नागर खण्ड · अध्याय 63
सोमेश्वर-लिंगों की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.6.63.1)
सूत उवाच॥ अथ सोमेश्वराख्यं च तत्र लिंगं सुशोभनम्॥ अस्ति ख्यातं त्रिलोकेऽत्र स्वयं सोमेन निर्मितम्
sūta uvāca atha someśvarākhyaṁ ca tatra liṁgaṁ suśobhanam asti khyātaṁ triloke'tra svayaṁ somena nirmitam
सूत जी ने कहा — अब वहाँ सोमेश्वर नामक अत्यंत सुंदर लिंग है, जो तीनों लोकों में विख्यात है और स्वयं सोम चन्द्रमा द्वारा स्थापित किया गया है।
श्लोक 2 (skanda.6.63.2)
सोमवारेण यस्तत्र वत्सरं यावदर्चयेत्॥ क्षणं कृत्वा स रोगेण दारुणेनापि मुच्यते
somavāreṇa yastatra vatsaraṁ yāvadarcayet kṣaṇaṁ kṛtvā sa rogeṇa dāruṇenāpi mucyate
जो मनुष्य सोमवार के दिन वहाँ एक वर्ष तक निरंतर पूजा करता है, वह क्षणभर में ही भयंकर रोग से भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.6.63.3)
यक्ष्मणापि न संदेहः किं पुनः कुष्ठपूर्वकैः॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रोगार्त्तस्तं प्रपूजयेत्
yakṣmaṇāpi na saṁdehaḥ kiṁ punaḥ kuṣṭhapūrvakaiḥ tasmātsarvaprayatnena rogārttastaṁ prapūjayet
क्षय रोग से मुक्ति में भी कोई संदेह नहीं है, फिर कुष्ठ जैसे रोगों की तो बात ही क्या! अतः रोग से पीड़ित व्यक्ति को सम्पूर्ण प्रयत्न से उसकी पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.6.63.4)
तदाराध्य पुरा सोमः क्षयव्याधिसमन्वितः॥ बभूव नीरुग्देहोऽसौ यथा पांड्यो नराधिपः
tadārādhya purā somaḥ kṣayavyādhisamanvitaḥ babhūva nīrugdeho'sau yathā pāṁḍyo narādhipaḥ
पूर्वकाल में क्षय रोग से पीड़ित सोम चन्द्रमा ने उसकी आराधना करके अपने शरीर को रोगमुक्त कर लिया था, जैसे पांड्य राजा ने भी किया था।
श्लोक 5 (skanda.6.63.5)
ऋषय ऊचुः॥ ओषधीनामधीशस्य कथं सोमस्य सूतज॥ क्षयव्याधिः पुरा जाता उपशांतिं कथं गतः
ṛṣaya ūcuḥ oṣadhīnāmadhīśasya kathaṁ somasya sūtaja kṣayavyādhiḥ purā jātā upaśāṁtiṁ kathaṁ gataḥ
ऋषियों ने कहा — हे सूतनन्दन! ओषधियों के स्वामी सोम को पूर्वकाल में क्षय रोग कैसे हुआ, और वह कैसे शांत हुआ?
श्लोक 6 (skanda.6.63.6)
एतन्नः सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामते॥ तथा तस्य महीपस्य पांड्यस्यापि कथां शुभाम्
etannaḥ sarvamācakṣva vistareṇa mahāmate tathā tasya mahīpasya pāṁḍyasyāpi kathāṁ śubhām
हे महामते! यह सब हमें विस्तार से बताइए, तथा उस पांड्य राजा की भी शुभ कथा सुनाइए।
श्लोक 7 (skanda.6.63.7)
सूत उवाच॥ दक्षस्य कन्यकाः पूर्वं सप्तविंशतिसंख्यया॥ उपयेमे निशानाथो देवाग्निगुरुसंनिधौ
sūta uvāca dakṣasya kanyakāḥ pūrvaṁ saptaviṁśatisaṁkhyayā upayeme niśānātho devāgnigurusaṁnidhau
सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में चन्द्रमा ने देवताओं, अग्नि और गुरु की उपस्थिति में दक्ष की सत्ताईस कन्याओं से विवाह किया था।
श्लोक 8 (skanda.6.63.8)
नक्षत्रसंज्ञिता लोके कीर्त्यंते या द्विजोत्तमैः॥ दैवज्ञैरश्विनीपूर्वा रूपौदार्यगुणान्विताः
nakṣatrasaṁjñitā loke kīrtyaṁte yā dvijottamaiḥ daivajñairaśvinīpūrvā rūpaudāryaguṇānvitāḥ
वे लोक में नक्षत्रों के नाम से जानी जाती हैं, जिन्हें श्रेष्ठ ब्राह्मण और ज्योतिषी अश्विनी आदि के नाम से कीर्तन करते हैं, और जो रूप, उदारता तथा गुणों से सम्पन्न थीं।
