्यों न जाना पड़े, मैं तो केवल हरकांता पार्वती की आज्ञा से ही चलूँगी — तुम्हारी आज्ञा से स्वर्ग में जाने के लिए भी नहीं।'
श्लोक 54 (skanda.6.62.54)
अनादिमध्यपर्य्यन्ता ज्ञानैश्वर्यसम न्विता॥ या देवी पूज्यते देवैर्वरं तस्या वृणोम्यहम्
anādimadhyaparyyantā jñānaiśvaryasama nvitā yā devī pūjyate devairvaraṁ tasyā vṛṇomyaham
'जो देवी आदि, मध्य और अंत से रहित हैं, ज्ञान और ऐश्वर्य से सम्पन्न हैं, तथा जिनकी पूजा स्वयं देवता करते हैं — मैं तो केवल उन्हीं का वर चाहती हूँ।'
श्लोक 55 (skanda.6.62.55)
यामाराधयते विष्णुर्ब्रह्मा रुद्रश्च वासवः॥ वांछितार्थं सदा देवीं वरं तस्या वृणो म्यहम्
yāmārādhayate viṣṇurbrahmā rudraśca vāsavaḥ vāṁchitārthaṁ sadā devīṁ varaṁ tasyā vṛṇo myaham
'जिनकी आराधना विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र और इन्द्र भी अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए सदा करते हैं — मैं उन्हीं देवी का वर चाहती हूँ।'
श्लोक 56 (skanda.6.62.56)
यया व्याप्तमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ स्त्रीरूपैर्विविधैर्देव्या वरं तस्या वृणोम्यहम्
yayā vyāptamidaṁ sarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram strīrūpairvividhairdevyā varaṁ tasyā vṛṇomyaham
'जिस देवी ने चराचर सहित इस सम्पूर्ण त्रिलोक को अपने विविध स्त्री-रूपों से व्याप्त कर रखा है — मैं उन्हीं देवी का वर चाहती हूँ।'
श्लोक 57 (skanda.6.62.57)
श्रीदेव्युवाच॥ अहं भार्या सुरेन्द्रस्य प्राणेभ्योऽपि गरीयसी॥ ममाज्ञां पालयन्ति स्म देवदानवपन्नगाः
śrīdevyuvāca ahaṁ bhāryā surendrasya prāṇebhyo'pi garīyasī mamājñāṁ pālayanti sma devadānavapannagāḥ
श्री देवी शचि रूप में ने कहा — 'मैं इन्द्र की पत्नी हूँ, जो उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है; देवता, दानव और नाग सभी मेरी आज्ञा का पालन करते हैं।'
श्लोक 58 (skanda.6.62.58)
किंनरा गुह्का यक्षाः किं पुनर्मर्त्यधर्मिणः॥ तस्मात्त्वं किं न गृह्णासि वरं मत्तः कुतापसि
kiṁnarā guhkā yakṣāḥ kiṁ punarmartyadharmiṇaḥ tasmāttvaṁ kiṁ na gṛhṇāsi varaṁ mattaḥ kutāpasi
'किन्नर, गुह्यक और यक्ष भी मेरी आज्ञा मानते हैं, फिर मरणधर्मा मनुष्यों की तो बात ही क्या! हे तपस्विनी! फिर तुम मुझसे वर क्यों नहीं लेतीं?'
