Skip to main content

नागर खण्ड · अध्याय 64

चमत्कारी देवी का माहात्म्य

अध्याय 63अध्याय-सूचीअध्याय 65

श्लोक 1 (skanda.6.64.1)

सूत उवाच॥ चमत्कारी पुरा देवी तत्रैवास्ति द्विजोत्तमाः॥ चमत्कारनरेंद्रेण स्थापिता श्रद्धया पुरा

sūta uvāca camatkārī purā devī tatraivāsti dvijottamāḥ camatkāranareṁdreṇa sthāpitā śraddhayā purā

सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो! वहीं पूर्वकाल में चमत्कारी नामक देवी हैं, जिन्हें राजा चमत्कार ने श्रद्धापूर्वक स्थापित किया था।

श्लोक 2 (skanda.6.64.2)

यया स महिषः पूर्वं निहतो दानवो रणे॥ कौमारव्रतधारिण्या मायाशतसहस्रधृक्

yayā sa mahiṣaḥ pūrvaṁ nihato dānavo raṇe kaumāravratadhāriṇyā māyāśatasahasradhṛk

उन्हीं देवी ने, जो कौमारी व्रत धारण करने वाली तथा लाखों मायाओं की स्वामिनी हैं, पूर्वकाल में महिषासुर नामक दानव को युद्ध में मार डाला था।

श्लोक 3 (skanda.6.64.3)

यदा तन्निर्मितं तत्र पुरं तेन महात्मना॥ तस्य संरक्षणार्थाय तदा सा स्थापिता द्विजाः

yadā tannirmitaṁ tatra puraṁ tena mahātmanā tasya saṁrakṣaṇārthāya tadā sā sthāpitā dvijāḥ

हे द्विजो! जब उस महात्मा ने वहाँ एक नगर बसाया, तब उसकी रक्षा के लिए उन देवी की स्थापना की गई।

श्लोक 4 (skanda.6.64.4)

पुरस्य तस्य रक्षार्थं तथा तत्पुरवासिनाम्॥ सर्वेषां ब्राह्मणेंद्राणां भक्त्या भावितचेतसाम्

purasya tasya rakṣārthaṁ tathā tatpuravāsinām sarveṣāṁ brāhmaṇeṁdrāṇāṁ bhaktyā bhāvitacetasām

उस नगर की रक्षा के लिए तथा उसमें निवास करने वाले, भक्ति में लीन मन वाले समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों की रक्षा के लिए भी।

श्लोक 5 (skanda.6.64.5)

यस्तामभ्यर्चयेत्सम्यङ्महानवमिवासरे॥ कृत्स्नं संवत्सरं तस्य न भयं जायते क्वचित्

yastāmabhyarcayetsamyaṅmahānavamivāsare kṛtsnaṁ saṁvatsaraṁ tasya na bhayaṁ jāyate kvacit

जो कोई महानवमी के दिन उनकी भली-भाँति पूजा करता है, उसे पूरे वर्ष कहीं भी कोई भय नहीं होता।

श्लोक 6 (skanda.6.64.6)

भूतप्रेतपिशाचेभ्यः शत्रुतश्च विशेषतः॥ रोगेभ्यस्तस्करेभ्यश्च दुष्टेभ्योऽन्येभ्य एव च

bhūtapretapiśācebhyaḥ śatrutaśca viśeṣataḥ rogebhyastaskarebhyaśca duṣṭebhyo'nyebhya eva ca

भूत, प्रेत, पिशाचों से, विशेष रूप से शत्रुओं से, रोगों से, चोरों से तथा अन्य दुष्टों से भी उसे कोई भय नहीं होता।

श्लोक 7 (skanda.6.64.7)

यंयं काममभिध्यायञ्छुक्लाष्टम्यां नरः शुचिः॥ तां पूजयति सद्भक्त्या स तमाप्नोत्यसंशयम्

yaṁyaṁ kāmamabhidhyāyañchuklāṣṭamyāṁ naraḥ śuciḥ tāṁ pūjayati sadbhaktyā sa tamāpnotyasaṁśayam