श्लोक 9 (skanda.6.63.9)
अथ तासां समस्तानां मध्ये तस्य निशापतेः॥ रोहिणी वल्लभा जज्ञे प्राणेभ्योऽपि गरीयसी
atha tāsāṁ samastānāṁ madhye tasya niśāpateḥ rohiṇī vallabhā jajñe prāṇebhyo'pi garīyasī
अब उन सबके बीच रोहिणी ही उस चन्द्रमा की सबसे प्रिय पत्नी हुई, जो उसे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थी।
श्लोक 10 (skanda.6.63.10)
ततः समं परित्यज्य सर्वास्ता दक्षकन्यकाः॥ रोहिण्या सह संयुक्तः संबभूव दिवानिशम्
tataḥ samaṁ parityajya sarvāstā dakṣakanyakāḥ rohiṇyā saha saṁyuktaḥ saṁbabhūva divāniśam
तब उन सभी दक्ष-कन्याओं को समान रूप से त्यागकर, वह दिन-रात रोहिणी के साथ ही रहने लगा।
श्लोक 11 (skanda.6.63.11)
ततस्ताः काम संतप्ता दौर्भाग्येन समन्विताः॥ प्रोचुर्दुःखान्विता दक्षं गत्वा बाष्पप्लुताननाः
tatastāḥ kāma saṁtaptā daurbhāgyena samanvitāḥ procurduḥkhānvitā dakṣaṁ gatvā bāṣpaplutānanāḥ
तब वे कामाग्नि से संतप्त और दुर्भाग्य से पीड़ित होकर, दुःखी होकर आँसुओं से भीगे मुख के साथ दक्ष के पास जाकर बोलीं।
श्लोक 12 (skanda.6.63.12)
वयं यस्मै त्वया दत्ताः पत्न्यर्थं तात पापिने॥ ऋतुमात्रमपि प्रीत्या सोऽस्माकं न प्रयच्छति
vayaṁ yasmai tvayā dattāḥ patnyarthaṁ tāta pāpine ṛtumātramapi prītyā so'smākaṁ na prayacchati
'हे तात! जिस पापी को तुमने हमें पत्नी रूप में दिया, वह हमें ऋतुकाल में भी प्रेमपूर्वक प्राप्त नहीं होता।'
श्लोक 13 (skanda.6.63.13)
तस्मात्प्राणान्विहास्यामः संप्रविश्य हुताशनम्॥ अविलंबान्महाभाग सत्यं ब्रूमस्तवाग्रतः
tasmātprāṇānvihāsyāmaḥ saṁpraviśya hutāśanam avilaṁbānmahābhāga satyaṁ brūmastavāgrataḥ
'अतः हे महाभाग! हम बिना विलंब किए अग्नि में प्रवेश करके अपने प्राण त्याग देंगी; हम तुम्हारे समक्ष सत्य कह रही हैं।'
श्लोक 14 (skanda.6.63.14)
सूत उवाच॥ तासां तद्वचनं श्रुत्वा दक्षो दुःखसमन्वितः॥ सर्वास्ताः स्वयमादाय जगाम शशिसंनिधौ
sūta uvāca tāsāṁ tadvacanaṁ śrutvā dakṣo duḥkhasamanvitaḥ sarvāstāḥ svayamādāya jagāma śaśisaṁnidhau
सूत जी ने कहा — उनका यह वचन सुनकर दुःखी दक्ष स्वयं उन सबको लेकर चन्द्रमा के समीप गए।
श्लोक 15 (skanda.6.63.15)
ततः प्रोवाच सोऽन्वक्षं तासां दक्षः प्रजापतिः॥ भर्त्सयन्परुषैर्वाक्यैर्निशानाथं मुहुर्मुहुः
tataḥ provāca so'nvakṣaṁ tāsāṁ dakṣaḥ prajāpatiḥ bhartsayanparuṣairvākyairniśānāthaṁ muhurmuhuḥ
तब प्रजापति दक्ष ने उनके समक्ष ही, कठोर वचनों से बार-बार चन्द्रमा को धिक्कारते हुए कहा।
श्लोक 16 (skanda.6.63.16)
किमिदं युज्यते कर्तुं त्वया रात्रिपतेऽधम॥ कर्म मूढ सतां बाह्य धर्मशास्त्रविगर्हितम्
kimidaṁ yujyate kartuṁ tvayā rātripate'dhama karma mūḍha satāṁ bāhya dharmaśāstravigarhitam
'हे नीच रात्रिपते! क्या तुम्हारे लिए यह करना उचित है? यह मूर्खतापूर्ण कर्म है, सज्जनों के मार्ग से बाहर है और धर्मशास्त्र द्वारा निंदित है।'
श्लोक 17 (skanda.6.63.17)
ऋतुकालेऽपि संप्राप्ते सुता मम समुद्भवाः॥ यन्न संभाषसि प्रीत्या धर्मशास्त्रं न वेत्सि किम्
ṛtukāle'pi saṁprāpte sutā mama samudbhavāḥ yanna saṁbhāṣasi prītyā dharmaśāstraṁ na vetsi kim
'मेरी पुत्रियों का ऋतुकाल आने पर भी तुम उनसे प्रेमपूर्वक बात नहीं करते — क्या तुम धर्मशास्त्र को नहीं जानते?'