श्लोक 59 (skanda.6.62.59)
तन्नूनं वज्रघातेन चूर्णयिष्यामि ते शिरः॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा तापस्यथ ततो द्विजाः
tannūnaṁ vajraghātena cūrṇayiṣyāmi te śiraḥ tasyāstadvacanaṁ śrutvā tāpasyatha tato dvijāḥ
'तो निश्चय ही मैं वज्र के प्रहार से तुम्हारा सिर चूर-चूर कर दूँगी!' हे द्विजो! उसका यह वचन सुनकर वह तपस्विनी तब —
श्लोक 60 (skanda.6.62.60)
धैर्यमालंब्य तां प्राह भूय एव सुरेश्वरीम्॥ स्वामिनी त्वं हि देवानां सत्यमेतदसंशयम्
dhairyamālaṁbya tāṁ prāha bhūya eva sureśvarīm svāminī tvaṁ hi devānāṁ satyametadasaṁśayam
— धैर्य धारण करके उस देवेश्वरी से पुनः बोली — 'यह सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं, कि तुम देवताओं की स्वामिनी हो।'
श्लोक 61 (skanda.6.62.61)
यस्याः प्राप्तं त्वयैश्वर्यं परा तां तोषयाम्यहम्॥ स्वल्पमप्यपराधं ते न करोमि सुरेश्वरि
yasyāḥ prāptaṁ tvayaiśvaryaṁ parā tāṁ toṣayāmyaham svalpamapyaparādhaṁ te na karomi sureśvari
'जिससे तुमने अपना यह ऐश्वर्य प्राप्त किया है, मैं उन्हीं परम देवी को प्रसन्न करना चाहती हूँ। हे देवेश्वरी! मैं तुम्हारा तनिक भी अपराध नहीं कर रही।'
श्लोक 62 (skanda.6.62.62)
तथापि वधयोग्यां मां मन्यसे विक्षिपायुधम्॥ अन्यच्चापि वचो मह्यं शक्राणि शृणु सादरम्
tathāpi vadhayogyāṁ māṁ manyase vikṣipāyudham anyaccāpi vaco mahyaṁ śakrāṇi śṛṇu sādaram
'फिर भी यदि तुम मुझे वध के योग्य समझती हो, तो अपना अस्त्र चला दो। परंतु हे शचि! मेरा एक और वचन भी आदरपूर्वक सुन लो।'
श्लोक 63 (skanda.6.62.63)
तच्छुत्वा कुरु यच्छ्रेयो विचिन्त्य मनसा ततः॥ न त्वं न ते पतिः शक्रो न चान्येपि सुरासुराः॥ मां निषूदयितुं शक्ताः पार्वत्यां शरणं गताम्
tacchutvā kuru yacchreyo vicintya manasā tataḥ na tvaṁ na te patiḥ śakro na cānyepi surāsurāḥ māṁ niṣūdayituṁ śaktāḥ pārvatyāṁ śaraṇaṁ gatām
'इसे सुनकर मन में विचार करके जो श्रेयस्कर हो वही करना। न तुम, न तुम्हारे पति इन्द्र, और न ही अन्य कोई देव या असुर — कोई भी मुझे मार सकने में समर्थ नहीं है, क्योंकि मैंने पार्वती की शरण ली है।'
श्लोक 64 (skanda.6.62.64)
तस्माद्द्रुतं दिवं गच्छ मा त्वं कोपं वृथा कुरु॥ सन्मार्गे वर्तमानायां मम सर्वसुरेश्वरि
tasmāddrutaṁ divaṁ gaccha mā tvaṁ kopaṁ vṛthā kuru sanmārge vartamānāyāṁ mama sarvasureśvari
'अतः तुम शीघ्र स्वर्ग को लौट जाओ; व्यर्थ ही क्रोध मत करो, हे सर्वसुरेश्वरि! क्योंकि मैं तो सन्मार्ग पर ही चल रही हूँ।'
श्लोक 65 (skanda.6.62.65)
सूत उवाच॥ एवं सा तां शचीमुक्त्वा दुःखिता विषकन्यका॥ चिन्तयामास तदिदं मरणे कृतनिश्चया
sūta uvāca evaṁ sā tāṁ śacīmuktvā duḥkhitā viṣakanyakā cintayāmāsa tadidaṁ maraṇe kṛtaniścayā
सूत जी ने कहा — इस प्रकार शचि से यह कहकर वह दुःखी विषकन्या, मृत्यु का निश्चय करके यह सोचने लगी।
श्लोक 66 (skanda.6.62.66)
न प्रसीदति मे देवी यस्मात्पर्वतनंदिनी॥ तस्मान्मां यदि शक्राणी नैषा व्यापादयिष्यति
na prasīdati me devī yasmātparvatanaṁdinī tasmānmāṁ yadi śakrāṇī naiṣā vyāpādayiṣyati
'चूँकि पर्वतपुत्री देवी मुझसे अभी तक प्रसन्न नहीं हुई हैं, इसलिए यदि यह शचि मुझे नहीं मारेगी...'