शुक्ल अष्टमी के दिन शुद्ध होकर मनुष्य जिस-जिस कामना का ध्यान करते हुए उनकी सच्ची भक्ति से पूजा करता है, वह निश्चय ही उसे प्राप्त करता है।

श्लोक 8 (skanda.6.64.8)

निष्कामः सुखमाप्नोति मोक्षं नास्त्यत्र संशयः॥ तस्या देव्याः प्रसादेन सत्यमेतन्मयोदितम्

niṣkāmaḥ sukhamāpnoti mokṣaṁ nāstyatra saṁśayaḥ tasyā devyāḥ prasādena satyametanmayoditam

जो निष्काम है, वह सुख और मोक्ष को प्राप्त करता है — इसमें कोई संदेह नहीं। यह मैंने उन देवी की कृपा से सत्य कहा है।

श्लोक 9 (skanda.6.64.9)

तामाराध्य गताः पूर्वं सिद्धिं भूरिर्महीभुजः॥ ब्राह्मणाश्च तथान्येऽपि योगिनः परमेश्वरीम्

tāmārādhya gatāḥ pūrvaṁ siddhiṁ bhūrirmahībhujaḥ brāhmaṇāśca tathānye'pi yoginaḥ parameśvarīm

उस परमेश्वरी की आराधना करके पूर्वकाल में अनेक राजाओं ने, ब्राह्मणों ने तथा अन्य योगियों ने भी सिद्धि प्राप्त की।

श्लोक 10 (skanda.6.64.10)

यस्तस्याः श्रद्धयोपेतः प्रकरोति प्रदक्षिणाम्॥ नित्यं संवत्सरं यावत्तिर्यग्योनौ न स व्रजेत्॥६.६४,

yastasyāḥ śraddhayopetaḥ prakaroti pradakṣiṇām nityaṁ saṁvatsaraṁ yāvattiryagyonau na sa vrajet6.64,

जो श्रद्धायुक्त होकर एक वर्ष तक नित्य उनकी परिक्रमा करता है, वह पशु-योनि को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 11 (skanda.6.64.11)

तस्या आयतने पूर्वमाश्चर्यमभवन्महत्॥ यत्तद्वः कीर्तयिष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिताः

tasyā āyatane pūrvamāścaryamabhavanmahat yattadvaḥ kīrtayiṣyāmi śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ

उनके मंदिर में पूर्वकाल में एक महान आश्चर्य घटित हुआ था; अब मैं वह तुम्हें सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो।

श्लोक 12 (skanda.6.64.12)

आसीच्चित्ररथोनाम पूर्वं पार्थिवसत्तमः॥ दशार्णाधिपतिः ख्यातः सर्वशत्रुनिबर्हणः

āsīccitrarathonāma pūrvaṁ pārthivasattamaḥ daśārṇādhipatiḥ khyātaḥ sarvaśatrunibarhaṇaḥ

पूर्वकाल में चित्ररथ नामक एक श्रेष्ठ राजा था, जो दशार्ण देश का स्वामी और समस्त शत्रुओं का नाशक होने के लिए विख्यात था।

श्लोक 13 (skanda.6.64.13)

शुक्लाष्टम्यां सदा भक्त्या स तस्याः श्रद्धयान्वितः॥ अष्टोत्तरशतं यावत्प्रचकार प्रदक्षिणाम्

śuklāṣṭamyāṁ sadā bhaktyā sa tasyāḥ śraddhayānvitaḥ aṣṭottaraśataṁ yāvatpracakāra pradakṣiṇām

वह सदा शुक्ल अष्टमी के दिन भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर उनकी एक सौ आठ परिक्रमाएँ किया करता था।

श्लोक 14 (skanda.6.64.14)

ततः प्रणम्य तां देवीं संप्रयाति पुनर्गृहम्॥ सैन्येन चतुरंगेण समंतात्परिवारितः

tataḥ praṇamya tāṁ devīṁ saṁprayāti punargṛham sainyena caturaṁgeṇa samaṁtātparivāritaḥ

