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नागर खण्ड · अध्याय 65

शूद्र और प्रेतों की मुक्ति

अध्याय 64अध्याय-सूचीअध्याय 66

श्लोक 1 (skanda.6.65.1)

सूत उवाच॥ तथान्यदपि तत्रास्ति तडागं देवनिर्मितम्॥ यत्रानर्तो नृपः सिद्धः सुहयो नाम नामतः

sūta uvāca tathānyadapi tatrāsti taḍāgaṁ devanirmitam yatrānarto nṛpaḥ siddhaḥ suhayo nāma nāmataḥ

सूत जी ने कहा — वहाँ एक और भी सरोवर है, जो देवताओं द्वारा निर्मित है, जहाँ सुहय नामक राजा आनर्त ने सिद्धि प्राप्त की थी।

श्लोक 2 (skanda.6.65.2)

तेनैव भूभुजा तत्र लिंगं संस्थापितं शुभम्॥ आनर्तेश्वरसंज्ञं च सर्व सिद्धिप्रदं नृणाम्

tenaiva bhūbhujā tatra liṁgaṁ saṁsthāpitaṁ śubham ānarteśvarasaṁjñaṁ ca sarva siddhipradaṁ nṛṇām

उसी राजा ने वहाँ आनर्तेश्वर नामक एक शुभ लिंग स्थापित किया, जो मनुष्यों को समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाला है।

श्लोक 3 (skanda.6.65.3)

तत्रांगारकषष्ठ्यां यस्तडागे स्नानमाचरेत्॥ स प्राप्नोति नरः सिद्धिं यथाऽऽनर्ताधिपेन च

tatrāṁgārakaṣaṣṭhyāṁ yastaḍāge snānamācaret sa prāpnoti naraḥ siddhiṁ yathā''nartādhipena ca

जो मनुष्य अंगारक षष्ठी के दिन उस सरोवर में स्नान करता है, वह उसी प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है जैसे आनर्त के स्वामी ने की थी।

श्लोक 4 (skanda.6.65.4)

ऋषय ऊचुः॥ कथं सिद्धिस्तु संप्राप्ता आनर्तेन महात्मना॥ सर्वं कथय तत्सूत सर्वं वेत्सि न संशयः

ṛṣaya ūcuḥ kathaṁ siddhistu saṁprāptā ānartena mahātmanā sarvaṁ kathaya tatsūta sarvaṁ vetsi na saṁśayaḥ

ऋषियों ने कहा — महात्मा आनर्त ने सिद्धि कैसे प्राप्त की? हे सूत! वह सब हमें बताइए; आप सब कुछ जानते हैं, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 5 (skanda.6.65.5)

सूत उवाच॥ आनर्तः सुहयो नाम पुरासीत्पृथिवीपतिः॥ सर्वारिभिर्हतो युद्धे पलायनपरायणः॥ उच्छिष्टो म्लेच्छसंस्पृष्ट एकाकी बहुभिर्वृतः

sūta uvāca ānartaḥ suhayo nāma purāsītpṛthivīpatiḥ sarvāribhirhato yuddhe palāyanaparāyaṇaḥ ucchiṣṭo mlecchasaṁspṛṣṭa ekākī bahubhirvṛtaḥ

सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में सुहय नामक एक राजा आनर्त था; युद्ध में सभी शत्रुओं द्वारा पराजित होकर, भागने पर विवश, म्लेच्छों के स्पर्श से अशुद्ध, अकेला तथा अनेकों से घिरा हुआ था।

श्लोक 6 (skanda.6.65.6)

अथ तस्य कपालं च कापालिक व्रतान्वितः॥ जगृहे निजकर्मार्थं ज्ञात्वा तं वीरसंभवम्

atha tasya kapālaṁ ca kāpālika vratānvitaḥ jagṛhe nijakarmārthaṁ jñātvā taṁ vīrasaṁbhavam

तब एक कापालिक व्रतधारी साधु ने, उसे वीर-वंश में उत्पन्न जानकर, अपने कर्मकांड के लिए उसकी खोपड़ी ले ली।

श्लोक 7 (skanda.6.65.7)

आनर्तेश्वरसांनिध्ये वसमानो वने स्थितः॥ स रात्रौ तेन तोयेन सर्वदेवमयेन च

ānarteśvarasāṁnidhye vasamāno vane sthitaḥ sa rātrau tena toyena sarvadevamayena ca

आनर्तेश्वर के समीप वन में निवास करते हुए, वह साधु रात्रि में उस जल से, जो समस्त देवमय माना जाता था —

श्लोक 8 (skanda.6.65.8)

तडागोत्थेन संपूर्णं रात्रौ कृत्वा प्रमुंचति॥ आसीत्पूर्वं वणिङ्नाम्ना सिद्धसेन इति स्मृतः॥ धनी भृत्यसमोपेतः सदा पुण्यपरायणः

taḍāgotthena saṁpūrṇaṁ rātrau kṛtvā pramuṁcati āsītpūrvaṁ vaṇiṅnāmnā siddhasena iti smṛtaḥ dhanī bhṛtyasamopetaḥ sadā puṇyaparāyaṇaḥ