श्लोक 18 (skanda.6.63.18)
ऋतु स्नातां तु यो भार्यां संनिधौ नोपगच्छति॥ घोरायां भ्रूणहत्यायां युज्यते नात्र संशयः
ṛtu snātāṁ tu yo bhāryāṁ saṁnidhau nopagacchati ghorāyāṁ bhrūṇahatyāyāṁ yujyate nātra saṁśayaḥ
'जो पुरुष ऋतुस्नाता पत्नी के पास नहीं जाता, वह निश्चय ही भ्रूणहत्या के घोर पाप का भागी होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।'
श्लोक 19 (skanda.6.63.19)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सलज्जो रात्रिनायकः॥ प्रोवाचाधोमुखो दक्षं प्रकरिष्ये वचस्तव
tasya tadvacanaṁ śrutvā salajjo rātrināyakaḥ provācādhomukho dakṣaṁ prakariṣye vacastava
उसका यह वचन सुनकर लज्जित रात्रिनाथ ने सिर नीचा करके दक्ष से कहा — 'मैं आपकी बात का पालन करूँगा।'
श्लोक 20 (skanda.6.63.20)
ततो हृष्टमना दक्षः सुताः सर्वा हिमद्युते॥ निवेद्यामंत्र्य तं पश्चाज्जगाम निजमंदिरम्
tato hṛṣṭamanā dakṣaḥ sutāḥ sarvā himadyute nivedyāmaṁtrya taṁ paścājjagāma nijamaṁdiram
तब प्रसन्न मन से दक्ष ने अपनी सभी पुत्रियों को हिमकिरण चन्द्रमा को सौंपकर, उससे विदा लेकर अपने निवास को प्रस्थान किया।
श्लोक 21 (skanda.6.63.21)
चन्द्रोऽपि पूर्ववत्सर्वास्ताः परित्यज्य दक्षजाः॥ रोहिण्या सह संसर्गं प्रचकारानुरागतः
candro'pi pūrvavatsarvāstāḥ parityajya dakṣajāḥ rohiṇyā saha saṁsargaṁ pracakārānurāgataḥ
परन्तु चन्द्रमा भी पहले की भाँति उन सभी दक्ष-कन्याओं को त्यागकर, अनुराग से केवल रोहिणी के साथ ही संगति करने लगा।
श्लोक 22 (skanda.6.63.22)
अथ ता दुःखिता भूयो जग्मुर्यत्र पिता स्थितः॥ प्रोचुश्च बाष्पपूर्णाक्षास्तत्कालसदृशं वचः
atha tā duḥkhitā bhūyo jagmuryatra pitā sthitaḥ procuśca bāṣpapūrṇākṣāstatkālasadṛśaṁ vacaḥ
तब वे फिर से दुःखी होकर अपने पिता के पास गईं, और आँखों में आँसू भरकर उस समय के अनुकूल वचन कहने लगीं।
श्लोक 23 (skanda.6.63.23)
एतत्तात महद्दुःखमस्माकं वर्तते हृदि॥ यद्दौर्भाग्यं प्रसंजातं सर्वस्त्रीजनगर्हितम्
etattāta mahadduḥkhamasmākaṁ vartate hṛdi yaddaurbhāgyaṁ prasaṁjātaṁ sarvastrījanagarhitam
'हे तात! हमारे हृदय में यह महान् दुःख है कि हमें ऐसा दुर्भाग्य प्राप्त हुआ है, जो सभी स्त्रियों द्वारा निंदित है।'
श्लोक 24 (skanda.6.63.24)
यत्पुनस्त्वं कृतस्तेन कामुकेन दुरात्मना॥ व्यर्थश्रमोऽप्रमाणीव कृतेऽस्माकं गतः स्वयम्
yatpunastvaṁ kṛtastena kāmukena durātmanā vyarthaśramo'pramāṇīva kṛte'smākaṁ gataḥ svayam
'और जो कुछ भी तुमने उस कामी दुरात्मा से कहा था, वह भी हमारे विषय में व्यर्थ ही सिद्ध हुआ, मानो उसका कोई महत्व ही न हो।'
श्लोक 25 (skanda.6.63.25)
तद्दुःखं न वयं शक्ता हृदि धर्तुं कथंचन॥ रमते स हि रोहिण्या चंद्रमाः सहितोऽनिशम्
tadduḥkhaṁ na vayaṁ śaktā hṛdi dhartuṁ kathaṁcana ramate sa hi rohiṇyā caṁdramāḥ sahito'niśam
