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नागर खण्ड · अध्याय 67

सहस्रार्जुन-वध

अध्याय 66अध्याय-सूचीअध्याय 68

श्लोक 1 (skanda.6.67.1)

सूत उवाच॥ एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो रामो भ्रातृभिरन्वितः॥ फलानि कन्दमूलानि गृहीत्वाऽऽश्रमसम्मुखः

sūta uvāca etasminnaṁtare prāpto rāmo bhrātṛbhiranvitaḥ phalāni kandamūlāni gṛhītvā''śramasammukhaḥ

सूत जी ने कहा — इसी बीच राम अपने भाइयों सहित फल तथा कंद-मूल लेकर आश्रम की ओर आ पहुँचे।

श्लोक 2 (skanda.6.67.2)

स दृष्ट्वा स्वाश्रमं ध्वस्तं पुलिन्दैर्बहुशो वृतम्॥ लकुटाश्मप्रहारैस्तु तां धेनुं जर्जरीकृताम्

sa dṛṣṭvā svāśramaṁ dhvastaṁ pulindairbahuśo vṛtam lakuṭāśmaprahāraistu tāṁ dhenuṁ jarjarīkṛtām

उसने अपने आश्रम को नष्ट-भ्रष्ट देखा, जो अनेक पुलिन्दों से घिरा हुआ था, तथा उस गाय को लाठियों और पत्थरों की मार से जर्जर देखा।

श्लोक 3 (skanda.6.67.3)

पप्रच्छ किमिदं सर्वं व्याकुलत्वमुपागतम्॥ आश्रमास्पदमाभीरैः पुलिन्दैश्च समावृतम्

papraccha kimidaṁ sarvaṁ vyākulatvamupāgatam āśramāspadamābhīraiḥ pulindaiśca samāvṛtam

उसने पूछा — 'यह सब क्या है, यह व्याकुलता कैसे आई? यह आश्रम-स्थल आभीरों और पुलिन्दों से क्यों घिर गया?'

श्लोक 4 (skanda.6.67.4)

केनैषा मामिका धेनुः प्रहारैर्जर्जरीकृता॥ तापस्यस्तापसाः सर्वे कस्मादेते रुदन्ति च

kenaiṣā māmikā dhenuḥ prahārairjarjarīkṛtā tāpasyastāpasāḥ sarve kasmādete rudanti ca

'किसने मेरी इस गाय को मार-मारकर जर्जर कर दिया? ये सभी तपस्वी इस प्रकार रो क्यों रहे हैं?'

श्लोक 5 (skanda.6.67.5)

क्व स मेऽद्य पिता वृद्धो माता च सुतवत्सला॥ न मामद्य यथापूर्वं स्नेहाच्चायाति सम्मुखी

kva sa me'dya pitā vṛddho mātā ca sutavatsalā na māmadya yathāpūrvaṁ snehāccāyāti sammukhī

'आज मेरे वृद्ध पिता कहाँ हैं? और पुत्रवत्सला माता भी आज पहले की भाँति स्नेहपूर्वक मुझसे मिलने क्यों नहीं आतीं?'

श्लोक 6 (skanda.6.67.6)

अथ तस्य समाचख्युर्वृत्तांतं सर्वतापसाः॥ यथादृष्टं सुदुःखार्ता सहस्रार्जुनचेष्टितम्

atha tasya samācakhyurvṛttāṁtaṁ sarvatāpasāḥ yathādṛṣṭaṁ suduḥkhārtā sahasrārjunaceṣṭitam

तब समस्त तपस्वियों ने, अत्यंत दुःखी होकर, जैसा उन्होंने देखा था, सहस्रार्जुन के कृत्य का सम्पूर्ण वृत्तांत उसे सुनाया।

श्लोक 7 (skanda.6.67.7)

ततस्ते भ्रातरः सर्वे वज्रपातोपमं वचः॥ श्रुत्वा दृष्ट्वा च तं शस्त्रैः खंडितं जनकं निजम्

tataste bhrātaraḥ sarve vajrapātopamaṁ vacaḥ śrutvā dṛṣṭvā ca taṁ śastraiḥ khaṁḍitaṁ janakaṁ nijam