— उसे सरोवर के जल से भरकर रात्रि में उड़ेल देता था। इससे पहले सिद्धसेन नामक एक धनी व्यापारी था, जो सेवकों से युक्त और सदा पुण्यकर्मों में तत्पर रहता था।

श्लोक 9 (skanda.6.65.9)

कस्यचित्त्वथ कालस्य पण्यबुद्ध्या द्विजोत्तमाः॥ प्रस्थितश्चोत्तरां काष्ठां स सार्थेन समन्वितः

kasyacittvatha kālasya paṇyabuddhyā dvijottamāḥ prasthitaścottarāṁ kāṣṭhāṁ sa sārthena samanvitaḥ

तत्पश्चात् कुछ समय बीतने पर, हे द्विजोत्तमो! व्यापार की इच्छा से वह अपने कारवां के साथ उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा।

श्लोक 10 (skanda.6.65.10)

अथ प्राप्तः क्रमात्सर्वैः स गच्छन्मरुमंडल म्॥ वृक्षोदकपरित्यक्तं सर्वसत्त्वविवर्जितम्

atha prāptaḥ kramātsarvaiḥ sa gacchanmarumaṁḍala m vṛkṣodakaparityaktaṁ sarvasattvavivarjitam

फिर सभी के साथ यात्रा करते हुए, वह क्रमशः एक मरुभूमि में पहुँचा, जो वृक्षों और जल से रहित तथा समस्त प्राणियों से विहीन थी।

श्लोक 11 (skanda.6.65.11)

तत्र रात्रिं समासाद्य श्रांताः पांथाः समन्ततः॥ सुप्ताः स्थानानि संसृत्य गता निद्रावशं तथा

tatra rātriṁ samāsādya śrāṁtāḥ pāṁthāḥ samantataḥ suptāḥ sthānāni saṁsṛtya gatā nidrāvaśaṁ tathā

वहाँ रात्रि होने पर, थके हुए यात्री चारों ओर अपने-अपने स्थानों पर फैलकर सो गए और निद्रा के वशीभूत हो गए।

श्लोक 12 (skanda.6.65.12)

ततः प्रत्यूषमासाद्य समुत्थाय च सत्वरम्॥ प्रस्थिता उत्तरां काष्ठां मुक्त्वैकं शूद्रसेवकम्

tataḥ pratyūṣamāsādya samutthāya ca satvaram prasthitā uttarāṁ kāṣṭhāṁ muktvaikaṁ śūdrasevakam

फिर प्रातःकाल होते ही सभी शीघ्रता से उठकर, एक शूद्र सेवक को छोड़कर, उत्तर दिशा की ओर चल पड़े।

श्लोक 13 (skanda.6.65.13)

स वै मार्गपरिश्रांतो गत्वा निद्रावशं भृशम्॥ न जजागार जातेऽपि प्रयाणे बहुशब्दिते

sa vai mārgapariśrāṁto gatvā nidrāvaśaṁ bhṛśam na jajāgāra jāte'pi prayāṇe bahuśabdite

वह मार्ग की थकान से अत्यंत गहरी निद्रा में सो गया था और प्रस्थान के समय बहुत शोर होने पर भी नहीं जागा।

श्लोक 14 (skanda.6.65.14)

न च तैः स स्मृतः सार्थैर्यैः समं प्रस्थितो गृहात्॥ न च केनापि संदृष्टः स तु रोधसि संस्थितः

na ca taiḥ sa smṛtaḥ sārthairyaiḥ samaṁ prasthito gṛhāt na ca kenāpi saṁdṛṣṭaḥ sa tu rodhasi saṁsthitaḥ

जिन साथियों के साथ वह घर से चला था, उन्होंने भी उसे याद नहीं किया, और न ही किसी ने उसे देखा, क्योंकि वह एक ओर पड़ा हुआ था।

श्लोक 15 (skanda.6.65.15)

एवं गते ततः सार्थे प्रोद्गते सूर्यमंडले॥ तीव्रतापपरिस्पृष्टो जजागार ततः परम्

evaṁ gate tataḥ sārthe prodgate sūryamaṁḍale tīvratāpaparispṛṣṭo jajāgāra tataḥ param

इस प्रकार कारवां के चले जाने पर और सूर्य के उदय होने पर, तीव्र गर्मी से झुलसकर वह तब जाग उठा।

श्लोक 16 (skanda.6.65.16)

यावत्पश्यति नो किञ्चित्तस्मिन्स्थाने स सार्थकम्॥ न च तेषां मरौ तस्मिँल्लक्ष्यते पदपद्धतिः

yāvatpaśyati no kiñcittasminsthāne sa sārthakam na ca teṣāṁ marau tasmi~llakṣyate padapaddhatiḥ

उस स्थान पर उसे कारवां का कुछ भी दिखाई नहीं दिया; और उस मरुभूमि में उनके पैरों के निशान भी दिखाई नहीं दिए।