श्लोक 67 (skanda.6.62.67)
तन्नूनं ज्वलनं दीप्तं सेवयिष्यामि सत्वरम्॥ अथापश्यत्क्षणेनैव तं चैरावणवारणम्
tannūnaṁ jvalanaṁ dīptaṁ sevayiṣyāmi satvaram athāpaśyatkṣaṇenaiva taṁ cairāvaṇavāraṇam
'...तो निश्चय ही मैं शीघ्र ही प्रज्वलित अग्नि का आश्रय लूँगी।' तभी उसने उसी क्षण उस ऐरावत हाथी को —
श्लोक 68 (skanda.6.62.68)
दुग्धकुंदेन्दुसंकाशं संजातं सहसा वृषम्॥ तस्योपरि स्थितां देवीं शंभुना सह पार्वतीम्
dugdhakuṁdendusaṁkāśaṁ saṁjātaṁ sahasā vṛṣam tasyopari sthitāṁ devīṁ śaṁbhunā saha pārvatīm
— जो दूध, कुंद पुष्प और चन्द्रमा के समान श्वेत था, अचानक एक वृषभ नंदी में परिवर्तित हो गया, और उसके ऊपर शिव सहित देवी पार्वती को विराजमान देखा।
श्लोक 69 (skanda.6.62.69)
चतुर्भुजां प्रसन्नास्यां दिव्यरूपसमन्विताम्॥ शुक्लमाल्यांबरधरां चन्द्रार्धकृतमस्तकाम्
caturbhujāṁ prasannāsyāṁ divyarūpasamanvitām śuklamālyāṁbaradharāṁ candrārdhakṛtamastakām
वे चतुर्भुजी थीं, उनका मुख प्रसन्न था, दिव्य रूप से युक्त थीं, श्वेत माला और वस्त्र धारण किए हुए थीं तथा उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र सुशोभित था।
श्लोक 70 (skanda.6.62.70)
ततः सम्यक्समालोक्य ज्ञात्वा तां पर्वतात्मजाम्॥ विषकन्या स्तुतिं चक्रे प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः
tataḥ samyaksamālokya jñātvā tāṁ parvatātmajām viṣakanyā stutiṁ cakre praṇipatya muhurmuhuḥ
तब भली-भाँति देखकर और उन्हें पर्वतपुत्री पहचानकर, विषकन्या बार-बार प्रणाम करते हुए उनकी स्तुति करने लगी।
श्लोक 71 (skanda.6.62.71)
नमस्ते देवदेवेशि नमस्ते सर्ववासिनि॥ सर्वकामप्रदे सत्ये जरामरणवर्जिते
namaste devadeveśi namaste sarvavāsini sarvakāmaprade satye jarāmaraṇavarjite
'हे देवदेवेशि! तुम्हें नमस्कार है। हे सर्ववासिनि! तुम्हें नमस्कार है। हे समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली, हे सत्यस्वरूपा, हे जरा-मृत्यु से रहित देवि!'
श्लोक 72 (skanda.6.62.72)
शक्रादयोऽपि देवास्ते परमार्थेन नो विदुः॥ स्वरूपवर्णनं कर्तुं किं पुनर्देवि मानुषी
śakrādayo'pi devāste paramārthena no viduḥ svarūpavarṇanaṁ kartuṁ kiṁ punardevi mānuṣī
'इन्द्र आदि देवता भी परमार्थ रूप से तुम्हारे स्वरूप का वर्णन करना नहीं जानते, फिर हे देवि! एक साधारण मानवी भला कैसे कर सकती है!'
श्लोक 73 (skanda.6.62.73)
यस्याः सर्वं महीव्योमजलाग्निपवनात्मकम्॥ ब्रह्मांडमंगसंभूतं सदेवासुरमानुषम्
yasyāḥ sarvaṁ mahīvyomajalāgnipavanātmakam brahmāṁḍamaṁgasaṁbhūtaṁ sadevāsuramānuṣam
'जिनके शरीर से पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायुमय यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड — देवों, असुरों और मनुष्यों सहित — उत्पन्न हुआ है।'
श्लोक 74 (skanda.6.62.74)
न तस्या जन्मनि ब्रह्मा न नाशाय महेश्वरः॥ पालनाय न गोविंदस्तां त्वां स्तोष्याम्यहं कथम्
na tasyā janmani brahmā na nāśāya maheśvaraḥ pālanāya na goviṁdastāṁ tvāṁ stoṣyāmyahaṁ katham
'जिनके जन्म पर ब्रह्मा का, जिनके नाश पर महेश्वर का, और जिनके पालन पर गोविंद का भी कोई अधिकार नहीं — ऐसी तुम्हारी मैं भला कैसे स्तुति कर सकती हूँ?'