'हम उस दुःख को अपने हृदय में किसी भी प्रकार धारण करने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि चन्द्रमा तो निरंतर रोहिणी के साथ ही रमण करता है।'
श्लोक 26 (skanda.6.63.26)
विशेषात्तव वाक्येन निषिद्धो रात्रिनायकः॥ अनुज्ञां देहि तस्मात्त्वमस्माकं तत्र सांप्रतम्॥ दौर्भाग्यदुःखसंतप्तास्त्यजामो येन जीवितम्
viśeṣāttava vākyena niṣiddho rātrināyakaḥ anujñāṁ dehi tasmāttvamasmākaṁ tatra sāṁpratam daurbhāgyaduḥkhasaṁtaptāstyajāmo yena jīvitam
'विशेष रूप से जब तुम्हारे वचन से रात्रिनाथ को मना किया गया था फिर भी उसने ऐसा किया — इसलिए अब तुम हमें अनुमति दो, जिससे हम दुर्भाग्य के दुःख से संतप्त होकर अपने प्राण त्याग सकें।'
श्लोक 27 (skanda.6.63.27)
सूत उवाच॥ तासां तद्वचनं श्रुत्वा दक्षः कोपसमन्वितः॥ शशाप शर्वरीनाथं गत्वा तत्संनिधौ ततः
sūta uvāca tāsāṁ tadvacanaṁ śrutvā dakṣaḥ kopasamanvitaḥ śaśāpa śarvarīnāthaṁ gatvā tatsaṁnidhau tataḥ
सूत जी ने कहा — उनका यह वचन सुनकर क्रोध से भरे दक्ष ने रात्रिनाथ के समीप जाकर उसे शाप दे दिया।
श्लोक 28 (skanda.6.63.28)
यस्मात्पाप न मे वाक्यं त्वया धर्मसमन्वितम्॥ कृतं तस्मात्क्षयव्याधिस्त्वां ग्रसिष्यति दारुणः
yasmātpāpa na me vākyaṁ tvayā dharmasamanvitam kṛtaṁ tasmātkṣayavyādhistvāṁ grasiṣyati dāruṇaḥ
'हे पापी! चूँकि तुमने मेरे धर्मयुक्त वचन का पालन नहीं किया, इसलिए एक भयंकर क्षय रोग तुम्हें ग्रस लेगा।'
श्लोक 29 (skanda.6.63.29)
एवमुक्त्वा ययौ दक्षश्चन्द्रोऽपि द्विजसत्तमाः॥ तत्क्षणाद्यक्ष्मणाश्लिष्टः क्षयं याति दिने दिने
evamuktvā yayau dakṣaścandro'pi dvijasattamāḥ tatkṣaṇādyakṣmaṇāśliṣṭaḥ kṣayaṁ yāti dine dine
ऐसा कहकर दक्ष चले गए; और हे द्विजोत्तमो! उसी क्षण चन्द्रमा भी क्षय रोग से ग्रस्त हो गया और दिन-प्रतिदिन क्षीण होने लगा।
श्लोक 30 (skanda.6.63.30)
ततोऽसौ कृशतां प्राप्तः संपरित्यज्य रोहिणीम्॥ अशक्तः सेवितुं कामं वभ्राम जगतीतले
tato'sau kṛśatāṁ prāptaḥ saṁparityajya rohiṇīm aśaktaḥ sevituṁ kāmaṁ vabhrāma jagatītale
तब क्षीण होते हुए, वह रोहिणी को छोड़कर, काम-भोग में असमर्थ होकर, पृथ्वी पर भटकने लगा।
श्लोक 31 (skanda.6.63.31)
क्षयव्याधिप्रणाशाय पृच्छ मानश्चिकित्सकान्॥ औषधानि विचित्राणि प्रकुर्वाणो जितेन्द्रियः
kṣayavyādhipraṇāśāya pṛccha mānaścikitsakān auṣadhāni vicitrāṇi prakurvāṇo jitendriyaḥ
क्षय रोग को नष्ट करने के लिए वैद्यों से परामर्श करता हुआ, विविध औषधियों का सेवन करता हुआ, इन्द्रियों को वश में रखते हुए —
श्लोक 32 (skanda.6.63.32)
तथापि मुच्यते नैव यक्ष्मणा स निशापतिः॥ दक्षशापेन रौद्रेण क्षयं याति दिनेदिने
tathāpi mucyate naiva yakṣmaṇā sa niśāpatiḥ dakṣaśāpena raudreṇa kṣayaṁ yāti dinedine
— फिर भी वह रात्रिनाथ क्षय रोग से मुक्त नहीं हो सका; दक्ष के भयंकर शाप से वह दिन-प्रतिदिन क्षीण होता ही गया।