श्लोक 17 (skanda.6.65.17)

ततो दुःखपरीतात्मा धावमान इतस्ततः॥ पतितो मेदिनीपृष्ठे मध्याह्ने क्षुत्तृषार्दितः

tato duḥkhaparītātmā dhāvamāna itastataḥ patito medinīpṛṣṭhe madhyāhne kṣuttṛṣārditaḥ

तब दुःख से व्याकुल होकर, इधर-उधर दौड़ते हुए, वह मध्याह्न में भूख-प्यास से पीड़ित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 18 (skanda.6.65.18)

एवं तस्य तृषार्तस्य पतितस्य धरातले॥ धृतप्राणस्य कृच्छ्रेण संयातोऽस्ताचलं रविः

evaṁ tasya tṛṣārtasya patitasya dharātale dhṛtaprāṇasya kṛcchreṇa saṁyāto'stācalaṁ raviḥ

इस प्रकार पृथ्वी पर गिरे हुए, प्यास से पीड़ित तथा बड़ी कठिनाई से प्राण धारण किए हुए उसके ऊपर सूर्य अस्ताचल की ओर चला गया।

श्लोक 19 (skanda.6.65.19)

ततः किंचित्ससंज्ञोऽभून्मंदीभूते दिवाकरे॥ चिन्तयामास चित्तेन क्वाहं गच्छामि सांप्रतम्

tataḥ kiṁcitsasaṁjño'bhūnmaṁdībhūte divākare cintayāmāsa cittena kvāhaṁ gacchāmi sāṁpratam

तब सूर्य के मंद होने पर उसे कुछ चेतना आई, और उसने मन में सोचा — 'अब मैं कहाँ जाऊँ?'

श्लोक 20 (skanda.6.65.20)

न लक्ष्यते क्वचिन्मार्गो दृश्यते न च मानुषम्॥ नात्र तोयं न च च्छाया नूनं मे मृत्यु रागतः

na lakṣyate kvacinmārgo dṛśyate na ca mānuṣam nātra toyaṁ na ca cchāyā nūnaṁ me mṛtyu rāgataḥ

'यहाँ कोई मार्ग दिखाई नहीं देता, न ही कोई मनुष्य दिखता है। यहाँ न जल है, न छाया; निश्चय ही अब मेरी मृत्यु निकट आ गई है।'

श्लोक 21 (skanda.6.65.21)

एवं चिन्ताप्रपन्नस्य तस्य शूद्रस्य निर्जने॥ मरौ तस्मिन्समायाता शर्वरी तदनन्तरम्

evaṁ cintāprapannasya tasya śūdrasya nirjane marau tasminsamāyātā śarvarī tadanantaram

इस प्रकार चिंता में डूबे हुए उस शूद्र के लिए उस निर्जन मरुभूमि में तत्पश्चात् रात्रि हो गई।

श्लोक 22 (skanda.6.65.22)

अथ क्षणेन शुश्राव स गीतं मधुरध्वनि॥ पठतां नन्दिवृद्धानां तथा शब्दं मनोहरम्

atha kṣaṇena śuśrāva sa gītaṁ madhuradhvani paṭhatāṁ nandivṛddhānāṁ tathā śabdaṁ manoharam

तब क्षणभर में उसने मधुर स्वर में गान सुना, तथा वृद्ध पुरुषों के पाठ करने का मनोहर शब्द सुना।

श्लोक 23 (skanda.6.65.23)

अथापश्यत्क्षणेनैव प्रेतसंघैः सभावृतम्॥ प्रेतमेकं च सर्वेषामाधिपत्ये व्यव स्थितम्

athāpaśyatkṣaṇenaiva pretasaṁghaiḥ sabhāvṛtam pretamekaṁ ca sarveṣāmādhipatye vyava sthitam

तभी क्षणभर में उसने प्रेतों के समूह से घिरी हुई एक सभा देखी, जिसमें एक प्रेत उन सबका अधिपति होकर स्थित था।

श्लोक 24 (skanda.6.65.24)

ततस्ते पार्श्वगाः प्रेता एके नृत्यं प्रचक्रिरे॥ तत्पुरो गीतमन्ये तु स्तुतिं चैव तथा परे

tataste pārśvagāḥ pretā eke nṛtyaṁ pracakrire tatpuro gītamanye tu stutiṁ caiva tathā pare

तब उसके निकट खड़े कुछ प्रेत नृत्य करने लगे, कुछ उसके सामने गीत गाने लगे, और कुछ अन्य स्तुति करने लगे।

श्लोक 25 (skanda.6.65.25)

अथासौ प्राह तं शूद्रमतिथे कुरु भोजनम्॥ स्वेच्छया पिब तोयं च श्रेयो येन भवेन्मम

athāsau prāha taṁ śūdramatithe kuru bhojanam svecchayā piba toyaṁ ca śreyo yena bhavenmama

तब उसने उस शूद्र से कहा — 'हे अतिथि! भोजन करो, अपनी इच्छानुसार जल पीओ, जिससे मेरा भी कल्याण हो।'