तब वे सभी भाई, वज्रपात के समान उस वचन को सुनकर तथा अपने पिता को शस्त्रों से खंडित देखकर —

श्लोक 8 (skanda.6.67.8)

मातरं क्षतसर्वाङ्गीं प्राणशेषां व्यथान्विताम्॥ रुरुदुः शोकसन्तप्ता मुक्त्वा रामं महाबलम्

mātaraṁ kṣatasarvāṅgīṁ prāṇaśeṣāṁ vyathānvitām ruruduḥ śokasantaptā muktvā rāmaṁ mahābalam

— और अपनी माता को सर्वांग-क्षत, शेष प्राणों वाली तथा वेदना से पीड़ित देखकर, महाबली राम को छोड़कर वे सभी शोक-संतप्त होकर रोने लगे।

श्लोक 9 (skanda.6.67.9)

रुदित्वाथ चिरं कालं विप्रलप्य मुहुर्मुहुः॥ अन्त्येष्टिं चक्रिरे तस्य वेदोक्तविधिना ततः

ruditvātha ciraṁ kālaṁ vipralapya muhurmuhuḥ antyeṣṭiṁ cakrire tasya vedoktavidhinā tataḥ

तत्पश्चात् बहुत देर तक रोकर और बार-बार विलाप करके, उन्होंने वेदोक्त विधि से उनका अंत्येष्टि संस्कार सम्पन्न किया।

श्लोक 10 (skanda.6.67.10)

अथ दाहावसाने ते कृत्वा गर्तां यथोचिताम्॥ मुक्त्वा रामं ददुस्तोयं पितुः पुत्रास्तिलान्वितम्

atha dāhāvasāne te kṛtvā gartāṁ yathocitām muktvā rāmaṁ dadustoyaṁ pituḥ putrāstilānvitam

तत्पश्चात् दाह-संस्कार के अंत में, उचित गर्त बनाकर, राम को छोड़कर सभी पुत्रों ने अपने पिता को तिल-मिश्रित जल अर्पित किया।

श्लोक 11 (skanda.6.67.11)

अथान्यैस्तापसैः प्रोक्तो रामः शस्त्रभृतां वरः॥ न प्रयच्छसि कस्मात्त्वं प्रेतपित्रे जलांजलिम्

athānyaistāpasaiḥ prokto rāmaḥ śastrabhṛtāṁ varaḥ na prayacchasi kasmāttvaṁ pretapitre jalāṁjalim

तब अन्य तपस्वियों ने शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राम से कहा — 'तुम अपने दिवंगत पिता को जलांजलि क्यों नहीं दे रहे हो?'

श्लोक 12 (skanda.6.67.12)

अथासौ बहुधा प्रो क्तस्तापसैर्जमदग्निजः॥ प्रहारान्गणयन्मातुः शितशस्त्रविनिर्मितान्

athāsau bahudhā pro ktastāpasairjamadagnijaḥ prahārāngaṇayanmātuḥ śitaśastravinirmitān

तब तपस्वियों द्वारा बार-बार कहे जाने पर भी, जमदग्नि-पुत्र मौन रहे, अपनी माता पर तीक्ष्ण शस्त्रों से किए गए प्रहारों को गिनते हुए।

श्लोक 13 (skanda.6.67.13)

ततस्तानब्रवीद्रामो विनिःश्वस्य मुनीश्वरान्॥ निषेधस्तोयदानस्य श्रूयतां यन्मया कृतः

tatastānabravīdrāmo viniḥśvasya munīśvarān niṣedhastoyadānasya śrūyatāṁ yanmayā kṛtaḥ

तब राम ने गहरी साँस लेकर उन मुनीश्वरों से कहा — 'मैंने जल-दान का जो निषेध किया है, उसका कारण सुनिए।'

श्लोक 14 (skanda.6.67.14)