श्लोक 33 (skanda.6.63.33)
ततो वैराग्यमापन्नस्तीर्थयात्रापरायणः॥ बभूव श्रद्धयायुक्तस्त्यक्त्वा भेषजमुत्तमम्
tato vairāgyamāpannastīrthayātrāparāyaṇaḥ babhūva śraddhayāyuktastyaktvā bheṣajamuttamam
तब वैराग्य को प्राप्त होकर और उत्तम औषधियों को भी त्यागकर, वह श्रद्धायुक्त होकर तीर्थयात्रा में तत्पर हो गया।
श्लोक 34 (skanda.6.63.34)
अथासौ भ्रममाणस्तु तीर्थान्यायतनानि च॥ संप्राप्तो ब्राह्मणश्रेष्ठाः प्रभासं क्षेत्रमुत्तमम्
athāsau bhramamāṇastu tīrthānyāyatanāni ca saṁprāpto brāhmaṇaśreṣṭhāḥ prabhāsaṁ kṣetramuttamam
तब भटकते हुए, तीर्थों और मंदिरों में घूमते हुए, हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! वह प्रभास नामक उत्तम क्षेत्र में पहुँचा।
श्लोक 35 (skanda.6.63.35)
तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा प्रभासं वीक्ष्य रात्रिपः॥ यावत्संप्रस्थितोन्यत्र तावदग्रे व्यवस्थितम्
tatra snātvā śucirbhūtvā prabhāsaṁ vīkṣya rātripaḥ yāvatsaṁprasthitonyatra tāvadagre vyavasthitam
वहाँ स्नान करके और शुद्ध होकर, प्रभास को देखकर रात्रिनाथ जैसे ही वहाँ से अन्यत्र जाने को उद्यत हुआ, तभी उसके सामने कोई खड़ा दिखाई दिया।
श्लोक 36 (skanda.6.63.36)
अपश्यद्रोमकंनाम स मुनि संशितव्रतम्॥ तपोवीर्यसमोपेतं सर्वसत्त्वानुकम्पकम्
apaśyadromakaṁnāma sa muni saṁśitavratam tapovīryasamopetaṁ sarvasattvānukampakam
उसने रोमक नामक एक मुनि को देखा, जो कठोर व्रतों का पालन करने वाला, तपोबल से सम्पन्न तथा समस्त प्राणियों पर दया करने वाला था।
श्लोक 37 (skanda.6.63.37)
तं दृष्ट्वा स प्रणम्योच्चै स्ततः प्रोवाच सादरम्॥ क्षयव्याधियुतश्चन्द्रो निर्वेदाद्द्विजसत्तमाः
taṁ dṛṣṭvā sa praṇamyoccai stataḥ provāca sādaram kṣayavyādhiyutaścandro nirvedāddvijasattamāḥ
उसे देखकर, गहरे विषाद में डूबा हुआ, क्षय रोग से पीड़ित चन्द्रमा उसे प्रणाम करके आदरपूर्वक बोला।
श्लोक 38 (skanda.6.63.38)
परिक्षीणोऽस्मि विप्रेंद्र क्षयव्याधिप्रभावतः॥ तस्मात्कुरु प्रतीकार महं त्वां शरणं गतः
parikṣīṇo'smi vipreṁdra kṣayavyādhiprabhāvataḥ tasmātkuru pratīkāra mahaṁ tvāṁ śaraṇaṁ gataḥ
'हे विप्रेन्द्र! मैं क्षय रोग के प्रभाव से अत्यंत क्षीण हो गया हूँ; अतः मेरा उपचार कीजिए, मैं आपकी शरण में आया हूँ।'
श्लोक 39 (skanda.6.63.39)
मया चिकित्सकाः पृष्टास्तैरुक्तं भेषजं कृतम्॥ अनेकधा महाभाग परिक्षीणो दिनेदिने
mayā cikitsakāḥ pṛṣṭāstairuktaṁ bheṣajaṁ kṛtam anekadhā mahābhāga parikṣīṇo dinedine
'हे महाभाग! मैंने वैद्यों से परामर्श लिया और उनके द्वारा बताई गई अनेक प्रकार की औषधियाँ भी लीं, फिर भी मैं दिन-प्रतिदिन क्षीण ही होता जा रहा हूँ।'
श्लोक 40 (skanda.6.63.40)
यदि नैवोपदेशं मे कञ्चित्त्वं संप्रदास्यसि॥ व्याधिनाशाय तत्तेन त्यक्ष्याम्यद्य कलेवरम्
yadi naivopadeśaṁ me kañcittvaṁ saṁpradāsyasi vyādhināśāya tattena tyakṣyāmyadya kalevaram