श्लोक 26 (skanda.6.65.26)

ततः स भोजनं चक्रे क्षुधार्तश्च पपौ जलम्॥ भयं त्यक्त्वा सुविश्रब्धः प्रेतराजस्य शासनात्

tataḥ sa bhojanaṁ cakre kṣudhārtaśca papau jalam bhayaṁ tyaktvā suviśrabdhaḥ pretarājasya śāsanāt

तब भूख से पीड़ित उसने भोजन किया और जल पिया, भय त्यागकर, प्रेतराज की आज्ञा से पूर्ण आश्वस्त होकर।

श्लोक 27 (skanda.6.65.27)

ततः प्रेताश्च ते सर्वे प्रेतत्वेन समन्विताः॥ यथाज्येष्ठं यथान्यायं प्रचक्रुर्भोजनक्रियाम्

tataḥ pretāśca te sarve pretatvena samanvitāḥ yathājyeṣṭhaṁ yathānyāyaṁ pracakrurbhojanakriyām

तब वे समस्त प्रेत भी अपने-अपने प्रेत-स्वभाव के अनुसार, ज्येष्ठता और नियमानुसार भोजन-क्रिया करने लगे।

श्लोक 28 (skanda.6.65.28)

एवं तेषां समस्तानां विलासैः पार्थिवोचितैः॥ अतिक्रान्ता निशा सर्वा क्रीडतां द्विजसत्तमाः

evaṁ teṣāṁ samastānāṁ vilāsaiḥ pārthivocitaiḥ atikrāntā niśā sarvā krīḍatāṁ dvijasattamāḥ

इस प्रकार हे द्विजसत्तमो! उन सबकी राजोचित लीलाओं और क्रीड़ाओं में सारी रात्रि व्यतीत हो गई।

श्लोक 29 (skanda.6.65.29)

ततः प्रभाते विमले प्रोद्गते रविमंडले॥ यावत्पश्यति शूद्रः स तावत्तत्र न किञ्चन

tataḥ prabhāte vimale prodgate ravimaṁḍale yāvatpaśyati śūdraḥ sa tāvattatra na kiñcana

फिर स्वच्छ प्रातःकाल होने पर और सूर्य के उदित होने पर, जब वह शूद्र देखता है, तो वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता।

श्लोक 30 (skanda.6.65.30)

ततश्च चिन्तयामास किमेतत्स्वप्नदर्शनम्॥ चित्तभ्रमोऽथवाऽस्माकमिन्द्रजालमथापि वा

tataśca cintayāmāsa kimetatsvapnadarśanam cittabhramo'thavā'smākamindrajālamathāpi vā

तब उसने सोचा — 'क्या यह कोई स्वप्न-दर्शन था? या मेरे मन का भ्रम? अथवा कोई इन्द्रजाल ही था?'

श्लोक 31 (skanda.6.65.31)

अथवा सत्यमेतद्धि यतो मे तृप्तिरुत्तमा॥ संजातेयं क्षुधार्त्तस्य पिपासाकुलितस्य च

athavā satyametaddhi yato me tṛptiruttamā saṁjāteyaṁ kṣudhārttasya pipāsākulitasya ca

'अथवा यह सत्य ही था, क्योंकि भूखे और प्यास से व्याकुल मुझे यह उत्तम तृप्ति प्राप्त हुई है।'

श्लोक 32 (skanda.6.65.32)

एवं चिन्तयमानस्य भास्करो गगनांगणम्॥ समारुरोह तापेन तापयन्धरणीतलम्

evaṁ cintayamānasya bhāskaro gaganāṁgaṇam samāruroha tāpena tāpayandharaṇītalam

इस प्रकार सोचते हुए, सूर्य आकाश के आँगन में चढ़ गया और अपने ताप से पृथ्वी को तपाने लगा।

श्लोक 33 (skanda.6.65.33)

ततः कंचित्समाश्रित्य स्वल्पच्छायं महीरुहम्॥ प्राप्तवान्दिवसस्यांतं क्षुत्पिपासाप्रपीडितः

tataḥ kaṁcitsamāśritya svalpacchāyaṁ mahīruham prāptavāndivasasyāṁtaṁ kṣutpipāsāprapīḍitaḥ

तब किसी छोटी छाया वाले वृक्ष का सहारा लेकर, भूख-प्यास से पीड़ित होकर, उसने दिन का अंत किया।

श्लोक 34 (skanda.6.65.34)

ततो निशामुखे प्राप्ते भूयोऽपि प्रेतराजकम्॥ प्रेतैस्तैश्चसमोपेतं तथारूपं व्यलोकयत्

tato niśāmukhe prāpte bhūyo'pi pretarājakam pretaistaiścasamopetaṁ tathārūpaṁ vyalokayat

फिर रात्रि का प्रारंभ होने पर, उसने पुनः उसी रूप में उन प्रेतों से घिरे हुए प्रेतराज को देखा।

श्लोक 35 (skanda.6.65.35)