अपराधं विना तातः क्षत्रियेण हतोमम॥ एकविंशतिः प्रहाराणां मातुरंगे स्थिता मम

aparādhaṁ vinā tātaḥ kṣatriyeṇa hatomama ekaviṁśatiḥ prahārāṇāṁ māturaṁge sthitā mama

'बिना किसी अपराध के मेरे पिता को एक क्षत्रिय ने मार डाला। मेरी माता के शरीर पर इक्कीस घाव विद्यमान हैं।'

श्लोक 15 (skanda.6.67.15)

तस्मान्निःक्षत्रियामुर्वीं यद्यहं न करोमि वै॥ प्रहारसंख्यया विप्रास्तन्मे स्यात्सर्वपातकम्

tasmānniḥkṣatriyāmurvīṁ yadyahaṁ na karomi vai prahārasaṁkhyayā viprāstanme syātsarvapātakam

'अतः हे विप्रो! यदि मैं इन प्रहारों की संख्या के अनुसार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित नहीं करता, तो मुझे समस्त पापों का भागी होना पड़े।'

श्लोक 16 (skanda.6.67.16)

पितृमातृवधाज्जातं यत्कृतं तेन पाप्मना॥ क्षत्रियापसदेनात्र तथान्यदपि कुत्सितम्

pitṛmātṛvadhājjātaṁ yatkṛtaṁ tena pāpmanā kṣatriyāpasadenātra tathānyadapi kutsitam

'मेरे पिता-माता के वध से उत्पन्न जो पाप उस नीच क्षत्रिय ने किया, तथा जो अन्य निंदनीय कर्म भी किए —'

श्लोक 17 (skanda.6.67.17)

ततस्तस्यैव चान्येषां क्षत्रियाणां दुरात्मनाम्॥ रुधिरैः पूरयित्वेमां गर्तां पितृजलोचिताम्॥ तर्पयिष्यामि रक्तेन पितरं नाहमंभसा

tatastasyaiva cānyeṣāṁ kṣatriyāṇāṁ durātmanām rudhiraiḥ pūrayitvemāṁ gartāṁ pitṛjalocitām tarpayiṣyāmi raktena pitaraṁ nāhamaṁbhasā

'— अतः इस पितृ-जल के लिए बनाए गए गर्त को उस दुरात्मा तथा अन्य दुष्ट क्षत्रियों के रक्त से भरकर, मैं अपने पिता को जल से नहीं, रक्त से ही तृप्त करूँगा।'

श्लोक 18 (skanda.6.67.18)

सूत उवाच॥ श्रुत्वा ते दारुणां तस्य प्रतिज्ञां तापसोत्तमाः॥ परं विस्मयमापन्ना नोचुः किंचित्ततः परम्

sūta uvāca śrutvā te dāruṇāṁ tasya pratijñāṁ tāpasottamāḥ paraṁ vismayamāpannā nocuḥ kiṁcittataḥ param

सूत जी ने कहा — उसकी इस भयंकर प्रतिज्ञा को सुनकर वे श्रेष्ठ तपस्वी अत्यंत आश्चर्यचकित हो गए और इसके बाद कुछ भी नहीं बोले।

श्लोक 19 (skanda.6.67.19)

अथाशौचांतमासाद्य रामः क्रोधसमन्वितः॥ तीक्ष्णं परशुमादाय माहिष्मत्युन्मुखं ययौ

athāśaucāṁtamāsādya rāmaḥ krodhasamanvitaḥ tīkṣṇaṁ paraśumādāya māhiṣmatyunmukhaṁ yayau

तत्पश्चात् अशौच की अवधि समाप्त होने पर, क्रोध से भरे राम अपना तीक्ष्ण परशु लेकर माहिष्मती की ओर चल पड़े।

श्लोक 20 (skanda.6.67.20)

सर्वैस्तैः शबरैः सार्धं पुलिन्दैर्मेदकैस्तथा॥ बद्धगोधांगुलित्राणैर्वरबाणधनुर्धरैः

sarvaistaiḥ śabaraiḥ sārdhaṁ pulindairmedakaistathā baddhagodhāṁgulitrāṇairvarabāṇadhanurdharaiḥ