श्लोक 75 (skanda.6.62.75)
तथाष्टगुणमैश्वर्यं यस्याः स्वाभाविकं परम्॥ निरस्तातिशयं लोके स्पृहणीयतमं सदा
tathāṣṭaguṇamaiśvaryaṁ yasyāḥ svābhāvikaṁ param nirastātiśayaṁ loke spṛhaṇīyatamaṁ sadā
'और उनका आठ प्रकार का ऐश्वर्य स्वाभाविक और सर्वोत्कृष्ट है, जगत् में जिससे बढ़कर कुछ नहीं तथा जो सदा सबसे अधिक चाहा जाने योग्य है।'
श्लोक 76 (skanda.6.62.76)
यस्या रूपाण्यनेकानि सम्यग्ध्यानपरायणाः॥ ध्यायंति मुनयो भक्त्या प्राप्नुवंति च वांछितम्
yasyā rūpāṇyanekāni samyagdhyānaparāyaṇāḥ dhyāyaṁti munayo bhaktyā prāpnuvaṁti ca vāṁchitam
'जिनके अनेक रूपों का ध्यान मुनि भली-भाँति ध्यानपरायण होकर भक्तिपूर्वक करते हैं, और अपनी अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करते हैं।'
श्लोक 77 (skanda.6.62.77)
हृदि संकल्प्य यद्रूपं ध्यानेनार्चंति योगिनः॥ सम्यग्भावात्मकैः पुष्पैर्मोक्षाय कृत निश्चयाः
hṛdi saṁkalpya yadrūpaṁ dhyānenārcaṁti yoginaḥ samyagbhāvātmakaiḥ puṣpairmokṣāya kṛta niścayāḥ
'जिनके स्वरूप का हृदय में संकल्प करके योगीजन ध्यान द्वारा भावपूर्ण पुष्पों से पूजा करते हैं, मोक्ष के लिए दृढ़ निश्चय करके।'
श्लोक 78 (skanda.6.62.78)
तां देवीं मानुषी भूत्वा कथं स्तौमि महेश्वरीम्
tāṁ devīṁ mānuṣī bhūtvā kathaṁ staumi maheśvarīm
'उस महेश्वरी देवी की मैं, एक साधारण मानवी होकर, भला कैसे स्तुति कर सकती हूँ?'
श्लोक 79 (skanda.6.62.79)
देव्युवाच॥ परितुष्टास्मि ते पुत्रि वरं प्रार्थय सुव्रते॥ असंदिग्धं प्रदास्यामि यत्ते हृदि सदा स्थितम्
devyuvāca parituṣṭāsmi te putri varaṁ prārthaya suvrate asaṁdigdhaṁ pradāsyāmi yatte hṛdi sadā sthitam
देवी ने कहा — 'हे पुत्री! मैं तुमसे अत्यंत प्रसन्न हूँ। हे सुव्रते! वर माँगो; जो कुछ भी तुम्हारे हृदय में सदा स्थित है, मैं वह निःसंदेह प्रदान करूँगी।'
श्लोक 80 (skanda.6.62.80)
विषकन्योवाच॥ भर्तुरर्थे मया देवि कृतोऽयं तपउद्यमः॥ तत्किं तेन करिष्यामि सांप्रतं जरयावृता
viṣakanyovāca bharturarthe mayā devi kṛto'yaṁ tapaudyamaḥ tatkiṁ tena kariṣyāmi sāṁprataṁ jarayāvṛtā
विषकन्या ने कहा — 'हे देवि! मैंने यह तपस्या पति की प्राप्ति के लिए की थी; परंतु अब वृद्धावस्था से घिर जाने पर उससे मुझे क्या लाभ होगा?'