तथैव भोजनं चक्रे तस्यातिथ्यसमुद्भवम्॥ भयेन रहितः शूद्रो हर्षेण महतान्वितः

tathaiva bhojanaṁ cakre tasyātithyasamudbhavam bhayena rahitaḥ śūdro harṣeṇa mahatānvitaḥ

पहले की भाँति ही, अब भय से रहित और अत्यंत हर्ष से युक्त होकर, वह शूद्र उसकी अतिथि-सेवा से उत्पन्न भोजन ग्रहण करने लगा।

श्लोक 36 (skanda.6.65.36)

एवं तस्य निशावक्त्रे नित्यमेव स भूपतिः॥ आतिथ्यं प्रकरोत्येव समागत्य तथैव च

evaṁ tasya niśāvaktre nityameva sa bhūpatiḥ ātithyaṁ prakarotyeva samāgatya tathaiva ca

इस प्रकार प्रत्येक रात्रि के आरंभ में वह राजा नित्य ही आकर उसी प्रकार उसकी आतिथ्य-सेवा करता रहा।

श्लोक 37 (skanda.6.65.37)

ततोऽन्यदिवसे प्राप्ते तेन शूद्रेण भूपतिः॥ पृष्टः किमेतदाश्चर्यं दृश्यते रजनीमुखे

tato'nyadivase prāpte tena śūdreṇa bhūpatiḥ pṛṣṭaḥ kimetadāścaryaṁ dṛśyate rajanīmukhe

फिर किसी अन्य दिन, उस शूद्र ने राजा से पूछा — 'यह रात्रि के आरंभ में दिखाई देने वाला आश्चर्य क्या है?'

श्लोक 38 (skanda.6.65.38)

विभवस्ते महाभाग प्रणश्यति निशाक्षये॥ एतत्कीर्तय मे गुह्यं न चेत्प्रेतप संस्थितम्॥ अत्र कौतूहलं जातं दृष्ट्वेदं सुविचेष्टितम्

vibhavaste mahābhāga praṇaśyati niśākṣaye etatkīrtaya me guhyaṁ na cetpretapa saṁsthitam atra kautūhalaṁ jātaṁ dṛṣṭvedaṁ suviceṣṭitam

'हे महाभाग! रात्रि समाप्त होते ही आपका यह वैभव नष्ट हो जाता है। हे प्रेतप! यदि यह गोपनीय न हो, तो मुझे बताइए; इस सुव्यवस्थित लीला को देखकर मेरे मन में बड़ा कौतूहल उत्पन्न हुआ है।'

श्लोक 39 (skanda.6.65.39)

प्रेत उवाच॥ अस्ति पुण्यं महाक्षेत्रं हाटकेश्वरसंज्ञितम्॥ गंगा च यमुना चैव स्थिते तत्र च संगमे

preta uvāca asti puṇyaṁ mahākṣetraṁ hāṭakeśvarasaṁjñitam gaṁgā ca yamunā caiva sthite tatra ca saṁgame

प्रेत ने कहा — 'एक पुण्य महाक्षेत्र है, जिसे हाटकेश्वर कहते हैं, जहाँ गंगा और यमुना का संगम स्थित है।'

श्लोक 40 (skanda.6.65.40)

ताभ्यामतिसमीपस्थं शिवस्यायतनं शुभम्॥ महाव्रतधरस्तत्र तपस्यति सुनैष्ठिकः

tābhyāmatisamīpasthaṁ śivasyāyatanaṁ śubham mahāvratadharastatra tapasyati sunaiṣṭhikaḥ

'उन दोनों के अत्यंत समीप शिव का एक शुभ मंदिर है; वहाँ महाव्रतधारी एक निष्ठावान तपस्वी तपस्या करता है।'

श्लोक 41 (skanda.6.65.41)

स सदा रात्रिशौचार्थं कपालं जलपूरितम्॥ मदीयं शयने चक्रे तत्र कृत्वा निजां क्रियाम्

sa sadā rātriśaucārthaṁ kapālaṁ jalapūritam madīyaṁ śayane cakre tatra kṛtvā nijāṁ kriyām

'वह सदा रात्रि में शौच के लिए, अपनी निजी क्रिया वहाँ करके, मेरी ही खोपड़ी को जल से भरकर अपनी शय्या के पास रखता है।'

श्लोक 42 (skanda.6.65.42)

तत्प्रभावान्ममेयं हि विभूतिर्जायते निशि॥ दिवा रिक्ते कृते याति भूय एव महामते

tatprabhāvānmameyaṁ hi vibhūtirjāyate niśi divā rikte kṛte yāti bhūya eva mahāmate

'उसी के प्रभाव से रात्रि में मेरा यह वैभव उत्पन्न होता है; हे महामते! दिन में उसे खाली कर देने पर वह पुनः लुप्त हो जाता है।'

श्लोक 43 (skanda.6.65.43)

तस्मात्कुरु प्रसादं मे तत्र गत्वा कपालकम्॥ चूर्णं कृत्वा मदीयं तत्तस्मिंस्तोये विनिक्षिप

tasmātkuru prasādaṁ me tatra gatvā kapālakam cūrṇaṁ kṛtvā madīyaṁ tattasmiṁstoye vinikṣipa