उन समस्त शबरों, पुलिन्दों तथा मेदों के साथ, जिन्होंने अपनी अँगुलियों पर चर्म-त्राण बाँध रखे थे और उत्तम धनुष-बाण धारण कर रखे थे।

श्लोक 21 (skanda.6.67.21)

तथाऽर्जुनोऽपि तं श्रुत्वा समायातं भृगूत्तमम्॥ सैन्येन महता युक्तं प्रतिज्ञाधारिणं तथा

tathā'rjuno'pi taṁ śrutvā samāyātaṁ bhṛgūttamam sainyena mahatā yuktaṁ pratijñādhāriṇaṁ tathā

और अर्जुन भी यह सुनकर कि भृगुवंश में श्रेष्ठ वह विशाल सेना के साथ अपनी प्रतिज्ञा लिए हुए आ रहा है —

श्लोक 22 (skanda.6.67.22)

ततस्तु सम्मुखो दृष्टो युद्धार्थं स विनिर्ययौ॥ सार्धं नानाविधैर्योधैः सर्वैर्देवासुरोपमैः

tatastu sammukho dṛṣṭo yuddhārthaṁ sa viniryayau sārdhaṁ nānāvidhairyodhaiḥ sarvairdevāsuropamaiḥ

— तब उसे सामने देखकर, वह भी विविध प्रकार के योद्धाओं के साथ, जो सभी देव-दानवों के समान थे, युद्ध के लिए निकल पड़ा।

श्लोक 23 (skanda.6.67.23)

अथाभवन्महायुद्धं पुलिन्दानां द्विजोत्तमाः॥ हैहयाधिपतेर्योधैः सार्धं देवासुरोपमैः

athābhavanmahāyuddhaṁ pulindānāṁ dvijottamāḥ haihayādhipateryodhaiḥ sārdhaṁ devāsuropamaiḥ

तब हे द्विजोत्तमो! पुलिन्दों तथा हैहयराज के देव-दानव सदृश योद्धाओं के बीच एक महायुद्ध हुआ।

श्लोक 24 (skanda.6.67.24)

ततस्ते हैहयाः सर्वे शरैराशीविषोपमैः॥ वध्यन्ते शबरैः संख्ये गर्जमानैर्मुहुर्मुहुः

tataste haihayāḥ sarve śarairāśīviṣopamaiḥ vadhyante śabaraiḥ saṁkhye garjamānairmuhurmuhuḥ

तब उस युद्ध में समस्त हैहय, बार-बार गर्जना करते हुए शबरों के विषधर सर्पों के समान बाणों से मारे जाने लगे।

श्लोक 25 (skanda.6.67.25)

ब्रह्महत्यासमुत्थेन पातकेन ततश्च ते॥ जाता निस्तेजसः सर्वे प्रपतंति धरातले

brahmahatyāsamutthena pātakena tataśca te jātā nistejasaḥ sarve prapataṁti dharātale

और फिर ब्रह्महत्या से उत्पन्न पाप के कारण वे सभी तेजहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 26 (skanda.6.67.26)

न कश्चित्पौरुषं तत्र संप्रदर्शयितुं क्षमः॥ पलायनपरा सर्वे वध्यन्ते निशितैः शरैः

na kaścitpauruṣaṁ tatra saṁpradarśayituṁ kṣamaḥ palāyanaparā sarve vadhyante niśitaiḥ śaraiḥ

उनमें से कोई भी पौरुष दिखाने में समर्थ नहीं रहा; सभी भागने में लगे हुए तीक्ष्ण बाणों से मारे गए।

श्लोक 27 (skanda.6.67.27)

अथ भग्नं बलं दृष्ट्वा हैहयाधिपतिः क्रुधा॥ स्वचापं वाञ्छयामास सज्यं कर्तुं त्वरान्वितः॥ शक्नोति नारोपयितुं सुयत्नमपि चाश्रितः

atha bhagnaṁ balaṁ dṛṣṭvā haihayādhipatiḥ krudhā svacāpaṁ vāñchayāmāsa sajyaṁ kartuṁ tvarānvitaḥ śaknoti nāropayituṁ suyatnamapi cāśritaḥ