फिर उन देवी को प्रणाम करके, चतुरंगिणी सेना से चारों ओर से घिरा हुआ, वह पुनः अपने घर लौट जाता था।

श्लोक 15 (skanda.6.64.15)

एवं तस्य नरेंद्रस्य प्रदक्षिणरतस्य च॥ जगाम सुमहान्कालो देव्या भक्तिरतस्य च

evaṁ tasya nareṁdrasya pradakṣiṇaratasya ca jagāma sumahānkālo devyā bhaktiratasya ca

इस प्रकार परिक्रमा में रत तथा देवी-भक्ति में लीन उस राजा का बहुत लंबा समय बीत गया।

श्लोक 16 (skanda.6.64.16)

कस्यचित्त्वथ कालस्य स राजा तत्र संगतः॥ अपश्यद्ब्राह्मणश्रेष्ठान्देवीगृहसमाश्रितान्

kasyacittvatha kālasya sa rājā tatra saṁgataḥ apaśyadbrāhmaṇaśreṣṭhāndevīgṛhasamāśritān

तत्पश्चात् कुछ समय बीतने पर, वहाँ पहुँचकर राजा ने देवी के मंदिर में निवास करने वाले श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देखा।

श्लोक 17 (skanda.6.64.17)

ततः प्रदक्षिणां कृत्वा तां देवीं स महीपतिः

tataḥ pradakṣiṇāṁ kṛtvā tāṁ devīṁ sa mahīpatiḥ

तब उस देवी की परिक्रमा करके वह राजा —

श्लोक 18 (skanda.6.64.18)

अग्रस्थांस्तान्द्विजान्सर्वान्नमश्चक्रे समाहितः

agrasthāṁstāndvijānsarvānnamaścakre samāhitaḥ

— शांत चित्त से अपने सामने खड़े उन सभी ब्राह्मणों को प्रणाम किया।

श्लोक 19 (skanda.6.64.19)

ततस्तैः सहितैस्तत्र सहासीनः कथाः शुभाः॥ राजर्षीणां पुराणानां विप्रर्षीणां चकार ह

tatastaiḥ sahitaistatra sahāsīnaḥ kathāḥ śubhāḥ rājarṣīṇāṁ purāṇānāṁ viprarṣīṇāṁ cakāra ha

फिर वहाँ उनके साथ बैठकर उसने राजर्षियों, पुराणों और विप्रर्षियों की शुभ कथाएँ कीं।

श्लोक 20 (skanda.6.64.20)

ततः कस्मिन्कथांते स पृष्टस्तैर्द्विजसत्तमैः॥ कौतूहलसमोपेतैर्विनयावनतः स्थितः

tataḥ kasminkathāṁte sa pṛṣṭastairdvijasattamaiḥ kautūhalasamopetairvinayāvanataḥ sthitaḥ

फिर किसी कथा के अंत में, कौतूहल से भरे उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने विनयपूर्वक झुके हुए उस राजा से पूछा।

श्लोक 21 (skanda.6.64.21)

राजन्पृच्छामहे सर्वे त्वां वयं कौतुकान्विताः॥ तस्मात्कीर्तय चेद्गुह्यं न तत्तव व्यवस्थितम्

rājanpṛcchāmahe sarve tvāṁ vayaṁ kautukānvitāḥ tasmātkīrtaya cedguhyaṁ na tattava vyavasthitam

'हे राजन्! हम सब कौतूहल से भरकर तुमसे पूछते हैं; अतः बताओ — यदि यह तुम्हारे लिए गोपनीय न हो।'

श्लोक 22 (skanda.6.64.22)

मासिमासि सदाष्टम्यां त्वं शुक्लायां सुदूरतः॥ आगत्य देवतायाश्च प्रकरोषि प्रदक्षिणाम्

māsimāsi sadāṣṭamyāṁ tvaṁ śuklāyāṁ sudūrataḥ āgatya devatāyāśca prakaroṣi pradakṣiṇām

'प्रत्येक मास की शुक्ल अष्टमी को तुम बहुत दूर से आकर इस देवी की परिक्रमा करते हो।'