श्लोक 81 (skanda.6.62.81)
तस्मादत्राऽऽश्रमे साकं त्वया स्थेयं सदैव तु॥ हिताय सर्वनारीणां वचनान्मम पार्वति
tasmādatrā''śrame sākaṁ tvayā stheyaṁ sadaiva tu hitāya sarvanārīṇāṁ vacanānmama pārvati
'अतः हे पार्वति! मेरे इस वचन से, समस्त स्त्रियों के हित के लिए, तुम सदा यहीं इस आश्रम में साथ ही निवास करो।'
श्लोक 82 (skanda.6.62.82)
श्रीदेव्युवाच॥ अद्यप्रभृत्यहं भद्रे श्रेष्ठेऽस्मिन्नाश्रमे शुभे॥ स्वमाश्रमं करिष्यामि यत्ते हृदि समाश्रितम्
śrīdevyuvāca adyaprabhṛtyahaṁ bhadre śreṣṭhe'sminnāśrame śubhe svamāśramaṁ kariṣyāmi yatte hṛdi samāśritam
श्री देवी ने कहा — 'हे भद्रे! आज से मैं, तुम्हारे हृदय में जो संकल्प है उसके अनुसार, इस श्रेष्ठ और शुभ आश्रम को अपना निवास स्थान बनाऊँगी।'
श्लोक 83 (skanda.6.62.83)
माघशुक्लतृतीयायां या ऽत्र स्नानं करिष्यति॥ नारी सा मत्प्रसादेन लप्स्यते वांछितं फलम्
māghaśuklatṛtīyāyāṁ yā 'tra snānaṁ kariṣyati nārī sā matprasādena lapsyate vāṁchitaṁ phalam
'जो स्त्री माघ शुक्ल तृतीया के दिन यहाँ स्नान करेगी, वह मेरी कृपा से अपने अभीष्ट फल को प्राप्त करेगी।'
श्लोक 84 (skanda.6.62.84)
अपि कृत्वा महापापं नारी वा पुरुषोऽथवा॥ यत्र स्नात्वा प्रसादान्मे विपाप्मा संभविष्यति
api kṛtvā mahāpāpaṁ nārī vā puruṣo'thavā yatra snātvā prasādānme vipāpmā saṁbhaviṣyati
'चाहे किसी स्त्री या पुरुष ने कोई महापाप ही क्यों न किया हो, यहाँ स्नान करके वह मेरी कृपा से पापरहित हो जाएगा।'
श्लोक 85 (skanda.6.62.85)
अत्र ये फलदानं च प्रकरिष्यंति मानवाः॥ सफलाः सकलास्तेषामाशाः स्युर्नात्र संशयः
atra ye phaladānaṁ ca prakariṣyaṁti mānavāḥ saphalāḥ sakalāsteṣāmāśāḥ syurnātra saṁśayaḥ
'जो मनुष्य यहाँ फल-दान करेंगे, उन सभी की आशाएँ पूर्ण होंगी — इसमें कोई संदेह नहीं है।'
श्लोक 86 (skanda.6.62.86)
अपि हत्वा स्त्रियं मर्त्यो योऽत्र स्नानं करिष्यति॥ माघशुक्लतृतीयायां विपाप्मा स भविष्यति
api hatvā striyaṁ martyo yo'tra snānaṁ kariṣyati māghaśuklatṛtīyāyāṁ vipāpmā sa bhaviṣyati
'यहाँ तक कि जिस मनुष्य ने किसी स्त्री की हत्या की हो, वह भी यदि माघ शुक्ल तृतीया के दिन यहाँ स्नान करेगा, तो पापरहित हो जाएगा।'
श्लोक 87 (skanda.6.62.87)
या तत्र कन्यका भद्रे स्नानं भक्त्या करि ष्यति॥ तस्मिन्दिने पतिश्रेष्ठं लप्स्यते नात्र संशयः
yā tatra kanyakā bhadre snānaṁ bhaktyā kari ṣyati tasmindine patiśreṣṭhaṁ lapsyate nātra saṁśayaḥ
'हे भद्रे! जो कन्या उस दिन वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करेगी, वह निश्चय ही एक श्रेष्ठ पति प्राप्त करेगी।'
श्लोक 88 (skanda.6.62.88)
सूत उवाच॥ एवमुक्त्वा ततो गौरी तां च पस्पर्श पाणिना॥ ततश्च तत्क्षणाज्जाता दिव्यरूपवपुर्द्धरा
sūta uvāca evamuktvā tato gaurī tāṁ ca pasparśa pāṇinā tataśca tatkṣaṇājjātā divyarūpavapurddharā