'यदि आप मुझे इस रोग के नाश हेतु कोई उपदेश नहीं देंगे, तो मैं आज ही अपने शरीर का त्याग कर दूँगा।'
श्लोक 41 (skanda.6.63.41)
रोमक उवाच॥ अन्यस्यापि निशानाथ न शापः कर्तुमन्यथा॥ शक्यते किं पुनस्तस्य दक्षस्यामिततेजसः
romaka uvāca anyasyāpi niśānātha na śāpaḥ kartumanyathā śakyate kiṁ punastasya dakṣasyāmitatejasaḥ
रोमक ने कहा — 'हे रात्रिनाथ! किसी साधारण व्यक्ति के शाप को भी अन्यथा नहीं किया जा सकता, फिर अमित तेजस्वी उस दक्ष के शाप की तो बात ही क्या!'
श्लोक 42 (skanda.6.63.42)
तस्मादत्रोपदेशं ते प्रयच्छामि सुसंमतम्॥ येन ते स्यादसंदिग्धं क्षयव्याधि परिक्षयः
tasmādatropadeśaṁ te prayacchāmi susaṁmatam yena te syādasaṁdigdhaṁ kṣayavyādhi parikṣayaḥ
'अतः मैं तुम्हें यहाँ एक सर्वस्वीकृत उपदेश देता हूँ, जिससे तुम्हारे क्षय रोग का सम्पूर्ण नाश निश्चय ही हो जाएगा।'
श्लोक 43 (skanda.6.63.43)
नादेयं किंचिदस्तीह देवदेवस्य शूलिनः॥ संप्रहृष्टस्य तद्वाक्यात्तस्मादाराधयस्व तम्
nādeyaṁ kiṁcidastīha devadevasya śūlinaḥ saṁprahṛṣṭasya tadvākyāttasmādārādhayasva tam
'प्रसन्न होने पर त्रिशूलधारी देवाधिदेव के लिए कुछ भी देना असंभव नहीं है; अतः उन्हीं की आराधना करो।'
श्लोक 44 (skanda.6.63.44)
अष्टषष्टिषु तीर्थेषु सत्यं वासः सदा क्षितौ॥ तेषु संस्थाप्य तल्लिंगं तस्य नाशाय रात्रिप
aṣṭaṣaṣṭiṣu tīrtheṣu satyaṁ vāsaḥ sadā kṣitau teṣu saṁsthāpya talliṁgaṁ tasya nāśāya rātripa
'पृथ्वी पर अड़सठ तीर्थों में सत्य ही उनका निवास सदा रहता है; हे रात्रिप! अपने रोग के नाश के लिए तुम उनमें उनका लिंग स्थापित करो।'
श्लोक 45 (skanda.6.63.45)
आराधय ततो नित्यं श्रद्धापूतेन चेतसा॥ संप्राप्स्यसि न संदेहः क्षयव्याधि परिक्षयम्
ārādhaya tato nityaṁ śraddhāpūtena cetasā saṁprāpsyasi na saṁdehaḥ kṣayavyādhi parikṣayam
'फिर श्रद्धा से पवित्र हुए मन से नित्य उनकी आराधना करो; तुम्हें निश्चय ही क्षय रोग का सम्पूर्ण नाश प्राप्त होगा।'
श्लोक 46 (skanda.6.63.46)
सूत उवाच॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा संप्रहृष्टो निशापतिः॥ तस्मिन्प्रभासके क्षेत्रे दिव्यलिंगानि शूलिनः॥ संस्थाप्य पूजयामास स्वनामांकानि भक्तितः
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā saṁprahṛṣṭo niśāpatiḥ tasminprabhāsake kṣetre divyaliṁgāni śūlinaḥ saṁsthāpya pūjayāmāsa svanāmāṁkāni bhaktitaḥ
सूत जी ने कहा — उसका यह वचन सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए रात्रिनाथ ने उस प्रभास क्षेत्र में त्रिशूलधारी के दिव्य लिंगों को अपने-अपने नाम से चिह्नित करके स्थापित किया और भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की।
श्लोक 47 (skanda.6.63.47)
ततस्तुष्टो महादेवस्तस्य संदर्शनं गतः॥ प्रोवाच वरदोऽस्मीति प्रार्थयस्व यथेप्सितम्