श्लोक 23 (skanda.6.64.23)

यत्नेनान्याः परित्यज्य सर्वाः पूजादिकाः क्रियाः॥ नूनं वेत्सि फलं कृत्स्नं यत्प्रदक्षिणसंभवम्

yatnenānyāḥ parityajya sarvāḥ pūjādikāḥ kriyāḥ nūnaṁ vetsi phalaṁ kṛtsnaṁ yatpradakṣiṇasaṁbhavam

'अन्य समस्त पूजा-विधियों को जान-बूझकर छोड़कर, निश्चय ही तुम परिक्रमा से उत्पन्न होने वाले सम्पूर्ण फल को जानते हो।'

श्लोक 24 (skanda.6.64.24)

राजोवाच॥॥ सत्यमेतद्द्विजश्रेष्ठा यद्भवद्भिरुदाहृतम्॥ रहस्यमपि वक्तव्यं युष्माकं सांप्रतं मया

rājovāca satyametaddvijaśreṣṭhā yadbhavadbhirudāhṛtam rahasyamapi vaktavyaṁ yuṣmākaṁ sāṁprataṁ mayā

राजा ने कहा — 'हे द्विजश्रेष्ठो! तुमने जो कहा वह सत्य है; अब मुझे तुम्हें अपना रहस्य भी बताना चाहिए।'

श्लोक 25 (skanda.6.64.25)

अहमास शुकः पूर्वमस्मिन्नायतने शुभे॥ देव्याः पश्चिमदिग्भागे कुलायकृतसंश्रयः

ahamāsa śukaḥ pūrvamasminnāyatane śubhe devyāḥ paścimadigbhāge kulāyakṛtasaṁśrayaḥ

'पूर्वजन्म में मैं इसी शुभ मंदिर में एक तोता था, जो देवी के पश्चिम दिशा भाग में अपने बनाए हुए घोंसले में रहता था।'

श्लोक 26 (skanda.6.64.26)

तत्र निर्गच्छतो नित्यं कुर्वतश्चप्रवेशनम्॥ प्रदक्षिणाभवद्देव्या नित्यमेव द्विजोत्तमाः

tatra nirgacchato nityaṁ kurvataścapraveśanam pradakṣiṇābhavaddevyā nityameva dvijottamāḥ

'हे द्विजोत्तमो! वहाँ प्रतिदिन बाहर निकलते और भीतर प्रवेश करते समय, मेरा वह आना-जाना ही नित्य देवी की परिक्रमा बन जाता था।'

श्लोक 27 (skanda.6.64.27)

ततः कालेन मे मृत्युः संजातोऽत्रैव मंदिरे॥ तत्प्रभावेण संजातो राजा जातिस्मरोऽत्र हि

tataḥ kālena me mṛtyuḥ saṁjāto'traiva maṁdire tatprabhāveṇa saṁjāto rājā jātismaro'tra hi

'फिर समय आने पर उसी मंदिर में मेरी मृत्यु हो गई; और उसी के प्रभाव से मैं यहाँ जातिस्मर राजा बनकर जन्मा।'

श्लोक 28 (skanda.6.64.28)

एतस्मात्कारणाद्दूरात्समभ्येत्य प्रदक्षिणाम्॥ करोम्यस्या द्विजश्रेष्ठा देवतायाः समाहितः

etasmātkāraṇāddūrātsamabhyetya pradakṣiṇām karomyasyā dvijaśreṣṭhā devatāyāḥ samāhitaḥ

'इसी कारण, हे द्विजश्रेष्ठो! मैं दूर से आकर, एकाग्र मन से इन देवी की परिक्रमा करता हूँ।'

श्लोक 29 (skanda.6.64.29)

पुरा भक्तिविहीनेन कुलाये वसता मया॥ कृता प्रदक्षिणा देव्यास्तेन जातोऽस्मि भूपतिः

purā bhaktivihīnena kulāye vasatā mayā kṛtā pradakṣiṇā devyāstena jāto'smi bhūpatiḥ