'अतः मुझ पर कृपा करो: वहाँ जाकर मेरी उस खोपड़ी को चूर्ण करके उसी जल में विसर्जित कर दो।'

श्लोक 44 (skanda.6.65.44)

येन मे जायते मोक्षः प्रेतभावात्सुदारुणात्

yena me jāyate mokṣaḥ pretabhāvātsudāruṇāt

'जिससे मुझे इस अत्यंत भयंकर प्रेत-अवस्था से मुक्ति प्राप्त हो सके।'

श्लोक 45 (skanda.6.65.45)

तथा तत्रास्ति पूर्वस्यां दिशि तत्तीर्थमुत्तमम्॥ गयाशिर इति ख्यातं प्रेतत्वान्मुक्तिदा यकम्

tathā tatrāsti pūrvasyāṁ diśi tattīrthamuttamam gayāśira iti khyātaṁ pretatvānmuktidā yakam

'और वहाँ पूर्व दिशा में वह उत्तम तीर्थ है, जो गयाशिर के नाम से विख्यात है और प्रेत-योनि से मुक्ति देने वाला है।'

श्लोक 46 (skanda.6.65.46)

तत्र गत्वा कुरु श्राद्धं सर्वेषां त्वं महामते॥ दृश्यते तव पार्श्वस्था भद्र संपुटिका शुभाम्

tatra gatvā kuru śrāddhaṁ sarveṣāṁ tvaṁ mahāmate dṛśyate tava pārśvasthā bhadra saṁpuṭikā śubhām

'हे महामते! वहाँ जाकर तुम सभी का श्राद्ध करो। तुम्हारे पास ही एक शुभ छोटी पेटिका दिखाई देगी।'

श्लोक 47 (skanda.6.65.47)

अस्यां नामानि सर्वेषां यथाज्येष्ठं समालिख॥ ततः श्राद्धं कुरुष्वाशु दयां कृत्वा गरीयसीम्

asyāṁ nāmāni sarveṣāṁ yathājyeṣṭhaṁ samālikha tataḥ śrāddhaṁ kuruṣvāśu dayāṁ kṛtvā garīyasīm

'उसमें हम सबके नाम ज्येष्ठता क्रम से लिख लो। फिर बड़ी दया करके शीघ्र ही श्राद्ध सम्पन्न करो।'

श्लोक 48 (skanda.6.65.48)

वयं त्वां तत्र नेष्यामः सुखोपायेन भद्रक॥ निधिं च दर्शयिष्यामः श्राद्धार्थं सुमहत्तरम्

vayaṁ tvāṁ tatra neṣyāmaḥ sukhopāyena bhadraka nidhiṁ ca darśayiṣyāmaḥ śrāddhārthaṁ sumahattaram

'हे भद्र! हम तुम्हें सुखपूर्वक वहाँ ले चलेंगे, और श्राद्ध के लिए एक बड़ा निधि भी दिखाएँगे।'

श्लोक 49 (skanda.6.65.49)

तथेति समनुज्ञाते तेन शूद्रेण सत्वरम्॥ निन्युस्तं स्कन्धमारोप्य शूद्रं क्षेत्रे यथोदितम्

tatheti samanujñāte tena śūdreṇa satvaram ninyustaṁ skandhamāropya śūdraṁ kṣetre yathoditam

उस शूद्र द्वारा 'ऐसा ही हो' कहकर सहमति देने पर, वे उसे शीघ्र ही अपने कंधों पर उठाकर, वर्णित उस क्षेत्र में ले गए।

श्लोक 50 (skanda.6.65.50)

दर्शयामासुरेवास्य निधानं भूरिवित्तजम्॥ तदादाय गतस्तत्र यत्रासौ नैष्ठिकः स्थितः

darśayāmāsurevāsya nidhānaṁ bhūrivittajam tadādāya gatastatra yatrāsau naiṣṭhikaḥ sthitaḥ

उन्होंने उसे प्रचुर धन देने वाला वह निधान दिखाया; उसे लेकर वह वहाँ गया, जहाँ वह निष्ठावान तपस्वी स्थित था।

श्लोक 51 (skanda.6.65.51)

ततः प्रणम्य तं भक्त्या कथ यामास विस्तरात्॥ तस्य भूतपतेः सर्वं वृत्तांतं विनयान्वितः

tataḥ praṇamya taṁ bhaktyā katha yāmāsa vistarāt tasya bhūtapateḥ sarvaṁ vṛttāṁtaṁ vinayānvitaḥ

तब भक्तिपूर्वक उसे प्रणाम करके, उसने विनयपूर्वक उस भूतपति की सम्पूर्ण कथा विस्तार से सुनाई।

श्लोक 52 (skanda.6.65.52)