tatastuṣṭo mahādevastasya saṁdarśanaṁ gataḥ provāca varado'smīti prārthayasva yathepsitam
तब प्रसन्न होकर महादेव उसके समक्ष प्रकट हुए और बोले — 'मैं वरदाता हूँ; जो चाहो माँग लो।'
श्लोक 48 (skanda.6.63.48)
चन्द्र उवाच॥ परं क्षीणोऽस्मि देवेश यक्ष्मणाहं पदांतिकम्॥ प्राप्तस्तस्मात्परित्राहि नान्यत्संप्रार्थयाम्यहम्
candra uvāca paraṁ kṣīṇo'smi deveśa yakṣmaṇāhaṁ padāṁtikam prāptastasmātparitrāhi nānyatsaṁprārthayāmyaham
चन्द्रमा ने कहा — 'हे देवेश! मैं क्षय रोग से अत्यंत क्षीण हो चुका हूँ और मृत्यु के निकट पहुँच गया हूँ; अतः मेरी रक्षा कीजिए, मैं और कुछ नहीं माँगता।'
श्लोक 49 (skanda.6.63.49)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भगवान्वृषभध्वजः॥ दक्षमाहूय तत्रैव ततः प्रोवाच सादरम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ dakṣamāhūya tatraiva tataḥ provāca sādaram
उसका यह वचन सुनकर वृषभध्वज भगवान् शिव ने दक्ष को वहीं बुलाया और आदरपूर्वक उससे कहा।
श्लोक 50 (skanda.6.63.50)
एष चंद्रस्त्वया शप्तो जामाता न कृतं शुभम्॥ तस्मादनुग्रहं चास्य मम वाक्यात्समाचर
eṣa caṁdrastvayā śapto jāmātā na kṛtaṁ śubham tasmādanugrahaṁ cāsya mama vākyātsamācara
'यह चन्द्रमा, तुम्हारा दामाद, तुम्हारे द्वारा शापित हुआ है — यह अच्छा कार्य नहीं हुआ। अतः मेरे वचन से इस पर अनुग्रह करो।'
श्लोक 51 (skanda.6.63.51)
दक्ष उवाच॥ मया धर्म्यमपि प्रोक्तो वाक्यमेष कुबुद्धिमान्॥ नाकरोन्मे पुरः प्रोच्य करिष्यामीत्य सत्यवाक्
dakṣa uvāca mayā dharmyamapi prokto vākyameṣa kubuddhimān nākaronme puraḥ procya kariṣyāmītya satyavāk
दक्ष ने कहा — 'मैंने उसे धर्मयुक्त वचन कहा था, फिर भी इस दुर्बुद्धि ने उसका पालन नहीं किया; मेरे समक्ष मैं ऐसा करूँगा कहकर भी वह अपने वचन में सत्य नहीं रहा।'
श्लोक 52 (skanda.6.63.52)
तेन शप्तस्तु कोपेन सुतार्थे वृषभध्वज॥ हास्येनापि मया प्रोक्तं नान्यथा संप्रजायते
tena śaptastu kopena sutārthe vṛṣabhadhvaja hāsyenāpi mayā proktaṁ nānyathā saṁprajāyate
'इसलिए हे वृषभध्वज! मैंने अपनी पुत्रियों के लिए क्रोधवश उसे शाप दिया; और मैंने जो कह दिया, चाहे वह हँसी में ही क्यों न हो, वह अन्यथा नहीं हो सकता।'
श्लोक 53 (skanda.6.63.53)
देवदेव उवाच॥ अद्यप्रभृति सर्वास्ताः सुता एष निशाकरः॥ समाः संवीक्षते नित्यं मम वाक्यादसंशयम्
devadeva uvāca adyaprabhṛti sarvāstāḥ sutā eṣa niśākaraḥ samāḥ saṁvīkṣate nityaṁ mama vākyādasaṁśayam
देवाधिदेव ने कहा — 'आज से यह चन्द्रमा मेरे वचन से निःसंदेह तुम्हारी सभी पुत्रियों को सदा समान दृष्टि से देखेगा।'
श्लोक 54 (skanda.6.63.54)
तस्मात्पक्षं क्षयं यातु पक्षं वृद्धिं प्रगच्छतु॥ येन ते स्याद्वचः सत्यं मत्प्रसादसमन्वितम्
tasmātpakṣaṁ kṣayaṁ yātu pakṣaṁ vṛddhiṁ pragacchatu yena te syādvacaḥ satyaṁ matprasādasamanvitam