'पूर्वकाल में भक्ति से रहित होते हुए भी, केवल घोंसले में रहते हुए, मैंने देवी की परिक्रमा की थी; उसी से मैं राजा बनकर जन्मा हूँ।'

श्लोक 30 (skanda.6.64.30)

अधुना श्रद्धया युक्तो यत्करोमि प्रदक्षिणाम्॥ किं मे भविष्यति श्रेयस्तन्न वेद्मि द्विजोत्तमाः

adhunā śraddhayā yukto yatkaromi pradakṣiṇām kiṁ me bhaviṣyati śreyastanna vedmi dvijottamāḥ

'अब श्रद्धायुक्त होकर मैं जो परिक्रमा कर रहा हूँ, हे द्विजोत्तमो! उससे मुझे क्या श्रेय प्राप्त होगा, यह मैं नहीं जानता।'

श्लोक 31 (skanda.6.64.31)

सूत उवाच॥ तच्छ्रुत्वा तस्य ते विप्रा विस्मयोत्फुल्ललोचनाः॥ साधुवादं तथा चक्रुस्तस्य भूपस्य हर्षिताः

sūta uvāca tacchrutvā tasya te viprā vismayotphullalocanāḥ sādhuvādaṁ tathā cakrustasya bhūpasya harṣitāḥ

सूत जी ने कहा — यह सुनकर आश्चर्य से फैली आँखों वाले वे ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न होकर उस राजा की प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 32 (skanda.6.64.32)

ततः स पार्थिवः सर्वान्प्रणम्य द्विजसत्तमान्॥ अनुज्ञाप्य ययौ तूर्णं स्वगृहाय ससैनिकः

tataḥ sa pārthivaḥ sarvānpraṇamya dvijasattamān anujñāpya yayau tūrṇaṁ svagṛhāya sasainikaḥ

तब उस राजा ने उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों को प्रणाम करके, उनसे विदा लेकर, अपनी सेना सहित शीघ्र ही अपने घर को प्रस्थान किया।

श्लोक 33 (skanda.6.64.33)

अधुना श्रद्धया युक्तो यः करोति प्रदक्षिणाम्॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो लभते वांछितं फलम्

adhunā śraddhayā yukto yaḥ karoti pradakṣiṇām sarvapāpavinirmukto labhate vāṁchitaṁ phalam

अब जो कोई श्रद्धायुक्त होकर परिक्रमा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अपने अभीष्ट फल को प्राप्त करता है।

श्लोक 34 (skanda.6.64.34)

ततः प्रभृति ते विप्राः सर्वे भक्तिपुरःसराः॥ तस्याः प्रदक्षिणां चक्रुस्तथान्ये मुक्तिहेतवे

tataḥ prabhṛti te viprāḥ sarve bhaktipuraḥsarāḥ tasyāḥ pradakṣiṇāṁ cakrustathānye muktihetave

तभी से वे सभी ब्राह्मण भक्तिपूर्वक तथा अन्य लोग भी मुक्ति की कामना से उनकी परिक्रमा करने लगे।

श्लोक 35 (skanda.6.64.35)

प्राप्ताश्च परमां सिद्धिं वांछितां तत्प्रभावतः॥ इह लोके परे चैव दुर्लभां त्रिदशैरपि

prāptāśca paramāṁ siddhiṁ vāṁchitāṁ tatprabhāvataḥ iha loke pare caiva durlabhāṁ tridaśairapi

और उसी के प्रभाव से उन्होंने वह परम अभीष्ट सिद्धि प्राप्त की, जो इस लोक और परलोक दोनों में देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 36 (skanda.6.64.36)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तां देवीमिह संश्रयेत्॥ सर्वकामप्रदां नृणां तस्मिन्क्षेत्रे व्यवस्थिताम्

tasmātsarvaprayatnena tāṁ devīmiha saṁśrayet sarvakāmapradāṁ nṛṇāṁ tasminkṣetre vyavasthitām

अतः सम्पूर्ण प्रयत्न से उन देवी की शरण लेनी चाहिए, जो उस क्षेत्र में स्थित हैं और मनुष्यों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।

अध्याय 63अध्याय-सूचीअध्याय 65