ततो लब्ध्वा कपालं तच्चूर्णयित्वा समाहितः॥ गंगायमुनयोर्मध्ये प्रचिक्षेप मुदान्वितः

tato labdhvā kapālaṁ taccūrṇayitvā samāhitaḥ gaṁgāyamunayormadhye pracikṣepa mudānvitaḥ

तब उस खोपड़ी को प्राप्त कर, एकाग्र मन से उसे चूर्ण करके, उसने हर्षपूर्वक गंगा-यमुना के मध्य उसे विसर्जित कर दिया।

श्लोक 53 (skanda.6.65.53)

एतस्मिन्नंतरे प्रेतो दिव्यरूपवपुर्धरः॥ विमानस्थोऽब्रवीद्वाक्यं शूद्रं तं हर्षसंयुतः

etasminnaṁtare preto divyarūpavapurdharaḥ vimānastho'bravīdvākyaṁ śūdraṁ taṁ harṣasaṁyutaḥ

उसी क्षण वह प्रेत, अब दिव्य और तेजस्वी रूप धारण किए हुए, विमान पर बैठा हुआ, हर्षपूर्वक उस शूद्र से बोला।

श्लोक 54 (skanda.6.65.54)

प्रसादात्तव मुक्तोऽहं प्रेतत्वाद्दारुणादितः॥ स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सांप्रतं त्रिदिवालयम्

prasādāttava mukto'haṁ pretatvāddāruṇāditaḥ svasti te'stu gamiṣyāmi sāṁprataṁ tridivālayam

'तुम्हारी कृपा से मैं इस भयंकर प्रेत-अवस्था से मुक्त हुआ; तुम्हारा कल्याण हो — अब मैं देवलोक को जा रहा हूँ।'

श्लोक 55 (skanda.6.65.55)

एतेषामेव सर्वेषामिदानीं श्राद्धमाचर॥ गत्वा गयाशिरः पुण्यं येन मुक्तिः प्रजायते

eteṣāmeva sarveṣāmidānīṁ śrāddhamācara gatvā gayāśiraḥ puṇyaṁ yena muktiḥ prajāyate

'अब जाकर सभी अन्य प्रेतों के लिए भी उस पुण्य गयाशिर तीर्थ में श्राद्ध करो, जिससे उन सभी को भी मुक्ति प्राप्त हो सके।'

श्लोक 56 (skanda.6.65.56)

ततः स विस्मयाविष्टस्तेषामेव पृथक्पृथक्॥ श्राद्धं चक्रे च भूतानां नित्यमेव समाहितः

tataḥ sa vismayāviṣṭasteṣāmeva pṛthakpṛthak śrāddhaṁ cakre ca bhūtānāṁ nityameva samāhitaḥ

तब आश्चर्यचकित होकर उसने उन समस्त भूतों के लिए एकाग्रचित्त होकर पृथक्-पृथक् श्राद्ध सम्पन्न किया।

श्लोक 57 (skanda.6.65.57)

तेऽपि सर्वे गताः स्वर्गं प्रेतास्तस्य प्रभावतः॥ ददुश्च दर्शनं तस्य स्वप्रे हर्षसमन्विताः

te'pi sarve gatāḥ svargaṁ pretāstasya prabhāvataḥ daduśca darśanaṁ tasya svapre harṣasamanvitāḥ

उसी के प्रभाव से वे सभी प्रेत स्वर्ग को चले गए, और हर्षपूर्वक उसे स्वप्न में दर्शन दिए।

श्लोक 58 (skanda.6.65.58)

ततः शूद्रः स विज्ञाय तत्क्षेत्रं पुण्यवर्ध नम्॥ न जगाम गृहं भूयस्तत्रैव तपसि स्थितः

tataḥ śūdraḥ sa vijñāya tatkṣetraṁ puṇyavardha nam na jagāma gṛhaṁ bhūyastatraiva tapasi sthitaḥ

तब उस शूद्र ने उस क्षेत्र को पुण्यवर्धक जानकर पुनः घर नहीं लौटा, बल्कि वहीं तपस्या में स्थित हो गया।

श्लोक 59 (skanda.6.65.59)

गंगायमुनयोः पार्श्वे शूद्रकेश्वरसंज्ञितम्॥ लिगं संस्थापितं तेन सर्वपातकनाशनम्

gaṁgāyamunayoḥ pārśve śūdrakeśvarasaṁjñitam ligaṁ saṁsthāpitaṁ tena sarvapātakanāśanam

गंगा-यमुना के तट पर उसने शूद्रकेश्वर नामक एक लिंग स्थापित किया, जो समस्त पापों का नाशक है।

श्लोक 60 (skanda.6.65.60)

यस्तयोर्विधिवत्स्नानं कृत्वा पूजयते नरः॥ शूद्रकेश्वरसंज्ञं च लिंगं श्रद्धासमन्वितः

yastayorvidhivatsnānaṁ kṛtvā pūjayate naraḥ śūdrakeśvarasaṁjñaṁ ca liṁgaṁ śraddhāsamanvitaḥ

जो मनुष्य उन दोनों नदियों में विधिपूर्वक स्नान करके श्रद्धायुक्त होकर शूद्रकेश्वर नामक उस लिंग की पूजा करता है —