तब अपनी सेना को टूटा हुआ देखकर, हैहयराज ने क्रोधपूर्वक शीघ्रता से अपने धनुष को चढ़ाना चाहा — किन्तु अत्यंत प्रयत्न करने पर भी वह उसे चढ़ा नहीं सका।

श्लोक 28 (skanda.6.67.28)

ततश्चाकर्षयामास खङ्गं कोशात्सुनिर्मलम्॥ आक्रष्टुं न च शक्रोति वैलक्ष्यं परमं गतः

tataścākarṣayāmāsa khaṅgaṁ kośātsunirmalam ākraṣṭuṁ na ca śakroti vailakṣyaṁ paramaṁ gataḥ

तब उसने म्यान से अपनी निर्मल तलवार खींचनी चाही, किंतु वह उसे भी नहीं खींच सका और अत्यंत विस्मय को प्राप्त हुआ।

श्लोक 29 (skanda.6.67.29)

गदया निर्जितो रौद्रो रावणो लोकरावणः॥ यया साप्यपतद्धस्तात्तत्क्षणात्पृथिवीतले

gadayā nirjito raudro rāvaṇo lokarāvaṇaḥ yayā sāpyapataddhastāttatkṣaṇātpṛthivītale

जिस गदा से भयंकर रावण, जो सम्पूर्ण लोकों को रुलाने वाला था, पराजित हुआ था, वही गदा भी उसी क्षण उसके हाथ से पृथ्वी पर गिर पड़ी।

श्लोक 30 (skanda.6.67.30)

नर्मदायाः प्रवाहो यैः सहस्राख्यैः करैः शुभैः॥ विधृतस्तेन ते सर्वे बभूवुः कम्पविह्वलाः

narmadāyāḥ pravāho yaiḥ sahasrākhyaiḥ karaiḥ śubhaiḥ vidhṛtastena te sarve babhūvuḥ kampavihvalāḥ

जिन हज़ार शुभ भुजाओं से उसने कभी नर्मदा के प्रवाह को रोक दिया था, वे सभी अब कँपकँपी से विह्वल हो गईं।

श्लोक 31 (skanda.6.67.31)

न शस्त्रं शेकुरुद्धर्तुं दैवयोगात्कथंचन॥ दिव्यास्त्राणां तथा सर्वे मन्त्रा विस्मृतिमागताः

na śastraṁ śekuruddhartuṁ daivayogātkathaṁcana divyāstrāṇāṁ tathā sarve mantrā vismṛtimāgatāḥ

दैव-योग से वे किसी भी प्रकार शस्त्र उठाने में समर्थ नहीं रहीं; और उसी प्रकार दिव्य अस्त्रों के समस्त मंत्र भी उसकी स्मृति से लुप्त हो गए।

श्लोक 32 (skanda.6.67.32)

एतस्मिन्नंतरे रामः संप्राप्तः क्रोधमूर्छितः॥ तीक्ष्णं परशुमुद्यम्य ततस्तं प्राह निष्ठुरम्

etasminnaṁtare rāmaḥ saṁprāptaḥ krodhamūrchitaḥ tīkṣṇaṁ paraśumudyamya tatastaṁ prāha niṣṭhuram

इसी बीच क्रोध से मूर्छित राम वहाँ पहुँचे, और अपना तीक्ष्ण परशु उठाकर उससे कठोरतापूर्वक कहा।

श्लोक 33 (skanda.6.67.33)

हैहयाधिपते पाप यैः करैर्जनको मम॥ त्वया विनिहतस्तान्मे शीघ्रं दर्शय सांप्रतम्

haihayādhipate pāpa yaiḥ karairjanako mama tvayā vinihatastānme śīghraṁ darśaya sāṁpratam

'हे पापी हैहयराज! जिन भुजाओं से तुमने मेरे पिता को मारा था, उन्हें अभी शीघ्र मुझे दिखाओ।'