'अतः वह एक पक्ष में क्षीण हो और दूसरे पक्ष में वृद्धि को प्राप्त हो, जिससे तुम्हारा वचन भी सत्य रहे और मेरी कृपा भी बनी रहे।'
श्लोक 55 (skanda.6.63.55)
ततो दक्षस्तथेत्युक्त्वा जगाम निजमन्दिरम्॥ देवोऽपि शंकरो भूयः प्रोवाच शशलांछनम्
tato dakṣastathetyuktvā jagāma nijamandiram devo'pi śaṁkaro bhūyaḥ provāca śaśalāṁchanam
तब दक्ष 'ऐसा ही हो' कहकर अपने धाम को चले गए; और भगवान् शंकर ने पुनः शशलांछन चन्द्रमा से कहा।
श्लोक 56 (skanda.6.63.56)
भूयोऽपि प्रार्थयाभीष्टं मत्तस्त्वं शशलांछन॥ येन सर्वं प्रयच्छामि यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
bhūyo'pi prārthayābhīṣṭaṁ mattastvaṁ śaśalāṁchana yena sarvaṁ prayacchāmi yadyapi syātsudurlabham
'हे शशलांछन! तुम मुझसे पुनः जो चाहो माँगो, मैं तुम्हें वह सब कुछ दूँगा, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।'
श्लोक 57 (skanda.6.63.57)
चन्द्र उवाच॥ यदि तुष्टोऽसि देवेश यदि देयो वरो मम॥ तत्स्थापितेषु लिंगेषु मया सर्वेषु सर्वदा॥ संनिधानं त्वया कार्यं लोकानां हित काम्यया
candra uvāca yadi tuṣṭo'si deveśa yadi deyo varo mama tatsthāpiteṣu liṁgeṣu mayā sarveṣu sarvadā saṁnidhānaṁ tvayā kāryaṁ lokānāṁ hita kāmyayā
चन्द्रमा ने कहा — 'हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो मेरे द्वारा स्थापित उन सभी लिंगों में, लोकहित की कामना से, आप सदा उपस्थित रहें।'
श्लोक 58 (skanda.6.63.58)
देव उवाच॥ अष्टषष्टिषु लिंगेषु स्थापितेषु त्वया विभो॥ सोमवारेण सांनिध्यं करिष्ये वचनात्तव
deva uvāca aṣṭaṣaṣṭiṣu liṁgeṣu sthāpiteṣu tvayā vibho somavāreṇa sāṁnidhyaṁ kariṣye vacanāttava
भगवान् ने कहा — 'हे विभो! तुम्हारे द्वारा स्थापित उन अड़सठ लिंगों में, तुम्हारे वचन से, मैं सोमवार के दिन अपनी उपस्थिति दूँगा।'
श्लोक 59 (skanda.6.63.59)
एवमुक्त्वा स देवेशस्ततश्चादर्शनं गतः॥ चन्द्रोऽपि हर्षसंयुक्तः समं पश्यति तास्ततः
evamuktvā sa deveśastataścādarśanaṁ gataḥ candro'pi harṣasaṁyuktaḥ samaṁ paśyati tāstataḥ
ऐसा कहकर वे देवेश्वर अदृश्य हो गए; और चन्द्रमा भी हर्षित होकर तत्पश्चात् उन सभी को समान दृष्टि से देखने लगा।
श्लोक 60 (skanda.6.63.60)
सुता दक्षस्य विप्रेंद्रा शंकरस्य वचः स्मरन्॥ ततो हर्ष समायुक्ता वभूवुस्तदनंतरम्
sutā dakṣasya vipreṁdrā śaṁkarasya vacaḥ smaran tato harṣa samāyuktā vabhūvustadanaṁtaram
हे विप्रेन्द्रो! दक्ष की पुत्रियाँ भी शंकर के वचन का स्मरण करके तत्पश्चात् हर्षित हो गईं।
श्लोक 61 (skanda.6.63.61)
एवं सोमेश्वरास्तत्र बभूवुर्द्विजसत्तमाः॥ अष्टषष्टिषु तीर्थेषु तथान्येषु ततः परम्
evaṁ someśvarāstatra babhūvurdvijasattamāḥ aṣṭaṣaṣṭiṣu tīrtheṣu tathānyeṣu tataḥ param
इस प्रकार हे द्विजसत्तमो! उन अड़सठ तीर्थों में तथा तत्पश्चात् अन्य स्थानों में भी सोमेश्वर लिंग स्थापित हुए।