श्लोक 61 (skanda.6.65.61)

स सर्वैः पातकैर्मुक्तः प्रयाति शिव मंदिरम्॥ स्तूयमानश्च गंधर्वैर्विमानवरमाश्रितः

sa sarvaiḥ pātakairmuktaḥ prayāti śiva maṁdiram stūyamānaśca gaṁdharvairvimānavaramāśritaḥ

— वह समस्त पापों से मुक्त होकर, गंधर्वों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ, श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर शिवलोक को जाता है।

श्लोक 62 (skanda.6.65.62)

यस्तत्र त्यजति प्राणान्कृत्वा प्रायोपवेशनम्॥ न च भूयोऽत्र संसारे स जन्माप्नोति । मानवः

yastatra tyajati prāṇānkṛtvā prāyopaveśanam na ca bhūyo'tra saṁsāre sa janmāpnoti mānavaḥ

जो वहाँ प्रायोपवेशन करके अपने प्राण त्यागता है, वह मनुष्य इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेता।

श्लोक 63 (skanda.6.65.63)

गंडूषमपि तोयस्य यस्तस्य निवसन्पिबेत्॥ सोऽपि संमुच्यते पापादाजन्ममरणांतिकात्

gaṁḍūṣamapi toyasya yastasya nivasanpibet so'pi saṁmucyate pāpādājanmamaraṇāṁtikāt

जो वहाँ रहते हुए उस जल का एक कुल्ला भी पीता है, वह भी जन्म से लेकर मृत्यु तक के समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 64 (skanda.6.65.64)

यस्तत्र ब्राह्मणेंद्राणां संप्रयच्छति भोजनम्॥ पितरस्तस्य तृप्यंति यावत्कल्पशतत्रयम्

yastatra brāhmaṇeṁdrāṇāṁ saṁprayacchati bhojanam pitarastasya tṛpyaṁti yāvatkalpaśatatrayam

जो वहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उसके पितर तीन सौ कल्पों तक तृप्त रहते हैं।

श्लोक 65 (skanda.6.65.65)

त्रुटिमात्रं च यो दद्यात्तत्र स्वर्णं समाहितः॥ स प्राप्नोति फलं कृत्स्नं राजसूयाश्वमेधयोः

truṭimātraṁ ca yo dadyāttatra svarṇaṁ samāhitaḥ sa prāpnoti phalaṁ kṛtsnaṁ rājasūyāśvamedhayoḥ

और जो वहाँ एकाग्रचित्त होकर स्वर्ण का अत्यंत सूक्ष्म अंश भी दान करता है, वह राजसूय और अश्वमेध — दोनों यज्ञों का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।

श्लोक 66 (skanda.6.65.66)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्तीर्थवरमाश्रयेत्॥ य इच्छेच्छाश्वतं स्वर्गं सदैव मनुजो द्विजाः

tasmātsarvaprayatnena tattīrthavaramāśrayet ya icchecchāśvataṁ svargaṁ sadaiva manujo dvijāḥ

अतः हे द्विजो! जो मनुष्य शाश्वत स्वर्ग की इच्छा रखता है, उसे सदा सम्पूर्ण प्रयत्न से उस श्रेष्ठ तीर्थ का आश्रय लेना चाहिए।

श्लोक 67 (skanda.6.65.67)

अत्र गाथा पुरा गीता गौतमेन महर्षिणा॥ गंगायमुनयोस्तं च प्रभावं वीक्ष्य विस्मयात्

atra gāthā purā gītā gautamena maharṣiṇā gaṁgāyamunayostaṁ ca prabhāvaṁ vīkṣya vismayāt

यहाँ पूर्वकाल में महर्षि गौतम ने, गंगा-यमुना के उस प्रभाव को देखकर आश्चर्यचकित होकर, एक गाथा गाई थी।

श्लोक 68 (skanda.6.65.68)

गंगायमुनयोः संगे नरः स्नात्वा समाहितः॥ शूद्रेश्वरं समालोक्य सद्यः स्वर्गमवाप्नुयात्

gaṁgāyamunayoḥ saṁge naraḥ snātvā samāhitaḥ śūdreśvaraṁ samālokya sadyaḥ svargamavāpnuyāt

'गंगा-यमुना के संगम में एकाग्रचित्त होकर स्नान करके तथा शूद्रेश्वर का दर्शन करके, मनुष्य तत्काल स्वर्ग को प्राप्त होता है।'

श्लोक 69 (skanda.6.65.69)

एतद्वः सर्वमाख्यातं गंगायमुनयोर्मया॥ माहात्म्यं ब्राह्मणश्रेष्ठाः सर्वपातकनाशनम्

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ gaṁgāyamunayormayā māhātmyaṁ brāhmaṇaśreṣṭhāḥ sarvapātakanāśanam

हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! यह गंगा-यमुना का सम्पूर्ण माहात्म्य, जो समस्त पापों का नाशक है, मैंने तुम्हें बता दिया।

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