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर गौरी ने अपने हाथ से उसे स्पर्श किया, और उसी क्षण वह एक दिव्य और तेजस्वी शरीर धारण करने वाली बन गई।
श्लोक 89 (skanda.6.62.89)
वृद्धत्वेन परित्यक्ता दिव्यमाल्यानुलेपना॥ पीनोन्नतकुचाभोगा प्रमत्तगजगामिनी
vṛddhatvena parityaktā divyamālyānulepanā pīnonnatakucābhogā pramattagajagāminī
वृद्धावस्था से मुक्त होकर, वह दिव्य माला और अनुलेपन से युक्त हो गई, उसका वक्षस्थल पुष्ट और उन्नत हो गया, और वह मदमस्त हथिनी की भाँति चलने लगी।
श्लोक 90 (skanda.6.62.90)
ततस्तां सा समादाय विधाय निजकिंकरीम्॥ कैलासं पर्वतश्रेष्ठं जगाम हरसंयुता
tatastāṁ sā samādāya vidhāya nijakiṁkarīm kailāsaṁ parvataśreṣṭhaṁ jagāma harasaṁyutā
तब देवी उसे साथ लेकर और अपनी सेविका बनाकर, शिव सहित पर्वतश्रेष्ठ कैलास को चली गईं।
श्लोक 91 (skanda.6.62.91)
ततःप्रभृति तत्तीर्थं शर्मिष्ठातीर्थमुच्यते॥ प्रख्यातं त्रिषु लोकेषु सर्वपातकनाशनम्
tataḥprabhṛti tattīrthaṁ śarmiṣṭhātīrthamucyate prakhyātaṁ triṣu lokeṣu sarvapātakanāśanam
तभी से वह तीर्थ शर्मिष्ठा-तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो तीनों लोकों में विख्यात है और समस्त पापों का नाशक है।
श्लोक 92 (skanda.6.62.92)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नानं समाचरेत्॥ माघशुक्लतृतीयायां यथावद्द्विजसत्तमाः
tasmātsarvaprayatnena tatra snānaṁ samācaret māghaśuklatṛtīyāyāṁ yathāvaddvijasattamāḥ
अतः हे द्विजोत्तमो! माघ शुक्ल तृतीया के दिन विधिपूर्वक वहाँ स्नान अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 93 (skanda.6.62.93)
एतत्पवित्रमायुष्यं सर्व पातकनाशनम्॥ स्त्रीतीर्थसंभवं नॄणां माहात्म्यं यन्मयोदितम्
etatpavitramāyuṣyaṁ sarva pātakanāśanam strītīrthasaṁbhavaṁ nṝṇāṁ māhātmyaṁ yanmayoditam
यह जो मैंने कहा, यह पवित्र और आयु बढ़ाने वाला, समस्त पापों का नाशक — यह स्त्री-तीर्थ से उत्पन्न माहात्म्य मनुष्यों के लिए वर्णित किया गया है।
श्लोक 94 (skanda.6.62.94)
यश्चैतत्प्रातरुत्थाय सदा पठति मानवः॥ स सर्वाँल्लभते कामान्मनसा वांछितान्सदा
yaścaitatprātarutthāya sadā paṭhati mānavaḥ sa sarvā~llabhate kāmānmanasā vāṁchitānsadā
जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर सदा इसका पाठ करता है, वह सदा अपने मन से चाही गई सभी कामनाओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 95 (skanda.6.62.95)
तथा पर्वणि संप्राप्ते यश्चैतत्पठते नरः॥ शृणोति चाशु भक्त्या यः स याति शिवमंदिरम्
tathā parvaṇi saṁprāpte yaścaitatpaṭhate naraḥ śṛṇoti cāśu bhaktyā yaḥ sa yāti śivamaṁdiram
तथा जब कोई पर्व आता है, तब जो मनुष्य इसका पाठ करता है अथवा भक्तिपूर्वक शीघ्र ही इसे सुनता है, वह शिवलोक को प्राप्त होता है।