श्लोक 34 (skanda.6.67.34)

ब्रह्मतेजोहतः सोऽपि प्रोक्तस्तेन सुनिष्ठुरम्॥ नोवाच चोत्तरं किंचिदालेख्ये लिखितो यथा

brahmatejohataḥ so'pi proktastena suniṣṭhuram novāca cottaraṁ kiṁcidālekhye likhito yathā

वह भी ब्रह्मतेज से आहत होकर, इतनी कठोरता से कहे जाने पर भी, कोई उत्तर नहीं दे सका, मानो किसी चित्र में अंकित हो।

श्लोक 35 (skanda.6.67.35)

ततो भुजवनं तस्य रामः शस्त्रभृतां वरः॥ मुहुर्मुहुर्विनिर्भर्त्स्य प्रचकर्त शनैःशनैः

tato bhujavanaṁ tasya rāmaḥ śastrabhṛtāṁ varaḥ muhurmuhurvinirbhartsya pracakarta śanaiḥśanaiḥ

तब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राम ने, बार-बार उसे धिक्कारते हुए, धीरे-धीरे उसकी उस भुजा-वन को काट डाला।

श्लोक 36 (skanda.6.67.36)

ततश्छित्त्वा शिरस्तस्य कुठारेण भृगूद्वहः॥ जग्राह रुधिरं यत्नात्प्रहारेभ्यः स्वयं द्विजाः

tataśchittvā śirastasya kuṭhāreṇa bhṛgūdvahaḥ jagrāha rudhiraṁ yatnātprahārebhyaḥ svayaṁ dvijāḥ

तब हे द्विजो! भृगुवंशी राम ने कुठार से उसका सिर काटकर, स्वयं यत्नपूर्वक उसके घावों से बहते रक्त को एकत्र किया।

श्लोक 37 (skanda.6.67.37)

पूरयित्वा महाकुम्भाञ्छबरेभ्यो ददौ ततः॥ म्लेच्छेभ्यो लुब्धकेभ्यश्च ततः प्रोवाच सादरम्

pūrayitvā mahākumbhāñchabarebhyo dadau tataḥ mlecchebhyo lubdhakebhyaśca tataḥ provāca sādaram

उससे बड़े-बड़े घड़े भरकर उसने उन्हें शबरों, म्लेच्छों तथा शिकारियों को दिया, और फिर आदरपूर्वक उनसे कहा।

श्लोक 38 (skanda.6.67.38)

हाटकेश्वरजे क्षेत्रे गर्ता मे भ्रातृभिः कृता॥ पितृसंतर्पणार्थाय सलिलेन परिप्लुता

hāṭakeśvaraje kṣetre gartā me bhrātṛbhiḥ kṛtā pitṛsaṁtarpaṇārthāya salilena pariplutā

'हाटकेश्वर क्षेत्र में मेरे भाइयों ने पितृ-तर्पण के लिए एक गर्त बनाया है, जो जल से भरा हुआ है।'

श्लोक 39 (skanda.6.67.39)

प्रक्षिपध्वं द्रुतं गत्वा तस्यां रक्तमिदं महत्॥ पापस्यास्य सपत्नस्य ममादेशादसंशयम्

prakṣipadhvaṁ drutaṁ gatvā tasyāṁ raktamidaṁ mahat pāpasyāsya sapatnasya mamādeśādasaṁśayam

'शीघ्र जाकर उसमें मेरे इस पापी शत्रु के इस विशाल रक्त को, मेरी आज्ञा से, निःसंदेह डाल दो।'

श्लोक 40 (skanda.6.67.40)

येन तातं निजं भक्त्या तर्पयित्वा विधानतः॥ ऋणस्य मुक्तिर्भवति येन मे पैतृकस्यच

yena tātaṁ nijaṁ bhaktyā tarpayitvā vidhānataḥ ṛṇasya muktirbhavati yena me paitṛkasyaca

'जिससे मैं भक्तिपूर्वक विधिवत् अपने पिता को तृप्त करके, अपने पितृ-ऋण से मुक्त हो सकूँ।'

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